तृतीय सोपान
अरण्यकाण्ड
वनवास, शूर्पणखा प्रसंग एवं माता सीता हरण की कथा।
अरण्यकाण्ड — सुनें
अरण्यकाण्ड — पढ़ें भी, सुनें भी
वनवास, शूर्पणखा प्रसंग एवं माता सीता हरण की कथा।
यह कथा शीघ्र ही यहाँ सुनने हेतु भी उपलब्ध होगी
मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददंवैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्।मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्वःसम्भवं शङ्करंवन्दे ब्रह्मकुलं कलंकशमनं श्रीरामभूपप्रियम्॥१॥
धर्मरूपी वृक्षकी जड़, विवेकरूपी सागरको आनंद देनेवाले पूर्णचंद्र, वैराग्यरूपी कमलको खिलानेवाले सूर्य, पापके घोर अंधकार और तीनों तापोंको मिटानेवाले, मोहरूपी बादलोंको छाँटनेमें आकाशसे उठी आँधीके समान, ब्रह्माके वंशज और कलंकनाशक राम के प्रिय शिवजीको मैं प्रणाम करता हूँ।
सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुन्दरंपाणौ बाणशरासनं कटिलसत्तूणीरभारं वरम्।राजीवायतलोचनं धृतजटाजूटेन संशोभितंसीतालक्ष्मणसंयुतं पथिगतं रामाभिरामं भजे॥२॥
जिनका शरीर घने बादलोंजैसा सुंदर श्याम और आनंदसे भरा है, जो सुंदर पीले वस्त्र पहने हैं, हाथोंमें धनुष-बाण लिए हैं, कमरमें तरकस सजा है, कमल-जैसे बड़े नेत्र हैं और सिरपर जटा सजी है - सीता और लक्ष्मणके साथ वनके रास्तेपर चलते उन मनमोहक राम को मैं भजता हूँ।
उमा राम गुन गूढ़ पंडित मुनि पावहिं बिरति।पावहिं मोह बिमूढ़ जे हरि बिमुख न धर्म रति॥
पार्वती, राम के गुण बहुत गहरे हैं - पंडित और मुनि इन्हें समझकर वैराग्य पाते हैं, पर जो भगवानसे विमुख हैं और धर्ममें जिनका मन नहीं लगता, वे मूढ़ इन्हें सुनकर भी मोहमें ही पड़े रहते हैं।
पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई॥अब प्रभु चरित सुनहु अति पावन। करत जे बन सुर नर मुनि भावन॥॥१॥
नगरवासियों और भरतके अनोखे, सुंदर प्रेमका मैंने अपनी बुद्धिभर गान किया। अब सुनो राम के वे परम पवित्र चरित्र, जो देवता, मनुष्य और मुनि सबको भाते हैं, और जो वे वनमें कर रहे हैं।
एक बार चुनि कुसुम सुहाए। निज कर भूषन राम बनाए॥सीतहि पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुंदर॥॥२॥
एक बार सुंदर फूल चुनकर राम ने अपने हाथोंसे तरह-तरहके गहने बनाए। फिर सुंदर स्फटिकशिलापर बैठकर उन्होंने बड़े आदरसे वे गहने सीताको पहनाए।
सुरपति सुत धरि बायस बेषा। सठ चाहत रघुपति बल देखा॥जिमि पिपीलिका सागर थाहा। महा मंदमति पावन चाहा॥॥३॥
इंद्रका मूर्ख बेटा जयंत कौएका रूप धरकर रघुनाथका बल परखना चाहता है - मानो कोई नादान चींटी समुद्रकी गहराई नापना चाहती हो।
सीता चरन चौंच हति भागा। मूढ़ मंदमति कारन कागा॥चला रुधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना॥॥४॥
उस मूर्खने कौआ बनकर सीताके पैरमें चोंच मार दी और उड़ चला। खून बहता देखकर रघुनाथ समझ गए और धनुषपर सरकंडेका बाण चढ़ा दिया।
अति कृपाल रघुनायक सदा दीन पर नेह।ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह॥१॥
रघुनाथ तो अत्यंत कृपालु हैं, दीनोंपर सदा उनका स्नेह रहता है - फिर भी अवगुणोंके घर उस मूर्ख जयंतने आकर उनसे छल किया।
प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा॥धरि निज रूप गयउ पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं॥॥१॥
मंत्रसे प्रेरित होकर वह ब्रह्मबाण दौड़ पड़ा, कौआ डरकर भाग खड़ा हुआ। असली रूपमें आकर वह पिता इंद्रके पास गया, पर राम का विरोधी जानकर इंद्रने भी उसे शरण नहीं दी।
भा निरास उपजी मन त्रासा। जथा चक्र भय रिषि दुर्बासा॥ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका। फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका॥॥२॥
निराश होकर उसके मनमें ऐसा भय समाया जैसे दुर्वासा ऋषिको सुदर्शनचक्रसे हुआ था। वह ब्रह्मलोक, शिवलोक जैसे सभी लोकोंमें थका-हारा, भय और शोकसे व्याकुल भटकता रहा।
काहूँ बैठन कहा न ओही। राखि को सकइ राम कर द्रोही॥मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना॥॥३॥
किसीने उसे बैठनेतकको नहीं कहा - राम के द्रोहीको भला कौन शरण दे? काकभुशुंडि कहते हैं, हे गरुड़, ऐसे व्यक्तिके लिए माता मृत्युके समान, पिता यमराजके समान और अमृत भी विषके समान हो जाता है।
मित्र करइ सत रिपु के करनी। ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी॥सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता॥॥४॥
मित्र भी सैकड़ों शत्रुओंकी तरह बर्ताव करने लगता है, गंगा भी उसके लिए वैतरणी बन जाती है। भाई, सुनो, जो रघुनाथसे विमुख हो जाता है, उसके लिए पूरी दुनिया आगसे भी ज्यादा तपती है।
नारद देखा बिकल जयंता। लागि दया कोमल चित संता॥पठवा तुरत राम पहिं ताही। कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही॥॥५॥
नारदने जयंतको इतना व्याकुल देखा तो संतोंके कोमल हृदयको दया आ गई। उन्होंने उसे तुरंत राम के पास भेज दिया, वहाँ उसने पुकारकर कहा - हे शरणागतवत्सल, मेरी रक्षा कीजिए।
आतुर सभय गहेसि पद जाई। त्राहि त्राहि दयाल रघुराई॥अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमंद जानि नहिं पाई॥॥६॥
आतुर और भयभीत जयंतने जाकर राम के चरण पकड़ लिए - हे दयालु रघुनाथ, बचाइए, बचाइए! आपके अतुलनीय बल और सामर्थ्यको मैं मंदबुद्धि समझ ही नहीं पाया था।
निज कृत कर्म जनित फल पायउँ। अब प्रभु पाहि सरन तकि आयउँ॥सुनि कृपाल अति आरत बानी। एकनयन करि तजा भवानी॥॥७॥
अपने ही कर्मका फल मैंने पा लिया, अब प्रभु रक्षा कीजिए, मैं आपकी शरणमें आया हूँ। शिवजी कहते हैं - पार्वती, कृपालु राम ने उसकी यह दुखभरी पुकार सुनकर उसे एक आँखसे काना करके छोड़ दिया।
कीन्ह मोह बस द्रोह जद्यपि तेहि कर बध उचित।प्रभु छाड़ेउ करि छोह को कृपाल रघुबीर सम॥२॥
उसने मोहवश द्रोह किया था, इसलिए वध ही उचित था, फिर भी प्रभुने दया करके उसे छोड़ दिया - रघुनाथ-जैसा कृपालु और कौन होगा?
रघुपति चित्रकूट बसि नाना। चरित किए श्रुति सुधा समाना॥बहुरि राम अस मन अनुमाना। होइहि भीर सबहिं मोहि जाना॥॥१॥
चित्रकूटमें रहते हुए रघुनाथने बहुत-से ऐसे चरित्र किए जो कानोंको अमृत-जैसे मीठे लगते हैं। फिर उन्होंने सोचा - अब सब लोग मुझे पहचान गए हैं, यहाँ भीड़ लग जाएगी।
सकल मुनिन्ह सन बिदा कराई। सीता सहित चले द्वौ भाई॥अत्रि के आश्रम जब प्रभु गयऊ। सुनत महामुनि हरषित भयऊ॥॥२॥
सो सब मुनियोंसे विदा लेकर सीतासहित दोनों भाई आगे चल पड़े। जब प्रभु अत्रिके आश्रम पहुँचे, तो उनका आना सुनते ही महामुनि हर्षसे भर उठे।
पुलकित गात अत्रि उठि धाए। देखि रामु आतुर चलि आए॥करत दंडवत मुनि उर लाए प्रेम बारि द्वौ जन अन्हवाए॥॥३॥
शरीर रोमांचित होकर अत्रि दौड़ पड़े, उन्हें आते देख राम भी और तेज़ी से बढ़े। दंडवत करते ही मुनिने उन्हें उठाकर गले लगा लिया और प्रेमके आँसुओंसे दोनों भाइयोंको नहला दिया।
देखि राम छबि नयन जुड़ाने। सादर निज आश्रम तब आने॥करि पूजा कहि बचन सुहाए। दिए मूल फल प्रभु मन भाए॥॥४॥
राम की छवि देखकर मुनिकी आँखें शीतल हो गईं, वे उन्हें आदरपूर्वक अपने आश्रम ले आए। पूजा करके, मीठे वचन कहकर उन्होंने फल-मूल दिए, जो प्रभुको बहुत भाए।
प्रभु आसन आसीन भरि लोचन सोभा निरखि।मुनिबर परम प्रबीन जोरि पानि अस्तुति करत॥३॥
प्रभु आसनपर विराजमान हैं, उनकी शोभा आँखें भरकर निहारते हुए परम प्रवीण मुनिश्रेष्ठ अत्रि हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे -
नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं।भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं॥१॥
हे भक्तवत्सल, हे कृपालु, हे कोमल स्वभाववाले, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। जो कुछ नहीं चाहते उन्हें भी अपना परमधाम दे देनेवाले आपके चरणकमलोंको मैं भजता हूँ।
निकाम श्याम सुंदरं। भवाम्बुनाथ मंदरं।प्रफुल्ल कंज लोचनं। मदादि दोष मोचनं॥२॥
आप नितांत सुंदर, श्यामवर्ण, संसाररूपी सागरको मथनेके लिए मंदराचल-समान, खिले कमल-जैसे नेत्रोंवाले और मद-जैसे दोषोंसे मुक्ति देनेवाले हैं।
प्रलंब बाहु विक्रमं। प्रभोऽप्रमेय वैभवं।निषंग चाप सायकं। धरं त्रिलोक नायकं॥३॥
प्रभु, आपकी लंबी भुजाओंका पराक्रम और आपका वैभव अपार है, आप तरकस-धनुष-बाण धारण किए तीनों लोकोंके स्वामी हैं,
दिनेश वंश मंडनं। महेश चाप खंडनं।मुनींद्र संत रंजनं। सुरारि वृंद भंजनं॥४॥
सूर्यवंशके भूषण, शिवजीके धनुषको तोड़नेवाले, मुनियों-संतोंको आनंद देनेवाले और असुरोंके समूहका नाश करनेवाले हैं।
मनोज वैरि वंदितं। अजादि देव सेवितं।विशुद्ध बोध विग्रहं। समस्त दूषणापहं॥५॥
आप कामदेवके शत्रु शिवजीसे वंदित, ब्रह्मा-जैसे देवताओंसे सेवित, विशुद्ध ज्ञानस्वरूप और सारे दोषोंको मिटानेवाले हैं।
नमामि इंदिरा पतिं। सुखाकरं सतां गतिं।भजे सशक्ति सानुजं। शची पतिं प्रियानुजं॥६॥
हे लक्ष्मीपति, सुखकी खान और सज्जनोंकी एकमात्र गति, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे इंद्रके प्रिय छोटे भाई, शक्तिस्वरूपा सीता और लक्ष्मणसहित मैं आपको भजता हूँ।
त्वदंघ्रि मूल ये नराः। भजंति हीन मत्सरा।पतंति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले॥७॥
जो मनुष्य ईर्ष्यारहित होकर आपके चरणकमलोंकी सेवा करते हैं, वे तर्क-वितर्करूपी लहरोंसे भरे संसारसागरमें कभी नहीं डूबते।
विविक्त वासिनः सदा। भजंति मुक्तये मुदा।निरस्य इंद्रियादिकं। प्रयांति ते गति स्वकं॥८॥
जो एकांतवासी मुक्तिके लिए इंद्रियोंको वशमें करके प्रसन्न मनसे आपको भजते हैं, वे अपने असली स्वरूपको पा लेते हैं।
तमेकमभ्दुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुं।जगद्गुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलं॥९॥
आप एक, अद्भुत, सर्वसमर्थ, इच्छारहित, सबके स्वामी, सर्वव्यापी, जगद्गुरु, सनातन और तीनों गुणोंसे परे केवल अपने स्वरूपमें स्थित हैं,
भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभं।स्वभक्त कल्प पादपं। सम सुसेव्यमन्वहं॥१०॥
और भावसे प्रसन्न होनेवाले, कुयोगियोंके लिए दुर्लभ, अपने भक्तोंके लिए कल्पवृक्ष-समान, निष्पक्ष और सदा सहज सेवनीय हैं - मैं निरंतर आपको भजता हूँ।
अनूप रूप भूपतिं। नतोऽहमुर्विजा पतिं।प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे॥११॥
हे अनुपम सुंदर, हे पृथ्वीपति, हे जानकीनाथ, मैं आपको प्रणाम करता हूँ - मुझपर प्रसन्न होइए, नमस्कार करता हूँ, मुझे अपने चरणोंकी भक्ति दीजिए।
पठंति ये स्तवं इदं। नरादरेण ते पदं।व्रजंति नात्र संशयं। त्वदीय भक्ति संयुता॥१२॥
जो इस स्तुतिको आदरसे पढ़ते हैं, वे आपकी भक्तिसे युक्त होकर निःसंदेह आपके परमपदको पाते हैं।
बिनती करि मुनि नाइ सिरु कह कर जोरि बहोरि।चरन सरोरुह नाथ जनि कबहुँ तजै मति मोरि॥४॥
इस तरह विनती करके मुनिने फिर सिर नवाकर, हाथ जोड़कर कहा - नाथ, मेरी बुद्धि आपके चरणकमलोंको कभी न छोड़े।
अनुसुइया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील बिनीता॥रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई। आसिष देइ निकट बैठाई॥॥१॥
फिर सरल स्वभाव और विनम्र सीता अनसूयाके चरण पकड़कर उनसे मिलीं। ऋषिपत्नीका मन बहुत प्रसन्न हुआ, उन्होंने आशीर्वाद देकर सीताको पास बिठा लिया।
दिब्य बसन भूषन पहिराए। जे नित नूतन अमल सुहाए॥कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारिधर्म कछु ब्याज बखानी॥॥२॥
और उन्हें ऐसे दिव्य वस्त्र-आभूषण पहनाए जो सदा नए और चमकदार बने रहते हैं। फिर ऋषिपत्नीने मीठी, कोमल वाणीमें उसी बहाने स्त्रीधर्मकी कुछ बातें कहीं।
मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी॥अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही॥॥३॥
राजकुमारी, सुनो - माता, पिता, भाई सब हितैषी हैं, पर इनका सुख सीमित होता है। जानकी, पति ही असीम सुख देनेवाला है - जो स्त्री ऐसे पतिकी सेवा नहीं करती, वह अधम है।
धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अंध बधिर क्रोधी अति दीना॥॥४॥
धैर्य, धर्म, मित्र और पत्नी - इन चारोंकी परख विपत्तिके समयमें ही होती है। बूढ़ा, बीमार, मूर्ख, निर्धन, अंधा, बहरा, क्रोधी या अत्यंत दीन पति -
ऐसेहु पति कर किए अपमाना। नारि पाव जमपुर दुख नाना॥एकइ धर्म एक ब्रत नेमा। कायँ बचन मन पति पद प्रेमा॥॥५॥
ऐसे पतिका भी अपमान करनेसे स्त्री यमपुरीमें तरह-तरहके दुख भोगती है। तन-मन-वचनसे पतिके चरणोंमें प्रेम रखना ही स्त्रीके लिए एकमात्र धर्म, व्रत और नियम है।
जग पति ब्रता चारि बिधि अहहिं। बेद पुरान संत सब कहहिं॥उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं॥॥६॥
संसारमें चार तरहकी पतिव्रताएँ होती हैं, वेद-पुराण और संत सब यही कहते हैं। उत्तम पतिव्रताके मनमें यह भाव बसा रहता है कि सपनेमें भी अपने पतिके सिवा कोई और पुरुष नहीं है।
मध्यम परपति देखइ कैसें। भ्राता पिता पुत्र निज जैंसें॥धर्म बिचारि समुझि कुल रहई। सो निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहई॥॥७॥
मध्यम पतिव्रता पराए पुरुषको भाई, पिता या पुत्रकी तरह देखती है। जो धर्म और कुलमर्यादा सोचकर बची रहती है, वेद उसे निम्न श्रेणीकी स्त्री कहते हैं।
बिनु अवसर भय तें रह जोई। जानेहु अधम नारि जग सोई॥पति बंचक परपति रति करई। रौरव नरक कल्प सत परई॥॥८॥
और जो मौका न मिलनेसे या डरके मारे पतिव्रता बनी रहती है, उसे संसारमें सबसे नीच स्त्री समझो। जो पतिको धोखा देकर पराए पुरुषसे संबंध रखती है, वह सौ कल्पोंतक रौरव नरकमें पड़ी रहती है।
छन सुख लागि जनम सत कोटि। दुख न समुझ तेहि सम को खोटी॥बिनु श्रम नारि परम गति लहई। पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई॥॥९॥
क्षणभरके सुखके लिए जो करोड़ों जन्मोंके दुखको नहीं सोचती, उससे बुरी और कौन होगी। जो छल छोड़कर सच्चे मनसे पतिव्रतधर्म अपनाती है, वह बिना किसी परिश्रमके परम गति पा लेती है।
पति प्रतिकुल जनम जहँ जाई। बिधवा होई पाई तरुनाई॥॥१०॥
पर जो पतिके खिलाफ चलती है, वह जहाँ भी जन्म ले, भरी जवानीमें ही विधवा हो जाती है।
सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ।जसु गावत श्रुति चारि अजहुँ तुलसिका हरिहि प्रिय॥५(क)॥
स्त्री जन्मसे भले अपवित्र मानी जाए, पर पतिकी सेवा करके वह सहज ही शुभ गति पा लेती है - इसी तरह 'तुलसी' आज भी भगवानको प्रिय है और चारों वेद उसका यश गाते हैं।
सुनु सीता तव नाम सुमिरि नारि पतिब्रत करहिं।तोहि प्रानप्रिय राम कहिउँ कथा संसार हित॥५(ख)॥
सीता, सुनो, तुम्हारा नाम लेकर ही स्त्रियाँ पतिव्रतधर्म निभाएँगी। तुम्हें तो राम प्राणोंसे भी प्रिय हैं - यह सब मैंने तो बस संसारके भले के लिए कहा है।
सुनि जानकी परम सुखु पावा। सादर तासु चरन सिरु नावा॥तब मुनि सन कह कृपानिधाना। आयसु होइ जाउँ बन आना॥॥१॥
यह सुनकर जानकीको बहुत सुख मिला, उन्होंने आदरसे अनसूयाके चरणोंमें सिर नवाया। तब कृपालु राम ने मुनिसे कहा - आज्ञा हो तो अब आगे किसी और वनकी ओर चलें।
संतत मो पर कृपा करेहू। सेवक जानि तजेहु जनि नेहू॥धर्म धुरंधर प्रभु के बानी। सुनि सप्रेम बोले मुनि ग्यानी॥॥२॥
मुझपर सदा कृपा बनाए रखिएगा, अपना सेवक जानकर स्नेह न छोड़िएगा। धर्मधुरंधर प्रभुके यह वचन सुनकर ज्ञानी मुनि प्रेमसे बोले -
जासु कृपा अज सिव सनकादी। चहत सकल परमारथ बादी॥ते तुम्ह राम अकाम पिआरे। दीन बंधु मृदु बचन उचारे॥॥३॥
ब्रह्मा, शिव और सनकादि जैसे सारे तत्त्वज्ञानी जिनकी कृपा चाहते हैं, राम, आप वही निष्कामियोंके भी प्रिय, दीनोंके बंधु भगवान हैं जो इतने कोमल वचन बोल रहे हैं।
अब जानी मैं श्री चतुराई। भजी तुम्हहि सब देव बिहाई॥जेहि समान अतिसय नहिं कोई। ता कर सील कस न अस होई॥॥४॥
अब मैं लक्ष्मीकी चतुराई समझा, जिसने बाकी सब देवताओंको छोड़कर केवल आपको ही चुना। जिसके समान कोई महान नहीं, उसका स्वभाव भी ऐसा ही अनुपम क्यों न होगा।
केहि बिधि कहौं जाहु अब स्वामी। कहहु नाथ तुम्ह अंतरजामी॥अस कहि प्रभु बिलोकि मुनि धीरा। लोचन जल बह पुलक सरीरा॥॥५॥
मैं कैसे कहूँ कि स्वामी, अब आप जाइए - नाथ, आप तो अंतर्यामी हैं, आप ही बताइए। यह कहकर धीर मुनि प्रभुको निहारते रहे, उनकी आँखोंसे आँसू बह रहे थे और शरीर रोमांचित था।
तन पुलक निर्भर प्रेम पूरन नयन मुख पंकज दिए।मन ग्यान गुन गोतीत प्रभु मैं दीख जप तप का किए॥जप जोग धर्म समूह तें नर भगति अनुपम पावई।रघुबीर चरित पुनीत निसि दिन दास तुलसी गावई॥
मुनिका शरीर रोमांचित है, प्रेमसे भरा मन और आँखें राम के मुखकमलपर टिकी हैं। वे सोच रहे हैं - मैंने ऐसा कौन-सा तप किया था कि मन-बुद्धि-इंद्रियोंसे परे प्रभुके दर्शन पा गया। जप-योग-धर्मसे तो मनुष्य साधारण भक्ति ही पाता है, पर तुलसीदास तो रघुवीरके पावन चरित्र रातदिन गाता है।
कलिमल समन दमन मन राम सुजस सुखमूल।सादर सुनहिं जे तिन्ह पर राम रहहिं अनुकूल॥६(क)॥
राम का सुंदर यश कलियुगके पापोंको मिटानेवाला, मनको वश में करनेवाला और सुखकी जड़ है। जो इसे आदरसे सुनते हैं, राम उनपर सदा प्रसन्न रहते हैं।
कठिन काल मल कोस धर्म न ग्यान न जोग जप।परिहरि सकल भरोस रामहि भजहिं ते चतुर नर॥६(ख)॥
यह कठिन कलियुग पापोंका भंडार है, इसमें न धर्म बचा, न ज्ञान, न योग-जप। इसमें तो बस वे ही चतुर हैं जो बाकी सब सहारे छोड़कर सीधे राम को ही भजते हैं।
मुनि पद कमल नाइ करि सीसा। चले बनहि सुर नर मुनि ईसा॥आगें राम अनुज पुनि पाछें। मुनि बर बेष बने अति काछें॥॥१॥
मुनिके चरणोंमें सिर नवाकर देवता-मनुष्य-मुनियोंके स्वामी राम वनकी ओर चल पड़े। आगे राम और पीछे लक्ष्मण, दोनों मुनियोंका सुंदर वेष धारण किए बेहद शोभायमान लग रहे हैं।
उभय बीच श्री सोहइ कैसी। ब्रह्म जीव बिच माया जैसी॥सरिता बन गिरि अवघट घाटा। पति पहिचानी देहिं बर बाटा॥॥२॥
दोनोंके बीच सीता ऐसी सुशोभित हैं जैसे ब्रह्म और जीवके बीच माया हो। नदी, वन, पर्वत, दुर्गम घाटियाँ - सब अपने स्वामीको पहचानकर खुद ही सुगम रास्ता दे देते हैं।
जहँ जहँ जाहि देव रघुराया। करहिं मेध तहँ तहँ नभ छाया॥मिला असुर बिराध मग जाता। आवतहीं रघुबीर निपाता॥॥३॥
जहाँ-जहाँ रघुनाथ जाते हैं, वहाँ-वहाँ बादल आकाशमें छाया करते चलते हैं। रास्तेमें विराध राक्षस मिला, सामने आते ही रघुवीरने उसे मार गिराया।
तुरतहिं रुचिर रूप तेहिं पावा। देखि दुखी निज धाम पठावा॥पुनि आए जहँ मुनि सरभंगा। सुंदर अनुज जानकी संगा॥॥४॥
मरते ही उसे तुरंत दिव्य रूप मिल गया, उसे दुखी देखकर प्रभुने उसे अपने परमधाम भेज दिया। फिर लक्ष्मण और सीताके साथ वे वहाँ पहुँचे जहाँ मुनि शरभंग रहते थे।
देखि राम मुख पंकज मुनिबर लोचन भृंग।सादर पान करत अति धन्य जन्म सरभंग॥७॥
राम का मुखकमल देखकर मुनिश्रेष्ठके नेत्ररूपी भौंरे बड़े आदरसे उसका रस पी रहे हैं - शरभंगका जन्म सचमुच धन्य है।
कह मुनि सुनु रघुबीर कृपाला। संकर मानस राजमराला॥जात रहेउँ बिरंचि के धामा। सुनेउँ श्रवन बन ऐहहिं रामा॥॥१॥
मुनिने कहा - कृपालु रघुवीर, हे शिवजीके मनरूपी मानसरोवरके राजहंस, सुनिए, मैं ब्रह्मलोक जा ही रहा था कि कानों सुना कि राम वनमें पधारेंगे।
चितवत पंथ रहे दिन राती। अब प्रभु देखि जुड़ानी छाती॥नाथ सकल साधन मैं हीना। कीन्ही कृपा जानि जन दीना॥॥२॥
तबसे मैं दिन-रात आपकी राह देखता रहा। आज आपको देखकर छाती शीतल हो गई। नाथ, मुझमें कोई साधन नहीं है, फिर भी आपने दीन सेवक जानकर मुझपर कृपा की।
सो कछु देव न मोहि निहोरा। निज पन राखेउ जन मन चोरा॥तब लगि रहहु दीन हित लागी। जब लगि मिलौं तुम्हहि तनु त्यागी॥॥३॥
देव, यह मुझपर आपका कोई एहसान नहीं, आपने भक्तका मन चुरानेवाला अपना ही व्रत निभाया है। अब इस दीनके भले के लिए तबतक ठहरिए जबतक मैं देह त्यागकर आपसे मिल न जाऊँ।
जोग जग्य जप तप ब्रत कीन्हा। प्रभु कहँ देइ भगति बर लीन्हा॥एहि बिधि सर रचि मुनि सरभंगा। बैठे हृदयँ छाड़ि सब संगा॥॥४॥
योग, यज्ञ, जप, तप - जो कुछ भी किया था, सब प्रभुको सौंपकर बदलेमें भक्तिका वरदान पा लिया। इस तरह मुनि शरभंग चिता रचकर सब मोह त्यागकर उसपर बैठ गए।
सीता अनुज समेत प्रभु नील जलद तनु स्याम।मम हियँ बसहु निरंतर सगुनरुप श्रीराम॥८॥
नीले बादलजैसे श्यामवर्ण, सगुणरूप राम - सीता और लक्ष्मणसहित आप सदा मेरे हृदयमें बसे रहिए।
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। राम कृपाँ बैकुंठ सिधारा॥ताते मुनि हरि लीन न भयऊ। प्रथमहिं भेद भगति बर लयऊ॥॥१॥
यह कहकर शरभंगने योगाग्निसे अपना शरीर जला डाला और राम की कृपासे वे वैकुंठ चले गए। मुनि भगवानमें लीन इसलिए नहीं हुए क्योंकि उन्होंने पहले ही भेद-भक्तिका वरदान ले लिया था।
रिषि निकाय मुनिबर गति देखि। सुखी भए निज हृदयँ बिसेषी॥अस्तुति करहिं सकल मुनि बृंदा। जयति प्रनत हित करुना कंदा॥॥२॥
ऋषिसमूहने मुनिश्रेष्ठकी यह दुर्लभ गति देखकर मनमें बड़ा सुख पाया। सब मुनि राम की स्तुति करने लगे - शरणागतवत्सल, करुणाके मूल प्रभुकी जय हो!
पुनि रघुनाथ चले बन आगे। मुनिबर बृंद बिपुल सँग लागे॥अस्थि समूह देखि रघुराया। पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया॥॥३॥
फिर रघुनाथ वनमें आगे बढ़े, बहुत-से श्रेष्ठ मुनि उनके साथ हो लिए। हड्डियोंका ढेर देखकर रघुनाथको बड़ी दया आई, उन्होंने मुनियोंसे इसका कारण पूछा।
जानतहुँ पूछिअ कस स्वामी। सबदरसी तुम्ह अंतरजामी॥निसिचर निकर सकल मुनि खाए। सुनि रघुबीर नयन जल छाए॥॥४॥
मुनियोंने कहा - स्वामी, आप सर्वज्ञ और अंतर्यामी हैं, जानते हुए भी क्यों पूछ रहे हैं? राक्षसोंके झुंडोंने सब मुनियोंको खा डाला है। यह सुनते ही रघुवीरकी आँखें भर आईं।
निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह॥९॥
राम ने भुजा उठाकर प्रण किया - मैं धरतीको राक्षसोंसे मुक्त कर दूँगा। फिर वे सब मुनियोंके आश्रमोंमें जा-जाकर उन्हें दर्शन और स्नेहका सुख देते रहे।
मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना॥मन क्रम बचन राम पद सेवक। सपनेहुँ आन भरोस न देवक॥॥१॥
मुनि अगस्त्यके एक सुजान शिष्य थे, नाम सुतीक्ष्ण, जिनकी भगवानमें गहरी प्रीति थी। वे तन-मन-वचनसे राम के सेवक थे, सपनेमें भी उन्हें किसी और देवताका सहारा नहीं चाहिए था।
प्रभु आगवनु श्रवन सुनि पावा। करत मनोरथ आतुर धावा॥हे बिधि दीनबंधु रघुराया। मो से सठ पर करिहहिं दाया॥॥२॥
प्रभुका आगमन सुनते ही वे तरह-तरहके मनोरथ करते हुए बेतहाशा दौड़ पड़े - हे विधाता, क्या दीनबंधु रघुनाथ मुझ-जैसे नादानपर भी दया करेंगे?
सहित अनुज मोहि राम गोसाई। मिलिहहिं निज सेवक की नाई॥मोरे जियँ भरोस दृढ़ नाहीं। भगति बिरति न ग्यान मन माहीं॥॥३॥
क्या स्वामी राम लक्ष्मणसहित मुझसे अपने सेवककी तरह मिलेंगे? मेरे मनमें पक्का भरोसा नहीं बनता, क्योंकि मुझमें न भक्ति है, न वैराग्य, न ज्ञान।
नहिं सतसंग जोग जप जागा। नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा॥एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की॥॥४॥
मैंने न सत्संग किया, न योग-जप-यज्ञ, न प्रभुके चरणोंमें दृढ़ प्रेम है। पर दयाके सागरकी एक खासियत है - जिसे किसी और का सहारा नहीं, वही उन्हें सबसे प्यारा लगता है।
होइहैं सुफल आजु मम लोचन। देखि बदन पंकज भव मोचन॥निर्भर प्रेम मगन मुनि ग्यानी। कहि न जाइ सो दसा भवानी॥॥५॥
आज संसार-बंधनसे मुक्त करनेवाले प्रभुका मुख देखकर मेरी आँखें सफल हो जाएँगी। शिवजी कहते हैं - भवानी, ज्ञानी मुनि प्रेममें ऐसे डूब गए कि उनकी वह दशा बयान ही नहीं की जा सकती।
दिसि अरु बिदिसि पंथ नहिं सूझा। को मैं चलेउँ कहाँ नहिं बूझा॥कबहुँक फिरि पाछें पुनि जाई। कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई॥॥६॥
उन्हें दिशा-विदिशा और रास्ता कुछ भी नहीं सूझ रहा, यह भी नहीं पता कि मैं कौन हूँ और कहाँ जा रहा हूँ। कभी पीछे घूमकर फिर आगे बढ़ते हैं, कभी गुण गाते हुए नाचने लगते हैं।
अबिरल प्रेम भगति मुनि पाई। प्रभु देखैं तरु ओट लुकाई॥अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा। प्रगटे हृदयँ हरन भव भीरा॥॥७॥
मुनिने इस तरह गाढ़ी प्रेम-भक्ति पा ली। राम पेड़की आड़में छिपकर उनकी यह भक्तिभरी दशा देख रहे हैं। मुनिका इतना गहरा प्रेम देखकर भवभयको हरनेवाले रघुवीर उनके हृदयमें प्रकट हो गए।
मुनि मग माझ अचल होइ बैसा। पुलक सरीर पनस फल जैसा॥तब रघुनाथ निकट चलि आए। देखि दसा निज जन मन भाए॥॥८॥
मुनि रास्तेके बीच ही स्थिर होकर बैठ गए, शरीर कटहलके फलकी तरह रोमांचसे भर उठा। तब रघुनाथ उनके पास चले आए और अपने भक्तकी यह प्रेमदशा देखकर मनमें बहुत प्रसन्न हुए।
मुनिहि राम बहु भाँति जगावा। जाग न ध्यानजनित सुख पावा॥भूप रूप तब राम दुरावा। हृदयँ चतुर्भुज रूप देखावा॥॥९॥
राम ने मुनिको बहुत तरहसे जगाया, पर वे न जागे - क्योंकि उन्हें ध्यानका सुख मिल रहा था। तब राम ने अपना असली रूप छिपाकर उनके हृदयमें चतुर्भुज रूप दिखाया।
मुनि अकुलाइ उठा तब कैसें। बिकल हीन मनि फनि बर जैसें॥आगें देखि राम तन स्यामा। सीता अनुज सहित सुख धामा॥॥१०॥
तब मुनि ऐसे व्याकुल होकर उठे जैसे मणिके बिना कोई श्रेष्ठ सर्प व्याकुल हो जाए। उन्होंने सामने देखा - सीता और लक्ष्मणसहित श्यामसुंदर, सुखधाम राम खड़े थे।
परेउ लकुट इव चरनन्हि लागी। प्रेम मगन मुनिबर बड़भागी॥भुज बिसाल गहि लिए उठाई। परम प्रीति राखे उर लाई॥॥११॥
प्रेममें डूबे भाग्यशाली मुनि लाठीकी तरह गिरकर राम के चरणोंमें लग गए। राम ने अपनी विशाल भुजाओंसे उन्हें उठाकर बड़े प्रेमसे गले लगा लिया।
मुनिहि मिलत अस सोह कृपाला। कनक तरुहि जनु भेंट तमाला॥राम बदनु बिलोक मुनि ठाढ़ा। मानहुँ चित्र माझ लिखि काढ़ा॥॥१२॥
कृपालु राम मुनिसे मिलते हुए ऐसे शोभित हो रहे हैं मानो सोनेके पेड़से तमालका पेड़ लिपट गया हो। मुनि टकटकी लगाए राम का मुख देख रहे हैं, मानो चित्रमें बने खड़े हों।
तब मुनि हृदयँ धीर धीर गहि पद बारहिं बार।निज आश्रम प्रभु आनि करि पूजा बिबिध प्रकार॥१०॥
तब मुनिने हृदयमें धीरज धरकर बार-बार राम के चरण छुए। फिर प्रभुको अपने आश्रम लाकर कई तरहसे उनकी पूजा की।
कह मुनि प्रभु सुनु बिनती मोरी। अस्तुति करौं कवन बिधि तोरी॥महिमा अमित मोरि मति थोरी। रबि सन्मुख खद्योत अँजोरी॥॥१॥
मुनिने कहा - प्रभु, मेरी विनती सुनिए, मैं आपकी स्तुति कैसे करूँ? आपकी महिमा अपार है और मेरी बुद्धि छोटी - सूरजके सामने जुगनूकी रोशनी जैसी।
श्याम तामरस दाम शरीरं। जटा मुकुट परिधन मुनिचीरं॥पाणि चाप शर कटि तूणीरं। नौमि निरंतर श्रीरघुवीरं॥॥२॥
नीलकमलकी मालाजैसे श्यामवर्ण, जटाओंका मुकुट और मुनि-वस्त्र धारण किए, हाथमें धनुष-बाण और कमरमें तरकस सजाए राम को मैं निरंतर नमन करता हूँ।
मोह विपिन घन दहन कृशानुः। संत सरोरुह कानन भानुः॥निसिचर करि वरूथ मृगराजः। त्रातु सदा नो भव खग बाजः॥॥३॥
जो मोहरूपी घने जंगलको जलानेवाली आग हैं, संतरूपी कमलोंको खिलानेवाले सूर्य हैं, राक्षसरूपी हाथियोंको मार गिरानेवाले सिंह हैं, और संसाररूपी पक्षीको मारनेवाले बाज हैं - वे प्रभु सदा हमारी रक्षा करें।
अरुण नयन राजीव सुवेशं। सीता नयन चकोर निशेशं॥हर ह्रदि मानस बाल मरालं। नौमि राम उर बाहु विशालं॥॥४॥
लाल कमल-जैसे नेत्र, सुंदर वेष धारण किए, सीताके नेत्ररूपी चकोरके लिए चंद्रमा, शिवजीके मनरूपी सरोवरके बालहंस, विशाल हृदय-भुजाओंवाले राम को मैं नमन करता हूँ।
संशय सर्प ग्रसन उरगादः। शमन सुकर्कश तर्क विषादः॥भव भंजन रंजन सुर यूथः। त्रातु सदा नो कृपा वरूथः॥॥५॥
जो संशयरूपी सर्पको निगलनेवाले गरुड़ हैं, कठोर तर्कसे उपजे विषादको मिटानेवाले हैं, संसारका अंत करनेवाले और देवताओंको आनंद देनेवाले हैं - वे कृपाके सागर राम सदा हमारी रक्षा करें।
निर्गुण सगुण विषम सम रूपं। ज्ञान गिरा गोतीतमनूपं॥अमलमखिलमनवद्यमपारं। नौमि राम भंजन महि भारं॥॥६॥
निर्गुण-सगुण, विषम-सम दोनों रूपोंवाले, ज्ञान-वाणी-इंद्रियोंसे परे, अनुपम, निर्मल, संपूर्ण, दोषरहित, अनंत और धरतीका भार उतारनेवाले राम को मैं नमन करता हूँ।
भक्त कल्पपादप आरामः। तर्जन क्रोध लोभ मद कामः॥अति नागर भव सागर सेतुः। त्रातु सदा दिनकर कुल केतुः॥॥७॥
जो भक्तोंके लिए कल्पवृक्षका बगीचा हैं, क्रोध-लोभ-मद-कामको डरानेवाले हैं, अत्यंत चतुर और संसारसागरको पार करनेके लिए सेतु हैं - वे सूर्यवंशकी ध्वजा राम सदा मेरी रक्षा करें।
अतुलित भुज प्रताप बल धामः। कलि मल विपुल विभंजन नामः॥धर्म वर्म नर्मद गुण ग्रामः। संतत शं तनोतु मम रामः॥॥८॥
जिनकी भुजाओंका प्रताप अतुलनीय है, जो बलके धाम हैं, जिनका नाम कलियुगके भारी पापोंको मिटाता है, जो धर्मके रक्षक हैं और जिनके गुण आनंद देते हैं - वे राम मेरा कल्याण सदा बढ़ाते रहें।
जदपि बिरज ब्यापक अबिनासी। सब के हृदयँ निरंतर बासी॥तदपि अनुज श्री सहित खरारी। बसतु मनसि मम काननचारी॥॥९॥
यद्यपि आप निर्मल, व्यापक, अविनाशी और सबके हृदयमें सदा बसनेवाले हैं, फिर भी हे खरारि, लक्ष्मण-सीतासहित वनमें विचरते हुए इसी रूपमें मेरे मनमें निवास कीजिए।
जे जानहिं ते जानहुँ स्वामी। सगुन अगुन उर अंतरजामी॥जो कोसल पति राजिव नयना। करउ सो राम हृदय मम अयना॥॥१०॥
स्वामी, जो आपको सगुण-निर्गुण और अंतर्यामी जानते हैं, वे जानते रहें - मेरा हृदय तो बस कोसलपति कमलनयन राम का ही घर बने।
अस अभिमान जाइ जनि भोरे। मैं सेवक रघुपति पति मोरे॥सुनि मुनि बचन राम मन भाए। बहुरि हरषि मुनिबर उर लाए॥॥११॥
मुझे यह भ्रम कभी न हो कि मैं सेवक हूँ इसलिए रघुनाथ मेरे अधीन हैं। मुनिकी यह बात सुनकर राम मनमें बहुत प्रसन्न हुए और हर्षित होकर श्रेष्ठ मुनिको गले लगा लिया।
परम प्रसन्न जानु मुनि मोही। जो बर मागहु देउ सो तोही॥मुनि कह मैं बर कबहुँ न जाचा। समुझि न परइ झूठ का साचा॥॥१२॥
और कहा - मुनि, मुझे परम प्रसन्न समझो, जो वरदान माँगो वही दूँगा। मुनि सुतीक्ष्णने कहा - मैंने तो कभी कुछ माँगा ही नहीं, मुझे यह भी समझ नहीं आता कि क्या माँगूँ, क्या नहीं।
तुम्हहि नीक लागे रघुराई। सो मोहि देहु दास सुखदाई॥अबिरल भगति बिरति बिग्याना। होहु सकल गुन ग्यान निधाना॥॥१३॥
रघुनाथ, दासोंको सुख देनेवाले, आपको जो अच्छा लगे मुझे वही दे दीजिए। राम ने कहा - मुनि, तुम गहरी भक्ति, वैराग्य, ज्ञान और सारे गुणोंके भंडार बन जाओ।
प्रभु जो दीन्ह सो बरु मैं पावा। अब सो देहु मोहि जो भावा॥॥१४॥
मुनि बोले - प्रभुने जो वरदान दिया, वह तो मैंने पा लिया। अब मुझे जो अच्छा लगता है वह भी दे दीजिए -
अनुज जानकी सहित प्रभु चाप बान धर राम।मम हिय गगन इंदु इव बसहु सदा निहकाम॥११॥
प्रभु, लक्ष्मण और सीतासहित धनुष-बाण धारण किए आप निष्काम होकर मेरे हृदयरूपी आकाशमें चंद्रमाकी तरह सदा बसे रहिए।
एवमस्तु करि रमानिवासा। हरषि चले कुभंज रिषि पासा॥बहुत दिवस गुर दरसन पाएँ। भए मोहि एहिं आश्रम आएँ॥॥१॥
'एवमस्तु' कहकर लक्ष्मीपति राम हर्षित होकर अगस्त्य ऋषिके पास चल पड़े। सुतीक्ष्ण बोले - गुरु अगस्त्यका दर्शन पाए और इस आश्रममें आए मुझे बहुत दिन हो गए हैं।
अब प्रभु संग जाउँ गुर पाहीं। तुम्ह कहँ नाथ निहोरा नाहीं॥देखि कृपानिधि मुनि चतुराई। लिए संग बिहसे द्वौ भाई॥॥२॥
अब मैं भी प्रभुके साथ गुरुके पास चलता हूँ, नाथ, इसमें आपपर मेरा कोई एहसान नहीं। मुनिकी यह चतुराई देखकर कृपानिधान राम ने उन्हें साथ ले लिया और दोनों भाई मुस्कुरा उठे।
पंथ कहत निज भगति अनूपा। मुनि आश्रम पहुँचे सुरभूपा॥तुरत सुतीछन गुर पहिं गयऊ। करि दंडवत कहत अस भयऊ॥॥३॥
रास्तेमें अपनी अनुपम भक्तिकी बातें करते हुए देवताओंके स्वामी राम अगस्त्य मुनिके आश्रम जा पहुँचे। सुतीक्ष्ण तुरंत गुरुके पास गए और दंडवत करके यह कहने लगे -
नाथ कोसलाधीस कुमारा। आए मिलन जगत आधारा॥राम अनुज समेत बैदेही। निसि दिनु देव जपत हहु जेही॥॥४॥
नाथ, अयोध्याके राजा दशरथके पुत्र, संसारके आधार राम - छोटे भाई लक्ष्मण और सीतासहित - आपसे मिलने आए हैं, जिन्हें आप रातदिन जपते रहते हैं।
सुनत अगस्ति तुरत उठि धाए। हरि बिलोकि लोचन जल छाए॥मुनि पद कमल परे द्वौ भाई। रिषि अति प्रीति लिए उर लाई॥॥५॥
यह सुनते ही अगस्त्य तुरंत उठ दौड़े, भगवानको देखते ही उनकी आँखें भर आईं। दोनों भाई मुनिके चरणोंमें गिर पड़े, ऋषिने बड़े प्रेमसे उन्हें गले लगा लिया।
सादर कुसल पूछि मुनि ग्यानी। आसन बर बैठारे आनी॥पुनि करि बहु प्रकार प्रभु पूजा। मोहि सम भाग्यवंत नहिं दूजा॥॥६॥
ज्ञानी मुनिने आदरसे कुशल पूछकर उन्हें श्रेष्ठ आसनपर बिठाया, फिर कई तरहसे प्रभुकी पूजा करके कहा - मुझसे बढ़कर भाग्यशाली आज कोई और नहीं।
जहँ लगि रहे अपर मुनि बृंदा। हरषे सब बिलोकि सुखकंदा॥॥७॥
वहाँ जितने भी और मुनि थे, सब आनंदकंद राम के दर्शन पाकर हर्षित हो उठे।
मुनि समूह महँ बैठे सन्मुख सब की ओर।सरद इंदु तन चितवत मानहुँ निकर चकोर॥१२॥
मुनियोंकी उस सभामें राम ऐसे बैठे थे कि हर मुनिको लगे मानो वे उसीकी ओर मुख करके बैठे हों - मानो चकोरोंका झुंड शरद पूर्णिमाके चाँदको निहार रहा हो।
तब रघुबीर कहा मुनि पाहीं। तुम्ह सन प्रभु दुराव कछु नाहीं॥तुम्ह जानहु जेहि कारन आयउँ। ताते तात न कहि समुझायउँ॥॥१॥
तब रघुवीरने मुनिसे कहा - प्रभु, आपसे कुछ छिपा नहीं, मैं जिस काम से आया हूँ वह आप जानते ही हैं, इसीलिए तात, मैंने खुलकर कुछ नहीं कहा।
अब सो मंत्र देहु प्रभु मोही। जेहि प्रकार मारौं मुनिद्रोही॥मुनि मुसकाने सुनि प्रभु बानी। पूछेहु नाथ मोहि का जानी॥॥२॥
अब प्रभु, वही उपाय बताइए जिससे मैं मुनि-द्रोही राक्षसोंको मार सकूँ। यह सुनकर मुनि मुस्कुराए - नाथ, आपने यह प्रश्न मुझसे क्या समझकर पूछा?
तुम्हरेइँ भजन प्रभाव अघारी। जानउँ महिमा कछुक तुम्हारी॥ऊमरि तरु बिसाल तव माया। फल ब्रह्मांड अनेक निकाया॥॥३॥
पापनाशक, मैं तो आपके भजनके प्रभावसे ही आपकी थोड़ी-सी महिमा जानता हूँ। आपकी माया एक विशाल गूलरके पेड़ जैसी है, जिसके फल अनगिनत ब्रह्मांड हैं।
जीव चराचर जंतु समाना। भीतर बसहिं न जानहिं आना॥ते फल भच्छक कठिन कराला। तव भयँ डरत सदा सोउ काला॥॥४॥
चराचर जीव उस फलके भीतर बसनेवाले छोटे कीड़ोंकी तरह हैं, जो अपनी छोटी-सी दुनियाके सिवा कुछ नहीं जानते। उन फलोंको खानेवाला काल भी कठोर है, पर वह काल भी सदा आपसे डरता है।
ते तुम्ह सकल लोकपति साईं। पूँछेहु मोहि मनुज की नाईं॥यह बर मागउँ कृपानिकेता। बसहु हृदयँ श्री अनुज समेता॥॥५॥
उन्हीं आपने, समस्त लोकपालोंके स्वामी होकर भी, मुझसे एक साधारण मनुष्यकी तरह पूछा। कृपानिधान, मैं तो बस यही वरदान माँगता हूँ कि आप सीता-लक्ष्मणसहित सदा मेरे हृदयमें बसें।
अबिरल भगति बिरति सतसंगा। चरन सरोरुह प्रीति अभंगा॥जद्यपि ब्रह्म अखंड अनंता। अनुभव गम्य भजहिं जेहि संता॥॥६॥
मुझे प्रगाढ़ भक्ति, वैराग्य, सत्संग और आपके चरणोंमें अटूट प्रेम मिले। यद्यपि आप अखंड, अनंत ब्रह्म हैं, जिन्हें संत अनुभवसे ही भजते हैं,
अस तव रूप बखानउँ जानउँ। फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ॥संतत दासन्ह देहु बड़ाई। तातें मोहि पूँछेहु रघुराई॥॥७॥
फिर भी आपका यह रूप जानते-बखानते हुए भी मैं बार-बार आपके इसी सगुण रूपमें प्रेम पाता हूँ। आप अपने सेवकोंको सदा बड़ाई देते हैं, इसीलिए रघुनाथ, आपने मुझसे पूछा।
है प्रभु परम मनोहर ठाऊँ। पावन पंचबटी तेहि नाऊँ॥दंडक बन पुनीत प्रभु करहू। उग्र साप मुनिबर कर हरहू॥॥८॥
प्रभु, एक परम मनोहर, पवित्र स्थान है - नाम है पंचवटी। आप दंडकवनको पवित्र कीजिए और गौतम मुनिके कठोर शापको हर लीजिए।
बास करहु तहँ रघुकुल राया। कीजे सकल मुनिन्ह पर दाया॥चले राम मुनि आयसु पाई। तुरतहिं पंचबटी निअराई॥॥९॥
रघुकुलनाथ, वहीं ठहरकर सब मुनियोंपर कृपा कीजिए। मुनिकी आज्ञा पाकर राम वहाँसे चल दिए और शीघ्र ही पंचवटीके निकट पहुँच गए।
गीधराज सैं भेंट भइ बहु बिधि प्रीति बढ़ाइ।गोदावरी निकट प्रभु रहे परन गृह छाइ॥१३॥
वहाँ गृध्रराज जटायुसे भेंट हुई, उनसे खूब प्रेम बढ़ाकर प्रभु गोदावरीके किनारे पर्णकुटी बनाकर रहने लगे।
जब ते राम कीन्ह तहँ बासा। सुखी भए मुनि बीती त्रासा॥गिरि बन नदीं ताल छबि छाए। दिन दिन प्रति अति होहिं सुहाए॥॥१॥
जबसे राम ने वहाँ निवास किया, मुनि निश्चिंत और सुखी हो गए, उनका डर जाता रहा। पर्वत, वन, नदी, तालाब सब शोभासे भर उठे, दिन-ब-दिन और सुंदर होते गए।
खग मृग बृंद अनंदित रहहीं। मधुप मधुर गुंजत छबि लहहीं॥सो बन बरनि न सक अहिराजा। जहाँ प्रगट रघुबीर बिराजा॥॥२॥
पक्षी-पशुओंके झुंड आनंदित रहते हैं, भौंरे मीठी गुंजार से शोभा बढ़ाते हैं - जहाँ साक्षात रघुवीर विराजते हैं, उस वनका वर्णन तो शेषनाग भी नहीं कर सकते।
एक बार प्रभु सुख आसीना। लछिमन बचन कहे छलहीना॥सुर नर मुनि सचराचर साईं। मैं पूछउँ निज प्रभु की नाई॥॥३॥
एक बार प्रभु सुखसे बैठे थे, तब लक्ष्मणने सीधे मनसे पूछा - देवता-मनुष्य-मुनि-चराचरके स्वामी, मैं अपने प्रभुसे ही समझकर पूछता हूँ,
मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा। सब तजि करौं चरन रज सेवा॥कहहु ग्यान बिराग अरु माया। कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया॥॥४॥
देव, मुझे ऐसा समझाकर बताइए कि मैं सब कुछ छोड़कर बस आपके चरणोंकी धूलिकी सेवा करूँ। ज्ञान, वैराग्य और माया समझाइए, और वह भक्ति भी बताइए जिससे आप प्रसन्न होते हैं।
ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ।जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ॥१४॥
प्रभु, ईश्वर और जीवका भेद भी समझाकर बताइए, जिससे आपके चरणोंमें मेरा प्रेम बढ़े और शोक-मोह-भ्रम मिट जाए।
थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई॥मैं अरु मोर तोर तें माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥॥१॥
राम ने कहा - तात, मैं थोड़े में ही सब समझा देता हूँ, मन-चित्त लगाकर सुनो। मैं-मेरा, तू-तेरा - यही माया है, जिसने सारे जीवोंको वश में कर रखा है।
गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई॥तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ। बिद्या अपर अबिद्या दोऊ॥॥२॥
इंद्रियोंके विषय और जहाँतक मन जाए, भाई, वह सब माया ही जानो। उसके भी दो भेद हैं - विद्या और अविद्या,
एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा॥एक रचइ जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें॥॥३॥
एक (अविद्या) दुष्ट और बेहद दुखदायी है, जिसके वश जीव संसाररूपी कुएँमें पड़ा है। दूसरी (विद्या) गुणोंसे युक्त होकर जगत रचती है, पर वह भी प्रभुसे ही प्रेरित है, उसका अपना बल कुछ नहीं।
ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माहीं॥कहिअ तात सो परम बिरागी। तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी॥॥४॥
जहाँ अभिमान आदि एक भी दोष नहीं और जो हर जगह समान रूपसे ब्रह्मको देखे, वही ज्ञान है। तात, जो सारी सिद्धियाँ और तीनों गुण तिनकेकी तरह त्याग चुका हो, वही परम वैरागी है।
माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव।बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव॥१५॥
जो माया, ईश्वर और अपने असली स्वरूपको नहीं जानता, वह जीव है। जो बंधन और मोक्ष दोनों देनेवाला, सबसे परे और मायाको भी चलानेवाला है, वह ईश्वर है।
धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना॥जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई। सो मम भगति भगत सुखदाई॥॥१॥
धर्मसे वैराग्य और योगसे ज्ञान मिलता है, ज्ञान मोक्ष देता है - ऐसा वेदोंने कहा है। भाई, पर जिससे मैं जल्दी प्रसन्न होता हूँ, वह है मेरी भक्ति, जो भक्तोंको सुख देती है।
सो सुतंत्र अवलंब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना॥भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलइ जो संत होड़ अनुकूला॥॥२॥
वह भक्ति स्वतंत्र है, उसे किसी और सहारेकी जरूरत नहीं - ज्ञान-विज्ञान तो उसके अधीन हैं। तात, भक्ति अनुपम और सुखकी जड़ है, और वह तभी मिलती है जब संत प्रसन्न हों।
भगति कि साधन कहउँ बखानी। सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी॥प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती। निज निज कर्म निरत श्रुति रीती॥॥३॥
अब मैं भक्तिके साधन विस्तारसे बताता हूँ, यह ऐसा सुगम रास्ता है जिससे जीव मुझे सहज ही पा लेते हैं। पहले ब्राह्मणोंके चरणोंमें गहरी प्रीति हो, और वेदविधिके अनुसार अपने कर्तव्यमें लगा रहे,
एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा। तब मम धर्म उपज अनुरागा॥श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं। मम लीला रति अति मन माहीं॥॥४॥
इसका फल फिर विषयोंसे वैराग्य होगा, तब मेरे धर्ममें प्रेम जागेगा, फिर श्रवण-आदि नौ भक्तियाँ दृढ़ होंगी और मेरी लीलाओंमें मनका गहरा अनुराग बनेगा।
संत चरन पंकज अति प्रेमा। मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा॥गुरु पितु मातु बंधु पति देवा। सब मोहि कहँ जाने दृढ़ सेवा॥॥५॥
जिसका संतोंके चरणोंमें गहरा प्रेम हो, मन-वचन-कर्मसे भजनका दृढ़ नियम हो, जो मुझे ही गुरु-पिता-माता-भाई-पति-देवता सब मानकर दृढ़तासे सेवा करे,
मम गुन गावत पुलक सरीरा। गदगद गिरा नयन बह नीरा॥काम आदि मद दंभ न जाकें। तात निरंतर बस मैं ताकें॥॥६॥
मेरे गुण गाते हुए जिसका शरीर रोमांचित हो, वाणी गद्गद हो, आँखें भर आएँ, और जिसमें काम-मद-दंभ न हो - भाई, मैं सदा उसीके वश में रहता हूँ।
बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम।तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम॥१६॥
जिनकी गति कर्म-वचन-मनसे बस मैं ही हूँ, जो निष्काम भावसे मुझे भजते हैं - उनके हृदयकमलमें मैं सदा विश्राम करता हूँ।
भगति जोग सुनि अति सुख पावा। लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा॥एहि बिधि गए कछुक दिन बीती। कहत बिराग ग्यान गुन नीती॥॥१॥
यह भक्तियोग सुनकर लक्ष्मणको बहुत सुख मिला, उन्होंने प्रभुके चरणोंमें सिर नवाया। इस तरह वैराग्य, ज्ञान, गुण और नीतिकी बातें करते हुए कुछ दिन बीत गए।
सूपनखा रावन के बहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी॥पंचबटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भइ जुगल कुमारा॥॥२॥
रावणकी बहन शूर्पणखा नागिनकी तरह भयानक और दुष्ट हृदयकी थी। एक बार वह पंचवटी गई और दोनों राजकुमारोंको देखकर काममोहित हो उठी।
भ्राता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी॥होइ बिकल सक मनहि न रोकी। जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी॥॥३॥
काकभुशुंडि कहते हैं - गरुड़, ऐसी स्त्री मनोहर पुरुषको देखकर, चाहे वह भाई-पिता-पुत्र ही क्यों न हो, विकल हो उठती है, मनको रोक नहीं पाती - जैसे सूर्यकांतमणि सूरजको देखकर पिघल जाती है।
रुचिर रुप धरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसुकाई॥तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह सँजोग बिधि रचा बिचारी॥॥४॥
वह सुंदर रूप धरकर प्रभुके पास गई और मुस्कुराते हुए बोली - न तुम्हारे जैसा कोई पुरुष है, न मेरे जैसी कोई स्त्री, विधाताने यह जोड़ी सोच-समझकर बनाई है।
मम अनुरूप पुरुष जग माहीं। देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीं॥ताते अब लगि रहिउँ कुमारी। मनु माना कछु तुम्हहि निहारी॥॥५॥
मेरे लायक पुरुष संसारभर में नहीं मिला, मैंने तीनों लोक खोज डाले। इसीलिए अबतक कुँवारी रही, अब तुम्हें देखकर मन कुछ ठहर गया है।
सीतहि चितइ कही प्रभु बाता। अहइ कुआर मोर लघु भ्राता॥गइ लछिमन रिपु भगिनी जानी। प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी॥॥६॥
सीताकी ओर देखकर राम ने कहा - मेरा छोटा भाई अभी अविवाहित है। यह सुनकर वह लक्ष्मणके पास गई। लक्ष्मणने उसे शत्रुकी बहन समझकर, प्रभुकी ओर देखकर मीठे स्वरमें कहा -
सुंदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा। पराधीन नहिं तोर सुपासा॥प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा। जो कछु करहिं उनहि सब छाजा॥॥७॥
सुंदरी, सुनो, मैं तो उनका दास हूँ, पराधीन हूँ, तुम्हें सुख नहीं दे पाऊँगा। प्रभु समर्थ हैं, कोसलके राजा हैं, वे जो भी करें, उन्हींको शोभा देता है।
सेवक सुख चह मान भिखारी। ब्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी॥लोभी जसु चह चार गुमानी। नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी॥॥८॥
सेवक सुख चाहे, भिखारी सम्मान चाहे, व्यसनी धन चाहे, व्यभिचारी शुभ गति चाहे, लोभी यश चाहे, अभिमानी चारों फल चाहे - ये सब मानो आकाशको दुहकर दूध निकालना चाहते हैं।
पुनि फिरि राम निकट सो आई। प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई॥लछिमन कहा तोहि सो बरई। जो तृन तोरि लाज परिहरई॥॥९॥
वह फिर राम के पास लौट आई, प्रभुने उसे फिर लक्ष्मणके पास भेज दिया। लक्ष्मणने कहा - तुम्हें वही ब्याहेगा जो लाजको तिनकेकी तरह तोड़कर फेंक दे।
तब खिसिआनि राम पहिं गई। रूप भयंकर प्रगटत भई॥सीतहि सभय देखि रघुराई। कहा अनुज सन सयन बुझाई॥॥१०॥
तब वह चिढ़कर राम के पास गई और अपना भयानक रूप दिखाने लगी। सीताको डरी देखकर रघुनाथने लक्ष्मणको इशारेसे कुछ कहा।
लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि।ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि॥१७॥
लक्ष्मणने बड़ी फुर्तीसे उसके नाक-कान काट डाले - मानो उसके इस हाथने खुद रावणको चुनौती दे दी हो।
नाक कान बिनु भइ बिकरारा। जनु स्त्रव सैल गैरु कै धारा॥खर दूषन पहिं गई बिलपाता। धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता॥॥१॥
नाक-कान कटने से वह भयानक दिखने लगी, मानो काले पहाड़से गेरूकी धार बह रही हो। विलाप करती हुई वह खर-दूषणके पास गई - भाई, तुम्हारे बल-पौरुषको धिक्कार है!
तेहि पूछा सब कहेसि बुझाई। जातुधान सुनि सेन बनाई॥धाए निसिचर निकर बरूथा। जनु सपच्छ कज्जल गिरि जूथा॥॥२॥
उन्होंने पूछा, तो शूर्पणखाने सब कह सुनाया। सुनते ही राक्षसोंने सेना सजाई, झुंड-के-झुंड दौड़ पड़े, मानो पंखवाले काले पहाड़ोंके समूह चले आ रहे हों।
नाना बाहन नानाकारा। नानायुध धर घोर अपारा॥सुपनखा आगें करि लीनी। असुभ रूप श्रुति नासा हीनी॥॥३॥
तरह-तरहकी सवारियों और रूपोंमें, अनगिनत भयानक हथियार लिए वे राक्षस दौड़े, और नाक-कान कटी अमंगल-रूपा शूर्पणखाको आगे कर लिया।
असगुन अमित होहिं भयकारी। गनहिं न मृत्यु बिबस सब झारी॥गर्जहिं तर्जहिं गगन उड़ाहीं। देखि कटकु भट अति हरषाहीं॥॥४॥
अनगिनत डरावने अपशकुन हो रहे थे, पर मौतके मुँहमें फँसे वे उन्हें गिनते ही नहीं। गरजते-ललकारते, आकाशमें उड़ते हुए सेना देखकर योद्धा बहुत खुश हो रहे हैं।
कोउ कह जिअत धरहु द्वौ भाई। धरि मारहु तिय लेहु छड़ाई॥धूरि पूरि नभ मंडल रहा। राम बोलाइ अनुज सन कहा॥॥५॥
कोई कहता है दोनों भाइयोंको जीता पकड़ लो, फिर मार डालो और स्त्री छीन लो। आकाश धूलसे भर गया, तब राम ने लक्ष्मणको बुलाकर कहा -
लै जानकिहि जाहु गिरि कंदर। आवा निसिचर कटकु भयंकर॥रहेहु सजग सुनि प्रभु के बानी। चले सहित श्री सर धनु पानी॥॥६॥
जानकीको लेकर पर्वतकी गुफामें चले जाओ, राक्षसोंकी भयानक सेना आ पहुँची है, सावधान रहना। प्रभुकी यह बात सुनकर लक्ष्मण धनुष-बाण लिए सीतासहित चल दिए।
देखि राम रिपुदल चलि आवा। बिहसि कठिन कोदंड चढ़ावा॥॥७॥
शत्रुसेना चली आते देखकर राम ने हँसते हुए कठिन धनुष चढ़ाया।
कोदंड कठिन चढ़ाइ सिर जट जूट बाँधत सोह क्यों।मरकत सयल पर लरत दामिनि कोटि सो जुग भुजग ज्यों॥कटि कसि निषंग बिसाल भुज गहि चाप बिसिख सुधारि के।चितवत मनहुँ मृगराज प्रभु गजराज घटा निहारि कै॥
कठिन धनुष चढ़ाकर, सिरपर जटाका जूड़ा बाँधते हुए प्रभु कैसे शोभित हो रहे हैं - मानो पन्नेके पहाड़पर करोड़ों बिजलियोंसे दो साँप लड़ रहे हों। कमरमें तरकस कसे, विशाल भुजाओंमें धनुष-बाण थामे राक्षसोंकी ओर ऐसे देख रहे हैं मानो मतवाले हाथियोंके झुंडको देखकर सिंह ताक रहा हो।
आइ गए बगमेल धरहु धरहु धावत सुभट।जथा बिलोकि अकेल बाल रबिहि घेरत दनुज॥१८॥
'पकड़ो-पकड़ो' चिल्लाते हुए राक्षस योद्धा दौड़े चले आए और घेर लिया - जैसे उगते सूरजको अकेला देखकर दैत्य उसे घेर लेते हैं।
प्रभु बिलोकि सर सकहिं न डारी। थकित भई रजनीचर धारी॥सचिव बोलि बोले खर दूषन। यह कोउ नृपबालक नर भूषन॥॥१॥
प्रभुको देखकर राक्षससेना दंग रह गई, बाण तक नहीं छोड़ पाई। मंत्रीको बुलाकर खर-दूषणने कहा - यह राजकुमार तो मनुष्योंका गहना लगता है।
नाग असुर सुर नर मुनि जेते। देखे जिते हते हम केते॥हम भरि जन्म सुनहु सब भाई। देखी नहिं असि सुंदरताई॥॥२॥
नाग, असुर, देवता, मनुष्य, मुनि - जितने भी हमने देखे, जीते या मारे, भाइयो, जन्मभरमें ऐसी सुंदरता कभी नहीं देखी।
जद्यपि भगिनी कीन्ह कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा॥देहु तुरत निज नारि दुराई। जीअत भवन जाहु द्वौ भाई॥॥३॥
यद्यपि इन्होंने हमारी बहनको कुरूप कर दिया, फिर भी यह अनुपम पुरुष मारने योग्य नहीं - तुरंत अपनी छिपाई स्त्री हमें सौंप दो और दोनों भाई जीते-जी घर लौट जाओ।
मोर कहा तुम्ह ताहि सुनावहु। तासु बचन सुनि आतुर आवहु॥दूतन्ह कहा राम सन जाई। सुनत राम बोले मुसुकाई॥॥४॥
मेरी यह बात उसे सुनाओ, और उसका जवाब सुनकर जल्दी लौट आओ। दूतोंने जाकर राम को यह संदेश सुनाया, सुनते ही राम मुस्कुराकर बोले -
हम छत्री मृगया बन करहीं। तुम्ह से खल मृग खोजत फिरहीं॥रिपु बलवंत देखि नहिं डरहीं। एक बार कालहु सन लरहीं॥॥५॥
हम क्षत्रिय हैं, वनमें शिकार करते हैं, और तुम-जैसे दुष्ट पशुओंको तो ढूँढ़ते ही फिरते हैं। हम बलवान शत्रुसे नहीं डरते, चाहे तो एक बार कालसे भी भिड़ जाएँ।
जद्यपि मनुज दनुज कुल घालक। मुनि पालक खल सालक बालक॥जौं न होइ बल घर फिरि जाहू। समर बिमुख मैं हतउँ न काहू॥॥६॥
हम मनुष्य हैं पर दैत्यकुलका नाश करनेवाले और मुनियोंके रक्षक हैं, बालक हैं पर दुष्टोंको दंड देनेवाले। बल न हो तो घर लौट जाओ, रणसे पीठ दिखानेवालेको मैं कभी नहीं मारता।
रन चढ़ि करिअ कपट चतुराई। रिपु पर कृपा परम कदराई॥दूतन्ह जाइ तुरत सब कहेऊ। सुनि खर दूषन उर अति दहेऊ॥॥७॥
युद्धमें आकर छल-चतुराई करना और शत्रुपर दया दिखाना बड़ी कायरता है। दूतोंने लौटकर यह सब कहा, सुनते ही खर-दूषणका हृदय जल उठा।
उर दहेउ कहेउ कि धरहु धाए बिकट भट रजनीचरा।सर चाप तोमर सक्ति सूल कृपान परिघ परसु धरा॥प्रभु कीन्ह धनुष टकोर प्रथम कठोर घोर भयावहा।भए बधिर ब्याकुल जातुधान न ग्यान तेहि अवसर रहा॥
हृदय जल उठा, बोले - पकड़ लो! भयानक राक्षस योद्धा बाण-धनुष-भाला-शक्ति-शूल-कटार-गदा-फरसा लिए दौड़ पड़े। प्रभुने पहले धनुषकी भयानक टंकार की, जिसे सुनकर राक्षस बहरे-से होकर व्याकुल हो गए, उस पल उन्हें कुछ होश ही न रहा।
सावधान होइ धाए जानि सबल आराति।लागे बरषन राम पर अस्त्र सस्त्र बहु भाँति॥१९(क)॥
फिर शत्रुको बलवान जानकर सावधान होकर दौड़े और राम पर तरह-तरहके अस्त्र-शस्त्र बरसाने लगे।
तिन्ह के आयुध तिल सम करि काटे रघुबीर।तानि सरासन श्रवन लगि पुनि छाँड़े निज तीर॥१९(ख)॥
रघुवीरने उनके हथियारोंको तिनकोंकी तरह काट डाला, फिर धनुष कानतक खींचकर अपने बाण छोड़े।
तब चले जान बबान कराल। फुंकरत जनु बहु ब्याल॥कोपेउ समर श्रीराम। चले बिसिख निसित निकाम॥॥१॥
तब भयानक बाण ऐसे चले मानो कई साँप फुफकार रहे हों। राम युद्धमें क्रुद्ध हो उठे, अत्यंत तीखे बाण चलने लगे।
अवलोकि खरतर तीर। मुरि चले निसिचर बीर॥भए क्रुद्ध तीनिउ भाइ। जो भागि रन ते जाइ॥॥२॥
तीखे बाण देखकर राक्षस वीर पीठ दिखाकर भागे। खर, दूषण और त्रिशिरा तीनों भाई क्रोधसे बोले - जो रणसे भागेगा,
तेहि बधब हम निज पानि। फिरे मरन मन महुँ ठानि॥आयुध अनेक प्रकार। सनमुख ते करहिं प्रहार॥॥३॥
उसे हम खुद अपने हाथों मारेंगे। तब मरना ठानकर भागते राक्षस लौट पड़े और सामने आकर तरह-तरहके हथियारोंसे प्रहार करने लगे।
रिपु परम कोपे जानि। प्रभु धनुष सर संधानि॥छाँड़े बिपुल नाराच। लगे कटन बिकट पिसाच॥॥४॥
शत्रुको बेहद क्रोधित जानकर प्रभुने धनुषपर बाण चढ़ाकर ढेरों बाण छोड़े, जिनसे भयानक राक्षस कटने लगे।
उर सीस भुज कर चरन। जहँ तहँ लगे महि परन॥चिक्करत लागत बान। धर परत कुधर समान॥॥५॥
उनकी छाती, सिर, भुजा, हाथ, पैर जहाँ-तहाँ धरतीपर गिरने लगे। बाण लगते ही वे हाथीकी तरह चिंघाड़ते, पहाड़-जैसे धड़ कटकर गिरते जाते हैं।
भट कटत तन सत खंड। पुनि उठत करि पाषंड॥नभ उड़त बहु भुज मुंड। बिनु मौलि धावत रुंड॥॥६॥
योद्धाओंके शरीर सैकड़ों टुकड़ोंमें कटते हैं, फिर मायासे उठ खड़े होते हैं। आकाशमें कटी भुजाएँ-सिर उड़ रहे हैं, बिना सिरके धड़ दौड़ रहे हैं।
खग कंक काक सृगाल। कटकटहिं कठिन कराल॥॥७॥
चील, कौए, सियार भयानक कर्कश शब्द कर रहे हैं।
कटकटहिं जंबुक भूत प्रेत पिसाच खर्पर संचहीं।बेताल बीर कपाल ताल बजाइ जोगिनि नंचहीं॥रघुबीर बान प्रचंड खंडहिं भटन्ह के उर भुज सिरा।जहेँ तहँ परहिं उठि लरहिं धर धरु धरु करहिं भयकर गिरा॥॥१॥
सियार कटकटाते हैं, भूत-प्रेत-पिशाच खोपड़ियाँ बटोर रहे हैं, वीर-वैताल खोपड़ियोंपर ताल बजाते हैं और योगिनियाँ नाच रही हैं। रघुवीरके प्रचंड बाण योद्धाओंकी छाती-भुजा-सिर टुकड़े-टुकड़े कर डालते हैं, धड़ जहाँ-तहाँ गिरते हैं, फिर उठकर लड़ते और 'पकड़ो-पकड़ो' चिल्लाते हैं।
अंतावरीं गहि उड़त गीध पिसाच कर गहि धावहों।संग्राम पुर बासी मनहुूँ बहु बाल गुड़ी उड़ावहीं॥मारे पछारे उर बिदारे बिपुल भट कहँरत परे।अवलोकि निज दल बिकल भट तिसिरादि खर दूषन फिरे॥२॥
अँतड़ियोंका एक सिरा पकड़े गिद्ध उड़ते हैं, दूसरा सिरा थामे पिशाच दौड़ते हैं - मानो युद्धभूमिके बच्चे पतंग उड़ा रहे हों। ढेरों योद्धा मारे-पछाड़े गए हैं, बहुत-से घायल पड़े कराह रहे हैं। अपनी सेना तबाह देखकर त्रिशिरा और खर-दूषण राम की ओर मुड़े।
सर सक्ति तोमर परसु सूल कृपान एकहि बारहीं।करि कोप श्रीरघुबीर पर अगनित निसाचर डारहीं॥प्रभु निमिष महुँ रिपु सर निवारि पचारि डारे सायका।दस दस बिसिख उर माझ मारे सकल निसिचर नायका॥३॥
अनगिनत राक्षस क्रोधसे बाण, शक्ति, भाला, फरसा, शूल, कटार एक साथ राम पर बरसाने लगे। प्रभुने पलभरमें उनके बाण काटकर ललकारते हुए अपने बाण छोड़े, सब सेनापतियोंकी छातीमें दस-दस बाण उतार दिए।
महि परत उठि भट भिरत मरत न करत माया अति घनी।सुर डरत चौदह सहस प्रेत बिलोकि एक अवध धनी॥सुर मुनि सभय प्रभु देखि मायानाथ अति कौतुक करथयो।देखहिं परसपर राम करि संग्राम रिपु दल लरि मरदयो॥४॥
योद्धा गिरते हैं, उठकर फिर भिड़ते हैं, मरते नहीं, तरह-तरहकी माया रचते हैं। देवता डर जाते हैं यह देखकर कि राक्षस चौदह हजार हैं और अयोध्यानाथ अकेले। देवता-मुनियोंको भयभीत देखकर मायापति प्रभुने ऐसा चमत्कार किया कि शत्रुसेना एक-दूसरेको राम समझकर आपसमें ही लड़-भिड़कर मर गई।
राम राम कहि तनु तजहिं पावहिं पद निर्बान।करि उपाय रिपु मारे छन महुँ कृपानिधान॥२०(क)॥
सब 'यही राम है, मारो इसे' कहते हुए शरीर त्यागते हैं और मोक्ष पा जाते हैं। कृपानिधानने यह उपाय करके पलभरमें सारी शत्रुसेना समाप्त कर दी।
हरषित बरषहिं सुमन सुर बाजहिं गगन निसान।अस्तुति करि करि सब चले सोभित बिबिध बिमान॥२०(ख)॥
देवता हर्षित होकर फूल बरसाते हैं, आकाशमें नगाड़े बजते हैं। फिर सब स्तुति करते हुए अलग-अलग विमानोंपर सवार होकर लौट गए।
जब रघुनाथ समर रिपु जीते। सुर नर मुनि सब के भय बीते॥तब लछिमन सीतहि लै आए। प्रभु पद परत हरषि उर लाए॥॥१॥
युद्धमें रघुनाथने शत्रुओंको हरा दिया, देवता-मनुष्य-मुनि सबका भय मिट गया। तब लक्ष्मण सीताको ले आए, चरणोंमें गिरते ही प्रभुने उन्हें हर्षसे उठाकर गले लगा लिया।
सीता चितव स्याम मृदु गाता। परम प्रेम लोचन न अघाता॥पंचवटीं बसि श्रीरघुनायक। करत चरित सुर मुनि सुखदायक॥॥२॥
सीता राम के श्याम, कोमल शरीरको प्रेमसे निहार रही हैं, आँखें भरती ही नहीं। इस तरह पंचवटीमें बसकर रघुनाथ देवताओं-मुनियोंको सुख देनेवाले चरित्र रचने लगे।
धुआँ देखि खरदूषन केरा। जाइ सुपनखाँ रावन प्रेरा॥बोलि बचन क्रोध करि भारी। देस कोस कै सुरति बिसारी॥॥३॥
खर-दूषणका विनाश देखकर शूर्पणखा रावणके पास जाकर उसे भड़काने लगी। बड़े क्रोधसे बोली - तुझे देश और खजानेकी सुध ही नहीं रही!
करसि पान सोवसि दिनु राती। सुधि नहिं तव सिर पर आराती॥राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा। हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा॥
शराब पीकर दिन-रात सोता रहता है, तुझे पता ही नहीं कि शत्रु तेरे सिर पर है! नीति बिना राज्य और धर्म बिना धन व्यर्थ है, जैसे भगवान को समर्पित किए बिना किया गया सत्कर्म।
बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ। श्रम फल पढ़े किएँ अरु पाएँ॥संग ते जती कुमंत्र ते राजा। मान ते ग्यान पान तें लाजा॥
विवेक जगाए बिना पढ़ी विद्या केवल व्यर्थ श्रम है। कुसंगति से संन्यासी, बुरी सलाह से राजा, अभिमान से ज्ञान और शराब से लज्जा — शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं।
प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी। नासहि बेगि नीति अस सुनी॥
विनम्रता के बिना प्रेम और घमंड से गुणी मनुष्य भी शीघ्र नष्ट हो जाते हैं — ऐसी नीति मैंने सुनी है।
रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि।अस कहि बिबिध बिलाप करि लागी रोदन करन॥२१(क)॥
शत्रु, रोग, आग, पाप, स्वामी और साँप - इन्हें कभी छोटा समझकर हल्केमें मत लेना। ऐसा कहकर शूर्पणखा तरह-तरहसे विलाप करते हुए रोने लगी।
सभा माझ परि ब्याकुल बहु प्रकार कह रोइ।तोहि जिअत दसकंधर मोरि कि असि गति होइ॥२१(ख)॥
रावणकी सभामें व्याकुल होकर गिरी-गिरी वह रो-रोकर कहती है - अरे दशमुख, तेरे जीते-जी मेरी यह दशा कैसे हुई?
सुनत सभासद उठे अकुलाई। समुझाई गहि बाहँ उठाई॥कह लंकेस कहसि निज बाता। केंइँ तव नासा कान निपाता॥॥१॥
यह सुनते ही सभासद घबरा उठे, उसकी बाँह पकड़कर उठाया और समझाया। लंकापति रावणने कहा - अपनी बात बता, तेरे नाक-कान किसने काटे?
अवध नृपति दसरथ के जाए। पुरुष सिंघ बन खेलन आए॥समुझि परी मोहि उन्ह कै करनी। रहित निसाचर करिहहिं धरनी॥॥२॥
वह बोली - अयोध्याके राजा दशरथके पुरुषसिंह-जैसे बेटे वनमें शिकार खेलने आए हैं। मुझे उनकी करनी देखकर लगता है वे धरतीको राक्षसोंसे खाली कर देंगे।
जिन्ह कर भुजबल पाइ दसानन। अभय भए बिचरत मुनि कानन॥देखत बालक काल समाना। परम धीर धन्वी गुन नाना॥॥३॥
जिनका बाहुबल पाकर मुनि निर्भय होकर वनमें विचरते हैं, वे देखनेमें बालक हैं पर कालके समान हैं, परम धीर, श्रेष्ठ धनुर्धर और अनेक गुणोंसे भरपूर।
अतुलित बल प्रताप द्वौ भ्राता। खल बध रत सुर मुनि सुखदाता॥सोभाधाम राम अस नामा। तिन्ह के संग नारि एक स्यामा॥॥४॥
दोनों भाइयोंका बल-प्रताप अतुलनीय है, दुष्टोंका वध करते हैं, देवताओं-मुनियोंको सुख देते हैं। शोभाके धाम, नाम है राम - उनके साथ एक सुंदर तरुणी भी है।
रूप रासि बिधि नारि सँवारी। रति सत कोटि तासु बलिहारी॥तासु अनुज काटे श्रुति नासा। सुनि तव भगिनि करहिं परिहासा॥॥५॥
विधाताने उस स्त्रीको ऐसी रूपराशि बनाया कि सौ करोड़ रति भी उसपर न्यौछावर हैं। उन्हींके छोटे भाईने मेरे नाक-कान काट डाले - मैं तेरी बहन हूँ यह सुनकर वे मेरा उपहास करने लगे।
खर दूषन सुनि लगे पुकारा। छन महुँ सकल कटक उन्ह मारा॥खर दूषन तिसिरा कर घाता। सुनि दससीस जरे सब गाता॥॥६॥
मेरी पुकार सुनकर खर-दूषण मदद करने आए, पर उन्होंने पलभरमें उनकी पूरी सेना मार डाली। खर-दूषण-त्रिशिराका वध सुनकर रावणका रोम-रोम जल उठा।
सुपनखहि समुझाइ करि बल बोलेसि बहु भाँति।गयउ भवन अति सोचबस नीद परइ नहिं राति॥२२॥
शूर्पणखाको समझाकर उसने अपने बलका खूब बखान किया, पर मनमें बड़ी चिंतासे भरकर महलमें गया - रातभर उसे नींद ही नहीं आई।
सुर नर असुर नाग खग माहीं। मोरे अनुचर कहँ कोउ नाहीं॥खर दूषन मोहि सम बलवंता। तिन्हहि को मारइ बिनु भगवंता॥॥१॥
वह सोचने लगा - देवता, मनुष्य, असुर, नाग, पक्षी - किसीमें भी मेरे सेवकको हरानेवाला कोई नहीं। खर-दूषण तो मेरे ही बराबर बलवान थे, उन्हें भगवानके सिवा कौन मार सकता है?
सुर रंजन भंजन महि भारा। जौं भगवंत लीन्ह अवतारा॥तौ मैं जाइ बैरु हठि करऊँ। प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ॥॥२॥
देवताओंको सुख देनेवाले, धरतीका बोझ उतारनेवाले भगवानने ही अवतार लिया है तो मैं जाकर हठपूर्वक उनसे बैर करूँगा, प्रभुके बाणसे प्राण त्यागकर संसार-सागर पार कर जाऊँगा।
होइहि भजनु न तामस देहा। मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा॥जौं नररुप भूपसुत कोऊ। हरिहउँ नारि जीति रन दोऊ॥॥३॥
इस तामसी देहसे भजन तो होगा नहीं, इसलिए मन-वचन-कर्मसे यही पक्का इरादा है - अगर वे मनुष्यरूपी कोई राजकुमार हुए तो रणमें दोनोंको हराकर उनकी स्त्री हर लूँगा।
चला अकेल जान चढ़े तहवाँ। बस मारीच सिंधु तट जहवाँ॥इहाँ राम जसि जुगुति बनाई। सुनहु उमा सो कथा सुहाई॥॥४॥
यह सोचकर रावण अकेला रथपर चढ़कर वहाँ गया जहाँ समुद्रतटपर मारीच रहता था। शिवजी कहते हैं - पार्वती, यहाँ राम ने जो युक्ति रची, वह सुंदर कथा सुनो।
लछिमन गए बनहिं जब लेन मूल फल कंद।जनकसुता सन बोले बिहसि कृपा सुख बृंद॥२३॥
जब लक्ष्मण कंद-मूल-फल लेने वनमें गए, तब कृपा और सुखके सागर राम अकेलेमें हँसकर जानकीसे बोले -
सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला॥तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। जौ लगि करौं निसाचर नासा॥॥१॥
प्रिये, सुंदर व्रतधारी सुशीले, सुनो, अब मैं कुछ मनोहर मनुष्य-लीला करूँगा - जबतक मैं राक्षसोंका नाश न कर लूँ, तबतक तुम अग्निमें निवास करो।
जबहिं राम सब कहा बखानी। प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी॥निज प्रतिबिंब राखि तहँ सीता। तैसइ सील रूप सुबिनीता॥॥२॥
राम ने ज्यों ही यह सब समझाया, सीता प्रभुके चरण हृदयमें धरकर अग्निमें समा गईं। उन्होंने वहाँ अपनी ही छायामूर्ति रख दी, जो शील-रूप और विनम्रतामें बिल्कुल वैसी ही थी।
लछिमनहूँ यह मरमु न जाना। जो कछु चरित रचा भगवाना॥दसमुख गयउ जहाँ मारीचा। नाइ माथ स्वारथ रत नीचा॥॥३॥
भगवानने जो लीला रची, इसका भेद लक्ष्मणने भी नहीं जाना। स्वार्थी नीच रावण मारीचके पास जाकर उसे सिर नवाकर बोला,
नवनि नीच कै अति दुखदाई। जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई॥भयदायक खल के प्रिय बानी। जिमि अकाल के कुसुम भवानी॥॥४॥
नीचका झुकना भी उतना ही दुखदायी होता है जितना अंकुश, धनुष, साँप या बिल्लीका झुकना। भवानी, दुष्टकी मीठी बात भी बेमौसम खिले फूलकी तरह डरावनी होती है।
करि पूजा मारीच तब सादर पूछी बात।कवन हेतु मन ब्यग्र अति अकसर आयहु तात॥२४॥
मारीचने पूजा-सत्कार करके आदरसे पूछा - तात, आपका मन इतना व्यग्र क्यों है, और आप अकेले क्यों आए हैं?
दसमुख सकल कथा तेहि आगें। कही सहित अभिमान अभागें॥होहु कपट मृग तुम्ह छलकारी। जेहि बिधि हरि आनौ नृपनारी॥॥१॥
अभागे रावणने अभिमानसहित सारी बात कह सुनाई - तुम छलिया कपट-मृग बन जाओ, जिससे मैं उस राजकुमारीको हर लाऊँ।
तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा। ते नररुप चराचर ईसा॥तासों तात बयरु नहिं कीजे। मारें मरिअ जिआएँ जीजै॥॥२॥
मारीचने कहा - दशमुख, सुनो, वे मनुष्यरूपमें चराचरके स्वामी हैं। तात, उनसे बैर मत करो, उनके मारनेसे मरना और उनके जिलानेसे जीना ही श्रेष्ठ है।
मुनि मख राखन गयउ कुमारा। बिनु फर सर रघुपति मोहि मारा॥सत जोजन आयउँ छन माहीं। तिन्ह सन बयरु किए भल नाहीं॥॥३॥
यही राजकुमार मुनि विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षाके लिए आए थे, तब रघुनाथने बिना फलका बाण मुझे मारा था जिससे मैं पलभरमें सौ योजन दूर जा गिरा। उनसे बैर करना ठीक नहीं।
भइ मम कीट भृंग की नाई। जहँ तहँ मैं देखउँ दोउ भाई॥जौं नर तात तदपि अति सूरा। तिन्हहि बिरोधि न आइहि पूरा॥॥४॥
मेरी हालत तो भुनगेके कीड़े जैसी हो गई है, जहाँ देखता हूँ वहीं मुझे राम-लक्ष्मण दोनों भाई दिखते हैं। तात, अगर वे मनुष्य भी हैं तो भी बड़े वीर हैं, उनसे टकराना ठीक नहीं रहेगा।
जेहिं ताड़का सुबाहु हति खंडेउ हर कोदंड।खर दूषन तिसिरा बधेउ मनुज कि अस बरिबंड॥२५॥
जिसने ताड़का-सुबाहुको मारा, शिवका धनुष तोड़ा और खर-दूषण-त्रिशिराका वध किया, ऐसा प्रचंड बली क्या कहीं मनुष्य हो सकता है?
जाहु भवन कुल कुसल बिचारी। सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी॥गुरु जिमि मूढ़ करसि मम बोधा। कहु जग मोहि समान को जोधा॥॥१॥
इसलिए अपने कुलकी भलाई सोचकर घर लौट जाओ। यह सुनकर रावण जल उठा और खूब गालियाँ देने लगा - अरे मूर्ख, तू मुझे गुरुकी तरह ज्ञान सिखाता है? बता, संसारमें मेरे बराबर योद्धा कौन है?
तब मारीच हृदयँ अनुमाना। नवहि बिरोधें नहिं कल्याना॥सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनी। बैद बंदि कबि भानस गुनी॥॥२॥
तब मारीचने मनमें सोचा - शस्त्रधारी, भेद जाननेवाला, समर्थ स्वामी, मूर्ख, धनवान, वैद्य, भाट, कवि और रसोइया - इनसे बैर करनेमें कभी भला नहीं होता।
उभय भाँति देखा निज मरना। तब ताकिसि रघुनायक सरना॥उतरु देत मोहि बधब अभागें। कस न मरौं रघुपति सर लागें॥॥३॥
दोनों तरफसे मौत ही देखकर मारीचने रघुनाथकी शरण लेना बेहतर समझा - सोचा, इनकार करूँ तो यह अभागा मुझे मार ही डालेगा, तो फिर रघुनाथके बाणसे ही क्यों न मरूँ।
अस जियँ जानि दसानन संगा। चला राम पद प्रेम अभंगा॥मन अति हरष जनाव न तेही। आजु देखिहउँ परम सनेही॥॥४॥
यह सोचकर वह रावणके साथ चल पड़ा, पर उसका मन तो राम के चरणोंमें अटूट प्रेमसे बँधा था। मनमें बड़ा हर्ष था कि आज अपने परम प्रियको देखूँगा, पर यह खुशी उसने रावणको जाहिर नहीं होने दी।
निज परम प्रीतम देखि लोचन सुफल करि सुख पाइहौं।श्री सहित अनुज समेत कृपानिकेत पद मन लाइहौं॥निर्बान दायक क्रोध जा कर भगति अबसहि बसकरी।निज पानि सर संधानि सो मोहि बधिहि सुखसागर हरी॥
वह सोचने लगा - अपने परम प्रियको देखकर आँखें सफल कर लूँगा, सीता-लक्ष्मणसहित कृपानिधानके चरणोंमें मन लगाऊँगा। जिनका क्रोध भी मुक्ति देता है, जिनकी भक्ति उस स्वतंत्र भगवानको भी वश कर लेती है - वे ही आनंदसागर हरि अपने हाथों बाण चलाकर मेरा वध करेंगे!
मम पाछें धर धावत धरें सरासन बान।फिरि फिरि प्रभुहि बिलोकिहउँ धन्य न मो सम आन॥२६॥
धनुष-बाण लिए मेरे पीछे दौड़ते प्रभुको मैं बार-बार निहारूँगा - मेरे बराबर भाग्यशाली और कोई नहीं।
तेहि बन निकट दसानन गयऊ। तब मारीच कपटमृग भयऊ॥अति बिचित्र कछु बरनि न जाई। कनक देह मनि रचित बनाई॥॥१॥
उस वनके पास पहुँचते ही रावण रुक गया और मारीच कपटी मृग बन गया - इतना अद्भुत कि बयान ही न हो सके, सोनेका शरीर मणियोंसे जड़ा हुआ।
सीता परम रुचिर मृग देखा। अंग अंग सुमनोहर बेषा॥सुनहु देव रघुबीर कृपाला। एहि मृग कर अति सुंदर छाला॥॥२॥
सीताने वह परम सुंदर हिरन देखा, जिसका हर अंग मनमोहक था - देव, कृपालु रघुवीर, सुनिए, इस मृगकी खाल कितनी सुंदर है!
सत्यसंध प्रभु बधि करि एही। आनहु चर्म कहति बैदेही॥तब रघुपति जानत सब कारन। उठे हरषि सुर काजु सँवारन॥॥३॥
सीताने कहा - सत्यप्रतिज्ञ प्रभु, इसे मारकर इसकी खाल ले आइए। रघुनाथ सब कुछ जानते हुए भी, देवताओंका काम सिद्ध करनेके लिए हर्षित होकर उठे।
मृग बिलोकि कटि परिकर बाँधा। करतल चाप रुचिर सर साँधा॥प्रभु लछिमनिहि कहा समुझाई। फिरत बिपिन निसिचर बहु भाई॥॥४॥
हिरनको देखकर राम ने कमर कसी, हाथमें धनुष लेकर सुंदर बाण चढ़ाया। फिर लक्ष्मणको समझाकर कहा - भाई, वनमें बहुत राक्षस घूमते हैं,
सीता केरि करेहु रखवारी। बुधि बिबेक बल समय बिचारी॥प्रभुहि बिलोकि चला मृग भाजी। धाए रामु सरासन साजी॥॥५॥
बुद्धि-विवेकसे समय और परिस्थिति समझकर सीताकी रखवाली करना। प्रभुको देखते ही मृग भागा, राम भी धनुष चढ़ाए उसके पीछे दौड़ पड़े।
निगम नेति सिव ध्यान न पावा। मायामृग पाछें सो धावा॥कबहुँ निकट पुनि दूरि पराई। कबहुँक प्रगटइ कबहुँ छपाई॥॥६॥
जिन्हें वेद 'नेति-नेति' कहकर छोड़ देते हैं और शिव भी ध्यानमें नहीं पा पाते, वे ही राम मायावी मृगके पीछे दौड़ रहे हैं - वह कभी पास आता, कभी दूर भाग जाता, कभी प्रकट होता, कभी छिप जाता।
प्रगटत दुरत करत छल भूरी। एहि बिधि प्रभुहि गयउ लै दूरी॥तब तकि राम कठिन सर मारा। धरनि परेउ करि घोर पुकारा॥॥७॥
इस तरह प्रकट-छिपते और खूब छल करते हुए उसने प्रभुको दूर तक खींच लिया। तब राम ने निशाना साधकर कठोर बाण छोड़ा, लगते ही वह भयानक चीख मारकर धरतीपर गिर पड़ा।
लछिमन कर प्रथमहिं लै नामा। पाछें सुमिरेसि मन महुँ रामा॥प्रान तजत प्रगटेसि निज देहा। सुमिरेसि रामु समेत सनेहा॥॥८॥
मरते समय उसने पहले लक्ष्मणका नाम पुकारा, फिर मनमें राम को स्मरण किया। प्राण त्यागते हुए उसने अपना असली राक्षसी रूप प्रकट किया और प्रेमसहित राम को याद किया।
अंतर प्रेम तासु पहिचाना। मुनि दुर्लभ गति दीन्हि सुजाना॥
श्रीराम ने उसके हृदय के सच्चे प्रेम को पहचान लिया और उस बुद्धिमान असुर को वह गति प्रदान की, जो बड़े-बड़े मुनियों को भी दुर्लभ है।
बिपुल सुमन सुर बरषहिं गावहिं प्रभु गुन गाथ।निज पद दीन्ह असुर कहुँ दीनबंधु रघुनाथ॥२७॥
देवता ढेरों फूल बरसाकर प्रभुके गुण गा रहे हैं - रघुनाथ ऐसे दीनबंधु हैं कि उन्होंने एक असुरको भी अपना परमपद दे दिया।
खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा। सोह चाप कर कटि तूनीरा॥आरत गिरा सुनी जब सीता। कह लछिमन सन परम सभीता॥॥१॥
दुष्टको मारकर रघुवीर तुरंत लौट पड़े, हाथमें धनुष और कमरमें तरकस शोभा दे रहे हैं। इधर सीताने मरते हुए मारीचकी दुखभरी पुकार (हा लक्ष्मण की आवाज़) सुनी तो भयभीत होकर लक्ष्मणसे बोलीं -
जाहु बेगि संकट अति भ्राता। लछिमन बिहसि कहा सुनु माता॥भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई। सपनेहुँ संकट परइ कि सोई॥॥२॥
जल्दी जाओ, तुम्हारे भाई बड़ी मुसीबतमें हैं। लक्ष्मणने हँसकर कहा - माता, सुनो, जिनकी भौंहके इशारेसे सारी सृष्टि लय हो जाती है, वे राम भला सपनेमें भी संकटमें पड़ सकते हैं?
मरम बचन जब सीता बोला। हरि प्रेरित लछिमन मन डोला॥बन दिसि देव सौंपि सब काहू। चले जहाँ रावन ससि राहू॥॥३॥
जब सीताने कुछ चुभनेवाली बातें कहीं, तब भगवानकी ही प्रेरणासे लक्ष्मणका मन डोल गया। वे सीताको वन और दिशाओंके देवताओंको सौंपकर वहाँ चल पड़े जहाँ रावणरूपी चाँदके लिए राहु-जैसे राम थे।
सून बीच दसकंधर देखा। आवा निकट जती कें बेषा॥जाकें डर सुर असुर डेराहीं। निसि न नीद दिन अन्न न खाहीं॥॥४॥
मौका खाली देखकर रावण संन्यासीका रूप धरकर पास आया - जिसके डरसे देवता-दानव तक रातको सो नहीं पाते और दिनमें अन्न नहीं खाते,
सो दससीस स्वान की नाई। इत उत चितइ चला भड़िहाई॥इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज तन बुधि बल लेसा॥॥५॥
वही दस सिरवाला रावण कुत्तेकी तरह इधर-उधर ताकता हुआ चोरीके इरादेसे बढ़ा। गरुड़, कुमार्गपर कदम रखते ही शरीरका तेज और बुद्धि-बलका नामोनिशान नहीं रहता।
नाना बिधि करि कथा सुहाई। राजनीति भय प्रीति देखाई॥कह सीता सुनु जती गोसाईं। बोलेहु बचन दुष्ट की नाईं॥॥६॥
उसने तरह-तरहकी सुहावनी कहानियाँ गढ़कर सीताको राजनीति, डर और प्रेम दिखाया। सीताने कहा - यति महाराज, सुनो, तुमने तो एक दुष्टकी तरह ही बात की है।
तब रावन निज रूप देखावा। भई सभय जब नाम सुनावा॥कह सीता धरि धीरजु गाढ़ा। आइ गयउ प्रभु रहु खल ठाढ़ा॥॥७॥
तब रावणने अपना असली रूप दिखाया, और जैसे ही नाम बताया, सीता डर गईं। फिर भी गहरा धीरज धरकर बोलीं - दुष्ट, वहीं खड़ा रह, प्रभु आ रहे हैं!
जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा। भएसि कालबस निसिचर नाहा॥सुनत बचन दससीस रिसाना। मन महुँ चरन बंदि सुख माना॥॥८॥
जैसे कोई तुच्छ खरगोश शेरनीको चाहे, वैसे ही तू कालके वश होकर मुझे चाहने चला है। यह सुनते ही रावण क्रोधित हुआ, पर मनमें सीताके चरणोंकी वंदना करके संतोष कर लिया।
क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ।चला गगनपथ आतुर भय रथ हाँकि न जाइ॥२८॥
फिर क्रोधमें भरकर रावणने सीताको रथपर बिठाया और घबराहटमें आकाशमार्गसे चल पड़ा, पर डरके मारे उससे रथ ठीकसे हाँका ही नहीं जा रहा था।
हा जग एक बीर रघुराया। केहिं अपराध बिसारेहु दाया॥आरति हरन सरन सुखदायक। हा रघुकुल सरोज दिननायक॥॥१॥
सीता विलाप करने लगीं - हे जगतके अद्वितीय वीर रघुनाथ, किस अपराधसे आपने मुझपर दया भुला दी! हे दुखहर्ता, शरणागतको सुख देनेवाले, हे रघुकुलरूपी कमलके सूर्य!
हा लछिमन तुम्हार नहिं दोसा। सो फलु पायउँ कीन्हेउँ रोसा॥बिबिध बिलाप करति बैदेही। भूरि कृपा प्रभु दूरि सनेही॥॥२॥
हा लक्ष्मण, तुम्हारा कोई दोष नहीं, मैंने ही गुस्सा किया था, उसीका फल पा रही हूँ। जानकी तरह-तरहसे विलाप करती हैं - प्रभुकी कृपा तो अपार है, पर वे स्नेही प्रभु आज इतने दूर रह गए।
बिपति मोरि को प्रभुहि सुनावा। पुरोडास चह रासभ खावा॥सीता के बिलाप सुनि भारी। भए चराचर जीव दुखारी॥॥३॥
मेरी यह विपत्ति प्रभुको कौन बताए? यज्ञका अन्न तो गधा खाना चाहता है (कैसा अनर्थ!)। सीताका यह भारी विलाप सुनकर जड़-चेतन सभी जीव दुखी हो उठे।
गीधराज सुनि आरत बानी। रघुकुलतिलक नारि पहिचानी॥अधम निसाचर लीन्हे जाई। जिमि मलेछ बस कपिला गाई॥॥४॥
गृध्रराज जटायुने सीताकी दुखभरी पुकार सुनकर पहचान लिया कि यह रघुकुलतिलक राम की पत्नी हैं। देखा कि नीच राक्षस उन्हें ऐसे ले जा रहा है जैसे कपिला गाय म्लेच्छके हाथ पड़ गई हो।
सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा। करिहउँ जातुधान कर नासा॥धावा क्रोधवंत खग कैसें। छूटइ पति परबत कहुँ जैसे॥॥५॥
जटायु बोले - बेटी सीता, डरो मत, मैं इस राक्षसका नाश करूँगा। यह कहकर वह क्रोधमें भरकर ऐसे दौड़ा जैसे पर्वतकी ओर वज्र छूटता है।
रे रे दुष्ट ठाढ़ किन होही। निर्भय चलेसि न जानेहि मोही॥आवत देखि कृतांत समाना। फिरि दसकंधर कर अनुमाना॥॥६॥
ललकारकर बोला - अरे दुष्ट, खड़ा क्यों नहीं होता, निडर होकर चल दिया, मुझे पहचाना नहीं क्या? उसे यमराजकी तरह आता देख रावण मुड़कर सोचने लगा -
की मैनाक कि खगपति होई। मम बल जान सहित पति सोई॥जाना जरठ जटायू एहा। मम कर तीरथ छाँड़िहि देहा॥॥७॥
यह मैनाक पर्वत है या पक्षिराज गरुड़? पर गरुड़ तो अपने स्वामी विष्णुसहित मेरा बल जानता है। पास आनेपर पहचान लिया - अरे, यह तो बूढ़ा जटायु है, यह मेरे हाथरूपी तीर्थमें ही प्राण त्यागेगा।
सुनत गीध क्रोधातुर धावा। कह सुनु रावन मोर सिखावा॥तजि जानकिहि कुसल गृह जाहू। नाहिं त अस होइहि बहुबाहू॥॥८॥
यह सुनते ही जटायु क्रोधमें भरकर दौड़ा और बोला - रावण, मेरी बात सुन ले, जानकीको छोड़कर सकुशल घर लौट जा, नहीं तो हे बहुभुजाधारी, ऐसा होगा कि -
राम रोष पावक अति घोरा। होइहि सकल सलभ कुल तोरा॥उतरु न देत दसानन जोधा। तबहिं गीध धावा करि क्रोधा॥॥९॥
राम के क्रोधरूपी भयानक अग्निमें तेरा पूरा वंश पतंगेकी तरह जल जाएगा। योद्धा रावणने कोई जवाब नहीं दिया, तब जटायु क्रोधसे दौड़ पड़ा।
धरि कच बिरथ कीन्ह महि गिरा। सीतहि राखि गीध पुनि फिरा॥चौचन्ह मारि बिदारेसि देही। दंड एक भइ मुरुछा तेही॥॥१०॥
उसने रावणके बाल पकड़कर उसे रथसे नीचे गिरा दिया, रावण धरतीपर आ पड़ा। जटायु सीताको एक ओर बिठाकर लौटा और चोंचोंसे रावणके शरीरको छलनी कर डाला, जिससे वह पल-भरके लिए बेहोश हो गया।
तब सक्रोध निसिचर खिसिआना। काढ़ेसि परम कराल कृपाना॥काटेसि पंख परा खग धरनी। सुमिरि राम करि अदभुत करनी॥॥११॥
तब क्रोधित रावणने भयानक तलवार निकाली और जटायुके पंख काट डाले। जटायु राम की अद्भुत लीलाका स्मरण करते हुए धरतीपर गिर पड़ा।
सीतहि जानि चढ़ाइ बहोरी। चला उताइल त्रास न थोरी॥करति बिलाप जाति नभ सीता। ब्याध बिबस जनु मृगी सभीता॥॥१२॥
फिर सीताको रथपर चढ़ाकर रावण डरते-डरते तेजीसे चल पड़ा। सीता आकाशमें विलाप करती जा रही हैं, मानो शिकारीके जालमें फँसी कोई डरी हुई हिरनी हो।
गिरि पर बैठे कपिन्ह निहारी। कहि हरि नाम दीन्ह पट डारी॥एहि बिधि सीतहि सो लै गयऊ। बन असोक महँ राखत भयऊ॥॥१३॥
पहाड़पर बैठे वानरोंको देखकर सीताने राम-नाम लेते हुए अपना वस्त्र नीचे गिरा दिया। इस तरह रावण उन्हें अशोकवाटिकामें ले जाकर रख आया।
हारि परा खल बहु बिधि भय अरु प्रीति देखाइ।तब असोक पादप तर राखिसि जतन कराइ॥२९(क)॥
बहुत तरहसे डरा-धमकाकर और प्रेम जताकर भी जब वह दुष्ट सीताको झुका न सका, तब सारी व्यवस्था करवाकर उन्हें अशोक वृक्षके नीचे बिठा दिया।
जेहि बिधि कपट कुरंग सँग धाइ चले श्रीराम।सो छबि सीता राखि उर रटति रहति हरिनाम॥२९(ख)॥
जिस तरह कपटी मृगके पीछे राम दौड़ पड़े थे, वही दृश्य हृदयमें बसाए सीता रामनाम रटती रहती हैं।
रघुपति अनुजहि आवत देखी। बाहिज चिंता कीन्हि बिसेषी॥जनकसुता परिहरिहु अकेली। आयहु तात बचन मम पेली॥॥१॥
इधर रघुनाथने लक्ष्मणको आते देखकर ऊपरसे बहुत चिंता जताई - भाई, तुमने जानकीको अकेली छोड़ दिया और मेरी बात टालकर यहाँ चले आए!
निसिचर निकर फिरहिं बन माहीं। मम मन सीता आश्रम नाहीं॥गहि पद कमल अनुज कर जोरी। कहेउ नाथ कछु मोहि न खोरी॥॥२॥
वनमें राक्षसोंके झुंड घूमते रहते हैं, मुझे लग रहा है सीता आश्रममें नहीं हैं। लक्ष्मणने राम के चरण पकड़कर हाथ जोड़े - नाथ, इसमें मेरा कोई दोष नहीं है।
अनुज समेत गए प्रभु तहवाँ। गोदावरि तट आश्रम जहवाँ॥आश्रम देखि जानकी हीना। भए बिकल जस प्राकृत दीना॥॥३॥
लक्ष्मणसहित प्रभु वहाँ पहुँचे जहाँ गोदावरीके तटपर उनका आश्रम था। सीतासे खाली आश्रम देखकर राम एक साधारण मनुष्यकी तरह व्याकुल और दुखी हो उठे।
हा गुन खानि जानकी सीता। रूप सील ब्रत नेम पुनीता॥लछिमन समुझाए बहु भाँती। पूछत चले लता तरु पाँती॥॥४॥
विलाप करने लगे - हा गुणोंकी खान जानकी, हा रूप-शील-व्रत-नियममें पवित्र सीते! लक्ष्मणने बहुत समझाया, फिर राम लता-वृक्षोंकी कतारोंसे पूछते हुए आगे बढ़े।
हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी॥खंजन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीना॥॥५॥
हे पक्षियो, हे पशुओ, हे भौंरोंके झुंड, क्या तुमने मृगनयनी सीताको देखा? खंजन, तोता, कबूतर, हिरन, मछली, भौंरे, कुशल कोयल,
कुंद कली दाड़िम दामिनी। कमल सरद ससि अहिभामिनी॥बरुन पास मनोज धनु हंसा। गज केहरि निज सुनत प्रसंसा॥॥६॥
कुंदकली, अनार, बिजली, कमल, शरदका चाँद और नागिन, वरुणका पाश, कामदेवका धनुष, हंस, हाथी, सिंह - ये सब आज खुद अपनी तारीफ सुन रहे हैं।
श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं। नेकु न संक सकुच मन माहीं॥सुनु जानकी तोहि बिनु आजू। हरषे सकल पाइ जनु राजू॥॥७॥
बेल, सोना, केला हर्षित हो रहे हैं, इनके मनमें अब कोई शंका-संकोच नहीं। जानकी, सुनो, तुम्हारे बिना ये सब आज ऐसे खुश हैं मानो राज पा गए हों।
किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं । प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं॥एहि बिधि खोजत बिलपत स्वामी। मनहुँ महा बिरही अति कामी॥॥८॥
यह होड़ तुमसे कैसे सही जाती है, प्रिये, तुम जल्दी सामने क्यों नहीं आतीं? इस तरह ढूँढ़ते-विलाप करते हुए स्वामी राम मानो कोई अत्यंत विरही और व्याकुल प्रेमी लग रहे हैं।
पूरनकाम राम सुख रासी। मनुज चरित कर अज अबिनासी॥आगें परा गीधपति देखा। सुमिरत राम चरन जिन्ह रेखा॥॥९॥
पूर्णकाम, आनंदराशि, अजन्मा-अविनाशी राम मनुष्यके-से चरित्र कर रहे हैं। आगे जाकर उन्होंने गृध्रराज जटायुको गिरा पड़ा देखा, जो राम के चरण-चिह्नोंका स्मरण कर रहा था।
कर सरोज सिर परसेउ कृपासिंधु रघुबीर।निरखि राम छबि धाम मुख बिगत भई सब पीर॥३०॥
कृपासागर रघुवीरने अपने हाथसे उसके सिरको छुआ। शोभाधाम राम का मुख देखते ही उसकी सारी पीड़ा जाती रही।
तब कह गीध बचन धरि धीरा । सुनहु राम भंजन भव भीरा॥नाथ दसानन यह गति कीन्ही। तेहि खल जनकसुता हरि लीन्ही॥॥१॥
तब धीरज धरकर जटायुने कहा - संसार-भयको मिटानेवाले राम, सुनिए, नाथ, रावणने मेरी यह दशा की है, उसी दुष्टने जानकीको हर लिया है।
लै दच्छिन दिसि गयउ गोसाई। बिलपति अति कुररी की नाई॥दरस लागी प्रभु राखेंउँ प्राना। चलन चहत अब कृपानिधाना॥॥२॥
गोसाईं, वह उन्हें दक्षिण दिशाकी ओर ले गया, सीता कुर्रीकी तरह विलाप कर रही थीं। प्रभु, मैंने बस आपके दर्शनके लिए प्राण रोक रखे थे, अब कृपानिधान, ये चलना चाहते हैं।
राम कहा तनु राखहु ताता। मुख मुसकाइ कही तेहिं बाता॥जा कर नाम मरत मुख आवा। अधमउ मुकुत होई श्रुति गावा॥॥३॥
राम ने कहा - तात, शरीर बचाए रखिए। वह मुस्कुराते हुए बोला - मरते समय जिसका नाम मुखमें आ जाए तो घोर पापी भी मुक्त हो जाता है, ऐसा वेद कहते हैं -
सो मम लोचन गोचर आगें। राखौं देह नाथ केहि खाँगें॥जल भरि नयन कहहिं रघुराई। तात कर्म निज ते गतिं पाई॥॥४॥
वही आप आज मेरी आँखोंके सामने खड़े हैं, नाथ, अब मैं किस कमीके लिए यह देह बचाए रखूँ? आँखोंमें आँसू भरकर रघुनाथ बोले - तात, आपने अपने पुण्य कर्मोंसे यह दुर्लभ गति पाई है।
परहित बस जिन्ह के मन माहीं। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥तनु तजि तात जाहु मम धामा। देउँ काह तुम्ह पूरनकामा॥॥५॥
जिनके मनमें दूसरोंका भला बसता है, उनके लिए संसारमें कुछ भी दुर्लभ नहीं। तात, देह त्यागकर मेरे परमधाममें जाइए, आपको मैं क्या दूँ, आप तो पहले ही पूर्णकाम हैं।
सीता हरन तात जनि कहहु पिता सन जाइ।जौं मैं राम त कुल सहित कहिहि दसानन आइ॥३१॥
तात, सीताहरणकी बात पिताजीसे मत कहिएगा - अगर मैं राम हूँ तो रावण खुद अपने परिवारसहित वहाँ आकर यह बात कहेगा।
गीध देह तजि धरि हरि रुपा। भूषन बहु पट पीत अनूपा॥स्याम गात बिसाल भुज चारी। अस्तुति करत नयन भरि बारी॥॥१॥
जटायुने पक्षी-देह त्यागकर विष्णुका रूप धारण किया, कई दिव्य आभूषण और पीतांबर पहने। श्याम शरीर, चार विशाल भुजाएँ, आँखोंमें आँसू भरे वह स्तुति करने लगा -
जय राम रूप अनूप निर्गुन सगुन गुन प्रेरक सही।दससीस बाहु प्रचंड खंडन चंड सर मंडन मही॥पाथोद गात सरोज मुख राजीव आयत लोचनं।नित नौमि रामु कृपाल बाहु बिसाल भव भय मोचनं॥॥१॥
राम, आपकी जय हो, आपका रूप अनुपम है, आप निर्गुण भी हैं सगुण भी, और सच्चे अर्थमें गुणोंके प्रेरक हैं। दस सिरवाले रावणकी भुजाओंको तोड़नेके लिए प्रचंड बाण धारण करनेवाले, धरतीको सुशोभित करनेवाले, बादल-जैसे श्याम शरीर, कमल-जैसे मुख-नेत्र, विशाल भुजाओंवाले, भवभयसे मुक्त करनेवाले कृपालु राम को मैं सदा नमन करता हूँ।
बलमप्रमेयमनादिमजमब्यक्तमेकमगोचरं।गोबिंद गोपर द्वंद्वहर बिग्यानघन धरनीधरं॥जे राम मंत्र जपंत संत अनंत जन मन रंजनं।नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि खल दल गंजनं॥२॥
आप अपार बलवाले, अनादि, अजन्मा, अव्यक्त, एक, अगोचर, इंद्रियोंसे परे, सुख-दुखके द्वंद्वको मिटानेवाले, ज्ञानकी मूर्ति और धरतीके आधार हैं। जो संत राम-मंत्र जपते हैं, उन अनगिनत भक्तोंके मनको आनंद देनेवाले, निष्कामियोंके प्रिय और काम-जैसे दुष्ट भावोंका नाश करनेवाले राम को मैं सदा नमन करता हूँ।
जेहि श्रुति निरंजन ब्रह्म ब्यापक बिरज अज कहि गावहीं।करि ध्यान ग्यान बिराग जोग अनेक मुनि जेहि पावहीं॥सो प्रगट करुना कंद सोभा बृंद अग जग मोहई।मम हृदय पंकज भृंग अंग अनंग बहु छबि सोहई॥३॥
जिन्हें वेद निरंजन, ब्रह्म, व्यापक, निर्विकार और अजन्मा कहकर गाते हैं, जिन्हें मुनि ध्यान-ज्ञान-वैराग्य-योगसे पाते हैं, वे ही करुणाके सागर, शोभाके मूल प्रकट होकर सारे जगतको मोहित कर रहे हैं - मेरे हृदयकमलके भँवरे बने उनके अंग-अंगमें अनगिनत कामदेवोंकी छटा शोभा पा रही है।
जो अगम सुगम सुभाव निर्मल असम सम सीतल सदा।पस्यंति जं जोगी जतन करि करत मन गो बस सदा॥सो राम रमा निवास संतत दास बस त्रिभुवन धनी।मम उर बसउ सो समन संसृति जासु कीरति पावनी॥४॥
जो अगम भी हैं सुगम भी, स्वभावसे निर्मल, विषम भी सम भी, सदा शांत हैं, जिन्हें योगी मन-इंद्रियोंको वशमें करते हुए बड़ी साधनासे देख पाते हैं - वे तीनों लोकोंके स्वामी, लक्ष्मीनिवास राम सदा अपने भक्तोंके वश रहते हैं, वे ही मेरे हृदयमें बसें, जिनकी पवित्र कीर्ति जन्म-मरणका चक्र मिटा देती है।
अबिरल भगति मागि बर गीध गयउ हरिधाम।तेहि की क्रिया जथोचित निज कर कीन्ही राम॥३२॥
अटूट भक्तिका वरदान माँगकर जटायु हरिधाम चला गया। राम ने उसकी अंत्येष्टि-क्रिया स्वयं अपने हाथों से पूरी की।
कोमल चित अति दीनदयाला। कारन बिनु रघुनाथ कृपाला॥गीध अधम खग आमिष भोगी। गति दीन्हि जो जाचत जोगी॥॥१॥
रघुनाथ अत्यंत कोमल हृदयके, दीनदयालु और बिना किसी कारणके कृपालु हैं। जटायु पक्षियोंमें भी नीच और मांसाहारी था, फिर भी उसे वह दुर्लभ गति दी जो योगी तरसते हैं।
सुनहु उमा ते लोग अभागी। हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी॥पुनि सीतहि खोजत द्वौ भाई। चले बिलोकत बन बहुताई॥॥२॥
शिवजी कहते हैं - पार्वती, सुनो, वे अभागे हैं जो भगवानको छोड़कर सांसारिक विषयोंमें रम जाते हैं। फिर दोनों भाई सीताको खोजते आगे बढ़े, घने वनको निहारते हुए।
संकुल लता बिटप घन कानन। बहु खग मृग तहँ गज पंचानन॥आवत पंथ कबंध निपाता। तेहिं सब कही साप कै बाता॥॥३॥
वह सघन वन लताओं-वृक्षोंसे भरा है, वहाँ बहुत पक्षी, हिरण, हाथी, सिंह रहते हैं। रास्तेमें राम ने कबंध राक्षसको मार डाला, उसने मरते हुए अपने शापकी सारी कहानी सुनाई।
दुरबासा मोहि दीन्ही सापा। प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा॥सुनु गंधर्ब कहउँ मै तोही। मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही॥॥४॥
बोला - दुर्वासाने मुझे शाप दिया था, प्रभुके चरण देखते ही वह पाप मिट गया। राम ने कहा - गंधर्व, सुनो, ब्राह्मणकुलसे द्रोह करनेवाला मुझे कभी नहीं भाता।
मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव।मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव॥३३॥
जो मन-वचन-कर्मसे कपट छोड़कर ब्राह्मणोंकी सेवा करता है, ब्रह्मा-शिवसहित मैं और सारे देवता उसके वश हो जाते हैं।
सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता॥पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना॥॥१॥
शाप देता, मारता या कड़वा बोलता ब्राह्मण भी पूजनीय है, ऐसा संत कहते हैं। शील-गुणहीन ब्राह्मण भी पूजा जाए, पर गुणी और ज्ञानी शूद्र भी पूजनीय नहीं।
कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मन भावा॥रघुपति चरन कमल सिरु नाई। गयउ गगन आपनि गति पाई॥॥२॥
राम ने उसे अपना धर्म समझाया, अपने चरणोंमें उसका प्रेम देखकर मन प्रसन्न हुआ। फिर रघुनाथके चरणोंमें सिर नवाकर वह अपना असली गंधर्व-रूप पाकर आकाशमें उड़ गया।
ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी कें आश्रम पगु धारा॥सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए॥॥३॥
उदार राम उसे मुक्ति देकर शबरीके आश्रम पहुँचे। राम को घर आया देखकर शबरीको मुनि मतंगके वचन याद आए और मन प्रसन्न हो उठा।
सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला॥स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई॥॥४॥
कमल-जैसे नेत्र, विशाल भुजाएँ, सिरपर जटाओंका मुकुट, हृदयपर वनमाला - सुंदर साँवले-गोरे दोनों भाइयोंके चरणोंमें शबरी लिपट गई।
प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा॥सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे॥॥५॥
प्रेममें डूबी वह कुछ बोल न पाई, बार-बार चरणोंमें सिर नवाती रही। फिर आदरसे जल लेकर दोनोंके चरण धोए और सुंदर आसनपर बिठाया।
कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि।प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि॥३४॥
वह रसीले, स्वादिष्ट कंद-मूल-फल लाकर राम को दिए, प्रभुने बार-बार तारीफ करते हुए प्रेमसे उन्हें खाया।
पानि जोरि आगें भइ ठाढ़ी। प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी॥केहि बिधि अस्तुति करौं तुम्हारी। अधम जाति मैं जड़मति भारी॥॥१॥
फिर हाथ जोड़कर सामने खड़ी हो गई, प्रभुको देखकर उसका प्रेम और बढ़ गया - बोली, मैं आपकी स्तुति कैसे करूँ, मैं नीच जातिकी और मंदबुद्धि हूँ।
अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी॥कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता॥॥२॥
अधमसे भी अधम स्त्रियाँ होती हैं, और उनमें भी मैं सबसे मंदबुद्धि हूँ। रघुनाथने कहा - सुनो, मैं तो बस भक्तिका ही नाता मानता हूँ।
जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई॥भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥॥३॥
जाति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, परिवार, गुण, चतुराई - सब कुछ हो, पर भक्तिहीन मनुष्य ऐसा लगता है जैसे पानी बिना बादल।
नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा॥॥४॥
अब मैं तुझे अपनी नवधा भक्ति बताता हूँ, ध्यानसे सुन और मनमें बसा ले। पहली भक्ति है संतोंका साथ, दूसरी है मेरी कथाओंमें प्रेम,
गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान॥३५॥
तीसरी भक्ति है निरभिमान होकर गुरुके चरणोंकी सेवा, चौथी है छल छोड़कर मेरे गुण गाना।
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा॥॥१॥
मेरे नाम-मंत्रका जाप और मुझपर दृढ़ विश्वास - यह पाँचवीं भक्ति है, जो वेदोंमें प्रसिद्ध है। छठी है इंद्रिय-संयम, अच्छा स्वभाव, तमाम कामोंसे वैराग्य और सदा संतोंके आचरणमें लगे रहना।
सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा॥आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥॥२॥
सातवीं भक्ति है सारी दुनियाको मुझमें ही समाया देखना और संतोंको मुझसे भी बढ़कर मानना। आठवीं है जो मिले उसीमें संतुष्ट रहना, सपनेमें भी दूसरोंके दोष न देखना।
नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना॥नव महुँ एकउ जिन्ह के होई। नारि पुरुष सचराचर कोई॥॥३॥
नौवीं है सरलता और सबके साथ निष्कपट व्यवहार, मनमें मेरा भरोसा रखना और न कभी हर्षमें फूलना न दुखमें टूटना। इन नौमेंसे जिसमें एक भी हो, वह चाहे स्त्री हो पुरुष, जड़ हो या चेतन -
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरे। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें॥जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई॥॥४॥
वही मुझे सबसे प्रिय है, सखी। और तुझमें तो सारी नौ भक्तियाँ पक्की हैं। इसलिए जो गति योगियोंको भी दुर्लभ है, वह आज तेरे लिए सहज हो गई है।
मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा॥जनकसुता कइ सुधि भामिनी। जानहि कहु करिबरगामिनी॥॥५॥
मेरे दर्शनका सबसे बड़ा फल यही है कि जीव अपने असली स्वरूपको पा लेता है। सखी, अगर तुझे गजगामिनी जानकीकी कोई खबर हो तो बता।
पंपा सरहि जाहु रघुराई। तहँ होइहि सुग्रीव मिताई॥सो सब कहिहि देव रघुबीरा। जानतहूँ पूछहु मतिधीरा॥॥६॥
शबरीने कहा - रघुनाथ, आप पंपा सरोवर जाइए, वहीं सुग्रीवसे आपकी मित्रता होगी। देव, रघुवीर, वह सब बता देगा - धैर्यवान प्रभु, आप सब जानते हुए भी मुझसे क्यों पूछते हैं!
बार बार प्रभु पद सिरु नाई। प्रेम सहित सब कथा सुनाई॥॥७॥
बार-बार प्रभुके चरणोंमें सिर नवाकर उसने प्रेमसहित यह सारी बात सुनाई।
कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदयँ पद पंकज धरे।तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भइ जहँ नहिं फिरे॥नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू।बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू॥
सब कथा कहकर, हरिका मुख निहारकर, हृदयमें उनके चरणकमल धारण करके, योगाग्निसे देह त्यागकर वह उस दुर्लभ हरिपदमें लीन हो गई जहाँसे लौटना नहीं होता। तुलसीदास कहते हैं - मनुष्यो, तरह-तरहके कर्म-अधर्म और मत-मतांतर सब दुखदायी हैं, इन्हें छोड़ो और विश्वाससहित राम के चरणोंमें प्रेम करो।
जाति हीन अघ जन्म महि मुक्त कीन्हि असि नारि।महामंद मन सुख चहसि ऐसे प्रभुहि बिसारि॥३६॥
जो नीच जातिकी और पापोंकी जन्मभूमि जैसी थी, ऐसी स्त्रीको भी जिन्होंने मुक्त कर दिया - अरे महामूर्ख मन, ऐसे प्रभुको भुलाकर तू सुख चाहता है?
चले राम त्यागा बन सोऊ। अतुलित बल नर केहरि दोऊ॥बिरही इव प्रभु करत बिषादा। कहत कथा अनेक संबादा॥॥१॥
राम ने वह वन भी छोड़ दिया, आगे चल पड़े - दोनों भाई अतुलनीय बलवान, मनुष्योंमें सिंहके समान। प्रभु विरहीकी तरह विषाद करते हुए तरह-तरहकी बातें कहने लगे -
लछिमन देखु बिपिन कइ सोभा। देखत केहि कर मन नहिं छोभा॥नारि सहित सब खग मृग बृंदा। मानहुँ मोरि करत हहिं निंदा॥॥२॥
लक्ष्मण, देखो तो वनकी शोभा, इसे देखकर किसका मन विचलित न हो। पक्षी-पशुओंके झुंड सब अपनी-अपनी संगिनीके साथ हैं - मानो मेरा उपहास कर रहे हों।
हमहि देखि मृग निकर पराहीं। मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं॥तुम्ह आनंद करहु मृग जाए। कंचन मृग खोजन ए आए॥॥३॥
हमें देखकर हिरनोंके झुंड भागते हैं तो हिरनियाँ कहती हैं - तुम्हें डर नहीं, तुम तो साधारण हिरनसे जन्मे हो, आनंद करो, ये तो सोनेका हिरन ढूँढ़ने आए हैं।
संग लाइ करिनीं करि लेहीं। मानहुँ मोहि सिखावनु देहीं॥सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ। भूप सुसेवित बस नहिं लेखिअ॥॥४॥
हाथी अपनी हथिनियोंको साथ लगाए रखते हैं, मानो मुझे सिखा रहे हों कि स्त्रीको अकेला न छोड़ो। अच्छी तरह पढ़े शास्त्रको भी बार-बार दोहराना चाहिए, अच्छी सेवावाले राजाको भी पूरा वश में मत समझो।
राखिअ नारि जदपि उर माहीं। जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं॥देखहु तात बसंत सुहावा। प्रिया हीन मोहि भय उपजावा॥॥५॥
स्त्रीको चाहे हृदयमें ही क्यों न रखो, पर जवान स्त्री, शास्त्र और राजा किसीके वशमें नहीं रहते। तात, यह सुंदर वसंत तो देखो, प्रियाके बिना यह मुझमें डर पैदा कर रहा है।
बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल।सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल॥३७(क)॥
विरहसे व्याकुल, कमजोर और बिल्कुल अकेला जानकर कामदेवने वन, भौंरे और पक्षियोंको साथ लेकर मुझपर धावा बोल दिया।
देखि गयउ भ्राता सहित तासु दूत सुनि बात।डेरा कीन्हेउ मनहुँ तब कटकु हटकि मनजात॥३७(ख)॥
पर जब उसके दूतने देखा कि मैं भाईके साथ हूँ, अकेला नहीं, तो यह सुनकर कामदेवने मानो अपनी सेना रोककर डेरा डाल दिया।
बिटप बिसाल लता अरुझानी। बिबिध बितान दिए जनु तानी॥कदलि ताल बर धुजा पताका। देखि न मोह धीर मन जाका॥॥१॥
विशाल वृक्षोंमें उलझी लताएँ ऐसी लगती हैं मानो कई तंबू तान दिए गए हों। केला-ताड़ सुंदर झंडोंकी तरह हैं - इन्हें देखकर वही न मोहित हो जिसका मन बहुत धीर हो।
बिबिध भाँति फूले तरु नाना। जनु बानैत बने बहु बाना॥कहूँ कहुँ कहुँ सुन्दर बिटप सुहाए। जनु भट बिलग बिलग होइ छाए॥॥२॥
तरह-तरहके फूले पेड़ मानो अलग-अलग वर्दीवाले धनुर्धर हों, कहीं-कहीं सुंदर पेड़ ऐसे शोभित हैं मानो योद्धा अलग-अलग छावनी डाले हों।
कूजत पिक मानहुँ गज माते। ढेक महोख ऊँट बिसराते॥मोर चकोर कीर बर बाजी। पारावत मराल सब ताजी॥॥३॥
कोयलें कूज रही हैं मानो मतवाले हाथी चिंघाड़ रहे हों, ढेक-महोख पक्षी मानो ऊँट-खच्चर हैं, मोर-चकोर-तोते-कबूतर-हंस मानो सुंदर घोड़े हैं।
तीतिर लावक पदचर जूथा। बरनि न जाइ मनोज बरूथा॥रथ गिरि सिला दुंदुभी झरना। चातक बंदी गुन गन बरना॥॥४॥
तीतर-बटेर पैदल सैनिकोंके झुंड हैं, कामदेवकी इस सेनाका वर्णन ही नहीं हो सकता। पहाड़ोंकी चट्टानें रथ हैं, झरने नगाड़े हैं, पपीहे भाट बनकर गुणगान कर रहे हैं।
मधुकर मुखर भेरि सहनाई। त्रिबिध बयारि बसीठीं आई॥चतुरंगिनी सेन सँग लीन्हें। बिचरत सबहि चुनौती दीन्हें॥॥५॥
भौंरोंकी गुंजार ही भेरी-शहनाई है, शीतल-मंद-सुगंधित हवा मानो दूत बनकर आई है। इस तरह चतुरंगिणी सेना लिए कामदेव मानो सबको चुनौती देते हुए घूम रहा है।
लछिमन देखत काम अनीका। रहहिं धीर तिन्ह के जग लीका॥एहि कें एक परम बल नारी। तेहि तें उबर सुभट सोइ भारी॥॥६॥
लक्ष्मण, कामदेवकी इस सेनाको देखकर भी जो धीर बने रहें, संसारमें उन्हींकी प्रतिष्ठा है। इस कामदेवका सबसे बड़ा हथियार तो बस एक स्त्री ही है, जो उससे बच जाए वही सच्चा योद्धा है।
तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ।मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ॥३८(क)॥
तात, काम, क्रोध और लोभ - ये तीन बड़े प्रबल शत्रु हैं। ये ज्ञानी मुनियोंके मनको भी पलभरमें डगमगा देते हैं।
लोभ कें इच्छा दंभ बल काम के केवल नारि।क्रोध के परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि॥३८(ख)॥
लोभका बल है इच्छा और दिखावा, कामका बल है बस स्त्री, और क्रोधका बल है कठोर वचन - ऐसा श्रेष्ठ मुनि विचारकर कहते हैं।
गुनातीत सचराचर स्वामी। राम उमा सब अंतरजामी॥कामिन्ह के दीनता देखाई। धीरन्ह कें मन बिरति दृढ़ाई॥॥१॥
शिवजी कहते हैं - पार्वती, राम तीनों गुणोंसे परे, चराचरके स्वामी और सबके मनकी बात जाननेवाले हैं। इन बातोंसे उन्होंने कामीजनोंकी लाचारी दिखाई और धीर पुरुषोंके मनमें वैराग्य और दृढ़ किया।
क्रोध मनोज लोभ मद माया। छूटहिं सकल राम कीं दाया॥सो नर इंद्रजाल नहिं भूला। जा पर होइ सो नट अनुकूला॥॥२॥
क्रोध, काम, लोभ, मद, माया - ये सब राम की कृपासे ही छूटते हैं। जिसपर वे नटराज प्रसन्न हों, वह मनुष्य इस माया-जालमें कभी नहीं भटकता।
उमा कहउँ मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत सब सपना॥पुनि प्रभु गए सरोबर तीरा। पंपा नाम सुभग गंभीरा॥॥३॥
उमा, मैं तुझे अपना अनुभव बताता हूँ - हरिका भजन ही सच है, यह पूरी दुनिया तो एक सपना है। फिर प्रभु पंपा नामक सुंदर, गहरे सरोवरके किनारे गए।
संत हृदय जस निर्मल बारी। बाँधे घाट मनोहर चारी॥जहँ तहँ पिअहिं बिबिध मृग नीरा। जनु उदार गृह जाचक भीरा॥॥४॥
उसका पानी संतोंके मनकी तरह निर्मल है, चार सुंदर घाट बने हैं। तरह-तरहके पशु जहाँ-तहाँ पानी पी रहे हैं, मानो किसी उदार दानीके घर याचकोंकी भीड़ लगी हो।
पुरइनि सबन ओट जल बेगि न पाइअ मर्म।मायाछन्न न देखिऐ जैसे निर्गुन ब्रह्म॥३९(क)॥
घने कमल-पत्तोंकी आड़में पानीका पता जल्दी नहीं चलता - ठीक वैसे ही जैसे मायाकी ओटमें निर्गुण ब्रह्म नहीं दिखता।
सुखी मीन सब एकरस अति अगाध जल माहिं।जथा धर्मसीलन्ह के दिन सुख संजुत जाहिं॥३९(ख)॥
उस अथाह जलमें सब मछलियाँ सदा एक-सी सुखी रहती हैं, जैसे धर्मपरायण लोगोंके दिन हमेशा सुखसे बीतते हैं।
बिकसे सरसिज नाना रंगा। मधुर मुखर गुंजत बहु भृंगा॥बोलत जलकुक्कुट कलहंसा। प्रभु बिलोकि जनु करत प्रसंसा॥॥१॥
उसमें रंग-बिरंगे कमल खिले हैं, बहुत-से भौंरे मीठी गुंजार कर रहे हैं। जलमुर्गे और राजहंस ऐसे बोल रहे हैं मानो प्रभुको देखकर उनकी तारीफ कर रहे हों।
चक्रवाक बक खग समुदाई। देखत बनइ बरनि नहिं जाई॥सुंदर खग गन गिरा सुहाई। जात पथिक जनु लेत बोलाई॥॥२॥
चकवा-बगुलोंका झुंड देखते ही बनता है, बयान नहीं हो सकता। पक्षियोंकी मीठी बोली ऐसी लगती है मानो रास्ते चलते राहगीरको बुला रही हो।
ताल समीप मुनिन्ह गृह छाए। चहु दिसि कानन बिटप सुहाए॥चंपक बकुल कदंब तमाला। पाटल पनस परास रसाला॥॥३॥
उस सरोवरके पास मुनियोंने आश्रम बना रखे हैं, चारों ओर सुंदर वनके वृक्ष हैं - चंपा, मौलसिरी, कदंब, तमाल, पाटल, कटहल, ढाक, आम,
नव पल्लव कुसुमित तरु नाना। चंचरीक पटली कर गाना॥सीतल मंद सुगंध सुभाऊ। संतत बहइ मनोहर बाऊ॥॥४॥
कई पेड़ नए पत्तों-फूलोंसे लदे हैं, भौंरे उनपर गुंजार कर रहे हैं। शीतल-मंद-सुगंधित मनोहर हवा हर पल बहती रहती है।
कुहू कुहू कोकिल धुनि करहीं। सुनि रव सरस ध्यान मुनि टरहीं॥॥५॥
कोयलें कुहू-कुहू कर रही हैं, उनकी मीठी बोली सुनकर मुनियोंका ध्यान भी टूट जाता है।
फल भारन नमि बिटप सब रहे भूमि निअराइ।पर उपकारी पुरुष जिमि नवहिं सुसंपति पाइ॥४०॥
फलोंके बोझसे झुककर सारे पेड़ धरतीके करीब आ गए हैं - जैसे परोपकारी लोग बड़ी संपत्ति पाकर विनम्र हो जाते हैं।
देखि राम अति रुचिर तलावा। मज्जनु कीन्ह परम सुख पावा॥देखी सुंदर तरुबर छाया। बैठे अनुज सहित रघुराया॥॥१॥
राम ने यह सुंदर तालाब देखकर स्नान किया और बहुत सुख पाया। फिर एक अच्छे पेड़की छाया देखकर वे लक्ष्मणसहित बैठ गए।
तहँ पुनि सकल देव मुनि आए। अस्तुति करि निज धाम सिधाए॥बैठे परम प्रसन्न कृपाला। कहत अनुज सन कथा रसाला॥॥२॥
वहाँ सब देवता-मुनि आए, स्तुति करके अपने-अपने धाम लौट गए। परम प्रसन्न कृपालु राम लक्ष्मणसे रसभरी कथाएँ कहने लगे।
बिरहवंत भगवंतहि देखी। नारद मन भा सोच बिसेषी॥मोर साप करि अंगीकारा। सहत राम नाना दुख भारा॥॥३॥
भगवानको विरहमें देखकर नारदको बड़ा सोच हुआ - उन्होंने सोचा, मेरे ही शापको स्वीकार करके राम इतने दुख झेल रहे हैं।
ऐसे प्रभुहि बिलोकउँ जाई। पुनि न बनिहि अस अवसरु आई॥यह बिचारि नारद कर बीना। गए जहाँ प्रभु सुख आसीना॥॥४॥
ऐसे प्रभुके पास जाकर उन्हें देख लूँ, फिर ऐसा मौका न मिलेगा - यह सोचकर नारद वीणा लिए वहाँ पहुँचे जहाँ प्रभु सुखसे बैठे थे।
गावत राम चरित मृदु बानी। प्रेम सहित बहु भाँति बखानी॥करत दंडवत लिए उठाई। राखे बहुत बार उर लाई॥॥५॥
वे कोमल वाणीमें प्रेमसे राम के चरित्र गाते हुए आ रहे थे। दंडवत करते देखकर राम ने उन्हें उठाकर बहुत देर गले लगाए रखा।
स्वागत पूँछि निकट बैठारे। लछिमन सादर चरन पखारे॥॥६॥
फिर कुशल पूछकर पास बिठाया, लक्ष्मणने आदरपूर्वक उनके चरण धोए।
नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि।नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि॥४१॥
नारदने कई तरहसे विनती की और प्रभुको प्रसन्न जानकर हाथ जोड़कर बोले -
सुनहु उदार सहज रघुनायक। सुंदर अगम सुगम बर दायक॥देहु एक बर मागउँ स्वामी। जद्यपि जानत अंतरजामी॥॥१॥
स्वभावसे उदार रघुनाथ, सुनिए, आप सुंदर, अगम भी और सुगम भी, वरदान देनेवाले हैं। स्वामी, मैं एक वरदान माँगता हूँ, यद्यपि आप अंतर्यामी होकर सब जानते ही हैं।
जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ। जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ॥कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी। जो मुनिबर न सकहु तुम्ह मागी॥॥२॥
राम ने कहा - मुनि, तुम मेरा स्वभाव जानते ही हो, क्या मैं अपने भक्तसे कभी कुछ छिपाता हूँ? भला ऐसी कौन-सी चीज़ है जो मुझे प्रिय हो और तुम माँग न सको?
जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोरें। अस बिस्वास तजहु जनि भोरें॥तब नारद बोले हरषाई । अस बर मागउँ करउँ ढिठाई॥॥३॥
भक्तके लिए मेरे पास कुछ भी अदेय नहीं है, यह भरोसा भूलकर भी मत छोड़ो। तब नारद हर्षित होकर बोले - मैं यह धृष्टता करते हुए ऐसा वरदान माँगता हूँ -
जद्यपि प्रभु के नाम अनेका। श्रुति कह अधिक एक तें एका॥राम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका॥॥४॥
यद्यपि प्रभुके अनेक नाम हैं और वेद कहते हैं वे सब एक-से-बढ़कर-एक हैं, फिर भी नाथ, रामनाम सब नामोंसे श्रेष्ठ हो, और यह पापरूपी पक्षियोंके लिए शिकारी-जैसा हो।
राका रजनी भगति तव राम नाम सोइ सोम।अपर नाम उडगन बिमल बसुहुँ भगत उर ब्योम॥४२(क)॥
आपकी भक्ति पूर्णिमाकी रात है, उसमें 'राम' नाम ही पूर्णचंद्र बनकर और बाकी सब नाम तारे बनकर भक्तोंके निर्मल हृदय-आकाशमें बसें।
एवमस्तु मुनि सन कहेउ कृपासिंधु रघुनाथ।तब नारद मन हरष अति प्रभु पद नायउ माथ॥४२(ख)॥
कृपासागर रघुनाथने मुनिसे 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहा। तब नारदने मनमें बहुत हर्षित होकर प्रभुके चरणोंमें सिर नवाया।
अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी। पुनि नारद बोले मृदु बानी॥राम जबहिं प्रेरेउ निज माया। मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया॥॥१॥
रघुनाथको बहुत प्रसन्न जानकर नारद फिर कोमल वाणीमें बोले - राम, सुनिए, जब आपने अपनी माया चलाकर मुझे मोहित किया था,
तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा। प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा॥सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा॥॥२॥
तब मैं विवाह करना चाहता था, प्रभु, आपने किस वजहसे मुझे रोका? राम ने कहा - मुनि, सुनो, मैं तुम्हें प्रसन्नतासे बताता हूँ - जो सारा भरोसा छोड़कर बस मुझे ही भजते हैं,
करउँ सदा तिन्ह के रखवारी। जिमि बालक राखइ महतारी॥गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई। तहँ राखइ जननी अरगाई॥॥३॥
मैं उनकी रक्षा वैसे ही सदा करता हूँ जैसे माँ बच्चेकी करती है - बच्चा दौड़कर आग या साँप पकड़ने जाए तो माँ उसे झट खींचकर बचा लेती है।
प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता। प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता॥मोरें प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी॥॥४॥
पर वही बेटा बड़ा हो जाए तो माँ प्यार तो करती है, पर पुरानी वैसी सतर्कता नहीं रहती। मेरे लिए ज्ञानी वैसा ही है जैसे बड़ा हो चुका बेटा, और निरभिमानी सेवक मेरे छोटे बच्चे जैसा है।
जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही॥यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं। पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं॥॥५॥
मेरे सेवकके पास सिर्फ मेरा बल होता है, ज्ञानीके पास अपना बल - पर काम-क्रोध तो दोनोंके शत्रु हैं। यह समझकर बुद्धिमान लोग मुझे ही भजते हैं, ज्ञान पाकर भी भक्ति नहीं छोड़ते।
काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह के धारि।तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि॥४३॥
काम, क्रोध, लोभ, मद - ये मोहकी प्रबल सेना हैं, इनमें मायारूपी स्त्री सबसे भयानक दुख देनेवाली है।
सुनि मुनि कह पुरान श्रुति संता। मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता॥जप तप नेम जलाश्रय झारी। होइ ग्रीषम सोषइ सब नारी॥॥१॥
मुनि, सुनो, पुराण-वेद-संत कहते हैं कि स्त्री मोहरूपी वनके लिए वसंत ऋतु है। जप-तप-नियमरूपी सारे जलाशयोंको वह गर्मीकी तरह सोख लेती है।
काम क्रोध मद मत्सर भेका। इन्हहि हरषप्रद बरषा एका॥दुर्बासना कुमुद समुदाई। तिन्ह कहँ सरद सदा सुखदाई॥॥२॥
काम, क्रोध, मद, ईर्ष्या - ये मेंढक हैं, इन्हें आनंद देनेवाली बरसात यही स्त्री है। बुरी वासनाएँ कुमुद हैं, उन्हें सदा सुख देनेवाली यह शरद ऋतु है।
धर्म सकल सरसीरुह बृंदा। होइ हिम तिन्हहि दहइ सुख मंदा॥पुनि ममता जवास बहुताई। पलुहइ नारि सिसिर रितु पाई॥॥३॥
सारे धर्म कमलोंके झुंड हैं, यह क्षणिक सुख देनेवाली स्त्री पाला बनकर उन्हें जला डालती है। फिर ममतारूपी जवासा इस शिशिर-ऋतु स्त्रीको पाकर हरा-भरा हो उठता है।
पाप उलूक निकर सुखकारी। नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी॥बुधि बल सील सत्य सब मीना। बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना॥॥४॥
पापरूपी उल्लुओंके लिए यह स्त्री सुखद घनी अँधेरी रात है। बुद्धि, बल, शील, सत्य - ये सब मछलियाँ हैं, और इन्हें फँसानेके लिए स्त्री बंसीके समान है, चतुर लोग यही कहते हैं।
अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि।ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि॥४४॥
जवान स्त्री अवगुणोंकी जड़, दुखदायी और सारे दुखोंकी खान है। इसीलिए मुनि, मैंने यह समझकर तुम्हें विवाहसे रोका था।
सुनि रघुपति के बचन सुहाए। मुनि तन पुलक नयन भरि आए॥कहहु कवन प्रभु के असि रीती। सेवक पर ममता अरु प्रीती॥॥१॥
रघुनाथके यह सुंदर वचन सुनकर मुनिका शरीर रोमांचित हो उठा, आँखें भर आईं - सोचने लगे, किस प्रभुकी ऐसी रीति है, सेवकपर इतना स्नेह-प्रेम!
जे न भजहिं अस प्रभु भ्रम त्यागी। ग्यान रंक नर मंद अभागी॥पुनि सादर बोले मुनि नारद। सुनहु राम बिग्यान बिसारद॥॥२॥
जो भ्रम छोड़कर ऐसे प्रभुको नहीं भजते, वे ज्ञानहीन, मूर्ख और अभागे हैं। फिर नारद आदरसे बोले - विज्ञानविशारद राम, सुनिए -
संतन्ह के लच्छन रघुबीरा। कहहु नाथ भव भंजन भीरा॥सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ। जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ॥॥३॥
रघुवीर, भवभयको मिटानेवाले नाथ, अब कृपा करके संतोंके लक्षण बताइए। राम ने कहा - मुनि, सुनो, मैं संतोंके गुण बताता हूँ, जिनकी वजहसे मैं उनके वश रहता हूँ।
षट बिकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा॥अमितबोध अनीह मितभोगी। सत्यसार कबि कोबिद जोगी॥॥४॥
वे छहों विकार जीत चुके, पापरहित, निष्काम, स्थिरचित्त, निस्संग, तन-मनसे पवित्र, सुखके धाम, असीम ज्ञानी, इच्छारहित, मिताहारी, सत्यनिष्ठ, कवि, विद्वान, योगी,
सावधान मानद मदहीना। धीर धर्म गति परम प्रबीना॥॥५॥
सावधान, दूसरोंको मान देनेवाले, निरभिमानी, धैर्यवान, धर्मके आचरणमें बड़े निपुण,
गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह।तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह॥४५॥
गुणोंके भंडार, संसारके दुखसे परे और हर संशयसे मुक्त होते हैं - मेरे चरणकमलोंको छोड़कर उन्हें न देह प्यारी लगती है न घर।
निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं। पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं॥सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती। सरल सुभाउ सबहिं सन प्रीती॥॥१॥
अपने गुण सुनकर सकुचाते हैं, दूसरोंके गुण सुनकर खुश होते हैं। समभाव और शांत रहते हैं, न्याय कभी नहीं छोड़ते, सरल स्वभावके होकर सबसे प्रेम रखते हैं।
जप तप ब्रत दम संजम नेमा। गुरु गोबिंद बिप्र पद प्रेमा॥श्रद्धा छमा मयत्री दाया। मुदिता मम पद प्रीति अमाया॥॥२॥
जप-तप-व्रत-संयम-नियममें रत रहते हैं, गुरु-गोविंद-ब्राह्मणोंके चरणोंमें प्रेम रखते हैं। उनमें श्रद्धा, क्षमा, मैत्री, दया, प्रसन्नता और मेरे चरणोंमें निष्कपट प्रेम होता है।
बिरति बिबेक बिनय बिग्याना। बोध जथारथ बेद पुराना॥दंभ मान मद करहिं न काऊ। भूलि न देहिं कुमारग पाऊ॥॥३॥
वैराग्य, विवेक, विनय, तत्त्वज्ञान और वेद-पुराणका सच्चा ज्ञान रखते हैं। कभी दिखावा, अभिमान या घमंड नहीं करते, भूलसे भी गलत राह पर पैर नहीं रखते।
गावहिं सुनहिं सदा मम लीला। हेतु रहित परहित रत सीला॥मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते। कहि न सकहिं सारद श्रुति तेते॥॥४॥
सदा मेरी लीलाएँ गाते-सुनते हैं, बिना किसी स्वार्थके दूसरोंका भला करते रहते हैं। मुनि, सुनो, संतोंके इतने गुण हैं कि सरस्वती और वेद भी उन्हें पूरा नहीं गिना सकते।
कहि सक न सारद सेष नारद सुनत पद पंकज गहे।अस दीनबंधु कृपाल अपने भगत गुन निज मुख कहे॥सिरु नाह बारहिं बार चरनन्हि ब्रह्मपुर नारद गए।ते धन्य तुलसीदास आस बिहाइ जे हरि रँग रँए॥
'शेष और सरस्वती भी नहीं बता सकते' - यह सुनते ही नारदने राम के चरण पकड़ लिए। दीनबंधु कृपालु प्रभुने इस तरह खुद अपने भक्तोंके गुण बताए। बार-बार सिर नवाकर नारद ब्रह्मलोक चले गए। तुलसीदास कहते हैं - वे लोग धन्य हैं जो सारी आशा छोड़कर बस हरिके रंगमें रँग गए हैं।
रावनारि जसु पावन गावहिं सुनहिं जे लोग।राम भगति दृढ़ पावहिं बिनु बिराग जप जोग॥४६(क)॥
जो लोग रावणके शत्रु राम का पवित्र यश गाएँगे और सुनेंगे, वे बिना वैराग्य-जप-योगके भी राम की दृढ़ भक्ति पा लेंगे।
दीप सिखा सम जुबति तन मन जनि होसि पतंग।भजहि राम तजि काम मद करहि सदा सतसंग॥४६(ख)॥
जवान स्त्रीका शरीर दीपककी लौ-जैसा है, मन, तू उसका पतंगा मत बन। काम-मद छोड़कर राम को भज और सदा सत्संग कर।
इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने तृतीय: सोपान: समाप्तः।
कलियुगके सम्पूर्ण पापोंको विध्वंस करनेवाले श्रीरामचरितमानसका यह तीसरा सोपान (अरण्यकाण्ड) समाप्त हुआ।
सखा सोच त्यागहु बल मोरें। सब बिधि घटब काज में तोरें॥
सखा, धीरज रखो, मेरे बलपर तुम्हारा काम हर तरहसे बन जाएगा।
