प्रथम सोपान
बालकाण्ड
शिव-पार्वती संवाद, श्रीराम जन्म, बाल-लीला एवं श्रीसीता स्वयंवर की कथा।
बालकाण्ड — सुनें
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शिव-पार्वती संवाद, श्रीराम जन्म, बाल-लीला एवं श्रीसीता स्वयंवर की कथा।
यह कथा शीघ्र ही यहाँ सुनने हेतु भी उपलब्ध होगी
वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥१॥
अक्षर, शब्दों के अर्थ, काव्य-रस, छंद और समस्त शुभ कार्यों की सिद्धि करने वाले माँ सरस्वती और श्रीगणेशजी को मैं आरम्भ में ही प्रणाम करता हूँ।
भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाःस्वान्तःस्थमीश्वरम्॥२॥
पार्वतीजी और शिवजी को नमन करता हूँ, जो क्रमशः श्रद्धा और विश्वास के साकार रूप हैं — इनके सहारे के बिना बड़े-बड़े सिद्ध पुरुष भी अपने भीतर बसे परमेश्वर को नहीं पहचान पाते।
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम्।यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥३॥
मैं अपने सद्गुरु को नमन करता हूँ, जो साक्षात ज्ञानस्वरूप, शाश्वत और शिवजी के समान पूजनीय हैं — जिनकी शरण पाकर टेढ़ा चन्द्रमा भी संसार भर में पूजा जाता है।
सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ।वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कबीश्वरकपीश्वरौ॥४॥
श्रीराम-सीता के गुणों के पावन वन में सदा विचरण करने वाले, निर्मल ज्ञानसम्पन्न कविश्रेष्ठ वाल्मीकिजी तथा वानरशिरोमणि हनुमानजी को मैं वन्दन करता हूँ।
उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्।सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्॥५॥
सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार करने वाली, समस्त कष्टों को दूर करने वाली और हर प्रकार का कल्याण करने वाली श्रीराम की प्रियतमा सीताजी के आगे मैं नतमस्तक होता हूँ।
यन्मायावशवर्तिं विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरायत्सत्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः।यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतांवन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्॥६॥
जिनकी माया के अधीन ब्रह्मा आदि देवता, असुर और सम्पूर्ण चराचर जगत् है, जिनके अस्तित्व से ही यह दृश्य-जगत् वैसे ही सत्य प्रतीत होता है जैसे अंधेरे में रस्सी सांप-सी दिखे, और भवसागर पार करने की इच्छा वालों के लिए जिनके चरण ही एकमात्र नौका हैं — उन सर्वकारण-स्वरूप राम नामधारी भगवान् हरि को मैं वन्दन करता हूँ।
नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा-भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति॥७॥
अनेक पुराणों, वेदों (निगम), और शास्त्रों (आगम/तंत्र) से सम्मत (स्वीकृत), जो रामायण (वाल्मीकि रामायण या शिवजी द्वारा रचित रामकथा) में वर्णित है और कुछ अन्य ग्रंथों से भी उपलब्ध श्री रघुनाथजी (राम) की पावन कथा को तुलसीदास अपने अंतःकरण के सुख (आत्म-शांति) के लिए अत्यन्त मनोहर और सुंदर भाषा में विस्तृत (रचना) कर रहे हैं।
जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन।करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि रासि सुभ गुन सदन॥२॥
जिनका स्मरण करते ही हर कार्य सफल हो जाता है, जो गणों के अधिपति हैं और गजमुख धारण करते हैं — बुद्धि के भण्डार और शुभ गुणों के धाम वे श्रीगणेशजी मुझ पर कृपा करें।
मूक होइ बाचाल पंगु चढइ गिरिबर गहन।जासु कृपाँ सो दयाल द्रवउ सकल कलि मल दहन॥॥२॥
जिनकी कृपा से गूँगा भी सुंदर वाणी बोलने लगे और लंगड़ा दुर्गम पर्वत पार कर ले — कलियुग के समस्त पापों को भस्म करने वाले वे दयालु प्रभु द्रवित हों।
नील सरोरुह स्याम तरुन अरुन बारिज नयन।करउ सो मम उर धाम सदा छीरसागर सयन॥३॥
नीलकमल-सा श्याम वर्ण और खिले लाल कमल जैसे नेत्रों वाले, सदा क्षीरसागर में शयन करने वाले भगवान् मेरे हृदय में सदा निवास करें।
कुंद इंदु सम देह उमा रमन करुना अयन।जाहि दीन पर नेह करउ कृपा मर्दन मयन॥४॥
कुंद के फूल और चन्द्रमा-सी गौर देह वाले, पार्वतीजी के प्रियतम और करुणा के आगार शिवजी — जो दीनों पर विशेष स्नेह रखते हैं — कामदेव के मर्दन करने वाले वे मुझ पर कृपा करें।
बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥५॥
गुरु के चरण-कमलों की मैं वन्दना करता हूँ, जो कृपा के सागर और मनुष्यरूप में साक्षात् हरि हैं — जिनका एक वचन महामोह रूपी सघन अंधकार को सूर्यकिरणों की भाँति दूर कर देता है।
बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥॥१॥
मैं गुरुजी के चरण-कमलों की रज को नमन करता हूँ, जिसमें उत्तम सुगंध और गहरा अनुराग भरा है — जो अमृतमयी जड़ी के चूर्ण-सी है और भव-रोग के समस्त परिवार का शमन करती है।
सुकृति संभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती॥जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किए तिलक गुन गन बस करनी॥॥२॥
वह रज शिवजी के शरीर की निर्मल विभूति के समान पुण्यदायी है, सुंदर मंगल और आनंद को जन्म देने वाली है — भक्तों के मन-दर्पण का मैल हरने वाली यह रज मानो गुणों का तिलक बनकर मन को वश में कर लेती है।
श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य द्रृष्टि हियँ होती॥दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू॥॥३॥
श्रीगुरु के चरण-नखों की कान्ति मणियों के तेज-सी है, जिसका स्मरण करते ही हृदय में दिव्य दृष्टि जाग उठती है — यह प्रकाश मोहरूपी अंधकार का नाश करता है, और जिसके हृदय में यह उतर आए, वह परम भाग्यशाली है।
उघरहिं बिमल बिलोचन ही के। मिटहिं दोष दुख भव रजनी के॥सूझहिं राम चरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक॥॥४॥
इसी दिव्य दृष्टि से निर्मल नेत्र खुल जाते हैं और संसाररूपी रात्रि के दोष-दुख मिट जाते हैं — तब राम-चरित्र के मणि-माणिक्य, चाहे प्रकट हों या छिपे, हर जगह दिखाई देने लगते हैं।
जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान।कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान॥१॥
जैसे सिद्ध साधक विशेष अंजन आँखों में लगाकर पर्वत और वन में गड़े अनगिनत धरती के खजाने कौतुक भर में देख लेते हैं, वैसे ही यह गुरु-कृपारूपी अंजन दृष्टि को दिव्य बना देता है।
गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन। नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन॥तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन। बरनउँ राम चरित भव मोचन॥॥१॥
गुरु-चरणों की रज ही वह कोमल-सुंदर अंजन है जो नेत्रों के अमृत-दोष हर लेता है — इसी से निर्मल विवेक-रूपी नेत्र पाकर मैं संसार-बंधन काटने वाले श्रीराम-चरित्र का वर्णन करता हूँ।
बंदउँ प्रथम महीसुर चरना। मोह जनित संसय सब हरना॥सुजन समाज सकल गुन खानी। करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी॥॥२॥
सबसे पहले मैं ब्राह्मणों के चरणों की वन्दना करता हूँ, जो मोहजनित सभी संशयों को हर लेते हैं — फिर सज्जनों के समाज को, जो समस्त गुणों की खान है, प्रेमपूर्वक प्रणाम करता हूँ।
साधु चरित सुभ चरित कपासू। निरस बिसद गुनमय फल जासू॥जो सहि दुख परछिद्र दुरावा। बंदनीय जेहिं जग जस पावा॥॥३॥
साधुओं का चरित्र शुभ कपास के समान है — देखने में नीरस और स्वच्छ, पर उसका फल गुणों से भरा होता है; जो दूसरों के दोष छिपाकर स्वयं दुख सहता है, वही संसार में यश और वन्दना पाता है।
मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू॥राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा॥॥४॥
संत-समाज आनंद और मंगल से भरा है, मानो पृथ्वी पर चलता-फिरता तीर्थराज ही हो — जहाँ राम-भक्ति गंगा की धारा-सी बहती है और ब्रह्मविचार का प्रचार होता रहता है।
बिधि निषेधमय कलि मल हरनी। करम कथा रबिनंदनि बरनी॥हरि हर कथा बिराजति बेनी। सुनत सकल मुद मंगल देनी॥॥५॥
यह समाज विधि-निषेध के ज्ञान से कलियुग के पाप हरता है और सूर्यपुत्र यमराज की कथा (धर्म-कथा) कहता है — हरि और हर, दोनों की कथाएँ यहाँ त्रिवेणी-सी विराजती हैं, जिन्हें सुनते ही सब मंगल-आनंद मिलता है।
बटु बिस्वास अचल निज धरमा। तीरथराज समाज सुकरमा॥सबहिं सुलभ सब दिन सब देसा। सेवत सादर समन कलेसा॥॥६॥
यह समाज अपने धर्म पर अटल विश्वास रखने वाला और तीर्थराज प्रयाग-सा शुभ कर्मों वाला है — हर दिन, हर देश में, सबके लिए सुलभ है, और श्रद्धापूर्वक सेवा करने पर सारे क्लेश मिटा देता है।
अकथ अलौकिक तीरथराऊ। देइ सद्य फल प्रगट प्रभाऊ॥॥७॥
तीर्थराज प्रयाग की महिमा अकथनीय और अलौकिक है — यह देह धारण करते ही तत्काल फल देने वाला अपना प्रभाव प्रत्यक्ष दिखा देता है।
सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग।लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग॥२॥
इसे सुनकर-समझकर लोग प्रसन्न मन से अत्यंत प्रेमपूर्वक स्नान करते हैं — इस देह के रहते ही वे साधु-समाजरूपी प्रयाग में चारों फल (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) पा लेते हैं।
मज्जन फल पेखिअ ततकाला। काक होहिं पिक बकउ मराला॥सुनि आचरज करे जनि कोई। सतसंगति महिमा नहिं गोई॥॥१॥
सत्संग में स्नान का फल तत्काल दिखता है — कौआ भी कोयल जैसा और बगुला भी हंस जैसा बन जाता है; यह सुनकर कोई आश्चर्य न करे, क्योंकि सत्संग की महिमा किसी से छिपी नहीं है।
बालमीक नारद घटजोनी। निज निज मुखनि कही निज होनी॥जलचर थलचर नभचर नाना। जे जड़ चेतन जीव जहाना॥॥२॥
वाल्मीकिजी, नारदजी और अगस्त्यजी (घटयोनि) — सभी ने अपने-अपने मुख से अपनी कथा कही है; जल में, थल में, आकाश में रहने वाले तथा जड़-चेतन, सभी प्रकार के जीव इसके साक्षी हैं।
मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई॥सो जानब सतसंग प्रभाऊ। लोकहुँ बेद न आन उपाऊ॥॥३॥
बुद्धि, कीर्ति, गति, ऐश्वर्य और भलाई — जिसने जब, जिस यत्न से, जहाँ भी पाई — जान लो कि वह सब सत्संग का ही प्रभाव है; लोक हो या वेद, इसके सिवा कोई दूसरा उपाय नहीं है।
बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥सतसंगत मुद मंगल मूला। सोई फल सिधि सब साधन फूला॥॥४॥
सत्संग के बिना विवेक नहीं जागता और राम-कृपा के बिना वह सत्संग भी सहज नहीं मिलता — सत्संग ही आनंद-मंगल का मूल है, वही सिद्धि रूपी फल और साधन का फूल है।
सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई॥बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं। फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं॥॥५॥
मूर्ख भी सत्संग पाकर सुधर जाते हैं, जैसे पारस के स्पर्श से खोटी धातु सोना बन जाती है — पर विधि के वश दुर्भाग्य से यदि सज्जन कुसंगत में पड़ जाएँ, तो भी वे मणि धारण किए साँप की तरह अपने ही गुण का अनुसरण करते हैं।
बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी। कहत साधु महिमा सकुचानी॥सो मो सन कहि जात न कैसें। साक बनिक मनि गुन गन जैसें॥॥६॥
ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा बड़े-बड़े कवि और विद्वानों की वाणी भी संतों की महिमा वर्णन करते हुए सकुचा जाती है। फिर मुझसे यह किस तरह कहा जा सकेगा — ठीक वैसे ही जैसे कोई साग बेचने वाला रत्नों के गुण परखने बैठ जाए।
बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ।अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ॥३(क)॥
मैं ऐसे संतों को प्रणाम करता हूँ जिनका मन सबके प्रति समान रहता है, जिनके लिए न कोई हितैषी है, न कोई शत्रु — जैसे अंजलि में रखे शुभ फूल अपनी सुगंध से दोनों हाथों को समान रूप से महका देते हैं, वैसे ही उनका स्नेह सब पर एक-सा बरसता है।
संत सरल चित जगत हित जानि सुभाउ सनेहु।बालबिनय सुनि करि कृपा राम चरन रति देहु॥३(ख)॥
हे सरल हृदय, संसार का हित चाहने वाले, स्वभाव से ही स्नेही संतो! मेरी बालक-जैसी विनती सुनकर कृपा कीजिए और मुझे श्रीराम के चरणों में प्रेम प्रदान कीजिए।
बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ॥पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें। उजरें हरष बिषाद बसेरें॥॥१॥
अब मैं सद्भाव से दुष्टों की भी वंदना करता हूँ, जो बिना किसी कारण के ही किसी का भला या बुरा करने पर उतर आते हैं। जिनके लिए दूसरे की हानि में लाभ और लाभ में हानि दिखे, जो दूसरों की बर्बादी देखकर हर्षित होते हैं और उनकी भलाई देखकर दुखी होते हैं।
हरि हर जस राकेस राहु से। पर अकाज भट सहसबाहु से॥जे पर दोष लखहिं सहसाखी। पर हित घृत जिन्ह के मन माखी॥॥२॥
जो विष्णु और शिव की कीर्ति को राहु के समान ग्रस लेने वाले हैं, जो दूसरों को हानि पहुँचाने में सहस्रबाहु जैसे वीर बन जाते हैं। जो दूसरों के दोष हजार आँखों से देखते हैं, पर दूसरों की भलाई रूपी घी में मक्खी की तरह गिर पड़ते हैं।
तेज कृसानु रोष महिषेसा। अघ अवगुन धन धनी धनेसा॥उदय केतु सम हित सबही के। कुंभकरन सम सोवत नीके॥॥३॥
जो तेज में अग्नि के समान और क्रोध में यम के समान हैं, जिनके पास पाप और दुर्गुण ही धन हैं और वे उन्हीं के धनी-कुबेर हैं। जो केतु ग्रह के उदय के समान सबका अहित करने वाले हैं, और कुम्भकर्ण की तरह परोपकार के समय गहरी नींद में सोए रहना ही उनके लिए अच्छा है।
पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं। जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं॥बंदउँ खल जस सेष सरोषा। सहस बदन बरनइ पर दोषा॥॥४॥
जो दूसरों को हानि पहुँचाने के लिए अपने प्राण तक त्याग देते हैं, जैसे ओले खेती को नष्ट करके स्वयं भी गल जाते हैं। मैं ऐसे दुष्टों की भी वंदना करता हूँ जो क्रोधित शेषनाग के समान अपने सहस्र मुखों से दूसरों के दोष ही बखानते रहते हैं।
पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना। पर अघ सुनइ सहस दस काना॥बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेही। संतत सुरानीक हित जेही॥॥५॥
फिर मैं राजा पृथु के समान दुष्टों को भी प्रणाम करता हूँ, जो दूसरों के पाप-दोष सुनने के लिए मानो दस हजार कान लगाए रहते हैं। फिर मैं इंद्र के समान उनकी भी विनती करता हूँ, जो सदैव देवताओं की सेना के हित का बहाना बनाए रहते हैं।
बचन बज्र जेहि सदा पिआरा। सहस नयन पर दोष निहारा॥॥६॥
जिन्हें वज्र के समान कठोर वचन ही सदा प्रिय लगते हैं, और जो इन्द्र के सहस्र नेत्रों की भांति सदैव दूसरों के दोष ही देखते रहते हैं।
उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति।जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करइ सप्रीति॥४॥
उदासीन, शत्रु अथवा मित्र — किसी का भी भला सुनकर दुष्टों का स्वभाव जल उठता है, ऐसा जानकर भी यह सेवक दोनों हाथ जोड़कर प्रेमपूर्वक उनसे विनती करता है कि वे प्रसन्न रहें।
मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा। तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा॥बायस पलिअहिं अति अनुरागा। होहिं निरामिष कबहुँ कि कागा॥॥१॥
मैंने अपनी ओर से तो प्रेम-निवेदन कर दिया है, पर दुष्ट लोग अपनी ओर से कभी भोलेपन का भाव नहीं लाते। कौवों को कितने ही प्रेम से क्यों न पाला जाए, वे कभी मांस छोड़कर शुद्ध शाकाहारी नहीं बन पाते।
बंदउँ संत असज्जन चरना। दुखप्रद उभय बीच कछु बरना॥बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दुख दारुन देहीं॥॥२॥
अब मैं संत और असंत दोनों के चरणों की वंदना करता हूँ और दोनों में एक ऐसा अंतर बताता हूँ जो दुखदायी भी है और सुखद भी। एक बिछड़ते ही प्राण हर लेते हैं, तो दूसरे मिलते ही भयंकर दुख देते हैं।
उपजहिं एक संग जग माहीं। जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं॥सुधा सुरा सम साधु असाधू। जनक एक जग जलधि अगाधू॥॥३॥
संत और असंत इस संसार में साथ-साथ जन्म लेते हैं, जैसे कमल और जोंक एक ही जल में पैदा होकर भी अपने गुण-स्वभाव में सर्वथा भिन्न होते हैं। साधु और असाधु अमृत और मदिरा के समान हैं, यद्यपि इन दोनों का उद्गम स्थान एक ही अथाह समुद्र है।
भल अनभल निज निज करतूती। लहत सुजस अपलोक बिभूती॥॥४॥
भला और बुरा व्यक्ति अपने-अपने कर्मों के अनुसार ही क्रमशः सुयश और अपयश रूपी फल पाते हैं।
सुधा सुधाकर सुरसरि साधु। गरल अनल कलिमल सरि ब्याधु॥गुन अवगुन जानत सब कोई। जो जेहि भाव नीक तेहि सोई॥
अमृत, चन्द्रमा और गंगा सत्पुरुषों के समान हैं, तो विष, अग्नि और कलियुग की मैली नदी दुष्टों के समान — यह गुण-दोष सभी जानते हैं, पर जिसे जो प्रिय लगे, वह उसे ही अच्छा मानता है।
भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु।सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु॥॥५॥
भलाई से भला और नीचता से नीच अपना-अपना फल पाता है — अमृत की प्रशंसा अमरता के लिए होती है, तो विष की प्रशंसा उसकी घातक शक्ति के कारण मृत्यु के संदर्भ में होती है।
खल अघ अगुन साधु गुन गाहा। उभय अपार उदधि अवगाहा॥तेहि तें कछु गुन दोष बखाने। संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने॥॥१॥
दुष्टों के पाप-अवगुण और साधुओं की गुण-गाथाएँ, दोनों ही अपार समुद्र के समान अथाह हैं। इसीलिए यहाँ केवल कुछ ही गुण-दोषों का वर्णन किया गया है — क्योंकि बिना पहचाने किसी वस्तु को न तो ग्रहण करना उचित है, न त्यागना।
भलेउ पोच सब बिधि उपजाए। गनि गुन दोष बेद बिलगाए॥कहहिं बेद इतिहास पुराना। बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना॥॥२॥
भले और बुरे दोनों प्रकार के प्राणी विधाता ने उत्पन्न किए, पर वेदों ने उनके गुण-दोषों को गिनकर अलग-अलग बताया। वेद, इतिहास और पुराण सभी यही कहते हैं कि यह सृष्टि गुण और अवगुण दोनों से गुँथी हुई है।
कहहिं बेद इतिहास पुराना। बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना॥दुख सुख पाप पुन्य दिन राती। साधु असाधु सुजाति कुजाती॥॥३॥
वेद, इतिहास और पुराण सभी कहते हैं कि विधाता की यह सृष्टि गुण और दोष दोनों से मिश्रित है — सुख-दुख, पाप-पुण्य, दिन-रात, साधु-असाधु, सुजाति-कुजाति जैसे परस्पर विरोधी तत्व इसी मिश्रित सृष्टि के अंग हैं।
दानव देव ऊँच अरु नीचू। अमिअ सुजीवनु माहुरु मीचू॥माया ब्रह्म जीव जगदीसा। लच्छि अलच्छि रंक अवनीसा॥॥४॥
दानव-देव, ऊँच-नीच, जीवनदायी अमृत और मृत्युदायी विष, माया और ब्रह्म, जीव और जगदीश्वर, लक्ष्मी और दरिद्रता, रंक और राजा — ये सभी परस्पर विरोधी तत्व एक साथ इस सृष्टि में विद्यमान हैं।
कासी मग सुरसरि क्रमनासा। मरु मारव महिदेव गवासा॥सरग नरक अनुराग बिरागा। निगमागम गुन दोष बिभागा॥॥५॥
काशी और साधारण मार्ग, गंगा और कर्मनाशा नदी, मरुस्थल और उपजाऊ भूमि, ब्राह्मण और साधारण जन, स्वर्ग और नरक, अनुराग और वैराग्य — वेद-शास्त्र इन सभी द्वंद्वों में गुण-दोष का भेद बताते हैं।
जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार॥॥६॥
सृष्टिकर्ता ने यह सम्पूर्ण जड़-चेतन जगत् गुण और दोष दोनों से युक्त बनाया है — जैसे हंस दूध और पानी को अलग कर केवल दूध ग्रहण करता है, वैसे ही संत जन जगत् में से केवल गुण को ग्रहण करते हैं और विकाररूपी जल को त्याग देते हैं।
अस बिबेक जब देइ बिधाता। तब तजि दोष गुनहिं मनु राता॥काल सुभाउ करम बरिआई। भलेउ प्रकृति बस चुकइ भलाई॥॥१॥
जब विधाता ऐसा विवेक प्रदान करते हैं, तब मन दोषों को छोड़कर गुणों में ही रमने लगता है। परंतु समय, स्वभाव और कर्मों के प्रबल प्रभाव से कभी-कभी भला व्यक्ति भी अपनी प्रकृति के वशीभूत होकर भलाई से चूक जाता है।
सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं। दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं॥खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू। मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू॥॥२॥
उस भूल को भी भगवान के भक्त जन इस प्रकार सुधार लेते हैं कि दुख-दोष को मिटाकर निर्मल यश प्रदान कर देते हैं। सत्संग पाकर दुष्ट भी कभी भला कर बैठते हैं, फिर भी उनका मूल मलिन स्वभाव पूरी तरह नहीं मिटता।
लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ॥उधरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू॥॥३॥
संसार में जो छली-कपटी लोग भी साधु जैसा सुंदर वेष धारण कर लेते हैं, वे भी उस वेष के प्रताप से कुछ समय के लिए पूजे जाने लगते हैं। किंतु अंत में उनका असली रूप खुल ही जाता है और उनका निर्वाह नहीं हो पाता — जैसे कालनेमि, रावण और राहु का हुआ।
किएहुँ कुबेष साधु सनमानू। जिमि जग जामवंत हनुमानू॥हानि कुसंग सुसंगति लाहू। लोकहुँ बेद बिदित सब काहू॥॥४॥
इसके विपरीत, कुरूप वेष धारण किए होने पर भी साधु पुरुष सम्मान पाते ही हैं, जैसे संसार में जाम्बवान और हनुमान का हुआ। बुरी संगति से हानि और अच्छी संगति से लाभ होता है — यह बात लोक और वेद दोनों में सर्वविदित है।
गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा। कीचहिं मिलइ नीच जल संगा॥साधु असाधु सदन सुक सारीं। सुमिरहिं राम देहिं गनि गारी॥॥५॥
धूल भी पवन के संग से आकाश में उड़ जाती है, और वही जल नीचे बहकर कीचड़ में मिल जाता है। साधु और असाधु के घर में पले तोता-मैना भी अपनी-अपनी संगति के अनुसार ही होते हैं — एक राम का नाम स्मरण करता है तो दूसरा गिन-गिनकर गालियाँ देता है।
धूम कुसंगति कारिख होई। लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई॥सोइ जल अनल अनिल संघाता। होइ जलद जग जीवन दाता॥॥६॥
धुआँ बुरी संगति में जाकर कालिख बन जाता है, वही कालिख फिर स्याही बनकर पुराणों जैसे सुंदर ग्रंथ लिखने के काम आती है। वही जल जब अग्नि और वायु के संग से मिलता है, तो बादल बनकर संसार को जीवनदायी वर्षा देता है।
ग्रह भेषज जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग।होहिं कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग॥७(क)॥
ग्रह, औषधि, जल, वायु और वस्त्र भी अच्छे या बुरे संयोग को पाकर अच्छी या बुरी वस्तु बन जाते हैं — इस भेद को संसार में केवल सुलक्षण, विवेकी लोग ही पहचान पाते हैं।
सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह।ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह॥७(ख)॥
प्रकाश और अंधकार तो दोनों पक्षों में समान रूप से रहते हैं, पर विधाता ने उनके नाम अलग-अलग रख दिए। चन्द्रमा को शोषक और पोषक समझकर ही संसार ने उसे यश और अपयश दोनों दिए।
जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि॥७(ग)॥
जड़ और चेतन, इस संसार के जितने भी जीव हैं, उन सबको श्रीराममय जानकर मैं सदैव दोनों हाथ जोड़कर सबके चरण-कमलों की वंदना करता हूँ।
देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गंधर्ब।बंदउँ किंनर रजनिचर कृपा करहु अब सर्ब॥७(घ)॥
देवता, दानव, मनुष्य, नाग, पक्षी, प्रेत, पितर, गंधर्व और किन्नर तथा राक्षस — इन सबकी मैं वंदना करता हूँ। अब आप सब मुझ पर कृपा कीजिए।
आकर चारि लाख चौरासी। जाति जीव जल थल नभ बासी॥सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥॥१॥
चौरासी लाख योनियों में जल, थल और आकाश में रहने वाले समस्त जीवों को सीता-राममय जानकर, मैं दोनों हाथ जोड़कर सबको प्रणाम करता हूँ।
जानि कृपाकर किंकर मोहू। सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू॥निज बुधि बल भरोस मोहि नाहीं। तातें बिनय करउँ सब पाही॥॥२॥
मुझे अपना दास जानकर आप सब कृपापूर्वक छल त्यागकर स्नेह कीजिए। मुझे अपनी बुद्धि और बल का कोई भरोसा नहीं है, इसीलिए मैं सबसे विनती करता हूँ।
करन चहउँ रघुपति गुन गाहा। लघु मति मोरि चरित अवगाहा॥सूझ न एकउ अंग उपाऊ। मन मति रंक मनोरथ राऊ॥॥३॥
मैं श्रीरघुनाथजी के गुणों की गाथा कहना चाहता हूँ, पर मेरी बुद्धि तुच्छ है और उनका चरित्र अथाह है। मुझे इसका एक भी उपाय नहीं सूझता — मेरी बुद्धि तो दरिद्र के समान है, पर मनोरथ राजा के समान बड़ा है।
मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी। चहिअ अमिअ जग जुरइ न छाछी॥छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई। सुनिहहिं बालबचन मन लाई॥॥४॥
मेरी बुद्धि अत्यंत तुच्छ है, पर इच्छा बहुत ऊँची है — चाहता तो अमृत हूँ, पर संसार में मुझे छाछ भी दुर्लभ है। फिर भी सज्जन लोग मेरी इस धृष्टता को क्षमा कर देंगे और मन लगाकर मेरे बालक-जैसे वचन सुनेंगे।
जौं बालक कह तोतरि बाता। सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता॥हँसिहहि कूर कुटिल कुबिचारी। जे पर दूषन भूषनधारी॥॥५॥
जैसे कोई बालक तुतलाकर बोलता है, तो माता-पिता उसे प्रसन्न मन से सुनते हैं। किन्तु क्रूर, कुटिल और दुर्बुद्धि लोग, जिन्हें दूसरों की निंदा करना ही आभूषण जैसा प्रिय लगता है, वे उस पर हँसेंगे।
निज कवित केहि लाग न नीका। सरस होउ अथवा अति फीका॥जे पर भनिति सुनत हरषाही। ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं॥॥६॥
अपनी रचना किसे अच्छी नहीं लगती, चाहे वह रसीली हो या नीरस। पर जो दूसरों की रचना सुनकर भी प्रसन्न हो उठें, ऐसे श्रेष्ठ पुरुष संसार में बहुत कम होते हैं।
जग बहु नर सर सरि सम भाई। जे निज बाढ़ि बढ़हिं जल पाई॥सज्जन सकृत सिंधु सम कोई। देखि पूर बिधु बाढ़इ जोई॥॥७॥
संसार में अधिकांश लोग तालाब या नदी के समान हैं, जो जल पाकर स्वयं ही बढ़ जाते हैं। पर सज्जन कोई-कोई ही समुद्र के समान होते हैं, जो चंद्रमा को पूर्ण देखकर दूसरे के उत्कर्ष से स्वयं उमड़ आते हैं।
भाग छोट अभिलाषु बड़ करउँ एक बिस्वास।पैहहिं सुख सुनि सुजन सब खल करिहहिं उपहास॥८॥
मेरा भाग्य छोटा है, पर अभिलाषा बड़ी है — फिर भी मैं एक विश्वास लेकर यह कर रहा हूँ। सज्जन लोग इसे सुनकर सुख पाएँगे, जबकि सभी दुष्ट लोग इसका उपहास ही करेंगे।
खल परिहास होइ हित मोरा। काक कहहिं कलकंठ कठोरा॥हंसहि बक दादुर चातकही। हँसहिं मलिन खल बिमल बतकही॥॥१॥
दुष्टों का उपहास भी मेरे लिए हितकारी ही होगा — जैसे कौआ कोयल को कठोर स्वर वाली कहता है। बगुला हंस पर हँसता है, और मेंढक चातक पर — इसी तरह मलिन लोग निर्मल बात करने वालों पर हँसते हैं।
कबित रसिक न राम पद नेहू। तिन्ह कहँ सुखद हास रस एहू॥भाषा भनिति भोरि मति मोरी। हँसिबे जोग हँसें नहिं खोरी॥॥२॥
जिन्हें न तो काव्य में रस आता है और न श्रीराम के चरणों में प्रेम, उनके लिए यह हास्य-रस ही सुखद होगा। मेरी भाषा-रचना भोली और मति अल्प है, यह हँसने योग्य ही है, इसमें हँसने वालों का कोई दोष नहीं।
प्रभु पद प्रीति न सामुझि नीकी। तिन्हहि कथा सुनि लागहि फीकी॥हरि हर पद रति मति न कुतरकी। तिन्ह कहुँ मधुर कथा रघुबर की॥॥३॥
जिन्हें प्रभु के चरणों की प्रीति ठीक से समझ में नहीं आई, उन्हें यह कथा सुनकर फीकी लगेगी। पर जिनकी बुद्धि कुतर्की नहीं है और जिनकी रति विष्णु-शिव के चरणों में है, उनके लिए श्रीरघुनाथजी की यह कथा मधुर होगी।
राम भगति भूषित जियँ जानी। सुनिहहिं सुजन सराहि सुबानी॥कबि न होऊँ नहिं बचन प्रबीनू। सकल कला सब बिद्या हीनू॥॥४॥
जिनका मन श्रीराम-भक्ति से अलंकृत जान पड़ेगा, ऐसे सज्जन इसे सुनकर सुंदर वाणी की सराहना करेंगे। मैं न तो कवि हूँ, न वचनों में प्रवीण — समस्त कलाओं और विद्याओं से रहित हूँ।
आखर अरथ अलंकृति नाना। छंद प्रबंध अनेक बिधाना॥भाव भेद रस भेद अपारा। कबित दोष गुन बिबिध प्रकारा॥॥५॥
अक्षर, अर्थ, नाना प्रकार के अलंकार, अनेक प्रकार के छंद और रचना-शैलियाँ, भाव और रस के अनगिनत भेद, तथा काव्य के विविध प्रकार के दोष-गुण — इन सबका मुझे कुछ ज्ञान नहीं।
कबित बिबेक एक नहिं मोरें। सत्य कहउँ लिखि कागद कोरे॥॥६॥
मुझमें काव्य का कोई विवेक नहीं है, यह मैं सत्य कहता हूँ — मानो कोरे कागज पर ही लिख रहा हूँ, इसे बिना किसी संकोच के स्वीकार करता हूँ।
भनिति मोरि सब गुन रहित बिस्व बिदित गुन एक।सो बिचारि सुनिहहिं सुमति जिन्ह कें बिमल बिबेक॥९॥
मेरी रचना सभी गुणों से रहित है, पर उसमें एक ऐसा गुण है जो संसार भर में प्रसिद्ध है — राम-नाम। इसी बात को समझकर, जिनकी बुद्धि निर्मल और विवेकपूर्ण है, वे सुधीजन इसे सुनेंगे।
एहि महँ रघुपति नाम उदारा। अति पावन पुरान श्रुति सारा॥मंगल भवन अमंगल हारी। उमा सहित जेहि जपत पुरारी॥॥१॥
इस रचना में श्रीरघुनाथजी का उदार नाम है, जो अत्यंत पवित्र है और पुराणों तथा वेदों का सार है। यह नाम मंगल का घर और अमंगल को हरने वाला है, जिसे उमा सहित शिवजी स्वयं जपते हैं।
भनिति बिचित्र सुकबि कृत जोऊ। राम नाम बिनु सोह न सोऊ॥बिधुबदनी सब भाँति सँवारी। सोह न बसन बिना बर नारी॥॥२॥
किसी अच्छे कवि की कितनी ही अद्भुत रचना क्यों न हो, राम-नाम के बिना वह शोभा नहीं पाती — जैसे चंद्रमुखी सुंदरी कितनी भी सजी-संवरी हो, वस्त्र के बिना उसकी शोभा अधूरी रहती है।
सब गुन रहित कुकबि कृत बानी। राम नाम जस अंकित जानी॥सादर कहहिं सुनहिं बुध ताही। मधुकर सरिस संत गुनग्राही॥॥३॥
किसी साधारण कवि की सर्वगुण-रहित रचना में भी यदि राम-नाम का यश अंकित हो, तो विद्वान लोग उसे आदरपूर्वक कहते-सुनते हैं, ठीक वैसे ही जैसे भ्रमर केवल रस ग्रहण करता है — संत भी सदा गुणों को ही ग्रहण करते हैं।
जदपि कबित रस एकउ नाही। राम प्रताप प्रगट एहि माहीं॥सोइ भरोस मोरें मन आवा। केहिं न सुसंग बडप्पनु पावा॥॥४॥
यद्यपि इस काव्य में एक भी काव्य-रस नहीं है, फिर भी इसमें श्रीराम का प्रताप स्पष्ट प्रकट है। मेरे मन में यही भरोसा है — भला अच्छे संग से किसे बड़प्पन नहीं मिला?
धूमउ तजइ सहज करुआई। अगरु प्रसंग सुगंध बसाई।भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी। राम कथा जग मंगल करनी॥॥५॥
धुआँ भी अगर की लकड़ी के संग से अपना कड़वापन छोड़कर सुगंध धारण कर लेता है। इसी तरह मेरी साधारण रचना भी उत्तम वस्तु का वर्णन करने से सुंदर बन गई है — क्योंकि राम कथा संसार का कल्याण करने वाली है।
मंगल करनि कलि मल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की।गति कूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की॥प्रभु सुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन भावनी।भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी॥
श्रीरघुनाथजी की यह कथा मंगल करने वाली और कलियुग के पापों को हरने वाली है, ऐसा तुलसीदास कहते हैं। साधारण कवि की रचना की गति भी पवित्र नदी की धारा जैसी हो जाती है। प्रभु के सुंदर यश के संग से भद्दी रचना भी सज्जनों के मन को भाने लगती है — जैसे श्मशान की राख भी शिवजी के अंग पर सुशोभित और पवित्र हो जाती है, उसका स्मरण भी सुहावना और पावन होता है।
प्रिय लागिहि अति सबहि मम भनिति राम जस संग।दारु बिचारु कि करि कोउ बंदिअ मलय प्रसंग॥१०(क)॥
राम-यश के संग से मेरी यह रचना सबको अत्यंत प्रिय लगेगी। भला मलयगिरि चंदन के संग से कौन साधारण लकड़ी का विचार करता है — वह भी वंदनीय बन जाती है।
स्याम सुरभि पय बिसद अति गुनद करहिं सब पान।गिरा ग्राम्य सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान॥१०(ख)॥
श्याम रंग की गाय का दूध भी अत्यंत निर्मल और गुणकारी होता है, जिसे सब पीते हैं। इसी तरह ग्रामीण-सामान्य भाषा में भी यदि सीता-राम का यश गाया-सुना जाए, तो सुज्ञ पुरुष उसे स्वीकार करते हैं।
मनि मानिक मुकुता छबि जैसी। अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी॥नृप किरीट तरुनी तनु पाई। लहहिं सकल सोभा अधिकाई॥॥१॥
मणि, मानिक और मोती की जैसी शोभा होती है, वैसी शोभा वे सर्प, पर्वत या हाथी के सिर पर धारण किए जाने पर नहीं होती। वही जब राजमुकुट में या युवती के शरीर पर सजते हैं, तब उनकी शोभा कहीं अधिक बढ़ जाती है।
तैसेहिं सुकबि कबित बुध कहहीं। उपजहिं अनत अनत छबि लहहीं॥भगति हेतु बिधि भवन बिहाई। सुमिरत सारद आवति धाई॥॥२॥
उसी प्रकार विद्वान कहते हैं कि अच्छे कवि की कविता भी कहीं और उत्पन्न होकर कहीं और ही अपनी शोभा पाती है। भक्ति के निमित्त सरस्वतीजी भी ब्रह्मलोक छोड़कर दौड़ी चली आती हैं।
राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ। सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ॥कबि कोबिद अस हृदयँ बिचारी। गावहिं हरि जस कलि मल हारी॥॥३॥
राम-चरित रूपी सरोवर में स्नान कराए बिना, सरस्वतीजी का श्रम करोड़ों उपायों से भी दूर नहीं होता। कवि और विद्वान हृदय में यही विचार कर, कलियुग के पापों को हरने वाला हरि-यश गाते हैं।
कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना। सिर धुनि गिरा लगत पछिताना॥हृदय सिंधु मति सीप समाना। स्वाति सारदा कहहिं सुजाना॥॥४॥
साधारण मनुष्यों के गुण गाने पर सरस्वतीजी को सिर धुनकर पछताना पड़ता है। विद्वान लोग कहते हैं कि हृदय समुद्र के समान है, बुद्धि सीप के समान, और सरस्वतीजी स्वाति नक्षत्र की बूँद के समान हैं।
जौं बरषइ बर बारि बिचारू। होहिं कबित मुकुतामनि चारू॥॥५॥
यदि उत्तम विचार रूपी जल बरसे, तभी काव्य सुंदर मुक्तामणि के समान बन पाता है।
जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग।पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग॥११॥
फिर उन मोतियों को युक्तिपूर्वक बेधकर श्रीराम-चरित रूपी उत्तम धागे में पिरोया जाता है, जिन्हें सज्जन लोग अपने निर्मल हृदय में धारण करते हैं और वह उनके प्रेम की अत्यंत शोभा बढ़ाता है।
जे जनमे कलिकाल कराला। करतब बायस बेष मराला॥चलत कुपंथ बेद मग छाँड़े। कपट कलेवर कलि मल भाँड़ें॥॥१॥
जो लोग इस भयंकर कलियुग में जन्मे हैं, वे हंस का वेश धारण किए कौवे के समान कर्म करने वाले हैं। वे वेद-मार्ग छोड़कर कुमार्ग पर चलते हैं — उनका शरीर कपट और कलियुग के पापों का पात्र बना हुआ है।
बंचक भगत कहाइ राम के। किंकर कंचन कोह काम के॥तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी। धींग धरमध्वज धंधक धोरी॥॥२॥
वे स्वयं को राम-भक्त कहलाते हुए भी छली हैं, वास्तव में धन, क्रोध और काम के दास हैं। ऐसे लोगों में संसार में सबसे आगे मेरा ही नाम है — मैं ही सबसे बड़ा पाखंडी, धर्म की ध्वजा फहराने वाला ढोंगी हूँ।
जौं अपने अवगुन सब कहऊँ। बाढ़इ कथा पार नहिं लहऊँ॥ताते मैं अति अलप बखाने। थोरे महुँ जानिहहिं सयाने॥॥३॥
यदि मैं अपने सारे अवगुण गिनाने बैठूँ, तो यह कथा इतनी बढ़ जाएगी कि उसका पार ही नहीं मिलेगा। इसलिए मैंने केवल थोड़ा-सा ही वर्णन किया है — बुद्धिमान लोग इतने से ही सब कुछ जान लेंगे।
समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी। कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी॥एतेहु पर करिहहिं जे असंका। मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका॥॥४॥
मेरी नाना प्रकार की यह विनती समझकर कोई भी इस कथा को सुनकर दोष नहीं देगा। फिर भी जो इसमें शंका करेंगे, वे मुझसे भी अधिक मंदबुद्धि और दरिद्र समझे जाएँगे।
कबि न होऊँ नहिं चतुर कहावउँ। मति अनुरूप राम गुन गावउँ॥कहँ रघुपति के चरित अपारा। कहँ मति मोरि निरत संसारा॥॥५॥
मैं न तो कवि हूँ, न स्वयं को चतुर कहलाना चाहता हूँ — बस अपनी बुद्धि के अनुसार राम-गुण गाता हूँ। कहाँ तो श्रीरघुनाथजी का अपार चरित्र, और कहाँ संसार में डूबी हुई मेरी तुच्छ बुद्धि!
जेहिं मारुत गिरि मेरु उड़ाहीं। कहहु तूल केहि लेखे माहीं॥समुझत अमित राम प्रभुताई। करत कथा मन अति कदराई॥॥६॥
जिस वायु के वेग से मेरु पर्वत भी उड़ जाए, उसके आगे रूई किस गिनती में है? श्रीराम की अनंत प्रभुता को समझते हुए, यह कथा कहते हुए मेरा मन बहुत भयभीत हो रहा है।
सारद सेस महेस बिधि आगम निगम पुरान।नेति नेति कहि जासु गुन करहिं निरंतर गान॥१२॥
सरस्वती, शेषनाग, शिव, ब्रह्मा तथा तंत्र-वेद-पुराण — सभी 'नेति नेति' कहकर जिनके गुणों का निरंतर गान करते रहते हैं।
सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहें बिनु रहा न कोई॥तहाँ बेद अस कारन राखा। भजन प्रभाउ भाँति बहु भाषा॥॥१॥
प्रभु की वह महिमा सभी जानते हैं, फिर भी उसे कहे बिना कोई नहीं रह पाता। इसका कारण वेदों ने यह बताया है — भजन का प्रभाव अनेक प्रकार से वर्णन करने योग्य होता है।
एक अनीह अरूप अनामा। अज सच्चिदानंद पर धामा॥ब्यापक बिस्वरूप भगवाना। तेहिं धरि देह चरित कृत नाना॥॥२॥
वे एक, इच्छारहित, रूपरहित, नामरहित, अजन्मा, सच्चिदानंद और परमधाम स्वरूप भगवान ही व्यापक विश्वरूप हैं। उन्होंने ही देह धारण करके नाना प्रकार के चरित्र किए।
सो केवल भगतन हित लागी। परम कृपाल प्रनत अनुरागी॥जेहि जन पर ममता अति छोहू। जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू॥॥३॥
वे केवल भक्तों के हित के लिए ही अवतार लेते हैं — वे परम कृपालु हैं और शरणागत से अत्यंत स्नेह करते हैं। जिस भगवान का अपने भक्तों पर अपार ममता और स्नेह है, जिन्होंने सदा करुणा ही की, कभी क्रोध नहीं किया।
गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू॥बुध बरनहिं हरि जस अस जानी। करहिं पुनीत सुफल निज बानी॥॥४॥
श्रीरघुनाथजी दीनों पर दया करने वाले, सरल और समर्थ स्वामी हैं। विद्वान लोग हरि-यश को इसी रूप में जानकर उसका वर्णन करते हैं और अपनी वाणी को पवित्र तथा सफल बनाते हैं।
तेहिं बल मैं रघुपति गुन गाथा। कहिहउँ नाइ राम पद माथा॥मुनिन्ह प्रथम हरि कीरति गाई। तेहिं मग चलत सुगम मोहि भाई॥॥५॥
उसी बल के सहारे मैं श्रीरघुनाथजी के गुणों की गाथा, राम-चरणों में मस्तक झुकाकर कहूँगा। मुनियों ने पहले ही हरि-कीर्ति गाई है, इसलिए उसी मार्ग पर चलना मेरे लिए सुगम हो गया है।
अति अपार जे सरित बर जौं नृप सेतु कराहिं।चढ़ि पिपीलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं॥१३॥
अत्यंत अपार नदी को भी यदि कोई राजा सेतु बनवा दे, तो उस पर चढ़कर एक छोटी-सी चींटी भी बिना श्रम के पार चली जाती है।
एहि प्रकार बल मनहि देखाई। करिहउँ रघुपति कथा सुहाई॥ब्यास आदि कबि पुंगव नाना। जिन्ह सादर हरि सुजस बखाना॥॥१॥
इसी प्रकार अपने मन को बल दिखाकर मैं श्रीरघुनाथजी की सुहावनी कथा कहूँगा — जैसे व्यास आदि अनेक श्रेष्ठ कवियों ने आदरपूर्वक हरि के सुयश का बखान किया है।
चरन कमल बंदउँ तिन्ह केरे। पुरवहुँ सकल मनोरथ मेरे॥कलि के कबिन्ह करउँ परनामा। जिन्ह बरने रघुपति गुन ग्रामा॥॥२॥
मैं उन्हीं के चरण-कमलों की वंदना करता हूँ — वे मेरे सभी मनोरथ पूर्ण करें। मैं कलियुग के उन कवियों को भी प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने श्रीरघुनाथजी के गुण-समूहों का वर्णन किया है।
जे प्राकृत कबि परम सयाने। भाषाँ जिन्ह हरि चरित बखाने॥भए जे अहहिं जे होइहहिं आगें। प्रनवउँ सबहिं कपट सब त्यागें॥॥३॥
जो साधारण भाषा में भी परम बुद्धिमान कवि हैं, जिन्होंने अपनी भाषा में हरि-चरित्र का वर्णन किया है — जो हो चुके हैं और आगे होंगे, उन सबको मैं कपट त्यागकर प्रणाम करता हूँ।
होहु प्रसन्न देहु बरदानू। साधु समाज भनिति सनमानू॥जो प्रबंध बुध नहिं आदरहीं। सो श्रम बादि बाल कबि करहीं॥॥४॥
आप सब प्रसन्न होकर यह वरदान दीजिए कि साधु-समाज में मेरी रचना का सम्मान हो। जिस रचना को विद्वान लोग आदर नहीं देते, बालक कवि का वह परिश्रम व्यर्थ ही जाता है।
कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई॥राम सुकीरति भनिति भदेसा। असमंजस अस मोहि अँदेसा॥॥५॥
कीर्ति, रचना और वैभव वही अच्छे हैं जो गंगा नदी के समान सबके लिए हितकारी हों। पर मुझे यह असमंजस और आशंका है कि श्रीराम की सुंदर कीर्ति और मेरी भद्दी रचना का मेल कैसे बैठेगा।
तुम्हरी कृपा सुलभ सोउ मोरे। सिअनि सुहावनि टाट पटोरे॥॥६॥
आप सबकी कृपा से मेरे लिए भी वह सुलभ हो जाएगा — जैसे मोटे टाट पर भी सुंदर पटोरी वस्त्र की सिलाई हो जाए तो वह सुहावना बन जाता है।
सरल कबित कीरति बिमल सोइ आदरहिं सुजान।सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान॥१४(क)॥
सरल काव्य में निर्मल कीर्ति का वर्णन हो, तो सुज्ञ पुरुष उसी का आदर करते हैं — यहाँ तक कि स्वाभाविक शत्रु भी अपना वैर भूलकर उसे सुनकर उसकी प्रशंसा करते हैं।
सो न होइ बिनु बिमल मति मोहि मति बल अति थोर।करहु कृपा हरि जस कहउँ पुनि पुनि करउँ निहोर॥१४(ख)॥
पर वह निर्मल बुद्धि के बिना संभव नहीं, और मेरी बुद्धि का बल अत्यंत तुच्छ है। इसलिए मैं बार-बार विनती करता हूँ — कृपा कीजिए, जिससे मैं हरि-यश कह सकूँ।
कबि कोबिद रघुबर चरित मानस मंजु मराल।बाल बिनय सुनि सुरुचि लखि मोपर होहु कृपाल॥१४(ग)॥
श्रीरघुनाथजी का चरित्र मानो सुंदर मानसरोवर है, और कवि-विद्वान उसमें विचरने वाले सुंदर हंस हैं। मेरी बालक-जैसी विनती और शुभ रुचि देखकर, आप सब मुझ पर कृपा कीजिए।
बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ।सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित॥१४(घ)॥
मैं उन मुनि वाल्मीकि के चरण-कमलों की वंदना करता हूँ, जिन्होंने रामायण की रचना की — जो कठोर वर्णों से युक्त होते हुए भी अत्यंत सुकोमल और सुंदर है, और दोषरहित होते हुए भी 'दूषण' अक्षर से युक्त है (यह एक सुंदर शब्द-क्रीड़ा है)।
बंदउँ चारिउ बेद भव बारिधि बोहित सरिस।जिन्हहि न सपनेहुँ खेद बरनत रघुबर बिसद जसु॥१४(ङ)॥
मैं चारों वेदों की वंदना करता हूँ, जो संसार-सागर से पार उतारने के लिए जहाज़ के समान हैं - जिन्हें राम के निर्मल यश का वर्णन करते हुए स्वप्न में भी थकान नहीं होती।
बंदउँ बिधि पद रेनु भव सागर जेहि कीन्ह जहँ।संत सुधा ससि धेनु प्रगटे खल बिष बारुनी॥१४(च)॥
मैं विधाता के चरणों की धूलि को प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने यह संसार-सागर रचा है - जहाँ से एक ओर संत-रूपी अमृत, चंद्रमा और कामधेनु प्रकट हुए, तो दूसरी ओर दुष्ट-रूपी विष और मदिरा भी उत्पन्न हुए।
बिबुध बिप्र बुध ग्रह चरन बंदि कहउँ कर जोरि।होइ प्रसन्न पुरवहु सकल मंजु मनोरथ मोरि॥१४(छ)॥
देवता, ब्राह्मण, विद्वान और नवग्रह - इन सबके चरणों की वंदना करके हाथ जोड़कर कहता हूँ कि आप सब प्रसन्न होकर मेरे सारे सुंदर मनोरथ पूर्ण करें।
पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता। जुगल पुनीत मनोहर चरिता॥मज्जन पान पाप हर एका। कहत सुनत एक हर अबिबेका॥॥१॥
फिर मैं सरस्वती और गंगा की वंदना करता हूँ, दोनों का चरित्र पवित्र और मनोहर है। इनमें से एक, गंगा, स्नान और जलपान से पाप का नाश करती हैं, और दूसरी, सरस्वती, कहने-सुनने मात्र से अज्ञान का नाश कर देती हैं।
गुर पितु मातु महेस भवानी। प्रनवउँ दीनबंधु दिन दानी॥सेवक स्वामि सखा सिय पी के। हित निरुपधि सब बिधि तुलसीके॥॥२॥
गुरु, माता-पिता, शिवजी और पार्वतीजी, तथा दीनबंधु दीनदयालु भगवान को मैं प्रणाम करता हूँ। तुलसीदास सीतापति श्रीराम के सेवक, स्वामी और सखा — सभी रूपों में सर्वथा निष्कपट हित चाहने वाले हैं।
कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा। साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा॥अनमिल आखर अरथ न जापू। प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू॥॥३॥
कलियुग को देखकर जगत के हित के लिए शिव-पार्वती ने साबर मंत्रों का जाल रचा, जिनके अक्षर आपस में मेल नहीं खाते और जिनका कोई अर्थ भी जपने योग्य नहीं लगता — फिर भी उनका प्रभाव प्रत्यक्ष दिखता है, यही शिवजी का प्रताप है।
सो उमेस मोहि पर अनुकूला। करिहिं कथा मुद मंगल मूला॥सुमिरि सिवा सिव पाइ पसाऊ। बरनउँ रामचरित चित चाऊ॥॥४॥
वे उमापति शिवजी मुझ पर अनुकूल रहकर यह कथा आनंद और मंगल का मूल बनाएँ। पार्वती और शिवजी का स्मरण कर, उनका प्रसाद पाकर, मैं चित्त में उत्साह लिए राम-चरित्र का वर्णन करता हूँ।
भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती। ससि समाज मिलि मनहुँ सुराती॥जे एहि कथहि सनेह समेता। कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता॥
शिवजी की कृपा से मेरी रचना ऐसे शोभित होगी मानो तारागणों के साथ मिलकर सुंदर रात्रि शोभा पा रही हो। जो लोग इस कथा को सचेत होकर, समझकर, स्नेहपूर्वक कहेंगे-सुनेंगे,
होइहहिं राम चरन अनुरागी। कलि मल रहित सुमंगल भागी॥
वे श्रीराम के चरणों में अनुरागी होकर कलियुग के पापों से रहित सुमंगल के भागी बनेंगे।
सपनेहुँ साचेहुँ मोहि पर जौं हर गौरि पसाउ।तौ फुर होउ जो कहेउँ सब भाषा भनिति प्रभाउ॥॥१५॥
स्वप्न में हो या सत्य में, शिव-पार्वती की कृपा सचमुच मुझ पर बनी है, तो मैंने भाषा-रचना के विषय में जो कुछ कहा है, वह सब सत्य होकर प्रभावी सिद्ध हो।
बंदउँ अवध पुरी अति पावनि। सरजू सरि कलि कलुष नसावनि॥प्रनवउँ पुर नर नारि बहोरी। ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी॥॥१॥
मैं अत्यंत पावन अयोध्यापुरी की वंदना करता हूँ, तथा कलियुग के पापों का नाश करने वाली सरयू नदी की भी। फिर मैं उस नगर के नर-नारियों को भी प्रणाम करता हूँ, जिन पर प्रभु की ममता कुछ कम नहीं है।
सिय निंदक अघ ओघ नसाए। लोक बिसोक बनाइ बसाए॥बंदउँ कौसल्या दिसि प्राची। कीरति जासु सकल जग माची॥॥२॥
जिन्होंने सीताजी की निंदा करने वालों के भी पाप-समूह नष्ट किए और उन्हें शोकरहित लोक में बसाया। मैं पूर्व दिशा के समान कौसल्याजी की वंदना करता हूँ, जिनकी कीर्ति समस्त संसार में फैली है।
प्रगटेउ जहँ रघुपति ससि चारू। बिस्व सुखद खल कमल तुसारू॥दसरथ राउ सहित सब रानी। सुकृत सुमंगल मूरति मानी॥
जहाँ से श्रीरघुनाथ रूपी सुंदर चंद्रमा प्रकट हुए — जो विश्व के लिए सुखदायी और दुष्टरूपी कमल के लिए पाले के समान हैं। राजा दशरथ और उनकी सभी रानियों को मैं सुकृत और सुमंगल की साक्षात मूर्ति मानता हूँ,
करउँ प्रनाम करम मन बानी। करहु कृपा सुत सेवक जानी॥जिन्हहि बिरचि बड़ भयउ बिधाता। महिमा अवधि राम पितु माता॥
मन-वचन-कर्म से प्रणाम करता हूँ — वे मुझे अपना पुत्र-सेवक जानकर कृपा करें। इन्हें रचकर स्वयं विधाता भी बड़ा हो गया, क्योंकि राम के माता-पिता होने की महिमा की कोई सीमा नहीं।
बंदउँ अवध भुआल सत्य प्रेम जेहि राम पद।बिछुरत दीनदयाल प्रिय तनु तृन इव परिहरेउ॥॥१६॥
मैं अयोध्या के राजा दशरथजी को प्रणाम करता हूँ, जिनका श्रीराम के चरणों में सच्चा प्रेम था — उन दीनदयालु प्रभु के वियोग में उन्होंने अपने प्रिय शरीर को तिनके के समान त्याग दिया।
प्रनवउँ परिजन सहित बिदेहू। जाहि राम पद गूढ़ सनेहू॥जोग भोग महँ राखेउ गोई। राम बिलोकत प्रगटेउ सोई॥॥१॥
मैं परिवार सहित राजा जनक को प्रणाम करता हूँ, जिनके हृदय में श्रीराम के चरणों का गूढ़ स्नेह है। योग और भोग दोनों में जो गुप्त रूप से छिपा था, वह श्रीराम को देखते ही प्रकट हो गया।
प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना। जासु नेम ब्रत जाइ न बरना॥राम चरन पंकज मन जासू। लुबुध मधुप इव तजइ न पासू॥॥२॥
मैं सबसे पहले भरतजी के चरणों को प्रणाम करता हूँ, जिनके नियम-व्रत का वर्णन नहीं किया जा सकता। उनका मन श्रीराम के चरण-कमलों में ऐसे लीन है जैसे लोभी भ्रमर कमल का साथ कभी नहीं छोड़ता।
बंदउँ लछिमन पद जलजाता। सीतल सुभग भगत सुख दाता॥रघुपति कीरति बिमल पताका। दंड समान भयउ जस जाका॥॥३॥
मैं लक्ष्मणजी के चरण-कमलों की वंदना करता हूँ, जो शीतल, सुंदर और भक्तों को सुख देने वाले हैं। श्रीरघुनाथजी की निर्मल कीर्ति रूपी पताका के लिए वे मानो दंड के समान हैं।
सेष सहस्त्रसीस जग कारन। जो अवतरेउ भूमि भय टारन॥सदा सो सानुकूल रह मो पर। कृपासिंधु सौमित्रि गुनाकर॥॥४॥
सहस्र फणों वाले शेषनाग, जो संसार के आधार हैं और जिन्होंने पृथ्वी का भार व भय दूर करने के लिए लक्ष्मणजी के रूप में अवतार लिया — वे कृपासागर, गुणों की खान सौमित्र सदा मुझ पर अनुकूल रहें।
रिपुसूदन पद कमल नमामी। सूर सुसील भरत अनुगामी॥महावीर बिनवउँ हनुमाना। राम जासु जस आप बखाना॥॥५॥
मैं शत्रुघ्नजी के चरण-कमलों को नमस्कार करता हूँ, जो शूरवीर, सुशील और भरतजी के अनुगामी हैं। फिर मैं महावीर हनुमानजी की विनती करता हूँ, जिनका यश स्वयं श्रीराम ने भी बखाना है।
प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानधन।जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर॥१७॥
मैं पवनपुत्र हनुमानजी को प्रणाम करता हूँ, जो दुष्टरूपी वन के लिए अग्नि के समान और ज्ञान के भंडार हैं, जिनके हृदय-मंदिर में धनुष-बाण धारण किए श्रीराम सदा निवास करते हैं।
कपिपति रीछ निसाचर राजा। अंगदादि जे कीस समाजा॥बंदउँ सब के चरन सुहाए। अधम सरीर राम जिन्ह पाए॥॥१॥
वानरराज सुग्रीव, ऋक्षराज जाम्बवान, राक्षसराज विभीषण, तथा अंगद आदि जो भी वानर-समाज के सदस्य हैं — मैं उन सबके सुंदर चरणों की वंदना करता हूँ, जिन्होंने पशु-योनि जैसे तुच्छ शरीर में भी श्रीराम को पा लिया।
रघुपति चरन उपासक जेते। खग मृग सुर नर असुर समेते॥बंदउँ पद सरोज सब केरे। जे बिनु काम राम के चेरे॥॥२॥
श्रीरघुनाथजी के चरणों के जितने भी उपासक हैं — पक्षी, पशु, देवता, मनुष्य और असुर सहित — मैं उन सबके चरण-कमलों की वंदना करता हूँ, जो बिना किसी स्वार्थ के श्रीराम के सेवक हैं।
सुक सनकादि भगत मुनि नारद। जे मुनिबर बिग्यान बिसारद॥प्रनवउँ सबहिं धरनि धरि सीसा। करहु कृपा जन जानि मुनीसा॥॥३॥
शुकदेव, सनकादि भक्त, नारदजी तथा जो भी श्रेष्ठ मुनि विज्ञान में निपुण हैं, उन सबको मैं धरती पर सिर टेककर प्रणाम करता हूँ। हे मुनीश्वरो, मुझे अपना सेवक जानकर कृपा कीजिए।
जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुना निधान की॥ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ॥॥४॥
जनकनंदिनी जानकीजी संसार की जननी हैं, जो करुणानिधान श्रीराम को अत्यंत प्रिय हैं। मैं उनके दोनों चरण-कमलों को मनाता हूँ, जिनकी कृपा से निर्मल बुद्धि प्राप्त होती है।
पुनि मन बचन कर्म रघुनायक। चरन कमल बंदउँ सब लायक॥राजिवनयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुख दायक॥॥५॥
फिर मन-वचन-कर्म से मैं सर्वसमर्थ श्रीरघुनाथजी के चरण-कमलों की वंदना करता हूँ, जिनके कमल-जैसे नेत्र हैं और जो धनुष-बाण धारण किए हुए हैं, जो भक्तों की विपत्ति हरने वाले और सुख देने वाले हैं।
गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।बदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न॥१८॥
वाणी और अर्थ जल और लहर के समान हैं — न तो भिन्न कहे जा सकते हैं, न अभिन्न। मैं सीता-राम के उन चरणों की वंदना करता हूँ, जिन्हें दीन-दुखी अत्यंत प्रिय हैं।
बंदउँ नाम राम रघुबर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को॥बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो॥॥१॥
मैं श्रीरघुनाथ राम के नाम की वंदना करता हूँ, जो अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा तीनों के लिए मूल कारण है। वह नाम ब्रह्मा-विष्णु-शिवमय और वेदों का प्राण है, वह निर्गुण होते हुए भी अनुपम गुणों का भंडार है।
महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू॥महिमा जासु जान गनराउ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ॥॥२॥
जिस महामंत्र को शिवजी स्वयं जपते हैं और काशी में मुक्ति के लिए उसी का उपदेश देते हैं, उसकी महिमा गणेशजी जानते हैं, इसीलिए नाम के प्रभाव से ही उन्हें सबसे पहले पूजा जाता है।
जान आदिकबि नाम प्रतापू। भयउ सुद्ध करि उलटा जापू॥सहस नाम सम सुनि सिव बानी। जपि जेई पिय संग भवानी॥॥३॥
आदिकवि वाल्मीकि ने नाम का प्रताप जाना — उलटा जपकर भी वे शुद्ध हो गए। शिवजी के वचन से यह सुनकर कि राम-नाम सहस्रनाम के समान है, पार्वतीजी ने भी अपने पति के साथ उसे जपा।
हरषे हेतु हेरि हर ही को। किय भूषन तिय भूषन ती को॥नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को॥॥४॥
यह देखकर शिवजी स्वयं हर्षित हुए और नाम को अपनी पत्नी पार्वतीजी का आभूषण बना दिया। शिवजी नाम के प्रभाव को भली-भाँति जानते हैं — जिसने उन्हें कालकूट विष का फल भी अमृत के समान दे दिया।
बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास।राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास।॥१९॥
श्रीरघुनाथजी की भक्ति वर्षा ऋतु के समान है, तुलसीदास और सुदास भक्तजन धान की फसल के समान हैं, और राम नाम के दोनों उत्तम अक्षर सावन-भादों के महीनों के समान हैं जो फसल को पूर्ण पोषण देते हैं।
आखर मधुर मनोहर दोऊ। बरन बिलोचन जन जिय जोऊ॥सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोक लाहु परलोक निबाहू॥॥१॥
राम-नाम के दोनों अक्षर मधुर और मनोहर हैं, जो मानो भक्तों के हृदय के दो नेत्र हैं। इसका स्मरण सभी के लिए सुलभ और सुखद है — यह लोक में लाभ और परलोक में भी सहारा देता है।
कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके। राम लखन सम प्रिय तुलसी के॥बरनत बरन प्रीति बिलगाती। ब्रह्म जीव सम सहज सँघाती॥॥२॥
कहने, सुनने और स्मरण करने में यह अत्यंत सुंदर है — तुलसीदास को यह राम-लखन के समान प्रिय है। यद्यपि वर्णन करने पर इसके दोनों अक्षरों में भेद जान पड़ता है, पर वे ब्रह्म और जीव के समान स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे के सहचर हैं।
नर नारायन सरिस सुभ्राता। जग पालक बिसेषि जन त्राता॥भगति सुतिय कल करन बिभूषन। जग हित हेतु बिमल बिधु पूषन॥॥३॥
राम-नाम के दोनों अक्षर नर-नारायण जैसे शुभ भाई हैं, जो संसार के पालक और विशेषकर भक्तों के त्राता हैं। ये भक्ति रूपी सुंदर स्त्री के मनोहर कान के आभूषण हैं, और जगत के हित के लिए निर्मल चंद्रमा और सूर्य के समान हैं।
स्वाद तोष सम सुगति सुधा के। कमठ सेष सम धर बसुधा के॥जन मन मंजु कंज मधुकर से। जीह जसोमति हरि हलधर से॥॥४॥
ये दोनों अक्षर सुगति रूपी अमृत के स्वाद और तृप्ति के समान हैं, तथा कच्छप और शेषनाग के समान पृथ्वी को धारण करने वाले हैं। ये भक्तों के मन रूपी सुंदर कमल के लिए भ्रमर के समान हैं, और जीभ पर मानो यशोदा के दो पुत्र श्रीकृष्ण और बलराम के समान विराजते हैं।
एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ।तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोऊ॥२०॥
एक अक्षर छत्र के समान है और दूसरा सब वर्णों के ऊपर मुकुटमणि के समान — तुलसीदास कहते हैं कि श्रीरघुनाथजी के नाम के ये दोनों अक्षर इसी प्रकार शोभा पाते हैं।
समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी॥नाम रूप दुइ ईस उपाधी। अकथ अनादि सुसामुझि साधी॥॥१॥
समझने पर नाम और नामी समान ही हैं — दोनों में परस्पर प्रेम है, नाम मानो प्रभु का ही अनुगामी है। नाम और रूप, दोनों ही ईश्वर की उपाधियाँ हैं — यह अकथनीय और अनादि रहस्य सुबुद्धि से ही समझा जा सकता है।
को बड़ छोट कहत अपराधू। सुनि गुन भेद समुझिहहिं साधू।॥देखिअहिं रूप नाम आधीना। रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना॥॥२॥
इनमें कौन बड़ा और कौन छोटा है, यह कहना ही अपराध है — साधुजन इनके गुण-भेद को सुनकर स्वयं समझ लेंगे। रूप को देखने के लिए भी नाम की ही आवश्यकता होती है — नाम के बिना रूप का ज्ञान भी संभव नहीं।
रूप बिसेष नाम बिनु जानें। करतल गत न परहिं पहिचानें॥सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें। आवत हृदयँ सनेह बिसेषें॥॥३॥
किसी विशेष रूप को भी नाम जाने बिना पहचानना कठिन है — हाथ में रखी वस्तु भी बिना नाम जाने पहचानी नहीं जाती। पर नाम का तो बिना रूप देखे ही स्मरण किया जा सकता है, और वह हृदय में विशेष स्नेह के साथ स्वयं आ बसता है।
नाम रूप गति अकथ कहानी। समुझत सुखद न परति बखानी॥अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी। उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी॥॥४॥
नाम और रूप की गति एक अकथनीय कहानी है — समझने में सुखद है, पर उसका पूरा वर्णन नहीं हो सकता। निर्गुण और सगुण के बीच नाम ही सच्चा साक्षी है, मानो दोनों को समझाने वाला एक चतुर दुभाषिया।
राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरी द्वार।तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर॥२१॥
तुलसीदास कहते हैं — यदि तू भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहता है, तो राम-नाम रूपी मणिदीपक को जीभ रूपी द्वार की देहरी पर रख दे।
नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी॥ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा। अकथ अनामय नाम न रूपा॥॥१॥
योगीजन जीभ से नाम जपकर ही जाग्रत रहते हैं, वैराग्य द्वारा ब्रह्मा की इस सृष्टि-प्रपंच से मुक्त होकर वे अनुपम ब्रह्मसुख का अनुभव करते हैं — जो अकथनीय, दोषरहित और नाम-रूप से परे है।
जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ। नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ॥साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ॥॥२॥
जो लोग गूढ़ गति को जानना चाहते हैं, वे भी जीभ से नाम जपकर ही उसे जान पाते हैं। साधक लय लगाकर नाम जपते हैं और अणिमा आदि सिद्धियाँ पाकर सिद्ध हो जाते हैं।
जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी॥राम भगत जग चारि प्रकारा। सुकृती चारिउ अनघ उदारा॥॥३॥
अत्यंत पीड़ित भक्तजन नाम जपते हैं, जिससे उनके भारी संकट मिट जाते हैं और वे सुखी हो जाते हैं। संसार में राम-भक्त चार प्रकार के हैं — और चारों ही पुण्यात्मा, निष्पाप तथा उदार हैं।
चहू चतुर कहुँ नाम अधारा। ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा॥चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ। कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ॥॥४॥
चारों ही प्रकार के चतुर भक्तों के लिए नाम ही आधार है, फिर भी ज्ञानी भक्त प्रभु को विशेष रूप से प्रिय है। चारों युगों और चारों वेदों में नाम का प्रभाव वर्णित है, विशेषकर कलियुग में तो नाम के अतिरिक्त कोई और उपाय ही नहीं।
सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन।नाम सुप्रेम पियूष हृद तिन्हहें किए मन मीन॥२२॥
जो सभी कामनाओं से रहित होकर श्रीराम-भक्ति के रस में लीन रहते हैं, नाम रूपी सुंदर प्रेम-अमृत ने उनके मन को उस अमृत में मछली के समान बना दिया है।
अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा॥मोरें मत बड़ नामु दुहू तें। किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें॥॥१॥
निर्गुण और सगुण दोनों ही ब्रह्म के स्वरूप हैं — अकथनीय, अथाह, अनादि और अनुपम। पर मेरी दृष्टि में इन दोनों से भी बड़ा नाम है, जिसने अपने बल से दोनों को ही अपने वश में कर लिया।
प्रोढ़ि सुजन जनि जानहिं जन की। कहउँ प्रतीति प्रीति रुचि मन की॥एक दारुगत देखिअ एकू। पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू॥
इसे मेरी बढ़-चढ़कर कही बात न समझें — मैं तो अपने मन की सच्ची प्रीति और रुचि के अनुसार ही कह रहा हूँ। निर्गुण और सगुण ब्रह्म का भेद वैसे ही समझें जैसे लकड़ी में छिपी और प्रकट अग्नि।
उभय अगम जुग सुगम नाम तें। कहेउ नामु बड़ ब्रह्म राम तें॥ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी। सत चेतन घन आनंद रासी॥
ये दोनों ही स्वयं अगम हैं, पर नाम के द्वारा सुगम बन जाते हैं — इसीलिए मैं नाम को ब्रह्म और राम दोनों से भी बड़ा कहता हूँ। व्यापक, अद्वितीय, अविनाशी ब्रह्म ही सत्-चित्-आनंदघन है।
अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी॥नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें॥
ऐसे निर्विकार प्रभु सबके हृदय में विद्यमान रहते हुए भी, संसार के सभी जीव दुखी और दीन बने रहते हैं — परन्तु नाम के निरूपण और नाम के ही प्रयत्न से वे प्रभु वैसे ही प्रकट हो जाते हैं, जैसे परखने के प्रयत्न से रत्न का मूल्य प्रकट होता है।
निरगुन तें एहि भाँति बड़ नाम प्रभाउ अपार।कहउँ नामु बड़ राम तें निज बिचार अनुसार॥२३॥
इस प्रकार निर्गुण ब्रह्म से भी नाम का प्रभाव अपार और बड़ा है — यह मैं अपने विचार के अनुसार कहता हूँ कि नाम राम से भी बड़ा है।
राम भगत हित नर तनु धारी। सहि संकट किए साधु सुखारी॥नामु सप्रेम जपत अनयासा। भगत होहिं मुद मंगल बासा॥॥१॥
श्रीराम ने भक्तों के हित के लिए मनुष्य-शरीर धारण किया, स्वयं संकट सहकर साधुओं को सुखी किया। परंतु नाम को प्रेमपूर्वक जपने मात्र से ही, बिना किसी कष्ट के, भक्त आनंद और मंगल के धाम बन जाते हैं।
राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी॥रिषि हित राम सुकेतुसुता की। सहित सेन सुत कीन्ह बिबाकी॥
श्रीराम ने तो एक तपस्वी की स्त्री अहल्या का ही उद्धार किया, पर नाम ने करोड़ों दुर्बुद्धि दुष्टों को सुधार दिया। श्रीराम ने ऋषियों के हित के लिए ताड़का का वध किया, सेना सहित उसके पुत्रों को भी दंडित किया —
सहित दोष दुख दास दुरासा। दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा॥भंजेउ राम आपु भव चापू। भव भय भंजन नाम प्रतापू॥
पर नाम तो दास के दोष, दुख और दुराशा को उसी तरह नष्ट कर देता है जैसे सूर्य रात्रि का नाश करता है। श्रीराम ने स्वयं शिवजी का धनुष तोड़ा, पर नाम का प्रताप तो संसार के भय का ही नाश करने वाला है।
दंडक बनु प्रभु कीन्ह सुहावन। जन मन अमित नाम किए पावन॥निसिचर निकर दले रघुनंदन। नामु सकल कलि कलुष निकंदन॥
प्रभु श्रीराम ने दण्डक वन को सुंदर बना दिया, पर नाम ने असंख्य भक्तों के मन को पावन कर दिया — श्रीराम ने राक्षसों के समूह का नाश किया, पर नाम कलियुग के समस्त पापों का समूल नाश करता है।
सबरी गीध सुसेवकनि सुगति दीन्हि रघुनाथ।नाम उधारे अमित खल बेद बिदित गुन गाथ॥२४॥
श्रीरघुनाथजी ने शबरी और जटायु जैसे सुसेवकों को ही सद्गति दी, पर नाम ने असंख्य दुष्टों का उद्धार कर दिया — यह गुणगाथा वेदों में भी विदित है।
राम सुकंठ बिभीषन दोऊ। राखे सरन जान सबु कोऊ॥नाम गरीब अनेक नेवाजे। लोक बेद बर बिरिद बिराजे॥॥१॥
श्रीराम ने सुग्रीव और विभीषण, इन दो शरणागतों की ही रक्षा की, यह सभी जानते हैं। पर नाम ने तो अनेक दीन-दुखियों पर कृपा की है — यह उत्तम विरद लोक और वेद दोनों में शोभित है।
राम भालु कपि कटकु बटोरा। सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा॥नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं। करहु बिचारु सुजन मन माहीं॥॥२॥
श्रीराम ने भालू-वानरों की सेना जुटाई और सेतु बनाने के लिए कम परिश्रम नहीं किया, पर नाम लेते ही भवसागर सूख जाता है — हे सज्जनो, अपने मन में इस पर विचार कीजिए।
राम सकुल रन रावनु मारा। सीय सहित निज पुर पगु धारा॥राजा रामु अवध रजधानी। गावत गुन सुर मुनि बर बानी॥
श्रीराम ने युद्ध में कुल सहित रावण को मारकर सीताजी सहित अपनी अयोध्यापुरी में पदार्पण किया। राजा राम अयोध्या की राजधानी में विराजमान हुए, देवता-मुनि उत्तम वाणी से उनके गुण गाते हैं।
सेवक सुमिरत नामु सप्रीती। बिनु श्रम प्रबल मोह दलु जीती॥फिरत सनेहँ मगन सुख अपनें। नाम प्रसाद सोच नहिं सपनें॥
परंतु सेवक तो केवल प्रेमपूर्वक नाम का स्मरण करके ही, बिना किसी परिश्रम के, प्रबल मोह की सेना पर विजय पा लेता है — नाम के प्रसाद से उसे स्वप्न में भी कोई शोक नहीं होता।
ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि।रामचरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि॥॥२५॥
ब्रह्मरूप श्रीराम से भी नाम बड़ा है, क्योंकि वह वरदान देने वाले को भी वर देने वाला है — इसी भाव को हृदय में जानकर भगवान शिव ने करोड़ों रामकथाओं में से इसी रामचरितमानस को चुना।
नाम प्रसाद संभु अबिनासी। साजु अमंगल मंगल रासी॥सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी। नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी॥॥१॥
नाम के प्रसाद से ही अविनाशी शिवजी, अमंगल वेष धारण किए होते हुए भी, मंगलों की राशि बने हुए हैं। शुकदेव, सनकादि, सिद्ध, मुनि और योगी — ये सब भी नाम के प्रसाद से ही ब्रह्मसुख भोगते हैं।
नारद जानेउ नाम प्रतापू। जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय आपू॥नामु जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू। भगत सिरोमनि भे प्रहलादू॥॥२॥
नारदजी ने नाम का प्रताप जाना, जिससे वे स्वयं संसार को प्रिय हो गए और विष्णु-शिव दोनों को भी प्रिय बन गए। नाम जपने से ही प्रभु प्रसन्न हुए, और प्रह्लादजी भक्तों में शिरोमणि बन गए।
ध्रुवँ सगलानि जपेउ हरि नाऊँ। पायउ अचल अनूपम ठाऊँ॥सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू॥॥३॥
ध्रुवजी ने अपनी ग्लानि में हरि-नाम जपा और अचल, अनुपम पद पाया। पवनपुत्र हनुमानजी ने पवित्र नाम का स्मरण करके ही श्रीराम को अपने वश में कर लिया।
अपतु अजामिलु गजु गनिकाऊ। भए मुकुत हरि नाम प्रभाऊ॥कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई। रामु न सकहिं नाम गुन गाई॥॥४॥
पतित अजामिल, गजराज और गणिका — ये सभी हरि-नाम के प्रभाव से मुक्त हो गए। मैं नाम की बड़ाई कहाँ तक कहूँ — स्वयं श्रीराम भी नाम के गुण पूरी तरह नहीं गा सकते।
नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु।जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु॥२६॥
राम का नाम कलियुग में कल्पवृक्ष के समान है और कल्याण का निवास है — जिसका स्मरण करते ही भाँग जैसे तुच्छ से तुलसीदास तुलसी जैसे पवित्र बन गए।
चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका। भए नाम जपि जीव बिसोका॥बेद पुरान संत मत एहू। सकल सुकृत फल राम सनेहू॥॥१॥
चारों युगों, तीनों कालों और तीनों लोकों में, नाम जपकर ही जीव शोकरहित हुए हैं। वेद, पुराण और संतों का यही मत है कि समस्त पुण्यों का फल श्रीराम में प्रेम ही है।
ध्यानु प्रथम जुग मखबिधि दूजें। द्वापर परितोषत प्रभु पूजें॥कलि केवल मल मूल मलीना। पाप पयोनिधि जन मन मीना॥॥२॥
सतयुग में ध्यान से, त्रेता में यज्ञ-विधि से, और द्वापर में प्रभु की पूजा से ही प्रसन्नता होती थी। पर कलियुग तो केवल पापों की जड़ और मलिन है, जिसमें भक्तों का मन पाप रूपी समुद्र में मछली के समान फँसा रहता है।
नाम कामतरु काल कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला॥राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता॥॥३॥
इस भयंकर कलियुग में नाम ही कल्पवृक्ष है, जिसका स्मरण करते ही संसार के समस्त जाल मिट जाते हैं। राम-नाम कलियुग में इच्छित फल देने वाला है, और लोक-परलोक दोनों में माता-पिता के समान हितकारी है।
नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥कालनेमि कलि कपट निधानू। नाम सुमति समरथ हनुमानू॥॥४॥
कलियुग में न तो कर्म का पालन संभव है, न भक्ति का, न विवेक का — राम-नाम ही एकमात्र सहारा है। कलियुग तो कालनेमि के समान कपट का भंडार है, और नाम रूपी सुबुद्धि ही उसे परास्त करने वाला समर्थ हनुमान है।
राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल।जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल॥२७॥
राम-नाम नृसिंह भगवान के समान है और कलिकाल हिरण्यकशिपु के समान — जो भी जपने वाला भक्त प्रह्लाद के समान होगा, नाम उसे उसी प्रकार पालेगा, देवताओं को कष्ट देने वाले कलिकाल का नाश करके।
भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ।॥सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि माथा॥॥१॥
चाहे बुरे भाव से, क्रोध से या आलस्य से ही नाम क्यों न जपा जाए, फिर भी दसों दिशाओं में मंगल होता है। उसी नाम का स्मरण करके, मैं श्रीरघुनाथजी को मस्तक झुकाकर उनकी गुण-गाथा कहता हूँ।
मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती॥राम सुस्वामि कुसेवकु मोसो। निज दिसि देखि दयानिधि पोसो॥॥२॥
मुझे तो वही सब प्रकार से सुधारेंगे, जिनकी कृपा किसी भी कृपा से कम नहीं होती। श्रीराम उत्तम स्वामी हैं और मुझसा कुसेवक कोई नहीं — फिर भी वे दयानिधि अपनी ही ओर से मेरा पालन-पोषण करते हैं।
लोकहुँ बेद सुसाहिब रीतीं। बिनय सुनत पहिचानत प्रीती॥गनी गरीब ग्रामनर नागर। पंडित मूढ़ मलीन उजागर॥॥३॥
लोक और वेद दोनों में उत्तम स्वामी की यही रीति है कि वह सेवक की विनती सुनकर उसका प्रेम पहचान लेता है — चाहे वह धनी हो या गरीब, गाँव का हो या नगर का, पंडित हो या मूर्ख, मलिन हो या उजला।
सुकबि कुकबि निज मति अनुहारी। नृपहि सराहत सब नर नारी॥साधु सुजान सुसील नृपाला। ईस अंस भव परम कृपाला॥॥४॥
अच्छे-बुरे सभी कवि अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार राजा की प्रशंसा करते हैं, और सभी नर-नारी भी उसे सराहते हैं। साधु, सुज्ञ, सुशील राजा वस्तुतः ईश्वर के ही अंश हैं और संसार में परम कृपालु माने जाते हैं।
सुनि सनमानहिं सबहि सुबानी। भनिति भगति नति गति पहिचानी॥यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ। जान सिरोमनि कोसलराऊ॥॥५॥
राजा सबकी बात सुनकर मीठी वाणी से सबका सम्मान करता है — रचना, भक्ति, विनम्रता और चाल-ढाल को पहचानकर। यह तो साधारण राजाओं का स्वभाव है, पर कोसलराज श्रीराम तो शिरोमणि हैं, वे इससे भी बढ़कर जानते हैं।
रीझत राम सनेह निसोतें। को जग मंद मलिनमति मोतें॥॥६॥
श्रीराम तो केवल निश्छल स्नेह देखकर ही रीझ जाते हैं — नहीं तो संसार में मुझसे बढ़कर मंदबुद्धि और मलिन-मति कौन होगा।
सठ सेवक की प्रीति रुचि रखिहहिं राम कृपालु।उपल किए जलजान जेहिं सचिव सुमति कपि भालु॥२८(क)॥
कृपालु श्रीराम मूर्ख सेवक की प्रीति को भी सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं — जिन्होंने पत्थरों को भी जलयान बना दिया और वानर-भालुओं को सुबुद्धि मंत्री बना लिया।
हौहु कहावत सबु कहत राम सहत उपहास।साहिब सीतानाथ सो सेवक तुलसीदास॥२८(ख)॥
मैं भले ही स्वयं को सेवक कहलाता हूँ, और सब मेरा उपहास करते हैं, पर श्रीराम इसे सह लेते हैं — क्योंकि स्वामी तो सीतापति हैं, और सेवक तुलसीदास उन्हीं का है।
अति बड़ि मोरि ढिठाई खोरी। सुनि अघ नरकहुँ नाक सकोरी॥समुझि सहम मोहि अपडर अपनें। सो सुधि राम कीन्हि नहिं सपनें॥॥१॥
मेरी धृष्टता और दोष इतने बड़े हैं कि उन्हें सुनकर नरक भी अपनी नाक सिकोड़ ले। यह समझकर मुझे अपने ही भय से डर लगता है, पर श्रीराम ने स्वप्न में भी कभी उसकी सुधि नहीं ली।
सुनि अवलोकि सुचित चख चाही। भगति मोरि मति स्वामि सराही॥कहत नसाइ होइ हियँ नीकी। रीझत राम जानि जन जी की॥॥२॥
मेरी विनती सुनकर, सुंदर नेत्रों से देखकर, मेरी भक्ति और बुद्धि को स्वामी ने सराहा है। कहते ही सारा दोष मिट जाता है, हृदय में शुभता आ जाती है — क्योंकि श्रीराम अपने सेवक के हृदय की बात जानकर ही रीझ जाते हैं।
रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की॥जेहिं अघ बधेउ ब्याध जिमि बाली। फिरि सुकंठ सोइ कीन्ह कुचाली॥॥३॥
प्रभु के मन में सेवक की भूल कभी टिकती नहीं, पर वे उसके हृदय की सैकड़ों बार सुधि लेते हैं। जिस पाप के लिए बाली को शिकारी की भाँति मारा गया, फिर भी सुग्रीव ने भी वैसी ही कुचाल की थी।
सोइ करतूति बिभीषन केरी। सपनेहुँ सो न राम हियँ हेरी॥ते भरतहि भेंटत सनमाने। राजसभाँ रघुबीर बखाने॥॥४॥
विभीषण की भी वैसी ही करतूत थी, पर श्रीराम ने स्वप्न में भी उसे अपने हृदय में नहीं रखा। जब वे भरतजी से मिले तो उन्होंने सबका सम्मान किया, राजसभा में स्वयं रघुवीर ने ही सबकी प्रशंसा की।
प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आपु समान।तुलसी कहूँ न राम से साहिब सीलनिधान॥२९(क)॥
प्रभु स्वयं वृक्ष के नीचे बैठे और वानरों को डाल पर बैठाकर अपने समान सम्मान दिया — तुलसीदास कहते हैं कि श्रीराम जैसा शीलनिधान स्वामी कहीं नहीं मिलता।
राम निकाईं रावरी है सबही को नीक।जौं यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक॥२९(ख)॥
हे राम, आपकी भलाई सबके लिए ही अच्छी है — यदि यह सदा सच है, तो तुलसीदास का भी भला अवश्य होगा।
एहि बिधि निज गुन दोष कहि सबहि बहुरि सिरु नाइ।बरनउँ रघुबर बिसद जसु सुनि कलि कलुष नसाइ॥२९(ग)॥
इस प्रकार अपने गुण-दोष कहकर, सबको फिर से सिर झुकाकर, अब मैं श्रीरघुनाथजी का निर्मल यश वर्णन करता हूँ, जिसे सुनते ही कलियुग के पाप नष्ट हो जाते हैं।
जागबलिक जो कथा सुहाई। भरद्वाज मुनिबरहि सुनाई॥कहिहउँ सोइ संबाद बखानी। सुनहुँ सकल सज्जन सुखु मानी॥॥१॥
याज्ञवल्क्य मुनि ने जो सुहावनी कथा भरद्वाज मुनि को सुनाई थी, मैं उसी संवाद का विस्तार से वर्णन करूँगा — हे सज्जनो, सुख मानकर सब उसे सुनिए।
संभु कीन्ह यह चरित सुहावा। बहुरि कृपा करि उमहि सुनावा॥सोइ सिव कागभुसुंडिहि दीन्हा। राम भगत अधिकारी चीन्हा॥॥२॥
यह सुहावना चरित्र सबसे पहले शिवजी ने रचा, फिर कृपा करके उन्होंने इसे पार्वतीजी को सुनाया। शिवजी ने ही राम-भक्तों में अधिकारी जानकर इसे काकभुशुंडिजी को दिया।
तेहि सन जागबलिक पुनि पावा। तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति गावा॥ते श्रोता बकता समसीला। सवँदरसी जानहिं हरिलीला॥॥३॥
उन्हीं से याज्ञवल्क्य मुनि ने यह कथा पाई, और उन्होंने फिर भरद्वाज मुनि के सामने इसे गाया। ये सब श्रोता और वक्ता समान शील वाले हैं, जो हरि-लीला को भली-भाँति जानते हैं।
जानहिं तीनि काल निज ग्याना। करतल गत आमलक समाना॥औरउ जे हरिभगत सुजाना। कहहिं सुनहिं समुझहिं बिधि नाना॥॥४॥
वे अपने ज्ञान से तीनों कालों को हाथ में रखे आँवले के समान स्पष्ट जानते हैं। इनके अतिरिक्त भी जो सुज्ञ हरि-भक्त हैं, वे भी नाना प्रकार से इस कथा को कहते, सुनते और समझते हैं।
मैं पुनि निज गुर सन सुनी कथा सो सूकरखेत।समुझी नहिं तसि बालपन तब अति रहेउँ अचेत॥३०(क)॥
मैंने भी यह कथा सूकरक्षेत्र में अपने गुरु से सुनी थी, परंतु उस समय बचपन के कारण मैं अत्यंत अचेत था और उसे वैसी नहीं समझ सका।
श्रोता बकता ग्याननिधि कथा राम के गूढ़।किमि समुझौं मैं जीव जड़ कलि मल ग्रसित बिमूढ़॥३०(ख)॥
श्रोता और वक्ता दोनों ज्ञान के भंडार थे, और श्रीराम की यह कथा भी अत्यंत गूढ़ है — मैं जैसा जड़ जीव, कलियुग के पापों से ग्रसित मूढ़, इसे कैसे समझ पाता।
तदपि कही गुर बारहिं बारा। समुझि परी कछु मति अनुसारा॥भाषाबद्ध करबि मैं सोई। मोरें मन प्रबोध जेहिं होई॥॥१॥
फिर भी गुरुजी ने यह कथा बार-बार कही, जिससे मेरी बुद्धि के अनुसार कुछ समझ में आ गई। उसी को मैं भाषा में बद्ध करूँगा, जिससे मेरे मन को भी बोध हो सके।
जस कछु बुधि बिबेक बल मेरें। तस कहिहउँ हियँ हरि के प्रेरें॥निज संदेह मोह भ्रम हरनी। करउँ कथा भव सरिता तरनी॥॥२॥
जैसी भी मेरी बुद्धि और विवेक की शक्ति है, हृदय में हरि की प्रेरणा से मैं वैसा ही कहूँगा। अपने संदेह, मोह और भ्रम को हरने वाली, संसार-नदी को पार कराने वाली नाव के समान यह कथा मैं रचता हूँ।
बुध बिश्राम सकल जन रंजनि। रामकथा कलि कलुष बिभंजनि॥रामकथा कलि पंनग भरनी। पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी॥॥३॥
राम-कथा विद्वानों के लिए विश्राम-स्थल है, सबका मन रंजित करने वाली और कलियुग के पापों का नाश करने वाली है। यह कलियुग रूपी सर्प के लिए गरुड़-मंत्र के समान है, और विवेक रूपी अग्नि प्रकट करने के लिए अरणी काष्ठ के समान है।
रामकथा कलि कामद गाई। सुजन सजीवनि मूरि सुहाई॥सोइ बसुधातल सुधा तरंगिनि। भय भंजनि भ्रम भेक भुअंगिनि॥॥४॥
राम-कथा कलियुग में कामधेनु गाय के समान इच्छित फल देने वाली, सज्जनों के लिए संजीवनी बूटी के समान है। यह पृथ्वी पर अमृत की नदी है, भय का नाश करने वाली और भ्रम रूपी मेंढक के लिए सर्पिणी के समान है।
असुर सेन सम नरक निकंदिनि। साधु बिबुध कुल हित गिरिनंदिनि॥संत समाज पयोधि रमा सी। बिस्व भार भर अचल छमा सी॥॥५॥
यह राक्षस-सेना के समान नरक का नाश करने वाली, साधु-देवगण के हित के लिए पार्वतीजी के समान है। संत-समाज रूपी समुद्र के लिए यह लक्ष्मी के समान है, और विश्व का सारा भार धारण करने में अचल पृथ्वी के समान है।
जम गन मुहँ मसि जग जमुना सी। जीवन मुकुति हेतु जनु कासी॥रामहि प्रिय पावनि तुलसी सी। तुलसिदास हित हियँ हुलसी सी॥॥६॥
यह यमदूतों के मुँह पर कालिख के समान और संसार के लिए यमुना नदी के समान है, तथा जीवन-मुक्ति के लिए मानो काशी के समान है। यह राम को तुलसी के पत्तों के समान प्रिय और पावन है, और तुलसीदास के हृदय को हुलसाने वाली है।
सिवप्रय मेकल सैल सुता सी। सकल सिद्धि सुख संपति रासी॥सदगुन सुरगन अंब अदिति सी। रघुबर भगति प्रेम परमिति सी॥॥७॥
यह शिवजी को प्रिय नर्मदा नदी के समान है, समस्त सिद्धियों, सुखों और संपत्तियों की राशि है। यह सद्गुणों और देवताओं की माता अदिति के समान है, और श्रीरघुनाथजी की भक्ति व प्रेम की चरम सीमा के समान है।
राम कथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु।तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुबीर बिहारु॥३१॥
राम-कथा मानो मंदाकिनी नदी है, मन ही सुंदर चित्रकूट पर्वत है — तुलसीदास कहते हैं कि इसमें सीता-रघुवीर का सुंदर स्नेह-वन विहार करता है।
राम चरित चिंतामनि चारू। संत सुमति तिय सुभग सिंगारू॥जग मंगल गुन ग्राम राम के। दानि मुकुति धन धरम धाम के॥॥१॥
राम-चरित्र एक सुंदर चिंतामणि है, संत-सुबुद्धि रूपी स्त्री का सुंदर श्रृंगार है। यह जगत का मंगल करने वाला, राम के गुण-समूहों से युक्त, तथा मुक्ति, धन और धर्म का दाता है।
सदगुर ग्यान बिराग जोग के। बिबुध बेद भव भीम रोग के॥जननि जनक सिय राम प्रेम के। बीज सकल ब्रत धरम नेम के॥॥२॥
यह ज्ञान, वैराग्य और योग के लिए सद्गुरु के समान है, संसार रूपी भयंकर रोग के लिए देवताओं और वेदों के समान वैद्य है। यह सीता-राम के प्रेम की जननी-जनक है, और समस्त व्रत-धर्म-नियमों का बीज है।
समन पाप संताप सोक के। प्रिय पालक परलोक लोक के॥सचिव सुभट भूपति बिचार के। कुंभज लोभ उदधि अपार के॥॥३॥
यह पाप, संताप और शोक को शांत करने वाली है, लोक-परलोक दोनों की प्रिय पालक है। यह विचारशील राजा के लिए उत्तम मंत्री और वीर सेनापति के समान है, और अपार लोभ-सागर को सोखने के लिए अगस्त्य मुनि के समान है।
काम कोह कलिमल करिगन के। केहरि सावक जन मन बन के॥अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के। कामद घन दारिद दवारि के॥॥४॥
यह काम-क्रोध और कलियुग के पापरूपी हाथियों के लिए सिंह-शावक के समान है, और भक्तों के मन-वन के लिए भी। यह पूज्य अतिथि है, शिवजी को अत्यंत प्रिय है, इच्छाएँ पूर्ण करने वाले मेघ के समान है, और दरिद्रता को जलाने वाली दावाग्नि के समान है।
मंत्र महामनि बिषय ब्याल के। मेटत कठिन कुअंक भाल के॥हरन मोह तम दिनकर कर से। सेवक सालि पाल जलधर से॥॥५॥
यह विषय-सर्प के लिए महामणि-मंत्र के समान है, जो ललाट पर लिखे कठिन दुर्भाग्य को भी मिटा देती है। यह मोह रूपी अंधकार को हरने के लिए सूर्य-किरणों के समान है, और सेवक रूपी धान की फसल की रक्षा करने वाले बादल के समान है।
अभिमत दानि देवतरु बर से। सेवत सुलभ सुखद हरि हर से॥सुकबि सरद नभ मन उडगन से। रामभगत जन जीवन धन से॥॥६॥
यह इच्छित फल देने में कल्पवृक्ष के समान है, सेवा करने में सुलभ और सुखदायी विष्णु-शिव के समान है। यह अच्छे कवियों के मन के लिए शरद ऋतु के आकाश में तारागण के समान है, और राम-भक्तों के लिए जीवन-धन के समान है।
सकल सुकृत फल भूरि भोग से। जग हित निरुपधि साधु लोग से॥सेवक मन मानस मराल से। पावक गंग तंरग माल से॥॥७॥
यह समस्त पुण्यों के फल और प्रचुर भोगों के समान है, तथा निष्कपट रूप से जगत का हित करने वाले साधु-पुरुषों के समान है। यह सेवक के मन रूपी मानसरोवर में विचरने वाले हंस के समान है, और पवित्र गंगा की तरंगमाला के समान है।
कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाषंड।दहन राम गुन ग्राम जिमि इंधन अनल प्रचंड॥३२(क)॥
कुमार्ग, कुतर्क, कुचाल तथा कलियुग के कपट, दंभ और पाखंड को, श्रीराम के गुण-समूह उसी प्रकार जला देते हैं जैसे प्रचंड अग्नि लकड़ी को जला देती है।
रामचरित राकेस कर सरिस सुखद सब काहु।सज्जन कुमुद चकोर चित हित बिसेषि बड़ लाहु॥३२(ख)॥
राम-चरित्र पूर्णिमा के चंद्रमा की किरणों के समान सबको सुख देने वाला है, विशेषकर सज्जन रूपी कुमुद और चकोर के हृदय के लिए यह बड़ा लाभ है।
कीन्हि प्रस्न जेहि भाँति भवानी। जेहि बिधि संकर कहा बखानी॥सो सब हेतु कहब मैं गाई। कथाप्रबंध बिचित्र बनाई॥॥१॥
जिस प्रकार पार्वतीजी को प्रसन्न किया गया और जिस विधि शिवजी ने यह कथा विस्तार से कही, वह सारा कारण मैं गाकर कहूँगा, इस कथा को एक विचित्र प्रबंध के रूप में रचकर।
जेहि यह कथा सुनी नहिं होई। जनि आचरजु करे सुनि सोई॥कथा अलौकिक सुनहिं जे ग्यानी। नहिं आचरजु करहिं अस जानी॥
जिसने यह कथा पहले न सुनी हो, वह इसे सुनकर आश्चर्य न करे। जो ज्ञानी इस अलौकिक कथा को सुनते हैं, वे आश्चर्य नहीं करते,
रामकथा के मिति जग नाहीं। असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं॥नाना भाँति राम अवतारा। रामायन सत कोटि अपारा॥
यह जानकर कि राम-कथा की कोई सीमा संसार में नहीं है — उनके मन में यह दृढ़ विश्वास है। श्रीराम के अनेक प्रकार के अवतार हुए हैं, और रामायण भी करोड़ों प्रकार की अपार हैं।
कलपभेद हरिचरित सुहाए। भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए॥करिअ न संसय अस उर आनी। सुनिअ कथा सारद रति मानी॥
कल्पभेद से हरिचरित्र की सुंदर कथाएँ मुनीश्वरों ने अनेक प्रकार से गाई हैं — मन में यह संशय न करें, वरन् श्रद्धापूर्वक सरस्वती की यह कथा प्रेमपूर्वक सुनें।
राम अनंत अनंत गुन अमित कथा बिस्तार।सुनि आचरजु न मानिहहिं जिन्ह कें बिमल बिचार॥३३॥
श्रीराम अनंत हैं, उनके गुण अनंत हैं, और उनकी कथा का विस्तार भी असीम है — जिनकी बुद्धि निर्मल और विवेकपूर्ण है, वे इसे सुनकर आश्चर्य नहीं मानते।
एहि बिधि सब संसय करि दूरी। सिर धरि गुर पद पंकज धूरी॥पुनि सबही बिनवउँ कर जोरी। करत कथा जेहिं लाग न खोरी॥॥१॥
इस प्रकार सारे संशय दूर करके, गुरु के चरण-कमलों की धूल को सिर पर धारण कर, फिर मैं हाथ जोड़कर सबसे विनती करता हूँ कि यह कथा कहते हुए मुझे कोई दोष न लगे।
सादर सिवहि नाइ अब माथा। बरनउँ बिसद राम गुन गाथा॥संबत सोरह से एकतीसा। करउँ कथा हरि पद धरि सीसा॥॥२॥
अब शिवजी को आदरपूर्वक मस्तक नवाकर, मैं श्रीराम की निर्मल गुण-गाथा का वर्णन करता हूँ। संवत् सोलह सौ इकतीस में, हरि-चरणों में सिर रखकर मैं यह कथा रचता हूँ।
नौमी भौम बार मधु मासा। अवधपुरीं यह चरित प्रकासा॥जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं। तीरथ सकल तहाँ चलि आवहिं॥॥३॥
चैत्र मास की नवमी तिथि, मंगलवार के दिन, अयोध्यापुरी में यह चरित्र प्रकाशित हुआ। जिस दिन श्रीराम का जन्म हुआ, वेद उसका गान करते हैं, और समस्त तीर्थ वहाँ चलकर आते हैं।
असुर नाग खग नर मुनि देवा। आइ करहिं रघुनायक सेवा॥जन्म महोत्सव रचहिं सुजाना। करहिं राम कल कीरति गाना॥॥४॥
असुर, नाग, पक्षी, मनुष्य, मुनि और देवता — सभी आकर श्रीरघुनाथजी की सेवा करते हैं। सुज्ञ जन जन्म-महोत्सव रचाते हैं और श्रीराम की सुंदर कीर्ति का गान करते हैं।
मज्जहि सज्जन बृंद बहु पावन सरजू नीर।जपहिं राम धरि ध्यान उर सुंदर स्याम सरीर॥३४॥
उस दिन सज्जन लोग बड़ी संख्या में पवित्र सरयू के जल में स्नान करते हैं, और हृदय में श्रीराम के सुंदर श्याम शरीर का ध्यान धरकर उनका नाम जपते हैं।
दरस परस मज्जन अरु पाना। हरइ पाप कह बेद पुराना॥नदी पुनीत अमित महिमा अति। कहि न सकइ सारद बिमलमति॥॥१॥
वेद-पुराण कहते हैं कि सरयू नदी का दर्शन, स्पर्श, स्नान और उसका जल पीना — सभी पाप हर लेते हैं। इस पवित्र नदी की महिमा इतनी अपार है कि उसे निर्मल बुद्धि वाली सरस्वतीजी भी पूरी तरह वर्णन नहीं कर सकतीं।
राम धामदा पुरी सुहावनि। लोक समस्त बिदित अति पावनि॥चारि खानि जग जीव अपारा। अवध तजे तनु नहिं संसारा॥॥२॥
अयोध्यापुरी श्रीराम-धाम देने वाली, सुहावनी और अत्यंत पवित्र है, जो समस्त लोकों में विख्यात है। चारों योनियों के जितने भी अपार जीव अयोध्या में शरीर त्यागते हैं, वे फिर संसार में नहीं लौटते।
सब बिधि पुरी मनोहर जानी। सकल सिद्धिप्रद मंगल खानी॥बिमल कथा कर कीन्ह अरंभा। सुनत नसाहिं काम मद दंभा॥॥३॥
इस पुरी को सब प्रकार से मनोहर, समस्त सिद्धियाँ देने वाली और मंगल की खान जानकर, मैंने इस निर्मल कथा का आरंभ किया — जिसे सुनते ही काम, मद और दंभ नष्ट हो जाते हैं।
रामचरितमानस एहि नामा। सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा॥मन करि बिषय अनल बन जरई। होइ सुखी जौं एहिं सर परई॥॥४॥
इस ग्रंथ का नाम रामचरितमानस है — इसे कानों से सुनते ही मन को विश्राम प्राप्त होता है। यदि मन विषय-वासना रूपी अग्नि से जल रहा हो, तो इस मानसरोवर में पड़ते ही वह सुखी हो जाता है।
रामचरितमानस मुनि भावन। बिरचेउ संभु सुहावन पावन॥त्रिबिध दोष दुख दारिद दावन। कलि कुचालि कलि कलुष नसावन॥॥५॥
यह रामचरितमानस मुनियों को अत्यंत भाता है, इसे शिवजी ने सुंदर और पावन रूप में रचा। यह तीनों प्रकार के दोष, दुख और दरिद्रता को दबाने वाला है, और कलियुग की कुचालों तथा पापों का नाश करने वाला है।
रचि महेस निज मानस राखा। पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा॥तातें रामचरितमानस बर। धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर॥॥६॥
शिवजी ने इसे रचकर पहले अपने मानस (मन) में रखा, फिर उचित अवसर पाकर पार्वतीजी से कहा। इसीलिए इसका नाम श्रीरामचरितमानस रखा गया — शिवजी ने हृदय में देखकर हर्षित होकर यह नाम धरा।
कहउँ कथा सोइ सुखद सुहाई। सादर सुनहु सुजन मन लाई॥॥७॥
अब मैं वही सुखद और सुहावनी कथा कहता हूँ — हे सज्जनो, आदरपूर्वक मन लगाकर सुनिए।
जस मानस जेहि बिधि भयउ जग प्रचार जेहि हेतु।अब सोइ कहउँ प्रसंग सब सुमिरि उमा बृषकेतु॥३५॥
यह मानस जिस प्रकार बना और जिस कारण संसार में इसका प्रचार हुआ, वह सारा प्रसंग अब मैं पार्वती और शिवजी का स्मरण करके कहता हूँ।
संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी। रामचरितमानस कबि तुलसी॥करइ मनोहर मति अनुहारी। सुजन सुचित सुनि लेहु सुधारी॥॥१॥
शिवजी की कृपा से मेरे हृदय में सुबुद्धि हुलस उठी, और कवि तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की। यह अपनी बुद्धि के अनुसार मनोहर बनाने का प्रयत्न है — हे सज्जनो, सुचित होकर सुनिए और इसकी त्रुटियों को सुधार लीजिए।
सुमति भूमि थल हृदय अगाधू। बेद पुरान उदधि घन साधू॥बरषहिं राम सुजस बर बारी। मधुर मनोहर मंगलकारी॥॥२॥
सुबुद्धि रूपी भूमि पर हृदय ही अथाह सरोवर है, वेद-पुराण रूपी समुद्र से साधु रूपी बादल उठते हैं, और वे श्रीराम के सुयश रूपी मधुर, मनोहर और मंगलकारी जल की वर्षा करते हैं।
लीला सगुन जो कहहिं बखानी। सोइ स्वच्छता करइ मल हानी॥प्रेम भगति जो बरनि न जाई। सोइ मधुरता सुसीतलताई॥॥३॥
जो सगुण लीला का विस्तार से वर्णन करते हैं, वह वर्णन ही जल की निर्मलता है जो मन का मैल दूर करता है। जो प्रेम-भक्ति वर्णन से परे है, वही इस जल की मिठास और शीतलता है।
सो जल सुकृत सालि हित होई। राम भगत जन जीवन सोई॥मेधा महि गत सो जल पावन। सकिलि श्रवन मग चलेउ सुहावन॥
यह जल पुण्य रूपी धान की खेती के लिए हितकारी है, और राम-भक्तों के लिए जीवन के समान है। यह पावन जल बुद्धि रूपी भूमि पर गिरकर, कानों के मार्ग से होकर सुहावने ढंग से बहा,
भरेउ सुमानस सुथल थिराना। सुखद सीत रुचि चारू चिराना॥
और अंततः मानस रूपी सुंदर स्थान में जाकर स्थिर हो गया — सुखद, शीतल, रुचिकर और चिरस्थायी।
सुठि सुंदर संबाद बर बिरचे बुद्धि बिचारि।तेइ एहि पावन सुभग सर घाट मनोहर चारि॥॥३६॥
बुद्धिपूर्वक विचार कर अत्यंत सुंदर संवादों की रचना की गई है — यही इस पावन सरोवर के चार मनोहर और सुंदर घाट हैं।
सप्त प्रबंध सुभग सोपाना। ग्यान नयन निरखत मन माना॥रघुपति महिमा अगुन अबाधा। बरनब सोइ बर बारि अगाधा॥॥१॥
इसकी सात कांडें सुंदर सीढ़ियों के समान हैं, जिन्हें ज्ञान-नेत्रों से देखकर मन प्रसन्न होता है। श्रीरघुनाथजी की निर्गुण, अबाध महिमा का वर्णन ही इस सरोवर का अथाह जल है।
राम सीय जस सलिल सुधासम। उपमा बीचि बिलास मनोरम॥पुरइनि सघन चारु चौपाई। जुगुति मंजु मनि सीप सुहाई॥॥२॥
राम-सीता का यश अमृत के समान जल है, इसकी उपमाएँ मनोरम लहरों की क्रीड़ा हैं। घनी सुंदर चौपाइयाँ सुंदर सीपों के समान हैं, जिनके भीतर युक्तिपूर्ण मणि जैसे भाव छिपे हैं।
छंद सोरठा सुंदर दोहा। सोइ बहुरंग कमल कुल सोहा॥अरथ अनूप सुभाव सुभासा। सोइ पराग मकरंद सुबासा॥॥३॥
छंद, सोरठा और सुंदर दोहे मानो विविध रंगों के कमल-समूह हैं। अनुपम अर्थ, सुंदर भाव और मधुर भाषा ही इनकी पराग, मकरंद और सुगंध है।
सुकृत पुंज मंजुल अलि माला। ग्यान बिराग बिचार मराला॥धुनि अवरेब कबित गुन जाती। मीन मनोहर ते बहुभाँती॥॥४॥
पुण्य-समूह मानो सुंदर भ्रमरों की माला है, ज्ञान-वैराग्य और विचार हंस के समान हैं। काव्य की ध्वनि, अलंकार, गुण और छंद-जाति ही इसमें अनेक प्रकार की मनोहर मछलियाँ हैं।
अरथ धरम कामादिक चारी। कहब ग्यान बिग्यान बिचारी॥नव रस जप तप जोग बिरागा। ते सब जलचर चारु तड़ागा॥॥५॥
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — ये चारों पुरुषार्थ, तथा ज्ञान-विज्ञान का विचारपूर्वक कथन, और नवरस, जप, तप, योग और वैराग्य — ये सब इस सुंदर सरोवर के विविध जलचर जीव हैं।
सुकृती साधु नाम गुन गाना। ते बिचित्र जल बिहग समाना॥संतसभा चहुँ दिसि अवँराई। श्रद्धा रितु बसंत सम गाई॥॥६॥
पुण्यात्मा साधुजन जो नाम-गुण गाते हैं, वे मानो इस सरोवर के विचित्र जलपक्षी हैं। संत-समाज चारों दिशाओं में फैला बाग है, और श्रद्धा को वसंत ऋतु के समान बताया गया है।
भगति निरुपन बिबिध बिधाना। छमा दया दम लता बिताना॥सम जम नियम फूल फल ग्याना। हरि पद रति रस बेद बखाना॥॥७॥
भक्ति का विविध प्रकार से निरूपण, तथा क्षमा-दया-संयम — ये सब लताओं की छतरी हैं। शम, यम, नियम — फूल हैं, ज्ञान — फल है, और हरि-चरणों में प्रीति ही उसका रस है, ऐसा वेदों ने बखान किया है।
औरउ कथा अनेक प्रसंगा। तेइ सुक पिक बहुबरन बिहंगा॥॥८॥
इसके अतिरिक्त और भी अनेक कथा-प्रसंग हैं, वे सब मानो शुक-पिक जैसे नाना रंगों के पक्षी हैं।
पुलक बाटिका बाग बन सुख सुबिहंग बिहारु।माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारु॥३७॥
पुलकावली ही इस बाग-वाटिका का सुख है, जिसमें सुंदर पक्षी विहार करते हैं — भक्तों के सुंदर नेत्र ही माली हैं, जो स्नेह रूपी जल से इसे सींचते हैं।
जे गावहिं यह चरित सँभारे। ते एहि ताल चतुर रखवारे॥सदा सुनहिं सादर नर नारी। ते सुरबर मानस अधिकारी॥॥१॥
जो लोग इस चरित्र को सावधानी से गाते हैं, वे इस सरोवर के चतुर रखवाले हैं। जो नर-नारी सदा आदरपूर्वक इसे सुनते हैं, वे श्रेष्ठ देवताओं के समान इस मानस-सरोवर के अधिकारी हैं।
अति खल जे बिषई बग कागा। एहि सर निकट न जाहिं अभागा॥संबुक भेक सेवार समाना। इहाँ न बिषय कथा रस नाना॥॥२॥
जो अत्यंत दुष्ट, विषयी हैं, वे बगुले और कौवे के समान अभागे इस सरोवर के पास भी नहीं जाते। यहाँ सीप, मेंढक और शैवाल के समान नाना विषय-कथाओं का रस भी नहीं है।
तेहि कारन आवत हियँ हारे। कामी काक बलाक बिचारे॥आवत एहिं सर अति कठिनाई। राम कृपा बिनु आइ न जाई॥॥३॥
इसी कारण कौवे और बगुले जैसे बेचारे विषयी-कामी लोग, मन में हारकर, यहाँ आने से कतराते हैं। इस सरोवर तक आना अत्यंत कठिन है — श्रीराम की कृपा के बिना यहाँ आया ही नहीं जा सकता।
कठिन कुसंग कुपंथ कराला। तिन्ह के बचन बाघ हरि ब्याला॥गृह कारज नाना जंजाला। ते अति दुर्गम सैल बिसाला॥॥४॥
कठिन कुसंगति ही भयंकर कुमार्ग है, और दुष्टों के वचन मानो बाघ, सिंह और सर्प हैं। घर-गृहस्थी के नाना जंजाल ही मार्ग में विशाल दुर्गम पर्वत हैं।
बन बहु बिषम मोह मद माना। नदीं कुतर्क भयंकर नाना॥॥५॥
मोह, मद और अभिमान अनेक विषम वन हैं, और कुतर्क अनेक भयंकर नदियाँ हैं।
जे श्रद्धा संबल रहित नहिं संतन्ह कर साथ।तिन्ह कहुँ मानस अगम अति जिन्हहि न प्रिय रघुनाथ॥३८॥
जो श्रद्धा रूपी संबल से रहित हैं और जिन्हें संतों का साथ नहीं मिला — जिन्हें श्रीरघुनाथ प्रिय नहीं, उनके लिए यह मानस-सरोवर अत्यंत दुर्गम है।
जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोई। जातहिं नीद जुड़ाई होई॥जड़ता जाड़ बिषम उर लागा। गएहुँ न मज्जन पाव अभागा॥॥१॥
यदि कोई कष्ट सहकर वहाँ पहुँच भी जाए, तो जाते ही उसे शीतलता की जगह नींद जैसा आलस्य घेर लेता है। जड़ता और भयंकर जाड़ा हृदय में समा जाते हैं, और वह अभागा वहाँ पहुँचकर भी स्नान नहीं कर पाता।
करि न जाइ सर मज्जन पाना। फिरि आवइ समेत अभिमाना॥जौं बहोरि कोउ पूछन आवा। सर निंदा करि ताहि बुझावा॥॥२॥
वह न तो स्नान कर पाता है, न जल पी पाता है, और अभिमान सहित वापस लौट आता है। यदि फिर कोई उससे उस सरोवर के बारे में पूछे, तो वह सरोवर की निंदा करके ही उसे समझा देता है।
सकल बिघ्न ब्यापहि नहिं तेही। राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही॥सोइ सादर सर मज्जनु करई। महा घोर त्रयताप न जरई॥॥३॥
जिसे श्रीराम अपनी कृपा-दृष्टि से देखते हैं, उसे कोई विघ्न नहीं सताता — वही आदरपूर्वक इस सरोवर में स्नान कर पाता है, और फिर महाघोर त्रिविध ताप उसे नहीं जलाता।
ते नर यह सर तजहिं न काऊ। जिन्ह के राम चरन भल भाऊ॥जो नहाइ चह एहिं सर भाई। सो सतसंग करउ मन लाई॥॥४॥
जिनका श्रीराम के चरणों में सच्चा प्रेम है, वे इस सरोवर को कभी नहीं छोड़ते। हे भाई, जो इस सरोवर में स्नान करना चाहे, उसे मन लगाकर सत्संग करना चाहिए।
अस मानस मानस चख चाही। भइ कबि बुद्धि बिमल अवगाही॥भयउ हृदयँ आनंद उछाहू। उमगेउ प्रेम प्रमोद प्रबाहू॥॥५॥
इस प्रकार मन की आँखों से इस मानस-सरोवर को निहारकर, कवि की बुद्धि निर्मल होकर उसमें डूब गई। हृदय में आनंद और उत्साह भर आया, और प्रेम व आनंद का प्रवाह उमड़ पड़ा।
चली सुभग कबिता सरिता सो। राम बिमल जस जल भरिता सो॥सरजू नाम सुमंगल मूला। लोक बेद मत मंजुल कूला॥॥६॥
उसी से यह सुंदर काव्य रूपी नदी बह चली, जो श्रीराम के निर्मल यश रूपी जल से भरी है। इसका नाम सरयू है — जो सुमंगल का मूल है, और लोक-वेद के मत ही इसके सुंदर तट हैं।
नदी पुनीत सुमानस नंदिनि। कलिमल तृन तरु मूल निकंदिनि॥॥७॥
यह पवित्र नदी मानस-सरोवर की पुत्री है, जो कलियुग के पापरूपी घास-वृक्षों को जड़ से उखाड़ फेंकने वाली है।
श्रोता त्रिबिध समाज पुर ग्राम नगर दुहुँ कूल।संतसभा अनुपम अवध सकल सुमंगल मूल।॥३९॥
तीन प्रकार के श्रोता-समाज ही गाँव-नगर हैं, दोनों किनारे हैं, और अनुपम संत-सभा ही अयोध्या नगरी है — यह सब सुमंगल का मूल है।
रामभगति सुरसरितहि जाई। मिली सुकीरति सरजु सुहाई॥॥१॥
यह सुंदर कीर्ति रूपी सरयू नदी बहते-बहते जाकर राम-भक्ति रूपी गंगा में मिल गई।
सानुज राम समर जसु पावन। मिलेउ महानदु सोन सुहावन॥
छोटे भाई लक्ष्मण सहित श्रीराम का युद्ध-यश पावन है, मानो सोन नामक विशाल और सुंदर नदी में जा मिला हो।
जुग बिच भगति देवधुनि धारा। सोहति सहित सुबिरति बिचारा॥त्रिबिध ताप त्रासक तिमुहानी। राम सरुप सिंधु समुहानी॥॥२॥
दोनों धाराओं के बीच भक्ति रूपी गंगा-धारा वैराग्य और सद्विचार सहित शोभा पाती है। यह त्रिविध ताप को डराने वाला त्रिवेणी-संगम है, जो श्रीराम-स्वरूप रूपी समुद्र की ओर बढ़ता है।
मानस मूल मिली सुरसरिही। सुनत सुजन मन पावन करिही॥बिच बिच कथा बिचित्र बिभागा। जनु सरि तीर तीर बन बागा॥॥३॥
मानस-सरोवर से निकली यह नदी गंगा में जाकर मिल गई, इसे सुनकर सज्जनों का मन पावन हो जाएगा। बीच-बीच में जो विचित्र उप-कथाएँ आती हैं, वे मानो नदी तट पर बने वन-बाग हैं।
उमा महेस बिबाह बराती। ते जलचर अगनित बहुभाँती॥रघुबर जनम अनंद बधाई। भवँर तरंग मनोहरताई॥॥४॥
पार्वती-शिव विवाह की बारात ही मानो नदी में असंख्य प्रकार के जलचर जीव हैं। श्रीरघुनाथजी के जन्म का आनंद और बधाई ही नदी की मनोहर लहरें हैं।
बालचरित चहु बंधु के बनज बिपुल बहुरंग।नृप रानी परिजन सुकृत मधुकर बारिबिहंग॥४०॥
चारों भाइयों के बालचरित्र ही नदी में खिले अनेक रंगों के प्रचुर कमल हैं, और राजा-रानी तथा परिजनों के पुण्य ही इस जल पर मँडराते भ्रमर और जलपक्षी हैं।
सीय स्वयंबर कथा सुहाई। सरित सुहावनि सो छबि छाई॥नदी नाव पटु प्रस्न अनेका। केवट कुसल उतर सबिबेका॥॥१॥
सीता-स्वयंवर की सुहावनी कथा ही इस सुंदर नदी की छटा है। नदी में नाव के समान अनेक कुशल प्रश्न हैं, और उनके विवेकपूर्ण उत्तर मानो कुशल केवट हैं।
सुनि अनुकथन परस्पर होई। पथिक समाज सोह सरि सोई॥घोर धार भृगुनाथ रिसानी। घाट सुबद्ध राम बर बानी॥॥२॥
इसे सुनकर लोगों में परस्पर चर्चा होती है, जिससे यह नदी पथिक-समाज से सुशोभित होती है। परशुरामजी का क्रोध ही इसकी भयंकर धारा है, और श्रीराम की सुंदर वाणी इसके सुदृढ़ घाट हैं।
सानुज राम बिबाह उछाहू। सो सुभ उमग सुखद सब काहू॥कहत सुनत हरषहिं पुलकाहीं। ते सुकृती मन मुदित नहाहीं॥॥३॥
लक्ष्मण सहित श्रीराम के विवाह का उत्साह ही इस नदी की शुभ बाढ़ है, जो सबको सुख देती है। इसे कहते-सुनते जो हर्षित और पुलकित होते हैं, वे पुण्यात्मा ही प्रसन्न मन से इसमें स्नान करते हैं।
राम तिलक हित मंगल साजा। परब जोग जनु जुरे समाजा॥काई कुमति केकई केरी। परी जासु फल बिपति घनेरी॥॥४॥
श्रीराम के राजतिलक के मंगल-आयोजन ही मानो पर्व के अवसर पर जुटा हुआ समाज है। कैकेयी की कुबुद्धि ही इस नदी की काई है, जिसके फलस्वरूप भारी विपत्ति आ पड़ी।
समन अमित उतपात सब भरतचरित जपजाग।कलि अघ खल अवगुन कथन ते जलमल बग काग॥४१॥
भरतजी का चरित्र और उनका जप-यज्ञ असंख्य उत्पातों को शांत करने वाला है। कलियुग के पाप और दुष्टों के अवगुणों का वर्णन ही इस जल की गंदगी और बगुले-कौवे हैं।
कीरति सरित छहूँ रितु रूरी। समय सुहावनि पावनि भूरी॥हिम हिमसैलसुता सिव ब्याहू। सिसिर सुखद प्रभु जनम उछाहू।॥॥१॥
यह कीर्ति-नदी छहों ऋतुओं में सुंदर है, समय-समय पर सुहावनी और अत्यंत पावन है। हेमंत ऋतु पार्वती-शिव विवाह के समान है, और शिशिर ऋतु प्रभु के जन्मोत्सव के समान सुखद है।
बरनब राम बिबाह समाजू। सो मुद मंगलमय रितुराजू॥ग्रीषम दुसह राम बनगवनू। पंथकथा खर आतप पवनू॥॥२॥
श्रीराम-विवाह के समाज का वर्णन ही आनंद-मंगलमय वसंत ऋतु है। श्रीराम का दुःसह वनगमन ग्रीष्म ऋतु के समान है, और वन-मार्ग की कथा उसकी तीखी धूप और गर्म हवा के समान है।
बरषा घोर निसाचर रारी। सुरकुल सालि सुमंगलकारी॥राम राज सुख बिनय बड़ाई। बिसद सुखद सोइ सरद सुहाई॥॥३॥
राक्षसों से घोर युद्ध वर्षा ऋतु के समान है, जो देवकुल रूपी धान की फसल के लिए मंगलकारी है। राम-राज्य का सुख, विनय और महिमा ही निर्मल, सुखद शरद ऋतु के समान सुहावनी है।
सती सिरोमनि सिय गुनगाथा। सोइ गुन अमल अनूपम पाथा॥भरत सुभाउ सुसीतलताई। सदा एकरस बरनि न जाई॥॥४॥
सतियों में शिरोमणि सीताजी के गुणों की गाथा ही इस जल की निर्मल, अनुपम गुणवत्ता है। भरतजी का स्वभाव इसकी शीतलता है, जो सदा एकरस है और जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
अवलोकनि बोलनि मिलनि प्रीति परसपर हास।भायप भलि चहु बंधु की जल माधुरी सुबास॥४२॥
आपस में देखना, बोलना, मिलना, प्रेम और हँसी-मजाक — चारों भाइयों का यह सुंदर भाईचारा ही इस जल की मिठास और सुगंध है।
आरति बिनय दीनता मोरी। लघुता ललित सुबारि न थोरी॥अदभुत सलिल सुनत गुनकारी। आस पिआस मनोमल हारी॥॥१॥
मेरी व्याकुलता, विनती और दीनता ही इस सुंदर जल की सरलता है, जो कुछ कम नहीं। यह अद्भुत जल सुनने मात्र से गुणकारी है, जो आशा रूपी प्यास और मन के मैल को हर लेता है।
राम सुप्रेमहि पोषत पानी। हरत सकल कलि कलुष गलानी॥भव श्रम सोषक तोषक तोषा। समन दुरित दुख दारिद दोषा॥॥२॥
यह जल श्रीराम के प्रति सुंदर प्रेम को पोषित करता है, और कलियुग के समस्त पाप-ग्लानि को हर लेता है। यह संसार के श्रम को सोखने वाला और संतोष को तृप्त करने वाला है, तथा पाप, दुख, दरिद्रता और दोषों को शांत करने वाला है।
काम कोह मद मोह नसावन। बिमल बिबेक बिराग बढ़ावन॥सादर मज्जन पान किए तें। मिटहिं पाप परिताप हिए तें॥॥३॥
यह काम, क्रोध, मद और मोह का नाश करने वाला है, और निर्मल विवेक तथा वैराग्य को बढ़ाने वाला है। इसमें आदरपूर्वक स्नान और पान करने से हृदय के पाप और संताप मिट जाते हैं।
जिन्ह एहि बारि न मानस धोए। ते कायर कलिकाल बिगोए॥तृषित निरखि रबि कर भव बारी। फिरिहहि मृग जिमि जीव दुखारी॥॥४॥
जिन्होंने इस जल से अपना मन नहीं धोया, वे कायर कलिकाल के हाथों नष्ट हो गए। जैसे प्यासा हिरण मृगतृष्णा के जल की ओर भटकता है, वैसे ही वे दुखी जीव इधर-उधर भटकते रहेंगे।
मति अनुहारि सुबारि गुन गन गनि मन अन्हवाइ।सुमिरि भवानी संकरहि कह कबि कथा सुहाइ॥४३(क)॥
अपनी बुद्धि के अनुसार इस सुंदर जल के गुण-समूह गिनकर और मन को उसमें स्नान कराकर, पार्वती-शिवजी का स्मरण कर, कवि अब यह सुहावनी कथा कहता है।
अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि पाइ प्रसाद।कहउँ जुगल मुनिबर्ज कर मिलन सुभग संबाद॥४३(ख)॥
अब श्रीरघुनाथजी के चरण-कमलों को हृदय में धारण कर, उनका प्रसाद पाकर, मैं दोनों श्रेष्ठ मुनियों के मिलन का सुंदर संवाद कहता हूँ।
भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा। तिन्हहि राम पद अति अनुरागा॥तापस सम दम दया निधाना। परमारथ पथ परम सुजाना॥॥१॥
भरद्वाज मुनि प्रयाग में निवास करते हैं, जिन्हें श्रीराम के चरणों में अत्यंत प्रेम है। वे तपस्वी, शम-दम और दया के भंडार तथा परमार्थ के मार्ग में परम सुज्ञ हैं।
माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई॥देव दनुज किंनर नर श्रेनी। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं॥॥२॥
जब माघ मास में सूर्य मकर राशि में आता है, तब सभी लोग तीर्थराज प्रयाग आते हैं। देवता, दानव, किन्नर और मनुष्यों की पंक्तियाँ आदरपूर्वक त्रिवेणी में स्नान करती हैं।
पूजहि माधव पद जलजाता। परसि अखय बटु हरषहिं गाता॥भरद्वाज आश्रम अति पावन। परम रम्य मुनिबर मन भावन॥॥३॥
वे माधव के चरण-कमलों की पूजा करते हैं, अक्षयवट का स्पर्श कर उनका शरीर पुलकित हो उठता है। भरद्वाज मुनि का आश्रम अत्यंत पावन, परम रमणीय और श्रेष्ठ मुनियों के मन को भाने वाला है।
तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा। जाहिं जे मज्जन तीरथराजा॥मज्जहिं प्रात समेत उछाहा। कहहिं परसपर हरि गुन गाहा॥॥४॥
जो लोग तीर्थराज प्रयाग में स्नान करने जाते हैं, वहाँ मुनियों-ऋषियों का समागम होता है। वे प्रातःकाल उत्साहपूर्वक स्नान करते हैं और आपस में हरि की गुण-गाथाएँ कहते हैं।
ब्रह्म निरूपम धरम बिधि बरनहिं तत्त्व बिभाग।कहहिं भगति भगवंत कै संजुत ग्यान बिराग॥४४॥
वे ब्रह्म का निरूपण करते हैं, धर्म-विधि और तत्त्वों के भेद का वर्णन करते हैं, तथा ज्ञान-वैराग्य सहित भगवान की भक्ति का वर्णन करते हैं।
एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं। पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं॥प्रति संबत अति होइ अनंदा। मकर मज्जि गवनहिं मुनिबृंदा॥॥१॥
इस प्रकार पूरे माघ मास स्नान करके, फिर सब अपने-अपने आश्रमों को लौट जाते हैं। प्रत्येक वर्ष यह अत्यंत आनंददायी होता है — मकर स्नान करके मुनि-समूह अपने स्थान को चले जाते हैं।
एक बार भरि मकर नहाए। सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए॥जगबालिक मुनि परम बिबेकी। भरद्वाज राखे पद टेकी॥॥२॥
एक बार मकर-स्नान पूरा करके सभी मुनीश्वर अपने आश्रमों को चले गए। परम विवेकी याज्ञवल्क्य मुनि को भरद्वाज मुनि ने चरण पकड़कर रोक लिया।
सादर चरन सरोज पखारे। अति पुनीत आसन बैठारे॥करि पूजा मुनि सुजस बखानी। बोले अति पुनीत मृदु बानी॥॥३॥
उन्होंने आदरपूर्वक याज्ञवल्क्य मुनि के चरण-कमल धोए और अत्यंत पवित्र आसन पर बैठाया। पूजा करके और मुनि के सुयश का बखान करके, वे अत्यंत पवित्र और कोमल वाणी में बोले।
नाथ एक संसउ बड़ मोरें। करगत बेदतत्व सबु तोरें॥कहत सो मोहि लागत भय लाजा। जौं न कहउँ बड़ होइ अकाजा॥॥४॥
हे नाथ, मेरे मन में एक बड़ा संशय है, यद्यपि वेद का सारा तत्त्व आपकी मुट्ठी में है। उसे कहने में मुझे भय और लज्जा लगती है, पर यदि न कहूँ तो बड़ी हानि होगी।
संत कहहिं असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव।होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किए दुराव॥४५७॥
संतजन ऐसी नीति कहते हैं, और वेद-पुराण तथा मुनि भी यही गाते हैं कि गुरु से कुछ छिपाने पर हृदय में निर्मल विवेक नहीं होता।
अस बिचारि प्रगटउँ निज मोहू। हरहु नाथ करि जन पर छोहू॥राम नाम कर अमित प्रभावा। संत पुरान उपनिषद गावा॥॥१॥
ऐसा विचारकर मैं अपना मोह प्रकट करता हूँ — हे नाथ, अपने सेवक पर स्नेह करके इसे दूर कीजिए। राम-नाम का अमित प्रभाव है, जिसे संत, पुराण और उपनिषद सभी गाते हैं।
संतत जपत संभु अबिनासी। सिव भगवान ग्यान गुन रासी॥आकर चारि जीव जग अहहीं। कासीं मरत परम पद लहहीं॥॥२॥
अविनाशी शिवजी निरंतर इसी नाम को जपते हैं — शिवजी भगवान ज्ञान और गुणों की राशि हैं। संसार में चारों योनियों के जीव, काशी में मरकर परम पद प्राप्त कर लेते हैं।
सुनि राम महिमा मुनिराया। सिव उपदेसु करत करि दाया॥रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही। कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही॥॥३॥
श्रीराम की महिमा सुनकर, हे मुनिराज, शिवजी दया करके उपदेश करते हैं। हे कृपानिधि, मैं आपसे पूछता हूँ — यह राम कौन प्रभु हैं, मुझे समझाकर कहिए।
एक राम अवधेस कुमारा। तिन्ह कर चरित बिदित संसारा॥नारि बिरहँ दुखु लहेउ अपारा। भयउ रोषु रन रावनु मारा॥॥४॥
एक राम तो अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र हैं, जिनका चरित्र संसार में विख्यात है। उन्होंने पत्नी के वियोग में अपार दुख सहा, फिर क्रोधित होकर युद्ध में रावण को मारा।
प्रभु सोइ राम कि अपर कोउ जाहि जपत त्रिपुरारि।सत्यधाम सर्बग्य तुम्ह कहहु बिबेकु बिचारि॥४६॥
क्या वही राम प्रभु हैं जिन्हें शिवजी जपते हैं, या कोई और? आप सत्यधाम और सर्वज्ञ हैं, विवेकपूर्वक विचारकर मुझे बताइए।
जैसे मिटै मोर भ्रम भारी। कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी॥जागबलिक बोले मुसुकाई। तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई॥॥१॥
जैसे मेरा यह भारी भ्रम मिट जाए, हे नाथ, वह कथा विस्तार से कहिए। याज्ञवल्क्य मुनि मुस्कुराकर बोले — तुम्हें तो श्रीरघुनाथजी की प्रभुता पहले से ही ज्ञात है।
राममगत तुम्ह मन क्रम बानी। चतुराई तुम्हारी मैं जानी॥चाहहु सुने राम गुन गूढ़ा। कीन्हिहु प्रस्न मनहुँ अति मूढ़ा॥॥२॥
तुम मन-वचन-कर्म से राम-भक्त हो, तुम्हारी चतुराई मैं जानता हूँ। तुम श्रीराम के गूढ़ गुण सुनना चाहते हो, इसीलिए मानो अनजान बनकर यह प्रश्न किया है।
तात सुनहु सादर मनु लाई। कहउँ राम के कथा सुहाई॥महामोहु महिषेसु बिसाला। रामकथा कालिका कराला॥॥३॥
हे तात, आदरपूर्वक मन लगाकर सुनो, मैं श्रीराम की सुहावनी कथा कहता हूँ। महामोह मानो विशाल यम है, और राम-कथा उसके लिए भयंकर काली देवी के समान है।
रामकथा ससि किरन समाना। संत चकोर करहिं जेहि पाना॥ऐसेइ संसय कीन्ह भवानी। महादेव तब कहा बखानी॥॥४॥
राम-कथा चन्द्रमा की किरणों के समान है, जिसे संत रूपी चकोर पीते हैं। ऐसा ही संशय पार्वतीजी ने भी किया था, तब महादेव ने उन्हें विस्तार से बताया था।
कहउँ सो मति अनुहारि अब उमा संभु संबाद।भयउ समय जेहि हेतु जेहि सुनु मुनि मिटिहि बिषाद॥४७॥
अब मैं अपनी बुद्धि के अनुसार वही पार्वती-शिव संवाद कहता हूँ — यह जिस समय और जिस कारण हुआ, हे मुनि, उसे सुनने से तुम्हारा विषाद मिट जाएगा।
एक बार त्रेता जुग माहीं। संभु गए कुंभज रिषि पाहीं॥संग सती जगजननि भवानी। पूजे रिषि अखिलेस्वर जानी॥॥१॥
एक बार त्रेता युग में शिवजी अगस्त्य मुनि के पास गए। साथ में जगत-जननी सती पार्वती भी थीं। ऋषि ने उन्हें संपूर्ण जगत का स्वामी जानकर पूजा की।
रामकथा मुनीबर्ज बखानी। सुनी महेस परम सुखु मानी॥रिषि पूछी हरिभगति सुहाई। कही संभु अधिकारी पाई॥॥२॥
श्रेष्ठ मुनि अगस्त्य ने राम-कथा का बखान किया, जिसे महादेव ने परम सुख मानकर सुना। फिर ऋषि ने सुंदर हरि-भक्ति के विषय में पूछा, और शिवजी ने उन्हें अधिकारी जानकर बताया।
कहत सुनत रघुपति गुन गाथा। कछु दिन तहाँ रहे गिरिनाथा॥मुनि सन बिदा मागि त्रिपुरारी। चले भवन सँग दच्छकुमारी॥॥३॥
श्रीरघुनाथजी की गुण-गाथा कहते-सुनते शिवजी वहाँ कुछ दिन रहे। फिर मुनि से विदा माँगकर, दक्ष-पुत्री सती के साथ शिवजी अपने धाम को चले।
तेहि अवसर भंजन महिभारा। हरि रघुबंस लीन्ह अवतारा॥पिता बचन तजि राजु उदासी। दंडक बन बिचरत अबिनासी॥॥४॥
उसी समय पृथ्वी का भार हरने के लिए विष्णु ने रघुवंश में अवतार लिया था। पिता के वचन का पालन करने के लिए राज्य त्यागकर, अविनाशी प्रभु उदासीन होकर दण्डक वन में विचरण कर रहे थे।
हृदय बिचारत जात हर केहि बिधि दरसनु होइ।गुप्त रूप अवतरेउ प्रभु गए जान सब कोइ॥४८(क)॥
जाते हुए शिवजी अपने हृदय में विचार कर रहे थे कि किस प्रकार दर्शन हो — क्योंकि प्रभु ने गुप्त रूप से अवतार लिया था, यह बात सब कोई नहीं जानते थे।
संकर उर अति छोभु सती न जानहिं मरमु सोइ।तुलसी दरसन लोभु मन डरु लोचन लालची॥४८(ख)॥
शिवजी के हृदय में अत्यंत हलचल थी, पर सती इस रहस्य को नहीं जानती थीं। तुलसीदास कहते हैं — मन में दर्शन का लोभ था, पर साथ ही डर भी था, फिर भी नेत्र लालची हो रहे थे।
रावन मरन मनुज कर जाचा। प्रभु बिधि बचनु कीन्ह चह साचा॥जौं नहिं जाउँ रहइ पछितावा। करत बिचारु न बनत बनावा॥॥१॥
रावण का वध मनुष्य के हाथों होना विधाता का वरदान था, प्रभु उस वचन को सत्य करना चाहते थे। यदि मैं दर्शन के लिए न जाऊँ तो पछतावा रहेगा — ऐसा विचार करते हुए भी कोई उपाय नहीं बन रहा था।
एहि बिधि भए सोचबस ईसा। तेहि समय जाइ दससीसा॥लीन्ह नीच मारीचहि संगा। भयउ तुरत सोइ कपट कुरंगा॥॥२॥
इस प्रकार शिवजी सोच में पड़े हुए थे, कि उसी समय रावण जाकर नीच मारीच को साथ ले गया, और वह तुरंत कपट-मृग बन गया।
करि छलु मूढ़ हरी बैदेही। प्रभु प्रभाउ तस बिदित न तेही॥मृग बधि बंधु सहित हरि आए। आश्रमु देखि नयन जल छाए॥॥३॥
उस मूर्ख रावण ने छल करके सीताजी का हरण कर लिया — उसे प्रभु के प्रभाव का ज्ञान नहीं था। मृग का वध करके श्रीराम भाई सहित आश्रम लौटे, तो आश्रम को सूना देखकर उनके नेत्रों में जल भर आया।
बिरह बिकल नर इव रघुराई। खोजत बिपिन फिरत दोउ भाई॥कबहूँ जोग बियोग न जाकें। देखा प्रगट बिरह दुख ताकें॥॥४॥
श्रीरघुनाथजी विरह से विकल होकर साधारण मनुष्य की भाँति दोनों भाई वन में सीता को खोजते फिरे। जिनका कभी संयोग-वियोग होता ही नहीं, उन्हीं में प्रत्यक्ष विरह का दुख देखा गया।
अति बिचित्र रघुपति चरित जानहिं परम सुजान।जे मतिमंद बिमोह बस हृदयँ धरहिं कछु आन॥४९॥
श्रीरघुनाथजी का यह अत्यंत विचित्र चरित्र परम सुज्ञ पुरुष ही जानते हैं — जो मंदबुद्धि मोहवश हृदय में कुछ और ही मान बैठते हैं, वे नहीं समझ पाते।
संभु समय तेहि रामहि देखा। उपजा हियँ अति हरषु बिसेषा॥भरि लोचन छबिसिंधु निहारी। कुसमय जानिन कीन्हि चिन्हारी॥॥१॥
उसी समय शिवजी ने श्रीराम को देखा, जिससे उनके हृदय में विशेष हर्ष उत्पन्न हुआ। नेत्र भरकर सौंदर्य-सागर को निहारा, पर असमय जानकर उन्होंने परिचय प्रकट नहीं किया।
जय सच्चिदानंद जग पावन। अस कहि चलेउ मनोज नसावन॥चले जात सिव सती समेता। पुनि पुनि पुलकत कृपानिकेता॥॥२॥
'हे सच्चिदानंद, जगत को पावन करने वाले, आपकी जय हो' — ऐसा कहकर कामदेव का नाश करने वाले शिवजी आगे बढ़ गए। सती सहित शिवजी चलते गए, और कृपानिधान शिवजी बार-बार पुलकित हो रहे थे।
सतीं सो दसा संभु के देखी। उर उपजा संदेहु बिसेषी॥संकरु जगतबंद्य जगदीसा। सुर नर मुनि सब नावत सीसा॥॥३॥
सतीजी ने शिवजी की यह दशा देखी, जिससे उनके हृदय में विशेष संदेह उत्पन्न हुआ — शिवजी तो जगत के वंदनीय, जगदीश्वर हैं, जिन्हें देवता, मनुष्य और मुनि सभी मस्तक झुकाते हैं।
तिन्ह नृपसुतहि कीन्ह परनामा। कहि सच्चिदानंद परधमा॥भए मगन छबि तासु बिलोकी। अजहुँ प्रीति उर रहति न रोकी॥॥४॥
उन्हीं शिवजी ने राजपुत्र राम को सच्चिदानंद परधाम कहकर प्रणाम किया, और उनकी छवि निहारकर मग्न हो गए — आज भी सतीजी को वह प्रीति हृदय में रोकी नहीं रह पाई।
ब्रह्म जो ब्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद।सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत बेद॥५०॥
जो ब्रह्म व्यापक, निर्मल, अजन्मा, अखंड, इच्छारहित और अभेद है, क्या वह देह धारण करके साधारण मनुष्य बन सकता है, जिसे वेद भी नहीं जान पाते?
बिष्नु जो सुर हित नरतनु धारी। सोउ सर्बग्य जथा त्रिपुरारी॥खोजइ सो कि अग्य इव नारी। ग्यानधाम श्रीपति असुरारी॥॥१॥
जो विष्णु देवताओं के हित के लिए मनुष्य-शरीर धारण किए हैं, वे शिवजी के समान ही सर्वज्ञ हैं। तो क्या वे ज्ञान के धाम, असुरों के शत्रु श्रीपति, अज्ञानी स्त्री की भाँति सीता को खोजेंगे?
संभुगिरा पुनि मृषा न होई। सिव सर्बग्य जान सबु कोई॥अस संसय मन भयउ अपारा। होई न हृदयँ प्रबोध प्रचारा॥॥२॥
फिर शिवजी के वचन भी झूठे नहीं हो सकते — शिवजी सर्वज्ञ हैं, यह सभी जानते हैं। इस प्रकार सतीजी के मन में अपार संशय उत्पन्न हो गया, और हृदय में कोई समाधान नहीं मिल रहा था।
जद्यपि प्रगट न कहेउ भवानी। हर अंतरजामी सब जानी॥सुनहि सती तव नारि सुभाऊ। संसय अस न धरिअ उर काऊ॥॥३॥
यद्यपि पार्वतीजी ने यह संशय प्रकट रूप से नहीं कहा, फिर भी अंतर्यामी शिवजी ने सब जान लिया। शिवजी बोले — हे सती, सुनो, यह तुम्हारा स्त्री-स्वभाव है, ऐसा संशय हृदय में कभी नहीं रखना चाहिए।
जासु कथा कुभंज रिषि गाई। भगति जासु मैं मुनिहि सुनाई॥सोइ मम इष्टदेव रघुबीरा। सेवत जाहि सदा मुनि धीरा॥॥४॥
जिनकी कथा अगस्त्य मुनि ने गाई थी, और जिनकी भक्ति मैंने मुनि को सुनाई थी — वही श्रीरघुवीर मेरे इष्टदेव हैं, जिनकी सेवा सदा धीर मुनि करते हैं।
मुनि धीर जोगी सिद्ध संतत बिमल मन जेहि ध्यावहीं।कहि नेति निगम पुरान आगम जासु कीरति गावहीं॥सोइ रामु ब्यापक ब्रह्म भुवन निकाय पति माया धनी।अवतरेउ अपने भगत हित निजतंत्र नित रघुकुलमनि॥
धीर मुनि, योगी और सिद्धजन निरंतर निर्मल मन से जिनका ध्यान करते हैं, और वेद-पुराण-आगम जिनकी कीर्ति 'नेति नेति' कहकर गाते हैं — वे ही राम व्यापक ब्रह्म, समस्त लोकों के स्वामी और माया के अधिपति हैं। रघुकुल के मणि उन्होंने अपने भक्तों के हित के लिए अपनी ही इच्छा से नित्य अवतार लिया है।
लाग न उर उपदेसु जदपि कहेउ सिव बार बहु।बोले बिहसि महेसु हरिमाया बलु जानि जियँ॥५१॥
यद्यपि शिवजी ने बार-बार समझाया, फिर भी सतीजी के हृदय में यह उपदेश नहीं बैठा। शिवजी हरि की माया का बल जानकर मन-ही-मन हँसकर बोले।
जौं तुम्हरें मन अति संदेहू। तौ किन जाइ परीछा लेहू॥तब लगि बैठ अहउँ बटछाहिं। जब लगि तुम्ह ऐहहु मोहि पाही॥॥१॥
यदि तुम्हारे मन में इतना अधिक संदेह है, तो जाकर परीक्षा क्यों नहीं ले लेतीं? तब तक मैं यहाँ बरगद की छाया में बैठा रहूँगा, जब तक तुम मेरे पास लौट न आओ।
जैसें जाइ मोह भ्रम भारी। करेहु सो जतनु बिबेक बिचारी॥चलीं सती सिव आयसु पाई। करहिं बिचारु करौं का भाई॥॥२॥
जिस प्रकार यह भारी मोह-भ्रम दूर हो, वैसा ही उपाय विवेकपूर्वक विचारकर करो। शिवजी की आज्ञा पाकर सती चल पड़ीं, और विचार करने लगीं कि अब क्या करूँ।
इहाँ संभु अस मन अनुमाना। दच्छसुता कहुँ नहिं कल्याना॥मोरेहु कहें न संसय जाहीं। बिधि बिपरीत भलाई नाहीं॥॥३॥
इधर शिवजी ने मन में अनुमान लगाया कि इसमें दक्षपुत्री सती का कल्याण नहीं है। मेरे कहने से भी संशय दूर नहीं हुआ — जब विधाता प्रतिकूल हों तो भलाई नहीं होती।
होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥अस कहि लगे जपन हरिनामा। गई सती जहँ प्रभु सुखधामा॥॥४॥
जो श्रीराम ने रचकर पहले ही निश्चित कर रखा है, वही होगा — तर्क करके शाखाएँ बढ़ाने से क्या लाभ? ऐसा कहकर शिवजी हरिनाम जपने लगे, और सती वहाँ गईं जहाँ सुखधाम प्रभु श्रीराम थे।
पुनि पुनि हृदयँ विचारु करि धरि सीता कर रुप।आगें होइ चलि पंथ तेहि जेहिं आवत नरभूप॥५२॥
बार-बार हृदय में विचार करके, सीताजी का रूप धारण कर, वे उसी मार्ग पर आगे जा खड़ी हुईं, जिस मार्ग से राजा श्रीराम आ रहे थे।
लछिमन दीख उमाकृत बेषा। चकित भए भ्रम हृदयँ बिसेषा॥कहि न सकत कछु अति गंभीरा। प्रभु प्रभाउ जानत मतिधीरा॥॥१॥
लक्ष्मणजी ने पार्वतीजी द्वारा धारण किया गया यह वेष देखा, तो हृदय में विशेष भ्रम के कारण चकित हो गए। पर वे अत्यंत गंभीर होने के कारण कुछ कह न सके, क्योंकि धीर बुद्धि वाले लक्ष्मणजी प्रभु का प्रभाव जानते थे।
सती कपटु जानेउ सुरस्वामी। सबदरसी सब अंतरजामी॥सुमिरत जाहि मिटइ अग्याना। सोइ सरबग्य रामु भगवाना॥॥२॥
देवताओं के स्वामी श्रीराम ने सती का यह कपट तुरंत पहचान लिया, क्योंकि वे सबके द्रष्टा और सबके अंतर्यामी हैं। जिनका स्मरण करते ही अज्ञान मिट जाता है, वे ही सर्वज्ञ भगवान राम हैं।
सती कीन्ह चह तहँ दुराऊ। देखहु नारि सुभाव प्रभाऊ॥निज माया बलु हृदयँ बखानी। बोले बिहसि रामु मृदु बानी॥॥३॥
सती अपने मन का भेद वहाँ छिपाना चाहती हैं—देखिए, यह है नारी-स्वभाव का प्रभाव। अपनी माया की शक्ति हृदय में विचारकर श्रीरामजी मुस्कराकर कोमल वाणी बोले।
जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामू। पिता समेत लीन्ह निज नामू॥कहेउ बहोरि कहाँ बृषकेतू। बिपिन अकेलि फिरहु केहि हेतू॥॥४॥
प्रभु ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और पिता समेत अपना नाम बताया। फिर पूछा—भगवान शिव कहाँ हैं? आप वन में अकेली किस कारण घूम रही हैं?
राम बचन मृदु गूढ़ सुनि उपजा अति संकोचु।सती सभीत महेस पहिं चलीं हृदयँ बड़ सोचु॥५३॥
श्रीराम के कोमल किन्तु गूढ़ वचन सुनकर सती को बड़ा संकोच हुआ। भयभीत मन से वे शिवजी के पास चलीं, हृदय में गहरी चिंता लिए।
मैं संकर कर कहा न माना। निज अग्यानु राम पर आना॥जाइ उतरु अब देह काहा। उर उपजा अति दारुन दाहा॥॥१॥
मैंने शिवजी की बात नहीं मानी और अपने अज्ञान का दोष श्रीराम पर मढ़ दिया। अब जाकर मैं क्या उत्तर दूँगी? हृदय में भारी संताप उठा।
जाना राम सतीं दुखु पावा। निज प्रभाउ कछु प्रगटि जनावा॥सतीं दीख कौतुकु मग जाता। आगें रामु सहित श्री भ्राता॥॥२॥
श्रीराम ने जान लिया कि सती को दुख हुआ है, तब उन्होंने अपना कुछ प्रभाव प्रकट कर दिखाया। मार्ग में जाते हुए सती ने एक अद्भुत दृश्य देखा—आगे श्रीराम, सीताजी और लक्ष्मणजी सहित।
फिरि चितवा पाछें प्रभु देखा। सहित बंधु सिय सुंदर वेषा॥जहँ चितवहिं तहँ प्रभु आसीना। सेवहिं सिद्ध मुनीस प्रबीना॥॥३॥
मुड़कर पीछे देखा तो वहाँ भी प्रभु को सुंदर वेष में सीता और भाई सहित देखा। जिधर भी दृष्टि डालें, वहीं प्रभु विराजमान थे, सिद्ध और श्रेष्ठ मुनिजन उनकी सेवा कर रहे थे।
देखे सिव बिधि बिष्नु अनेका। अमित प्रभाउ एक तें एका॥बंदत चरन करत प्रभु सेवा। बिबिध बेष देखे सब देवा॥॥४॥
सती ने अनेक शिव, ब्रह्मा और विष्णु देखे, जिनका प्रभाव एक-दूसरे से बढ़कर था। सब देवता विविध रूपों में प्रभु के चरण वंदन करते और सेवा करते दिखे।
सती बिधात्री इंदिरा देखीं अमित अनूप।जेहिं जेहिं बेष अजादि सुर तेहि तेहि तन अनुरूप॥५४॥
सती ने अनगिनत अनुपम सरस्वती और लक्ष्मी को भी देखा। ब्रह्मा आदि देवता जिस-जिस रूप में थे, उनकी शक्तियाँ भी उसी रूप के अनुरूप वहाँ विद्यमान थीं।
देखे जहँ तहँ रघुपति जेते। सक्तिन्ह सहित सकल सुर तेते॥जीव चराचर जो संसारा। देखे सकल अनेक प्रकारा॥॥१॥
जहाँ-जहाँ जितने श्रीराम दिखे, वहाँ-वहाँ उतने ही देवता अपनी शक्तियों सहित भी दिखाई दिए। संसार के जड़-चेतन सभी प्राणी उन्होंने अनेक रूपों में देखे।
पूजहिं प्रभुहि देव बहु बेषा। राम रूप दूसर नहिं देखा॥अवलोके रघुपति बहुतेरे। सीता सहित न बेष घनेरे॥॥२॥
देवता अनेक रूपों में प्रभु की पूजा कर रहे थे, पर श्रीराम के रूप के समान दूसरा कोई रूप नहीं दिखा। श्रीराम अनेक जगह दिखे, किंतु सीताजी सहित वैसा दूसरा रूप कहीं नहीं था।
सोइ रघुबर सोइ लछिमनु सीता। देखि सती अति भई सभीता॥हृदय कंप तन सुधि कछु नाहीं। नयन मूदि बैठीं मग माहीं॥॥३॥
वही श्रीराम, वही लक्ष्मण और वही सीता—हर जगह यही देखकर सती अत्यंत भयभीत हो गईं। हृदय काँपने लगा, देह की सुध-बुध जाती रही, वे आँखें मूँदकर मार्ग में ही बैठ गईं।
बहुरि बिलोकेउ नयन उघारी। कछु न दीख तहँ दच्छकुमारी॥पुनि पुनि नाइ राम पद सीसा। चलीं तहाँ जहँ रहे गिरीसा॥॥४॥
फिर आँखें खोलकर देखा तो दक्षकुमारी को वहाँ कुछ भी दिखाई न दिया। बार-बार श्रीराम के चरणों में सिर नवाकर वे वहाँ चलीं जहाँ शिवजी विराजमान थे।
गई समीप महेस तब हँसि पूछी कुसलात।लीन्ही परीछा कवन बिधि कहहु सत्य सब बात॥५५॥
सती शिवजी के पास पहुँचीं, तब शिवजी हँसकर कुशल पूछने लगे—बताओ, तुमने किस प्रकार परीक्षा ली, सारी बात सच-सच कहो।
सतीं समुझि रघुबीर प्रभाऊ। भय बस सिव सन कीन्ह दुराऊ॥कछु न परीछा लीन्हि गोसाई। कीन्ह प्रनामु तुम्हारिहि नाई॥॥१॥
श्रीराम के प्रभाव को समझकर सती भय के कारण शिवजी से बात छिपा गईं। बोलीं—स्वामी, मैंने कोई परीक्षा नहीं ली, आपकी ही भाँति उन्हें प्रणाम किया।
जो तुम्ह कहा सो मृषा न होई। मोरें मन प्रतीति अति सोई॥तब संकर देखेउ धरि ध्याना। सतीं जो कीन्ह चरित सब जाना॥॥२॥
आपने जो कहा वह असत्य नहीं हो सकता, मेरे मन में यह पूर्ण विश्वास है। तब शिवजी ने ध्यान लगाकर देखा और सती ने जो कुछ किया था, सब जान लिया।
बहुरि राममायहि सिरु नावा। प्रेरि सतिहि जेहिं झूँठ कहावा॥हरि इच्छा भावी बलवाना। हृदयँ बिचारत संभु सुजाना॥॥३॥
शिवजी ने फिर श्रीराम की माया को सिर नवाया, जिसने सती को प्रेरित कर असत्य कहलवाया। भगवान की इच्छा और होनी बड़ी बलवान है—यह सोचते हुए बुद्धिमान शिवजी हृदय में विचार करने लगे।
सतीं कीन्ह सीता कर बेषा। सिव उर भयउ बिषाद बिसेषा॥जौं अब करउँ सती सन प्रीती। मिटइ भगति पथु होइ अनीती॥॥४॥
सती ने सीताजी का रूप धरा था, यह जानकर शिवजी के हृदय में विशेष विषाद हुआ। सोचा—यदि अब मैं सती से पहले जैसा प्रेम रखूँ तो भक्ति का मार्ग मिट जाएगा और अनीति होगी।
परम पुनीत न जाइ तजि किए प्रेम बड़ पापु।प्रगटि न कहत महेसु कछु हृदयँ अधिक संतापु॥५६॥
सती परम पवित्र हैं, उन्हें त्यागा नहीं जा सकता, पर स्नेह बनाए रखना भी बड़ा दोष होगा। यह सोचकर शिवजी कुछ प्रकट नहीं कहते, किंतु उनके हृदय में अत्यंत संताप है।
तब संकर प्रभु पद सिरु नावा। सुमिरत रामु हृदयँ अस आवा॥एहिं तन सतिहि भेट मोहि नाहीं। सिव संकल्पु कीन्ह मन माहीं॥॥१॥
तब शिवजी ने प्रभु के चरणों में सिर नवाया, श्रीराम का स्मरण करते हुए हृदय में यह विचार आया—इस देह में अब सती का मिलन मेरे लिए उचित नहीं। शिवजी ने मन में यह संकल्प कर लिया।
अस बिचारि संकरु मतिधीरा। चले भवन सुमिरत रघुबीरा॥चलत गगन भै गिरा सुहाई। जय महेस भलि भगति दृढ़ाई॥॥२॥
यह विचारकर स्थिरबुद्धि शिवजी श्रीराम का स्मरण करते हुए अपने भवन को चले। चलते समय आकाश से मधुर वाणी हुई—हे महेश, जय हो, आपने भक्ति का मार्ग दृढ़ रखा।
अस पन तुम्ह बिनु करइ को आना। रामभगत समरथ भगवाना॥सुनि नभगिरा सती उर सोचा। पूछा सिवहि समेत सकोचा॥॥३॥
ऐसा दृढ़ प्रण आपके सिवा और कौन कर सकता है? आप ही श्रीराम के समर्थ भक्त और स्वयं भगवान हैं। यह आकाशवाणी सुनकर सती के मन में चिंता उठी, संकोच सहित उन्होंने शिवजी से पूछा।
कीन्ह कवन पन कहहु कृपाला। सत्यधाम प्रभु दीनदयाला॥जदपि सतीं पूछा बहु भाँती। तदपि न कहेउ त्रिपुर आराती॥॥४॥
हे कृपालु, हे सत्यस्वरूप दीनदयालु प्रभु, बताइए आपने कौन-सा प्रण किया? सती ने अनेक प्रकार से पूछा, फिर भी त्रिपुरारि शिवजी ने कुछ नहीं बताया।
सतीं हृदय अनुमान किय सबु जानेउ सर्बग्य।कीन्ह कपटु मैं संभु सन नारि सहज जड़ अग्य।। 57क॥५७(क)॥
सती ने हृदय में अनुमान कर लिया कि सर्वज्ञ शिवजी सब जान गए हैं। उन्हें ग्लानि हुई—मैंने शिवजी से कपट किया, नारी स्वभाव से ही सहज मूढ़ और अज्ञानी होती है।
जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि।बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि॥५७(ख)॥
जल और दूध जैसे मिलकर एक भाव से बिकते हैं—देखिए प्रेम की यही सुंदर रीति है। पर जहाँ कपट की खटास पड़ जाती है, वहाँ रस अलग होकर बिगड़ जाता है।
हृदयँ सोचु समुझत निज करनी। चिंता अमित जाइ नहिं बरनी॥कृपासिंधु सिव परम अगाधा। प्रगट न कहेउ मोर अपराधा॥॥१॥
अपनी करनी को समझकर सती के हृदय में ऐसी चिंता हुई जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। कृपा के अथाह सागर शिवजी ने फिर भी मेरा अपराध प्रकट नहीं किया, यह सोचकर वे और लज्जित हुईं।
संकर रुख अवलोकि भवानी। प्रभु मोहि तजेउ हृदयँ अकुलानी॥निज अघ समुझि न कछु कहि जाई। तपइ अवाँ इव उर अधिकाई॥॥२॥
शिवजी का उदासीन भाव देखकर भवानी का मन व्याकुल हो उठा—लगा कि प्रभु ने मुझे त्याग दिया है। अपने ही अपराध को समझकर कुछ कहते न बना, हृदय में संताप बहुत बढ़ गया।
सतिहि ससोच जानि बृषकेतू। कहीं कथा सुंदर सुख हेतू॥बरनत पंथ बिबिध इतिहासा। बिस्वनाथ पहुँचे कैलासा॥॥३॥
सती को दुखी जानकर शिवजी ने सुख देने के लिए सुंदर कथाएँ सुनाईं। मार्ग में अनेक प्रसंग कहते-कहते विश्वनाथ शिवजी कैलास पहुँच गए।
तहँ पुनि संभु समुझि पन आपन। बैठे बट तर करि कमलासन॥संकर सहज सरुप सम्हारा। लागि समाधि अखंड अपारा॥॥४॥
वहाँ पहुँचकर शिवजी ने अपना प्रण फिर याद किया और वट वृक्ष के नीचे कमलासन लगाकर बैठ गए। अपने सहज स्वरूप को सँभालकर वे अखंड अपार समाधि में लीन हो गए।
सती बसहिं कैलास तब अधिक सोचु मन माहिं।मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं॥५८॥
सती तब कैलास पर रहने लगीं, मन में उन्हें अत्यंत चिंता रहती। भेद कोई नहीं जानता था, और एक-एक दिन उनके लिए युग समान बीतने लगा।
नित नव सोचु सतीं उर भारा। कब जैहउँ दुख सागर पारा॥मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना। पुनिपति बचनु मृषा करि जाना॥॥१॥
सती के हृदय में प्रतिदिन नई-नई चिंता भारी होती—मैं इस दुख-सागर से कब पार जाऊँगी? मैंने श्रीराम का अपमान किया और फिर पति के वचन को असत्य समझा।
सो फलु मोहि बिधाताँ दीन्हा। जो कछु उचित रहा सोइ कीन्हा॥अब बिधि अस बूझिअ नहिं तोही। संकर बिमुख जिआवसि मोही॥॥२॥
विधाता ने मुझे उसी का फल दिया है, जो उचित था वही किया। हे विधाता, अब यह तो पूछा नहीं जाता कि शिवजी से विमुख होकर तुम मुझे क्यों जीवित रखे हो।
कहि न जाई कछु हृदय गलानी। मन महुँ रामहि सुमिर सयानी॥जौं प्रभु दीनदयालु कहावा। आरती हरन बेद जसु गावा॥॥३॥
हृदय की ग्लानि कही नहीं जाती। बुद्धिमती सती मन-ही-मन श्रीराम का स्मरण करने लगीं—यदि प्रभु सचमुच दीनदयालु कहलाते हैं, यदि वेद उन्हें दुख हरने वाला गाते हैं।
तौ मैं बिनय करउँ कर जोरी। छूटउ बेगि देह यह मोरी॥जौं मोरें सिव चरन सनेहू। मन क्रम बचन सत्य ब्रतु एहू॥॥४॥
तो मैं हाथ जोड़कर विनती करती हूँ—मेरी यह देह शीघ्र छूट जाए। यदि शिवजी के चरणों में मेरा सच्चा स्नेह है, यदि मन-वचन-कर्म से मेरा यह व्रत सत्य है।
तौ सबदरसी सुनिअ प्रभु करहु सो बेगि उपाइ।होइ मरनु जेहिं बिनहिं श्रम दुसह बिपत्ति बिहाइ॥५९॥
तो हे सर्वदर्शी प्रभु, सुनिए और शीघ्र वह उपाय कीजिए, जिससे बिना कष्ट के मेरा मरण हो जाए और यह असह्य विपत्ति समाप्त हो।
एहि बिधि दुखित प्रजेसकुमारी। अकथनीय दारुन दुखु भारी॥बीतें संबत सहस सतासी। तजी समाधि संभु अबिनासी॥॥१॥
इस प्रकार प्रजापति-पुत्री सती अकथनीय भारी दुख सहती रहीं। सत्तासी हजार वर्ष बीत जाने पर अविनाशी शिवजी ने समाधि त्यागी।
राम नाम सिव सुमिरन लागे। जानी सतीं जगतपति जागे॥जाइ संभु पद बंदनु कीन्ही। सनमुख संकर आसनु दीन्हा॥॥२॥
शिवजी श्रीराम-नाम का स्मरण करने लगे, सती ने जान लिया कि जगत्पति जाग गए हैं। जाकर उन्होंने शिवजी के चरणों की वंदना की, शिवजी ने सम्मुख आसन दिया।
लगे कहन हरिकथा रसाला। दच्छ प्रजेस भए तेहि काला॥देखा बिधि बिचारि सब लायक। दच्छहि कीन्ह प्रजापति नायक॥॥३॥
शिवजी हरिकथा का रसपान कराने लगे, उसी समय दक्ष प्रजापति बने। ब्रह्माजी ने सबको योग्यता से परखकर दक्ष को प्रजापतियों का प्रमुख बनाया।
बड़ अधिकार दच्छ जब पावा। अति अभिमानु हृदयँ तब आवा॥नहिं कोऊ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं॥॥४॥
दक्ष को जब बड़ा अधिकार मिला, तब उनके हृदय में अत्यंत अभिमान आ गया। संसार में ऐसा कोई जन्मा नहीं, जिसे बड़प्पन पाकर मद न चढ़े।
दच्छ लिए मुनि बोलि सब करन लगे बड़ जाग।नेवते सादर सकल सुर जे पावत मख भाग॥६०॥
दक्ष ने सब मुनियों को बुलाकर एक बड़ा यज्ञ आरंभ किया, और उन सब देवताओं को आदरपूर्वक निमंत्रण भेजा जिन्हें यज्ञ का भाग मिलता है।
किंनर नाग सिद्ध गंधर्बा। बधुन्ह समेत चले सुर सर्बा॥बिष्नु बिरंचि महेसु बिहाई। चले सकल सुर जान बनाई॥॥१॥
किन्नर, नाग, सिद्ध, गंधर्व और सभी देवता अपनी पत्नियों सहित यज्ञ में चले। विष्णु, ब्रह्मा और शिव को छोड़कर शेष सब देवता विमान सजाकर चले।
सतीं बिलोके ब्योम बिमाना। जात चले सुंदर बिधि नाना॥सुर सुंदरी करहिं कल गाना। सुनत श्रवन छूटहिं मुनि ध्याना॥॥२॥
सती ने आकाश में अनेक सुंदर विमानों को जाते देखा। देव-सुंदरियाँ मधुर गान कर रही थीं, जिसे सुनकर मुनियों का ध्यान भी भंग हो जाता।
पूछेउ तब सिवँ कहेउ बखानी। पिता जग्य सुनि कछु हरषानी॥जौं महेसु मोहि आयसु देहीं। कछु दिन जाइ रहौं मिस एहीं॥॥३॥
सती ने पूछा तो शिवजी ने सब बता दिया। पिता के यज्ञ की बात सुनकर सती कुछ हर्षित हुईं—यदि शिवजी आज्ञा दें तो इसी बहाने कुछ दिन जाकर वहाँ रह आऊँ।
पति परित्याग हृदय दुखु भारी। कह न निज अपराध बिचारी॥बोली सती मनोहर बानी। भय संकोच प्रेम रस सानी॥॥४॥
पति का साथ छोड़ने के विचार से हृदय में भारी दुख था, पर अपना अपराध सोचकर कह न सकीं। फिर सती भय, संकोच और प्रेम में सनी मनोहर वाणी बोलीं।
पिता भवन उत्सव परम जौं प्रभु आयसु होइ।तौ मै जाउँ कृपायतन सादर देखन सोइ॥६१॥
हे कृपानिधान, पिता के भवन में बड़ा उत्सव हो रहा है, यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं जाकर आदरपूर्वक वह उत्सव देख आऊँ।
कहेहु नीक मोरेहुँ मन भावा। यह अनुचित नहिं नेवत पठावा॥दच्छ सकल निज सुता बोलाई। हमरें बयर तुम्हउ बिसराई॥॥१॥
शिवजी बोले—तुमने अच्छा कहा, मेरे मन को भी यह भाया, पर यह अनुचित है कि दक्ष ने निमंत्रण नहीं भेजा। दक्ष ने अपनी सब पुत्रियों को बुलाया है, पर हमारे प्रति बैर के कारण तुम्हें भुला दिया।
ब्रह्मसभाँ हम सन दुखु माना। तेहि तें अजहुँ करहिं अपमाना॥जौं बिनु बोलें जाहु भवानी। रहइ न सीलु सनेहु न कानी॥॥२॥
ब्रह्मसभा में उन्हें हमसे दुख पहुँचा था, इसी कारण अब भी वे अपमान करते हैं। हे भवानी, यदि तुम बिना बुलाए वहाँ जाओगी तो न शील रहेगा, न स्नेह, न मर्यादा।
जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा। जाइअ बिनु बोलेहुँ न सँदेहा॥तदपि बिरोध मान जहँ कोई। तहाँ गएँ कल्यानु न होई॥॥३॥
यद्यपि मित्र, स्वामी, पिता और गुरु के घर बिना बुलाए भी जाने में कोई संदेह नहीं है, फिर भी जहाँ कोई विरोध और अभिमान रखता हो, वहाँ जाने से कल्याण नहीं होता।
भाँति अनेक संभु समुझावा। भावी बस न ग्यानु उर आवा॥कह प्रभु जाहु जो बिनहिं बोलाएँ। नहिं भलि बात हमारे भाएँ॥॥४॥
शिवजी ने अनेक प्रकार से समझाया, पर होनी के वश ज्ञान सती के हृदय में न बैठा। अंत में प्रभु ने कहा—यदि तुम बिना बुलाए जाओगी तो यह बात हमें अच्छी नहीं लगती।
कहि देखा हर जतन बहु रहई न दच्छकुमारि।दिए मुख्य गन संग तब बिदा कीन्ह त्रिपुरारि॥६२॥
शिवजी ने अनेक प्रकार से समझाकर देख लिया, पर दक्षकुमारी किसी तरह न रुकीं। तब त्रिपुरारि शिवजी ने अपने प्रमुख गणों को साथ देकर उन्हें विदा किया।
पिता भवन जब गई भवानी। दच्छ त्रास काहुँ न सनमानी॥सादर भलेहिं मिली एक माता। भगिनीं मिलीं बहुत मुसुकाता॥॥१॥
जब भवानी पिता के घर पहुँचीं, तो दक्ष के भय से किसी ने उनका सम्मान नहीं किया। केवल माता ही आदरपूर्वक भलीभाँति मिलीं, बहनें भी बहुत मुसकराकर मिलीं।
दच्छ न कछु पूछी कुसलाता। सतिहि बिलोकि जरे सब गाता॥सतीं जाइ देखेउ तब जागा। कतहुँ न दीख संभु कर भागा॥॥२॥
दक्ष ने सतीजी की कुशल-क्षेम तक नहीं पूछी, यह देखकर सती का सारा शरीर क्रोध और पीड़ा से जल उठा। सती ने जाकर यज्ञ में देखा तो कहीं भी शिवजी का भाग नहीं दिखा।
तब चित चढ़ेउ जो संकर कहेऊ। प्रभु अपमानु समुझि उर दहेऊ॥पाछिल दुखु न हृदयँ अस ब्यापा। जस यह भयउ महा परितापा॥॥३॥
तब उन्हें शिवजी की पहले कही बात याद आ गई; स्वामी के अपमान का बोध होते ही हृदय जल उठा। पति-त्याग का पूर्व दुःख भी उतना गहरा नहीं था, जितना यह नया संताप उन्हें अब हुआ।
जद्यपि जग दारुन दुख नाना। सब तें कठिन जाति अवमाना॥समुझि सो सतिहि भयउ अति क्रोधा। बहु बिधि जननीं कीन्ह प्रबोधा॥॥४॥
यद्यपि संसार में अनेक प्रकार के भयंकर दुःख हैं, तथापि कुल-अपमान से बढ़कर कठिन दुःख कोई नहीं। यह समझकर सती को अत्यंत क्रोध आया; माता ने उन्हें बहुत प्रकार से समझाया।
सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ न होइ प्रबोध।सकल सभहि हठि हटकि तब बोलीं बचन सक्रोध॥६३॥
शिवजी का अपमान सती से सहा नहीं गया, हृदय को कोई शांति नहीं मिली। तब उन्होंने सारी सभा को हठपूर्वक रोककर क्रोध भरे वचन कहे।
सुनहु सभासद सकल मुनिंदा। कही सुनी जिन्ह संकर निंदा॥सो फलु तुरत लहब सब काहूँ। भली भाँति पछिताब पिताहूँ॥॥१॥
हे सभासदो, हे समस्त मुनीश्वरो, सुनो! जिस-जिसने यहाँ शिवजी की निंदा कही या सुनी है, उसे उसका फल तुरंत मिलेगा, और मेरे पिता को भी भलीभाँति पछताना पड़ेगा।
संत संभु श्रीपति अपबादा। सुनिअ जहाँ तहँ असि मरजादा॥काटिअ तासु जीभ जो बसाई। श्रवन मूदि न त चलिअ पराई॥॥२॥
जहाँ कहीं संत, शिवजी अथवा श्रीहरि की निंदा सुनाई पड़े, वहाँ यही मर्यादा है — या तो निंदा करने वाले की जीभ काट दी जाए, अन्यथा कान बंद करके वहाँ से दूर चला जाए।
जगदातमा महेसु पुरारी। जगत जनक सब के हितकारी॥पिता मंदमति निंदत तेही। दच्छ सुक्र संभव यह देही॥॥३॥
महेश तो जगत की आत्मा, त्रिपुरासुर के संहारक, संसार के पिता और सबके हितकारी हैं; मेरे मंदबुद्धि पिता उन्हीं की निंदा करते हैं, यह भूलकर कि यह मेरा शरीर भी दक्ष के ही वंश से उत्पन्न है।
तजिहउँ तुरत देह तेहि हेतू। उर धरि चंद्रमौलि बृषकेतू॥अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। भयउ सकल मख हाहाकारा॥॥४॥
इसी कारण मैं अभी यह देह त्याग दूँगी — यह विचारकर, हृदय में चंद्रमौलि वृषकेतु (शिवजी) को धारण किए, उन्होंने योगाग्नि से अपने शरीर को भस्म कर लिया। सारे यज्ञ में हाहाकार मच गया।
सती मरनु सुनि संभु गन लगे करन मख खीस।जग्य बिधंस बिलोकि भृगु रच्छा कीन्हि मुनीस॥६४॥
सती की मृत्यु सुनकर शिवजी के गण यज्ञ को नष्ट करने चल पड़े। यज्ञ का विध्वंस होते देख मुनि भृगु ने उसकी रक्षा का उपाय किया।
समाचार सब संकर पाए। बीरभद्रु करि कोप पठाए॥जग्य बिधंस जाइ तिन्ह कीन्हा। सकल सुरन्ह बिधिवत फलु दीन्हा॥॥१॥
जब शिवजी को यह सारा समाचार मिला, तो उन्होंने क्रोधित होकर वीरभद्र को भेजा। वीरभद्र ने जाकर यज्ञ का विध्वंस कर दिया और सभी देवताओं को विधिवत उनका फल दिया।
भे जगबिदित दच्छ गति सोई। जसि कछु संभु बिमुख के होई॥यह इतिहास सकल जग जानी। ताते मैं संछेप बखानी॥॥२॥
शंभु से विमुख होने पर जैसी दुर्गति होती है, वैसी ही दक्ष की गति संसार भर में विख्यात हुई। यह कथा सारे जगत को ज्ञात है, इसीलिए मैंने इसे संक्षेप में कह दिया।
सतीं मरत हरि सन बरु मागा। जनम जनम सिव पद अनुरागा॥तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई। जनमीं पारबती तनु पाई॥॥३॥
मरते समय सती ने हरि से यही वर माँगा था कि जन्म-जन्म शिवजी के चरणों में उनका अनुराग बना रहे। इसी कारण उन्होंने हिमालय के घर जन्म लिया और पार्वती के रूप में देह पाई।
जब तें उमा सैल गृह जाईं। सकल सिद्धि संपति तहँ छाई॥जहँ तहँ मुनिन्ह सुआश्रम कीन्हे। उचित बास हिम भूधर दीन्हे॥॥४॥
जब से उमा हिमालय के घर जन्मीं, तभी से वहाँ सभी सिद्धियाँ और संपदाएँ आ बसीं। जहाँ-तहाँ मुनियों ने सुंदर आश्रम बनाए, और पर्वत ने उन्हें उचित निवास-स्थान दिए।
सदा सुमन फल सहित सब द्रुम नव नाना जाति।प्रगटीं सुंदर सैल पर मनि आकर बहु भाँति॥६५॥
वहाँ सदा फूल-फल से लदे नाना जाति के नए वृक्ष शोभा पाते, और पर्वत पर अनेक प्रकार की मणियों की खानें सुंदर रूप से प्रकट हुईं।
सरिता सब पुनीत जलु बहहीं। खग मृग मधुप सुखी सब रहहीं॥सहज बयरु सब जीवन्ह त्यागा। गिरि पर सकल करहिं अनुरागा॥॥१॥
सारी नदियाँ पवित्र जल लेकर बहतीं, पक्षी, मृग और भँवरे सब सुखपूर्वक वहाँ रहते। सभी प्राणियों ने अपना सहज वैर त्यागकर उस पर्वत पर आपस में प्रेम कर लिया था।
सोह सैल गिरिजा गृह आएँ। जिमि जनु रामभगति के पाएँ॥नित नूतन मंगल गृह तासू। ब्रह्मादिक गावहिं जसु जासू॥॥२॥
गिरिजा (पार्वती) के घर आने से पर्वत ऐसा शोभित हुआ मानो उसे रामभक्ति ही प्राप्त हो गई हो। उस घर में नित नए मंगल होते, जिसका यश ब्रह्मा आदि देवता भी गाते थे।
नारद समाचार सब पाए। कौतुकहीं गिरि गेह सिधाए॥सैलराज बड़ आदर कीन्हा। पद पखारि बर आसनु दीन्हा॥॥३॥
नारदजी ने जब यह सब समाचार पाया, तो कौतुकवश तुरंत पर्वत के घर जा पहुँचे। पर्वतराज ने उनका बड़ा आदर किया, चरण धोकर उन्हें सुंदर आसन दिया।
नारि सहित मुनि पद सिरु नावा। चरन सलिल सबु भवनु सिंचावा॥निज सौभाग्य बहुत गिरि बरना। सुता बोलि मेली मुनि चरना॥॥४॥
पत्नी सहित पर्वतराज ने मुनि के चरणों में सिर नवाया, और चरणामृत से सारा भवन सिंचवाया। अपने सौभाग्य का बहुत बखान करते हुए उन्होंने पुत्री को बुलाकर मुनि के चरणों में डाल दिया।
त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र तुम्हारि।कहहु सुता के दोष गुन मुनिबर हृदयँ बिचारि॥६६॥
हे मुनिवर, आप त्रिकालज्ञ और सर्वज्ञ हैं, आपकी गति सर्वत्र है; कृपया हृदय में विचारकर मेरी पुत्री के गुण-दोष बताइए।
कह मुनि बिहसि गूढ़ मृदु बानी। सुता तुम्हारि सकल गुन खानी॥सुंदर सहज सुसील सयानी। नाम उमा अंबिका भवानी॥॥१॥
मुनि मुस्कराकर गूढ़ और मधुर वाणी में बोले — तुम्हारी पुत्री समस्त गुणों की खान है। यह सहज सुंदर, सुशील और बुद्धिमती है, इसका नाम उमा, अंबिका और भवानी है।
सब लच्छन संपन्न कुमारी। होइहि संतत पियहि पिआरी॥सदा अचल एहि कर अहिवाता। एहि तें जसु पैहहिं पितु माता॥॥२॥
यह कन्या सब शुभ लक्षणों से संपन्न है, अपने पति को सदा प्रिय ही रहेगी। इसका सुहाग सदा अटल रहेगा, और इसके कारण माता-पिता को भी बड़ा यश मिलेगा।
होइहि पूज्य सकल जग माहीं। एहि सेवत कछु दुर्लभ नाहीं॥एहि कर नामु सुमिरि संसारा। त्रिय चढ़हहिं पतिब्रत असिधारा॥॥३॥
यह सारे संसार में पूज्य होगी, इसकी सेवा करने वाले के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं रहेगा। इसका नाम स्मरण करके ही संसार की स्त्रियाँ पतिव्रत की तलवार की धार पर चलने योग्य हो सकेंगी।
सैल सुलच्छन सुता तुम्हारी। सुनहु जे अब अवगुन दुइ चारी॥अगुन अमान मातु पितु हीना। उदासीन सब संसय छीना॥॥४॥
हे पर्वतराज, तुम्हारी पुत्री सुलक्षणा है, अब इसके दो-चार अवगुण भी सुन लो। यह गुणहीन (सांसारिक अर्थ में), मानरहित, माता-पिता से हीन, उदासीन और संशय-रहित है।
जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष।अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख॥६७॥
ऐसा योगी, जटाधारी, निष्काम मन वाला, नग्न और अमंगल वेष वाला पति ही इसे मिलेगा — हाथ की यही रेखा इसके भाग्य में लिखी है।
सुनि मुनि गिरा सत्य जियँ जानी। दुख दंपतिहि उमा हरषानी॥नारदहुँ यह भेदु न जाना। दसा एक समुझब बिलगाना॥॥१॥
मुनि की वाणी को सत्य जानकर हिमालय को अपने हृदय में दुःख हुआ, पर उमा यह सुनकर प्रसन्न हो गईं। नारदजी भी यह भेद न जान सके कि एक ही बात से दोनों की दशा इतनी अलग क्यों हुई।
सकल सखीं गिरिजा गिरि मैना। पुलक सरीर भरे जल नैना॥होइ न मृषा देवरिषि भाषा। उमा सो बचनु हृदयँ धरि राखा॥॥२॥
गिरिजा की सभी सखियाँ, पर्वत और मैना — सबका शरीर रोमांचित हो उठा और आँखें आँसुओं से भर गईं। देवर्षि की वाणी झूठी नहीं हो सकती, यह जानकर सब चिंतित हुए, पर उमा ने वह बात हृदय में सँजोकर रख ली।
उपजेउ सिव पद कमल सनेहू। मिलन कठिन मन भा संदेहू॥जानि कुअवसरु प्रीति दुराई। सखी उछँग बैठी पुनि जाई॥॥३॥
उनके मन में पहले से ही शिवजी के चरणों में प्रेम उत्पन्न हो चुका था, अब मिलन कठिन जानकर मन में संदेह उठा। असमय जानकर उन्होंने अपना प्रेम छिपा लिया और सखी की गोद में जाकर बैठ गईं।
झूठि न होइ देवरिषि बानी। सोचहिं दंपति सखीं सयानी॥उर धरि धीर कहइ गिरिराऊ। कहहु नाथ का करिअ उपाऊ॥॥४॥
देवर्षि की वाणी असत्य नहीं हो सकती, यह सोचकर बुद्धिमान दंपति और सखियाँ चिंतित हुईं। तब धैर्य धरकर पर्वतराज ने पूछा — हे नाथ, अब बताइए क्या उपाय किया जाए?
कह मुनीस हिमवंत सुनु जो बिधि लिखा लिलार।देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनिहार॥६८॥
मुनीश्वर बोले — हे हिमवंत, सुनो, विधाता ने जो ललाट पर लिख दिया है, उसे देव, दानव, मनुष्य, नाग अथवा मुनि — कोई भी नहीं मिटा सकता।
तदपि एक मैं कहउँ उपाई। होइ करै जौं दैउ सहाई॥जस बरु मैं बरनेउँ तुम्ह पाहीं। मिलहि उमहि तस संसय नाहीं॥॥१॥
फिर भी मैं तुम्हें एक उपाय बताता हूँ, जो दैव सहायक हो तो अवश्य सफल होगा। मैंने तुम्हें जिस वर का वर्णन किया, उसी से उमा का मिलन होगा, इसमें कोई संशय नहीं।
जे जे बर के दोष बखाने। ते सब सिव पहिं मैं अनुमाने॥जौं बिबाहु संकर सन होई। दोषु गुन सम कह सबु कोई॥॥२॥
वर में जो-जो दोष बताए गए थे, वे सब मैंने शिवजी में ही पाए हैं। यदि विवाह शंकरजी से हो, तो गुण-दोष दोनों बराबर मानकर सब कोई इसे उचित ही कहेंगे।
जौं अहि सेज सयन हरि करहीं। बुध कछु तिन्ह कर दोषु न धरहीं॥भानु कृसानु सर्ब रस खाहीं। तिन्ह कहँ मंद कहत कोउ नाहीं॥॥३॥
यदि विष्णु सर्प की शय्या पर सोते हैं, तो बुद्धिमान उसमें कोई दोष नहीं मानते। सूर्य और अग्नि सब कुछ ग्रहण कर लेते हैं, फिर भी उन्हें कोई नीच नहीं कहता।
सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई। सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई॥समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाई। रबि पावक सुरसरि की नाई॥॥४॥
नदी शुभ और अशुभ दोनों प्रकार का जल बहाती है, फिर भी गंगा को कोई अपवित्र नहीं कहता। समर्थ के लिए दोष नहीं होता, हे स्वामी, यह बात सूर्य, अग्नि और गंगा के समान ही सत्य है।
जौं अस हिसिषा करहिं नर जड़ बिबेक अभिमान।परहिं कलप भरि नरक महुँ जीव कि ईस समान॥६९॥
यदि कोई मूर्ख, अविवेकी और अभिमानी मनुष्य ऐसी ही तुलना करने लगे, तो वह एक कल्प भर नरक में पड़ा रहता है — भला जीव कहीं ईश्वर के समान हो सकता है?
सुरसरि जल कृत बारुनि जाना। कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना॥सुरसरि मिलें सो पावन जैसें। ईस अनीसहि अंतरु तैसें॥॥१॥
गंगा के ही जल से बनी मदिरा को भी संत कभी ग्रहण नहीं करते, फिर भी गंगा में मिलना पवित्र माना जाता है — ईश्वर और सामान्य जीव में भी ठीक यही अंतर है।
संभु सहज समरथ भगवाना। एहि बिबाहँ सब बिधि कल्याना॥दुराराध्य पै अहहिं महेसू। आसुतोष पुनि किए कलेसू॥॥२॥
शंभु स्वभाव से ही सर्वसमर्थ और स्वयं भगवान हैं, इस विवाह में हर प्रकार से कल्याण ही है। महेश भले ही प्रसन्न करने में कठिन हों, पर वे आशुतोष भी हैं, बस उन्हें ठीक विधि से आराधना चाहिए।
जौं तपु करै कुमारि तुम्हारी। भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी॥जद्यपि बर अनेक जग माहीं। एहि कहँ सिव तजि दूसर नाहीं॥॥३॥
यदि तुम्हारी कन्या तपस्या करे, तो त्रिपुरारि भाग्य को भी बदल सकते हैं। संसार में यद्यपि अनेक वर हैं, तथापि इसके लिए शिव के सिवा कोई दूसरा उपयुक्त नहीं।
बर दायक प्रनतारति भंजन। कृपासिंधु सेवक मन रंजन॥इच्छित फल बिनु सिव अवराधे। लहिअ न कोटि जोग जप साधें॥॥४॥
वे वरदाता, शरणागत की पीड़ा हरने वाले, कृपा के सागर और सेवक के मन को प्रसन्न करने वाले हैं। शिवजी की आराधना के बिना करोड़ों योग-जप से भी इच्छित फल नहीं मिलता।
अस कहि नारद सुमिरि हरि गिरिजहि दीन्हि असीस।होइहि यह कल्यान अब संसय तजहु गिरीस॥७०॥
ऐसा कहकर नारदजी ने हरि का स्मरण किया और गिरिजा को आशीर्वाद दिया — यह विवाह अवश्य कल्याणकारी होगा, अब हे गिरीश, सारा संशय त्याग दो।
कहि अस ब्रह्मभवन मुनि गयऊ। आगिल चरित सुनहु जस भयऊ॥पतिहि एकांत पाइ कह मैना। नाथ न मैं समुझे मुनि बैना॥॥१॥
यह कहकर मुनि ब्रह्मलोक चले गए। अब आगे का चरित्र सुनो — पति को अकेला पाकर मैना ने कहा — नाथ, मुनि की बात मुझे पूरी तरह समझ नहीं आई।
जौं घरु बरु कुलु होइ अनूपा। करिअ बिबाहु सुता अनुरुपा॥न त कन्या बरु रहउ कुआरी। कंत उमा मम प्रानपिआरी॥॥२॥
यदि सुयोग्य घर, वर और कुल मिले, तभी हमें अपनी बेटी के योग्य विवाह करना चाहिए, अन्यथा कन्या भले ही कुँआरी रह जाए — उमा मुझे अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय है।
जौं न मिलहि बरु गिरिजहि जोगू। गिरि जड़ सहज कहिहि सबु लोगू॥सोइ बिचारि पति करेहु बिबाहू। जेहिं न बहोरि होइ उर दाहू॥॥३॥
यदि गिरिजा के योग्य वर न मिला, तो सारा संसार पर्वत को मूर्ख कहेगा। यह सोचकर, हे स्वामी, विवाह इस प्रकार कीजिए कि हृदय में फिर कभी पछतावा न हो।
अस कहि परि चरन धरि सीसा। बोले सहित सनेह गिरीसा॥बरु पावक प्रगटे ससि माहीं। नारद बचनु अन्यथा नाहीं॥॥४॥
ऐसा कहकर वे पति के चरणों में गिर पड़ीं, गिरीश ने स्नेहपूर्वक कहा — जैसे चंद्रमा में अग्नि प्रकट होती है, वैसे ही वर मिलना निश्चित है; नारदजी के वचन कभी असत्य नहीं होते।
प्रिया सोचु परिहरहु सबु सुमिरहु श्रीभगवान।पारबतिहि निरमयउ जेहिं सोइ करिहि कल्यान॥७१॥
प्रिये, सारी चिंता त्याग दो, और केवल श्रीभगवान का ही स्मरण करो — जिन्होंने पार्वती को रचा है, वही उनका कल्याण भी करेंगे।
अब जौं तुम्हहि सुता पर नेहू। तौ अस जाइ सिखावन देहू॥करै सो तपु जेहिं मिलहिं महेसू। आन उपाय न मिटिहि कलेसू॥॥१॥
यदि तुम्हें पुत्री से इतना ही स्नेह है, तो जाकर उसे यही शिक्षा दो — वह ऐसी तपस्या करे जिससे उसे महेश ही प्राप्त हों, इसके सिवा और कोई उपाय इस दुःख को मिटाने का नहीं।
नारद बचन सगर्भ सहेतू। सुंदर सब गुन निधि बृषकेतू॥अस बिचारि तुम्ह तजहु असंका। सबहि भाँति संकरु अकलंका॥॥२॥
नारदजी के वचन गूढ़ अर्थ और शुभ प्रयोजन से भरे हैं, वृषकेतु (शिवजी) समस्त गुणों के भंडार हैं। यह विचारकर तुम सारी शंका त्याग दो, शंकरजी हर प्रकार से निष्कलंक हैं।
सुनि पति बचन हरषि मन माहीं। गई तुरत उठि गिरिजा पाहीं॥उमहि बिलोकि नयन भरे बारी। सहित सनेह गोद बैठारी॥॥३॥
पति के वचन सुनकर मैना का मन हर्ष से भर गया, वे तुरंत उठकर गिरिजा के पास गईं। उमा को देखते ही उनकी आँखें प्रेमाश्रुओं से भर गईं, और उन्होंने स्नेहपूर्वक उसे गोद में बिठा लिया।
बारहिं बार लेति उर लाई। गदगद कंठ न कछु कहि जाई॥जगत मातु सर्बग्य भवानी। मातु सुखद बोलीं मृदु बानी॥॥४॥
वे बार-बार उमा को हृदय से लगातीं, गद्गद कंठ से कुछ कहा न जाता। तब जगत की माता, सर्वज्ञ भवानी ने अपनी माता को सुख देने वाली मृदु वाणी में कहा —
सुनहि मातु मैं दीख अस सपन सुनावउँ तोहि।सुंदर गौर सुबिप्रबर अस उपदेसेउ मोहि॥७२॥
हे माता, सुनिए, मैंने एक स्वप्न देखा है, वही आपको सुनाती हूँ — एक सुंदर, गौरवर्ण, श्रेष्ठ वर ने आकर मुझे यह उपदेश दिया।
करहि जाइ तपु सैलकुमारी। नारद कहा सो सत्य बिचारी॥मातु पितहि पुनि यह मत भावा। तपु सुखप्रद दुख दोष नसावा॥॥१॥
हे पर्वतकुमारी, जाकर तपस्या करो — नारदजी की बात को सत्य मानकर विचार किया गया। माता-पिता को भी यह विचार भला लगा, क्योंकि तपस्या सुख देने वाली और दुःख-दोष का नाश करने वाली होती है।
तपबल रचइ प्रपंच बिधाता। तपबल बिष्नु सकल जग त्राता॥तपबल संभु करहिं संघारा। तपबल सेषु धरइ महिभारा॥॥२॥
तपोबल से ही ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते हैं, तपोबल से ही विष्णु सारे संसार की रक्षा करते हैं। तपोबल से ही शिवजी संहार करते हैं, और तपोबल से ही शेषनाग पृथ्वी का भार धारण करते हैं।
तप अधार सब सृष्टि भवानी। करहि जाइ तपु अस जियँ जानी॥सुनत बचन बिसमित महतारी। सपन सुनायउ गिरिहि हँकारी॥॥३॥
हे भवानी, सारी सृष्टि तप के ही आधार पर टिकी है — यह जानकर पार्वती के मन में यह विचार दृढ़ हुआ कि जाकर तपस्या करूँ। यह वचन सुनकर माता चकित रह गई, और उसने पर्वत को बुलाकर वह स्वप्न सुनाया।
मातु पितहि बहुबिधि समुझाई। चलीं उमा तप हित हरषाई॥प्रिय परिवार पिता अरु माता। भए बिकल मुख आव न बाता॥॥४॥
माता-पिता को बहुत प्रकार से समझाकर उमा हर्षित मन से तप के लिए चल दीं। प्रिय परिवार, पिता और माता व्याकुल हो उठे, मुख से कोई बात न निकली।
बेदसिरा मुनि आइ तब सबहि कहा समुझाइ।पारबती महिमा सुनत रहे प्रबोधहि पाइ॥७३॥
तब वेदशिरा मुनि ने आकर सबको समझाया; पार्वती की महिमा सुनकर सब को सांत्वना मिली और वे शांत हो गए।
उर धरि उमा प्रानपति चरना। जाइ बिपिन लागीं तपु करना॥अति सुकुमार न तनु तप जोगू। पति पद सुमिरि तजेउ सबु भोगू॥॥१॥
उमा ने प्राणपति (शिव) के चरणों को हृदय में धारण किया और वन में जाकर तपस्या करने लगीं। शरीर अत्यंत सुकुमार था, तप के योग्य नहीं था, फिर भी पति के चरणों का स्मरण कर उन्होंने सारे भोग त्याग दिए।
नित नव चरन उपज अनुरागा। बिसरी देह तपहिं मनु लागा॥संबत सहस मूल फल खाए। सागु खाइ सत बरष गवाँए॥॥२॥
प्रतिदिन उनके चरणों में नया अनुराग उपजता, देह की सुध बिसर गई और मन तपस्या में ही लग गया। एक हजार वर्ष उन्होंने केवल कंद-मूल-फल खाकर बिताए, फिर सौ वर्ष तक केवल साग खाकर काटे।
कछु दिन भोजनु बारि बतासा। किए कठिन कछु दिन उपबासा॥बेल पाती महि परइ सुखाई। तीनि सहस संबत सोइ खाई॥॥३॥
कुछ दिन उन्होंने केवल जल और वायु पर कठिन उपवास किया। बेल के पत्ते भी पृथ्वी पर सूखकर गिरते, उन्हें ही खाते हुए तीन हजार वर्ष बिताए।
पुनि परिहरे सुखानेउ परना। उमहि नाम तब भयउ अपरना॥देखि उमहि तप खीन सरीरा। ब्रह्मगिरा भै गगन गभीरा॥॥४॥
फिर वे सूखे पत्ते भी छोड़ दिए, तभी से उमा का नाम अपर्णा पड़ा। तप से क्षीण हुए उनके शरीर को देखकर देवताओं के मन गंभीर चिंता से भर उठे।
भयउ मनोरथ सुफल तव सुनु गिरिजाकुमारि।परिहरु दुसह कलेस सब अब मिलिहहिं त्रिपुरारि॥७४॥
हे गिरिराज-कुमारी, सुनो, तुम्हारा मनोरथ सफल हुआ; अब सारे असह्य क्लेश त्याग दो, त्रिपुरारि शीघ्र तुम्हें मिलेंगे।
अस तपु काहुँ न कीन्ह भवानी। भए अनेक धीर मुनि ग्यानी॥अब उर धरहु ब्रह्म बर बानी। सत्य सदा संतत सुचि जानी॥॥१॥
हे भवानी, ऐसा तप किसी और ने नहीं किया, इसी कारण अनेक धीर और ज्ञानी मुनि हुए। अब यह ब्रह्मा की श्रेष्ठ वाणी हृदय में धारण करो, इसे सदा सत्य और पवित्र जानो।
आवै पिता बोलावन जबहीं। हठ परिहरि घर जाएहु तबहीं॥मिलहिं तुम्हहि जब सप्त रिषीसा। जानेहु तब प्रमान बागीसा॥॥२॥
जब भी पिता तुम्हें बुलाने आएँ, तब हठ छोड़कर घर चली जाना। जब सप्तर्षि तुमसे मिलें, तब तुम इसे इसी वाणी की प्रामाणिकता समझ लेना।
सुनत गिरा बिधि गगन बखानी। पुलक गात गिरिजा हरषानी॥उमा चरित सुंदर मैं गावा। सुनहु संभु कर चरित सुहावा॥॥३॥
आकाशवाणी से ब्रह्मा की यह वाणी सुनकर गिरिजा का शरीर रोमांचित हो उठा और वे हर्षित हुईं। मैंने उमा का सुंदर चरित्र गाया, अब सुनो शिवजी का सुहावना चरित्र।
जब तें सती जाइ तनु त्यागा। तब तें सिव मन भयउ बिरागा॥जपहिं सदा रघुनायक नामा। जहँ तहँ सुनहिं राम गुन ग्रामा॥॥४॥
जब से सती ने जाकर देह त्यागी थी, तब से शिवजी के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया था। वे सदा रघुनाथ के नाम का जप करते और जहाँ-तहाँ राम के गुणों की चर्चा सुनते।
चिदानन्द सुखधाम सिव बिगत मोह मद काम।बिचरहिं महि धरि हृदयँ हरि सकल लोक अभिराम॥७५॥
चिदानंद, सुख के धाम शिवजी, मोह-मद-काम से रहित होकर, हृदय में हरि को धारण किए हुए, सब लोकों को सुंदर बनाते हुए पृथ्वी पर विचरण करने लगे।
कतहुँ मुनिन्ह उपदेसहिं ग्याना। कतहुँ राम गुन करहिं बखाना॥जदपि अकाम तदपि भगवाना। भगत बिरह दुख दुखित सुजाना॥॥१॥
कहीं वे मुनियों को ज्ञान का उपदेश देते, कहीं राम के गुणों का बखान करते। यद्यपि वे स्वयं निष्काम भगवान हैं, तथापि सुजान शिवजी भक्तों के विरह-दुःख से स्वयं दुखी हो जाते।
एहि बिधि गयउ कालु बहु बीती। नित नै होइ राम पद प्रीती॥नैमु प्रेमु संकर कर देखा। अबिचल हृदयँ भगति कै रेखा॥॥२॥
इस प्रकार बहुत समय बीत गया, पर राम के चरणों में उनकी प्रीति नित नई ही बनी रही। शंकरजी का यह नियम और प्रेम देखकर लगा कि उनके हृदय में भक्ति की रेखा अटल है।
प्रगटे रामु कृतग्य कृपाला। रूप सील निधि तेज बिसाला॥बहु प्रकार संकरहि सराहा। तुम्ह बिनु अस ब्रतु को निरबाहा॥॥३॥
तब कृतज्ञ और कृपालु राम, जो रूप, शील और तेज के अपार भंडार हैं, प्रकट हुए। उन्होंने शंकरजी की बहुत प्रकार से सराहना की — तुम्हारे सिवा ऐसा व्रत और कौन निभा सकता था!
बहुबिधि राम सिवहि समुझावा। पारबती कर जन्मु सुनावा॥अति पुनीत गिरिजा के करनी। बिस्तर सहित कृपानिधि बरनी॥॥४॥
राम ने शिवजी को बहुत प्रकार से समझाया और पार्वती के जन्म की कथा सुनाई। कृपानिधि ने विस्तार से गिरिजा की अत्यंत पवित्र करनी का वर्णन किया।
अब बिनती मम सुनहु सिव जौं मो पर निज नेहु।जाइ बिबाहहु सैलजहि यह मोहि मागें देहु॥७६॥
हे शिव, अब मेरी एक विनती सुनिए — यदि मुझ पर आपका स्नेह है, तो जाकर पर्वत-पुत्री से विवाह कर लीजिए, यही मेरी इच्छा मुझे माँगकर पूरी कीजिए।
कह सिव जदपि उचित अस नाहीं। नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं॥॥१॥
शिवजी बोले — यद्यपि ऐसा करना उचित तो नहीं, फिर भी हे नाथ, आपके वचन कभी टाले नहीं जा सकते।
सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरमु यह नाथ हमारा॥
आपकी आज्ञा सिर-माथे स्वीकार करना ही उचित है — हे नाथ, यही हमारा परम धर्म है।
मातु पिता गुर प्रभु कै बानी। बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी॥तुम्ह सब भाँति परम हितकारी। अग्या सिर पर नाथ तुम्हारी॥॥२॥
माता, पिता, गुरु और स्वामी के वचन बिना विचार किए ही शुभ मानकर स्वीकार करने चाहिए। आप हर प्रकार से मेरे परम हितकारी हैं, हे नाथ, आपकी आज्ञा मुझे सिर-माथे स्वीकार है।
प्रभु तोषेउ सुनि संकर बचना। भक्ति बिबेक धर्म जुत रचना॥कह प्रभु हर तुम्हार पन रहेऊ। अब उर राखेहु जो हम कहेऊ॥॥३॥
शिवजी के भक्ति, विवेक और धर्म से युक्त वचन सुनकर प्रभु प्रसन्न हुए। प्रभु ने कहा — हे हर, आपका व्रत बना रहा, अब जो मैंने कहा है उसे सदा हृदय में रखना।
अंतरधान भए अस भाषी। संकर सोइ मूरति उर राखी॥तबहिं सप्तरिषि सिव पहिं आए। बोले प्रभु अति बचन सुहाए॥॥४॥
ऐसा कहकर प्रभु अंतर्धान हो गए, शंकरजी ने उसी मूर्ति को अपने हृदय में बसा लिया। तभी सप्तर्षि शिवजी के पास आए, और प्रभु ने उनसे अत्यंत मधुर वचन कहे।
पारबती पहिं जाइ तुम्ह प्रेम परिच्छा लेहु।गिरिहि प्रेरि पठएहु भवन दूरि करेहु संदेहु॥७७॥
तुम पार्वती के पास जाकर उनके प्रेम की परीक्षा लो; फिर पर्वत को प्रेरित कर उन्हें घर भिजवा देना और उनका सारा संदेह दूर कर देना।
रिषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी। मूरतिमंत तपस्या जैसी॥बोले मुनि सुनु सैलकुमारी। करहु कवन कारन तपु भारी॥॥१॥
ऋषियों ने वहाँ गौरी को मूर्तिमान तपस्या के समान देखा। मुनियों ने कहा — हे शैलकुमारी, सुनो, तुम किस कारण इतना भारी तप कर रही हो?
केहि अवराधहु का तुम्ह चहहू। हम सन सत्य मरमु किन कहहू॥कहत बचन मनु अति सकुचाई। हँसिहहु सुनि हमारि जड़ताई॥॥२॥
किसकी आराधना कर रही हो, क्या चाहती हो, हमें सच्चा भेद क्यों नहीं बताती? यह वचन कहते हुए उनका मन बहुत सकुचाया — कहीं हमारी मूर्खता सुनकर तुम हँस न पड़ो।
मनु हठ परा न सुनइ सिखावा। चहत बारि पर भीति उठावा॥नारद कहा सत्य सोइ जाना। बिनु पंखन्ह हम चहहिं उड़ाना॥॥३॥
मन हठ पर अड़ा है, कोई सीख नहीं सुनता, मानो जल पर दीवार खड़ी करना चाहते हों। नारद का कथन सत्य समझकर मैंने माना, अब बिना पंखों के भी हम उड़ना चाहते हैं।
देखहु मुनि अबिबेकु हमारा। चाहिअ सदा सिवहि भरतारा॥॥४॥
हे मुनि, हमारे इस अविवेक को देखिए — हमें सदा शिवजी को ही पति के रूप में चाहिए।
सुनत बचन बिहसे रिषय गिरिसंभव तब देह।नारद कर उपदेसु सुनि कहहु बसेउ किसु गेह॥७८॥
यह वचन सुनकर ऋषि हँस पड़े — हे गिरिजा, यह देह तुम्हारी है, पर नारद के उपदेश का पहले क्या परिणाम हुआ, यह भी तो बताओ।
दच्छसुतन्ह उपदेसेन्हि जाई। तिन्ह फिरि भवनु न देखा आई॥चित्रकेतु कर घरु उन घाला। कनककसिपु कर पुनि अस हाला॥॥१॥
दक्ष के पुत्रों को भी नारदजी ने ऐसा ही उपदेश दिया था, और वे फिर कभी घर लौटकर नहीं देख सके। चित्रकेतु का घर भी उन्होंने ऐसे ही उजाड़ा, और हिरण्यकशिपु का भी वैसा ही हाल किया।
नारद सिख जे सुनहिं नर नारी। अवसि होहिं तजि भवनु भिखारी॥मन कपटी तन सज्जन चीन्हा। आपु सरिस सबही चह कीन्हा॥॥२॥
जो नर-नारी नारद की सीख सुनते हैं, वे अवश्य घर त्यागकर भिखारी हो जाते हैं। वे मन के कपटी और तन से साधु दिखते हैं, और सबको अपने ही समान बनाना चाहते हैं।
तेहि कें बचन मानि बिस्वासा। तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा॥निर्गुन निलज कुबेष कपाली। अकुल अगेह दिगंबर ब्याली॥॥३॥
उन्हीं के वचनों पर विश्वास कर तुम एक ऐसे पति की कामना करती हो जो स्वभाव से ही उदासीन, निर्गुण, निर्लज्ज, कुवेषधारी, कपाली, कुलहीन, गृहहीन, दिगंबर और साँपों से युक्त है।
कहहु कवन सुखु अस बरु पाएँ। भल भूलिहु ठग के बौराएँ॥पंच कहें सिव सती बिबाही। पुनि अवडेरि मराएन्हि ताही॥॥४॥
बताओ ऐसा वर पाकर कौन-सा सुख मिलेगा — तुम भला भूलकर ठग की बातों में बहक गई हो। पहले भी पंचों के कहने पर शिव से सती का विवाह हुआ था, पर अंततः उसी उपेक्षा में उन्हें मरना पड़ा।
अब सुख सोवत सोचु नहिं भीख मागि भव खाहिं।सहज एकाकिन्ह के भवन कबहुँ कि नारि खटाहिं॥७९॥
अब वे निश्चिंत सोते हैं, भीख माँगकर खाते हैं, कोई चिंता नहीं करते। ऐसे स्वभाव से एकाकी रहने वालों के घर में भला कभी स्त्री टिक सकती है?
अजहूँ मानहु कहा हमारा। हम तुम्ह कहुँ बरु नीक बिचारा॥अति सुंदर सुचि सुखद सुसीला। गावहिं बेद जासु जस लीला॥॥१॥
अब भी हमारी बात मान लो, हमने तुम्हारे लिए एक अच्छा वर सोच रखा है — अत्यंत सुंदर, पवित्र, सुखदायी और सुशील, जिसकी लीला का यश वेद भी गाते हैं।
दूषन रहित सकल गुन रासी। श्रीपति पुर बैकुंठ निवासी॥अस बरु तुम्हहि मिलाउब आनी। सुनत बिहसि कह बचन भवानी॥॥२॥
दोष रहित, सब गुणों की राशि, लक्ष्मीपति और वैकुंठ में निवास करने वाला — ऐसा वर हम लाकर तुम्हें दिलाएँगे। यह सुनकर भवानी मुस्कराकर बोलीं —
सत्य कहेहु गिरिभव तनु एहा। हठ न छूट छूटै बरु देहा॥कनकउ पुनि पषान तें होई। जारेहुँ सहजु न परिहर सोई॥॥३॥
हे मुनिवर, आपने सच कहा, यह शरीर पर्वत की संतान है, हठ कभी नहीं छूटेगा, चाहे शरीर ही क्यों न छूट जाए। सोना भी पत्थर में मिला होता है, पर उसे आग में तपाने पर भी उसका स्वाभाविक गुण नहीं छूटता।
नारद बचन न मैं परिहरउँ। बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ॥गुर कें बचन प्रतीति न जेही। सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही॥॥४॥
मैं नारद के वचन कभी नहीं त्यागूँगी, चाहे घर बसे या उजड़ जाए, मुझे कोई भय नहीं। जिसे गुरु के वचनों पर विश्वास नहीं, उसे स्वप्न में भी सुख और सिद्धि सुलभ नहीं होती।
महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम।जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥८०॥
महादेव अवगुणों के घर हैं और विष्णु सब गुणों के धाम — पर जिसका मन जिसमें रम जाए, उसका प्रेम-कार्य उसी से बनता है।
जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा। सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा॥अब मैं जन्मु संभु हित हारा। को गुन दूषन करै बिचारा॥॥१॥
यदि तुम मुनिवरो, मुझसे पहले ही मिले होते, तो शायद मैं तुम्हारी सीख भी सिर झुकाकर सुन लेती। पर अब मेरा यह जन्म शिवजी के लिए ही समर्पित हो चुका है, अब गुण-दोष का विचार कौन करे?
जौं तुम्हरे हठ हृदयँ बिसेषी। रहि न जाइ बिनु किए बरेषी॥तौ कौतुकिअन्ह आलसु नाहीं। बर कन्या अनेक जग माहीं॥॥२॥
यदि तुम्हारे हृदय में हठ इतनी गहरी बैठ गई है कि बिना विवाह के रहा ही नहीं जाता, तो हे कौतुक-प्रिय मुनियो, इसमें आलस्य की क्या बात — संसार में और भी अनेक कन्याएँ हैं।
जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिं सत बार महेसू॥॥३॥
करोड़ों जन्मों तक भी मेरा यह हठ बना रहेगा — मैं शंकर को ही वरूँगी, नहीं तो कुँआरी ही रहूँगी। मैं नारद का उपदेश कभी नहीं त्यागूँगी, चाहे महेश स्वयं सौ बार भी ऐसा कहें।
मैं पा परउँ कहइ जगदंबा। तुम्ह गृह गवनहु भयउ बिलंबा॥देखि प्रेमु बोले मुनि ग्यानी। जय जय जगदंबिके भवानी॥॥४॥
जगदंबा ने कहा — मैं तुम्हारे चरणों में प्रणाम करती हूँ, अब तुम अपने घर लौट जाओ, बहुत विलंब हो चुका है। उनका प्रेम देखकर ज्ञानी मुनि बोले — जय हो, जय हो, हे जगदंबिके भवानी!
तुम्ह माया भगवान सिव सकल जगत पितु मातु।नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गातु॥८१॥
तुम माया हो, शिवजी भगवान हैं, तुम दोनों समस्त जगत के माता-पिता हो — यह कहकर मुनि उनके चरणों में सिर नवाकर बार-बार हर्षित होते हुए वहाँ से चल दिए।
जाइ मुनिन्ह हिमवंतु पठाए। करि बिनती गिरजहिं गृह ल्याए॥बहुरि सप्तरिषि सिव पहिं जाई। कथा उमा के सकल सुनाई॥॥१॥
मुनियों ने जाकर हिमवान को भेजा, और विनती करके गिरिजा को घर ले आए। फिर सप्तर्षि शिवजी के पास जाकर उमा की सारी कथा सुनाई।
भए मगन सिव सुनत सनेहा। हरषि सप्तरिषि गवने गेहा॥मनु थिर करि तब संभु सुजाना। लगे करन रघुनायक ध्याना॥॥२॥
यह स्नेहभरी कथा सुनते ही शिवजी भाव-विभोर हो गए; सप्तर्षि हर्षित होकर अपने-अपने घर लौट गए। मन को स्थिर कर सुजान शंकर तब रघुनाथ का ध्यान करने लगे।
तारकु असुर भयउ तेहि काला। भुज प्रताप बल तेज बिसाला॥तेहिं सब लोक लोकपति जीते। भए देव सुख संपति रीते॥॥३॥
उसी समय तारकासुर नामक असुर उत्पन्न हुआ, जिसकी भुजाओं का प्रताप, बल और तेज अत्यंत विशाल था। उसने सभी लोकों के लोकपालों को जीत लिया, और देवता सुख-संपत्ति से रहित हो गए।
अजर अमर सो जीति न जाई। हारे सुर करि बिबिध लराई॥तब बिरंचि सन जाइ पुकारे। देखे बिधि सब देव दुखारे॥॥४॥
वह अजर-अमर था, कोई उसे जीत नहीं सकता था; देवता अनेक प्रकार से युद्ध करके भी हार गए। तब वे ब्रह्माजी के पास जाकर पुकार करने लगे; ब्रह्माजी ने सब देवताओं को दुखी देखा।
सब सन कहा बुझाइ बिधि दनुज निधन तब होइ।संभु सुक्र संभूत सुत एहि जीतइ रन सोइ॥८२॥
ब्रह्माजी ने सबको समझाकर कहा — इस दैत्य की मृत्यु तभी होगी जब शिवजी और उमा से उत्पन्न पुत्र युद्ध में इसे जीतेगा।
मोर कहा सुनि करहु उपाई। होइहि ईस्वर करिहि सहाई॥सतीं जो तजी दच्छ मख देहा। जनमी जाइ हिमाचल गेहा॥॥१॥
मेरी यह बात सुनकर उपाय करो, ईश्वर स्वयं सहायक होंगे — जो सती ने दक्ष के यज्ञ में देह त्यागी थी, वही जाकर हिमाचल के घर जन्मीं।
तेहिं तपु कीन्ह संभु पति लागी। सिव समाधि बैठे सबु त्यागी॥जदपि अहइ असमंजस भारी। तदपि बात एक सुनहु हमारी॥॥२॥
उस तपस्या के प्रभाव से शिवजी की समाधि दृढ़ हो गई, वे सब कुछ त्यागकर समाधि में बैठ गए। यद्यपि यह बड़ा असमंजस भरा कार्य है, तथापि हमारी एक बात सुनो।
पठवहु कामु जाइ सिव पाहीं। करै छोभु संकर मन माहीं॥तब हम जाइ सिवहि सिर नाई। करवाउब बिबाहु बरिआई॥॥३॥
कामदेव को भेजो, वे जाकर शिवजी के मन में क्षोभ उत्पन्न करेंगे। तब हम जाकर शिवजी के चरणों में सिर नवाकर बलपूर्वक उनका विवाह करा देंगे।
एहि बिधि भलेहि देवहित होई। मत अति नीक कहइ सबु कोई॥अस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति हेतू। प्रगटेउ बिषमबान झषकेतू॥॥४॥
इस प्रकार देवताओं का हित भली-भाँति सिद्ध होगा — सबने इस विचार को अत्यंत उत्तम बताया। देवताओं ने बड़े प्रेम से स्तुति की, तब विषम बाणों वाले कामदेव प्रकट हुए।
सुरन्ह कही निज बिपति सब सुनि मन कीन्ह बिचार।संभु बिरोध न कुसल मोहि बिहसि कहेउ अस मार॥८३॥
देवताओं ने अपनी सारी विपत्ति कामदेव को सुनाई; यह सुनकर उन्होंने मन में विचार किया और मुस्कराकर कहा — शिवजी से बैर करना मेरे लिए कुशलकारी नहीं है।
तदपि करब मैं काजु तुम्हारा। श्रुति कह परम धरम उपकारा॥पर हित लागि तजइ जो देही। संतत संत प्रसंसहिं तेही॥॥१॥
फिर भी मैं तुम्हारा कार्य अवश्य करूँगा, क्योंकि वेद परोपकार को ही परम धर्म कहते हैं। जो दूसरों के हित के लिए अपना शरीर तक त्याग दे, संत सदा उसी की प्रशंसा करते हैं।
अस कहि चलेउ सबहि सिरु नाई। सुमन धनुष कर सहित सहाई॥चलत मार अस हृदयँ बिचारा। सिव बिरोध ध्रुव मरनु हमारा॥॥२॥
ऐसा कहकर, सबको सिर नवाकर, फूलों का धनुष हाथ में लिए, अपने सहायकों सहित कामदेव चल पड़े। चलते हुए मन में यह विचार आया — शिवजी से बैर करना मानो निश्चित मृत्यु मोल लेना है।
तब आपन प्रभाउ बिस्तारा। निज बस कीन्ह सकल संसारा॥कोपेउ जबहिं बारिचरकेतू। छन महुँ मिटे सकल श्रुति सेतू॥॥३॥
तब भी उसने अपना प्रभाव फैलाया और सारे संसार को अपने वश में कर लिया। जैसे ही जलचरकेतु (कामदेव) क्रोधित हुआ, क्षणभर में सारे वैदिक मर्यादा के बाँध टूट गए।
ब्रह्मचर्ज ब्रत संजम नाना। धीरज धरम ग्यान बिग्याना॥सदाचार जप जोग बिरागा। सभय बिबेक कटकु सब भागा॥॥४॥
ब्रह्मचर्य, अनेक व्रत और संयम, धैर्य, धर्म, ज्ञान-विज्ञान, सदाचार, जप, योग और वैराग्य — विवेक की यह सारी सेना भय खाकर भाग खड़ी हुई।
भागेउ बिबेक सहाय सहित सो सुभट संजुग महि मुरे।सदग्रंथ पर्बत कंदरन्हि महुँ जाइ तेहि अवसर दुरे॥होनिहार का करतार को रखवार जग खरभरु परा।दुइ माथ केहि रतिनाथ जेहि कहुँ कोपि कर धनु सरु धरा॥
विवेक अपने सहायकों सहित उस युद्धभूमि में हार मानकर भाग गया, और उसी समय जाकर सद्ग्रंथों की तरह पर्वतों की कंदराओं में जा छिपा। होनी को कौन टाल सकता है, कर्ता कौन है, रक्षक कौन — संसार में सब हलचल मच गई; उस रतिनाथ के आगे किसका सिर न झुके, जिसने क्रोधित होकर हाथ में धनुष-बाण उठा लिया।
जे सजीव जग अचर चर नारि पुरुष अस नाम।ते निज निज मरजाद तजि भए सकल बस काम॥८४॥
संसार के जितने भी सजीव, चर-अचर, नर-नारी कहलाते हैं, वे सब अपनी-अपनी मर्यादा त्यागकर काम के वश में हो गए।
सब के हृदयँ मदन अभिलाषा। लता निहारि नवहिं तरु साखा॥नदीं उमगि अंबुधि कहुँ धाई। संगम करहिं तलाव तलाई॥॥१॥
सबके हृदय में कामेच्छा जाग उठी, लताएँ वृक्षों की डालियों को देखकर झुक जातीं। नदियाँ उमड़कर समुद्र की ओर दौड़ पड़तीं, तालाब आपस में संगम करने लगते।
जहँ असि दसा जड़न्ह के बरनी। को कहि सकइ सचेतन करनी॥पसु पच्छी नभ जल थलचारी। भए कामबस समय बिसारी॥॥२॥
जब जड़ पदार्थों की भी ऐसी दशा वर्णित है, तो सचेतन प्राणियों की करनी कौन कह सकता है। आकाश, जल और थल में विचरने वाले सभी पशु-पक्षी समय-सुध भूलकर काम के वश हो गए।
मदन अंध ब्याकुल सब लोका। निसि दिनु नहिं अवलोकहिं कोका॥देव दनुज नर किंनर ब्याला। प्रेत पिसाच भूत बेताला॥॥३॥
सारा संसार कामांध और व्याकुल हो गया, चकवा-चकवी रात-दिन एक-दूसरे को देखे बिना नहीं रह सकते। देव, दानव, मनुष्य, किन्नर, सर्प, प्रेत, पिशाच, भूत और बेताल — सब इसी दशा में पड़ गए।
इन्ह के दसा न कहेउँ बखानी। सदा काम के चेरे जानी॥सिद्ध बिरक्त महामुनि जोगी। तेपि कामबस भए बियोगी॥॥४॥
इन सबकी दशा का मैंने विस्तार से वर्णन नहीं किया, क्योंकि ये तो सदा से ही काम के दास माने जाते हैं। पर सिद्ध, विरक्त, महामुनि और योगी भी काम के वश होकर विरह में तड़पने लगे।
भए कामबस जोगीस तापस पावँरन्हि की को कहै।देखहिं चराचर नारिमय जे ब्रह्ममय देखत रहे॥अबला बिलोकहिं पुरुषमय जगु पुरुष सब अबलामयं।दुइ दंड भरि ब्रह्मांड भीतर कामकृत कौतुक अयं॥
योगीश्वर और तपस्वी भी काम के वश हो गए, फिर साधारण जनों की तो बात ही क्या। जो ब्रह्ममय दृष्टि से सबको देखते थे, वे अब सारे चराचर जगत को नारीमय देखने लगे। स्त्रियाँ पुरुषमय जगत देखतीं, पुरुष सबको स्त्रीमय — दो घड़ी भर के लिए सारे ब्रह्मांड में यह कामकृत कौतुक ऐसा ही फैल गया।
धरी न काहूँ धिर सबके मन मनसिज हरे।जे राखे रघुबीर ते उबरे तेहि काल महुँ॥८५॥
उस समय किसी का भी धैर्य टिक न सका, कामदेव ने सबके मन हर लिए; केवल जिन्हें रघुवीर ने बचाया, वे ही उस काल में इससे उबर पाए।
उभय घरी अस कौतुक भयऊ। जौ लगि कामु संभु पहिं गयऊ॥सिवहि बिलोकि ससंकेउ मारू। भयउ जथाथिति सबु संसारू॥॥१॥
यह विचित्र कौतुक तभी तक हुआ, जब तक कामदेव शिवजी के पास नहीं पहुँचा। शिवजी को देखते ही कामदेव भयभीत हो गया, और सारा संसार अपनी यथार्थ स्थिति में लौट आया।
भए तुरत सब जीव सुखारे। जिमि मद उतरि गए मतवारे॥रुद्रहि देखि मदन भय माना। दुराधरष दुर्गम भगवाना॥॥२॥
सारे जीव तुरंत वैसे ही सुखी हो गए, जैसे नशा उतरने पर मतवाले सामान्य हो जाते हैं। रुद्र को देखकर कामदेव को भय हुआ, क्योंकि वे भगवान अत्यंत दुर्जेय और दुर्गम्य हैं।
फिरत लाज कछु करि नहिं जाई। मरनु ठानि मन रचेसि उपाई॥प्रगटेसि तुरत रुचिर रितुराजा। कुसुमित नव तरु राजि बिराजा॥॥३॥
लौट जाने में भी लज्जा आ रही थी और वहाँ कुछ करते भी नहीं बन रहा था; अंततः मृत्यु का निश्चय कर उसने मन में एक उपाय रचा। उसने तुरंत सुंदर ऋतुराज वसंत को प्रकट कर दिया, जिसमें नए-नए फूलों से लदे वृक्षों की पंक्तियाँ शोभा पाने लगीं।
बन उपबन बापिका तड़ागा। परम सुभग सब दिसा बिभागा॥जहँ तहँ जनु उमगत अनुरागा। देखि मुएहुँ मन मनसिज जागा॥॥४॥
वन-उपवन, बावड़ी और तालाब — सभी दिशाएँ परम सुंदर हो उठीं। जहाँ-तहाँ मानो प्रेम उमड़ रहा हो, ऐसा दृश्य देखकर मरे हुए मन में भी कामवासना जाग उठती।
जागइ मनोभव मुएहुँ मन बन सुभगता न परै कही।सीतल सुगंध सुमंद मारुत मदन अनल सखा सही॥बिकसे सरन्हि बहु कंज गुंजत पुंज मंजुल मधुकरा।कलहंस पिक सुक सरस रव करि गान नाचहिं अपछरा॥
वसंत में मन की काम-वासना ऐसी जाग उठती कि मरा हुआ मन भी चंचल हो जाए, वन की सुंदरता का वर्णन ही नहीं हो सकता। शीतल, सुगंधित, मंद बयार मानो कामरूपी अग्नि की सच्ची सखी बन गई। सरोवरों में अनेक कमल खिले, भौंरों के झुंड गुनगुना रहे थे, हंस, कोयल और तोते मधुर स्वर में बोलते और अप्सराएँ गा-नाचकर आनंद मनाती थीं।
सकल कला करि कोटि बिधि हारेउ सेन समेत।चली न अचल समाधि सिव कोपेउ हृदयनिकेत॥८६॥
सारी कलाएँ और करोड़ों उपाय आजमाकर कामदेव अपनी सेना सहित हार गया, फिर भी शिवजी की अचल समाधि टस से मस न हुई; हृदय में बसे शिवजी को अंततः क्रोध आ गया।
देखि रसाल बिटप बर साखा। तेहि पर चढ़ेउ मदनु मन माखा॥सुमन चाप निज सर संधाने। अति रिस ताकि श्रवन लगि ताने॥॥१॥
एक सुंदर आम के वृक्ष की श्रेष्ठ शाखा देखकर, मन में क्रोधित कामदेव उस पर चढ़ गया। उसने फूलों के धनुष पर अपना बाण चढ़ाया और बड़े क्रोध से निशाना साधकर कान तक खींचा।
छाड़े बिषम बिसिख उर लागे। छुटि समाधि संभु तब जागे॥भयउ ईस मन छोभु बिसेषी। नयन उघारि सकल दिसि देखी॥॥२॥
उसने भयंकर बाण छोड़ा, जो शिवजी के हृदय में जा लगा; उससे उनकी समाधि टूट गई और शिवजी जाग उठे। ईश्वर के मन में अत्यंत क्षोभ हुआ, उन्होंने आँखें खोलकर चारों दिशाओं में देखा।
सौरभ पल्लव मदनु बिलोका। भयउ कोपु कंपेउ त्रैलोका॥तब सिवँ तीसर नयन उघारा। चितवत कामु भयउ जरि छारा॥॥३॥
सुगंधित नए पल्लवों के बीच छिपे कामदेव को देखते ही उन्हें क्रोध हो आया, और उस क्रोध से तीनों लोक काँप उठे। तब शिवजी ने अपना तीसरा नेत्र खोला, और उसकी दृष्टि पड़ते ही कामदेव जलकर भस्म हो गया।
हाहाकार भयउ जग भारी। डरपे सुर भए असुर सुखारी॥समुझि कामसुखु सोचहिं भोगी। भए अकंटक साधक जोगी॥॥४॥
सारे संसार में भारी हाहाकार मच गया, देवता डर गए और असुर प्रसन्न हो उठे। भोगी लोग काम-सुख की समाप्ति सोचकर शोकाकुल हुए, जबकि साधक और योगी अपने विघ्न से मुक्त होकर सुखी हुए।
जोगी अकंटक भए पति गति सुनत रति मुरुछित भई।रोदति बदति बहु भाँति करुना करति संकर पहिं गई॥अति प्रेम करि बिनती बिबिध बिधि जोरि कर सन्मुख रही।प्रभु आसुतोष कृपाल सिव अबला निरखि बोले सही॥
योगी-जन निष्कंटक हो गए, पर अपने पति की यह दशा सुनते ही रति मूर्छित हो गई। वह रोती-बिलखती, अनेक प्रकार से करुण विलाप करती हुई शिवजी के पास गई। बड़े प्रेम और विनय से हाथ जोड़े वह उनके सम्मुख खड़ी रही, तब कृपालु और आशुतोष प्रभु शिवजी ने उस असहाय स्त्री को देखकर सचमुच करुणा से वचन कहे।
अब तें रति तव नाथ कर होइहि नामु अनंगु।बिनु बपु ब्यापिहि सबहि पुनि सुनु निज मिलन प्रसंगु॥८७॥
हे रति, अब से तुम्हारे पति का नाम अनंग होगा, वे बिना शरीर के ही सबमें व्याप्त रहेंगे; अब अपने पुनर्मिलन का प्रसंग भी सुन लो।
जब जदुबंस कृष्न अवतारा। होइहि हरन महा महिभारा॥कृष्न तनय होइहि पति तोरा। बचनु अन्यथा होइ न मोरा॥॥१॥
जब यदुवंश में कृष्ण अवतार होगा और वे पृथ्वी का महान भार हरण करेंगे, तब कृष्ण का ही पुत्र तुम्हारा पति बनेगा — मेरी यह बात कभी असत्य नहीं होगी।
रति गवनी सुनि संकर बानी। कथा अपर अब कहउँ बखानी॥देवन्ह समाचार सब पाए। ब्रह्मादिक बैकुंठ सिधाए॥॥२॥
शिवजी की यह वाणी सुनकर रति चली गई; अब आगे की अलग कथा कहता हूँ, सुनो। जब देवताओं को यह सारा समाचार मिला, तो ब्रह्मा आदि देवता वैकुंठ चले गए।
सब सुर बिष्नु बिरंचि समेता। गए जहाँ सिव कृपानिकेता॥पृथक पृथक तिन्ह कीन्हि प्रसंसा। भए प्रसन्न चंद्र अवतंसा॥॥३॥
विष्णु और ब्रह्मा सहित सभी देवता वहाँ गए जहाँ कृपानिधान शिवजी विराजमान थे। उन्होंने अलग-अलग बड़े प्रेम से उनकी स्तुति की, तब चंद्रमा को मुकुट में धारण करने वाले शिवजी प्रसन्न हुए।
बोले कृपासिंधु बृषकेतू। कहहु अमर आए केहि हेतू॥कह बिधि तुम्ह प्रभु अंतरजामी। तदपि भगति बस बिनवउँ स्वामी॥॥४॥
कृपासागर वृषकेतु बोले — कहो देवताओ, तुम किस कारण यहाँ आए हो? ब्रह्माजी ने कहा — हे प्रभु, आप तो अंतर्यामी हैं, फिर भी भक्तिवश हम आपसे विनती करते हैं, हे स्वामी।
सकल सुरन्ह के हृदयँ अस संकर परम उछाहु।निज नयनन्हि देखा चहहिं नाथ तुम्हार बिबाहु॥८८॥
सभी देवताओं के हृदय में यही परम उत्साह है, हे शंकर, कि वे अपनी आँखों से आपका विवाह देखना चाहते हैं।
यह उत्सव देखिअ भरि लोचन। सोइ कछु करहु मदन मद मोचन॥कामु जारि रति कहुँ बरु दीन्हा। कृपासिंधु यह अति भल कीन्हा॥॥१॥
यह उत्सव हमें नेत्र भरकर देखने दीजिए, हे कामदेव के मद को नष्ट करने वाले, अब कुछ कीजिए। आपने कामदेव को जलाकर रति को वरदान दिया, हे कृपासागर, यह आपने बहुत भला किया।
सासति करि पुनि करहिं पसाऊ। नाथ प्रभु कर सहज सुभाऊ॥पारबतीं तपु कीन्ह अपारा। करहु तासु अब अंगीकारा॥॥२॥
दंड देकर फिर कृपा भी करना — यह तो प्रभु का सहज स्वभाव ही है, हे नाथ। पार्वती ने अपार तपस्या की है, अब आप उन्हें स्वीकार कीजिए।
सुनि बिधि बिनय समुझि प्रभु बानी। ऐसेइ होइ कहा सुखु मानी॥तब देवन्ह दुंदुभीं बजाईं। बरषि सुमन जय जय सुर साई॥॥३॥
ब्रह्माजी की विनती सुनकर और उनकी बात समझकर प्रभु शिवजी ने प्रसन्न मन से कहा — ऐसा ही होगा। तब देवताओं ने नगाड़े बजाए, फूल बरसाए और जय-जयकार की।
अवसरु जानि सप्तरिषि आए। तुरतहिं बिधि गिरिभवन पठाए॥प्रथम गए जहँ रही भवानी। बोले मधुर बचन छल सानी॥॥४॥
उचित अवसर जानकर सप्तर्षि वहाँ आए, ब्रह्माजी ने तुरंत उन्हें पर्वत के घर भेजा। वे पहले वहाँ गए जहाँ भवानी विराजमान थीं, और छलपूर्ण मधुर वचन बोले।
कहा हमार न सुनेहु तब नारद कें उपदेस।अब भा झूठ तुम्हार पन जारेउ कामु महेस॥८९॥
हमारी बात तब तुमने नहीं मानी थी, न ही नारद के उपदेश पर ध्यान दिया था। अब देखो, तुम्हारी प्रतिज्ञा झूठी हो गई, क्योंकि महेश ने तो कामदेव को ही भस्म कर दिया।
सुनि बोलीं मुसकाइ भवानी। उचित कहेहु मुनिबर बिग्यानी॥तुम्हरें जान कामु अब जारा। अब लगि संभु रहे सबिकारा॥॥१॥
यह सुनकर भवानी मुस्कराकर बोलीं — हे विद्वान मुनिवर, आपने ठीक ही कहा है। मैं भी जानती हूँ कि अब कामदेव को शिवजी ने जला दिया, इससे पहले तक शिवजी विकारयुक्त ही समझे जाते थे।
हमरें जान सदा सिव जोगी। अज अनवद्य अकाम अभोगी॥जौं मैं सिव सेये अस जानी। प्रीति समेत कर्म मन बानी॥॥२॥
मैं तो जानती हूँ कि शिवजी सदा योगी, अजन्मा, निर्दोष, निष्काम और निर्विकार हैं। यदि मैंने उन्हें ऐसा जानकर ही प्रेम, कर्म, मन और वचन से उनकी सेवा की है —
तौ हमार पन सुनहु मुनीसा। करिहहिं सत्य कृपानिधि ईसा॥तुम्ह जो कहा हर जारेउ मारा। सोइ अति बड़ अबिबेकु तुम्हारा॥॥३॥
तो हे मुनीश्वर, सुनिए, मेरी यह प्रतिज्ञा कृपानिधान ईश्वर सत्य करके ही दिखाएँगे। आपने जो कहा कि हर ने कामदेव को जलाया, यह कहना आपकी बड़ी भूल है।
तात अनल कर सहज सुभाऊ। हिम तेहि निकट जाइ नहिं काऊ॥गए समीप सो अवसि नसाई। असि मन्मथ महेस की नाई॥॥४॥
हे तात, आग का यह स्वाभाविक गुण है कि बर्फ कभी उसके पास नहीं टिक सकती। जो भी उसके निकट गया, वह अवश्य नष्ट हो जाता है — कामदेव और महेश का संबंध भी ठीक वैसा ही समझिए।
हियँ हरषे मुनि बचन सुनि देखि प्रीति बिस्वास।चले भवानिहि नाइ सिर गए हिमाचल पास॥९०॥
पार्वती के इन वचनों में प्रीति और विश्वास देखकर मुनि हृदय से हर्षित हुए, और उन्हें सिर नवाकर वे हिमाचल के पास चले गए।
सबु प्रसंगु गिरिपतिहि सुनावा। मदन दहन सुनि अति दुखु पावा॥बहुरि कहेउ रति कर बरदाना। सुनि हिमवंत बहुत सुखु माना॥॥१॥
उन्होंने सारा प्रसंग पर्वतराज को सुनाया; कामदेव के भस्म होने की बात सुनकर उन्हें बड़ा दुःख हुआ। फिर जब रति को दिए गए वरदान की बात कही, तो हिमवान को बहुत सुख मिला।
हृदयँ बिचारि संभु प्रभुताई। सादर मुनिबर लिए बोलाई॥सुदिनु सुनखतु सुघरी सोचाई। बेगि बेदबिधि लगन धराई॥॥२॥
शिवजी की महिमा हृदय में विचारकर उन्होंने बड़े आदर से मुनिवरों को बुलाया, और शीघ्र ही वेदविधि से शुभ दिन, नक्षत्र, मुहूर्त निश्चित कर विवाह का लग्न निकाला गया।
पत्री सप्तरिषिन्ह सोइ दीन्ही। गहि पद बिनय हिमाचल कीन्ही॥जाइ बिधिहि तिन्ह दीन्हि सो पाती। बाचत प्रीति न हृदयँ समाती॥॥३॥
सप्तर्षियों को शोभायमान लग्न-पत्री दी गई, हिमाचल ने उनके चरण पकड़कर विनती की। मुनियों ने जाकर वह पत्री ब्रह्माजी को दी, जिसे पढ़ते हुए उनके हृदय में प्रेम समाया न गया।
लगन बाचि अज सबहि सुनाई। हरषे मुनि सब सुर समुदाई॥सुमन बृष्टि नभ बाजन बाजे। मंगल कलस दसहुँ दिसि साजे॥॥४॥
ब्रह्माजी ने लग्न पढ़कर सबको सुनाया, यह सुनकर सभी मुनि और देवसमूह हर्षित हुए। आकाश से फूल बरसे, बाजे बजने लगे, और दसों दिशाओं में मंगल-कलश सजाए गए।
लगे सँवारन सकल सुर बाहन बिबिध बिमान।होहिं सगुन मंगल सुभद करहिं अपछरा गान॥९१॥
सभी देवता अपने-अपने वाहन और विविध विमान सजाने लगे, शुभ शकुन होने लगे, और अप्सराएँ मंगल-गान करने लगीं।
सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा॥कुंडल कंकन पहिरे ब्याला। तन बिभूति पट केहरि छाला॥॥१॥
शिवजी के गण उनका शृंगार करने लगे — जटाओं का मुकुट सजाया और उस पर सर्प का मौर बाँधा। कुंडल और कंगन के रूप में साँप पहनाए गए, शरीर पर भस्म और वस्त्र के रूप में सिंह-चर्म धारण कराया गया।
ससि ललाट सुंदर सिर गंगा। नयन तीनि उपबीत भुजंगा॥गरल कंठ उर नर सिर माला। असिव बेष सिवधाम कृपाला॥॥२॥
ललाट पर सुंदर चंद्रमा, सिर पर गंगा, तीन नेत्र, और यज्ञोपवीत के रूप में सर्प — कंठ में विष, वक्षस्थल पर नरमुंडों की माला — ऐसे अशुभ-से दिखते वेष में भी शिवधाम कृपालु शोभा पा रहे थे।
कर त्रिसूल अरु डमरु बिराजा। चले बसहँ चढ़ि बाजहिं बाजा॥देखि सिवहि सुरत्रिय मुसुकाहीं। बर लायक दुलहिनि जग नाहीं॥॥३॥
हाथ में त्रिशूल और डमरू शोभा पा रहे थे, शिवजी बैल पर चढ़कर चले, बाजे बजने लगे। शिवजी को देखकर देवांगनाएँ मुस्कराने लगीं — ऐसे वर के योग्य दुल्हन तो संसार में है ही नहीं!
बिष्नु बिरंचि आदि सुरब्राता। चढ़ि चढ़ि बाहन चले बराता॥सुर समाज सब भाँति अनूपा। नहिं बरात दूलह अनुरूपा॥॥४॥
विष्णु, ब्रह्मा आदि सभी देवता अपने-अपने वाहनों पर चढ़कर बारात में चले। देवसमाज तो हर प्रकार से अनुपम था, पर वर के अनुरूप बारात नहीं लग रही थी।
बिष्नु कहा अस बिहसि तब बोलि सकल दिसिराज।बिलग बिलग होइ चलहु सब निज निज सहित समाज॥९२॥
विष्णु ने मुस्कराकर सभी दिक्पालों को बुलाकर कहा — तुम सब अपने-अपने समाज सहित अलग-अलग होकर चलो।
बर अनुहारि बरात न भाई। हँसी करैहहु पर पुर जाई॥बिष्नु बचन सुनि सुर मुसकाने। निज निज सेन सहित बिलगाने॥॥१॥
यदि वर के अनुरूप बारात न सजी, तो दूसरे नगर में जाकर हमारी हँसी होगी। विष्णु की यह बात सुनकर देवता मुस्कराए और अपनी-अपनी सेना सहित अलग हो गए।
मनहीं मन महेसु मुसुकाहीं। हरि के बिंग्य बचन नहिं जाहीं॥अति प्रिय बचन सुनत प्रिय केरे। भृंगिहि प्रेरि सकल गन टेरे॥॥२॥
महेश मन-ही-मन मुस्कराने लगे, विष्णु के व्यंग्य भरे वचन उनसे छिपे न रहे। अपने प्रिय के मुख से यह प्रिय वचन सुनकर उन्होंने भृंगी को भेजकर अपने सभी गणों को बुलवाया।
सिव अनुसासन सुनि सब आए। प्रभु पद जलज सीस तिन्ह नाए॥नाना बाहन नाना बेषा। बिहसे सिव समाज निज देखा॥॥३॥
शिवजी की आज्ञा सुनकर सारे गण आ गए, उन्होंने प्रभु के चरण-कमलों में सिर नवाया। नाना वाहन और नाना वेष धारण किए अपने इस विचित्र समाज को देखकर शिवजी स्वयं हँस पड़े।
कोउ मुखहीन बिपुल मुख काहू। बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू॥बिपुल नयन कोउ नयन बिहीना। रिष्टपुष्ट कोउ अति तनखीना॥॥४॥
कोई मुखहीन था तो किसी के अनेक मुख थे, कोई बिना हाथ-पैर का था तो किसी के कई हाथ-पैर थे। कोई अनेक नेत्रों वाला था, कोई नेत्रहीन, कोई अत्यंत हृष्ट-पुष्ट तो कोई अत्यंत दुबला।
तन खीन कोउ अति पीन पावन कोउ अपावन गति धरें।भूषन कराल कपाल कर सब सद्य सोनित तन भरें॥खर स्वान सुअर सृकाल मुख गन बेष अगनित को गनै।बहु जिनस प्रेत पिसाच जोगि जमात बरनत नहिं बनै॥
कोई अत्यंत दुबला तो कोई मोटा, कोई पवित्र वेष में तो कोई अपवित्र रूप धरे था। किसी के आभूषण भयंकर खोपड़ियों के थे, सबके शरीर ताजे रक्त से सने थे। गधे, कुत्ते, सुअर और सियार के मुख वाले अनगिनत गण थे, उनका वेष कोई गिन ही नहीं सकता था। अनेक प्रकार के प्रेत, पिशाच और योगियों के झुंड थे, जिनका वर्णन करना भी कठिन था।
नाचहिं गावहिं गीत परम तरंगी भूत सब।देखत अति बिपरीत बोलहिं बचन बिचित्र बिधि॥९३॥
सभी भूत परम उमंग में नाचते-गाते थे, देखने में अत्यंत विचित्र लगते और विलक्षण ढंग से बोलते थे।
जस दूलहु तसि बनी बराता। कौतुक बिबिध होहिं मग जाता॥इहाँ हिमाचल रचेउ बिताना। अति बिचित्र नहिं जाइ बखाना॥॥१॥
जैसा दूल्हा था, वैसी ही यह बारात सजी थी; मार्ग में चलते हुए अनेक विचित्र कौतुक होते रहे। इधर हिमाचल ने ऐसा भव्य मंडप सजाया, जिसका वर्णन करना भी कठिन था।
सैल सकल जहँ लगि जग माहीं। लघु बिसाल नहिं बरनि सिराहीं॥बन सागर सब नदीं तलावा। हिमगिरि सब कहुँ नेवत पठावा॥॥२॥
संसार में जितने भी पर्वत हैं, छोटे-बड़े सब, जिनका पूरा वर्णन ही नहीं हो सकता; वन, सागर, सभी नदियाँ और तालाब — हिमगिरि ने सबको निमंत्रण भेजा।
कामरूप सुंदर तन धारी। सहित समाज सहित बर नारी॥गए सकल तुहिनाचल गेहा। गावहिं मंगल सहित सनेहा॥॥३॥
सुंदर मनचाहा रूप धारण किए सभी अपनी पत्नियों सहित हिमालय के घर पहुँचे, और प्रेमपूर्वक मंगल-गीत गाने लगे।
प्रथमहिं गिरि बहु गृह सँवराए। जथाजोगु तहँ तहँ सब छाए॥पुर सोभा अवलोकि सुहाई। लागई लघु बिरंचि निपुनाई॥॥४॥
पहले से ही पर्वत ने अनेक भवन सजा रखे थे, जिनमें सब यथोचित रूप से ठहर गए। नगर की सुंदर शोभा देखकर ब्रह्माजी की निपुणता भी फीकी लगने लगी।
लघु लाग बिधि की निपुनता अवलोकि पुर सोभा सही।बन बाग कूप तड़ाग सरिता सुभग सब सक को कही॥मंगल बिपुल तोरन पताका केतु गृह गृह सोहहीं।बनिता पुरुष सुंदर चतुर छबि देखि मुनि मन मोहहीं॥
नगर की शोभा देखकर सचमुच ब्रह्मा की कारीगरी भी छोटी लगती थी। वन, बाग, कुएँ, तालाब और नदियों की सुंदरता का वर्णन कौन कर सकता है। घर-घर पर अनेक मंगल-तोरण, पताकाएँ और ध्वजाएँ शोभा पा रही थीं, और सुंदर-चतुर स्त्री-पुरुषों की छवि देखकर मुनियों का मन भी मोहित हो जाता।
जगदंबा जहँ अवतरी सो पुरु बरनि कि जाइ।रिद्धि सिद्धि संपत्ति सुख नित नूतन अधिकाइ॥९४॥
जिस नगर में स्वयं जगदंबा अवतरित हुई हों, उसका वर्णन भला कैसे किया जाए — वहाँ ऋद्धि-सिद्धि और संपदा नित नए रूप में बढ़ती ही जाती थी।
नगर निकट बरात सुनि आई। पुर खरभरु सोभा अधिकाई॥करि बनाव सजि बाहन नाना। चले लेन सादर अगवाना॥॥१॥
नगर के निकट बारात आई सुनकर, नगर में हलचल और शोभा और भी बढ़ गई। अनेक प्रकार के वाहन सजाकर लोग आदरपूर्वक अगवानी करने चले।
हियँ हरषे सुर सेन निहारी। हरिहि देखि अति भए सुखारी॥सिव समाज जब देखन लागे। बिडरि चले बाहन सब भागे॥॥२॥
देवताओं की सेना देखकर सब हृदय से हर्षित हुए, विष्णु को देखकर तो और भी सुखी हुए। पर जब शिवजी के गणों का समाज दिखा, तो वाहन डरकर भाग खड़े हुए।
धरि धीरजु तहँ रहे सयाने। बालक सब लै जीव पराने॥गए भवन पूछहिं पितु माता। कहहिं बचन भय कंपित गाता॥॥३॥
वहाँ धैर्यवान समझदार लोग ही टिके रहे, बाकी बालकों को लेकर लोग जान बचाकर भागे। घर पहुँचकर जब माता-पिता ने पूछा, तो वे भय से काँपते हुए बताने लगे।
कहिअ काह कहि जाइ न बाता। जम कर धार किधौं बरिआता॥बरु बौराह बसहँ असवारा। ब्याल कपाल बिभूषन छारा॥॥४॥
क्या कहें, वह दृश्य कहा ही नहीं जा सकता — मानो यमराज की सेना हो या बारात। कोई बैल पर सवार पागल-सा दिखता था, सर्प, खोपड़ी और भस्म के आभूषण पहने था।
तन छार ब्याल कपाल भूषन नगन जटिल भयंकरा।सँग भूत प्रेत पिसाच जोगिनि बिकट मुख रजनीचरा॥जो जिअत रहिहि बरात देखत पुन्य बड़ तेहि कर सही।देखिहि सो उमा बिबाहु घर घर बात असि लरिकन्ह कही॥
शरीर पर भस्म, आभूषण के रूप में साँप और खोपड़ी, नंगे, जटाधारी और भयंकर रूप वाले — साथ में भूत, प्रेत, पिशाच, योगिनियाँ और विकट मुख वाले निशाचर। जो यह बारात देखकर भी जीवित बचा रहे, उसका बड़ा भाग्य समझो — यही बात घर-घर में बच्चे कहते फिरे कि वही उमा का विवाह देख पाएगा।
समुझि महेस समाज सब जननि जनक मुसुकाहिं।बाल बुझाए बिबिध बिधि निडर होहु डरु नाहिं॥९५॥
महेश के इस विचित्र समाज को समझकर माता-पिता मुस्कराए, और बालकों को अनेक प्रकार से समझाया कि निडर रहो, डरने की कोई बात नहीं है।
लै अगवान बरातहि आए। दिए सबहि जनवास सुहाए॥मैनाँ सुभ आरती सँवारी। संग सुमंगल गावहिं नारी॥॥१॥
अगवानी करने वाले बारात को लिवा लाए, और सबको सुंदर जनवासे दिए गए। मैना ने शुभ आरती सजाई, और स्त्रियाँ साथ में मंगल-गीत गाने लगीं।
कंचन थार सोह बर पानी। परिछन चली हरहि हरषानी॥बिकट बेष रुद्रहि जब देखा। अबलन्ह उर भय भयउ बिसेषा॥॥२॥
सुंदर कंचन के थाल में जल लिए मैना हर्षित मन से शिवजी की परछन करने चलीं। पर जब उन्होंने शिवजी का विकट रूप देखा, तो सभी स्त्रियों के हृदय में बड़ा भय समा गया।
भागि भवन पैठीं अति त्रासा। गए महेसु जहाँ जनवासा॥मैना हृदयँ भयउ दुखु भारी। लीन्ही बोलि गिरीसकुमारी॥॥३॥
वे भयभीत होकर घर के भीतर भाग गईं, और शिवजी अपने जनवासे में चले गए। मैना के हृदय में भारी दुःख हुआ, उन्होंने पार्वती को बुलाकर पास बिठाया।
अधिक सनेहँ गोद बैठारी। स्याम सरोज नयन भरे बारी॥जेहिं बिधि तुम्हहि रूपु अस दीन्हा। तेहिं जड़ बरु बाउर कस कीन्हा॥॥४॥
बड़े स्नेह से उन्हें गोद में बिठाया, श्याम कमल जैसे उनके नेत्र आँसुओं से भर आए। जिस विधाता ने तुम्हें ऐसा सुंदर रूप दिया, उसी मूर्ख ने ऐसा पागल वर क्यों दे दिया।
कस कीन्ह बरु बौराह बिधि जेहिं तुम्हहि सुंदरता दई।जो फलु चहिअ सुरतरुहिं सो बरबस बबूरहिं लागई॥तुम्ह सहित गिरि तें गिरौं पावक जरौं जलनिधि महुँ परौं।घरु जाउ अपजसु होइ जग जीवत बिबाहु न हौं करौं॥
विधाता ने तुम्हें तो इतनी सुंदरता दी, फिर ऐसा पागल वर क्यों चुना — जो फल कल्पवृक्ष को मिलना चाहिए, वह जबरन बबूल को लगा दिया। तुम्हारे साथ मैं भी पर्वत से गिर पड़ूँगी, आग में जल जाऊँगी या समुद्र में डूब जाऊँगी। घर भले उजड़ जाए, संसार में अपयश भी हो, पर जीते-जी मैं यह विवाह नहीं होने दूँगी।
भई बिकल अबला सकल दुखित देखि गिरिनारि।करि बिलापु रोदति बदति सुता सनेहु सँभारि॥९६॥
पर्वत की सभी स्त्रियाँ यह देखकर व्याकुल और दुखी हो उठीं। पुत्री के स्नेह में डूबी मैना विलाप करने लगीं, रोते-रोते बातें करने लगीं।
नारद कर मैं काह बिगारा। भवनु मोर जिन्ह बसत उजारा॥अस उपदेसु उमहि जिन्ह दीन्हा। बौरे बरहि लगि तपु कीन्हा॥॥१॥
नारद ने मेरा क्या बिगाड़ा था, जिन्होंने मेरा घर ही उजाड़ दिया! जिन्होंने उमा को ऐसा उपदेश दिया, उन्हीं के कारण वह पागल वर पाने के लिए तप करती रही।
साचेहुँ उन्ह के मोह न माया। उदासीन धनु धामु न जाया॥पर घर घालक लाज न भीरा। बाझँ कि जान प्रसव के पीरा॥॥२॥
सचमुच उन्हें न मोह है, न माया, न घर-द्वार, न पत्नी — वे तो उदासीन हैं। पर दूसरे के घर को उजाड़ने में उन्हें कोई लाज-भय नहीं — भला बाँझ स्त्री प्रसव-पीड़ा क्या जाने!
जननिहि बिकल बिलोकि भवानी। बोली जुत बिबेक मृदु बानी॥अस बिचारि सोचहि मति माता। सो न टरइ जो रचइ बिधाता॥॥३॥
माता को इतना व्याकुल देखकर भवानी विवेकपूर्ण मृदु वाणी में बोलीं — हे माता, ऐसा सोचकर व्यर्थ चिंता मत करो, विधाता ने जो रच दिया है, वह कभी टलता नहीं।
करम लिखा जौं बाउर नाहू। तौ कत दोसु लगाइअ काहू॥तुम्ह सन मिटहिं कि बिधि के अंका। मातु ब्यर्थ जनि लेहु कलंका॥॥४॥
यदि भाग्य में ही यह पागल वर लिखा है, तो फिर किसी को दोष क्यों दिया जाए? क्या तुम्हारे कारण विधाता के अंक मिट सकते हैं? हे माता, व्यर्थ ही कलंक अपने सिर मत लो।
जनि लेहु मातु कलंकु करुना परिहरहु अवसर नहीं।दुखु सुखु जो लिखा लिलार हमरें जाब जहँ पाउब तहीं॥सुनि उमा बचन बिनीत कोमल सकल अबला सोचहीं।बहु भाँति बिधिहि लगाइ दूषन नयन बारि बिमोचहीं॥
हे माता, व्यर्थ कलंक मत लो, करुणा छोड़ो, अब यह सोचने का अवसर नहीं है — ललाट पर लिखा दुःख-सुख जहाँ जाना है, वहीं मिलेगा। उमा के इन विनम्र और कोमल वचनों को सुनकर सभी स्त्रियाँ फिर भी चिंतित रहीं, और विधाता को बहुत दोष देते हुए आँसू बहाती रहीं।
तेहि अवसर नारद सहित अरु रिषि सप्त समेत।समाचार सुनि तुहिनगिरि गवने तुरत निकेत॥९७॥
उसी समय नारद और सप्तर्षि भी यह समाचार सुनकर तुरंत हिमालय के घर पहुँचे।
तब नारद सबहि समुझावा। पूरुब कथाप्रसंगु सुनावा॥मयना सत्य सुनहु मम बानी। जगदंबा तव सुता भवानी॥॥१॥
तब नारद ने सबको समझाया और पूर्व की सारी कथा सुनाई — हे मैना, सच्ची बात सुनो, तुम्हारी यह पुत्री साक्षात् जगदंबा भवानी है।
अजा अनादि सक्ति अबिनासिनि। सदा संभु अरधंग निवासिनि॥जग संभव पालन लय कारिनि। निज इच्छा लीला बपु धारिनि॥॥२॥
वह अजन्मा, अनादि, अविनाशी शक्ति है, सदा शिवजी के अर्धांग में निवास करने वाली है। वही जगत की उत्पत्ति, पालन और संहार करती है, और अपनी इच्छा से ही लीला के लिए शरीर धारण करती है।
जनमीं प्रथम दच्छ गृह जाई। नामु सती सुंदर तनु पाई॥तहँहुँ सती संकरहि बिबाहीं। कथा प्रसिद्ध सकल जग माहीं॥॥३॥
पहले उसने दक्ष के घर जन्म लिया था, नाम था सती, और सुंदर देह पाई थी। उसी जन्म में सती ने शंकरजी से विवाह किया था, यह कथा सारे संसार में प्रसिद्ध है।
एक बार आवत सिव संगा। देखेउ रघुकुल कमल पतंगा॥भयउ मोहु सिव कहा न कीन्हा। भ्रम बस बेषु सीय कर लीन्हा॥॥४॥
एक बार शिवजी के साथ आते हुए सती ने रघुकुल के सूर्यरूप राम को वन में देखा। उन्हें मोह हुआ और शिवजी की बात न मानकर, भ्रमवश उन्होंने सीता का रूप धारण कर लिया।
सिय बेषु सती जो कीन्ह तेहि अपराध संकर परिहरीं।हर बिरहँ जाइ बहोरि पितु कें जग्य जोगानल जरीं॥अब जनमि तुम्हरे भवन निज पति लागि दारुन तपु किया।अस जानि संसय तजहु गिरिजा सर्बदा संकर प्रिया॥
सीता का जो वेष सतीजी ने धारण किया, उसी अपराध के कारण शंकरजी ने उन्हें त्याग दिया। शिव-वियोग में जाकर वे पिता के यज्ञ की योगाग्नि में जल गईं। अब इसी हिमालय के घर जन्म लेकर उन्होंने अपने ही पति के लिए यह कठिन तप किया है। यह जानकर, हे गिरिजा, तुम सारा संशय त्याग दो — तुम सदा से ही शंकर की प्रिया हो।
सुनि नारद के बचन तब सब कर मिटा बिषाद।छन महुँ ब्यापेउ सकल पुर घर घर यह संबाद॥९८॥
नारदजी के ये वचन सुनकर सबका विषाद क्षणभर में मिट गया, और यह समाचार क्षणमात्र में सारे नगर के घर-घर में फैल गया।
तब मयना हिमवंतु अनंदे। पुनि पुनि पारबती पद बंदे॥नारि पुरुष सिसु जुबा सयाने। नगर लोग सब अति हरषाने॥॥१॥
तब मैना और हिमवान अत्यंत आनंदित हुए, और उन्होंने बार-बार पार्वती के चरणों की वंदना की। नगर के सभी स्त्री-पुरुष, बालक और वृद्ध — सब अत्यंत हर्षित हो उठे।
लगे होन पुर मंगलगाना। सजे सबहि हाटक घट नाना॥भाँति अनेक भई जेवराना। सूपसास्त्र जस कछु ब्यवहारा॥॥२॥
नगर में मंगल-गीत गूँजने लगे, घर-घर में सोने के अनेक कलश सजाए गए। सूपशास्त्र के अनुसार जितने भी व्यंजन बन सकते थे, वे सब अनेक प्रकार से तैयार किए गए।
सो जेवनार कि जाइ बखानी। बसहिं भवन जेहिं मातु भवानी॥सादर बोले सकल बराती। बिष्नु बिरंचि देव सब जाती॥॥३॥
उस भोज का वर्णन कैसे किया जाए, जहाँ स्वयं माता भवानी निवास करती हों! सभी बाराती आदरपूर्वक बुलाए गए — विष्णु, ब्रह्मा और सभी प्रकार के देवता।
बिबिधि पाँति बैठी जेवनारा। लागे परुसन निपुन सुआरा॥नारिबृंद सुर जेवँत जानी। लगीं देन गारीं मृदु बानी॥॥४॥
अनेक पंक्तियों में बैठकर सब भोजन करने लगे, निपुण रसोइए परोसने लगे। स्त्रियों के समूह ने देवताओं को पहचानकर मीठी वाणी में विवाह की परंपरागत ठिठोली गाना शुरू किया।
गारीं मधुर स्वर देहिं सुंदरि बिंग्य बचन सुनावहीं।भोजनु करहिं सुर अति बिलंबु बिनोदु सुनि सचु पावहीं॥जेवँत जो बढ्यो अनंदु सो मुख कोटिहूँ न परै कह्यो।अचवाँइ दीन्हे पान गवने बास जहँ जाको रह्यो॥
सुंदरियाँ मधुर स्वर में ठिठोली गातीं और व्यंग्यभरे वचन सुनातीं। देवता बड़ी देर तक भोजन करते और यह विनोद सुनकर सुख पाते रहे। भोजन करते समय जो आनंद बढ़ा, उसका वर्णन करोड़ों मुख से भी नहीं हो सकता। हाथ धुलाकर पान देकर सबको उनके-उनके जनवासे में विदा किया गया।
बहुरि मुनिन्ह हिमवंत कहुँ लगन सुनाई आइ।समय बिलोकि बिबाह कर पठए देव बोलाइ॥९९॥
फिर मुनियों ने हिमवान को लग्न सुनाया, और शुभ मुहूर्त देखकर देवताओं को विवाह के लिए बुला भेजा।
बोलि सकल सुर सादर लीन्हे। सबहि जथोचित आसन दीन्हे॥बेदी बेद बिधान सँवारी। सुभग सुमंगल गावहिं नारी॥॥१॥
सभी देवताओं को आदरपूर्वक बुलाकर उन्हें यथोचित आसन दिए गए। वेद-विधि के अनुसार वेदी सजाई गई, और स्त्रियाँ सुंदर मंगल-गीत गाने लगीं।
सिंघासनु अति दिब्य सुहावा। जाइ न बरनि बिरंचि बनावा॥बैठे सिव बिप्रन्ह सिरु नाई। हृदयँ सुमिरि निज प्रभु रघुराई॥॥२॥
अत्यंत दिव्य और सुहावना सिंहासन ब्रह्माजी ने बनाया था, जिसका वर्णन करना भी कठिन था। शिवजी विप्रों को सिर नवाकर उस पर बैठे, हृदय में अपने प्रभु रघुनाथ का स्मरण करते हुए।
बहुरि मुनीसन्ह उमा बोलाई। करि सिंगारु सखीं लै आई॥देखत रूपु सकल सुर मोहे। बरनै छबि अस जग कबि को है॥॥३॥
फिर मुनियों ने उमा को बुलवाया, सखियाँ उन्हें सुंदर शृंगार कर लिवा लाईं। उनका रूप देखकर सभी देवता मोहित हो गए — ऐसी छवि का वर्णन संसार का कौन कवि कर सकता है!
जगदंबिका जानि भव भामा। सुरन्ह मनहिं मन कीन्ह प्रनामा॥सुंदरता मरजाद भवानी। जाइ न कोटिहुँ बदन बखानी॥॥४॥
भवानी को साक्षात् जगदंबिका जानकर देवताओं ने मन-ही-मन उन्हें प्रणाम किया। भवानी की सुंदरता और मर्यादा का वर्णन करोड़ों मुख से भी नहीं हो सकता।
कोटिहुँ बदन नहिं बनै बरनत जग जननि सोभा महा।सकुचहिं कहत श्रुति सेष सारद मंदमति तुलसी कहा॥छबिखानि मातु भवानि गवनी मध्य मंडप सिव जहाँ।अवलोकि सकहिं न सकुच पति पद कमल मनु मधुकरु तहाँ॥
करोड़ों मुखों से भी जगत-जननी की महान शोभा का वर्णन नहीं हो सकता, स्वयं वेद, शेषनाग और शारदा भी कहते हुए सकुचाते हैं, फिर मंदबुद्धि तुलसीदास भला क्या कह सकता है। छवि की खान माता भवानी मंडप के मध्य में वहाँ पहुँचीं जहाँ शिवजी विराजमान थे, और उन्हें देखकर मन का भँवरा संकोचवश पति के चरण-कमलों में जाकर ही रम गया।
मुनि अनुसासन गनपतिहि पूजेउ संभु भवानि।कोउ सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जियँ जानि॥१००॥
मुनि की आज्ञा से पहले गणपति की पूजा की गई, फिर शिवजी और भवानी की पूजा हुई। कोई इसमें संशय न करे, देवता तो अनादि हैं, यह जानकर मन में इसे स्वीकार करना चाहिए।
जसि बिबाह के बिधि श्रुति गाई। महामुनिन्ह सो सब करवाई॥गहि गिरीस कुस कन्या पानी। भवहि समरपीं जानि भवानी॥॥१॥
वेदों में विवाह की जो विधि बताई गई है, महामुनि ने वह सब विधिपूर्वक संपन्न कराई। गिरिराज ने कुशा और कन्या का हाथ पकड़कर, भवानी को भव (शिव) के हाथों सौंप दिया।
पानिग्रहन जब कीन्ह महेसा। हियँ हरषे तब सकल सुरेसा॥बेद मंत्र मुनिबर उच्चरहीं। जय जय जय संकर सुर करहीं॥॥२॥
जब महेश ने पाणिग्रहण किया, तो सभी देवता हृदय से हर्षित हो उठे। महामुनि वेदमंत्रों का उच्चारण करने लगे, और देवता जय-जयकार करते हुए जय शंकर कहने लगे।
बाजहिं बाजन बिबिध बिधाना। सुमनबृष्टि नभ भै बिधि नाना॥हर गिरिजा कर भयउ बिबाहू। सकल भुवन भरि रहा उछाहू॥॥३॥
अनेक प्रकार के बाजे बजने लगे, आकाश से नाना प्रकार के फूल बरसने लगे। इस प्रकार हर-गिरिजा का विवाह संपन्न हुआ, सारे लोकों में उत्सव छा गया।
दासीं दास तुरग रथ नागा। धेनु बसन मनि बस्तु बिभागा॥अन्न कनकभाजन भरि जाना। दाइज दीन्ह न जाइ बखाना॥॥४॥
दासी, दास, घोड़े, रथ, हाथी, गाय, वस्त्र, मणियाँ और अनेक वस्तुएँ, अन्न और सोने के बर्तन भरकर अनगिनत गाड़ियाँ — इतना दहेज दिया गया कि उसका वर्णन ही नहीं हो सकता।
दाइज दियो बहु भाँति पुनि कर जोरि हिमभूधर कह्यो।का देउँ पूरनकाम संकर चरन पंकज गहि रह्यो॥सिवँ कृपासागर ससुर कर संतोषु सब भाँतिहिं कियो।पुनि गहे पद पाथोज मयनाँ प्रेम परिपूरन हियो॥
हिमाचल ने बहुत प्रकार का दहेज देकर फिर हाथ जोड़कर कहा — हे संकर, आप तो पूर्णकाम हैं, हम आपको और क्या दें — यह कहकर वे शिवजी के चरण-कमल पकड़कर वहीं रह गए। कृपासागर शिवजी ने ससुर को हर प्रकार से संतोष दिया, फिर मैना ने भी उनके चरण-कमल पकड़ लिए, उनका हृदय प्रेम से परिपूर्ण था।
नाथ उमा मन प्रान सम गृहकिंकरी करेहु।छमेहु सकल अपराध अब होइ प्रसन्न बरु देहु॥१०१॥
हे नाथ, उमा मेरे प्राणों के समान प्रिय है, इसे अपनी घर की सेविका मानकर रखिए। मेरे सारे अपराध क्षमा कीजिए, अब प्रसन्न होकर यही वर दीजिए।
