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सप्तम सोपान

उत्तरकाण्ड

अयोध्या वापसी, राज्याभिषेक एवं रामराज्य की कथा।

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अयोध्या वापसी, राज्याभिषेक एवं रामराज्य की कथा।

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श्लोक

केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नंशोभाढ्यं पीतवस्त्रं सरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्नम्।पाणौ नाराचचापं कपिनिकरयुतं बन्धुना सेव्यमानंनौमीड्यं जानकीशं रघुवरमनिशं पुष्पकारूढरामम्॥

मोरके कंठकी नीलिमा-सी श्यामल कान्तिवाले, ऋषिके चरण-चिह्नसे अंकित, पीताम्बरधारी, कमलनयन, सदा प्रसन्नचित्त, हाथमें धनुष-बाण लिये, वानरसेनासे घिरे और भाई लक्ष्मणसे सेवित, वन्दनीय, जानकीनाथ, पुष्पकविमानपर विराजमान श्रीरघुनाथको मैं बारम्बार प्रणाम करता हूँ।

श्लोक

कोसलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुलौ कोमलावजमहेशवन्दितौ।जानकीकरसरोजलालितौ चिन्तकस्य मनभृङ्गसड्गिनौ॥

कोसलनरेशके वे सुकुमार चरणकमल, जिन्हें ब्रह्मा और शिव वन्दन करते हैं, जो जानकीजीके हाथोंसे दुलराये जाते हैं और साधककी मनोरूपी भ्रमरीको सदा अपने पास बाँधे रखते हैं, उन्हें मैं नमन करता हूँ।

श्लोक

कुन्दइन्दुदरगौरसुन्दरं अम्बिकापतिमभीष्टसिद्धिदम्।कारुणीककलकञ्जलोचनं नौमि शंकरमनंगमोचनम्॥

कुन्दपुष्प और चन्द्रमाकी-सी गौर, सुन्दर कान्तिवाले, पार्वतीके स्वामी, इच्छित सिद्धि देनेवाले, करुणाके सागर, कमलनयन तथा कामको भस्म करनेवाले शिवजीको मैं प्रणाम करता हूँ।

दोहा

रहा एक दिन अवधि कर अति आरत पुर लोग।जहँ तहँ सोचहिं नारि नर कृस तन राम बियोग॥सगुन होहिं सुंदर सकल मन प्रसन्न सब केर।प्रभु आगवन जनाव जनु नगर रम्य चहुँ फेर॥कौसल्यादि मातु सब मन अनंद अस होइ।आयउ प्रभु श्री अनुज जुत कहन चहत अब कोइ॥भरत नयन भुज दच्छिन फरकत बारहिं बार।जानि सगुन मन हरष अति लागे करन बिचार॥

वनवासकी अवधिका अन्तिम दिन आ पहुँचा और अवधके नर-नारी विरहमें दुबले होकर व्याकुल थे। तभी सुन्दर शकुन होने लगे, सबके मन प्रफुल्लित हो उठे मानो नगर स्वयं प्रभुके आगमनकी सूचना दे रहा हो। माताओंके हृदयमें भी वैसा ही आनन्द उमड़ आया जैसे कोई अभी कह उठेगा कि सीता-लक्ष्मणसहित प्रभु आ गये। भरतका दाहिना नेत्र और दाहिनी भुजा बार-बार फड़कने लगी; इस शुभ शकुनको जानकर उनका मन हर्षसे भर गया और वे सोचने लगे।

रहेउ एक दिन अवधि अधारा। समुझत मन दुख भयउ अपारा॥कारन कवन नाथ नहिं आयउ। जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ॥

पर वनवासका अन्तिम दिन बीता जा रहा था, फिर भी प्रभु नहीं लौटे; यह सोचकर भरतका मन असीम दुःखसे भर गया। वे व्याकुल होकर विचारने लगे कि आखिर क्या बात हुई कि नाथ नहीं आये—कहीं मुझे कुटिल समझकर उन्होंने भुला तो नहीं दिया?

अहह धन्य लछिमन बड़भागी। राम पदारबिंदु अनुरागी॥कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा। ताते नाथ संग नहिं लीन्हा॥

वे कहते हैं कि लक्ष्मण सचमुच धन्य और भाग्यशाली हैं, जो श्रीरामके चरणोंसे कभी अलग नहीं हुए। मुझे ही प्रभुने कपटी और कुटिल समझा होगा, इसीलिये साथ नहीं ले गये।

जौं करनी समुझै प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कलप सत कोरी॥जन अवगुन प्रभु मान न काऊ। दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ॥

यदि प्रभु मेरे कर्मोंको तौलें तो करोड़ों कल्पोंमें भी मेरा उद्धार सम्भव नहीं; फिर भी यह धीरज है कि वे सेवकके दोषको कभी हृदयमें नहीं रखते, क्योंकि वे दीनोंके सहारे और अत्यन्त कोमल स्वभावके हैं।

मोरि जियँ भरोस दृढ़ सोई। मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई॥बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना। अधम कवन जग मोहि समाना॥

इसी भरोसेपर भरतका मन टिका है कि शुभ शकुन देखकर श्रीराम अवश्य लौटेंगे; पर वे यह भी कहते हैं कि यदि अवधि बीत गयी और वे जीवित रह गये, तो संसारमें उनसे नीच कोई न होगा।

दोहा

राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत।बिप्र रूप धरि पवन सुत आइ गयउ जनु पोत॥१(क)

भरत जब विरहके इस सागरमें डूबते जा रहे थे, ठीक उसी क्षण हनुमानजी ब्राह्मणका वेश धरकर वहाँ आ पहुँचे, मानो डूबतेको बचानेके लिये कोई नाव आ लगी हो।

दोहा

बैठि देखि कुसासन जटा मुकुट कृस गात।राम राम रघुपति जपत स्त्रवत नयन जलजात॥१(ख)

उन्होंने देखा—भरत कुशके आसनपर बैठे हैं, जटाओंका मुकुट बना है, शरीर दुबला पड़ गया है, और वे नेत्रोंसे अश्रु बहाते हुए निरन्तर 'राम राम' रट रहे हैं।

देखत हनूमान अति हरषेउ। पुलक गात लोचन जल बरषेउ॥मन महँ बहुत भाँति सुख मानी। बोलेउ श्रवन सुधा सम बानी॥

भरतको देखते ही हनुमानजीका हृदय हर्षसे उमड़ पड़ा, रोम-रोम पुलकित हो उठा और नेत्र भर आये। भीतर ही भीतर अपार सुख अनुभव करते हुए वे कानोंको अमृत-सी लगनेवाली वाणीमें बोल उठे।

जासु बिरहँ सोचहु दिन राती। रटहु निरंतर गुन गन पाँती॥रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता। आयउ कुसल देव मुनि त्राता॥

उन्होंने कहा—जिनके वियोगमें आप रात-दिन घुलते रहते हैं और जिनके गुणोंकी माला निरन्तर जपते रहते हैं, वे ही रघुकुलतिलक, सज्जनोंको सुख देनेवाले, देव-मुनियोंके रक्षक श्रीराम कुशलपूर्वक लौट आये हैं।

रिपु रन जीति सुजस सुर गावत। सीता सहित अनुज प्रभु आवत॥सुनत बचन बिसरे सब दूखा। तृषावंत जिमि पाइ पियूषा॥

शत्रुको युद्धमें परास्त कर, देवताओंसे स्तुत हो, सीता और लक्ष्मणसहित प्रभु आ रहे हैं—यह सुनते ही भरतका सारा दुःख वैसे ही विलीन हो गया जैसे प्यासेको अमृत मिलते ही तृष्णा शान्त हो जाती है।

को तुम्ह तात कहाँ ते आए। मोहि परम प्रिय बचन सुनाए॥मारुत सुत मैं कपि हनुमाना। नामु मोर सुनु कृपानिधाना॥

चकित भरतने पूछा—तुम कौन हो, कहाँसे आये, जिसने मुझे यह अत्यन्त प्रिय समाचार सुनाया? हनुमानजीने उत्तर दिया—हे कृपानिधान, मैं वायुपुत्र वानर हनुमान हूँ।

दीनबंधु रघुपति कर किंकर। सुनत भरत भेंटेउ उठि सादर॥मिलत प्रेम नहिं हृदयँ समाता। नयन स्त्रवत जल पुलकित गाता॥

मैं उन दीनबन्धु रघुनाथका सेवक हूँ—यह सुनते ही भरत उठकर बड़े आदरसे उनसे गले मिले। इस मिलनमें प्रेम हृदयमें समाता नहीं था, नेत्रोंसे अश्रु बह चले और शरीर रोमांचित हो उठा।

कपि तव दरस सकल दुख बीते। मिले आजु मोहि राम पिरीते॥बार बार बूझी कुसलाता। तो कहुँ देउँ काह सुनु भ्राता॥

भरत बोले—हे कपि, तुम्हारे दर्शनसे ही मेरे सारे दुःख मिट गये, मानो आज मुझे साक्षात् प्रिय राम ही मिल गये हों। उन्होंने बार-बार कुशल पूछी और कहा—भाई, बताओ, इस समाचारके बदले तुम्हें क्या दूँ?

एहि संदेस सरिस जग माहीं। करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं॥नाहिन तात उरिन मैं तोही। अब प्रभु चरित सुनावहु मोही॥

फिर स्वयं ही विचार कर बोले—इस समाचारके समान संसारमें कुछ भी नहीं है, मैं तुमसे कभी उऋण नहीं हो सकता। अब कृपाकर प्रभुका सारा वृत्तान्त मुझे सुनाओ।

तब हनुमंत नाइ पद माथा। कहे सकल रघुपति गुन गाथा॥कहु कपि कबहुँ कृपाल गोसाईं। सुमिरहिं मोहि दास की नाईं॥

तब हनुमानजीने भरतके चरणोंमें मस्तक नवाकर श्रीरघुनाथकी सम्पूर्ण गुणगाथा सुनायी। भरतने विनम्रतापूर्वक पूछा—हे कपि, कभी कृपालु स्वामी मुझे भी अपने दासकी भाँति स्मरण करते हैं क्या?

छंद

निज दास ज्यों रघुबंसभूषन कबहुँ मम सुमिरन कर्यो।सुनि भरत बचन बिनीत अति कपि पुलकि तन चरनन्हि पर्यो॥रघुबीर निज मुख जासु गुन गन कहत अग जग नाथ जो।काहे न होइ बिनीत परम पुनीत सदगुन सिंधु सो॥

भरतके इतने विनम्र वचन सुनकर हनुमानजी पुलकित हो उनके चरणोंमें गिर पड़े और मन-ही-मन सोचने लगे—जिनके गुणोंको स्वयं रघुवीर सारे जगतके सामने गाते हैं, वे भरत ऐसे विनम्र, पवित्र और सद्गुणोंके सागर क्यों न हों।

दोहा

राम प्रान प्रिय नाथ तुम्ह सत्य बचन मम तात।पुनि पुनि मिलत भरत सुनि हरष न हृदयँ समात२(क)

हनुमानजीने कहा—आप श्रीरामको प्राणोंसे भी प्रिय हैं, यह मेरा सत्य वचन है। यह सुनते ही भरत बार-बार उनसे गले मिलने लगे, हृदयका हर्ष किसी तरह समाता नहीं था।

सोरठा

भरत चरन सिरु नाइ तुरित गयउ कपि राम पहिं।कही कुसल सब जाइ हरषि चलेउ प्रभु जान चढ़ि२(ख)

भरतने कहा—प्रभुने दुःखी जानकर अपने दासको दर्शन दिये, इसीसे अब सब कुशल है; विरहके सागरमें डूबते हुए मुझे कृपानिधानने हाथ पकड़कर उबार लिया। फिर हनुमानजी भरतके चरणोंमें सिर नवाकर तुरन्त श्रीरामके पास लौट गये, सारा समाचार सुनाया, और प्रभु हर्षित होकर विमानपर सवार हो चल पड़े।

हरषि भरत कोसलपुर आए। समाचार सब गुरहि सुनाए॥पुनि मंदिर महँ बात जनाई। आवत नगर कुसल रघुराई॥

इधर भरत भी प्रसन्न मन अयोध्या लौटे और गुरु वसिष्ठको सारा समाचार सुनाया। फिर राजमहलमें भी यह शुभ सूचना पहुँचायी कि रघुनाथ कुशलपूर्वक नगरकी ओर आ रहे हैं।

सुनत सकल जननीं उठि धाईं। कहि प्रभु कुसल भरत समुझाई॥समाचार पुरबासिन्ह पाए। नर अरु नारि हरषि सब धाए॥

यह सुनते ही सब माताएँ उठ दौड़ीं; भरतने प्रभुकी कुशलता कहकर उन्हें धीरज बँधाया। नगरवासियोंने भी यह समाचार पाया तो स्त्री-पुरुष सब हर्षसे भरकर दौड़ पड़े।

दधि दुर्बा रोचन फल फूला। नव तुलसी दल मंगल मूला॥भरि भरि हेम थार भामिनी। गावत चलिं सिंधु सिंधुरगामिनी॥

स्वागतके लिये सुहागिन स्त्रियाँ दही, दूब, रोचन, फल-फूल और नयी तुलसीदल सोनेके थालोंमें भर-भरकर हथिनीकी-सी चालसे गीत गाती हुई चल पड़ीं।

जे जैसेहिं तैसेहिं उठि धावहिं। बाल बृद्ध कहँ संग न लावहिं॥एक एकन्ह कहँ बूझहिं भाई। तुम्ह देखे दयाल रघुराई॥

हर कोई जिस दशामें था उसी दशामें दौड़ पड़ा, न बालकोंकी सुध रही न वृद्धोंकी। एक-दूसरेसे बस यही पूछते जाते—भाई, तुमने दयालु रघुनाथको देखा क्या?

अवधपुरी प्रभु आवत जानी। भई सकल सोभा के खानी॥बहइ सुहावन त्रिबिध समीरा। भइ सरजू अति निर्मल नीरा॥

प्रभुका आगमन जानकर अवधपुरी मानो समस्त शोभाकी खान बन गयी, तीनों प्रकारकी सुखद वायु बहने लगी और सरयूका जल अपने-आप निर्मल हो उठा।

दोहा

हरषित गुर परिजन अनुज भूसुर बृंद समेत।चले भरत मन प्रेम अति सन्मुख कृपानिकेत३(क)

अत्यन्त प्रेमसे भरे मनसे गुरु वसिष्ठ, कुटुम्बीजन, छोटे भाई शत्रुघ्न और ब्राह्मणोंके समूहके साथ भरत कृपानिधान श्रीरामकी अगवानीके लिये चल पड़े।

दोहा

बहुतक चढ़ी अटारिन्ह निरखहिं गगन बिमान।देखि मधुर सुर हरषित करहिं सुमंगल गान३(ख)

अनेक स्त्रियाँ अटारियोंपर चढ़कर आकाशमें आते विमानको निहार रही थीं, और उसे देखते ही मधुर स्वरमें मंगलगीत गाने लगीं।

दोहा

राका ससि रघुपति पुर सिंधु देखि हरषान।बढ़यो कोलाहल करत जनु नारि तरंग समान३(ग)

श्रीराम मानो पूर्णिमाके चन्द्रमा हैं और अयोध्या समुद्र, जो उन्हें देखकर हर्षसे उमड़ पड़ा है; उसका कोलाहल ऐसा लगता है मानो उठती हुई तरंगोंके समान इधर-उधर दौड़ती स्त्रियाँ ही उसकी लहरें हों।

इहाँ भानुकुल कमल दिवाकर। कपिन्ह देखावत नगर मनोहर॥सुनु कपीस अंगद लंकेसा। पावन पुरी रुचिर यह देसा॥

उधर आकाशसे सूर्यकुलके सूर्य श्रीराम वानरोंको सुन्दर नगर दिखाते हुए कहते हैं—हे सुग्रीव, अंगद, विभीषण, सुनो, यह पावन नगरी और सुन्दर देश है।

जद्यपि सब बैकुंठ बखाना। बेद पुरान बिदित जगु जाना॥अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ॥

वेद-पुराणोंमें भले ही वैकुण्ठकी बड़ाई गायी गयी हो और सारा जगत उसे जानता हो, पर यह अवधपुरी मुझे उतनी ही प्रिय है—यह भेद विरले ही जानते हैं।

जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि। उत्तर दिसि बह सरजू पावनि॥जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा। मम समीप नर पावहिं बासा॥

यह सुहावनी नगरी मेरी जन्मभूमि है; इसके उत्तरमें पवित्र सरयू बहती है, जिसमें स्नान करते ही मनुष्य बिना किसी परिश्रमके मेरे सामीप्यको प्राप्त हो जाते हैं।

अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी। मम धामदा पुरी सुख रासी॥हरषे सब कपि सुनि प्रभु बानी। धन्य अवध जो राम बखानी॥

यहाँके निवासी मुझे विशेष प्रिय हैं; यह नगरी सुखकी राशि है और मेरे परमधामको देनेवाली है। प्रभुके ये वचन सुनकर सब वानर हर्षित हो उठे और बोले—धन्य है वह अवध, जिसकी बड़ाई स्वयं रामने की।

दोहा

आवत देखि लोग सब कृपासिंधु भगवान।नगर निकट प्रभु प्रेरेउ उतरेउ भूमि बिमान४(क)

सबको आते देख कृपासागर भगवानने विमानको नगरके निकट उतरनेकी आज्ञा दी, और वह पृथ्वीपर उतर आया।

दोहा

उतरि कहेउ प्रभु पुष्पकहि तुम्ह कुबेर पहिं जाहु।प्रेरित राम चलेउ सो हरषु बिरहु अति ताहु४(ख)

विमानसे उतरकर प्रभुने पुष्पकसे कहा—अब तुम कुबेरके पास लौट जाओ। आज्ञा पाते ही वह चल दिया—स्वामीके पास जानेकी प्रसन्नता और प्रभुसे बिछड़नेका दुःख, दोनों साथ लिये।

आए भरत संग सब लोगा। कृस तन श्रीरघुबीर बियोगा॥बामदेव बसिष्ठ मुनिनायक। देखे प्रभु महि धरि धनु सायक॥

भरत सबके साथ आ पहुँचे, सबके शरीर श्रीरामके वियोगसे क्षीण हो चले थे। प्रभुने वामदेव, वसिष्ठ आदि मुनिश्रेष्ठोंको देखा तो धनुष-बाण भूमिपर रख दिये।

धाइ धरे गुर चरन सरोरुह। अनुज सहित अति पुलक तनोरुह॥भेंटि कुसल बूझी मुनिराया। हमरें कुसल तुम्हारिहिं दाया॥

फिर लक्ष्मणसहित दौड़कर गुरुके चरणकमल पकड़ लिये, रोम-रोम पुलकित हो उठा। वसिष्ठजीने गले लगाकर कुशल पूछी तो प्रभुने कहा—आपकी ही कृपासे हमारा कुशल है।

सकल द्विजन्ह मिलि नायउ माथा। धर्म धुरंधर रघुकुलनाथा॥गहे भरत पुनि प्रभु पद पंकज। नमत जिन्हहि सुर मुनि संकर अज॥

धर्मकी धुरी धारण करनेवाले रघुकुलनाथने सब ब्राह्मणोंसे मिलकर उन्हें प्रणाम किया। फिर भरतने वे चरणकमल पकड़े जिन्हें देव, मुनि, शिव और ब्रह्मा भी नमन करते हैं।

परे भूमि नहिं उठत उठाए। बर करि कृपासिंधु उर लाए॥स्यामल गात रोम भए ठाढ़े। नव राजीव नयन जल बाढ़े॥

भरत भूमिपर गिरकर उठनेका नाम ही नहीं ले रहे थे; अन्ततः कृपासिंधुने बलपूर्वक उन्हें उठाकर हृदयसे लगा लिया। उनके साँवले शरीरपर रोमांच छा गया और नवकमल-से नेत्रोंमें अश्रुओंकी बाढ़ आ गयी।

छंद

राजीव लोचन स्त्रवत जल तन ललित पुलकावलि बनी।अति प्रेम हृदयँ लगाइ अनुजहि मिले प्रभु त्रिभुअन धनी॥प्रभु मिलत अनुजहि सोह मो पहिं जाति नहिं उपमा कही।जनु प्रेम अरु सिंगार तनु धरि मिले बर सुषमा लही॥

कमलनयनोंसे अश्रु बह रहे हैं, सुन्दर देहपर पुलकावली शोभित हो उठी है; त्रिभुवनके स्वामी प्रभु अपने छोटे भाईको अगाध प्रेमसे हृदयसे लगाकर मिले। उस मिलनकी शोभाका वर्णन मुझसे नहीं हो सकता—मानो प्रेम और शृंगार स्वयं देह धरकर मिले हों और परम सुषमाको प्राप्त हुए हों।

छंद

बूझत कृपानिधि कुसल भरतहि बचन बेगि न आवई।सुनु सिवा सो सुख बचन मन ते भिन्न जान जो पावई॥अब कुसल कौसलनाथ आरत जानि जन दरसन दियो।बूड़त बिरह बारीस कृपानिधान मोहि कर गहि लियो॥

कृपानिधि कुशल पूछते हैं, पर हर्षके मारे भरतके मुँहसे शब्द ही नहीं फूटते। शिवजी कहते हैं—हे उमा, वह सुख वाणी और मनसे परे है, उसे वही जानता है जो उसे भोगता है। भरत कहते हैं—हे कोसलनाथ, आपने दुःखी जानकर दासको दर्शन दिये, अब सब कुशल है; विरहसागरमें डूबते हुए कृपानिधानने मेरा हाथ थाम लिया।

दोहा

पुनि प्रभु हरषि सत्रुहन भेंटे हृदयँ लगाइ।लछिमन भरत मिले तब परम प्रेम दोउ भाइ

फिर प्रभुने हर्षित होकर शत्रुघ्नको हृदयसे लगाया, और लक्ष्मण-भरत दोनों भाई भी परम प्रेमसे आपसमें मिले।

भरतानुज लछिमन पुनि भेंटे। दुसह बिरह संभव दुख मेटे॥सीता चरन भरत सिरु नावा। अनुज समेत परम सुख पावा॥

भरतके छोटे भाई लक्ष्मणने शत्रुघ्नसे गले मिलकर विरहका असह्य दुःख मिटाया। फिर भरत भी शत्रुघ्नसहित सीताके चरणोंमें सिर नवाकर परम सुखको प्राप्त हुए।

प्रभु बिलोकि हरषे पुरबासी। जनित बियोग बिपति सब नासी॥प्रेमातुर सब लोग निहारी। कौतुक कीन्ह कृपाल खरारी॥

प्रभुको देखकर अयोध्यावासी हर्षित हो उठे, वियोगका सारा दुःख मिट गया। सबको प्रेमविह्वल देखकर करुणामय श्रीरामने एक अद्भुत लीला रची।

अमित रूप प्रगटे तेहि काला। जथाजोग मिले सबहि कृपाला॥कृपादृष्टि रघुबीर बिलोकी। किए सकल नर नारि बिसोकी॥

उसी क्षण वे असंख्य रूपोंमें प्रकट हो गये और सबसे यथायोग्य मिले; अपनी कृपादृष्टिसे सब नर-नारियोंको शोकरहित कर दिया।

छन महिं सबहि मिले भगवाना। उमा मरम यह काहुँ न जाना॥एहि बिधि सबहि सुखी करि रामा। आगें चले सील गुन धामा॥

भगवान क्षणभरमें ही सबसे मिल गये—यह रहस्य किसीको समझमें नहीं आया, कहते हैं शिवजी। इस तरह सबको सुखी करके शील और गुणोंके धाम श्रीराम आगे बढ़े।

कौसल्यादि मातु सब धाई। निरखि बच्छ जनु धेनु लवाई॥

कौसल्या आदि माताएँ ऐसे दौड़ीं मानो नयी ब्यायी गौएँ अपने बछड़ोंको देखकर दौड़ पड़ी हों।

छंद

जनु धेनु बालक बच्छ तजि गृहँ चरन बन परबस गईं।दिन अंत पुर रुख स्त्रवत थन हुंकार करि धावत भई।।अति प्रेम प्रभु सब मातु भेटीं बचन मृदु बहुबिधि कहे।गइ बिषम बियोग भव तिन्ह हरष सुख अगनित लहे॥

जैसे गौएँ अपने बछड़ोंको घरमें छोड़कर दिनभर वनमें विवश होकर चरती हैं, और साँझ ढलते ही गाँवकी ओर देख हुंकार भरती, थनोंसे दूध टपकाती दौड़ पड़ती हैं—वैसे ही अपार प्रेमसे प्रभु सब माताओंसे मिले और उन्हें अनेक मधुर वचन कहे। वियोगकी वह भीषण विपत्ति दूर हो गयी और सबने असीम हर्ष-सुख पाया।

दोहा

भेंटेउ तनय सुमित्राँ राम चरन रति जानि।रामहि मिलत कैकेई हृदयँ बहुत सकुचानि६(क)

सुमित्राजी अपने पुत्र लक्ष्मणकी रामचरणोंमें अटूट प्रीति देखकर उनसे गले मिलीं; और जब श्रीराम कैकेयीसे मिलने बढ़े तो उनका हृदय संकोचसे भर उठा।

दोहा

लछिमन सब मातन्ह मिलि हरषे आसिष पाई।कैकेइ कहँ पुनि पुनि मिले मन कर छोभु न जाइ॥६(ख)

लक्ष्मणजी भी सब माताओंसे मिलकर आशीर्वाद पाकर हर्षित हुए; कैकेयीसे भी वे बार-बार मिले, पर मनका क्षोभ किसी तरह शान्त नहीं हो रहा था।

सासुन्ह सबनि मिली बैदेही। चरनन्हि लागि हरषु अति तेही॥देहिं असीस बूझि कुसलाता। होइ अचल तुम्हार अहिवाता॥

सीताजी सब सासुओंसे मिलीं और उनके चरणोंमें लगकर अत्यन्त हर्षित हुईं; सासुएँ कुशल पूछकर आशीर्वाद देती हैं कि तुम्हारा सुहाग सदा अटल रहे।

सब रघुपति मुख कमल बिलोकहिं। मंगल जानि नयन जल रोकहिं॥कनक थार आरति उतारहिं। बार बार प्रभु गात निहारहिं॥

सब माताएँ रघुनाथके कमल-से मुखको निहार रही हैं; शुभ अवसर जानकर आँसुओंको नेत्रोंमें ही थाम लेती हैं। सोनेके थालसे आरती उतारती हैं और बार-बार प्रभुका रूप देखती हैं।

नाना भाँति निछावरि करहीं। परमानंद हरष उर भरहीं॥कौसल्या पुनि पुनि रघुबीरहि। चितवति कृपासिंधु रनधीरहि॥

वे अनेक प्रकारसे निछावर करती हैं, हृदय परमानन्दसे भर उठता है। कौसल्याजी बार-बार कृपासागर और रणधीर रघुवीरको निहारती हैं।

हृदयँ बिचारति बारहिं बारा। कवन भाँति लंकापति मारा॥अति सुकुमार जुगल मेरे बारे। निसिचर सुभट महाबल भारे॥

वे मन-ही-मन बार-बार सोचती हैं—इन्होंने लंकापतिको आखिर कैसे मार डाला? मेरे ये दोनों बालक तो अत्यन्त सुकुमार थे, और वे राक्षस-योद्धा भारी बलशाली थे।

दोहा

लछिमन अरु सीता सहित प्रभुहि बिलोकति मातु।परमानंद मगन मन पुनि पुनि पुलकित गातु

लक्ष्मण और सीतासहित प्रभुको माता निहार रही हैं, उनका मन परमानन्दमें डूबा है और शरीर बार-बार पुलकित हो उठता है।

लंकापति कपीस नल नीला। जामवंत अंगद सुभसीला॥हनुमदादि सब बानर बीरा। धरे मनोहर मनुज सरीरा॥

लंकापति विभीषण, वानरराज सुग्रीव, नल, नील, जाम्बवान, अंगद और हनुमान आदि सभी शूरवीर वानरोंने मनोहर मनुष्य-रूप धारण कर लिया।

भरत सनेह सील ब्रत नेमा। सादर सब बरनहिं अति प्रेमा॥देखि नगरबासिन्ह के रीती। सकल सराहहिं प्रभु पद प्रीती॥

सब लोग बड़े प्रेमसे भरतके स्नेह, शील और व्रत-नियमकी सराहना कर रहे हैं; नगरवासियोंकी विनम्र रीति देखकर सब प्रभुके चरणोंमें उनकी प्रीतिको सराहते हैं।

पुनि रघुपति सब सखा बोलाए। मुनि पद लागहु सकल सिखाए॥गुर बसिष्ट कुलपूज्य हमारे। इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे॥

फिर रघुनाथने अपने सब सखाओंको बुलाकर मुनिके चरणोंमें प्रणाम करनेको कहा—ये गुरु वसिष्ठ हमारे पूरे कुलके पूज्य हैं, इन्हींकी कृपासे युद्धमें राक्षस मारे गये।

ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे। भए समर सागर कहँ बेरे॥मम हित लागि जन्म इन्ह हारे। भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे॥

उन्होंने गुरुसे कहा—हे मुनि, ये सब मेरे सखा हैं, युद्धरूपी सागरमें ये मेरे लिये जहाजके समान बने; मेरे लिये इन्होंने अपने प्राणतक दाँवपर लगा दिये, ये मुझे भरतसे भी बढ़कर प्रिय हैं।

सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। निमिष निमिष उपजत सुख नए॥

प्रभुके ये वचन सुनकर सब प्रेममें डूब गये; पल-पल उन्हें नये-नये सुखकी अनुभूति होने लगी।

दोहा

कौसल्या के चरनन्हि पुनि तिन्ह नायउ माथ।आसिष दीन्हे हरषि तुम्ह प्रिय मम जिमि रघुनाथ८(क)

फिर सबने कौसल्याके चरणोंमें सिर नवाया; उन्होंने हर्षित होकर आशीर्वाद दिया—तुम मुझे रघुनाथके समान ही प्रिय हो।

दोहा

सुमन बृष्टि नभ संकुल भवन चले सुखकंद।चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नगर नारि नर बृंद८(ख)

आनन्दके मूल श्रीराम अपने महलकी ओर चले, आकाश पुष्पवृष्टिसे भर उठा; नगरके स्त्री-पुरुषोंकी भीड़ अटारियोंपर चढ़कर उन्हें निहारने लगी।

कंचन कलस बिचित्र सँवारे। सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे॥बंदनवार पताका केतू। सबन्हि बनाए मंगल हेतू॥

लोगोंने सोनेके सुन्दर सजे कलश अपने-अपने द्वारपर रख दिये; मंगलके लिये सब जगह बंदनवार, ध्वजा और पताकाएँ सजायी गयीं।

बीथीं सकल सुगंध सिंचाई। गजमनि रचि बहु चौक पुराई॥नाना भाँति सुमंगल साजे। हरषि नगर निसान बहु बाजे॥

सारी गलियाँ सुगन्धसे सिंचायी गयीं, मोतियोंसे बहुत-सी रंगोलियाँ रचायी गयीं; अनेक मंगल-साज सजे और नगरमें हर्षपूर्वक ढेरों नगाड़े बजने लगे।

जहँ तहँ नारि निछावरि करहीं। देहिं असीस हरष उर भरहीं॥कंचन थार आरती नाना। जुबती सजें करहिं सुभ गाना॥

स्त्रियाँ जहाँ-तहाँ निछावर करती हैं, हृदय हर्षसे भरकर आशीर्वाद देती हैं; सजी-धजी युवतियाँ सोनेके थालोंमें विविध आरती लिये मंगलगान करती हैं।

करहिं आरती आरतिहर कें। रघुकुल कमल बिपिन दिनकर कें॥पुर सोभा संपति कल्याना। निगम सेष सारदा बखाना॥

वे दुःखहर्ता, सूर्यकुलरूपी कमलवनको खिलानेवाले सूर्य श्रीरामकी आरती उतार रही हैं। नगरकी वह शोभा, सम्पदा और मंगल ऐसा है कि वेद, शेष और सरस्वती भी उसका वर्णन करते रहते हैं।

तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं। उमा तासु गुन नर किमि कहहीं॥

पर वे भी यह दृश्य देखकर चकित रह जाते हैं—शिवजी कहते हैं, हे उमा, फिर साधारण मनुष्य उनके गुणोंका वर्णन भला कैसे कर सकते हैं?

दोहा

नारि कुमुदिनीं अवध सर रघुपति बिरह दिनेस।अस्त भए बिगसत भईं निरखि राम राकेस९(क)

स्त्रियाँ मानो कुमुदिनी हैं और अयोध्या सरोवर, जो रामके विरहरूपी सूर्यसे मुरझा गया था; अब उस विरह-सूर्यके अस्त होते ही रामरूपी पूर्णचन्द्रको देखकर वे फिर खिल उठीं।

दोहा

होहिं सगुन सुभ बिबिध बिधि बाजहिं गगन निसान।पुर नर नारि सनाथ करि भवन चले भगवान९(ख)

अनेक प्रकारके शुभ शकुन होने लगे, आकाशमें नगाड़े बज उठे; नगरके सब स्त्री-पुरुषोंको दर्शनसे कृतार्थ करते हुए भगवान महलकी ओर चल पड़े।

प्रभु जानी कैकेई लजानी। प्रथम तासु गृह गए भवानी॥ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा। पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा॥

शिवजी कहते हैं, हे भवानी, प्रभुने समझ लिया कि माता कैकेयी संकोचमें हैं, इसलिये पहले उन्हींके महल गये, उन्हें समझा-बुझाकर सुख दिया, तब अपने महल गये।

कृपासिंधु जब मंदिर गए। पुर नर नारि सुखी सब भए॥गुर बसिष्ट द्विज लिए बुलाई। आजु सुघरी सुदिन समुदाई॥

कृपासागर जब अपने महलमें पहुँचे, नगरके स्त्री-पुरुष सब सुखी हो उठे; गुरु वसिष्ठने ब्राह्मणोंको बुलाकर कहा—आज हर दृष्टिसे शुभ घड़ी और सुन्दर दिन है।

सब द्विज देहु हरषि अनुसासन। रामचंद्र बैठहिं सिंघासन॥मुनि बसिष्ट के बचन सुहाए। सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए॥

उन्होंने कहा—आप सब हर्षपूर्वक आज्ञा दें ताकि रामचन्द्र सिंहासनपर विराजें; वसिष्ठजीके ये सुहावने वचन सुनते ही सब ब्राह्मणोंको बहुत भाये।

कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका। जग अभिराम राम अभिषेका॥अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजे। महाराज कहँ तिलक करीजै॥

अनेक ब्राह्मण कोमल वाणीमें बोल उठे कि रामका राज्याभिषेक सारे जगतको आनन्द देनेवाला है, अब हे मुनिश्रेष्ठ, विलम्ब न करें, महाराजका तिलक शीघ्र कर दें।

दोहा

तब मुनि कहेउ सुमंत्र सन सुनत चलेउ हरषाइ।रथ अनेक बहु बाजि गज तुरत सँवारे जाइ१०(क)

तब मुनिने सुमन्त्रसे कहा; वे सुनते ही हर्षित हो चले और तुरंत बहुत-से रथ, घोड़े और हाथी सजवा लिये।

दोहा

जहँ तहँ धावन पठइ पुनि मंगल द्रब्य मगाइ।हरष समेत बसिष्ट पद पुनि सिरु नायउ आइ१०(ख)

उन्होंने जहाँ-तहाँ दूत भेजकर मंगल-सामग्री मँगायी, फिर हर्षसे लौटकर वसिष्ठके चरणोंमें सिर नवाया।

अवधपुरी अति रुचिर बनाई। देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई॥राम कहा सेवकन्ह बुलाई। प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई॥

अवधपुरी अत्यन्त सुन्दर सजायी गयी, देवताओंने फूलोंकी झड़ी लगा दी; रामने सेवकोंको बुलाकर कहा—पहले जाकर मेरे सखाओंको स्नान कराओ।

सुनत बचन जहँ तहँ जन धाए। सुग्रीवादि तुरत अन्हवाए॥पुनि करुनानिधि भरतु हँकारे। निज कर राम जटा निरुआरे॥

यह सुनते ही सेवक जहाँ-तहाँ दौड़े और सुग्रीव आदिको तुरंत स्नान कराया; फिर करुणानिधानने भरतको बुलाकर स्वयं अपने हाथोंसे उनकी जटाएँ सुलझायीं।

अन्हवाए प्रभु तीनिउ भाई। भगत बछल कृपाल रघुराई॥भरत भाग्य प्रभु कोमलताई। सेष कोटि सत सकहिं न गाई॥

भक्तवत्सल कृपालु प्रभुने तीनों भाइयोंको स्नान कराया; भरतका भाग्य और प्रभुकी वह कोमलता ऐसी है कि करोड़ों शेष भी उसका वर्णन नहीं कर सकते।

पुनि निज जटा राम बिबराए। गुर अनुसासन मागि नहाए॥करि मज्जन प्रभु भूषन साजे। अंग अनंग देखि सत लाजे॥

फिर रामने स्वयं अपनी जटाएँ खोलीं और गुरुकी आज्ञा लेकर स्नान किया; स्नानके बाद आभूषण धारण किये तो उनके अंगोंकी शोभा देखकर सैकड़ों कामदेव लजा गये।

दोहा

सासुन्ह सादर जानकिहि मज्जन तुरत कराइ।दिब्य बसन बर भूषन अँग अंग सजे बनाइ११(क)

उधर सासुओंने जानकीको आदरपूर्वक तुरंत स्नान कराकर उनके अंग-अंगपर दिव्य वस्त्र और श्रेष्ठ आभूषण सजा दिये।

दोहा

राम बाम दिसि सोभति रमा रूप गुन खानि।देखि मातु सब हरषीं जन्म सुफल निज जानि११(ख)

रामके बायीं ओर रूप-गुणकी खान रमा (सीता) शोभित हो रही हैं; उन्हें देखकर हर माता अपना जीवन सफल मानकर हर्षित हुई।

दोहा

सुनु खगेस तेहि अवसर ब्रह्मा सिव मुनि बृंद।चढ़ि बिमान आए सब सुर देखन सुखकंद११(ग)

काकभुशुण्डि कहते हैं—हे गरुड़, उसी क्षण ब्रह्मा, शिव और मुनियोंके समूह तथा विमानोंपर सवार सब देवता उस आनन्दकन्दके दर्शनके लिये वहाँ आ पहुँचे।

प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा। तुरत दिब्य सिंघासन मागा॥रबि सम तेज सो बरनि न जाई। बैठे राम द्विजन्ह सिरु नाई॥

प्रभुको देखकर मुनि वसिष्ठका हृदय प्रेमसे भर उठा, उन्होंने तुरंत सूर्यके समान तेजस्वी, अवर्णनीय दिव्य सिंहासन मँगवाया; रामने ब्राह्मणोंको सिर नवाकर उसपर आसन ग्रहण किया।

जनकसुता समेत रघुराई। पेखि प्रहरषे मुनि समुदाई॥बेद मंत्र तब द्विजन्ह उचारे। नभ सुर मुनि जय जयति पुकारे॥

जानकीसहित रघुनाथको देखकर मुनियोंका समूह अत्यन्त हर्षित हो उठा; ब्राह्मणोंने वेदमंत्र पढ़े और आकाशमें देव-मुनि जय-जयकार करने लगे।

प्रथम तिलक बसिष्ट मुनि कीन्हा। पुनि सब बिप्रन्ह आयसु दीन्हा॥सुत बिलोकि हरषीं महतारी। बार बार आरती उतारी॥

सबसे पहले वसिष्ठमुनिने तिलक किया, फिर सब ब्राह्मणोंको भी वैसी अनुमति दी; पुत्रको सिंहासनपर देखकर माताएँ हर्षित हुईं और बार-बार आरती उतारने लगीं।

बिप्रन्ह दान बिबिध बिधि दीन्हे। जाचक सकल अजाचक कीन्हे॥सिंघासन पर त्रिभुअन साई। देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई॥

ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके दान दिये गये, हर याचक मालामाल हो गया; त्रिभुवनके स्वामीको सिंहासनपर देखकर देवताओंने नगाड़े बजाये।

छंद

नभ दुंदुभीं बाजहिं बिपुल गंधर्ब किंनर गावहीं।नाचहिं अपछरा बृंद परमानंद सुर मुनि पावहीं॥भरतादि अनुज बिभीषनांगद हनुमदादि समेत ते।गहें छत्र चामर ब्यजन धनु असि चर्म सक्ति बिराजते॥

आकाशमें अनेक नगाड़े बज रहे हैं, गन्धर्व और किन्नर गा रहे हैं, अप्सराओंके झुंड नाच रहे हैं, देव-मुनि परमानन्दमें डूबे हैं; भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, विभीषण, अंगद और हनुमान आदि छत्र, चँवर, पंखा, धनुष, तलवार, ढाल और शक्ति लिये सुशोभित खड़े हैं।

छंद

श्री सहित दिनकर बंस भूषन काम बहु छबि सोहई।नव अंबुधर बर गात अंबर पीत सुर मन मोहई॥मुकुटांगदादि बिचित्र भूषन अंग अंगन्हि प्रति सजे।अंभोज नयन बिसाल उर भुज धन्य नर निरखंति जे॥

सीतासहित सूर्यवंशके इस भूषणके शरीरमें अनगिनत कामदेवोंकी छटा झलक रही है; नवजलधर-सा साँवला रूप, पीताम्बर देवताओंके मनको भी मोह लेता है; मुकुट-बाजूबंद जैसे विचित्र आभूषण अंग-अंगपर सजे हैं, कमल-से विशाल नेत्र, चौड़ी छाती और लम्बी भुजाएँ—धन्य हैं वे जो इस रूपको निहारते हैं।

दोहा

वह सोभा समाज सुख कहत न बनइ खगेस।बरनहिं सारद सेष श्रुति सो रस जान महेस१२(क)

शिवजी कहते हैं—हे गरुड़, वह शोभा, वह समागम, वह सुख मुझसे वर्णन नहीं होता; सरस्वती, शेष और वेद उसका बखान करते रहते हैं, पर उसका रस तो महादेव ही जानते हैं।

दोहा

भिन्न भिन्न अस्तुति करि गए सुर निज निज धाम।बंदी बेष बेद तब आए जहँ श्रीराम१२(ख)

सब देवता अलग-अलग स्तुति करके अपने-अपने लोक लौट गये; फिर भाटका वेष धरकर स्वयं चारों वेद वहाँ आये जहाँ राम विराजमान थे।

दोहा

प्रभु सर्बग्य कीन्ह अति आदर कृपानिधान।लखेउ न काहूँ मरम कछु लगे करन गुन गान१२(ग)

सर्वज्ञ कृपानिधान प्रभुने उनका बड़ा आदर किया, पर किसीको भी उनका भेद नहीं मालूम हुआ; वेद वहाँ उनका गुणगान करने लगे।

छंद

जय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने।दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुज बल हने॥अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दुख दहे।जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संजुक्त सक्ति नमामहे॥

जय हो, हे सगुण-निर्गुण दोनों रूपोंवाले, अनुपम सुन्दरता और राजाओंके शिरोमणि! रावण आदि प्रचंड दुष्ट राक्षसोंको आपने अपनी भुजाओंसे मार गिराया; मनुष्य-रूप धरकर आपने धरतीका भार उतारा और घोर दुःखोंको भस्म किया। जय हो, हे शरणागतके रक्षक दयालु प्रभु! हम शक्तिसहित शक्तिमान आपको नमस्कार करते हैं।

छंद

तव बिषम माया बस सुरासुर नाग नर अग जग हरे।भव पंथ भ्रमत अमित दिवस निसि काल कर्म गुननि भरे॥जे नाथ करि करुना बिलोके त्रिबिधि दुख ते निर्बहे।भव खेद छेदन दच्छ हम कहुँ रच्छ राम नमामहे॥

आपकी दुर्निवार मायाके वशीभूत होकर देव, दानव, नाग, मनुष्य—सभी चराचर काल, कर्म और गुणोंमें बँधकर दिन-रात अनंत जन्म-मरणके पथपर भटकते रहते हैं। पर हे नाथ, जिन्हें आपने एक बार भी कृपादृष्टिसे देख लिया, वे तीनों तापोंसे मुक्त हो गये। संसारकी थकानको काटनेमें कुशल हे राम, हमारी रक्षा कीजिये, हम आपको नमस्कार करते हैं।

छंद

जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी।ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी॥बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे।जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव नाथ सो समरामहे॥

जो झूठे ज्ञानके घमंडमें डूबकर जन्म-मृत्युका नाश करनेवाली आपकी भक्तिका कभी आदर नहीं करते, हे हरि, उन्हें हमने देवताओंको भी दुर्लभ पद पाकर भी वहाँसे गिरते देखा है। पर जो हर आशा त्यागकर आप ही पर भरोसा रख आपके दास बन जाते हैं, वे केवल आपका नाम जपकर बिना किसी परिश्रमके भवसागर पार कर जाते हैं—हे नाथ, हम आपको इसी रूपमें स्मरण करते हैं।

छंद

जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपतिनी तरी।नख निर्गता मुनि बंदिता त्रेलोक पावनि सुरसरी॥ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे।पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेस नित्य भजामहे॥

जिन चरणोंको शिव और ब्रह्मा भी पूजते हैं, जिनकी पावन रजके स्पर्शमात्रसे मुनिपत्नी अहल्या तर गयी, जिनके नखसे निकलकर मुनिवन्दित, त्रैलोक्यको पावन करनेवाली गंगा प्रवाहित हुई, और जो ध्वजा, वज्र, अंकुश व कमलके चिह्नोंसे युक्त होकर भी वनमें भटकते समय काँटोंसे घट्टे पड़ गये—हे मुकुन्द, हे राम, हे रमापति, हम आपके उन्हीं युगल चरणोंको सदा भजते हैं।

छंद

अब्यक्तमूलमनादि तरु त्वच चारि निगमागम भने।षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने॥फल जुगल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे।पल्लवत फूलत नवल नित संसार बिटप नमामहे॥

वेद-शास्त्र कहते हैं—इस संसाररूपी वृक्षका मूल अव्यक्त है, यह अनादि है, इसकी चार छालें, छह तने और पच्चीस शाखाएँ हैं, अनगिनत पत्ते और फूल हैं; इसमें कड़वे-मीठे दो फल लगते हैं, एक ही बेल इसके सहारे टिकी रहती है, और इसमें सदा नये पत्ते-फूल निकलते रहते हैं—हे संसारवृक्षरूप प्रभु, हम आपको नमस्कार करते हैं।

छंद

जे ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य मनपर ध्यावहीं।ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं॥करुनायतन प्रभु सदगुनाकर देव यह बर मागहीं।मन बचन कर्म बिकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं॥

जो लोग ब्रह्मको अजन्मा, अद्वैत, अनुभवगम्य और मनसे परे मानकर ध्यान करते हैं, वे वैसा ही कहें और जानें; पर हे नाथ, हम तो सदा आपके सगुण यशका ही गान करते हैं। हे करुणाके धाम, सद्गुणोंकी खान प्रभु, हम बस यही वर माँगते हैं कि मन, वचन और कर्मसे सब विकार त्यागकर आपके चरणोंमें अनुराग बना रहे।

दोहा

सब के देखत बेदन्ह बिनती कीन्हि उदार।अंतर्धान भए पुनि गए ब्रह्म आगार१३(क)

सबके सामने वेदोंने यह उदार विनती की, फिर वे अन्तर्धान होकर ब्रह्मलोक चले गये।

दोहा

बैनतेय सुनु संभु तब आए जहँ रघुबीर।बिनय करत गदगद गिरा पूरित पुलक सरीर१३(ख)

काकभुशुण्डि कहते हैं—हे गरुड़, तब शिवजी वहाँ आये जहाँ रघुवीर विराजमान थे और गद्गद वाणीमें विनयपूर्वक स्तुति करने लगे, उनका शरीर रोमांचसे भर उठा।

छंद

जय राम रमारमनं समनं। भव ताप भयाकुल पाहि जनं॥अवधेस सुरेस रमेस बिभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो॥

जय हो राम, लक्ष्मीके रमण, संसार-तापको शान्त करनेवाले! भवभयसे व्याकुल इस सेवककी रक्षा कीजिये। हे अवधपति, हे देवोंके स्वामी, हे रमापति, हे विभो! शरण आया यह सेवक बस यही माँगता है—हे प्रभो, मेरी रक्षा कीजिये।

छंद

दससीस बिनासन बीस भुजा। कृत दूरि महा महि भूरि रुजा॥रजनीचर बृंद पतंग रहे। सर पावक तेज प्रचंड दहे॥

हे दस सिर और बीस भुजाओंवाले रावणके संहारक, जिन्होंने पृथ्वीके समस्त महारोगोंको दूर किया! रात्रिचर राक्षससमूह पतंगोंकी भाँति थे, वे सब आपके बाणरूपी अग्निके प्रचंड तेजसे भस्म हो गये।

छंद

महि मंडल मंडन चारुतरं। धृत सायक चाप निषंग बरं॥मद मोह महा ममता रजनी। तम पुंज दिवाकर तेज अनी॥

आप ही पृथ्वीके सबसे सुंदर आभूषण हैं, हाथमें बाण-धनुष-तरकस सदा धारण किये रहते हैं; मद, मोह और ममतारूपी घोर रात्रिके अंधकारको मिटानेके लिये आप सूर्यके प्रखर तेज हैं।

छंद

मनजात किरात निपात किए। मृग लोग कुभोग सरेन हिए॥हति नाथ अनाथनि पाहि हरे। बिषया बन पावर भूलि परे॥

कामरूपी भीलने मनुष्यरूपी हिरनोंके हृदयमें कुभोगके बाण चलाकर उन्हें गिरा दिया है; हे नाथ, हे हरि, उसे मारकर विषयवनमें भटकते इन असहाय पामर जीवोंकी रक्षा कीजिये।

छंद

बहु रोग बियोगन्हि लोग हए। भवदंघ्रि निरादर के फल ए॥भव सिंधु अगाध परे नर ते। पद पंकज प्रेम न जे करते॥

लोग अनेक रोगों और वियोगोंसे पीड़ित हैं—यह सब आपके चरणोंके अनादरका ही फल है। जो आपके चरणकमलोंसे प्रेम नहीं करते, वे अथाह भवसागरमें डूबे रहते हैं।

छंद

अति दीन मलीन दुखी नितहीं। जिन्ह के पद पंकज प्रीति नहीं॥अवलंब भवंत कथा जिन्ह के।। प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें॥

जिन्हें आपके चरणोंमें प्रीति नहीं, वे सदा दीन, मलिन और दुःखी रहते हैं; पर जिन्हें आपकी लीला-कथाका सहारा है, उन्हें संत और अनंत प्रभु सदा प्रिय लगते हैं।

छंद

नहिं राग न लोभ न मान मदा।। तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा॥एहि ते तव सेवक होत मुदा। मुनि त्यागत जोग भरोस सदा॥

उनमें न राग है, न लोभ, न मान, न मद; सुख-दुःख उनके लिये समान है। इसीसे मुनि भी योगका भरोसा छोड़कर सहर्ष आपके सेवक बन जाते हैं।

छंद

करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ। पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ॥सम मानि निरादर आदरही। सब संत सुखी बिचरंति मही॥

वे निरंतर प्रेमपूर्वक नियम लेकर शुद्ध हृदयसे आपके चरणकमलोंकी सेवा करते हैं, आदर-अनादरको एक समान मानते हुए ऐसे संत पृथ्वीपर सुखपूर्वक विचरते हैं।

छंद

मुनि मानस पंकज भृंग भजे। रघुबीर महा रनधीर अजे॥तव नाम जपामि नमामि हरी। भव रोग महागद मान अरी॥

हे मुनियोंके मनरूपी कमलके भ्रमर, महान् रणधीर, अजेय रघुवीर, मैं आपकी शरण लेता हूँ; हे हरि, आपका नाम जपता और आपको नमन करता हूँ—आप जन्म-मृत्युरूपी रोगकी महौषधि और अभिमानके शत्रु हैं।

छंद

गुन सील कृपा परमायतनं। प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं॥रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं। महिपाल बिलोकय दीन जनं॥१०

गुण, शील और कृपाके परम धाम, लक्ष्मीपति, मैं निरंतर आपको प्रणाम करता हूँ। हे रघुनंदन, मेरे भीतरके सब द्वंद्व मिटा दीजिये; हे पृथ्वीपाल, इस दीन जनकी ओर भी कृपादृष्टि डालिये।

दोहा

बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग।पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग॥१४(क)

मैं बार-बार यही वर माँगता हूँ—हे श्रीरंग, हर्षपूर्वक मुझे अपने चरणोंकी अटूट भक्ति और सदा सत्संग प्रदान कीजिये।

दोहा

बरनि उमापति राम गुन हरषि गए कैलास।तब प्रभु कपिन्ह दिवाए सब बिधि सुखप्रद बास१४(ख)

इस प्रकार रामके गुणोंका बखान कर उमापति शिवजी प्रसन्न होकर कैलास लौट गये; फिर प्रभुने वानरोंके लिये हर प्रकारसे सुखद निवासकी व्यवस्था करायी।

सुनु खगपति यह कथा पावनी। त्रिबिध ताप भव भय दावनी॥महाराज कर सुभ अभिषेका। सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका॥

काकभुशुण्डि कहते हैं—हे पक्षिराज, यह पावन कथा तीनों तापों और जन्म-मृत्युके भयको दूर करनेवाली है; रामके इस मंगलमय राज्याभिषेकको सुनकर मनुष्य वैराग्य और विवेक पाते हैं।

जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं। सुख संपति नाना बिधि पावहिं॥सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं। अंतकाल रघुपति पुर जाहीं॥

जो सकाम भावसे इसे सुनते या गाते हैं, वे भी अनेक प्रकारके सुख और सम्पत्ति पाते हैं; संसारमें देवदुर्लभ भोग भोगकर अंतकालमें रघुनाथके परमधामको जाते हैं।

सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई। लहहिं भगति गति संपति नई॥खगपति राम कथा मैं बरनी। स्वमति बिलास त्रास दुख हरनी॥

जीवन्मुक्त, विरक्त और विषयी—जो भी इसे सुनते हैं, वे यथायोग्य भक्ति, मुक्ति या नयी सम्पदा पाते हैं। हे गरुड़, मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार यह रामकथा कही है, जो भय और दुःखको हरनेवाली है।

बिरति बिबेक भगति दृढ़ करनी। मोह नदी कहँ सुंदर तरनी॥नित नव मंगल कौसलपुरी। हरषित रहहिं लोग सब कुल॥

यह वैराग्य, विवेक और भक्तिको दृढ़ करती है, मोहरूपी नदीको पार करनेके लिये सुंदर नाव है। अवधपुरीमें नित नये उत्सव होते रहे, हर वर्गके लोग सदा प्रसन्न रहे।

नित नव प्रीति राम पद पंकज। सबकें जिन्हहि नमत सिव मुनि अज॥मंगन बहु प्रकार पहिराए। द्विजन्ह दान नाना बिधि पाए॥

रामके उन चरणकमलोंमें, जिन्हें शिव, मुनि और ब्रह्मा भी नमन करते हैं, सबकी नित नयी प्रीति बनी रही। भिक्षुकोंको अनेक वस्त्राभूषण मिले और ब्राह्मणोंने तरह-तरहके दान पाये।

दोहा

ब्रह्मानंद मगन कपि सब कें प्रभु पद प्रीति।जात न जाने दिवस तिन्ह गए मास षट बीति१५

सब वानर प्रभुके चरणोंकी प्रीतिमें ब्रह्मानंदमें डूबे रहे, दिन बीतनेका पता ही न चला—देखते-देखते छह महीने बीत गये।

बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं। जिमि परद्रोह संत मन माहीं॥तब रघुपति सब सखा बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिरु नाए॥

उन्हें अपना घर स्वप्रमें भी याद न आया, ठीक वैसे ही जैसे संतके मनमें कभी दूसरेसे द्रोहकी बात नहीं आती। तब रघुनाथने सब सखाओंको बुलाया, और सबने आकर आदरसे सिर नवाया।

परम प्रीति समीप बैठारे। भगत सुखद मृदु बचन उचारे॥तुम्ह अति कीन्ह मोरि सेवकाई। मुख पर केहि बिधि करौं बड़ाई॥

उन्हें बड़े प्रेमसे अपने पास बिठाकर प्रभुने भक्तोंको सुख देनेवाले कोमल वचन कहे—तुमने मेरी बड़ी सेवा की है, तुम्हारी बड़ाई मुँहपर कैसे करूँ?

ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे। मम हित लागि भवन सुख त्यागे॥अनुज राज संपति बैदेही। देह गेह परिवार सनेही॥

इसीसे तुम मुझे अत्यंत प्रिय हो, क्योंकि मेरे लिये तुमने अपने घर-सुख सब त्याग दिये। भाई, राज्य, संपत्ति, सीता, अपनी देह, घर और कुटुम्ब—

सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना। मृषा न कहउँ मोर यह बाना॥सब के प्रिय सेवक यह नीती। मोरें अधिक दास पर प्रीती॥

यह सब मुझे प्रिय है, पर तुम्हारे समान नहीं; यह मैं झूठ नहीं कहता, यही मेरा स्वभाव है। सेवक सबको प्रिय होते हैं, यह नीति है, पर मेरा तो दासपर स्वाभाविक ही विशेष प्रेम है।

दोहा

अब गृह जाहु सखा सब भजेहु मोहि दृढ़ नेम।सदा सर्बगत सर्बहित जानि करेहु अति प्रेम१६

अब सब घर जाओ, हे सखागण, और दृढ़ नियमसे मुझे भजते रहना; मुझे सर्वव्यापी और सबका हितैषी जानकर मुझसे अत्यंत प्रेम करना।

सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। को हम कहाँ बिसरि तन गए॥एकटक रहे जोरि कर आगे। सकहिं न कछु कहि अति अनुरागे॥

प्रभुके वचन सुनकर सब प्रेममग्न हो गये, अपनी सुध-बुध ही भूल गये; हाथ जोड़े टकटकी लगाये खड़े रहे, अत्यंत प्रेमके कारण कुछ कह ही न सके।

परम प्रेम तिन्ह कर प्रभु देखा। कहा बिबिध बिधि ग्यान बिसेषा॥प्रभु सन्मुख कछु कहन न पारहिं। पुनि पुनि चरन सरोज निहारहिं॥

उनका ऐसा अगाध प्रेम देखकर प्रभुने उन्हें विशेष ज्ञानका उपदेश दिया; फिर भी वे सम्मुख कुछ कह न सके, बस बार-बार उनके चरणकमलोंको निहारते रहे।

तब प्रभु भूषन बसन मगाए। नाना रंग अनूप सुहाए॥सुग्रीवहि प्रथमहिं पहिराए। बसन भरत निज हाथ बनाए॥

तब प्रभुने अनेक रंगोंके सुंदर वस्त्राभूषण मँगवाये; सबसे पहले भरतने अपने ही हाथोंसे सुग्रीवको सजाकर पहनाया।

प्रभु प्रेरित लछिमन पहिराए। लंकापति रघुपति मन भाए॥अंगद बैठ रहा नहिं डोला। प्रीति देखि प्रभु ताहि न बोला॥

फिर प्रभुकी प्रेरणासे लक्ष्मणने विभीषणको वस्त्राभूषण पहनाये, जो रघुनाथके मनको बहुत भाये। अंगद बस बैठे ही रह गये, हिले तक नहीं; उनका गहरा प्रेम देखकर प्रभुने उन्हें बुलाया तक नहीं।

दोहा

जामवंत नीलादि सब पहिराए रघुनाथ।हियँ धरि राम रूप सब चले नाइ पद माथ१७(क)

जाम्बवान, नील आदि सभीको रघुनाथने स्वयं अपने हाथों वस्त्राभूषण पहनाये; वे सब हृदयमें रामका रूप बसाकर उनके चरणोंमें सिर नवाकर विदा हुए।

दोहा

तब अंगद उठि नाइ सिरु सजल नयन कर जोरि।अति बिनीत बोलेउ बचन मनहुँ प्रेम रस बोरि१७(ख)

तब अंगद उठकर सिर नवाकर, आँखोंमें आँसू भरकर, हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्र स्वरमें, मानो प्रेमरसमें डूबे हुए वचन बोले।

सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो। दीन दयाकर आरत बंधो॥मरती बेर नाथ मोहि बाली। गयउ तुम्हारेहि कोंछें घाली॥

हे सर्वज्ञ, कृपा और सुखके सागर, दीनदयालु, दुखियोंके बंधु, सुनिये—मरते समय मेरे पिता बालिने मुझे आपकी ही गोदमें डाल दिया था।

असरन सरन बिरदु संभारी। मोहि जनि तजहु भगत हितकारी॥मोरें तुम्ह प्रभु गुर पितु माता। जाउँ कहाँ तजि पद जलजाता॥

अपना अशरण-शरण व्रत याद रखकर मुझे त्यागिये मत, हे भक्तवत्सल! मेरे लिये स्वामी, गुरु, माता-पिता सब आप ही हैं—आपके चरण छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ?

तुम्हहि बिचारि कहहु नरनाहा। प्रभु तजि भवन काज मम काहा॥बालक ग्यान बुद्धि बल हीना। राखहु सरन नाथ जन दीना॥

हे महाराज, आप स्वयं विचारकर बताइये—आपको छोड़कर घरमें मेरा क्या काम? हे नाथ, ज्ञान-बुद्धि-बलसे हीन इस बालक दीन सेवकको अपनी शरणमें ही रखिये।

नीचि टहल गृह के सब करिहउँ। पद पंकज बिलोकि भव तरिहउँ॥अस कहि चरन परेउ प्रभु पाही। अब जनि नाथ कहहु गृह जाही॥

मैं घरकी सबसे नीची सेवा भी करूँगा, बस आपके चरणकमलोंको निहारते हुए भवसागर तर जाऊँगा। ऐसा कहकर वे प्रभुके चरणोंमें गिर पड़े—हे नाथ, अब घर जानेको मत कहिये।

दोहा

अंगद बचन बिनीत सुनि रघुपति करुना सींव।प्रभु उठाइ उर लायउ सजल नयन राजीव१८(क)

अंगदके ऐसे विनम्र वचन सुनकर करुणाके पारावार रघुनाथने उसे उठाकर हृदयसे लगा लिया, प्रभुके कमल-नेत्रोंमें प्रेमाश्रु भर आये।

दोहा

निज उर माल बसन मनि बालितनय पहिराइ।बिदा कीन्हि भगवान तब बहु प्रकार समुझाइ१८(ख)

तब भगवानने अपने हृदयकी माला, वस्त्र और मणि-आभूषण बालिपुत्र अंगदको स्वयं पहनाये, और बहुत प्रकारसे समझा-बुझाकर उसे विदा किया।

भरत अनुज सौमित्र समेता। पठवन चले भगत कृत चेता॥अंगद हृदयँ प्रेम नहिं थोरा। फिरि फिरि चितव राम कीं ओरा॥

अंगदकी भक्ति स्मरण कर भरत छोटे भाई शत्रुघ्न और लक्ष्मणसहित उसे पहुँचाने चले। अंगदके हृदयमें प्रेमका पार नहीं, वह बार-बार पीछे मुड़कर रामकी ओर देखता रहा।

बार बार कर दंड प्रनामा। मन अस रहन कहहिं मोहि रामा॥राम बिलोकनि बोलनि चलनी। सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी॥

वह बार-बार दंडवत प्रणाम करता रहा, मनमें बस यही आता कि राम कह दें—रुक जाओ। वह रामके देखने, बोलने, चलने और हँसकर मिलनेकी रीति याद कर-करके व्याकुल होता रहा।

प्रभु रुख देखि बिनय बहु भाषी। चलेउ हृदयँ पद पंकज राखी॥अति आदर सब कपि पहुँचाए। भाइन्ह सहित भरत पुनि आए॥

पर प्रभुका आशय समझकर, बहुत विनयवचन कहकर, हृदयमें उनके चरणकमल बसाकर वह चल पड़ा। बड़े आदरसे सब वानरोंको विदा कर भरत भाइयोंसहित लौट आये।

तब सुग्रीव चरन गहि नाना। भाँति बिनय कीन्हे हनुमाना॥दिन दस करि रघुपति पद सेवा। पुनि तव चरन देखिहउँ देवा॥

तब हनुमानने सुग्रीवके चरण पकड़कर बड़ी विनती की—हे देव, दस दिन रघुनाथके चरणोंकी सेवा कर फिर मैं आपके दर्शन करने आऊँगा।

पुन्य पुंज तुम्ह पवनकुमारा। सेवहु जाइ कृपा आगारा॥अस कहि कपि सब चले तुरंता। अंगद कहइ सुनहु हनुमंता॥

सुग्रीवने कहा—हे पवनकुमार, तुम पुण्यकी राशि हो, जाओ और कृपाधामकी सेवा करो। यह कहकर सब वानर तुरंत चल पड़े; अंगदने कहा—सुनो हनुमान।

दोहा

कहेहु दंडवत प्रभु सैं तुम्हहि कहउँ कर जोरि।बार बार रघुनायकहि सुरति कराएहु मोरि१९(क)

हाथ जोड़कर मैं तुमसे कहता हूँ—प्रभुसे मेरा दंडवत कह देना, और रघुनाथको बार-बार मेरी याद दिलाते रहना।

दोहा

अस कहि चलेउ बालिसुत फिरि आयउ हनुमंत।तासु प्रीति प्रभु सन कहि मगन भए भगवंत१९(ख)

यह कहकर बालिपुत्र चल पड़ा, और हनुमान लौट आये; उन्होंने प्रभुसे उसका वह प्रेम कह सुनाया, जिसे सुनकर भगवान प्रेममग्न हो गये।

दोहा

कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसुमहु चाहि।चित्त खगेस राम कर समुझि परइ कहु काहि१९(ग)

शिवजी कहते हैं—हे गरुड़, रामका हृदय वज्रसे भी कठोर और फूलसे भी कोमल है; अब बताओ, यह किसकी समझमें आ सकता है?

पुनि कृपाल लियो बोलि निषादा। दीन्हे भूषन बसन प्रसादा॥जाहु भवन मम सुमिरन करेहू। मन क्रम बचन धर्म अनुसरेहू॥

फिर कृपालु रामने निषादराजको बुलाकर उसे भी वस्त्राभूषण भेंट दिये—अब घर जाओ, कहा, वहाँ मेरा स्मरण करते रहना और मन-वचन-कर्मसे सदा धर्मका पालन करना।

तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता। सदा रहेहु पुर आवत जाता॥बचन सुनत उपजा सुख भारी। परेउ चरन भरि लोचन बारी॥

तुम मेरे मित्र हो, भरतके समान भाई हो—अयोध्यामें सदा आते-जाते रहना। यह सुनते ही उसे अपार सुख हुआ, और नेत्र भरकर वह चरणोंमें गिर पड़ा।

चरन नलिन उर धरि गृह आवा। प्रभु सुभाउ परिजनन्हि सुनावा॥रघुपति चरित देखि पुरबासी। पुनि पुनि कहहिं धन्य सुखरासी॥

रामके चरणकमल हृदयमें बसाकर वह घर लौटा और परिजनोंको प्रभुका स्वभाव सुनाया; रघुनाथका यह चरित्र देखकर अवधवासी बार-बार कहते—धन्य हैं वे सुखके भंडार राम।

राम राज बैंठें त्रेलोका। हरषित भए गए सब सोका॥बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप बिषमता खोई॥

राम जब राजसिंहासनपर विराजे, तीनों लोक हर्षसे भर उठे, सारा शोक जाता रहा; रामके प्रतापसे भेदभाव मिट गया और किसीका किसीसे बैर न रहा।

दोहा

बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग।चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग२०

सब लोग अपने-अपने वर्ण और आश्रमके धर्ममें तत्पर रहकर वेदमार्गपर चलते और सुख पाते रहे; उन्हें न भय था, न शोक, न कोई रोग।

दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥

रामराज्यमें किसीको दैहिक, दैविक या भौतिक कोई ताप न सताता था; सब लोग परस्पर प्रेम करते और वेद-नीतिमें रहकर अपने-अपने धर्मका पालन करते थे।

चारिउ चरन धर्म जग माहीं। पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं॥राम भगति रत नर अरु नारी। सकल परम गति के अधिकारी॥

धर्म अपने चारों चरणोंसहित सारे जगतमें परिपूर्ण था, स्वप्रमें भी पाप नहीं था; स्त्री-पुरुष सभी रामभक्तिमें लीन, सब परम गतिके अधिकारी थे।

अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा॥नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना॥

किसीकी अकाल मृत्यु न होती, किसीको कोई पीड़ा न होती; सबके शरीर सुंदर और नीरोग थे। न कोई दरिद्र, न दुखी, न दीन था; न कोई मूर्ख था, न शुभ लक्षणोंसे रहित।

सब निर्दंभ धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुनी॥सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी॥

सभी दंभरहित, धर्मपरायण और पुण्यात्मा हैं; स्त्री-पुरुष सब चतुर और गुणवान हैं। सब गुणग्राही, विद्वान और ज्ञानी हैं; सब कृतज्ञ हैं, किसीमें कपट या धूर्तता नहीं है।

दोहा

राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं।काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं२१

काकभुशुण्डि कहते हैं—हे गरुड़, सुनिये, रामके राज्यमें चराचर सारे जगतमें काल, कर्म या स्वभावसे उत्पन्न कोई दुःख किसीको नहीं होता।

भूमि सप्त सागर मेखला। एक भूप रघुपति कोसला॥भुअन अनेक रोम प्रति जासू। यह प्रभुता कछु बहुत न तासू॥

सात समुद्रोंसे घिरी इस पृथ्वीके अयोध्यामें रघुनाथ अकेले राजा हैं; पर जिनके एक-एक रोममें अनगिनत ब्रह्मांड समाये हैं, उनके लिये यह सप्तद्वीपी राज्य कुछ बड़ी बात नहीं।

सो महिमा समुझत प्रभु केरी। यह बरनत हीनता घनेरी॥सोउ महिमा खगेस जिन्ह जानी। फिरि एहिं चरित तिन्हहुँ रति मानी॥

बल्कि प्रभुकी वह वास्तविक महिमा समझ ली जाय तो उन्हें केवल पृथ्वीका सम्राट कहना उनकी हीनता ही जान पड़ती है; पर हे गरुड़, जिन्होंने वह महिमा जान भी ली, वे भी इस लीलामें उतना ही प्रेम पाते हैं।

सोउ जाने कर फल यह लीला। कहहिं महा मुनिबर दमसीला॥राम राज कर सुख संपदा। बरनि न सकइ फनीस सारदा॥

क्योंकि इन्द्रियजयी महामुनि कहते हैं कि उस महिमाको जाननेका फल भी यही लीला है; रामराज्यके सुख-वैभवका वर्णन तो शेष और सरस्वती भी नहीं कर सकते।

सब उदार सब पर उपकारी। बिप्र चरन सेवक नर नारी॥एकनारि ब्रत रत सब झारी। ते मन बच क्रम पति हितकारी॥

सब उदार और परोपकारी थे, ब्राह्मणोंके चरणोंके सेवक थे; हर पुरुष एकपत्नीव्रती था और हर स्त्री मन-वचन-कर्मसे पतिका हित करनेवाली थी।

दोहा

दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज।जीतहु मनहि सुनिअ अस रामचंद्र कें राज२२

रामके राज्यमें 'दंड' शब्द केवल संन्यासियोंके हाथमें, 'भेद' केवल नर्तकोंके नृत्यमें और 'जीतना' शब्द केवल अपने मनको जीतनेके अर्थमें ही सुनायी पड़ता था।

फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहिं एक संग गज पंचानन॥खग मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई॥

वनोंमें वृक्ष सदा फूलते-फलते रहते, हाथी और सिंह साथ-साथ विचरते; पक्षी और पशु अपना स्वाभाविक बैर भुलाकर आपसमें प्रेम बढ़ाते।

कूजहिं खग मृग नाना बृंदा। अभय चरहिं बन करहिं अनंदा॥सीतल सुरभि पवन बह मंदा। गुंजत अलि लै चलि मकरंदा॥

पक्षी मीठी बोली बोलते, हर प्रकारके पशु निर्भय होकर वनमें आनंदसे विचरते; शीतल सुगंधित मंद पवन बहता रहता और भौंरे पुष्परस लेकर गुंजार करते।

लता बिटप मागें मधु चवहीं। मनभावतो धेनु पय स्त्रवहीं॥ससि संपन्न सदा रह धरनी। त्रेताँ भई कृतजुग के करनी॥

लताएँ और वृक्ष माँगते ही मधु टपका देते, गौएँ मनचाहा दूध देतीं; धरती सदा फसलसे लहलहाती—त्रेतायुगमें मानो सतयुगकी ही रीति लौट आयी।

प्रगटीं गिरिन्ह बिबिध मनि खानी। जगदातमा भूप जग जानी॥सरिता सकल बहहिं बर बारी। सीतल अमल स्वाद सुखकारी॥

जगत्के आत्मा भगवानको संसारका राजा जानकर पर्वतोंने अनेक रत्नोंकी खानें प्रकट कर दीं; सब नदियाँ शीतल, निर्मल, स्वादिष्ट जल बहाने लगीं।

सागर निज मरजादाँ रहहीं। डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं॥सरसिज संकुल सकल तड़ागा। अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा॥

समुद्र अपनी सीमामें रहते और किनारोंपर रत्न बिखेर देते जिन्हें लोग बीन लेते; हर तालाब कमलोंसे भरा रहता और दसों दिशाएँ परम प्रसन्न दिखतीं।

दोहा

बिधु महि पूर मयूखन्हि रबि तप जेतनेहि काज।मागें बारिद देहिं जल रामचंद्र के राज२३

रामके राज्यमें चंद्रमा उतनी ही चाँदनी बिखेरता जितनी आवश्यक हो, सूर्य उतना ही तपता जितना चाहिये, और बादल माँगनेपर ही जल बरसाते।

कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे॥श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर। गुनातीत अरु भोग पुरंदर॥

प्रभुने करोड़ों अश्वमेध यज्ञ किये और ब्राह्मणोंको अनगिनत दान दिये; वे वेदमार्गके रक्षक, धर्मकी धुरी, त्रिगुणोंसे परे और भोग-वैभवमें इन्द्रके समान थे।

पति अनुकूल सदा रह सीता। सोभा खानि सुसील बिनीता॥जानति कृपासिंधु प्रभुताई। सेवति चरन कमल मन लाई॥

शोभाकी खान, सुशील और विनम्र सीता सदा पतिके अनुकूल रहतीं; वे कृपासागर रामकी महिमाको जानती थीं और मन लगाकर उनके चरणोंकी सेवा करतीं।

जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी। बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी॥निज कर गृह परिचरजा करई। रामचंद्र आयसु अनुसरई॥

घरमें अनगिनत दास-दासियाँ सेवामें कुशल थीं, फिर भी सीता स्वयं अपने हाथों घरकी सेवा करतीं और रामकी हर आज्ञाका पालन करतीं।

जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ। सोइ कर श्री सेवा बिधि जानइ॥कौसल्यादि सासु गृह माहीं। सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं॥

कृपासागर जिस बातसे प्रसन्न होते, सीता वही करतीं, क्योंकि वे सेवाका मर्म जानती थीं; घरमें कौसल्या आदि सब सासुओंकी वे बिना किसी अभिमानके सेवा करतीं।

उमा रमा ब्रह्मादि बंदिता। जगदंबा संततमनिंदिता॥

शिवजी कहते हैं—हे उमा, जगज्जननी रमा (सीता) ब्रह्मा आदि देवताओंसे वंदित और सदा निष्कलंक हैं।

दोहा

जासु कृपा कटाच्छु सुर चाहत चितव न सोइ।राम पदारबिंद रति करति सुभावहि खोइ२४

जिनकी कृपादृष्टिको देवता तरसते हैं पर जो उनकी ओर देखती भी नहीं, वही लक्ष्मी अपनी सारी महिमा भुलाकर रामके चरणकमलोंमें अनुराग रखती हैं।

सेवहिं सानकूल सब भाई। राम चरन रति अति अधिकाई॥प्रभु मुख कमल बिलोकत रहहीं। कबहुँ कृपाल हमहि कछु कहहीं॥

सब भाई अनुकूल भावसे उनकी सेवा करते, रामके चरणोंमें उनकी प्रीति असीम थी; वे सदा प्रभुका मुख निहारते रहते कि कभी कृपालु उन्हें कुछ करनेको कहें।

राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती। नाना भाँति सिखावहिं नीती॥हरषित रहहिं नगर के लोगा। करहिं सकल सुर दुर्लभ भोगा॥

राम भी भाइयोंपर प्रेम रखते और उन्हें अनेक नीतियाँ सिखाते; नगरके लोग सदा प्रसन्न रहते और देवदुर्लभ सुख भोगते।

अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीं। श्रीरघुबीर चरन रति चहहीं॥दुइ सुत सुंदर सीताँ जाए। लव कुस बेद पुरानन्ह गाए॥

वे दिन-रात ब्रह्माको मनाते रहते कि रघुबीरके चरणोंमें उनकी प्रीति बनी रहे; सीतासे लव और कुश नामक दो सुंदर पुत्र जन्मे, जिनका वेद-पुराणोंमें वर्णन है।

दोउ बिजई बिनई गुन मंदिर। हरि प्रतिबिंब मनहुँ अति सुंदर॥दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे। भए रूप गुन सील घनेरे॥

दोनों ही विजयी, विनम्र और गुणोंके धाम थे, मानो हरिके ही सुंदर प्रतिबिंब हों; अन्य भाइयोंके भी दो-दो पुत्र हुए, सब रूप-गुण-शीलमें उत्तम।

दोहा

ग्यान गिरा गोतीत अज माया मन गुन पार।सोइ सच्चिदानंद घन कर नर चरित उदार२५

जो ज्ञान, वाणी, इंद्रियों, अजन्मा-भाव, माया, मन और गुणोंसे परे हैं, वही सच्चिदानंदघन भगवान यह श्रेष्ठ मानव-लीला कर रहे हैं।

प्रातकाल सरऊ करि मज्जन। बैठहिं सभाँ संग द्विज सज्जन॥बेद पुरान बसिष्ट बखानहिं। सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं॥

प्रातःकाल सरयूमें स्नान कर राम ब्राह्मणों और सज्जनोंके साथ सभामें बैठते; वसिष्ठ वेद-पुराणकी कथा कहते और राम सुनते, यद्यपि वे सब पहलेसे जानते हैं।

अनुजन्ह संजुत भोजन करहीं। देखि सकल जननीं सुख भरहीं॥भरत सत्रुहन दोऊ भाई। सहित पवनसुत उपबन जाई॥

वे भाइयोंसहित भोजन करते, यह देख हर माता आनंदसे भर उठती; भरत और शत्रुघ्न दोनों भाई हनुमानसहित उपवनोंमें जाते,

बूझहिं बैठि राम गुन गाहा। कह हनुमान सुमति अवगाहा॥सुनत बिमल गुन अति सुख पावहिं। बहुरि बहुरि करि बिनय कहावहिं॥

और वहाँ बैठकर रामके गुणोंकी कथा पूछते; हनुमान अपनी सुंदर बुद्धिसे उन गुणोंमें डूबकर उनका वर्णन करते। उनके निर्मल गुण सुनकर दोनों भाई अत्यंत सुखी होते और बार-बार विनयपूर्वक और सुनानेको कहते।

सब के गृह गृह होहिं पुराना। रामचरित पावन बिधि नाना॥नर अरु नारि राम गुन गानहिं। करहिं दिवस निसि जात न जानहिं॥

घर-घरमें रामके पावन चरित्रकी नाना कथाएँ होतीं; स्त्री-पुरुष सब उनका गुणगान करते और आनंदमें दिन-रात बीतनेका पता ही न चलता।

दोहा

अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज।सहस सेष नहिं कहि सकहिं जहँ नृप राम बिराज२६

जहाँ स्वयं राम राजा होकर विराजते हैं, उस अवधपुरीके निवासियोंके सुख-वैभवका वर्णन हजारों शेष भी नहीं कर सकते।

नारदादि सनकादि मुनीसा। दरसन लागि कोसलाधीसा॥दिन प्रति सकल अजोध्या आवहिं। देखि नगरु बिरागु बिसरावहिं॥

नारद, सनक आदि मुनीश्वर कोसलनाथके दर्शनके लिये रोज अयोध्या आते और उस नगरको देखकर अपना वैराग्य भी भूल जाते।

जातरूप मनि रचित अटारीं। नाना रंग रुचिर गच ढारीं॥पुर चहुँ पास कोट अति सुंदर। रचे कँगूरा रंग रंग बर॥

सोने-रत्नोंसे बनी अटारियाँ थीं, जिनमें रंग-बिरंगी सुंदर फर्श जड़ी थी; नगरके चारों ओर सुंदर परकोटा था, जिसपर रंग-बिरंगे कँगूरे बने थे।

नव ग्रह निकर अनीक बनाई। जनु घेरी अमरावति आई॥महि बहु रंग रचित गच काँचा। जो बिलोकि मुनिबर मन नाचा॥

मानो नवग्रहोंने सेना बनाकर अमरावतीको घेर लिया हो; धरतीपर रंग-बिरंगे रत्नोंकी फर्श बिछी थी, जिसे देख श्रेष्ठ मुनियोंका भी मन नाच उठता।

धवल धाम ऊपर नभ चुंबत। कलस मनहुँ रबि ससि दुति निंदत॥बहु मनि रचित झरोखा भ्राजहिं। गृह गृह प्रति मनि दीप बिराजहिं॥

उज्ज्वल महल आकाशको छूते थे, उनके कलश मानो सूर्य-चंद्रकी चमकको भी मात देते; मणिजड़ित झरोखे शोभित थे और घर-घरमें रत्न-दीपक जगमगाते।

छंद

मनि दीप राजहिं भवन भ्राजहिं देहरीं बिद्रुम रची।मनि खंभ भीति बिरंचि बिरची कनक मनि मरकत खची॥सुंदर मनोहर मंदिरायत अजिर रुचिर फटिक रचे।प्रति द्वार द्वार कपाट पुरट बनाइ बहु बज्रन्हि खचे॥

हर घरमें मणि-दीपक जगमगाते, मूँगेकी देहलियाँ चमकतीं, रत्नोंके खंभे और मरकतमणि-जड़ित सोनेकी दीवारें मानो ब्रह्माने विशेष यत्नसे रची हों। सुंदर विशाल महलोंमें स्फटिकके आँगन थे, और हर द्वारपर हीरे जड़े सोनेके किंवाड़ बने थे।

दोहा

चारु चित्रसाला गृह गृह प्रति लिखे बनाइ।राम चरित जे निरख मुनि ते मन लेहिं चोराइ२७

हर घरमें सुंदर चित्रशाला थी जिसमें रामके चरित्र सुंदरतासे अंकित थे; जो मुनि भी उन्हें देखते, उनका मन चुरा लिये बिना नहीं रहते।

सुमन बाटिका सबहिं लगाई। बिबिध भाँति करि जतन बनाई॥लता ललित बहु जाति सुहाई। फूलहिं सदा बंसत कि नाई॥

सबने यत्नपूर्वक फूलोंकी वाटिकाएँ लगा रखी थीं, जिनमें अनेक जातिकी सुंदर लताएँ मानो सदा वसंतकी भाँति खिली रहतीं।

गुंजत मधुकर मुखर मनोहर। मारुत त्रिबिध सदा बह सुंदर॥नाना खग बालकन्हि जिआए। बोलत मधुर उड़ात सुहाए॥

भौंरे मनोहर स्वरमें गुंजार करते, तीनों प्रकारकी शीतल सुगंधित वायु सदा बहती रहती; बालकोंने पाले अनेक पक्षी मीठी बोली बोलते और सुंदर उड़ान भरते।

मोर हंस सारस पारावत। भवननि पर सोभा अति पावत॥जहँ तहँ देखहिं निज परिछाहीं। बहु बिधि कूजहिं नृत्य कराहीं॥

मोर, हंस, सारस और कबूतर घरोंकी छतोंपर शोभा पाते; वे जहाँ-तहाँ अपनी परछाईं देखकर मानो दूसरे पक्षीसे मिलकर तरह-तरहसे बोलते और नाचते।

सुक सारिका पढ़ावहिं बालक। कहहु राम रघुपति जनपालक॥राज दुआर सकल बिधि चारू। बीथीं चौहट रुचिर बजारू॥

बालक तोता-मैनाको सिखाते—कहो 'राम', 'रघुपति', 'जनपालक'; राजद्वार हर तरहसे सुंदर था, गलियाँ, चौराहे और बाजार सब मनोहर।

छंद

बाजार रुचिर न बनइ बरनत बस्तु बिनु गथ पाइए।जहँ भूप रमानिवास तहँ की संपदा किमि गाइए॥बैठे बजाज सराफ बनिक अनेक मनहुँ कुबेर ते।सब सुखी सब सच्चरित सुंदर नारि नर सिसु जरठ जे॥

ऐसा सुंदर बाजार कि वर्णन ही न हो सके, वहाँ वस्तुएँ मानो बिना मोलके ही मिल जातीं; जहाँ स्वयं लक्ष्मीपति राजा हों, वहाँकी संपदाका क्या कहना! कपड़े और सोने-चाँदीके व्यापारी बैठे मानो साक्षात् कुबेर हों; स्त्री-पुरुष, बालक-वृद्ध सभी सुखी, सदाचारी और सुंदर थे।

दोहा

उत्तर दिसि सरजू बह निर्मल जल गंभीर।बाँधे घाट मनोहर स्वल्प पंक नहिं तीर२८

नगरके उत्तरमें सरयू बहती, जिसका जल निर्मल और गहरा था; मनोहर घाट बने थे और किनारेपर तनिक भी कीचड़ नहीं था।

दूरि फराक रुचिर सो घाटा। जहँ जल पिअहिं बाजि गज ठाटा॥पनिघट परम मनोहर नाना। तहाँ न पुरुष करहिं अस्नाना॥

कुछ दूर वह घाट था जहाँ घोड़े-हाथियोंके झुंड जल पीते; और भी परम मनोहर घाट थे जहाँ स्त्रियाँ पानी भरतीं, वहाँ पुरुष स्नान नहीं करते।

राजघाट सब बिधि सुंदर बर। मज्जहिं तहाँ बरन चारिउ नर॥तीर तीर देवन्ह के मंदिर। चहुँ दिसि तिन्ह के उपबन सुंदर॥

राजघाट सब तरहसे सुंदर था, जहाँ चारों वर्णके लोग स्नान करते; सरयूके किनारे-किनारे देवमंदिर थे, चारों ओर सुंदर उपवन सजे थे।

कहुँ कहुँ सरिता तीर उदासी। बसहिं ग्यान रत मुनि संन्यासी॥तीर तीर तुलसिका सुहाई। बृंद बृंद बहु मुनिन्ह लगाई॥

कहीं-कहीं नदीतटपर ज्ञानपरायण मुनि और संन्यासी निवास करते; किनारे-किनारे मुनियोंने बहुत-सी सुंदर तुलसी लगा रखी थी।

पुर सोभा कछु बरनि न जाई। बाहेर नगर परम रुचिराई॥देखत पुरी अखिल अघ भागा। बन उपबन बापिका तड़ागा॥

नगरकी शोभाका तो वर्णन ही नहीं हो सकता, नगरके बाहर भी वैसी ही सुंदरता थी; अयोध्याके दर्शनमात्रसे सब पाप भाग जाते, वन-उपवन-बावली-तालाब सब शोभा पाते।

छंद

बापीं तड़ाग अनूप कूप मनोहरायत सोहहीं।सोपान सुंदर नीर निर्मल देखि सुर मुनि मोहहीं॥बहु रंग कंज अनेक खग कूजहिं मधुप गुंजारहीं।आराम रम्य पिकादि खग रव जनु पथिक हंकारहीं॥

अनुपम बावलियाँ, तालाब और विशाल मनोहर कुएँ शोभित थे, जिनकी सुंदर सीढ़ियाँ और निर्मल जल देखकर देव-मुनि तक मोहित हो जाते। रंग-बिरंगे कमल खिलते, पक्षी कूजते, भौंरे गुंजार करते, और बगीचोंमें कोयलकी बोली मानो राहगीरोंको बुलाती।

दोहा

रमानाथ जहँ राजा सो पुर बरनि कि जाइ।अनिमादिक सुख संपदा रहीं अवध सब छाइ२९

जहाँ स्वयं लक्ष्मीपति राजा हों, उस नगरका वर्णन कैसे हो? अणिमा आदि सिद्धियाँ और सारी सुख-संपदा अयोध्यापर छायी रहती।

जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं। बैठि परसपर इहइ सिखावहिं॥भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि। सोभा सील रूप गुन धामहि॥

लोग जहाँ-तहाँ रघुनाथके गुण गाते और बैठकर एक-दूसरेको सिखाते—शरणागतके पालक, शोभा-शील-रूप-गुणके धाम रामको भजो।

जलज बिलोचन स्यामल गातहि। पलक नयन इव सेवक त्रातहि॥धृत सर रुचिर चाप तूनीरहि। संत कंज बन रबि रनधीरहि॥

कमलनयन साँवले शरीरवालेको भजो, जो पलककी भाँति अपने सेवककी रक्षा करते हैं; सुंदर बाण-धनुष-तरकस धारण करनेवाले, संतरूपी कमलवनको खिलानेवाले सूर्य-समान रणधीर रामको भजो।

काल कराल ब्याल खगराजहि। नमत राम अकाम ममता जहि॥लोभ मोह मृगजूथ किरातहि। मनसिज करि हरि जन सुखदातहि॥

काल-सर्पको ग्रसनेवाले गरुड़रूप रामको भजो, जिनके निष्काम प्रणाममात्रसे ममता नष्ट हो जाती है; लोभ-मोहरूपी मृगोंके शिकारी, कामरूपी हाथीके लिये सिंह और भक्तोंको सुख देनेवाले रामको भजो।

संसय सोक निबिड़ तम भानुहि। दनुज गहन घन दहन कृसानुहि॥जनकसुता समेत रघुबीरहि। कस न भजहु भंजन भव भीरहि॥

संशय और शोकरूपी घने अंधकारका नाश करनेवाले सूर्यरूप रामको भजो, राक्षसरूपी सघन वनको भस्म करनेवाली अग्निरूप रामको भजो; जानकीसहित रघुवीर, जन्म-मृत्युके भयको मिटानेवाले, उन्हें क्यों न भजें?

बहु बासना मसक हिम रासिहि। सदा एकरस अज अबिनासिहि॥मुनि रंजन भंजन महि भारहि। तुलसिदास के प्रभुहि उदारहि॥

अनगिनत वासनारूपी मच्छरोंको नष्ट करनेवाले हिमराशिरूप रामको भजो, सदा एकरस, अजन्मा, अविनाशीको भजो; मुनियोंको आनंद देनेवाले, पृथ्वीका भार हरनेवाले, तुलसीदासके उदार स्वामीको भजो।

दोहा

एहि बिधि नगर नारि नर करहिं राम गुन गान।सानुकूल सब पर रहहिं संतत कृपानिधान३०

इस प्रकार नगरके स्त्री-पुरुष रामके गुण गाते रहे, और कृपानिधान सदा सबपर समान रूपसे प्रसन्न बने रहे।

जब ते राम प्रताप खगेसा। उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा॥पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका। बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका॥

काकभुशुण्डि कहते हैं—हे गरुड़, जबसे रामके प्रतापरूपी प्रचंड सूर्यका उदय हुआ, तीनों लोकोंमें प्रकाश भर गया—इससे किसीको सुख मिला, किसीके मनमें शोक जागा।

जिन्हहि सोक ते कहउँ बखानी। प्रथम अबिद्या निसा नसानी॥अघ उलूक जहँ तहाँ लुकाने। काम क्रोध कैरव सकुचाने॥

जिन्हें शोक हुआ, उन्हें बताता हूँ—पहले तो अविद्यारूपी रात्रि नष्ट हुई, पापरूपी उल्लू जहाँ-तहाँ छिप गये और काम-क्रोधरूपी कुमुद मुरझा गये।

बिबिध कर्म गुन काल सुभाऊ। ए चकोर सुख लहहिं न काऊ॥मत्सर मान मोह मद चोरा। इन्ह कर हुनर न कवनिहुँ ओरा॥

तरह-तरहके कर्म, गुण, काल और स्वभाव—ये चकोर इस प्रकाशमें कभी सुख नहीं पाते; मत्सर, अभिमान, मोह और मदरूपी चोरोंकी कोई चाल यहाँ नहीं चलती।

धरम तड़ाग ग्यान बिग्याना। ए पंकज बिकसे बिधि नाना॥सुख संतोष बिराग बिबेका। बिगत सोक ए कोक अनेका॥

धर्मरूपी सरोवरमें ज्ञान-विज्ञानरूपी अनेक कमल खिल उठे; सुख, संतोष, वैराग्य और विवेकरूपी असंख्य चकवे शोकरहित हो गये।

दोहा

यह प्रताप रबि जाकें उर जब करइ प्रकास।पछिले बाढ़हिं प्रथम जे कहे ते पावहिं नास३१

यह रामप्रतापरूपी सूर्य जिसके हृदयमें उदय होता है, उसमें पहले बताये गुण बढ़ने लगते हैं और पहले बताये दोष नष्ट हो जाते हैं।

भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा। संग परम प्रिय पवनकुमारा॥सुंदर उपबन देखन गए। सब तरु कुसुमित पल्लव नए॥

एक बार राम भाइयोंसहित और परमप्रिय हनुमानको साथ लेकर सुंदर उपवन देखने गये, जहाँ हर वृक्ष नये पत्तों और फूलोंसे लदा था।

जानि समय सनकादिक आए। तेज पुंज गुन सील सुहाए॥ब्रह्मानंद सदा लयलीना। देखत बालक बहुकालीना॥

ठीक उसी समय तेजपुंज, गुण-शीलसंपन्न और सदा ब्रह्मानंदमें लीन रहनेवाले सनकादि मुनि वहाँ आ पहुँचे—देखनेमें बालक जैसे, पर आयुमें अत्यंत प्राचीन।

रूप धरें जनु चारिउ बेदा। समदरसी मुनि बिगत बिभेदा॥आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं॥

मानो साक्षात् चारों वेद ही बाल-रूप धरे हों—समदर्शी, भेदरहित मुनि, दिशाएँ ही जिनका वस्त्र थीं; उनका बस एक ही व्यसन था कि जहाँ रघुनाथकी कथा हो, वहीं जाकर सुनें।

तहाँ रहे सनकादि भवानी। जहँ घटसंभव मुनिबर ग्यानी॥राम कथा मुनिबर बहु बरनी। ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी॥

शिवजी कहते हैं—हे भवानी, सनकादि मुनि वहींसे आ रहे थे जहाँ ज्ञानी अगस्त्यजी रहते हैं, जिन्होंने रामकी अनेक कथाएँ सुनायी थीं, जो अरणिकाष्ठसे अग्निकी तरह ज्ञान प्रज्वलित करती हैं।

दोहा

देखि राम मुनि आवत हरषि दंडवत कीन्ह।स्वागत पूँछि पीत पट प्रभु बैठन कहँ दीन्ह३२

मुनियोंको आते देख रामने हर्षित होकर दंडवत की, कुशल पूछी और उनके बैठनेके लिये अपना पीताम्बर बिछा दिया।

कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई। सहित पवनसुत सुख अधिकाई॥मुनि रघुपति छबि अतुल बिलोकी। भए मगन मन सके न रोकी॥

फिर हनुमानसहित तीनों भाइयोंने भी दंडवत की, सबको अपार सुख हुआ; मुनि रघुनाथकी अतुल छवि देखकर उसीमें ऐसे डूब गये कि स्वयंको रोक न सके।

स्यामल गात सरोरुह लोचन। सुंदरता मंदिर भव मोचन॥एकटक रहे निमेष न लावहिं। प्रभु कर जोरें सीस नवावहिं॥

साँवला शरीर, कमलनयन, सुंदरताके धाम, जन्म-मृत्युसे छुड़ानेवाले रामको वे टकटकी लगाये देखते ही रहे, पलक तक न झपकी; और प्रभु स्वयं हाथ जोड़े उन्हें सिर नवाते रहे।

तिन्ह के दसा देखि रघुबीरा। स्त्रवत नयन जल पुलक सरीरा॥कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे। परम मनोहर बचन उचारे॥

उनकी वह प्रेमविह्वल दशा देखकर रघुवीरके भी नेत्रोंसे अश्रु बहने लगे और शरीर पुलकित हो उठा; फिर हाथ पकड़कर उन्होंने श्रेष्ठ मुनियोंको बिठाया और परम मनोहर वचन कहे।

आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा। तुम्हरें दरस जाहिं अघ खीसा॥बड़े भाग पाइब सतसंगा। बिनहिं प्रयास होहिं भव भंगा॥

आज मैं धन्य हूँ, हे मुनीश्वरो, सुनिये—आपके दर्शनमात्रसे पाप नष्ट हो जाते हैं; बड़े भाग्यसे सत्संग मिलता है, जिससे बिना परिश्रम ही जन्म-मृत्युका चक्र टूट जाता है।

दोहा

संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ।कहहिं संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ३३

संतका संग मोक्षका मार्ग है और कामीका संग संसार-बंधनका मार्ग—यही संत, कवि, पंडित और वेद-पुराण जैसे सद्ग्रंथ भी कहते हैं।

छंद

सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी। पुलकित तन अस्तुति अनुसारी॥जय भगवंत अनंत अनामय। अनघ अनेक एक करुनामय॥

प्रभुके वचन सुनकर चारों मुनि हर्षसे पुलकित हो स्तुति करने लगे—जय हो अनंत, अविकारी, निष्पाप, अनेकरूप होते हुए भी एक और करुणामय भगवान!

छंद

जय निर्गुन जय जय गुन सागर। सुख मंदिर सुंदर अति नागर॥जय इंदिरा रमन जय भूधर। अनुपम अज अनादि सोभाकर॥

जय निर्गुण, जय-जय गुणसागर, सुखधाम, सुंदर और चतुर! जय लक्ष्मीपति, जय पृथ्वीधारक, अनुपम, अजन्मा, अनादि, शोभाके स्रोत!

छंद

ग्यान निधान अमान मानप्रद। पावन सुजस पुरान बेद बद॥तग्य कृतग्य अग्यता भंजन। नाम अनेक अनाम निरंजन॥

ज्ञानके भंडार, स्वयं मानरहित पर औरोंको मान देनेवाले, वेद-पुराण जिनका पावन यश गाते हैं; तत्त्वज्ञ, कृतज्ञ, अज्ञानको हरनेवाले—हे निरंजन, आपके अनंत नाम हैं और फिर भी आप नामातीत हैं।

छंद

सर्ब सर्बगत सर्ब उरालय। बससि सदा हम कहुँ परिपालय॥द्वंद बिपति भव फंद बिभंजय। ह्रदि बसि राम काम मद गंजय॥

सर्वरूप, सर्वव्यापी, सबके हृदयमें निवास करनेवाले—सदा हमारी रक्षा कीजिये; द्वंद्व, विपत्ति और भवबंधनका जाल काट दीजिये, हे राम, हृदयमें बसकर काम और मदको नष्ट कर दीजिये।

दोहा

परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम।प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम३४

परमानंदस्वरूप, कृपाधाम, मनकी हर कामना पूर्ण करनेवाले—हे श्रीराम, हमें अपनी अटूट प्रेमाभक्ति प्रदान कीजिये।

छंद

देहु भगति रघुपति अति पावनि। त्रिबिध ताप भव दाप नसावनि॥प्रनत काम सुरधेनु कलपतरु। होइ प्रसन्न दीजै प्रभु यह बरु॥

हे रघुनाथ, हमें वह परम पावन भक्ति दीजिये जो तीनों ताप और भवके क्लेशको मिटा दे; शरणागतोंकी कामधेनु और कल्पवृक्ष प्रभु, प्रसन्न होकर बस यही वरदान दीजिये।

छंद

भव बारिधि कुंभज रघुनायक। सेवत सुलभ सकल सुख दायक॥मन संभव दारुन दुख दारय। दीनबंधु समता बिस्तारय॥

हे रघुनाथ, जन्म-मृत्युरूपी समुद्रको सोखनेवाले अगस्त्य-समान, सेवामें सुलभ और सब सुख देनेवाले! हे दीनबंधु, मनके दारुण दुःखोंको काटिये और हममें समदृष्टि फैलाइये।

छंद

आस त्रास इरिषादि निवारक। बिनय बिबेक बिरति बिस्तारक॥भूप मौलि मन मंडन धरनी। देहि भगति संसृति सरि तरनी॥

आशा, भय और ईर्ष्याको मिटानेवाले, विनय-विवेक-वैराग्यको फैलानेवाले! हे राजाओंके शिरोमणि, पृथ्वीके भूषण, संसाररूपी नदीके लिये नौकास्वरूप अपनी भक्ति हमें दीजिये।

छंद

मुनि मन मानस हंस निरंतर। चरन कमल बंदित अज संकर॥रघुकुल केतु सेतु श्रुति रच्छक। काल करम सुभाउ गुन भच्छक॥

मुनियोंके मनरूपी मानसरोवरमें सदा विहार करनेवाले हंस, जिनके चरण ब्रह्मा-शिव भी वंदित करते हैं; रघुकुलकी ध्वजा, वेदमर्यादाके रक्षक, काल-कर्म-स्वभाव-गुणके भक्षक!

छंद

तारन तरन हरन सब दूषन। तुलसिदास प्रभु त्रिभुवन भूषन॥

स्वयं तरे हुए और औरोंको तारनेवाले, सब दोषोंको हरनेवाले—हे तुलसीदासके स्वामी, त्रिभुवनके भूषण!

दोहा

बार बार अस्तुति करि प्रेम सहित सिरु नाइ।ब्रह्म भवन सनकादि गे अति अभीष्ट बर पाइ३५

इस प्रकार बार-बार प्रेमसहित स्तुति करके और सिर नवाकर, अपना मनचाहा वरदान पाकर सनकादि मुनि ब्रह्मलोक चले गये।

सनकादिक बिधि लोक सिधाए। भ्रातन्ह राम चरन सिरु नाए॥पूछत प्रभुहि सकल सकुचाहीं। चितवहिं सब मारुतसुत पाहीं॥

सनकादि मुनि ब्रह्मलोक चले गये, तब भाइयोंने रामके चरणोंमें सिर नवाया; कुछ पूछते हुए सब सकुचा रहे थे, इसलिये सब हनुमानकी ओर देखने लगे।

सुनि चहहिं प्रभु मुख के बानी। जो सुनि होइ सकल भ्रम हानी॥अंतरजामी प्रभु सभ जाना। बूझत कहहु काह हनुमाना॥

वे प्रभुके अपने मुखसे वह बात सुनना चाहते थे, जिससे उनका हर भ्रम मिट जाय। अंतर्यामी प्रभु सब समझ गये और पूछा—बोलो हनुमान, बात क्या है?

जोरि पानि कह तब हनुमंता। सुनहु दीनदयाल भगवंता॥नाथ भरत कछु पूँछन चहहीं। प्रस्न करत मन सकुचत अहहीं॥

तब हनुमानने हाथ जोड़कर कहा—हे दीनदयालु भगवान सुनिये, भरत कुछ पूछना चाहते हैं पर मनमें सकुचा रहे हैं।

तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ। भरतहि मोहि कछु अंतर काऊ॥सुनि प्रभु बचन भरत गहे चरना। सुनहु नाथ प्रनतारति हरना॥

प्रभुने कहा—हनुमान, तुम तो मेरा स्वभाव जानते ही हो, भरत और मेरे बीच कभी कोई अंतर रहा है क्या? यह सुनते ही भरतने उनके चरण पकड़ लिये—सुनिये नाथ, शरणागतकी पीड़ा हरनेवाले!

दोहा

नाथ न मोहि संदेह कछु सपनेहुँ सोक न मोह।केवल कृपा तुम्हारिहि कृपानंद संदोह३६

हे नाथ, मुझे कोई संदेह नहीं, स्वप्रमें भी शोक-मोह नहीं है; यह केवल आपकी ही कृपा है, हे कृपा और आनंदके समूह!

करउँ कृपानिधि एक ढिठाई। मैं सेवक तुम्ह जन सुखदाई॥संतन्ह कै महिमा रघुराई। बहु बिधि बेद पुरानन्ह गाई॥

फिर भी, कृपानिधान, मैं एक धृष्टता करता हूँ—मैं सेवक हूँ और आप सेवकको सुख देनेवाले हैं। हे रघुनाथ, संतोंकी महिमा वेद-पुराणोंने अनेक प्रकारसे गायी है,

श्रीमुख तुम्ह पुनि कीन्हि बड़ाई। तिन्ह पर प्रभुहि प्रीति अधिकाई॥सुना चहउँ प्रभु तिन्ह कर लच्छन। कृपासिंधु गुन ग्यान बिचच्छन॥

और आपने भी स्वयं अपने मुखसे उनकी बड़ाई की है, उनपर आपका प्रेम भी अपार है। हे प्रभु, मैं उनके लक्षण सुनना चाहता हूँ, आप ही कृपासागर और गुण-ज्ञानमें निपुण हैं।

संत असंत भेद बिलगाई। प्रनतपाल मोहि कहहु बुझाई॥संतन्ह के लच्छन सुनु भ्राता। अगनित श्रुति पुरान बिख्याता॥

हे शरणागतपालक, संत और असंतका भेद अलग-अलग करके मुझे समझाइये। रामने कहा—सुनो भाई, संतोंके लक्षण असंख्य हैं, जो वेद-पुराणोंमें प्रसिद्ध हैं।

संत असंतन्हि के असि करनी। जिमि कुठार चंदन आचरनी॥काटइ परसु मलय सुनु भाई। निज गुन देइ सुगंध बसाई॥

संत और असंतकी करनी कुल्हाड़ी और चंदनके स्वभाव जैसी है—सुनो भाई, कुल्हाड़ी चंदनको काटती है, पर चंदन अपने स्वभाववश उसे भी अपनी सुगंधसे बसा देता है।

दोहा

ताते सुर सीसन्ह चढ़त जग बल्लभ श्रीखंड।अनल दाहि पीटत घनहिं परसु बदन यह दंड३७

इसी गुणके कारण चंदन देवताओंके मस्तकपर चढ़ता और जगतका प्रिय बनता है, जबकि कुल्हाड़ीको यह सजा मिलती है कि उसे आगमें तपाकर घनसे पीटा जाता है।

बिषय अलंपट सील गुनाकर। पर दुख दुख सुख सुख देखे पर॥सम अभूतरिपु बिमद बिरागी। लोभामरष हरष भय त्यागी॥

संत विषयोंमें आसक्त नहीं होते, शील और सद्गुणोंकी खान होते हैं; परायी पीड़ासे दुःखी और परायी खुशीसे सुखी होते हैं, सम रहते हैं, किसीको शत्रु नहीं मानते, अभिमानरहित और वैराग्यवान होते हैं, लोभ-क्रोध-हर्ष-भय त्याग चुके होते हैं।

कोमलचित दीनन्ह पर दाया। मन बच क्रम मम भगति अमाया॥सबहि मानप्रद आपु अमानी। भरत प्रान सम मम ते प्रानी॥

उनका हृदय अत्यंत कोमल होता है, दीनोंपर दया करते हैं, मन-वचन-कर्मसे निष्कपट भक्ति करते हैं; सबको आदर देते हैं, स्वयं मानरहित रहते हैं—हे भरत, ऐसे संत मुझे प्राणोंके समान प्रिय हैं।

बिगत काम मम नाम परायन। सांति बिरति बिनती मुदितायन॥सीतलता सरलता मयत्री। द्विज पद प्रीति धर्म जनयत्री॥

उन्हें कोई कामना नहीं होती, केवल मेरे नामके आश्रित रहते हैं, शांति-वैराग्य-विनय-प्रसन्नताके घर होते हैं; शीतलता, सरलता, सबसे मैत्री और ब्राह्मणोंके चरणोंमें प्रीति उनमें बसी रहती है, जो धर्मको जन्म देती है।

ए सब लच्छन बसहिं जासु उर। जानेहु तात संत संतत फुर॥सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं। परुष बचन कबहूँ नहिं बोलहिं॥

हे तात, ये सब लक्षण जिसके हृदयमें बसें, उसे सदा सच्चा संत जानना—जो संयम, नियम और नीतिसे कभी विचलित नहीं होते और कभी कठोर वचन नहीं बोलते;

दोहा

निंदा अस्तुति उभय सम ममता मम पद कंज।ते सज्जन मम प्रानप्रिय गुन मंदिर सुख पुंज३८

निंदा और स्तुति जिन्हें समान लगती है, जिनकी ममता केवल मेरे चरणकमलोंमें है—वे ही गुणोंके धाम, सुखकी राशि संतजन मुझे प्राणोंसे प्रिय हैं।

सुनहु असंतन्ह केर सुभाऊ। भूलेहुँ संगति करिअ न काऊ॥तिन्ह कर संग सदा दुखदाई। जिमि कलपहि घालइ हरहाई॥

अब असंतोंका स्वभाव सुनो—भूलकर भी उनकी संगति मत करना; उनका साथ सदा दुःख देता है, जैसे दुष्ट गाय अपने संगसे अच्छी दुधारू गायको भी बिगाड़ देती है।

खलन्ह हृदयँ अति ताप बिसेषी। जरहिं सदा पर संपति देखी॥जहँ कहुँ निंदा सुनहिं पराई। हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई॥

दुष्टोंके हृदयमें भारी संताप रहता है, दूसरेकी संपत्ति देखकर सदा जलते रहते हैं; कहीं दूसरेकी निंदा सुन लें तो ऐसे हर्षित होते हैं मानो राहमें खजाना मिल गया हो।

काम क्रोध मद लोभ परायन। निर्दय कपटी कुटिल मलायन॥बयरु अकारन सब काहू सों। जो कर हित अनहित ताहू सों॥

वे काम, क्रोध, मद और लोभके अधीन, निर्दयी, कपटी, कुटिल और पापोंके घर होते हैं; बिना कारण सबसे बैर रखते हैं और भलाई करनेवालेके साथ भी बुराई करते हैं।

झूठइ लेना झूठ देना। झूठ भोजन झूठ चबेना॥बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा। खाइ महा अति हृदय कठोरा॥

उनका लेना-देना, खाना-चबाना सब झूठ ही होता है; वे मोरकी तरह मीठा बोलते हैं, पर उनका हृदय इतना कठोर होता है कि वह भयंकर सर्पको भी निगल जाय।

दोहा

पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद।ते नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद३९

जो दूसरोंसे द्रोह करते हैं, परायी स्त्री, परायाधन और परायी निंदामें रत रहते हैं—वे पामर, पापी मनुष्य मानव-देह धरे राक्षस ही हैं।

लोभइ ओढ़न लोभइ डासन। सिस्त्रोदर पर जमपुर त्रास न॥काहू की जौं सुनहिं बड़ाई। स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई॥

लोभ ही उनका ओढ़ना-बिछौना है, पशुतुल्य भोग-भोजनमें डूबे रहते हैं, यमपुरका भय भी नहीं मानते; किसीकी प्रशंसा सुन लें तो ऐसी साँस लेते हैं मानो बुखार चढ़ आया हो।

जब काहू कै देखहिं बिपती। सुखी भए मानहुँ जग नृपती॥स्वारथ रत परिवार बिरोधी। लंपट काम लोभ अति क्रोधी॥

और जब किसी और की विपत्ति देखते हैं, तो ऐसे सुखी होते हैं मानो संसारके राजा बन गये हों; वे स्वार्थपरायण, अपने ही परिवारके विरोधी, काम-लोभमें लिप्त और अत्यंत क्रोधी होते हैं।

मातु पिता गुर बिप्र न मानहिं। आपु गए अरु घालहिं आनहिं॥करहिं मोह बस द्रोह परावा। संत संग हरि कथा न भावा॥

वे माता, पिता, गुरु और ब्राह्मणको कुछ नहीं मानते; स्वयं तो नष्ट रहते ही हैं, दूसरोंको भी नष्ट करते हैं। मोहवश दूसरोंसे द्रोह करते हैं, न उन्हें संतोंका संग भाता है, न हरिकथा।

अवगुन सिंधु मंदमति कामी। बेद बिदूषक परधन स्वामी॥बिप्र द्रोह पर द्रोह बिसेषा। दंभ कपट जियँ धरें सुबेषा॥

वे अवगुणोंके सागर, मंदबुद्धि, कामी, वेदोंके निंदक और परायी संपत्तिको हड़पनेवाले होते हैं; सबसे द्रोह करते हैं, पर ब्राह्मणसे विशेष; हृदयमें दंभ-कपट भरा होता है, पर बाहरसे सुंदर वेष धारण किये रहते हैं।

दोहा

ऐसे अधम मनुज खल कृतजुग त्रेता नाहिं।द्वापर कछुक बृंद बहु होइहहिं कलिजुग माहिं॥४०

ऐसे नीच दुष्ट मनुष्य सतयुग और त्रेतामें नहीं होते; द्वापरमें कुछ थोड़े होंगे, पर कलियुगमें इनके झुंड-के-झुंड होंगे।

पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥निर्नय सकल पुरान बेद कर। कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर॥

हे भाई, दूसरोंका भला करनेके समान कोई धर्म नहीं और दूसरेको दुःख देनेके समान कोई अधर्म नहीं—यह सभी वेद-पुराणोंका निश्चित सिद्धांत है, विद्वान इसे जानते हैं।

नर सरीर धरि जे पर पीरा। करहिं ते सहहिं महा भव भीरा॥करहिं मोह बस नर अघ नाना। स्वारथ रत परलोक नसाना॥

मनुष्यशरीर पाकर भी जो दूसरोंको पीड़ा देते हैं, उन्हें जन्म-मृत्युके भारी संकट सहने पड़ते हैं; मोहवश स्वार्थमें डूबे लोग अनेक पाप करते हैं और अपना परलोक बिगाड़ लेते हैं।

कालरूप तिन्ह कहँ मैं भ्राता। सुभ अरु असुभ कर्म फल दाता॥अस बिचारि जे परम सयाने। भजहिं मोहि संसृत दुख जाने॥

उनके लिये, भाई, मैं स्वयं कालरूप हूँ, उनके शुभ-अशुभ कर्मोंका फल देनेवाला। ऐसा जानकर जो परम बुद्धिमान हैं, वे संसारको दुःखरूप जानकर मुझे ही भजते हैं।

त्यागहिं कर्म सुभासुभ दायक। भजहिं मोहि सुर नर मुनि नायक॥संत असंतन्ह के गुन भाषे। ते न परहिं भव जिन्ह लखि राखे॥

वे शुभ-अशुभ फल देनेवाले कर्मोंको त्यागकर देव-मनुष्य-मुनियोंके स्वामी मुझको भजते हैं। इस तरह संत-असंतके गुण मैंने कहे; जिसने इन्हें समझ लिया, वह जन्म-मृत्युके चक्रमें नहीं पड़ता।

दोहा

सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक।गुन यह उभय न देखिअहिं देखिअ सो अबिबेक४१

सुनो तात, माया-रचित गुण और दोष दोनों ही अनेक हैं; इन दोनोंको न देखना ही विवेक है, इन्हें देखना ही अविवेक है।

श्रीमुख बचन सुनत सब भाई। हरषे प्रेम न हृदयँ समाई॥करहिं बिनय अति बारहिं बारा। हनूमान हियँ हरष अपारा॥

प्रभुके ये वचन सुनकर सब भाई हर्षित हो उठे, प्रेम हृदयमें समाता न था; वे बार-बार विनती करने लगे, और हनुमानके हृदयमें तो अपार हर्ष था।

पुनि रघुपति निज मंदिर गए। एहि बिधि चरित करत नित नए॥बार बार नारद मुनि आवहिं। चरित पुनीत राम के गावहिं॥

फिर रघुनाथ अपने महलको गये, इस प्रकार वे नित नयी लीला रचते रहे; नारदमुनि बार-बार आते और रामके पावन चरित्र गाते।

नित नव चरन देखि मुनि जाहीं। ब्रह्मलोक सब कथा कहाहीं॥सुनि बिरंचि अतिसय सुख मानहिं। पुनि पुनि तात करहु गुन गानहिं॥

मुनि यहाँसे नित नयी लीलाएँ देखकर जाते और ब्रह्मलोकमें जाकर सब कथा सुनाते; ब्रह्माजी सुनकर अत्यंत सुख पाते और कहते—तात, बार-बार रामके गुण गाओ।

सनकादिक नारदहि सराहहिं। जद्यपि ब्रह्म निरत मुनि आहहिं॥सुनि गुन गान समाधि बिसारी।। सादर सुनहिं परम अधिकारी॥

सनकादि मुनि नारदकी सराहना करते; यद्यपि वे स्वयं ब्रह्मनिष्ठ हैं, फिर भी रामका गुणगान सुनकर अपनी समाधि भूल जाते और आदरसे सुनते हैं—वे ही इस कथाके सच्चे अधिकारी हैं।

दोहा

जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान।जे हरि कथाँ न करहिं रति तिन्ह के हिय पाषान४२

जीवन्मुक्त, ब्रह्मपरायण मुनि भी ध्यान छोड़कर रामका चरित्र सुनते हैं; यह जानकर भी जो हरिकथासे प्रेम नहीं करते, उनका हृदय पत्थरके समान है।

एक बार रघुनाथ बोलाए। गुर द्विज पुरबासी सब आए॥बैठे गुर मुनि अरु द्विज सज्जन। बोले बचन भगत भव भंजन॥

एक बार रघुनाथने बुलाया तो गुरु, ब्राह्मण और सब नगरवासी सभामें आये; सब यथायोग्य बैठ गये, तब भक्तोंके भवबंधनको मिटानेवाले रामने वचन कहे।

सुनहु सकल पुरजन मम बानी। कहउँ न कछु ममता उर आनी॥नहिं अनीति नहिं कछु प्रभुताई। सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई॥

हे नगरवासियो, मेरी बात सुनो—मैं इसे किसी ममतासे नहीं कहता, न इसमें कोई अनीति है, न प्रभुताका आग्रह; सुनो और जो अच्छा लगे वही करो।

सोइ सेवक प्रियतम मम सोई। मम अनुसासन मानै जोई॥जौं अनीति कछु भाषौं भाई। तौ मोहि बरजहु भय बिसराई॥

जो मेरी आज्ञा माने, वही मेरा सेवक और प्रियतम है। और भाई, यदि मैं कभी कोई अनुचित बात कहूँ, तो निर्भय होकर मुझे रोक देना।

बड़ें भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथिन्ह गावा॥साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा॥

बड़े भाग्यसे यह मनुष्यशरीर मिलता है, जिसे सब शास्त्र देवताओंको भी दुर्लभ कहते हैं; यह साधनाका धाम और मोक्षका द्वार है—इसे पाकर भी जिसने परलोक न सँवारा,

दोहा

सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ।कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोष लगाइ४३

वह परलोकमें दुःख भोगता है, सिर पीट-पीटकर पछताता है और अपनी भूल न समझकर काल, कर्म और ईश्वरपर व्यर्थ दोष मढ़ता है।

एहि तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं। पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं॥

भाई, इस शरीरका फल विषयभोग नहीं है; स्वर्गका सुख भी थोड़ा है और अंततः दुःखदायी। मनुष्यशरीर पाकर भी जो मन विषयोंमें लगा देते हैं, वे मूर्ख अमृतके बदले विष चुन लेते हैं।

ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई। गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई॥आकर चारि लच्छ चौरासी। जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी॥

जो पारसमणि खोकर घुँघची बीन ले, उसे कोई बुद्धिमान नहीं कहता। यह अविनाशी जीव चौरासी लाख योनियोंमें युगों-युगोंसे भटकता रहता है,

फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म सुभाव गुन घेरा॥कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही॥

मायाकी प्रेरणासे काल, कर्म, स्वभाव और गुणोंसे घिरा सदा भटकता रहता है; बिना किसी कारणके स्नेह करनेवाला ईश्वर कभी-कभी दया करके इसे मनुष्यशरीर दे देता है।

नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो॥करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा॥

यह मनुष्यशरीर भवसागर पार करनेके लिये बेड़ा है, मेरी कृपा अनुकूल पवन है, सद्गुरु इस दृढ़ नावके कर्णधार हैं—इस तरह दुर्लभ साधन सहज ही सुलभ हो जाते हैं।

दोहा

जो न तर भव सागर नर समाज अस पाइ।सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ४४

जो ऐसा अवसर पाकर भी भवसागर पार नहीं करता, वह कृतघ्न और मंदबुद्धि है, और आत्मघाती जैसी दुर्गति पाता है।

जौं परलोक इहाँ सुख चहहू। सुनि मम बचन हृदय दृढ़ गहहू॥सुलभ सुखद मारग यह भाई। भगति मोरि पुरान श्रुति गाई॥

यदि इस लोक और परलोक दोनोंमें सुख चाहते हो, तो मेरे वचन हृदयमें दृढ़तासे धारण कर लो; हे भाई, यह मेरी भक्तिका मार्ग सुलभ और सुखद है, वेद-पुराणोंने इसे गाया है।

ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका। साधन कठिन न मन कहुँ टेका॥करत कष्ट बहु पावइ कोऊ। भक्ति हीन मोहि प्रिय नहिं सोऊ॥

ज्ञानका मार्ग दुर्गम है, उसमें अनेक विघ्न हैं, साधन कठिन है और मनको कोई सहारा नहीं मिलता; बड़े कष्टसे कोई उसे पा भी ले, तो भक्तिहीन होनेके कारण वह मुझे प्रिय नहीं।

भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी॥पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता॥

भक्ति स्वतंत्र और सब सुखोंकी खान है, पर सत्संगके बिना कोई इसे नहीं पाता; और संत भी पुण्यके बिना नहीं मिलते—सत्संग ही जन्म-मृत्युके चक्रका अंत करता है।

पुन्य एक जग महुँ नहिं दूजा। मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा॥सानुकूल तेहि पर मुनि देवा। जो तजि कपटु करइ द्विज सेवा॥

संसारमें एक ही पुण्य है, दूसरा कोई नहीं—मन-वचन-कर्मसे ब्राह्मणके चरणोंकी पूजा। जो कपट त्यागकर ब्राह्मणकी सेवा करता है, उसपर मुनि और देवता प्रसन्न रहते हैं।

दोहा

औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउँ कर जोरि।संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि४५

और एक गुप्त बात भी है, जो मैं हाथ जोड़कर सबसे कहता हूँ—शिवजीके भजन बिना मनुष्य मेरी भक्ति कभी नहीं पाता।

कहहु भगति पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा॥सरल सुभाव न मन कुटिलाई। जथा लाभ संतोष सदाई॥

भक्तिके मार्गमें कौन-सा परिश्रम है? न योग चाहिये, न यज्ञ-जप-तप-उपवास; बस सरल स्वभाव हो, मनमें कुटिलता न हो और जो मिले उसीमें सदा संतोष रखे।

मोर दास कहाइ नर आसा। करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा॥बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई। एहि आचरन बस्य मैं भाई॥

मेरा दास कहलाकर भी जो मनुष्योंसे आशा रखे, उसका मुझपर कैसा विश्वास? अधिक क्या कहूँ, भाई, मैं तो बस इस आचरणका ही वशीभूत हूँ।

बैर न बिग्रह आस न त्रासा। सुखमय ताहि सदा सब आसा॥अनारंभ अनिकेत अमानी। अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी॥

जो न वैर करे, न झगड़ा, न आशा रखे, न भय—उसके लिये सभी दिशाएँ सुखमय हैं। जो फलेच्छासे कर्म नहीं करता, जिसकी घरमें ममता नहीं, जो मानहीन, निष्पाप, क्रोधहीन, दक्ष और विज्ञानवान है,

प्रीति सदा सज्जन संसर्गा। तन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा॥भगति पच्छ हठ नहिं सठताई। दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई॥

जिसे सदा संतोंके संगमें प्रीति है, जिसे विषय-सुख, स्वर्ग और मोक्ष तक तृणके समान लगते हैं, जो भक्तिका आग्रही तो है पर मूर्खतावश हठ नहीं करता और सब कुतर्कोंको दूर बहा चुका है,

दोहा

मम गुन ग्राम नाम रत गत ममता मद मोह।ता कर सुख सोइ जानइ परानंद संदोह४६

जो मेरे गुणों और नामका ही परायण है, ममता-मद-मोहसे मुक्त है—उसका सुख वही जानता है जो स्वयं परमानंदको प्राप्त हो चुका है।

सुनत सुधासम बचन राम के। गहे सबनि पद कृपाधाम के॥जननि जनक गुर बंधु हमारे। कृपा निधान प्रान ते प्यारे॥

रामके अमृत-सम वचन सुनकर सबने कृपाधामके चरण पकड़ लिये—आप ही हमारे माता-पिता, गुरु और भाई हैं, हे कृपानिधान, प्राणोंसे भी प्रिय।

तनु धनु धाम राम हितकारी। सब बिधि तुम्ह प्रनतारति हारी॥असि सिख तुम्ह बिनु देइ न कोऊ। मातु पिता स्वारथ रत ओऊ॥

हे शरणागतकी पीड़ा हरनेवाले, आप ही हमारे तन-धन-घर और हर तरहसे हितकारी हैं; ऐसी शिक्षा आपके सिवा कोई नहीं दे सकता—माता-पिता भी स्वार्थके वशीभूत रहते हैं।

हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी॥स्वारथ मीत सकल जग माहीं। सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं॥

हे असुरोंके शत्रु, संसारमें निःस्वार्थ उपकार करनेवाले बस दो ही हैं—आप और आपके सेवक; बाकी सब स्वार्थके ही मित्र हैं, प्रभु, उनके मनमें स्वप्रमें भी परमार्थ नहीं।

सबके बचन प्रेम रस साने। सुनि रघुनाथ हृदयँ हरषाने॥निज निज गृह गए आयसु पाई। बरनत प्रभु बतकही सुहाई॥

सबके प्रेमरससे सने वचन सुनकर रघुनाथका हृदय हर्षसे भर गया; फिर आज्ञा पाकर सब प्रभुकी सुंदर बातें कहते हुए अपने-अपने घर लौट गये।

दोहा

उमा अवधबासी नर नारि कृतारथ रूप।ब्रह्म सच्चिदानंद घन रघुनायक जहँ भूप४७

शिवजी कहते हैं—हे उमा, अवधके नर-नारी सब कृतार्थ हैं, क्योंकि वहाँ स्वयं सच्चिदानंदघन रघुनाथ राजा हैं।

एक बार बसिष्ट मुनि आए। जहाँ राम सुखधाम सुहाए॥अति आदर रघुनायक कीन्हा। पद पखारि पादोदक लीन्हा॥

एक बार वसिष्ठमुनि वहाँ आये जहाँ सुखधाम राम विराजते थे; रघुनाथने उनका बड़ा आदर किया, चरण धोकर चरणामृत ग्रहण किया।

राम सुनहु मुनि कह कर जोरी। कृपासिंधु बिनती कछु मोरी॥देखि देखि आचरन तुम्हारा। होत मोह मम हृदयँ अपारा॥

मुनिने हाथ जोड़कर कहा—हे कृपासागर राम, मेरी एक विनती सुनिये; आपका मनुष्योचित आचरण देख-देखकर मेरे हृदयमें अपार विस्मय होता है।

महिमा अमित बेद नहिं जाना। मैं केहि भाँति कहउँ भगवाना॥उपरोहित्य कर्म अति मंदा। बेद पुरान सुमृति कर निंदा॥

आपकी महिमा असीम है, जिसे वेद भी नहीं जानते, फिर मैं कैसे कहूँ! पुरोहिती तो बहुत नीचा पेशा है, वेद-पुराण-स्मृति सब इसकी निंदा करते हैं—

जब न लेउँ मैं तब बिधि मोही। कहा लाभ आगें सुत तोही॥परमातमा ब्रह्म नर रूपा। होइहि रघुकुल भूषन भूपा॥

जब मैंने इसे स्वीकार नहीं किया था, तब ब्रह्माजीने कहा था—पुत्र, आगे इससे तुम्हें बड़ा लाभ होगा, क्योंकि स्वयं परमात्मा मनुष्यरूप धरकर रघुकुलके भूषण राजा बनेंगे।

दोहा

-तब मैं हृदयँ बिचारा जोग जग्य ब्रत दान।जा कहुँ करिअ सो पैहउँ धर्म न एहि सम आन४८

तब मैंने मन-ही-मन सोचा—जिस फलके लिये योग, यज्ञ, व्रत और दान किये जाते हैं, वह मुझे इसी कर्मसे मिल जायगा; फिर इसके समान कोई धर्म ही नहीं।

जप तप नियम जोग निज धर्मा। श्रुति संभव नाना सुभ कर्मा॥ग्यान दया दम तीरथ मज्जन। जहँ लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन॥

जप, तप, नियम, योग, अपना-अपना धर्म, वेदविहित शुभ कर्म, ज्ञान, दया, संयम, तीर्थस्नान—जहाँतक वेद और सज्जनोंने धर्म बताया है,

आगम निगम पुरान अनेका। पढ़े सुने कर फल प्रभु एका॥तब पद पंकज प्रीति निरंतर। सब साधन कर यह फल सुंदर॥

और अनेक शास्त्रों, वेदों-पुराणोंके पढ़ने-सुननेका फल भी अंततः एक ही है, प्रभु—और सब साधनोंका भी बस यही सुंदर फल है कि आपके चरणकमलोंमें अटूट प्रेम बना रहे।

छूटइ मल कि मलहि के धोएँ। घृत कि पाव कोइ बारि बिलोएँ॥प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुँ न जाई॥

क्या मैलसे मैल धुलता है? क्या जल बिलोनेसे घी निकलता है? वैसे ही, हे रघुनाथ, प्रेमभक्तिरूपी जलके बिना हृदयका मैल कभी नहीं जाता।

सोइ सर्बग्य तग्य सोइ पंडित। सोइ गुन गृह बिग्यान अखंडित॥दच्छ सकल लच्छन जुत सोई। जाकें पद सरोज रति होई॥

वही सर्वज्ञ है, वही तत्त्वज्ञ और पंडित है, वही गुणोंका घर और पूर्ण विज्ञानी है, वही चतुर और सर्वगुणसंपन्न है, जिसका आपके चरणकमलोंमें प्रेम है।

दोहा

नाथ एक बर मागउँ राम कृपा करि देहु।जन्म जन्म प्रभु पद कमल कबहुँ घटै जनि नेहु४९

हे नाथ राम, मैं आपसे एक ही वर माँगता हूँ, कृपा करके दीजिये—आपके चरणकमलोंमें मेरा प्रेम जन्म-जन्मांतरमें भी कभी कम न हो।

अस कहि मुनि बसिष्ट गृह आए। कृपासिंधु के मन अति भाए॥हनूमान भरतादिक भ्राता। संग लिए सेवक सुखदाता॥

ऐसा कहकर वसिष्ठमुनि घर लौट गये, उनकी बातें कृपासागरके मनको बहुत भायीं; फिर सेवकोंको सुख देनेवाले रामने हनुमान और भरत आदि भाइयोंको साथ लिया।

पुनि कृपाल पुर बाहेर गए। गज रथ तुरग मगावत भए॥देखि कृपा करि सकल सराहे। दिए उचित जिन्ह जिन्ह तेइ चाहे॥

फिर कृपालु राम नगरके बाहर गये और हाथी, रथ, घोड़े मँगवाये; उन्हें देखकर कृपापूर्वक सबकी सराहना की और जिस-जिसने चाहा, उसे उचित जानकर वह भेंट दी।

हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई। गए जहाँ सीतल अवँराई॥भरत दीन्ह निज बसन डसाई। बैठे प्रभु सेवहिं सब भाई॥

जगतके सारे श्रमको हरनेवाले प्रभुको ही जब कुछ थकान महसूस हुई, तो वे शीतल अमराईमें गये; वहाँ भरतने अपना वस्त्र बिछाया, प्रभु उसपर बैठे और सब भाई सेवामें लग गये।

मारुतसुत तब मारुत करई। पुलक बपुष लोचन जल भरई॥

तब पवनपुत्र हनुमान पंखा झलने लगे, उनका शरीर पुलकित हो उठा और नेत्र भर आए।

हनूमान सम नहिं बड़भागी। नहिं कोउ राम चरन अनुरागी॥गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई। बार बार प्रभु निज मुख गाई॥

शिवजी कहते हैं—हे गिरिजा, हनुमान के समान न कोई बड़भागी है, न कोई राम के चरणों का ऐसा प्रेमी, जिसकी सेवा-भक्ति की प्रभु ने स्वयं अपने मुख से बार-बार सराहना की।

दोहा

तेहिं अवसर मुनि नारद आए करतल बीन।गावन लगे राम कल कीरति सदा नबीन॥५०

ठीक उसी समय नारदमुनि हाथ में वीणा लिए आ पहुँचे और राम के सदा नये-से मधुर यश का गान करने लगे।

छंद

मामवलोकय पंकज लोचन। कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन॥नील तामरस स्याम काम अरि। हृदय कंज मकरंद मधुप हरि॥

हे कमलनयन, कृपादृष्टिमात्रसे शोक हरनेवाले, मेरी ओर देखिये; हे नीलकमल-श्याम, कामारि शिवके हृदयकमलके मकरंदको पीनेवाले भ्रमर हरि!

छंद

जातुधान बरूथ बल भंजन। मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन॥भूसुर ससि नव बृंद बलाहक। असरन सरन दीन जन गाहक॥

राक्षससेनाके बलको तोड़नेवाले, मुनि-संतोंको आनंद देनेवाले, पापोंके नाशक; ब्राह्मणरूपी खेतीके लिये नवमेघ, शरणहीनोंके शरणदाता, दीनोंके रक्षक!

छंद

भुज बल बिपुल भार महि खंडित। खर दूषन बिराध बध पंडित॥रावनारि सुखरूप भूपबर। जय दसरथ कुल कुमुद सुधाकर॥

अपनी भुजाओंसे पृथ्वीका भारी बोझ उतारनेवाले, खर-दूषण-विराधके संहारमें कुशल, रावणके शत्रु, आनंदस्वरूप, राजाओंमें श्रेष्ठ, दशरथकुलरूपी कुमुदिनीके चंद्रमा—आपकी जय हो!

छंद

सुजस पुरान बिदित निगमागम। गावत सुर मुनि संत समागम॥कारुनीक ब्यलीक मद खंडन। सब बिधि कुसल कोसला मंडन॥

आपका सुंदर यश पुराण-वेदोंमें प्रसिद्ध है, देव-मुनि-संत सब मिलकर उसे गाते हैं; करुणामय, झूठे अभिमानको तोड़नेवाले, सब तरहसे कुशल, आप ही कोसलपुरीके भूषण हैं।

छंद

कलि मल मथन नाम ममताहन। तुलसीदास प्रभु पाहि प्रनत जन॥

आपका नाम कलियुगके पापोंको मथ डालता और ममताको मार डालता है—हे तुलसीदासके स्वामी, इस शरणागतकी रक्षा कीजिये।

दोहा

प्रेम सहित मुनि नारद बरनि राम गुन ग्राम।सोभासिंधु हृदयँ धरि गए जहाँ बिधि धाम५१

इस प्रकार प्रेमपूर्वक रामके गुणोंका वर्णन कर नारदमुनि उस शोभाके सागरको हृदयमें बसाकर ब्रह्मलोक चले गये।

गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा। मैं सब कही मोरि मति जथा॥राम चरित सत कोटि अपारा। श्रुति सारदा न बरनै पारा॥

शिवजी कहते हैं—हे गिरिजा, सुनो, यह उज्ज्वल कथा मैंने अपनी बुद्धिभर पूरी कह दी; रामके चरित्र तो सौ करोड़से भी अधिक हैं, वेद और सरस्वती भी उनका पूरा वर्णन नहीं कर सकते।

राम अनंत अनंत गुनानी। जन्म कर्म अनंत नामानी॥जल सीकर महि रज गनि जाहीं। रघुपति चरित न बरनि सिराहीं॥

राम अनंत हैं, उनके गुण अनंत, जन्म-कर्म-नाम भी अनंत; जलकी बूँदें और धरतीकी धूल गिनी जा सकती है, पर रघुनाथके चरित्रोंका वर्णन कभी समाप्त नहीं होता।

बिमल कथा हरि पद दायनी। भगति होइ सुनि अनपायनी॥उमा कहिउँ सब कथा सुहाई। जो भुसुंडि खगपतिहि सुनाई॥

यह पवित्र कथा हरिके परमपदको देनेवाली है, इसे सुननेसे अटूट भक्ति मिलती है। हे उमा, मैंने वह सब सुंदर कथा कही जो काकभुशुण्डिने गरुड़को सुनायी थी।

कछुक राम गुन कहेउँ बखानी। अब का कहौं सो कहहु भवानी॥सुनि सुभ कथा उमा हरषानी। बोली अति बिनीत मृदु बानी॥

मैंने रामके कुछ थोड़े ही गुण बखानकर कहे, अब हे भवानी, तुम्हीं बताओ और क्या कहूँ? यह मंगलमय कथा सुनकर पार्वतीजी हर्षित हुईं और अत्यंत विनम्र, कोमल वाणीमें बोलीं।

धन्य धन्य मैं धन्य पुरारी। सुनेउँ राम गुन भव भय हारी॥

हे त्रिपुरारि, मैं धन्य हूँ, धन्य-धन्य हूँ, जो मैंने जन्म-मृत्युका भय हरनेवाले रामके गुण सुने।

दोहा

तुम्हरी कृपाँ कृपायतन अब कृतकृत्य न मोह।जानेउँ राम प्रताप प्रभु चिदानंद संदोह५२(क)

हे कृपाधाम, आपकी कृपासे अब मैं कृतकृत्य हो गयी, मोह जाता रहा; प्रभु, मैं सच्चिदानंदघन रामके प्रतापको जान गयी।

दोहा

नाथ तवानन ससि स्रवत कथा सुधा रघुबीर।श्रवन पुटन्हि मन पान करि नहिं अघात मतिधीर५२(ख)

हे नाथ, आपका मुखरूपी चंद्रमा रघुवीरकी कथारूपी अमृत बरसाता है; हे धीरबुद्धि, मेरा मन कानोंसे उसे पीकर भी कभी तृप्त नहीं होता।

राम चरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं॥जीवनमुक्त महामुनि जेऊ। हरि गुन सुनहिं निरंतर तेऊ॥

रामके चरित्र सुनते-सुनते जो तृप्त हो जाते हैं, उन्होंने उसका असली रस जाना ही नहीं; जीवन्मुक्त महामुनि भी हरिके गुण निरंतर सुनते ही रहते हैं।

भव सागर चह पार जो पावा। राम कथा ता कहँ दृढ़ नावा॥बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा। श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा॥

जो भवसागर पार करना चाहता है, उसके लिये रामकथा दृढ़ नाव है; और हरिके गुण तो विषयासक्त लोगोंके भी कानोंको सुख और मनको आनंद देते हैं।

श्रवनवंत अस को जग माहीं। जाहि न रघुपति चरित सोहाहीं॥ते जड़ जीव निजात्मक घाती। जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती॥

संसारमें ऐसा कौन कानवाला है जिसे रघुनाथके चरित्र न भाते हों? जिन्हें यह कथा नहीं भाती, वे मूर्ख जीव अपनी ही आत्माके हत्यारे हैं।

हरिचरित्र मानस तुम्ह गावा। सुनि मैं नाथ अमिति सुख पावा॥तुम्ह जो कही यह कथा सुहाई। कागभसुंडि गरुड़ प्रति गाई॥

आपने रामचरितमानसका गान किया, हे नाथ, सुनकर मैंने अपार सुख पाया; आपने बताया कि यह सुंदर कथा काकभुशुण्डिने गरुड़को सुनायी थी—

दोहा

बिरति ग्यान बिग्यान दृढ़ राम चरन अति नेह।बायस तन रघुपति भगति मोहि परम संदेह५३

—और वे काकभुशुण्डि, कौएका शरीर पाकर भी वैराग्य-ज्ञान-विज्ञानमें दृढ़ हैं, रामचरणोंमें उनका गहरा प्रेम है और उन्हें रघुनाथकी भक्ति भी प्राप्त है—यह सुनकर मुझे बड़ा विस्मय हो रहा है।

नर सहस्त्र महँ सुनहु पुरारी। कोउ एक होइ धर्म ब्रतधारी॥धर्मसील कोटिक महँ कोई। बिषय बिमुख बिराग रत होई॥

हे त्रिपुरारि, सुनिये, हजारों मनुष्योंमें कोई एक धर्मव्रती होता है, और करोड़ों धर्मात्माओंमें कोई एक विषयोंसे विमुख होकर वैराग्यमें रत होता है।

कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई। सम्यक ग्यान सकृत कोउ लहई॥ग्यानवंत कोटिक महँ कोऊ। जीवनमुक्त सकृत जग सोऊ॥

करोड़ों विरक्तोंमें श्रुति कहती है कोई एक ही सम्यक् ज्ञान पाता है; और करोड़ों ज्ञानियोंमें कोई एक ही जीवन्मुक्त होता है, संसारमें ऐसा कोई विरला ही मिलेगा।

तिन्ह सहस्त्र महुँ सब सुख खानी। दुर्लभ ब्रह्मलीन बिग्यानी॥धर्मसील बिरक्त अरु ग्यानी। जीवनमुक्त ब्रह्मपर प्रानी॥

हजारों जीवन्मुक्तोंमें भी सब सुखोंकी खान, ब्रह्ममें लीन विज्ञानी और दुर्लभ है; धर्मात्मा, वैराग्यवान, ज्ञानी, जीवन्मुक्त और ब्रह्मलीन—

सब ते सो दुर्लभ सुरराया। राम भगति रत गत मद माया॥सो हरिभगति काग किमि पाई। बिस्वनाथ मोहि कहहु बुझाई॥

—इन सबमें भी, हे देवाधिदेव, वह अत्यंत दुर्लभ है जो मद-मायासे मुक्त होकर रामभक्तिमें रत हो। हे विश्वनाथ, ऐसी दुर्लभ हरिभक्ति एक कौआ कैसे पा गया, मुझे समझाकर कहिये।

दोहा

राम परायन ग्यान रत गुनागार मति धीर।नाथ कहहु केहि कारन पायउ काक सरीर५४

हे नाथ, बताइये—रामपरायण, ज्ञाननिष्ठ, गुणोंके धाम, धीरबुद्धि भुशुण्डिने किस कारण कौएका शरीर पाया?

यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा। कहहु कृपाल काग कहँ पावा॥तुम्ह केहि भाँति सुना मदनारी। कहहु मोहि अति कौतुक भारी॥

यह प्रभुका पवित्र सुंदर चरित्र उस कौएने कहाँसे पाया, कृपालु? और हे कामारि, यह भी बताइये कि आपने इसे कैसे सुना—मुझे बड़ी उत्सुकता है।

गरुड़ महाग्यानी गुन रासी। हरि सेवक अति निकट निवासी॥तेहिं केहि हेतु काग सन जाई। सुनी कथा मुनि निकर बिहाई॥

गरुड़ तो महाज्ञानी, सद्गुणोंकी राशि, हरिके सेवक और उनके अत्यंत निकटवासी हैं—फिर मुनियोंका समूह छोड़कर वे कौएके पास जाकर कथा सुनने क्यों गये?

कहहु कवन बिधि भा संबादा। दोउ हरिभगत काग उरगादा॥गौरि गिरा सुनि सरल सुहाई। बोले सिव सादर सुख पाई॥

बताइये, इन दोनों हरिभक्तों—कौआ और गरुड़—के बीच यह संवाद किस तरह हुआ? पार्वतीकी सरल, सुंदर वाणी सुनकर शिवजी आदरसहित सुखपूर्वक बोले—

धन्य सती पावन मति तोरी। रघुपति चरन प्रीति नहिं थोरी॥सुनहु परम पुनीत इतिहासा। जो सुनि सकल लोक भ्रम नासा॥

हे सती, तुम धन्य हो, तुम्हारी बुद्धि परम पवित्र है, रघुनाथके चरणोंमें तुम्हारा प्रेम कम नहीं है; अब वह परम पावन इतिहास सुनो, जिसे सुनते ही सारे लोकोंका भ्रम मिट जाता है,

उपजइ राम चरन बिस्वासा। भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा॥

और रामचरणोंमें ऐसा विश्वास जगता है कि मनुष्य बिना किसी परिश्रमके ही भवसागर पार कर जाता है।

दोहा

ऐसिअ प्रस्न बिहंगपति कीन्ह काग सन जाइ।सो सब सादर कहिहउँ सुनहु उमा मन लाइ५५

गरुड़ने भी जाकर काकभुशुण्डिसे लगभग यही प्रश्न किये थे; हे उमा, मैं वह सब आदरसहित कहूँगा, तुम मन लगाकर सुनो।

मैं जिमि कथा सुनी भव मोचनि। सो प्रसंग सुनु सुमुखि सुलोचनि॥प्रथम दच्छ गृह तव अवतारा। सती नाम तब रहा तुम्हारा॥

जिस तरह मैंने वह भवबंधन काटनेवाली कथा सुनी, हे सुमुखी सुलोचनी, वह प्रसंग सुनो। पहले तुम्हारा जन्म दक्षके घर हुआ था, तब तुम्हारा नाम सती था।

दच्छ जग्य तब भा अपमाना। तुम्ह अति क्रोध तजे तब प्राना॥मम अनुचरन्ह कीन्ह मख भंगा। जानहु तुम्ह सो सकल प्रसंगा॥

दक्षके यज्ञमें तुम्हारा अपमान हुआ, तुमने क्रोधवश प्राण त्याग दिये; फिर मेरे गणोंने वह यज्ञ ध्वंस कर डाला—यह सब प्रसंग तुम पहलेसे ही जानती हो।

तब अति सोच भयउ मन मोरें। दुखी भय बियोग प्रिय तोरें॥सुंदर बन गिरि सरित तड़ागा। कौतुक देखत फिरउँ बेरागा॥

तब मेरे मनमें बड़ा शोक हुआ, प्रिये, तुम्हारे वियोगसे मैं दुखी हो गया; विरक्त होकर मैं सुंदर वन, पर्वत, नदी-तालाबोंके दृश्य देखता हुआ भटकता रहा।

गिरि सुमेर उत्तर दिसि दूरी। नील सैल एक सुंदर भूरी॥तासु कनकमय सिखर सुहाए। चारि चारु मोरे मन भाए॥

सुमेरु पर्वतसे उत्तरमें, बहुत दूर, एक अत्यंत सुंदर नीला पर्वत है; उसके स्वर्णमय सुंदर शिखरोंमेंसे चार शिखर मेरे मनको विशेष भाये।

तिन्ह पर एक एक बिटप बिसाला। बट पीपर पाकरी रसाला॥सैलोपरि सर सुंदर सोहा। मनि सोपान देखि मन मोहा॥

उन शिखरोंमें से एक-एकपर बरगद, पीपल, पाकर और आमका विशाल वृक्ष है; पर्वतके ऊपर एक सुंदर सरोवर शोभित है, जिसकी मणि-सीढ़ियाँ देखकर मन मोहित हो जाता है।

दोहा

सीतल अमल मधुर जल जलज बिपुल बहुरंग।कूजत कल रव हंस गन गुंजत मंजुल भृंग५६

उसका जल शीतल, निर्मल और मीठा है, उसमें रंग-बिरंगे अनेक कमल खिले हैं; हंस मधुर स्वरमें बोलते हैं और भौंरे सुंदर गुंजार करते हैं।

तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग सोई। तासु नास कल्पांत न होई॥माया कृत गुन दोष अनेका। मोह मनोज आदि अबिबेका॥

उसी सुंदर पर्वतपर वह पक्षी (काकभुशुण्डि) निवास करता है, जिसका नाश कल्पके अंतमें भी नहीं होता; माया-रचित अनेक गुण-दोष, मोह-काम आदि अविवेक,

रहे ब्यापि समस्त जग माहीं। तेहि गिरि निकट कबहुँ नहिं जाहीं॥तहँ बसि हरिहि भजइ जिमि कागा। सो सुनु उमा सहित अनुरागा॥

जो सारे संसारमें व्याप्त हैं, वे उस पर्वतके पास कभी फटकते तक नहीं। हे उमा, वहाँ रहकर वह कौआ हरिको कैसे भजता है, यह प्रेमसहित सुनो।

पीपर तरु तर ध्यान सो धरई। जाप जग्य पाकरि तर करई॥आँब छाहँ कर मानस पूजा। तजि हरि भजनु काजु नहिं दूजा॥

पीपलके नीचे वह ध्यान लगाता है, पाकरके नीचे जप-यज्ञ करता है, आमकी छायामें मानस-पूजा करता है—हरिभजनके सिवा उसे कोई दूसरा काम नहीं।

बर तर कह हरि कथा प्रसंगा। आवहिं सुनहिं अनेक बिहंगा॥राम चरित बिचित्र बिधि नाना। प्रेम सहित कर सादर गाना॥

बरगदके नीचे वह हरिकी कथाएँ सुनाता है, अनेक पक्षी वहाँ आकर सुनते हैं; वह विचित्र रामचरित्रको प्रेम और आदरसहित तरह-तरहसे गाता है।

सुनहिं सकल मति बिमल मराला। बसहिं निरंतर जे तेहिं ताला॥जब मैं जाइ सो कौतुक देखा। उर उपजा आनंद बिसेषा॥

उस सरोवरपर सदा बसनेवाले निर्मल बुद्धिके सब हंस भी उसे सुनते हैं। जब मैंने वहाँ जाकर यह अद्भुत दृश्य देखा, तो मेरे हृदयमें विशेष आनंद उमड़ आया।

दोहा

तब कछु काल मराल तनु धरि तहँ कीन्ह निवास।सादर सुनि रघुपति गुन पुनि आयउँ कैलास५७

तब मैंने हंसका रूप धरकर कुछ समय वहाँ निवास किया, आदरसहित रघुनाथके गुण सुने, फिर कैलास लौट आया।

गिरिजा कहेउँ सो सब इतिहासा। मैं जेहि समय गयउँ खग पासा॥अब सो कथा सुनहु जेहि हेतू। गयउ काग पहिं खग कुल केतू॥

हे गिरिजा, मैंने वह सारा इतिहास कहा जब मैं स्वयं उस पक्षीके पास गया था; अब वह कथा सुनो जिस कारण पक्षिकुलके ध्वज गरुड़ उस कौएके पास गये।

जब रघुनाथ कीन्हि रन क्रीड़ा। समुझत चरित होति मोहि ब्रीड़ा॥इंद्रजीत कर आपु बँधायो। तब नारद मुनि गरुड़ पठायो॥

जब रघुनाथने वह रणलीला की—जिसे याद करते मुझे भी लज्जा होती है, कि उन्होंने मेघनादके हाथों स्वयं बँध जाना स्वीकार किया—तब नारदमुनिने गरुड़को वहाँ भेजा।

बंधन काटि गयो उरगादा। उपजा हृदयँ प्रचंड बिषादा॥प्रभु बंधन समुझत बहु भाँती। करत बिचार उरग आराती॥

सर्पभक्षी गरुड़ बंधन काटकर लौटे, पर उनके हृदयमें भारी विषाद उठा; प्रभुके उस बंधनको बार-बार सोचकर सर्पशत्रु गरुड़ तरह-तरहके विचार करने लगे—

ब्यापक ब्रह्म बिरज बागीसा। माया मोह पार परमीसा॥सो अवतार सुनेउँ जग माहीं। देखेउँ सो प्रभाव कछु नाहीं॥

जो सर्वव्यापी, विकाररहित, वाणीके स्वामी और माया-मोहसे परे परमेश्वर हैं, सुना था कि उन्हींका यह अवतार है, पर मैंने तो उनका वह प्रभाव कहीं देखा ही नहीं।

दोहा

भव बंधन ते छूटहिं नर जपि जा कर नाम।खर्च निसाचर बाँधेउ नागपास सोइ राम५८

जिनका नाम जपकर मनुष्य भवबंधनसे मुक्त हो जाते हैं, उन्हीं रामको एक तुच्छ राक्षसने नागपाशसे बाँध लिया!

नाना भाँति मनहि समुझावा। प्रगट न ग्यान हृदयँ भ्रम छावा॥खेद खिन्न मन तर्क बढ़ाई। भयउ मोहबस तुम्हरिहिं नाई॥

गरुड़ने अपने मनको बहुत तरहसे समझाया, पर स्पष्टता नहीं आयी, हृदयमें भ्रम और गहरा गया; दुःख और कुतर्कसे व्याकुल होकर वे भी, हे उमा, ठीक तुम्हारी ही तरह मोहमें पड़ गये।

ब्याकुल गयउ देवरिषि पाहीं। कहेसि जो संसय निज मन माहीं॥सुनि नारदहि लागि अति दाया। सुनु खग प्रबल राम कै माया॥

व्याकुल होकर गरुड़ देवर्षि नारदके पास गये और अपने मनका संदेह कह सुनाया; सुनकर नारदको बड़ी दया आयी—हे पक्षिराज, सुनिये, रामकी माया अत्यंत बलवती है।

जो ग्यानिन्ह कर चित अपहरई। बरिआई बिमोह मन करई॥जेहिं बहु बार नचावा मोही। सोइ ब्यापी बिहंगपति तोही॥

वह ज्ञानियोंके चित्तको भी छीन लेती है और जबरन गहरा मोह उत्पन्न कर देती है; जिसने मुझे भी बार-बार नचाया है, हे पक्षिराज, वही माया अब आपको भी घेर चुकी है।

महामोह उपजा उर तोरें। मिटिहि न बेगि कहें खग मोरें॥चतुरानन पहिं जाहु खगेसा। सोइ करेहु जेहि होइ निदेसा॥

आपके हृदयमें बड़ा भारी मोह उठ खड़ा हुआ है, यह मेरे समझानेसे शीघ्र नहीं मिटेगा; इसलिये हे पक्षिराज, आप ब्रह्माजीके पास जाइये और वहाँसे जो आदेश मिले, वही कीजिये।

दोहा

अस कहि चले देवरिषि करत राम गुन गान।हरि माया बल बरनत पुनि पुनि परम सुजान५९

ऐसा कहकर परम सुजान देवर्षि नारद रामके गुण गाते और बार-बार हरिकी मायाका बल वर्णन करते हुए चल पड़े।

तब खगपति बिरंचि पहिं गयऊ। निज संदेह सुनावत भयऊ॥सुनि बिरंचि रामहि सिरु नावा। समुझि प्रताप प्रेम अति छावा॥

तब पक्षिराज गरुड़ ब्रह्माजीके पास गये और अपना संदेह सुनाया; सुनकर ब्रह्माजीने रामको सिर नवाया, और उनका प्रताप समझते ही उनके हृदयमें अपार प्रेम छा गया।

मन महुँ करइ बिचार बिधाता। माया बस कबि कोबिद ग्याता॥हरि माया कर अमिति प्रभावा। बिपुल बार जेहिं मोहि नचावा॥

ब्रह्माजी मन-ही-मन विचारने लगे—कवि, विद्वान, ज्ञानी सभी मायाके वशमें हैं; हरिकी मायाका प्रभाव असीम है, जिसने मुझे भी अनगिनत बार नचाया है।

अग जगमय जग मम उपराजा। नहिं आचरज मोह खगराजा॥तब बोले बिधि गिरा सुहाई। जान महेस राम प्रभुताई॥

यह सारा चराचर जगत तो मेरा ही रचा है, फिर भी मैं मायावश नाचता हूँ—तो पक्षिराजको मोह होना कोई अचरज नहीं। फिर ब्रह्माजी सुंदर वाणीमें बोले—रामकी महिमा तो महादेव ही जानते हैं।

बैनतेय संकर पहिं जाहू। तात अनत पूछहु जनि काहू॥तहँ होइहि तव संसय हानी। चलेउ बिहंग सुनत बिधि बानी॥

हे गरुड़, तुम शंकरजीके पास जाओ, और तात, बीचमें और किसीसे मत पूछना; वहीं तुम्हारा संदेह मिटेगा। ब्रह्माजीकी यह वाणी सुनते ही गरुड़ चल पड़े।

दोहा

परमातुर बिहंगपति आयउ तब मो पास।जात रहेउँ कुबेर गृह रहिहु उमा कैलास६०

तब बड़ी आतुरतासे पक्षिराज गरुड़ मेरे पास आये; हे उमा, उस समय मैं कुबेरके घर जा रहा था और तुम कैलासपर थीं।

तेहिं मम पद सादर सिरु नावा। पुनि आपन संदेह सुनावा॥सुनि ता करि बिनती मृदु बानी। प्रेम सहित मैं कहेउँ भवानी॥

उन्होंने आदरसे मेरे चरणोंमें सिर नवाकर अपना संदेह सुनाया; हे भवानी, उनकी विनम्र, कोमल वाणी सुनकर मैंने प्रेमसहित उनसे कहा—

मिलेहु गरुड़ मारग महँ मोही। कवन भाँति समुझावौं तोही॥तबहिं होइ सब संसय भंगा। जब बहु काल करिअ सतसंगा॥

गरुड़, तुम मुझे राहमें मिले हो, इतनेमें तुम्हें कैसे समझाऊँ? हर संदेह तभी मिटता है जब दीर्घकाल तक सत्संग किया जाय।

सुनिअ तहाँ हरि कथा सुहाई। नाना भाँति मुनिन्ह जो गाई॥जेहि महुँ आदि मध्य अवसाना। प्रभु प्रतिपाद्य राम भगवाना॥

वहाँ जाकर सुंदर हरिकथा सुनो, जिसे मुनियोंने अनेक प्रकारसे गाया है और जिसके आदि, मध्य और अंतमें भगवान राम ही प्रतिपाद्य हैं।

नित हरि कथा होत जहँ भाई। पठवउँ तहाँ सुनहु तुम्ह जाई॥जाइहि सुनत सकल संदेहा। राम चरन होइहि अति नेहा॥

भाई, जहाँ नित्य हरिकथा होती है, वहीं मैं तुम्हें भेजता हूँ, जाकर सुनो; सुनते ही तुम्हारा सारा संदेह मिट जायगा और रामचरणोंमें गहरा प्रेम जागेगा।

दोहा

बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग।मोह गए बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग६१

सत्संगके बिना हरिकथा नहीं मिलती, कथाके बिना मोह नहीं भागता, और मोह गये बिना रामचरणोंमें दृढ़ प्रेम नहीं जगता।

मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा। किएँ जोग तप ग्यान बिरागा॥उत्तर दिसि सुंदर गिरि नीला। तहँ रह काकभुसुंडि सुसीला॥

प्रेमके बिना केवल योग, तप, ज्ञान-वैराग्यसे रघुनाथ नहीं मिलते। उत्तर दिशामें एक सुंदर नीला पर्वत है, वहाँ परम सुशील काकभुशुण्डि रहते हैं।

राम भगति पथ परम प्रबीना। ग्यानी गुन गृह बहु कालीना॥राम कथा सो कहइ निरंतर। सादर सुनहिं बिबिध बिहंगबर॥

वे रामभक्तिके मार्गमें अत्यंत निपुण, ज्ञानी, गुणोंके धाम और चिरायु हैं; वे निरंतर रामकथा कहते रहते हैं, जिसे अनेक श्रेष्ठ पक्षी आदरपूर्वक सुनते हैं।

जाइ सुनहु तहँ हरि गुन भूरी। होइहि मोह जनित दुख दूरी॥मैं जब तेहि सब कहा बुझाई। चलेउ हरषि मम पद सिरु नाई॥

वहाँ जाकर हरिके अनगिनत गुण सुनो, मोहसे उपजा तुम्हारा दुःख दूर हो जायगा। जब मैंने उसे यह सब समझाकर कहा, तब वह मेरे चरणोंमें सिर नवाकर हर्षित होकर चल पड़ा।

ताते उमा न मैं समुझावा। रघुपति कृपाँ मरमु मैं पावा॥होइहि कीन्ह कबहुँ अभिमाना। सो खौवै चह कृपानिधाना॥

हे उमा, मैंने उसे स्वयं इसलिये नहीं समझाया कि रघुनाथकी कृपासे मैं पहले ही उसका मर्म जान गया था। उसने शायद कभी कुछ अभिमान किया होगा, जिसे कृपानिधान मिटाना चाहते थे।

कछु तेहि ते पुनि मैं नहिं राखा। समुझइ खग खगही कै भाषा॥प्रभु माया बलवंत भवानी। जाहि न मोह कवन अस ग्यानी॥

और कुछ इस कारण भी मैंने उसे अपने पास नहीं रखा कि पक्षी पक्षीकी ही भाषा समझते हैं। हे भवानी, प्रभुकी माया इतनी बलवती है कि ऐसा कौन ज्ञानी है जिसे वह मोहित न कर दे?

दोहा

ग्यानी भगत सिरोमनि त्रिभुवनपति कर जान।ताहि मोह माया नर पावर करहिं गुमान६२(क)

ज्ञानियों और भक्तोंके शिरोमणि, त्रिभुवनपतिके वाहन गरुड़को भी माया मोहित कर गयी—फिर भी नीच मनुष्य मूर्खतावश घमंड करते ही रहते हैं।

दोहा

सिव बिरंचि कहुँ मोहइ को है बपुरा आन।अस जियँ जानि भजहिं मुनि माया पति भगवान६२(ख)

यह माया शिव और ब्रह्माको भी मोहित कर लेती है, तो बेचारा और कौन है? यह जानकर ही मुनिजन उस मायाके स्वामी भगवानको भजते हैं।

गयउ गरुड़ जहँ बसइ भुसुंडा। मति अकुंठ हरि भगति अखंडा॥देखि सैल प्रसन्न मन भयऊ। माया मोह सोच सब गयऊ॥

गरुड़ वहाँ पहुँचे जहाँ अखंड बुद्धि और अटूट हरिभक्तिवाले काकभुशुण्डि रहते थे; उस पर्वतको देखते ही उनका मन प्रसन्न हो गया और सारी माया, मोह, चिंता जाती रही।

करि तड़ाग मज्जन जलपाना। बट तर गयउ हृदयँ हरषाना॥बृद्ध बृद्ध बिहंग तहँ आए। सुने राम के चरित सुहाए॥

सरोवरमें स्नान और जलपान कर वे प्रसन्न हृदयसे बरगदके नीचे गये; वहाँ पहले से ही अनेक वयोवृद्ध पक्षी रामके सुंदर चरित्र सुननेको एकत्र थे।

कथा अरंभ करै सोइ चाहा। तेही समय गयउ खगनाहा॥आवत देखि सकल खगराजा। हरषेउ बायस सहित समाजा॥

भुशुण्डि कथा आरंभ ही करना चाहते थे कि उसी क्षण पक्षिराज गरुड़ वहाँ आ पहुँचे; उन्हें आते देख काकभुशुण्डिसहित सारा पक्षिसमाज हर्षसे भर उठा।

अति आदर खगपति कर कीन्हा। स्वागत पूछि सुआसन दीन्हा॥करि पूजा समेत अनुरागा। मधुर बचन तब बोलेउ कागा॥

उन्होंने गरुड़का भरपूर आदर किया, कुशल पूछी और बैठनेको सुंदर आसन दिया; फिर प्रेमपूर्वक पूजा करके मधुर वाणीमें बोले—

दोहा

नाथ कृतारथ भयउँ मैं तव दरसन खगराज।आयसु देहु सो करौं अब प्रभु आयहु केहि काज६३(क)

हे नाथ, हे पक्षिराज, आपके दर्शनसे मैं कृतार्थ हो गया; अब आज्ञा दीजिये, मैं वही करूँ। प्रभु, आप किस कार्यसे यहाँ पधारे हैं?

दोहा

सदा कृतारथ रूप तुम्ह कह मृदु बचन खगेस।जेहि के अस्तुति सादर निज मुख कीन्हि महेस६३(ख)

गरुड़ने कोमल वाणीमें कहा—आप तो सदा ही कृतार्थ हैं, जिनकी बड़ाई स्वयं महादेवने अपने मुखसे आदरपूर्वक की है।

सुनहु तात जेहि कारन आयउँ। सो सब भयउ दरस तव पायउँ॥देखि परम पावन तव आश्रम। गयउ मोह संसय नाना भ्रम॥

सुनिये तात, जिस कारण मैं आया था, वह तो आपके दर्शन पाते ही पूरा हो गया; आपका यह परम पावन आश्रम देखते ही मेरा मोह, संदेह और हर तरहका भ्रम मिट गया।

अब श्रीराम कथा अति पावनि। सदा सुखद दुख पुंज नसावनि॥सादर तात सुनावहु मोही। बार बार बिनवउँ प्रभु तोही॥

अब हे तात, कृपया आदरसहित मुझे रामकी वह अत्यंत पावन, सदा सुखदायी और दुःखराशिको मिटानेवाली कथा सुनाइये—मैं बार-बार यही विनती करता हूँ।

सुनत गरुड़ के गिरा बिनीता। सरल सुप्रेम सुखद सुपुनीता॥भयउ तासु मन परम उछाहा। लाग कहै रघुपति गुन गाहा॥

गरुड़की विनम्र, सरल, प्रेमसे भरी, सुखद और पवित्र वाणी सुनकर भुशुण्डिके मनमें अपार उत्साह जागा और वे रघुनाथके गुणोंकी कथा कहने लगे।

प्रथमहिं अति अनुराग भवानी। रामचरित सर कहेसि बखानी॥पुनि नारद कर मोह अपारा। कहेसि बहुरि रावन अवतारा॥

हे भवानी, पहले उन्होंने बड़े प्रेमसे रामचरितमानस सरोवरका रूपक विस्तारसे कहा, फिर नारदके अपार मोहकी और फिर रावणके जन्मकी कथा कही।

प्रभु अवतार कथा पुनि गाई। तब सिसु चरित कहेसि मन लाई॥

फिर प्रभुके अवतारकी कथा गायी, और तब मन लगाकर रामकी बाल-लीलाएँ सुनायीं।

दोहा

बालचरित कहिं बिबिध बिधि मन महँ परम उछाह।रिषि आगवन कहेसि पुनि श्री रघुबीर बिबाह६४

मनमें उत्साह भरकर विविध बाल-लीलाएँ कहने के बाद उन्होंने विश्वामित्रके आगमन और रघुवीरके विवाहका वर्णन किया।

बहुरि राम अभिषेक प्रसंगा। पुनि नृप बचन राज रस भंगा॥पुरबासिन्ह कर बिरह बिषादा। कहेसि राम लछिमन संबादा॥

फिर रामके राज्याभिषेकका प्रसंग, राजाके वचनसे उस उत्सवमें बाधा, नगरवासियोंका विरह-विषाद, और राम-लक्ष्मणका संवाद कहा।

बिपिन गवन केवट अनुरागा। सुरसरि उतरि निवास प्रयागा॥बालमीक प्रभु मिलन बखाना। चित्रकूट जिमि बसे भगवाना॥

वनगमन, केवटका प्रेम, गंगा पार कर प्रयागमें निवास, वाल्मीकिसे मिलन, और जैसे भगवान चित्रकूटमें बसे, वह सब सुनाया।

सचिवागवन नगर नृप मरना। भरतागवन प्रेम बहु बरना॥करि नृप क्रिया संग पुरबासी। भरत गए जहँ प्रभु सुख रासी॥

फिर सुमंत्रका नगर लौटना, राजाका देहांत, भरतका आगमन और उनके गहरे प्रेमका विस्तृत वर्णन किया; राजाकी अंत्येष्टि कर नगरवासियोंसहित भरत वहाँ गये जहाँ सुखराशि प्रभु थे।

पुनि रघुपति बहु बिधि समुझाए। लै पादुका अवधपुर आए॥भरत रहनि सुरपति सुत करनी। प्रभु अरु अत्रि भेंट पुनि बरनी॥

फिर रघुनाथने उन्हें बहुत समझाया, जिससे वे खड़ाऊँ लेकर अयोध्या लौट आये—यह कहा; फिर भरतकी नंदिग्राम-वासकी रीति, इंद्रपुत्र जयंतकी नीचता, और प्रभु-अत्रि मिलन वर्णित किया।

दोहा

कहि बिराध बध जेहि बिधि देह तजी सरभंग।बरनि सुतीछन प्रीति पुनि प्रभु अगस्ति सतसंग६५

विराधका वध और शरभंगका देहत्याग कहकर, फिर सुतीक्ष्णके प्रेमका वर्णन कर, प्रभु और अगस्त्यके सत्संगकी कथा कही।

कहि दंडक बन पावनताई। गीध मइत्री पुनि तेहिं गाई॥पुनि प्रभु पंचवटीं कृत बासा। भंजी सकल मुनिन्ह की त्रासा॥

दंडकवनके पवित्र होनेकी कथा कहकर फिर गिद्ध जटायुसे मैत्रीका वर्णन किया; फिर प्रभुने पंचवटीमें कैसे निवास किया और सब मुनियोंका भय कैसे दूर किया, वह कहा।

पुनि लछिमन उपदेस अनूपा। सूपनखा जिमि कीन्हि कुरूपा॥खर दूषन बध बहुरि बखाना। जिमि सब मरमु दसानन जाना॥

फिर लक्ष्मणको दिया अनुपम उपदेश और शूर्पणखाका कुरूप होना वर्णित किया; फिर खर-दूषणका वध और रावणने सब कैसे जाना, वह बखाना।

दसकंधर मारीच बतकहीं। जेहि बिधि भई सो सब तेहिं कही॥पुनि माया सीता कर हरना। श्रीरघुबीर बिरह कछु बरना॥

रावण और मारीचकी बातचीत जैसी हुई, वैसी ही कही; फिर मायासीताका हरण और रघुवीरके विरहका कुछ वर्णन किया।

पुनि प्रभु गीध क्रिया जिमि कीन्ही। बधि कबंध सबरिहि गति दीन्ही॥बहुरि बिरह बरनत रघुबीरा। जेहि बिधि गए सरोबर तीरा॥

फिर प्रभुने जटायुका अंतिम संस्कार कैसे किया, कबंधका वध कर शबरीको कैसी गति दी, और विरहमें रघुवीर जैसे पंपासरोवरके तट गये, वह सब कहा।

दोहा

प्रभु नारद संबाद कहि मारुति मिलन प्रसंग।पुनि सुग्रीव मिताई बालि प्रान कर भंग।। 66(६६(क)

प्रभु और नारदका संवाद और हनुमानसे भेंटका प्रसंग कहकर फिर सुग्रीवसे मित्रता और बालिके प्राणांतका वर्णन किया।

दोहा

कपिहि तिलक करि प्रभु कृत सैल प्रबरषन बास।बरनन बर्षा सरद अरु राम रोष कपि त्रास६६(ख)

सुग्रीवका राजतिलक कर प्रभुका प्रवर्षण पर्वतपर निवास, वर्षा-शरदका वर्णन, रामका सुग्रीवपर रोष और सुग्रीवका भय—ये सब प्रसंग कहे।

जेहि बिधि कपिपति कीस पठाए। सीता खोज सकल दिसि धाए॥बिबर प्रबेस कीन्ह जेहि भाँती। कपिन्ह बहोरि मिला संपाती॥

सुग्रीवने जैसे वानरोंको भेजा और वे सीताकी खोजमें सब दिशाओंमें दौड़े, जैसे उन्होंने गुफामें प्रवेश किया और फिर संपाती मिला, वह कथा कही।

सुनि सब कथा समीरकुमारा। नाघत भयउ पयोधि अपारा॥लंकाँ कपि प्रबेस जिमि कीन्हा। पुनि सीतहि धीरजु जिमि दीन्हा॥

संपातीसे सब सुनकर हनुमान जैसे अपार समुद्र लाँघ गये, फिर जैसे लंकामें प्रवेश किया और सीताको धीरज दिया, वह सब कहा।

बन उजारि रावनहि प्रबोधी। पुर दहि नाघेउ बहुरि पयोधी॥आए कपि सब जहँ रघुराई। बैदेही कि कुसल सुनाई॥

अशोकवन उजाड़कर, रावणको समझाकर, लंका जलाकर फिर जैसे समुद्र लाँघा और सब वानर रघुनाथके पास पहुँचकर जानकीकी कुशल सुनायी, वह सब वर्णित किया।

सेन समेति जथा रघुबीरा। उतरे जाइ बारिनिधि तीरा॥मिला बिभीषन जेहि बिधि आई। सागर निग्रह कथा सुनाई॥

फिर सेनासहित रघुवीर समुद्रतटपर जा उतरे, विभीषण आकर मिले, और समुद्रको बाँधनेकी कथा भी सुनायी।

दोहा

सेतु बाँधि कपि सेन जिमि उतरी सागर पार।गयउ बसीठी बीरबर जेहि बिधि बालिकुमार६७(क)

पुल बाँधकर जैसे वानरसेना समुद्र पार गयी और वीरश्रेष्ठ बालिपुत्र अंगद जैसे दूत बनकर गये, वह सब कहा।

दोहा

निसिचर कीस लराई बरनिसि बिबिध प्रकार।कुंभकरन घननाद कर बल पौरुष संघार६७(ख)

फिर राक्षस-वानर युद्धका अनेक प्रकारसे वर्णन किया, और कुंभकर्ण-मेघनादके बल, पराक्रम और संहारकी कथा सुनायी।

निसिचर निकर मरन बिधि नाना। रघुपति रावन समर बखाना॥रावन बध मंदोदरि सोका। राज बिभीषन देव असोका॥

उन्होंने राक्षससमूहके नाना प्रकारके वधका और रघुनाथ-रावणके युद्धका वर्णन किया; फिर रावणवध, मंदोदरीका शोक, विभीषणका राज्याभिषेक और देवताओंका शोकमुक्त होना कहा,

सीता रघुपति मिलन बहोरी। सुरन्ह कीन्ह अस्तुति कर जोरी॥पुनि पुष्पक चढ़ि कपिन्ह समेता। अवध चले प्रभु कृपा निकेता॥

फिर सीता-रघुनाथका मिलन, देवताओंकी हाथ जोड़कर स्तुति, और फिर जैसे वानरोंसहित पुष्पकविमानपर चढ़कर कृपाधाम प्रभु अवधकी ओर चले, वह सुनाया।

जेहि बिधि राम नगर निज आए। बायस बिसद चरित सब गाए॥कहेसि बहोरि राम अभिषैका। पुर बरनत नृपनीति अनेका॥

राम जिस तरह अपने नगर आये, वे सब उज्ज्वल चरित्र भुशुण्डिने विस्तारसे गाये; फिर रामके राज्याभिषेककी और अयोध्याकी तथा अनेक राजनीतियोंकी कथा कही।

कथा समस्त भुसुंड बखानी। जो मैं तुम्ह सन कही भवानी॥सुनि सब राम कथा खगनाहा। कहत बचन मन परम उछाहा॥

भुशुण्डिने वही सारी कथा कही जो, हे भवानी, मैंने तुम्हें सुनायी है। सारी रामकथा सुनकर पक्षिराज गरुड़का मन परम उत्साहसे भर गया और वे बोल उठे—

सोरठा

गयउ मोर संदेह सुनेउँ सकल रघुपति चरित।भयउ राम पद नेह तव प्रसाद बायस तिलक६८(क)

रघुनाथके सारे चरित्र सुनकर मेरा संदेह जाता रहा; हे काकशिरोमणि, आपकी कृपासे मुझे रामचरणोंमें प्रेम हो गया।

सोरठा

मोहि भयउ अति मोह प्रभु बंधन रन महुँ निरखि।चिदानंद संदोह राम बिकल कारन कवन६८(ख)

युद्धमें प्रभुका नागपाशसे बंधन देखकर मुझे बड़ा मोह हुआ था—सच्चिदानंदघन राम आखिर किस कारण व्याकुल हुए?

देखि चरित अति नर अनुसारी। भयउ हृदयँ मम संसय भारी॥सोइ भ्रम अब हित करि मैं माना। कीन्ह अनुग्रह कृपानिधाना॥

बिलकुल मनुष्योंके-जैसा चरित्र देखकर मेरे हृदयमें भारी संदेह उठा था; अब मैं उस भ्रमको ही अपने हितकारी मानता हूँ—कृपानिधानने मुझपर यह बड़ा अनुग्रह किया।

जो अति आतप ब्याकुल होई। तरु छाया सुख जानइ सोई॥जौं नहिं होत मोह अति मोही। मिलतेउँ तात कवन बिधि तोही॥

जो तेज धूपसे व्याकुल होता है, वही वृक्षकी छायाका सुख जानता है; तात, यदि मुझे इतना गहरा मोह न होता, तो मैं आपसे कैसे मिल पाता?

सुनतेउँ किमि हरि कथा सुहाई। अति बिचित्र बहु बिधि तुम्ह गाई॥निगमागम पुरान मत एहा। कहहिं सिद्ध मुनि नहिं संदेहा॥

और कैसे सुनता यह अद्भुत, सुंदर हरिकथा जो आपने इतने रूपोंमें गायी? यही वेद-शास्त्र-पुराणोंका मत है, सिद्ध और मुनि भी यही कहते हैं, इसमें संदेह नहीं—

संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही। चितवहिं राम कृपा करि जेही॥राम कृपाँ तव दरसन भयऊ। तव प्रसाद सब संसय गयऊ॥

—कि शुद्ध संत उसीको मिलते हैं जिसपर राम कृपाकर दृष्टि डालें। रामकी कृपासे मुझे आपके दर्शन हुए, और आपकी कृपासे मेरा सारा संदेह मिट गया।

दोहा

सुनि बिहंगपति बानी सहित बिनय अनुराग।पुलक गात लोचन सजल मन हरषेउ अति काग६९(क)

पक्षिराज गरुड़की विनम्र, प्रेमभरी वाणी सुनकर काकभुशुण्डिका शरीर पुलकित हो उठा, नेत्रोंमें जल भर आया और मन अत्यंत हर्षसे भर गया।

दोहा

श्रोता सुमति सुसील सुचि कथा रसिक हरि दास।पाइ उमा अति गोप्यमपि सज्जन करहिं प्रकास६९(ख)

हे उमा, सुंदर बुद्धि, सुशील स्वभाव, पवित्रता, कथाप्रेम और हरिभक्तिवाला श्रोता पाकर सज्जन अपने सबसे गुप्त रहस्य भी खोलकर रख देते हैं।

बोलेउ काकभसुंड बहोरी। नभग नाथ पर प्रीति न थोरी॥सब बिधि नाथ पूज्य तुम्ह मेरे। कृपापात्र रघुनायक केरे॥

काकभुशुण्डिने फिर कहा—पक्षिराजपर उनका प्रेम कम न था—हे नाथ, आप सब तरहसे मेरे पूज्य हैं और रघुनाथकी कृपाके पात्र हैं।

तुम्हहि न संसय मोह न माया। मो पर नाथ कीन्ह तुम्ह दाया॥पठइ मोह मिस खगपति तोही। रघुपति दीन्हि बड़ाई मोही॥

आपको न संदेह है, न मोह, न माया—नाथ, आपने तो मुझपर केवल दया की है। हे पक्षिराज, मोहका बहाना बनाकर रघुनाथने आपको यहाँ भेजकर मुझे ही बड़ाई दी है।

तुम्ह निज मोह कही खग साईं। सो नहिं कछु आचरज गोसाईं॥नारद भव बिरंचि सनकादी। जे मुनिनायक आतमबादी॥

आपने अपना मोह बताया, यह कुछ आश्चर्यकी बात नहीं, हे स्वामी—क्योंकि नारद, शिव, ब्रह्मा और सनकादि जैसे आत्मज्ञानके मर्मज्ञ श्रेष्ठ मुनि भी—

मोह न अंध कीन्ह केहि केही। को जग काम नचाव न जेही॥तृस्नाँ केहि न कीन्ह बौराहा। केहि कर हृदय क्रोध नहिं दाहा॥

—उनमें भी किसे मोहने अंधा नहीं किया? संसारमें ऐसा कौन है जिसे कामने न नचाया हो? तृष्णाने किसे पागल नहीं बनाया? क्रोधने किसका हृदय नहीं जलाया?

दोहा

ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद गुन आगार।केहि कै लौभ बिडंबना कीन्हि न एहिं संसार७०(क)

इस संसारमें ऐसा कौन ज्ञानी, तपस्वी, शूरवीर, कवि, विद्वान या गुणवान है, जिसे लोभने कभी बदनाम न किया हो?

दोहा

श्री मद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि।मृगलोचनि के नैन सर को अस लाग न जाहि७०(ख)

धनके मदने किसे टेढ़ा नहीं किया, सत्ताने किसे बहरा नहीं किया? ऐसा कौन है जिसे किसी सुंदरीके नेत्र-बाण कभी न लगे हों?

गुन कृत सन्यपात नहिं केही। कोउ न मान मद तजेउ निबेही॥जोबन ज्वर केहि नहिं बलकावा। ममता केहि कर जस न नसावा॥

गुणोंके सन्निपातसे कौन बचा है? मान-मदने किसे नहीं छुआ? यौवनके ज्वरने किसे बेकाबू नहीं किया? ममताने किसका यश नष्ट नहीं किया?

मच्छर काहि कलंक न लावा। काहि न सोक समीर डोलावा॥चिंता साँपिनि को नहिं खाया। को जग जाहि न ब्यापी माया॥

ईर्ष्याने किसपर दाग नहीं लगाया? शोककी आँधीने किसे नहीं हिलाया? चिंतारूपी सर्पिणीने किसे नहीं डँसा? संसारमें ऐसा कौन है जिसे माया न घेरे हो?

कीट मनोरथ दारु सरीरा। जेहि न लाग घुन को अस धीरा॥सुत बित लोक ईषना तीनी। केहि के मति इन्ह कृत न मलीनी॥

मनोरथ कीड़ा है और शरीर लकड़ी—ऐसा कौन धैर्यवान है जिसे यह कीड़ा न लगा हो? पुत्र, धन और यशकी तीन प्रबल इच्छाओंने किसकी बुद्धिको मलिन नहीं किया?

यह सब माया कर परिवारा। प्रबल अमिति को बरनै पारा॥सिव चतुरानन जाहि डेराहीं। अपर जीव केहि लेखे माहीं॥

यह सब मायाका ही विशाल, बलवान परिवार है, जिसका पूरा वर्णन कोई नहीं कर सकता; शिव और ब्रह्मा तक जिससे डरते हैं, तो साधारण जीवोंकी क्या गिनती?

दोहा

ब्यापि रहेउ संसार महुँ माया कटक प्रचंड।सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाषंड७१(क)

मायाकी प्रचंड सेना पूरे संसारमें फैली है—काम-क्रोध-लोभ उसके सेनापति हैं, और दंभ, कपट, पाखंड उसके योद्धा।

दोहा

सो दासी रघुबीर के समुझें मिथ्या सोपि।छूट न राम कृपा बिनु नाथ कहउँ पद रोपि७१(ख)

पर वह माया रघुवीरकी दासी है—समझ लेनेपर मिथ्या ही है, फिर भी रामकी कृपा बिना कभी नहीं छूटती। नाथ, यह मैं प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ।

जो माया सब जगहि नचावा। जासु चरित लखि काहुँ न पावा॥सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा। नाच नटी इव सहित समाजा॥

जो माया सारे संसारको नचाती है और जिसकी करनी कोई पकड़ नहीं पाया, हे गरुड़, वही माया प्रभुकी भौंहके इशारेपर अपने पूरे परिवारसहित नर्तकीकी तरह नाचती है।

सोइ सच्चिदानंद घन रामा। अज बिग्यान रूप बल धामा॥ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता। अखिल अमोघसक्ति भगवंता॥

वे राम स्वयं वही सच्चिदानंदघन हैं—अजन्मा, विज्ञानस्वरूप, रूप-बलके धाम, सर्वव्यापी और सर्वरूप, अखंड, अनंत, संपूर्ण, अमोघशक्ति भगवान।

अगुन अदभ्र गिरा गोतीता। सबदरसी अनवद्य अजीता॥निर्मम निराकार निरमोहा। नित्य निरंजन सुख संदोहा॥

निर्गुण, महान, वाणी-इंद्रियोंसे परे, सर्वद्रष्टा, निर्दोष, अजेय, ममतारहित, निराकार, मोहरहित,

प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी। ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी॥इहाँ मोह कर कारन नाहीं। रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं॥

नित्य, मायातीत, सुखराशि, प्रकृतिसे परे, सबके हृदयमें बसनेवाले, इच्छारहित, अविकारी, अविनाशी ब्रह्म हैं। यहाँ मोहका कोई कारण ही नहीं—क्या अंधकार कभी सूर्यके सामने टिक सकता है?

दोहा

भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप।किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप७२(क)

भक्तोंके लिये भगवान रामने राजाका शरीर धारण किया और साधारण मनुष्योंकी तरह अनेकों परम पावन चरित्र किये।

दोहा

जथा अनेक बेष धरि नृत्य करइ नट कोइ।सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ७२(ख)

जैसे कोई नट अनेक वेष धरकर नाचता है और हर वेषके अनुरूप भाव दिखाता है, पर स्वयं उनमेंसे कोई बनता नहीं,

असि रघुपति लीला उरगारी। दनुज बिमोहनि जन सुखकारी॥जे मति मलिन बिषयबस कामी। प्रभु पर मोह धरहिं इमि स्वामी॥

—वैसी ही है रघुनाथकी यह लीला, हे गरुड़, जो राक्षसोंको मोहित करती और भक्तोंको सुख देती है। जो मलिनबुद्धि, विषयासक्त और कामी हैं, वे ही प्रभुपर ऐसा मोहका आरोप लगाते हैं।

नयन दोष जा कहँ जब होई। पीत बरन ससि कहुँ कह सोई॥जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा। सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा॥

जिसे आँखका दोष हो, वह चंद्रमाको भी पीला कहता है; हे गरुड़, जिसे दिशाभ्रम हो, वह कहता है सूर्य पश्चिममें उगा।

नौकारूढ़ चलत जग देखा। अचल मोह बस आपुहि लेखा॥बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादीं। कहहिं परस्पर मिथ्याबादी॥

नावपर चढ़ा मनुष्य संसारको चलता देखता है और मोहवश स्वयंको स्थिर मान बैठता है; बच्चे घूमते हैं, घर नहीं घूमता, पर वे आपसमें एक-दूसरेको झूठा कहते हैं।

हरि बिषइक अस मोह बिहंगा। सपनेहुँ नहिं अग्यान प्रसंगा॥मायाबस मतिमंद अभागी। हृदयँ जमनिका बहुबिधि लागी॥

हरिके विषयमें मोहकी कल्पना भी ऐसी ही है, हे गरुड़—भगवानमें स्वप्रमें भी अज्ञानका कोई प्रसंग नहीं। पर जो मायाके वश, मंदबुद्धि और अभागे हैं, जिनके हृदयपर अनेक परदे पड़े हैं,

ते सठ हठ बस संसय करहीं। निज अग्यान राम पर धरहीं॥

वे मूर्ख हठवश संदेह करते हैं और अपना ही अज्ञान रामपर मढ़ देते हैं।

दोहा

काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूप।ते किमि जानहिं रघुपतिहि मूढ़ परे तम कूप७३(क)

जो काम-क्रोध-मद-लोभमें डूबे और दुःखरूपी घरमें आसक्त हैं, वे रघुनाथको कैसे जानें—वे मूर्ख तो अंधकाररूपी कुएँमें पड़े हैं।

दोहा

निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ।सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ७३(ख)

निर्गुण रूप तो सहज ही समझमें आ जाता है, पर सगुण रूपको कोई नहीं जान पाता; इसीलिये सगुण भगवानके सुगम-अगम चरित्र सुनकर मुनियोंका भी मन भ्रमित हो जाता है।

सुनु खगेस रघुपति प्रभुताई। कहउँ जथामति कथा सुहाई॥जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही। सोउ सब कथा सुनावउँ तोही॥

हे गरुड़, अब रघुनाथकी प्रभुता सुनिये, मैंने यह सुंदर कथा अपनी बुद्धिभर कही; अब मुझे जिस तरह मोह हुआ, वह सब कथा भी आपको सुनाता हूँ।

राम कृपा भाजन तुम्ह ताता। हरि गुन प्रीति मोहि सुखदाता॥ताते नहिं कछु तुम्हहिं दुरावउँ। परम रहस्य मनोहर गावउँ॥

तात, आप रामके कृपापात्र हैं, हरिके गुणोंमें आपकी प्रीति है, इसीसे आप मुझे सुख देते हैं; इसीलिये मैं आपसे कुछ नहीं छिपाता, अत्यंत गोपनीय बात भी गाकर सुनाता हूँ।

सुनहु राम कर सहज सुभाऊ। जन अभिमान न राखहिं काऊ॥संसृत मूल सूलप्रद नाना। सकल सोक दायक अभिमाना॥

सुनिये रामका सहज स्वभाव—वे भक्तमें कभी अभिमान नहीं टिकने देते, क्योंकि अभिमान ही संसार-बंधनका मूल है और हर तरहके दुःख-शोकको जन्म देता है।

ताते करहिं कृपानिधि दूरी। सेवक पर ममता अति भूरी॥जिमि सिसु तन ब्रन होइ गोसाई। मातु चिराव कठिन की नाईं॥

इसीलिये कृपानिधि उसे दूर कर देते हैं, क्योंकि सेवकपर उनकी ममता अपार है। हे गोसाईं, जैसे बच्चेके शरीरमें फोड़ा होनेपर माता कठोर हृदय बनकर उसे चिरवा डालती है,

दोहा

जदपि प्रथम दुख पावइ रोवइ बाल अधीर।ब्याधि नास हित जननी गनति न सो सिसु पीर७४(क)

यद्यपि बच्चा पहले दर्दसे रोता-तड़पता है, फिर भी माता रोगके नाशके लिये उस क्षणिक पीड़ाकी परवा नहीं करती।

दोहा

तिमि रघुपति निज दासकर हरहिं मान हित लागि।तुलसिदास ऐसे प्रभुहि कस न भजहु भ्रम त्यागि७४(ख)

उसी तरह रघुनाथ अपने दासका अभिमान उसीके हितके लिये हर लेते हैं। तुलसीदास कहते हैं—ऐसे प्रभुको भ्रम त्यागकर क्यों न भजें?

राम कृपा आपनि जड़ताई। कहउँ खगेस सुनहु मन लाई॥जब जब राम मनुज तनु धरहीं। भक्त हेतु लीला बहु करहीं॥

हे गरुड़, अब रामकी कृपा और अपनी मूर्खताकी बात मन लगाकर सुनिये—जब-जब राम मनुष्यशरीर धरते हैं और भक्तोंके लिये अनेक लीलाएँ करते हैं,

तब तब अवधपुरी मैं जाऊँ। बालचरित बिलोकि हरषाऊँ॥जन्म महोत्सव देखउँ जाई। बरष पाँच तहँ रहउँ लोभाई॥

तब-तब मैं अयोध्या जाता हूँ और उनकी बाल-लीला देखकर हर्षित होता हूँ; जन्मोत्सव देखकर मैं वहाँ लुभाकर पाँच वर्षतक ठहर जाता हूँ।

इष्टदेव मम बालक रामा। सोभा बपुष कोटि सत कामा॥निज प्रभु बदन निहारि निहारी। लोचन सुफल करउँ उरगारी॥

मेरे इष्टदेव वही बालक राम हैं, जिनके शरीरमें अरबों कामदेवोंकी शोभा है; हे गरुड़, अपने प्रभुका मुख बार-बार निहारकर मैं अपने नेत्र सफल करता हूँ।

लघु बायस बपु धरि हरि संगा। देखउँ बालचरित बहुरंगा॥

छोटे कौएका रूप धरकर और हरिके साथ-साथ फिरकर मैं उनकी रंग-बिरंगी बाल-लीलाएँ देखता रहता हूँ।

दोहा

लरिकाईं जहँ जहँ फिरहिं तहँ तहँ संग उड़ाउँ।जूठनि परइ अजिर महँ सो उठाइ करि खाउँ७५(क)

बचपनमें वे जहाँ-जहाँ घूमते हैं, वहाँ-वहाँ मैं भी साथ उड़ता हूँ, और आँगनमें गिरी उनकी जूठन उठाकर खा लेता हूँ।

दोहा

एक बार अतिसय सब चरित किए रघुबीर।सुमिरत प्रभु लीला सोइ पुलकित भयउ सरीर७५(ख)

एक बार रघुवीरने सब लीलाएँ विशेष उमंगसे कीं; उस लीलाका स्मरण करते ही आज भी मेरा शरीर पुलकित हो उठता है।

कहइ भसुंड सुनहु खगनायक। रामचरित सेवक सुखदायक॥नृपमंदिर सुंदर सब भाँती। खचित कनक मनि नाना जाती॥

भुशुण्डि कहने लगे—सुनिये पक्षिराज, रामका चरित्र सेवकोंको सुख देनेवाला है। राजमहल सब तरहसे सुंदर था, सोनेकी दीवारोंमें नाना प्रकारके रत्न जड़े थे।

बरनि न जाइ रुचिर अँगनाई। जहँ खेलहिं नित चारिउ भाई॥बालबिनोद करत रघुराई। बिचरत अजिर जननि सुखदाई॥

उस सुंदर आँगनका वर्णन नहीं हो सकता, जहाँ चारों भाई नित्य खेलते हैं; माताको सुख देते हुए रघुनाथ बाल-विनोद करते हुए वहाँ विचरते हैं।

मरकत मृदुल कलेवर स्यामा। अंग अंग प्रति छबि बहु कामा॥नव राजीव अरुन मृदु चरना। पदज रुचिर नख ससि दुति हरना॥

मरकतमणि-सा कोमल साँवला शरीर है, हर अंगमें अनगिनत कामदेवोंकी छटा; नव-लाल कमलसे कोमल लाल चरण, सुंदर अंगुलियाँ, नख चंद्रमाकी चमकको भी मात देते।

ललित अंक कुलिसादिक चारी। नूपुर चारु मधुर रवकारी॥चारु पुरट मनि रचित बनाई। कटि किंकिन कल मुखर सुहाई॥

तलवोंमें वज्र आदि चार सुंदर चिह्न हैं, चरणोंमें मधुर बजते सुंदर नूपुर हैं; सोने-रत्नोंसे जड़ी कमरबंदकी मधुर झंकार सुहावनी लगती है।

दोहा

रेखा त्रय सुंदर उदर नाभी रुचिर गँभीर।उर आयत भ्राजत बिबिध बाल बिभूषन चीर७६

पेटपर तीन सुंदर रेखाएँ हैं, नाभि सुंदर और गहरी है; चौड़े वक्षपर बालकोचित अनेक आभूषण और वस्त्र शोभा दे रहे हैं।

अरुन पानि नख करज मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर॥कंध बाल केहरि दर ग्रीवा। चारु चिबुक आनन छबि सींवा॥

लाल हथेलियाँ, नख और अंगुलियाँ मन मोह लेती हैं, विशाल भुजाओंपर सुंदर आभूषण हैं; सिंहशावक-से कंधे, शंख-सी ग्रीवा, सुंदर ठुड्डी और मुख तो सौंदर्यकी सीमा ही है।

कलबल बचन अधर अरुनारे। दुइ दुइ दसन बिसद बर बारे॥ललित कपोल मनोहर नासा। सकल सुखद ससि कर सम हासा॥

तोतली बोली, लाल-लाल ओंठ, ऊपर-नीचे दो-दो उजली, सुंदर, नन्ही दंतुलियाँ; सुंदर गाल, मनोहर नासिका और चंद्रकिरणों-सी सुखद मुसकान।

नील कंज लोचन भव मोचन। भ्राजत भाल तिलक गोरोचन॥बिकट भृकुटि सम श्रवन सुहाए। कुंचित कच मेचक छबि छाए॥

नीले कमल-से नेत्र जन्म-मृत्युसे मुक्त करनेवाले हैं, ललाटपर गोरोचनका तिलक शोभित है; टेढ़ी भौंहें, सुडौल कान और घुँघराले काले केश—सब मिलकर अनुपम छटा बिखेरते हैं।

पीत झीनि झगुली तन सोही। किलकनि चितवनि भावति मोही॥रूप रासि नृप अजिर बिहारी। नाचहिं निज प्रतिबिंब निहारी॥

पीली महीन झँगुली शरीरपर सुशोभित है, उनकी किलकारी और चितवन मुझे बहुत प्रिय लगती है; रूपराशि राम राजा दशरथके आँगनमें विचरते हुए अपनी परछाईं देखकर नाचने लगते हैं,

मोहि सन करहीं बिबिध बिधि क्रीड़ा। बरनत मोहि होति अति ब्रीड़ा॥किलकत मोहि धरन जब धावहिं। चलउँ भागि तब पूप देखावहिं॥

और मुझसे तरह-तरहके खेल करते हैं, जिनका वर्णन करते मुझे लाज आती है! किलकारी भरकर जब वे मुझे पकड़नेको दौड़ते और मैं भाग जाता, तो मुझे पूआ दिखाकर लुभाते।

दोहा

आवत निकट हँसहिं प्रभु भाजत रुदन कराहिं।जाउँ समीप गहन पद फिरि फिरि चितइ पराहिं७७(क)

मेरे पास आते ही प्रभु हँसते, भागते ही रोने लगते; और जब मैं उनके चरण छूनेको पास जाता, तो वे बार-बार पीछे मुड़कर देखते हुए भाग जाते।

दोहा

प्राकृत सिसु इव लीला देखि भयउ मोहि मोह।कवन चरित्र करत प्रभु चिदानंद संदोह७७(ख)

साधारण बच्चोंकी-सी यह लीला देखकर मुझे मोह हुआ—सच्चिदानंदघन प्रभु आखिर यह कैसा चरित्र कर रहे हैं?

एतना मन आनत खगराया। रघुपति प्रेरित ब्यापी माया॥सो माया न दुखद मोहि काहीं। आन जीव इव संसृत नाहीं॥

मनमें इतनी शंका आते ही, हे पक्षिराज, रघुनाथकी ही प्रेरित माया मुझपर छा गयी; पर वह माया न मुझे दुःख देनेवाली हुई, न दूसरे जीवोंकी भाँति संसारमें फँसानेवाली।

नाथ इहाँ कछु कारन आना। सुनहु सो सावधान हरिजाना॥ग्यान अखंड एक सीताबर। माया बस्य जीव सचराचर॥

नाथ, इसका कुछ और ही कारण है, हे हरिवाहन, ध्यानसे सुनिये—केवल सीतापति राम ही अखंड ज्ञानस्वरूप हैं, बाकी सभी जड़-चेतन जीव मायाके वशमें हैं।

जौं सब कें रह ग्यान एकरस। ईस्वर जीवहि भेद कहहु कस॥माया बस्य जीव अभिमानी। ईस बस्य माया गुनखानी॥

यदि सबको एकरस ज्ञान बना रहे, तो फिर ईश्वर और जीवमें भेद ही कैसा? अभिमानी जीव मायाके वश है, और तीनों गुणोंकी खान वह माया स्वयं ईश्वरके वशमें है।

परबस जीव स्वबस भगवंता। जीव अनेक एक श्रीकंता॥मुधा भेद जद्यपि कृत माया। बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया॥

जीव परतंत्र है, भगवान स्वतंत्र; जीव अनेक हैं, लक्ष्मीपति एक। यद्यपि मायाकृत यह भेद असत् है, फिर भी हरिभजनके बिना करोड़ों उपायोंसे भी नहीं मिटता।

दोहा

रामचंद्र के भजन बिनु जो चह पद निर्बान।ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिषान७८(क)

रामके भजन बिना जो मोक्षपद चाहता है, वह चाहे कितना ही ज्ञानी क्यों न हो, बिना पूँछ-सींगके पशु ही है।

दोहा

राकापति षोड़स उअहिं तारागन समुदाइ।सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ७८(ख)

सोलहों कलाओंसे पूर्ण चंद्रमा तारागणसहित उदय हो जाय और सारे पर्वतोंमें दावाग्नि लगा दी जाय, तब भी सूर्यके उदय बिना रात्रि नहीं टलती।

ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा। मिटइ न जीवन्ह केर कलेसा॥हरि सेवकहि न ब्याप अबिद्या। प्रभु प्रेरित ब्यापइ तेहि बिद्या॥

उसी तरह, हे पक्षिराज, हरिभजन बिना जीवोंका क्लेश नहीं मिटता। हरिके सेवकको अविद्या नहीं छूती, उसे तो प्रभुकी ही प्रेरित विद्या घेरे रहती है।

ताते नास न होइ दास कर। भेद भगति भाढ़इ बिहंगबर॥भ्रम ते चकित राम मोहि देखा। बिहँसे सो सुनु चरित बिसेषा॥

इसीलिये दासका कभी नाश नहीं होता, हे पक्षिश्रेष्ठ, और भेद-भक्ति बढ़ती ही जाती है। रामने जब मुझे भ्रमसे चकित देखा तो हँस दिये—अब वह विशेष चरित्र सुनिये।

तेहि कौतुक कर मरमु न काहूँ। जाना अनुज न मातु पिताहूँ॥जानु पानि धाए मोहि धरना। स्यामल गात अरुन कर चरना॥

उस खेलका भेद न छोटे भाइयोंने जाना, न माता-पिताने। साँवले शरीरवाले, लाल हथेली-चरणोंवाले बालक राम घुटनों-हाथोंके बल मुझे पकड़ने दौड़े।

तब मैं भागि चलेउँ उरगामी। राम गहन कहँ भुजा पसारी॥जिमि जिमि दूरि उड़ाउँ अकासा। तहँ भुज हरि देखउँ निज पासा॥

तब मैं भाग चला, हे सर्पशत्रु गरुड़; रामने मुझे पकड़नेको भुजा फैलायी। मैं जितना ही आकाशमें दूर उड़ता, उतनी ही हरिकी वह भुजा मुझे अपने पास दिखती।

दोहा

ब्रह्मलोक लगि गयउँ मैं चितयउँ पाछ उड़ात।जुग अंगुल कर बीच सब राम भुजहि मोहि तात७९(क)

मैं ब्रह्मलोकतक जा पहुँचा, और उड़ते-उड़ते पीछे देखा तो, हे तात, रामकी भुजा और मेरे बीच बस दो अंगुल ही अंतर रह गया था।

दोहा

सप्ताबरन भेद करि जहाँ लगें गति मोरि।गयउँ तहाँ प्रभु भुज निरखि ब्याकुल भय बहोरि७९(ख)

सातों आवरणोंको भेदकर जहाँतक मेरी गति थी, वहाँतक गया; पर वहाँ भी प्रभुकी भुजाको अपने पीछे देखकर मैं फिर व्याकुल हो उठा।

मूदेउँ नयन त्रसित जब भयउँ। पुनि चितवत कोसलपुर गयऊँ॥मोहि बिलोकि राम मुसुकाहीं। बिहँसत तुरत गयउँ मुख माहीं॥

डरकर जब मैंने आँखें मूँद लीं, फिर खोलकर देखा तो अवधपुरीमें पहुँच चुका था। मुझे देखकर राम मुसकरा दिये, और हँसते ही मैं सीधा उनके मुखमें चला गया।

उदर माझ सुनु अंडज राया। देखेउँ बहु ब्रह्मांड निकाया॥अति बिचित्र तहँ लोक अनेका। रचना अधिक एक ते एका॥

उनके पेटके भीतर, हे पक्षिराज, मैंने अनगिनत ब्रह्मांडोंके समूह देखे; वहाँ विचित्र-से-विचित्र अनेक लोक थे, हर एककी रचना दूसरेसे भी बढ़कर।

कोटिन्ह _ चतुरानन गौरीसा। अगनित उडगन रबि रजनीसा॥अगनित लोकपाल जम काला। अगनित भूधर भूमि बिसाला॥

करोड़ों ब्रह्मा-शिव, अनगिनत तारे, सूर्य-चंद्र, अनगिनत लोकपाल, यम और काल, अनगिनत विशाल पर्वत और भूमि,

सागर सरि सर बिपिन अपारा। नाना भाँति सृष्टि बिस्तारा॥सुर मुनि सिद्ध नाग नर किंनर। चारि प्रकार जीव सचराचर॥

अपार समुद्र, नदी, तालाब, वन और नाना प्रकारकी सृष्टिका विस्तार; देव, मुनि, सिद्ध, नाग, मनुष्य, किन्नर और चारों तरहके जड़-चेतन जीव—सब मैंने वहाँ देखे।

दोहा

जो नहिं देखा नहिं सुना जो मनहूँ न समाइ।सो सब अद्भुत देखेउँ बरनि कवनि बिधि जाइ८०(क)

जो कभी न देखा, न सुना, न मनमें भी समा सकता था, वह सब अद्भुत मैंने वहाँ देखा—अब उसका वर्णन कैसे हो?

दोहा

एक एक ब्रह्मांड महुँ रहउँ बरष सत एक।एहि बिधि देखत फिरउँ मैं अंड कटाह अनेक८०(ख)

मैं हर एक ब्रह्मांडमें सौ-सौ वर्ष रहता, इस तरह घूमते-घूमते अनगिनत ब्रह्मांड मैंने देख डाले।

लोक लोक प्रति भिन्न बिधाता। भिन्न बिष्नु सिव मनु दिसित्राता॥नर गंधर्ब भूत बेताला। किंनर निसिचर पसु खग ब्याला॥

हर लोकमें अलग ब्रह्मा, अलग विष्णु, शिव, मनु और दिक्पाल थे; अलग मनुष्य, गंधर्व, भूत, वैताल, किन्नर, राक्षस, पशु-पक्षी, सर्प,

देव दनुज गन नाना जाती। सकल जीव तहँ आनहि भाँती॥महि सरि सागर सर गिरि नाना। सब प्रपंच तहँ आनइ आना॥

अलग जाति-जातिके देव-दानव—हर जगह सब जीव भिन्न ही थे; अनेक पृथ्वी, नदी, समुद्र, तालाब, पर्वत—सारी सृष्टि हर जगह अलग-ही-अलग थी।

अंडकोस प्रति प्रति निज रुपा। देखेउँ जिनस अनेक अनूपा॥अवधपुरी प्रति भुवन निनारी। सरजू भिन्न भिन्न नर नारी॥

हर ब्रह्मांडमें मैंने अपना ही रूप और अनेकों अनुपम वस्तुएँ देखीं; हर भुवनमें न्यारी अवधपुरी, न्यारी सरयू और न्यारे ही नर-नारी थे।

दसरथ कौसल्या सुनु ताता। बिबिध रूप भरतादिक भ्राता॥प्रति ब्रह्मांड राम अवतारा। देखउँ बालबिनोद अपारा॥

सुनिये तात, दशरथ, कौसल्या और भरत आदि भाई भी हर जगह अलग-अलग रूपोंके थे; हर ब्रह्मांडमें मैं रामावतार और उनकी अपार बाल-लीलाएँ देखता फिरता था।

दोहा

भिन्न भिन्न मै दीख सबु अति बिचित्र हरिजान।अगनित भुवन फिरेउँ प्रभु राम न देखेउँ आन८१(क)

हे हरिवाहन, मैंने सब कुछ भिन्न और अत्यंत विचित्र देखा; अनगिनत भुवनोंमें घूमकर भी प्रभु रामको मैंने कहीं भिन्न नहीं देखा।

दोहा

सोइ सिसुपन सोइ सोभा सोइ कृपाल रघुबीर।भुवन भुवन देखत फिरउँ प्रेरित मोह समीर८१(ख)

हर जगह वही बालपन, वही शोभा, वही कृपालु रघुवीर! इस तरह मोहरूपी पवनकी प्रेरणासे मैं भुवन-भुवनमें भटकता फिरता रहा।

भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका। बीते मनहुँ कल्प सत एका॥फिरत फिरत निज आश्रम आयउँ। तहँ पुनि रहि कछु काल गवाँयउँ॥

अनेक ब्रह्मांडोंमें भटकते-भटकते मानो सौ कल्प बीत गये; घूमते-घूमते अंततः मैं अपने आश्रम लौटा और वहाँ कुछ समय बिताया।

निज प्रभु जन्म अवध सुनि पायउँ। निर्भर प्रेम हरषि उठि धायउँ॥देखउँ जन्म महोत्सव जाई। जेहि बिधि प्रथम कहा मैं गाई॥

जब मैंने सुना कि मेरे प्रभुका अवधमें जन्म हुआ है, तो प्रेमसे भरकर हर्षित हो दौड़ पड़ा; जाकर जन्मोत्सव देखा, ठीक जैसा पहले वर्णन कर चुका हूँ।

राम उदर देखेउँ जग नाना। देखत बनइ न जाइ बखाना॥तहँ पुनि देखेउँ राम सुजाना। माया पति कृपाल भगवाना॥

रामके उदरमें मैंने फिर वही अनगिनत जगत देखे, जो वर्णनसे परे थे; वहाँ फिर मैंने सुजान, मायाके स्वामी, कृपालु भगवानको देखा।

करउँ बिचार बहोरि बहोरी। मोह कलिल ब्यापित मति मोरी॥उभय घरी महँ मैं सब देखा। भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा॥

मैं बार-बार विचार करने लगा, मेरी बुद्धि मोहके कीचड़में डूबी थी; यह सब मैंने बस दो घड़ीमें देख लिया था, फिर भी मन अत्यंत भ्रमित होकर थक गया।

दोहा

देखि कृपाल बिकल मोहि बिहँसे तब रघुबीर।बिहँसतहीं मुख बाहेर आयउँ सुनु मतिधीर८२(क)

मुझे व्याकुल देखकर कृपालु रघुवीर हँस दिये; हे धीरबुद्धि गरुड़, सुनिये, उनके हँसते ही मैं तुरंत मुखसे बाहर आ गया।

दोहा

सोइ लरिकाई मो सन करन लगे पुनि राम।कोटि भाँति समुझावउँ मनु न लहइ बिश्राम८२(ख)

राम फिर मेरे साथ वही बालसुलभ खेल करने लगे; मैं करोड़ों तरहसे अपने मनको समझाता, पर उसे कहीं शांति नहीं मिलती थी।

देखि चरित यह सो प्रभुताई। समुझत देह दसा बिसराई॥धरनि परेउ मुख आव न बाता। त्राहि त्राहि आरत जन त्राता॥

यह लीला देखकर और वह भीतर देखी हुई प्रभुता याद कर मैं देहकी सुध भूल गया; 'त्राहि त्राहि, हे आर्तजनोंके रक्षक' पुकारता हुआ धरतीपर गिर पड़ा, मुँहसे बोल न फूटता था।

प्रेमाकुल प्रभु मोहि बिलोकी। निज माया प्रभुता तब रोकी॥कर सरोज प्रभु मम सिर धरेऊ। दीनदयाल सकल दुख हरेऊ॥

मुझे प्रेमविह्वल देख प्रभुने अपनी मायाकी शक्तिको रोक लिया; अपना करकमल मेरे सिरपर रखा, और उस दीनदयालुने मेरा सारा दुःख हर लिया।

कीन्ह राम मोहि बिगत बिमोहा। सेवक सुखद कृपा संदोहा॥प्रभुता प्रथम बिचारि बिचारी। मन महँ होइ हरष अति भारी॥

सेवकोंको सुख देनेवाले, कृपासागर रामने मुझे मोहसे पूरी तरह मुक्त कर दिया; उस पहलेवाली प्रभुताको याद कर-करके मेरे मनमें अपार हर्ष हुआ।

भगत बछलता प्रभु के देखी। उपजी मम उर प्रीति बिसेषी॥सजल नयन पुलकित कर जोरी। कीन्हिउँ बहु बिधि बिनय बहोरी॥

प्रभुकी भक्तवत्सलता देखकर मेरे हृदयमें विशेष प्रेम उमड़ आया; नेत्र भरकर, पुलकित होकर, हाथ जोड़कर मैंने फिर बहुत तरहसे विनती की।

दोहा

सुनि सप्रेम मम बानी देखि दीन निज दास।बचन सुखद गंभीर मृदु बोले रमानिवास८३(क)

मेरी प्रेमभरी वाणी सुनकर और अपने दासको दीन देखकर रमानिवास राम सुखद, गंभीर, कोमल वचन बोले—

दोहा

काकभसुंडि मागु बर अति प्रसन्न मोहि जानि।अनिमादिक सिधि अपर रिधि मोच्छ सकल सुख खानि८३(ख)

हे काकभुशुण्डि, मुझे अत्यंत प्रसन्न जानकर वर माँग—अणिमा आदि सिद्धियाँ, अन्य ऋद्धियाँ और सब सुखोंकी खान मोक्ष,

ग्यान बिबेक बिरति बिग्याना। मुनि दुर्लभ गुन जे जग नाना॥आजु देउँ सब संसय नाहीं। मागु जो तोहि भाव मन माहीं॥

ज्ञान, विवेक, वैराग्य, विज्ञान और वे सब गुण जो जगतमें मुनियोंको भी दुर्लभ हैं—यह सब मैं आज तुझे दूँगा, इसमें संदेह मत कर; जो मन भाये सो माँग ले।

सुनि प्रभु बचन अधिक अनुरागेउँ। मन अनुमान करन तब लागेऊँ॥प्रभु कह देन सकल सुख सही। भगति आपनी देन न कही॥

प्रभुके वचन सुनकर मेरा प्रेम और बढ़ गया, पर मन ही मन सोचने लगा—प्रभुने सब सुख देनेकी बात कही सही, पर अपनी भक्ति देनेकी बात तो नहीं कही।

भगति हीन गुन सब सुख ऐसे। लवन बिना बहु बिंजन जैसे॥भजन हीन सुख कवने काजा। अस बिचारि बोलेउ खगराजा॥

भक्तिरहित सब गुण और सुख वैसे ही हैं जैसे नमकके बिना अनेक व्यंजन; भजनरहित सुख किस कामका? ऐसा सोचकर मैं, पक्षिराज, बोल उठा—

जौं प्रभु होइ प्रसन्न बर देहू। मो पर करहु कृपा अरु नेहू॥मन भावत बर मागउँ स्वामी। तुम्ह उदार उर अंतरजामी॥

यदि प्रभु आप प्रसन्न होकर वर दें और मुझपर कृपा-स्नेह करें, तो हे स्वामी, मैं अपने मनचाहा वर ही माँगता हूँ—आप उदार हैं और हृदयकी हर बात जाननेवाले हैं।

दोहा

अबिरल भगति बिसुध्द तव श्रुति पुरान जो गाव।जेहि खोजत जोगीस मुनि प्रभु प्रसाद कोउ पाव८४(क)

आपकी वह अविरल, विशुद्ध भक्ति जिसे वेद-पुराण गाते हैं, जिसे योगीश्वर मुनि खोजते फिरते हैं, और जिसे आपकी कृपासे कोई विरला ही पाता है—

दोहा

भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपा सिंधु सुख धाम।सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम८४(ख)

हे भक्तोंके कल्पवृक्ष, शरणागतके हितकारी, कृपासागर, सुखधाम राम! दया करके मुझे अपनी वही भक्ति प्रदान कीजिये।

एवमस्तु कहि रघुकुलनायक। बोले बचन परम सुखदायक॥सुनु बायस तें सहज सयाना। काहे न मागसि अस बरदाना॥

'एवमस्तु' कहकर रघुकुलनाथ परम सुखदायी वचन बोले—सुन काक, तू स्वभावसे ही बुद्धिमान है, ऐसा वरदान न माँगे तो भला और क्या माँगे?

सब सुख खानि भगति तैं मागी। नहिं जग कोउ तोहि सम बड़भागी॥जो मुनि कोटि जतन नहिं लहहीं। जे जप जोग अनल तन दहहीं॥

तूने सब सुखोंकी खान भक्ति माँग ली, संसारमें तेरे समान भाग्यशाली कोई नहीं। जिस भक्तिको मुनि करोड़ों जप-योगकी अग्निमें शरीर तपाकर भी नहीं पाते,

रीझेउँ देखि तोरि चतुराई। मागेहु भगति मोहि अति भाई॥सुनु बिहंग प्रसाद अब मोरें। सब सुभ गुन बसिहहिं उर तोरें॥

वही तूने माँगी—तेरी यह चतुराई देखकर मैं रीझ गया, यह मुझे बहुत भायी। सुन पक्षी, अब मेरी कृपासे सब शुभ गुण तेरे हृदयमें बस जायेंगे।

भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। जोग चरित्र रहस्य बिभागा॥जानब तें सबही कर भेदा। मम प्रसाद नहिं साधन खेदा॥

भक्ति, ज्ञान, विज्ञान, वैराग्य, योग, मेरी लीलाओंके रहस्य और भेद—यह सब तू मेरी ही कृपासे जान जायगा, तुझे साधनाका कोई कष्ट नहीं उठाना पड़ेगा।

दोहा

माया संभव भ्रम सब अब न ब्यापिहहिं तोहि।जानेसु ब्रह्म अनादि अज अगुन गुनाकर मोहि८५(क)

मायासे उपजे सब भ्रम अब तुझपर नहीं छाएँगे; मुझे अनादि, अजन्मा, निर्गुण और गुणोंकी खान ब्रह्म ही जानना।

दोहा

मोहि भगत प्रिय संतत अस बिचारि सुनु काग।कायँ बचन मन मम पद करेसु अचल अनुराग८५(ख)

सुन काक, जान ले कि मुझे भक्त सदा प्रिय होते हैं—यह विचारकर तन, वचन, मनसे मेरे चरणोंमें अटूट प्रेम बनाये रखना।

अब सुनु परम बिमल मम बानी। सत्य सुगम निगमादि बखानी॥निज सिद्धांत सुनावउँ तोही। सुनु मन धरु सब तजि भजु मोही॥

अब सुन मेरी परम निर्मल वाणी, जो सत्य और सुगम है, वेदोंने भी जिसका वर्णन किया है; मैं तुझे अपना यह मूल सिद्धांत सुनाता हूँ—सुनकर हृदयमें धारण कर, सब त्यागकर मुझे ही भज।

मम माया संभव संसारा। जीव चराचर बिबिधि प्रकारा॥सब मम प्रिय सब मम उपजाए। सब ते अधिक मनुज मोहि भाए॥

यह सारा संसार मेरी मायासे ही उपजा है, इसमें अनेक तरहके चराचर जीव हैं; वे सब मुझे प्रिय हैं क्योंकि सब मेरे ही रचे हैं, पर इन सबमें मनुष्य मुझे सबसे प्रिय लगते हैं।

तिन्ह महँ द्विज द्विज महँ श्रुतिधारी। तिन्ह महुँ निगम धरम अनुसारी॥तिन्ह महँ प्रिय बिरक्त पुनि ग्यानी। ग्यानिहु ते अति प्रिय बिग्यानी॥

उनमें भी ब्राह्मण, ब्राह्मणोंमें भी वेदधारी, उनमें भी वेदोक्त धर्मपर चलनेवाले, और उनमें भी विरक्त मुझे प्रिय हैं; विरक्तोंमें ज्ञानी और ज्ञानियोंसे भी अधिक विज्ञानी प्रिय हैं।

तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा। जेहि गति मोरि न दूसरि आसा॥पुनि पुनि सत्य कहउँ तोहि पाहीं। मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं॥

विज्ञानियोंसे भी बढ़कर मुझे अपना दास प्रिय है, जिसे मेरे सिवा कोई दूसरी आशा नहीं। मैं बार-बार सत्य कहता हूँ—मुझे अपने सेवकके समान प्रिय कोई नहीं है।

भगति हीन बिरंचि किन होई। सब जीवहु सम प्रिय मोहि सोई॥भगतिवंत अति नीचउ प्रानी। मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी॥

भक्तिहीन तो चाहे ब्रह्मा ही क्यों न हो, वह मुझे बाकी सब जीवोंके समान ही प्रिय है; पर भक्तिवान तो अत्यंत नीच प्राणी भी मुझे प्राणोंके समान प्रिय है—यह मेरी घोषणा है।

दोहा

सुचि सुसील सेवक सुमति प्रिय कहु काहि न लाग।श्रुति पुरान कह नीति असि सावधान सुनु काग८६

पवित्र, सुशील, सुबुद्धि सेवक भला किसे प्रिय नहीं लगता? वेद-पुराण भी यही नीति कहते हैं—सावधान होकर सुन, काक।

एक पिता के बिपुल कुमारा। होहिं पृथक गुन सील अचारा॥कोउ पंडित कोउ तापस ग्याता। कोउ धनवंत सूर कोउ दाता॥

एक ही पिताके अनेक पुत्र भिन्न-भिन्न गुण, स्वभाव और आचरणवाले होते हैं—कोई पंडित, कोई तपस्वी, कोई ज्ञानी, कोई धनी, कोई शूरवीर, कोई दानी,

कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई। सब पर पितहि प्रीति सम होई॥कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा। सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा॥

कोई सर्वज्ञ, कोई धर्मपरायण—पर पिताका प्रेम सबपर समान रहता है। किन्तु इनमेंसे जो मन-वचन-कर्मसे केवल पिताका ही भक्त हो, स्वप्रमें भी और कोई धर्म न जाने,

सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना। जद्यपि सो सब भाँति अयाना॥एहि बिधि जीव चराचर जेते। त्रिजग देव नर असुर समेते॥

वही पुत्र पिताको प्राणोंके समान प्रिय होता है, चाहे वह सब तरहसे अनजान ही क्यों न हो। इसी तरह पशु-पक्षी, देव, मनुष्य और असुरोंसहित जितने भी जड़-चेतन जीव हैं,

अखिल बिस्व यह मोर उपाया। सब पर मोहि बराबरि दाया॥तिन्ह महँ जो परिहरि मद माया। भजै मोहि मन बच अरु काया॥

यह सारा विश्व मेरा ही रचा हुआ है, इसलिये सबपर मेरी दया समान है। पर इनमें से जो मद-माया त्यागकर मन-वचन-कायासे मुझे भजता है,

दोहा

पुरुष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ।सर्ब भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ८७(क)

वह पुरुष हो, नपुंसक हो, स्त्री हो या कोई भी चर-अचर जीव—जो भी कपट त्यागकर सर्वभावसे मुझे भजता है, वही मुझे परम प्रिय है।

सोरठा

सत्य कहउँ खग तोहि सुचि सेवक मम प्रानप्रिय।अस बिचारि भजु मोहि परिहरि आस भरोस सब८७(ख)

हे पक्षी, मैं तुझसे सत्य कहता हूँ—मेरा पवित्र सेवक मुझे प्राणोंके समान प्रिय है। यह विचारकर सब आशा-भरोसा छोड़कर केवल मुझे ही भज।

कबहूँ काल न ब्यापिहि तोही। सुमिरेसु भजेसु निरंतर मोही॥प्रभु बचनामृत सुनि न अघाऊँ। तनु पुलकित मन अति हरषाऊँ॥

काल तुझे कभी नहीं छू पायेगा—निरंतर मेरा स्मरण-भजन करते रहना। प्रभुके इस अमृतवचनको सुनते-सुनते मैं तृप्त ही नहीं हो पाता था, शरीर पुलकित और मन हर्षसे भरा था।

सो सुख जानइ मन अरु काना। नहिं रसना पहिं जाइ बखाना॥प्रभु सोभा सुख जानहिं नयना। कहि किमि सकहिं तिन्हहि नहिं बयना॥

वह सुख तो केवल मन और कान ही जानते हैं, जीभसे उसे कहा नहीं जा सकता; प्रभुकी शोभाका सुख नेत्र जानते हैं, पर उनकी अपनी कोई वाणी नहीं, वे कैसे कहें?

बहु बिधि मोहि प्रबोधि सुख देई। लगे करन सिसु कौतुक तेई॥सजल नयन कछु मुख करि रूखा। चितइ मातु लागी अति भूखा॥

मुझे बहुत तरहसे समझा-बुझाकर सुख देनेके बाद प्रभु फिर बाल-सुलभ खेलमें रम गये; आँखें भरकर, मुँह कुछ रूखा बनाकर उन्होंने माँकी ओर देखा—मानो कह रहे हों, बड़ी भूख लगी है।

देखि मातु आतुर उठि धाई। कहि मृदु बचन लिए उर लाई॥गोद राखि कराव पय पाना। रघुपति चरित ललित कर गाना॥

यह देखते ही माता उठ दौड़ीं, कोमल वचन कहकर उन्हें छातीसे लगा लिया; गोदमें लेकर दूध पिलाने लगीं और साथ ही रघुनाथकी सुंदर लीलाएँ गुनगुनाने लगीं।

सोरठा

जेहि सुख लागि पुरारि असुभ बेष कृत सिव सुखद।अवधपुरी नर नारि तेहि सुख महुँ संतत मगन८८(क)

जिस सुखके लिये सबको सुख देनेवाले त्रिपुरारि शिवने अशुभ वेष धारण किया, उसी सुखमें अवधके नर-नारी निरंतर डूबे रहते थे।

सोरठा

सोइ सुख लवलेस जिन्ह बारक सपनेहुँ लहेउ।ते नहिं गनहिं खगेस ब्रह्मसुखहि सज्जन सुमति८८(ख)

उस सुखकी एक झलक जिन्हें स्वप्रमें भी एक बार मिल जाय, हे पक्षिराज, वे सुबुद्धि सज्जन फिर ब्रह्मसुखको भी कुछ नहीं गिनते।

मैं पुनि अवध रहेउँ कछु काला। देखेउँ बालबिनोद रसाला॥राम प्रसाद भगति बर पायउँ। प्रभु पद बंदि निजाश्रम आयउँ॥

मैं कुछ और समय अवधमें रहा, रामकी रसीली बाल-लीलाएँ देखता रहा; रामकी कृपासे भक्तिका वरदान पाकर, फिर प्रभुके चरणोंकी वंदना कर अपने आश्रम लौट आया।

तब ते मोहि न ब्यापी माया। जब ते रघुनायक अपनाया॥यह सब गुप्त चरित मैं गावा। हरि मायाँ जिमि मोहि नचावा॥

जबसे रघुनाथने मुझे अपनाया, तबसे माया मुझे कभी नहीं छू पायी। हरिकी माया मुझे कैसे नचाती थी, वह सब गुप्त वृत्तांत मैंने तुझे सुना दिया।

निज अनुभव अब कहउँ खगेसा। बिनु हरि भजन न जाहि कलेसा॥राम कृपा बिनु सुनु खगराई। जानि न जाइ राम प्रभुताई॥

अब हे गरुड़, मैं अपना निजी अनुभव कहता हूँ—हरिभजन बिना दुःख नहीं मिटते। सुनो, रामकी कृपा बिना रामकी प्रभुता नहीं जानी जा सकती,

जानें बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती॥प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई। जिमि खगपति जल के चिकनाई॥

प्रभुताको जाने बिना विश्वास नहीं जमता, विश्वासके बिना प्रेम नहीं होता, और प्रेमके बिना भक्ति दृढ़ नहीं होती—जैसे, हे पक्षिराज, जलमें तेल कभी टिकता नहीं।

सोरठा

बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु।गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु८९(क)

गुरुके बिना कहीं ज्ञान होता है? वैराग्यके बिना ज्ञान होता है? वेद-पुराण भी कहते हैं—हरिभक्तिके बिना सुख कहाँ मिलता है?

सोरठा

कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु।चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ८९(ख)

तात, सहज संतोषके बिना क्या कोई शांति पाता है? करोड़ों उपाय करके थक जाओ, पर क्या जल बिना नाव कभी चलती है?

बिनु संतोष न काम नसाहीं। काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं॥राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा। थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा॥

संतोषके बिना कामना नहीं मिटती, और कामना रहते सुख स्वप्रमें भी नहीं मिलता। रामभजन बिना कामनाएँ कैसे मिटें? क्या भूमि बिना कहीं पेड़ उगता है?

बिनु बिग्यान कि समता आवइ। कोउ अवकास कि नभ बिनु पावइ॥श्रद्धा बिना धर्म नहिं होई। बिनु महि गंध कि पावइ कोई॥

विज्ञानके बिना समता कैसे आये? क्या आकाश बिना कोई स्थान मिलता है? श्रद्धाके बिना धर्म नहीं होता, क्या पृथ्वीतत्त्व बिना गंध मिल सकती है?

बिनु तप तेज कि कर बिस्तारा। जल बिनु रस कि होइ संसारा॥सील कि मिल बिनु बुध सेवकाई। जिमि बिनु तेज न रूप गोसाई॥

तपके बिना तेज कैसे फैले? जलतत्त्वके बिना संसारमें रस कहाँ? विद्वानोंकी सेवाके बिना शील कैसे मिले? जैसे अग्नितत्त्वके बिना रूप नहीं मिलता, गोसाईं,

निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा। परस कि होइ बिहीन समीरा॥कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा। बिनु हरि भजन न भव भय नासा॥

आत्मसुखके बिना मन कैसे स्थिर हो? वायुतत्त्वके बिना स्पर्श कैसे हो? विश्वासके बिना कोई सिद्धि मिलती है? वैसे ही हरिभजन बिना जन्म-मृत्युका भय कभी नहीं मिटता।

दोहा

बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु।राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु॥९०(क)

विश्वासके बिना भक्ति नहीं, भक्तिके बिना राम पिघलते नहीं, और रामकी कृपाके बिना जीव स्वप्रमें भी शांति नहीं पाता।

सोरठा

अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल।भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद॥९०(ख)

यह विचारकर, हे धीरबुद्धि, सब कुतर्क और संदेह त्यागकर करुणाके सागर, सुंदर और सुखदायक रघुवीर रामका भजन करो।

निज मति सरिस नाथ मैं गाई। प्रभु प्रताप महिमा खगराई॥कहेउँ न कछु करि जुगुति बिसेषी। यह सब मैं निज नयनन्हि देखी॥

हे पक्षिराज, हे नाथ, मैंने अपनी बुद्धिभर प्रभुके प्रताप और महिमाका गान किया; कहीं कुछ बढ़ाकर नहीं कहा, यह सब मैंने अपनी आँखों देखा है।

महिमा नाम रूप गुन गाथा। सकल अमित अनंत रघुनाथा॥निज निज मति मुनि हरि गुन गावहिं। निगम सेष सिव पार न पावहिं॥

रघुनाथकी महिमा, नाम, रूप और गुणोंकी कथा सब अपार और अनंत है, और वे स्वयं भी अनंत हैं; मुनि अपनी-अपनी बुद्धिसे हरिके गुण गाते हैं, पर वेद, शेष और शिव भी उनका पार नहीं पाते।

तुम्हहि आदि खग मसक प्रजंता। नभ उड़ाहिं नहिं पावहिं अंता॥तिमि रघुपति महिमा अवगाहा। तात कबहुँ कोउ पाव कि थाहा॥

तुमसे लेकर मच्छरतक सब आकाशमें उड़ते हैं, पर आकाशका अंत कोई नहीं पाता; वैसे ही, तात, रघुनाथकी महिमा भी अथाह है—भला उसकी थाह कोई कभी पा सकता है?

रामु काम सत कोटि सुभग तन। दुर्गा कोटि अमित अरि मर्दन॥सक्र कोटि सत सरिस बिलासा। नभ सत कोटि अमित अवकासा॥

रामका सुंदर शरीर करोड़ों कामदेवोंके समान है, वे अनगिनत दुर्गाओंके समान शत्रुनाशक हैं; उनका ऐश्वर्य अरबों इंद्रोंके समान और उनका विस्तार अरबों आकाशोंके समान असीम है।

दोहा

मरुत कोटि सत बिपुल बल रबि सत कोटि प्रकास।ससि सत कोटि सुसीतल समन सकल भव त्रास९१(क)

उनका बल अरबों पवनोंके समान, उनकी आभा अरबों सूर्योंके समान, और उनकी शीतलता अरबों चंद्रमाओंके समान है, जो संसारके सारे भयको मिटा देती है।

दोहा

काल कोटि सत सरिस अति दुस्तर दुर्ग दुरंत।धूमकेतु सत कोटि सम दुराधरष भगवंत९१(ख)

वे अरबों कालोंके समान दुर्गम, दुर्ग और दुर्निवार हैं; भगवान अरबों धूमकेतुओंके समान अत्यंत प्रबल और अजेय हैं।

प्रभु अगाध सत कोटि पताला। समन कोटि सत सरिस कराला॥तीरथ अमित कोटि सम पावन। नाम अखिल अघ पूग नसावन॥

प्रभु अरबों पातालोंके समान अथाह हैं, अरबों यमोंके समान भयंकर; अनगिनत तीर्थोंके समान पवित्र करनेवाले हैं, और उनका नाम समस्त पापोंका नाश करता है।

हिमगिरि कोटि अचल रघुबीरा। सिंधु कोटि सत सम गंभीरा॥कामधेनु सत कोटि समाना। सकल काम दायक भगवाना॥

रघुवीर करोड़ों हिमालयोंके समान अटल और अरबों समुद्रोंके समान गंभीर हैं; भगवान अरबों कामधेनुओंके समान सब इच्छाएँ पूरी करनेवाले हैं।

सारद कोटि अमित चतुराई। बिधि सत कोटि सृष्टि निपुनाई॥बिष्नु कोटि सम पालन कर्ता। रुद्र कोटि सत सम संहर्ता॥

उनमें अनगिनत सरस्वतियोंकी चतुराई है, अरबों ब्रह्माओंकी सृष्टि-निपुणता है; वे करोड़ों विष्णुओंके समान पालनकर्ता और अरबों रुद्रोंके समान संहारकर्ता हैं।

धनद कोटि सत सम धनवाना। माया कोटि प्रपंच निधाना॥भार धरन सत कोटि अहीसा। निरवधि निरुपम प्रभु जगदीसा॥

वे अरबों कुबेरोंके समान धनवान और करोड़ों मायाओंके भंडार हैं; भार वहनमें अरबों शेषोंके समान हैं—संक्षेपमें, जगदीश्वर प्रभु सीमारहित और उपमारहित हैं।

छंद

निरुपम न उपमा आन राम समान रामु निगम कहै।जिमि कोटि सत खद्योत सम रबि कहत अति लघुता लहै॥एहि भाँति निज निज मति बिलास मुनीस हरिहि बखानहीं।प्रभु भाव गाहक अति कृपाल सप्रेम सुनि सुख मानहीं॥

राम उपमारहित हैं, राम-जैसा दूसरा कोई नहीं—वेद यही कहते हैं। जैसे सूर्यको करोड़ों जुगनुओंके समान कहना उसकी महिमा घटाना ही है, वैसे ही मुनिजन अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार हरिका वर्णन करते हैं; पर अत्यंत कृपालु प्रभु तो बस भक्तोंके भावको ग्रहण करते हैं, और उस वर्णनको प्रेमसहित सुनकर प्रसन्न होते हैं।

दोहा

रामु अमित गुन सागर थाह कि पावइ कोई।संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हहि सुनायउँ सोइ९२(क)

श्रीरामजी तो अनन्त गुणोंके अथाह सागर हैं, उनकी थाह भला कौन पा सकता है! संतोंसे मैंने जैसा कुछ उनके विषयमें सुना था, वही तुम्हें कह सुनाया।

सोरठा

भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन।तजि ममता मद मान भजिअ सदा सीता रवन९२(ख)

भगवान् सुखके अक्षय भण्डार और करुणाके धाम हैं, पर वे केवल प्रेमके ही वश होते हैं। इसलिये ममता, अभिमान और दम्भ त्यागकर सदा श्रीजानकीवल्लभका ही भजन करना चाहिये।

सुनि भुसुंडि के बचन सुहाए। हरषित खगपति पंख फुलाए॥नयन नीर मन अति हरषाना। श्रीरघुपति प्रताप उर आना॥

भुशुण्डिजीके ये मधुर वचन सुनकर पक्षिराज गरुड़ हर्षसे पुलकित हो उठे, उनके पंख फूल गये। नेत्रोंमें प्रेमाश्रु भर आये और मनमें श्रीरघुनाथजीका प्रताप स्मरण होते ही अपार आनन्दकी लहर दौड़ गयी।

पाछिल मोह समुझि पछिताना। ब्रह्म अनादि मनुज करि माना॥पुनि पुनि काग चरन सिरु नावा। जानि राम सम प्रेम बढ़ावा॥

गरुड़जीको अपना पूर्व मोह याद आया और वे पछताने लगे कि उन्होंने अनादि ब्रह्मको साधारण मनुष्य मान लिया था। उन्होंने बार-बार सिर झुकाकर काकभुशुण्डिजीके चरण छुए और उन्हें साक्षात् श्रीरामके समान जानकर उनके प्रति अपना प्रेम और बढ़ा लिया।

गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई॥संसय सर्प ग्रसेउ मोहि ताता। दुखद लहरि कुतर्क बहु ब्राता॥

गुरुकी शरण लिये बिना कोई भी भवसागर पार नहीं कर सकता, चाहे वह ब्रह्मा या शिवके समान ही सामर्थ्यवान् क्यों न हो। गरुड़जी बोले—हे तात! मुझे सन्देहरूपी सर्पने ऐसा डस लिया था कि भाँति-भाँतिके कुतर्कोंकी दुःखदायी लहरें मेरे भीतर उठती रहती थीं।

तव सरूप गारुड़ि रघुनायक। मोहि जिआयउ जन सुखदायक॥तव प्रसाद मम मोह नसाना। राम रहस्य अनूपम जाना॥

आपके ही स्वरूपरूपी गारुड़ी-मंत्रने, जो भक्तोंको सुख देनेवाला है, मुझ श्रीरघुनाथजीके सेवकको फिरसे जीवन दे दिया। आपकी कृपासे मेरा वह मोह मिट गया और मैंने श्रीरामके अनुपम रहस्यको पहचान लिया।

दोहा

ताहि प्रसंसि बिबिध बिधि सीस नाइ कर जोरि।बचन बिनीत सप्रेम मृदु बोलेउ गरुड़ बहोरि९३(क)

इस प्रकार भुशुण्डिजीकी बारम्बार प्रशंसा करके, सिर झुकाकर और हाथ जोड़कर गरुड़जी फिर बड़े ही विनम्र और प्रेमभीने कोमल स्वरमें बोले।

दोहा

प्रभु अपने अबिबेक ते बूझउँ स्वामी तोहि।कृपासिंधु सादर कहहु जानि दास निज मोहि९३(ख)

हे प्रभो, हे स्वामी! मैं अपनी नासमझीके कारण ही आपसे यह पूछ रहा हूँ। हे कृपासागर! मुझे अपना ही सेवक जानकर आदरपूर्वक मेरी जिज्ञासाका समाधान कीजिये।

तुम्ह सर्बग्य तन्य तम पारा। सुमति सुसील सरल आचारा॥ग्यान बिरति बिग्यान निवासा। रघुनायक के तुम्ह प्रिय दासा॥

आप सर्वज्ञ हैं, तत्त्वके पूर्ण ज्ञाता हैं, माया-मोहसे परे हैं, उत्तम बुद्धि और सरल स्वभावके धनी हैं। ज्ञान, वैराग्य और विज्ञान आपमें साक्षात् बसते हैं, और आप स्वयं श्रीरघुनाथजीके परम प्रिय दास हैं।

कारन कवन देह यह पाई। तात सकल मोहि कहहु बुझाई॥राम चरित सर सुंदर स्वामी। पायहु कहाँ कहहु नभगामी॥

फिर भी हे तात! यह बतलाइये कि आपने यह काकका शरीर किस कारणसे पाया। और हे आकाशगामी स्वामी! यह सुन्दर रामकथा आपने कहाँसे और कैसे प्राप्त की, वह भी मुझे सुनाइये।

नाथ सुना मैं अस सिव पाहीं। महा प्रलयहुँ नास तव नाहीं॥मुधा बचन नहिं ईस्वर कहई। सोऊ मोरें मन संसय अहई॥

हे नाथ! मैंने स्वयं शिवजीसे यह सुना है कि महाप्रलयमें भी आपका नाश नहीं होता, और ईश्वर कभी झूठ नहीं बोलते—फिर भी मेरे मनमें एक सन्देह बना हुआ है।

अग जग जीव नाग नर देवा। नाथ सकल जगु काल कलेवा॥अंड कटाह अमित लय कारी। कालु सदा दुरतिक्रम भारी॥

क्योंकि हे नाथ! समस्त चराचर जीव—नाग, मनुष्य, देवता—और यह सम्पूर्ण जगत् कालका ग्रास बन जाता है। असंख्य ब्रह्माण्डोंको लील जानेवाला वह काल सदा अत्यन्त प्रबल और अजेय माना जाता है।

सोरठा

तुम्हहि न ब्यापत काल अति कराल कारन कवन।मोहि सो कहहु कृपाल ग्यान प्रभाव कि जोग बल९४(क)

फिर वही अत्यन्त भयंकर काल आपपर कोई प्रभाव क्यों नहीं डालता? हे कृपालु! मुझे बतलाइये—क्या यह आपके ज्ञानका प्रताप है या योगबलका चमत्कार?

दोहा

प्रभु तव आश्रम आएँ मोर मोह भ्रम भाग।कारन कवन सो नाथ सब कहहु सहित अनुराग९४(ख)

और हे प्रभो! एक और बात—आपके आश्रममें आते ही मेरा सारा मोह और भ्रम क्षणभरमें कैसे भाग गया? हे नाथ! यह सब भी प्रेमपूर्वक मुझे विस्तारसे समझाइये।

गरुड़ गिरा सुनि हरषेउ कागा। बोलेउ उमा परम अनुरागा॥धन्य धन्य तव मति उरगारी। प्रस्न तुम्हारि मोहि अति प्यारी॥

हे उमा! गरुड़जीके ये वचन सुनकर काकभुशुण्डिजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और परम प्रेमसे बोले—हे सर्पशत्रु! तुम्हारी बुद्धि धन्य है, धन्य है! तुम्हारे ये प्रश्न मुझे बहुत ही भाये।

सुनि तव प्रस्न सप्रेम सुहाई। बहुत जनम के सुधि मोहि आई॥सब निज कथा कहउँ मैं गाई। तात सुनहु सादर मन लाई॥

तुम्हारे इन प्रेमभरे सुन्दर प्रश्नोंको सुनकर मुझे अपने अनेकों पूर्वजन्मोंकी स्मृति ताज़ा हो आयी है। अब मैं अपनी सम्पूर्ण कथा विस्तारसे कहता हूँ, हे तात! तुम आदरपूर्वक मन लगाकर सुनो।

जप तप मख सम दम ब्रत दाना। बिरति बिबेक जोग बिग्याना॥सब कर फल रघुपति पद प्रेमा। तेहि बिनु कोउ न पावइ छेमा॥

जप, तप, यज्ञ, संयम, व्रत, दान, वैराग्य, विवेक, योग और विज्ञान—इन सब साधनाओंका अन्तिम फल एक ही है: श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें सच्चा प्रेम जाग उठे। इसके बिना किसी भी साधनसे सच्चा कल्याण सम्भव नहीं।

एहि तन राम भगति मैं पाई। ताते मोहि ममता अधिकाई॥जेहि तें कछु निज स्वारथ होई। तेहि पर ममता कर सब कोई॥

इसी शरीरसे मुझे श्रीरामकी भक्ति प्राप्त हुई, इसीलिये मुझे इस देहसे इतना अधिक स्नेह है। यह स्वाभाविक भी है—जिस वस्तुसे हमारा कोई सच्चा प्रयोजन सिद्ध होता है, उसीसे सबका मन बँध जाता है।

सोरठा

पन्नगारि असि नीति श्रुति संमत सज्जन कहहिं।अति नीचहु सन प्रीति करिअ जानि निज परम हित९५(क)

हे गरुड़! वेदोंने भी यही नीति मानी है और सज्जन भी यही कहते हैं कि अपने परम हितको समझकर अत्यन्त तुच्छ वस्तुसे भी प्रेम रखना चाहिये।

सोरठा

पाट कीट तें होइ तेहि तें पाटंबर रुचिर।कृमि पालइ सबु कोइ परम अपावन प्रान सम९५(ख)

देखो न, रेशमका सुन्दर वस्त्र आखिर एक तुच्छ कीड़ेसे ही तो बनता है, फिर भी उस अपावन कीड़ेको हर कोई अपने प्राणोंके समान सँभालकर पालता है।

स्वारथ साँच जीव कहुँ एहा। मन क्रम बचन राम पद नेहा॥सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा। जो तनु पाइ भजिअ रघुबीरा॥

जीवका सच्चा स्वार्थ बस इतना ही है कि उसका मन, वचन और कर्म सदा श्रीरामके चरणोंमें रमा रहे। वही शरीर वास्तवमें पवित्र और सुन्दर है, जिसे पाकर श्रीरघुवीरका भजन किया जाय।

राम बिमुख लहि बिधि सम देही। कबि कोबिद न प्रसंसहिं तेही॥राम भगति एहिं तन उर जामी। ताते मोहि परम प्रिय स्वामी॥

श्रीरामसे विमुख व्यक्ति चाहे ब्रह्माके समान भी दिव्य शरीर पा जाय, तो भी विद्वान् और कवि उसकी प्रशंसा नहीं करते। इसी काकशरीरमें मेरे हृदयमें रामभक्तिका अंकुर फूटा, इसीलिये हे स्वामी! यह देह मुझे अत्यन्त प्रिय है।

तजउँ न तन निज इच्छा मरना। तन बिनु बेद भजन नहिं बरना॥प्रथम मोहँ मोहि बहुत बिगोवा। राम बिमुख सुख कबहुँ न सोवा॥

मैं इस शरीरको अपनी इच्छासे मरना होते हुए भी नहीं छोड़ता, क्योंकि शास्त्रोंने स्पष्ट कहा है कि देहके बिना भजन सम्भव ही नहीं। इससे पहले, मोहके वशीभूत होकर मेरी बड़ी दुर्गति हुई थी और श्रीरामसे विमुख रहकर मुझे कभी चैनकी नींद नहीं आयी।

नाना जनम कर्म पुनि नाना। किए जोग जप तप मख दाना॥कवन जोनि जनमेउँ जहँ नाहीं। मैं खगेस भ्रमि भ्रमि जग माहीं॥

अनेकानेक जन्मोंमें मैंने भाँति-भाँतिके योग, जप, तप, यज्ञ और दान आदि साधन किये। हे गरुड़! ऐसी कोई योनि नहीं बची जिसमें मैंने बार-बार भटककर जन्म न लिया हो।

देखेउँ करि सब करम गोसाई। सुखी न भयउँ अबहिं की नाई॥सुधि मोहि नाथ जन्म बहु केरी। सिव प्रसाद मति मोहँ न घेरी॥

हर तरहके कर्म करके देख लिये, पर जितना सुख अब इस जन्ममें मिला उतना पहले कभी नहीं मिला। हे नाथ! मुझे अपने अनेक पूर्वजन्मोंकी स्मृति बनी रहती है, क्योंकि शिवजीकी कृपासे मेरी बुद्धिको कभी मोहने घेर नहीं पाया।

दोहा

प्रथम जन्म के चरित अब कहउँ सुनहु बिहगेस।सुनि प्रभु पद रति उपजइ जातें मिटहिं कलेस९६(क)

अब मैं अपने प्रथम जन्मकी कथा सुनाता हूँ, हे पक्षिराज! इसे सुनकर प्रभुके चरणोंमें ऐसी प्रीति उपजती है जिससे सारे क्लेश मिट जाते हैं।

दोहा

पूरुब कल्प एक प्रभु जुग कलिजुग मल मूल।नर अरु नारि अधर्म रत सकल निगम प्रतिकूल९६(ख)

हे प्रभो! एक पूर्वकल्पमें ऐसा कलियुग था जो समस्त पापोंका मूल था, जिसमें सभी स्त्री-पुरुष अधर्ममें रत और वेदके सर्वथा विरोधी हो चुके थे।

तेहि कलिजुग कोसलपुर जाई। जन्मत भय सूद्र तनु पाई॥सिव सेवक मन क्रम अरु बानी। आन देव निंदक अभिमानी॥

उसी कलियुगमें मैं अयोध्यापुरीमें शूद्रके शरीरमें जन्मा। मन, वचन और कर्मसे शिवजीका सेवक तो था, पर साथ ही दूसरे देवताओंकी निन्दा करनेवाला घमण्डी भी था।

धन मद मत्त परम बाचाला। उग्रबुद्धि उर दंभ बिसाला॥जदपि रहेउँ रघुपति रजधानी। तदपि न कछु महिमा तब जानी॥

धनके नशेमें चूर, अत्यन्त बकवादी और उग्रबुद्धि—मेरे हृदयमें बड़ा भारी दम्भ भरा था। श्रीरघुनाथजीकी ही राजधानीमें रहते हुए भी उस समय मैंने उसकी महिमाको तनिक भी नहीं पहचाना।

अब जाना मैं अवध प्रभावा। निगमागम पुरान अस गावा॥कवनेहुँ जन्म अवध बस जोई। राम परायन सो परि होई॥

अब जाकर मैंने अयोध्याका सच्चा प्रभाव समझा है। वेद, शास्त्र और पुराण सभी यही गाते हैं कि जो कोई भी किसी भी जन्ममें अयोध्यामें निवास करता है, वह अन्ततः अवश्य ही श्रीरामका भक्त बन जाता है।

अवध प्रभाव जान तब प्रानी। जब उर बसहिं रामु धनुपानी॥सो कलिकाल कठिन उरगारी। पाप परायन सब नर नारी॥

पर अयोध्याका यह प्रभाव जीवको तभी अनुभव होता है जब धनुर्धारी श्रीराम स्वयं उसके हृदयमें बस जायँ। हे गरुड़! वह कलिकाल अत्यन्त कठोर था, जिसमें सभी नर-नारी पापमें ही डूबे रहते थे।

दोहा

कलिमल ग्रसे धर्म सब लुप्त भए सदग्रंथ।दंभिन्ह निज मति कल्पि करि प्रगट किए बहु पंथ९७(क)

कलियुगके पापोंने सारे धर्मको निगल लिया, सद्ग्रन्थ लुप्तप्राय हो गये, और पाखण्डियोंने अपनी मनमानी कल्पनाओंसे अनेकों नये-नये पंथ खड़े कर दिये।

दोहा

भए लोग सब मोहबस लोभ ग्रसे सुभ कर्म।सुनु हरिजान ग्यान निधि कहउँ कछुक कलिधर्म९७(ख)

सब लोग मोहके अंधकारमें डूब गये, लोभने शुभ कर्मोंको निगल लिया। हे ज्ञानभण्डार, हे हरिवाहन! अब सुनिये, मैं कलियुगके कुछ और लक्षण बतलाता हूँ।

बरन धर्म नहिं आश्रम चारी। श्रुति बिरोध रत सब नर नारी॥द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन। कोउ नहिं मान निगम अनुसासन॥

कलियुगमें न वर्णधर्म शेष रहता है, न चारों आश्रम। स्त्री-पुरुष सभी वेदके विरोधमें उतर आते हैं, ब्राह्मण वेदको बेचनेवाले और राजा प्रजाका शोषण करनेवाले हो जाते हैं—वेदकी आज्ञा माननेवाला कोई नहीं बचता।

मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा॥मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहुँ संत कह सब कोई॥

जिसे जो अच्छा लगे, वही उसके लिये सच्चा मार्ग बन जाता है; जो केवल डींगें हाँकना जानता है, वही पण्डित कहलाता है। जो झूठा आडम्बर और पाखण्ड रचता है, उसीको सब लोग संत मानने लगते हैं।

सोइ सयान जो परधन हारी। जो कर दंभ सो बड़ आचारी॥जो कह झूँठ मसखरी जाना। कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना॥

जो किसी तरह दूसरेका धन हड़प ले, वही चतुर समझा जाता है; जो पाखण्ड करे, वही बड़ा आचारवान् माना जाता है। जो झूठ बोलना और मज़ाक उड़ाना जानता है, कलियुगमें उसीको गुणवान् कहा जाता है।

निराचार जो श्रुति पथ त्यागी। कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी॥जाकें नख अरु जटा बिसाला। सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला॥

जो आचारहीन है और वेदमार्गको त्याग चुका है, कलियुगमें वही ज्ञानी और वही वैरागी माना जाता है। जिसके नाखून बढ़े हुए और जटाएँ लम्बी हों, वही उस युगमें प्रसिद्ध तपस्वी बन बैठता है।

दोहा

असुभ बेष भूषन धरें भच्छाभच्छ जे खाहिं।तेइ जोगी तेइ सिद्ध नर पूज्य ते कलिजुग माहिं९८(क)

जो अशुभ वेष-भूषा धारण करते हैं और खाने-न खाने योग्यका कोई भेद किये बिना सब कुछ खा लेते हैं, कलियुगमें वे ही योगी, वे ही सिद्ध और वे ही पूज्य पुरुष माने जाते हैं।

सोरठा

जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ।मन क्रम बचन लबार तेइ बकता कलिकाल महुँ९८(ख)

जिनका आचरण ही दूसरोंका अहित करनेवाला हो, उन्हींका गौरव होता है और वे ही आदरके पात्र बनते हैं। मन, वचन, कर्मसे झूठ बोलनेवाले ही कलिकालमें बड़े वक्ता माने जाते हैं।

नारि बिबस नर सकल गोसाई। नाचहिं नट मर्कट की नाई॥सूद्र द्विजन्ह उपदेसहिं ग्याना। मेलि जनेऊ लेहिं कुदाना॥

हे गोसाईं! सभी पुरुष स्त्रियोंके पूर्ण वशमें होकर मदारीके बंदरकी तरह नाचते हैं। शूद्र ब्राह्मणोंको ज्ञानका उपदेश देने लगते हैं और गलेमें जनेऊ डालकर नीच दान तक ग्रहण करने लगते हैं।

सब नर काम लोभ रत क्रोधी। देव बिप्र श्रुति संत बिरोधी॥गुन मंदिर सुंदर पति त्यागी। भजहिं नारि पर पुरुष अभागी॥

सभी पुरुष काम, लोभ और क्रोधमें डूबे रहते हैं तथा देवता, ब्राह्मण, वेद और संतोंसे बैर रखते हैं। अभागी स्त्रियाँ गुणवान् और सुन्दर पतिको त्यागकर पराये पुरुषका सेवन करने लगती हैं।

सौभागिनीं बिभूषन हीना। बिधवन्ह के सिंगार नबीना॥गुर सिष बधिर अंध का लेखा। एक न सुनइ एक नहिं देखा॥

सुहागिनें आभूषणहीन रहती हैं, जबकि विधवाएँ नित नये शृंगार सजाती हैं। गुरु और शिष्यके बीच बहरे और अंधेका-सा सम्बन्ध रह जाता है—एक उपदेश सुनता नहीं, दूसरा उसे सच्ची दृष्टि देता नहीं।

हरइ सिष्य धन सोक न हरई। सो गुर घोर नरक महुँ परई॥मातु पिता बालकन्हि बोलाबहिं। उदर भरे सोइ धर्म सिखावहिं॥

जो गुरु शिष्यका धन तो हर लेता है पर उसका दुःख नहीं हरता, वह घोर नरकमें गिरता है। माता-पिता भी बच्चोंको वही धर्म सिखाते हैं जिससे बस उनका पेट भर जाय।

दोहा

ब्रह्म ग्यान बिनु नारि नर कहहिं न दूसरि बात।कौड़ी लागि लोभ बस करहिं बिप्र गुर घात९९(क)

स्त्री-पुरुष ब्रह्मज्ञानकी बड़ी-बड़ी बातें ही करते रहते हैं, पर लोभवश एक कौड़ीके लिये भी ब्राह्मण और गुरुकी हत्या करनेसे नहीं चूकते।

दोहा

बादहिं सूद्र द्विजन्ह सन हम तुम्ह ते कछु घाटि।जानइ ब्रह्म सो बिप्रबर आँखि देखावहिं डाटि९९(ख)

शूद्र ब्राह्मणोंसे विवाद करके कहते हैं—हम तुमसे किस बातमें कम हैं? जो ब्रह्मको जान ले वही असली ब्राह्मण है—यों कहकर वे उन्हें आँखें दिखाकर डाँटने लगते हैं।

पर त्रिय लंपट कपट सयाने। मोह द्रोह ममता लपटाने॥तेइ अभेदबादी ग्यानी नर। देखा मैं चरित्र कलिजुग कर॥

परायी स्त्रीमें आसक्त, छल-कपटमें निपुण, मोह-द्रोह-ममतामें उलझे हुए लोग ही स्वयंको ब्रह्म और जीवको एक बतानेवाला ज्ञानी घोषित करते हैं। मैंने उस कलियुगका यही स्वरूप प्रत्यक्ष देखा।

आपु गए अरु तिन्हहू घालहिं। जे कहुँ सत मारग प्रतिपालहिं॥कल्प कल्प भरि एक एक नरका। परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका॥

ऐसे लोग स्वयं तो नष्ट होते ही हैं, साथ ही जो सन्मार्गपर चलते हैं उन्हें भी भ्रष्ट कर देते हैं। जो कुतर्कोंसे वेदकी निन्दा करते हैं, वे युगों-युगों तक नरकमें पड़े रहते हैं।

जे बरनाधम तेलि कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा॥नारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं सन्यासी॥

तेली, कुम्हार, चाण्डाल, भील, कोल, कलवार जैसे नीची जातिके लोग भी पत्नीकी मृत्यु या घर-सम्पत्तिके नाशपर सिर मुँड़ाकर संन्यासी बन बैठते हैं।

ते बिप्रन्ह सन आपु पुजावहिं। उभय लोक निज हाथ नसावहिं॥बिप्र निरच्छर लोलुप कामी। निराचार सठ बृषली स्वामी॥

वे स्वयं ब्राह्मणोंसे भी अपनी पूजा करवाने लगते हैं और अपने ही हाथों दोनों लोक बिगाड़ लेते हैं। इधर ब्राह्मण भी अपढ़, लोभी, विषयी, आचारहीन, मूर्ख और नीच स्त्रियोंके अधीन हो जाते हैं।

सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना। बैठि बरासन कहहिं पुराना॥सब नर कल्पित करहिं अचारा। जाइ न बरनि अनीति अपारा॥

शूद्र जप-तप-व्रत आदि करने लगते हैं और ऊँचे आसनपर बैठकर पुराण बाँचने लगते हैं। सब लोग मनमाना आचरण करते हैं—उस अपार अनीतिका वर्णन करना भी सम्भव नहीं।

दोहा

भए बरन संकर कलि भिन्नसेतु सब लोग।करहिं पाप पावहिं दुख भय रुज सोक बियोग१००(क)

कलियुगमें सब लोग वर्णसंकर होकर मर्यादासे गिर गये हैं। पाप करते हैं, और उसके बदलेमें दुःख, भय, रोग, शोक और प्रियजनोंका वियोग ही पाते हैं।

दोहा

श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत बिरति बिबेक।तेहि न चलहिं नर मोह बस कल्पहिं पंथ अनेक१००(ख)

वेदसम्मत, वैराग्य और विवेकसे भरा हुआ जो हरिभक्तिका सीधा मार्ग है, उसपर मोहवश कोई नहीं चलता—लोग इसके बदले अपनी मनमानी कल्पनासे नये-नये पंथ रचते रहते हैं।

छंद

बहु दाम सँवारहिं धाम जती। बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती॥तपसी धनवंत दरिद्र गृही। कलि कौतुक तात न जात कही॥

संन्यासी बड़ा धन लगाकर आलीशान मठ बनवाते हैं, उनका वैराग्य विषय-भोगोंने निगल लिया है। तपस्वी धनी बन गये और गृहस्थ दरिद्र हो गये—हे तात! कलियुगकी यह विचित्र लीला कही ही नहीं जा सकती।

कुलवंति निकारहिं नारि सती। गृह आनिहिं चेरी निबेरि गती॥सुत मानहिं मातु पिता तब लौं। अबलानन दीख नहीं जब लौं॥

कुलीन और पतिव्रता स्त्रीको घरसे निकाल दिया जाता है और उसकी जगह दासीको ला बिठाया जाता है। पुत्र माता-पिताको तभीतक मानते हैं जबतक उनकी पत्नीका मुख नहीं देख लेते।

ससुरारि पिआरि लगी जब तें। रिपरूप कुटुंब भए तब तें॥नृप पाप परायन धर्म नहीं। करि दंड बिडंब प्रजा नितहीं॥

जबसे ससुरालवाले प्यारे लगने लगे, तबसे सगे कुटुम्बी ही शत्रु बन गये। राजा भी पापमें डूबे रहते हैं, उनमें धर्म नहीं बचा—वे बेकसूर प्रजाको भी नित्य दण्ड देकर सताते रहते हैं।

धनवंत कुलीन मलीन अपी। द्विज चिन्ह जनेउ उघार तपी॥नहिं मान पुरान न बेदहि जो। हरि सेवक संत सही कलि सो॥

नीच कुलका भी धनी व्यक्ति कुलीन गिना जाने लगता है। ब्राह्मणत्वका चिह्न केवल जनेऊ भरका रह गया है और नंगे बदन घूमना ही तपस्वीपन बन गया है। जो वेद-पुराणको मानते ही नहीं, कलियुगमें वही हरिभक्त और सच्चे संत कहलाते हैं।

कबि बृंद उदार दुनी न सुनी। गुन दूषक ब्रात न कोपि गुनी॥कलि बारहिं बार दुकाल परै। बिनु अन्न दुखी सब लोग मरै॥

कवियोंकी भीड़ तो बहुत हो गयी, पर उन्हें सराहनेवाला उदार आश्रयदाता कहीं सुनायी नहीं देता। गुणोंमें दोष निकालनेवाले असंख्य हैं, पर सचमुच गुणी कोई नहीं। कलियुगमें बार-बार अकाल पड़ते हैं और अन्नके अभावमें लोग तड़पकर मरते हैं।

दोहा

सुनु खगेस कलि कपट हठ दंभ द्वेष पाषंड।मान मोह मारादि मद ब्यापि रहे ब्रह्मंड१०१(क)

हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिये, कलियुगमें कपट, हठ, दम्भ, द्वेष, पाखण्ड, मान, मोह, कामादि और मद पूरे ब्रह्माण्डमें व्याप्त हो जाते हैं।

दोहा

तामस धर्म करहिं नर जप तप ब्रत मख दान।देव न बरषहिं धरनी बए न जामहिं धान१०१(ख)

मनुष्य जप, तप, यज्ञ, व्रत और दान जैसे धर्म भी तामसी भावसे करने लगते हैं। फलस्वरूप वर्षा नहीं होती और बोया हुआ अन्न भी धरतीसे उगता नहीं।

छंद

अबला कच भूषन भूरि छुधा। धनहीन दुखी ममता बहुधा॥सुख चाहहिं मूढ़ न धर्म रता। मति थोरि कठोरि न कोमलता॥

स्त्रियोंके पास आभूषण नहीं बचते, बस उनके बाल ही उनका शृंगार रह जाते हैं, और उन्हें भूख अतृप्त-सी सताती रहती है। धनहीनता और तरह-तरहकी ममता उन्हें दुखी रखती है। वे मूर्ख सुख तो चाहती हैं पर धर्ममें उनका मन नहीं लगता—बुद्धि छोटी और कठोर होती है, कोमलता कहीं शेष नहीं रहती।

नर पीड़ित रोग न भोग कहीं। अभिमान बिरोध अकारनहीं॥लघु जीवन संबतु पंच दसा। कलपांत न नास गुमानु असा॥

मनुष्य रोगोंसे पीड़ित रहते हैं, कहीं सच्चा सुख नहीं मिलता, फिर भी बिना किसी कारण अभिमान और झगड़ा करते रहते हैं। जीवन बस दस-पाँच वर्षका है, पर घमण्ड इतना कि मानो प्रलयमें भी उनका नाश नहीं होगा।

कलिकाल बिहाल किए मनुजा। नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा॥नहिं तोष बिचार न सीतलता। सब जाति कुजाति भए मगता॥

कलिकालने मनुष्योंको पूरी तरह बदहाल कर डाला है—कोई अपनी बहन-बेटीका भी लिहाज़ नहीं करता। न संतोष बचा, न विवेक, न कोमलता—ऊँच-नीच सभी जातिके लोग भिखारी बनकर रह गये हैं।

इरिषा परुषाच्छर लोलुपता। भरि पूरि रही समता बिगता॥सब लोग बियोग बिसोक हुए। बरनाश्रम धर्म अचार गए॥

ईर्ष्या, कड़वे वचन और लालच चारों ओर छाये हुए हैं, समताका नामोनिशान मिट गया है। सब लोग बिछोह और शोकसे भरे हैं, वर्णाश्रम-धर्मका आचरण पूरी तरह लुप्त हो गया है।

दम दान दया नहिं जानपनी। जड़ता परबंचनताति घनी॥तनु पोषक नारि नरा सगरे। परनिंदक जे जग मो बगरे॥

इन्द्रिय-संयम, दान, दया और समझदारी—इनका कहीं पता नहीं। मूर्खता और छल-प्रपंच बुरी तरह फैल गये हैं। सब लोग बस अपने शरीरके पालन-पोषणमें ही लगे रहते हैं, और जो दूसरोंकी निन्दा करते हैं, संसारमें वे ही सबसे अधिक फैले नज़र आते हैं।

दोहा

सुनु ब्यालारि काल कलि मल अवगुन आगार।गुनउँ बहुत कलिजुग कर बिनु प्रयास निस्तार१०२(क)

हे सर्पशत्रु गरुड़! सुनिये, कलिकाल पाप और अवगुणोंका घर तो है, पर उसमें एक बड़ा गुण भी है—इसमें बिना किसी विशेष परिश्रमके ही भवबन्धनसे मुक्ति मिल जाती है।

दोहा

कृतजुग त्रेता द्वापर पूजा मख अरु जोग।जो गति होइ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग१०२(ख)

सत्ययुग, त्रेता और द्वापरमें पूजा, यज्ञ और योगके द्वारा जो गति प्राप्त होती है, कलियुगमें वही गति लोग केवल भगवान्का नाम लेकर पा लेते हैं।

कृतजुग सब जोगी बिग्यानी। करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी॥त्रेताँ बिबिध जग्य नर करहीं। प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं॥

सत्ययुगमें सब लोग योगी और ज्ञानी होते हैं, वे केवल हरि-ध्यानसे ही भवसागर पार कर लेते हैं। त्रेतामें लोग विविध यज्ञ करते हैं और अपने सारे कर्म प्रभुको समर्पित करके तर जाते हैं।

द्वापर करि रघुपति पद पूजा। नर भव तरहिं उपाय न दूजा॥कलिजुग केवल हरि गुन गाहा। गावत नर पावहिं भव थाहा॥

द्वापरमें श्रीरघुनाथजीके चरणोंकी पूजा करके ही मनुष्य पार होते हैं, कोई दूसरा उपाय नहीं बचता। पर कलियुगमें तो केवल श्रीहरिकी गुणगाथा गा लेनेभरसे मनुष्य भवसागरकी थाह पा जाता है।

कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना। एक अधार राम गुन गाना॥सब भरोस तजि जो भज रामहि। प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि॥

कलियुगमें न योग काम आता है, न यज्ञ, न ज्ञान—श्रीरामके गुणगानका ही एकमात्र सहारा रह जाता है। इसलिये जो सब भरोसे छोड़कर श्रीरामको भजता है और प्रेमपूर्वक उनके गुणसमूह गाता है,

सोइ भव तर कछु संसय नाहीं। नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं॥कलि कर एक पुनीत प्रतापा। मानस पुन्य होहिं नहिं पापा॥

वही निश्चित रूपसे भवसागरसे पार हो जाता है, इसमें रत्तीभर भी सन्देह नहीं। नामका यह प्रताप कलियुगमें साफ दिखायी देता है। कलियुगका एक पावन प्रताप यह भी है कि यहाँ मनमें पुण्य तो बन जाते हैं, पर मनके पाप उतने बाध्यकारी नहीं होते।

दोहा

कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास।गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास१०३(क)

यदि मनुष्य श्रद्धा रखे तो कलियुगके समान कोई अन्य युग सुगम नहीं—क्योंकि इसी युगमें श्रीरामके निर्मल गुण गाते-गाते मनुष्य बिना किसी परिश्रमके ही संसार-सागरसे पार हो जाता है।

दोहा

प्रगट चारि पद धर्म के कलि महुँ एक प्रधान।जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान१०३(ख)

धर्मके प्रसिद्ध चार चरण हैं—सत्य, दया, तप और दान—पर कलियुगमें इनमें केवल दान ही प्रधान रह जाता है। चाहे जिस भी विधिसे दिया जाय, दान सदा कल्याण ही करता है।

नित जुग धर्म होहिं सब केरे। हृदयँ राम माया के प्रेरे॥सुद्ध सत्व समता बिग्याना। कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना॥

श्रीरामकी मायाकी ही प्रेरणासे सबके हृदयमें सभी युगोंके धर्म बने रहते हैं। शुद्ध सत्त्वगुण, समता, विवेक और मनकी प्रसन्नता—इसे सत्ययुगका प्रभाव समझना चाहिये।

सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा। सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा॥बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस। द्वापर धर्म हरष भय मानस॥

अधिक सत्त्वगुण, कुछ रजोगुण, कर्ममें रुचि और चहुँओर सुख—यह त्रेताका धर्म है। रजोगुणकी अधिकता, सत्त्वगुणकी न्यूनता, कुछ तमोगुण, और मनमें हर्ष-भयका मिश्रण—यह द्वापरका धर्म है।

तामस बहुत रजोगुन थोरा। कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा॥बुध जुग धर्म जानि मन माहीं। तजि अधर्म रति धर्म कराहीं॥

तमोगुणकी अधिकता, रजोगुणकी न्यूनता और चारों ओर वैर-विरोध—यही कलियुगका प्रभाव है। पर बुद्धिमान् लोग युगधर्मको भलीभाँति पहचानकर अधर्मको त्यागकर धर्ममें ही अपनी प्रीति लगाते हैं।

काल धर्म नहिं ब्यापहिं ताही। रघुपति चरन प्रीति अति जाही॥नट कृत बिकट कपट खगराया। नट सेवकहि न ब्यापइ माया॥

जिसका श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें गहरा प्रेम है, उसे युगधर्मका प्रभाव छू भी नहीं पाता। हे पक्षिराज! जैसे बाजीगरका किया इन्द्रजाल देखनेवालोंके लिये अत्यन्त विकट लगता है, पर उसीके सहायकको उसकी माया छल नहीं पाती, वैसे ही भगवद्भक्तको संसारकी माया नहीं छलती।

दोहा

हरि माया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहिं।भजिअ राम तजि काम सब अस बिचारि मन माहिं१०४(क)

श्रीहरिकी मायासे उत्पन्न सारे दोष और गुण उनके भजनके बिना कभी दूर नहीं होते। यह मनमें विचारकर सारी कामनाएँ त्यागकर निष्कामभावसे श्रीरामका ही भजन करना चाहिये।

दोहा

तेहि कलिकाल बरष बहु बसेउँ अवध बिहगेस।परेउ दुकाल बिपति बस तब मैं गयउँ बिदेस१०४(ख)

हे पक्षिराज! उसी कलिकालमें मैं बहुत वर्षोंतक अयोध्यामें रहा। एक बार वहाँ भयंकर अकाल पड़ा, तो विपत्तिका मारा मैं परदेस चला गया।

गयउँ उजेनी सुनु उरगारी। दीन मलीन दरिद्र दुखारी॥गए काल कछु संपति पाई। तहँ पुनि करउँ संभु सेवकाई॥

हे सर्पशत्रु! मैं दीन, उदास, दरिद्र और दुखी होकर उज्जैन पहुँचा। कुछ समय बाद जब थोड़ी सम्पत्ति जुट गयी, तो वहीं मैं फिर शिवजीकी सेवामें लग गया।

बिप्र एक बैदिक सिव पूजा। करइ सदा तेहि काजु न दूजा॥परम साधु परमारथ बिंदक। संभु उपासक नहिं हरि निंदक॥

वहाँ एक विद्वान् ब्राह्मण नित्य वेदविधिसे शिवजीकी आराधना करते थे, उन्हें और कोई काम न था। वे परम साधु, परमार्थके ज्ञाता और शिवके भक्त तो थे, पर श्रीहरिकी कभी निन्दा नहीं करते थे।

तेहि सेवउँ मैं कपट समेता। द्विज दयाल अति नीति निकेता॥बाहिज नम्र देखि मोहि साईं। बिप्र पढ़ाव पुत्र की नाईं॥

मैं भीतरसे कपट रखते हुए भी उनकी सेवा करता रहा। वे ब्राह्मण अत्यन्त दयालु और नीतिवान् थे। हे स्वामी! ऊपरसे नम्र देखकर वे मुझे अपने पुत्रकी तरह मानकर पढ़ाने लगे।

संभु मंत्र मोहि द्विजबर दीन्हा। सुभ उपदेस बिबिध बिधि कीन्हा॥जपउँ मंत्र सिव मंदिर जाई। हृदयँ दंभ अहमिति अधिकाई॥

उन श्रेष्ठ ब्राह्मणने मुझे शिवमन्त्र दिया और भाँति-भाँतिका शुभ उपदेश दिया। मैं शिवमन्दिर जाकर मन्त्र जपने लगा, पर मेरे हृदयमें दम्भ और अहंकार और बढ़ता गया।

दोहा

मैं खल मल संकुल मति नीच जाति बस मोह।हरि जन द्विज देखें जरउँ करउँ बिष्नु कर द्रोह१०५(क)

मैं दुष्ट, नीच जातिका और पापसे भरी मलिन बुद्धिवाला था—हरिभक्तों और ब्राह्मणोंको देखते ही मोहवश जल उठता और भगवान् विष्णुसे द्वेष करने लगता।

सोरठा

गुर नित मोहि प्रबोध दुखित देखि आचरन मम।मोहि उपजइ अति क्रोध दंभिहि नीति कि भावई१०५(ख)

गुरुजी मेरा आचरण देखकर दुखी होते और मुझे नित्य समझाते रहते, पर इसका उलटा असर होता—मुझे भारी क्रोध आ जाता। दम्भीको भला नीतिकी बात कब सुहाती है!

एक बार गुर लीन्ह बोलाई। मोहि नीति बहु भाँति सिखाई॥सिव सेवा कर फल सुत सोई। अबिरल भगति राम पद होई॥

एक दिन गुरुजीने मुझे बुलाकर बड़े स्नेहसे समझाया कि हे पुत्र! शिवजीकी सेवाका सच्चा फल तो यही है कि श्रीरामके चरणोंमें अटूट भक्ति बने।

रामहि भजहिं तात सिव धाता। नर पावँर कै केतिक बाता॥जासु चरन अज सिव अनुरागी। तासु द्रोहँ सुख चहसि अभागी॥

हे तात! स्वयं शिवजी और ब्रह्माजी तक श्रीरामको भजते हैं, तो नीच मनुष्यकी बिसात ही क्या! जिनके चरणोंके ब्रह्मा-शिव भी अनुरागी हैं, उनसे बैर बाँधकर तू, अभागे, सुख चाहता है?

हर कहुँ हरि सेवक गुर कहेऊ। सुनि खगनाथ हृदय मम दहेऊ॥अधम जाति मैं बिद्या पाएँ। भयउँ जथा अहि दूध पिआएँ॥

गुरुजीने जब शिवजीको भी हरिका सेवक बता दिया, तो हे पक्षिराज! यह सुनते ही मेरा हृदय जल उठा। नीच जातिका होकर भी विद्या पाकर मैं वैसा ही हो गया जैसे साँप दूध पिलानेसे और विषैला हो जाता है।

मानी कुटिल कुभाग्य कुजाती। गुर कर द्रोह करउँ दिनु राती॥अति दयाल गुर स्वल्प न क्रोधा। पुनि पुनि मोहि सिखाव सुबोधा॥

अभिमानी, कुटिल, दुर्भाग्यशाली और नीच जातिका मैं दिन-रात गुरुजीसे द्रोह करता रहा। पर वे अत्यन्त दयालु थे, उन्हें रत्तीभर भी क्रोध न आता—मेरे द्रोहके बावजूद वे बार-बार मुझे सद्बुद्धिकी ही शिक्षा देते रहते।

जेहि ते नीच बड़ाई पावा। सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा॥धूम अनल संभव सुनु भाई। तेहि बुझाव घन पदवी पाई॥

नीच व्यक्ति जिससे मान-सम्मान पाता है, अन्ततः उसीको मारकर नष्ट कर देता है। हे भाई! सुनो, जैसे आगसे उपजा धुआँ बादलका रूप पाकर उसी आगको बुझा देता है।

रज मग परी निरादर रहई। सब कर पद प्रहार नित सहई॥मरुत उड़ाव प्रथम तेहि भरई। पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई॥

धूल राहमें बेकद्र पड़ी रहती है और सबकी ठोकरें सहती है, पर जब हवा उसे उड़ाकर ऊँचा उठाती है, तो सबसे पहले वह उसी हवाको भर देती है और फिर राजाओंकी आँखों और मुकुटोंतक जा पहुँचती है।

सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा। बुध नहिं करहिं अधम कर संगा॥कबि कोबिद गावहिं असि नीती। खल सन कलह न भल नहिं प्रीती॥

हे पक्षिराज! इस बात को समझकर बुद्धिमान् लोग नीचका साथ कभी नहीं करते। कवि और विद्वान् यही नीति बताते हैं कि दुष्टसे न झगड़ा भला है, न प्रेम।

उदासीन नित रहिअ गोसाईं। खल परिहरिअ स्वान की नाईं॥मैं खल हृदयँ कपट कुटिलाई। गुर हित कहइ न मोहि सोहाई॥

हे गोसाईं! दुष्टसे सदा उदासीन ही रहना चाहिये, उसे कुत्तेकी तरह दूरसे ही छोड़ देना चाहिये। मैं भी दुष्ट था, मेरे हृदयमें कपट और कुटिलता भरी थी, इसीलिये गुरुजीकी हितकी बातें भी मुझे भाती नहीं थीं।

दोहा

एक बार हर मंदिर जपत रहेउँ सिव नाम।गुर आयउ अभिमान तें उठि नहिं कीन्ह प्रनाम१०६(क)

एक बार मैं शिवमन्दिरमें शिवनाम जप रहा था, तभी गुरुजी वहाँ आये—पर अभिमानके मारे मैंने उठकर उन्हें प्रणाम तक नहीं किया।

दोहा

सो दयाल नहिं कहेउ कछु उर न रोष लवलेस।अति अघ गुर अपमानता सहि नहिं सके महेस१०६(ख)

गुरुजी बड़े दयालु थे, उन्होंने कुछ नहीं कहा और उनके मनमें रत्तीभर भी रोष नहीं आया। पर गुरुका अपमान इतना बड़ा पाप है कि स्वयं महादेवजी भी इसे सहन नहीं कर सके।

मंदिर माझ भई नभ बानी। रे हतभाग्य अग्य अभिमानी॥जद्यपि तव गुर कें नहिं क्रोधा। अति कृपाल चित सम्यक बोधा॥

मन्दिरमें आकाशवाणी गूँज उठी—अरे हतभाग्य, मूर्ख, अभिमानी! यद्यपि तेरे गुरुको क्रोध नहीं आया, वे अत्यन्त कृपालु और पूर्ण ज्ञानसे सम्पन्न हैं,

तदपि साप सठ दैहउँ तोही। नीति बिरोध सोहाइ न मोही॥जौं नहिं दंड करौं खल तोरा। भ्रष्ट होइ श्रुतिमारग मोरा॥

फिर भी हे मूर्ख! मैं तुझे शाप दिये बिना नहीं रहूँगा, क्योंकि नीतिका उल्लंघन मुझे सह्य नहीं। अरे दुष्ट, यदि मैं तुझे दण्ड न दूँ तो मेरा अपना वेदमार्ग ही भ्रष्ट हो जायगा।

जे सठ गुर सन इरिषा करहीं। रौरव नरक कोटि जुग परहीं॥त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा। अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा॥

जो मूर्ख गुरुसे ईर्ष्या करते हैं, वे करोड़ों युगोंतक रौरव नरकमें पड़े रहते हैं। फिर वहाँसे निकलकर पशु-पक्षी योनियोंमें जन्म लेकर दस हज़ार जन्मोंतक कष्ट भोगते हैं।

बैठ रहेसि अजगर इव पापी। सर्प होहि खल मल मति ब्यापी॥महा बिटप कोटर महुँ जाई।। रहु अधमाधम अधगति पाई॥

अरे पापी! तू गुरुके सामने अजगरकी तरह निश्चेष्ट बैठा रहा—अब तेरी बुद्धि पापसे इतनी ढक चुकी है कि तू सर्प बनकर रह। और अरे अधमसे भी अधम! इस नीच योनिको पाकर किसी बड़े वृक्षके खोखलेमें जा बस।

दोहा

हाहाकार कीन्ह गुर दारुन सुनि सिव साप।कंपित मोहि बिलोकि अति उर उपजा परिताप१०७(क)

शिवजीका यह भयानक शाप सुनकर गुरुजी हाहाकार कर उठे। मुझे थर-थर काँपते देखकर उनके हृदयमें गहरा सन्ताप उमड़ आया।

दोहा

करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख कर जोरि।बिनय करत गदगद स्वर समुझि घोर गति मोरि१०७(ख)

वे ब्राह्मण प्रेमसहित दण्डवत् करके शिवजीके सामने हाथ जोड़े खड़े हो गये और मेरी भयंकर गतिका विचार करते हुए गद्गद स्वरमें विनती करने लगे—

श्लोक

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विंभुं ब्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं॥निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरींह। चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं॥

हे मोक्षस्वरूप, सर्वव्यापी, ब्रह्मस्वरूप, वेदस्वरूप ईशान! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। निजस्वरूपमें स्थित, निर्गुण, भेदरहित, इच्छारहित, चेतन-आकाशरूप और आकाशको ही वस्त्र बनाकर धारण करनेवाले आपको मैं भजता हूँ।

श्लोक

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं॥करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोऽहं॥

निराकार, ओंकारके मूल, तुरीय अवस्थारूप, वाणी-ज्ञान-इन्द्रियोंसे परे, कैलासपति, विकराल किन्तु महाकालके भी काल, कृपालु और गुणोंके धाम, संसारसे परे रहनेवाले आपको मैं नमन करता हूँ।

श्लोक

तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं॥स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा॥

हिमाचलके समान गौर और गम्भीर, जिनके शरीरमें करोड़ों कामदेवोंकी आभा है, जिनकी जटाओंमें सुन्दर गंगा लहरा रही है, ललाटपर द्वितीयाका चन्द्रमा और कण्ठमें सर्प सुशोभित है।

श्लोक

चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं॥मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥

जिनके कानोंमें कुण्डल हिलते हैं, सुन्दर भौंहें और विशाल नेत्र हैं, जो प्रसन्नमुख, नीलकण्ठ और दयालु हैं, सिंहचर्म पहने और मुण्डमाला धारण किये हैं—उन सर्वप्रिय, सबके स्वामी शंकरको मैं भजता हूँ।

श्लोक

प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं॥त्रयःशूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं॥

प्रचण्ड, श्रेष्ठ, तेजस्वी परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान, तीनों तापोंको जड़से मिटानेवाले, त्रिशूलधारी—भावसे ही जिन्हें पाया जा सकता है, उन भवानीपतिको मैं भजता हूँ।

श्लोक

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्जनान्ददाता पुरारी॥चिदानंदसंदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥

कलाओंसे परे, कल्याणस्वरूप, प्रलयकारी, सज्जनोंको सदा आनन्द देनेवाले, त्रिपुरारि, सच्चिदानन्दघन, मोहका नाश करनेवाले कामदेवके शत्रु—हे प्रभो! प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये।

श्लोक

न यावदुमानाथ पादारविन्दं। भजन्तीह लोके परे वा नराणां॥न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं॥

जबतक मनुष्य पार्वतीपति आपके चरणकमलोंकी भक्ति नहीं करता, तबतक न इस लोकमें और न परलोकमें उसे सुख-शान्ति मिलती है, न उसके तापोंका नाश होता है। इसलिये हे समस्त प्राणियोंमें बसनेवाले प्रभो! प्रसन्न होइये।

श्लोक

न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं॥जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो॥

न मुझे योग आता है, न जप, न पूजा—मैं तो सदा-सर्वदा बस आपको ही नमस्कार करता हूँ। हे शम्भो! जरा और जन्म-मृत्युके दुःखोंसे झुलसते हुए इस शरणागतकी रक्षा कीजिये, हे ईश!

श्लोक

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति

यह रुद्राष्टक शिवजीको प्रसन्न करनेके लिये किसी ब्राह्मणके द्वारा रचा गया है। जो मनुष्य इसे भक्तिपूर्वक पढ़ते हैं, उनपर स्वयं भगवान् शम्भु प्रसन्न होते हैं।

दोहा

सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि बिप्र अनुरागु।पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु१०८(क)

सर्वज्ञ शिवजीने उस ब्राह्मणकी विनती सुनी और उसका प्रेम देखा, तो मन्दिरमें फिर आकाशवाणी हुई—हे श्रेष्ठ द्विज! अब कोई वर माँग लो।

दोहा

जौं प्रसन्न प्रभु मो पर नाथ दीन पर नेहु।निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहु१०८(ख)

ब्राह्मणने कहा—हे प्रभो! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और इस दीनपर आपका स्नेह है, तो पहले अपने चरणोंकी भक्ति दीजिये, फिर दूसरा वर देनेकी बात कीजियेगा।

दोहा

तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भुलान।तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपा सिंधु भगवान१०८(ग)

हे प्रभो! यह अबोध जीव आपकी मायाके वशीभूत होकर सदा भटकता फिरता है। हे कृपासागर भगवान्! उसपर क्रोध मत कीजिये।

दोहा

संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल।साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल१०८(घ)

हे दीनदयालु शंकर! अब इसपर कृपा कीजिये, जिससे हे नाथ! शीघ्र ही इसे शापसे मुक्ति मिल जाय।

एहि कर होइ परम कल्याना। सोइ करहु अब कृपानिधाना॥बिप्रगिरा सुनि परहित सानी। एवमस्तु इति भइ नभबानी॥

इसका जिसमें परम कल्याण हो, हे कृपानिधान! अब वही कीजिये। ब्राह्मणकी परहित-भावसे भरी यह वाणी सुनकर पुनः आकाशवाणी हुई—एवमस्तु, ऐसा ही होगा।

जदपि कीन्ह एहिं दारुन पापा। मैं पुनि दीन्ह कोप करि सापा॥तदपि तुम्हार साधुता देखी। करिहउँ एहि पर कृपा बिसेषी॥

यद्यपि इसने भयंकर पाप किया और मैंने क्रोधमें आकर इसे शाप भी दे दिया, फिर भी तुम्हारी साधुता देखकर मैं इसपर विशेष कृपा करूँगा।

छमासील जे पर उपकारी। ते द्विज मोहि प्रिय जथा खरारी॥मोर श्राप द्विज ब्यर्थ न जाइहि। जन्म सहस अवस्य यह पाइहि॥

हे द्विज! जो क्षमाशील और परोपकारी हैं, वे मुझे साक्षात् श्रीरामके समान प्रिय हैं। मेरा शाप व्यर्थ नहीं जायगा, यह हज़ार जन्म अवश्य भोगेगा।

जनमत मरत दुसह दुख होई। अहि स्वल्पउ नहिं ब्यापिहि सोई॥कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना। सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना॥

पर जन्म-मृत्युका जो असह्य कष्ट होता है, वह इसे छू भी नहीं पायेगा, और किसी भी जन्ममें इसका ज्ञान लुप्त नहीं होगा। हे शूद्र! मेरा यह सत्य वचन ध्यानसे सुन—

रघुपति पुरीं जन्म तब भयऊ। पुनि तें मम सेवाँ मन दयऊ॥पुरी प्रभाव अनुग्रह मोरें। राम भगति उपजिहि उर तोरें॥

तेरा जन्म श्रीरघुनाथजीकी नगरीमें हुआ, और फिर तूने मेरी सेवामें मन लगाया। इस पुरीके प्रभाव और मेरी कृपासे तेरे हृदयमें रामभक्ति अवश्य जागेगी।

सुनु मम बचन सत्य अब भाई। हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई॥अब जनि करहि बिप्र अपमाना। जानेहु संत अनंत समाना॥

हे भाई! अब मेरा यह सत्य वचन सुन—ब्राह्मणकी सेवा ही भगवान्को प्रसन्न करनेवाला सबसे बड़ा व्रत है। अब कभी किसी विप्रका अपमान मत करना, और संतोंको सदा भगवान्के समान ही समझना।

इंद्र कुलिस मम सूल बिसाला। कालदंड हरि चक्र कराला॥जो इन्ह कर मारा नहिं मरई। बिप्रद्रोह पावक सो जरई॥

इन्द्रके वज्र, मेरे विशाल त्रिशूल, कालदण्ड और श्रीहरिके भयंकर चक्रसे भी जो न मरे, वह भी ब्राह्मणद्रोहरूपी अग्निमें अवश्य भस्म हो जाता है।

अस बिबेक राखेहु मन माहीं। तुम्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥औरउ एक आसिषा मोरी। अप्रतिहत गति होइहि तोरी॥

ऐसा विवेक सदा मनमें बनाये रखना, फिर संसारमें तुम्हारे लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं रहेगा। और एक आशीर्वाद और लो—तुम्हारी गति सर्वत्र निर्बाध होगी।

दोहा

सुनि सिव बचन हरषि गुर एवमस्तु इति भाषि।मोहि प्रबोधि गयउ गृह संभु चरन उर राखि१०९(क)

आकाशवाणीके रूपमें शिवजीके ये वचन सुनकर गुरुजी हर्षित हो उठे। "एवमस्तु" कहकर उन्होंने मुझे बहुत समझाया और शिवजीके चरणोंको हृदयमें धारण किये अपने घर लौट गये।

दोहा

प्रेरित काल बिधि गिरि जाइ भयउँ मैं ब्याल।पुनि प्रयास बिनु सो तनु जजेउँ गएँ कछु काल१०९(ख)

कालकी प्रेरणासे मैं विन्ध्याचल पर्वतपर जाकर सर्प बना। फिर कुछ समय बीतनेपर बिना किसी कठिनाईके ही मैंने वह शरीर त्याग दिया।

दोहा

जोइ तनु धरउँ तजउँ पुनि अनायास हरिजान।जिमि नूतन पट पहिरइ नर परिहरइ पुरान१०९(ग)

हे हरिवाहन! इसके बाद जो भी शरीर मैं धारण करता, उसे उतनी ही सहजतासे त्याग देता, जैसे मनुष्य पुराना वस्त्र उतारकर नया धारण कर लेता है।

दोहा

सिव राखी श्रुति नीति अरु मैं नहिं पावा क्लेस।एहि बिधि धरेउँ बिबिध तनु ग्यान न गयउ खगेस१०९(घ)

शिवजीने वेदकी मर्यादा भी बनाये रखी और मुझे कोई कष्ट भी नहीं हुआ। हे पक्षिराज! इस तरह मैंने अनेक शरीर धारण किये, पर हर बार मेरा ज्ञान बना रहा, कभी लुप्त नहीं हुआ।

त्रिजग देव नर जोइ तनु धरउँ। तहँ तहँ राम भजन अनुसरऊँ॥एक सूल मोहि बिसर न काऊ। गुर कर कोमल सील सुभाऊ॥

तिर्यक् योनि, देवता या मनुष्यका जो भी शरीर धारण करता, वहाँ-वहाँ मैं श्रीरामजीका भजन जारी रखता। पर एक शूल मुझे कभी नहीं भूलता — गुरुजीका वह कोमल, सुशील स्वभाव, जिनका मैंने अपमान किया था।

चरम देह द्विज के मैं पाई। सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गाई॥खेलउँ तहूँ बालकन्ह मीला। करउँ सकल रघुनायक लीला॥

अन्ततः मैंने ब्राह्मणका अन्तिम शरीर पाया, जिसे वेद-पुराण देवताओंको भी दुर्लभ बताते हैं। उस जन्ममें भी जब मैं बालकोंके साथ खेलता, तो खेल-खेलमें भी श्रीरघुनाथजीकी ही लीलाएँ किया करता।

प्रौढ़ भए मोहि पिता पढ़ावा। समझउँ सुनउँ गुनउँ नहिं भावा॥मन ते सकल बासना भागी। केवल राम चरन लय लागी॥

सयाना होनेपर पिताजी मुझे पढ़ाने लगे। मैं समझता, सुनता और सोचता ज़रूर, पर पढ़ाई मुझे कभी अच्छी नहीं लगी—मेरे मनसे सारी वासनाएँ छूट चुकी थीं, अब बस श्रीरामके चरणोंमें ही लगन थी।

कहु खगेस अस कवन अभागी। खरी सेव सुरधेनुहि त्यागी॥प्रेम मगन मोहि कछु न सोहाई। हारे पिता पढ़ाइ पढ़ाई॥

हे गरुड़जी! बताइये, ऐसा कौन अभागा होगा जो कामधेनुको छोड़कर गदहीकी सेवा करे? मैं प्रेममें इतना डूबा रहता कि कुछ और सुहाता ही नहीं—पिताजी पढ़ा-पढ़ाकर आख़िर हार मान गये।

भए कालबस जब पितु माता। मैं बन गयउँ भजन जनत्राता॥जहँ जहँ बिपिन मुनीस्वर पावउँ। आश्रम जाइ जाइ सिरु नावउँ॥

जब माता-पिता कालके वश हो गये, तो मैं भक्तवत्सल श्रीरामके भजनके लिये वनकी ओर निकल पड़ा। जहाँ-जहाँ मुझे मुनियोंके आश्रम मिलते, वहाँ-वहाँ जाकर मैं श्रद्धासे सिर झुकाता।

बूझत तिन्हहि राम गुन गाहा। कहहिं सुनउँ हरषित खगनाहा॥सुनत फिरउँ हरि गुन अनुबादा। अब्याहत गति संभु प्रसादा॥

मैं उनसे श्रीरामकी गुणगाथाएँ पूछता, वे सुनाते और मैं हर्षित होकर सुनता रहता। इस तरह हरिगुणगान सुनते हुए घूमता रहता—शिवजीकी कृपासे कहीं भी मेरी गति रुकती नहीं थी।

छूटी त्रिबिध ईषना गाढ़ी। एक लालसा उर अति बाढ़ी॥राम चरन बारिज जब देखौं। तब निज जन्म सफल करि लेखौं॥

पुत्र, धन और मानकी गहरी वासनाएँ मुझसे छूट चुकी थीं, हृदयमें बस एक ही लालसा प्रबल हो गयी थी—श्रीरामके चरणकमलोंका दर्शन पा लूँ तो अपना जन्म सफल मानूँ।

जेहि पूँछउँ सोइ मुनि अस कहई। ईस्वर सर्ब भूतमय अहई॥निर्गुन मत नहिं मोहि सोहाई। सगुन ब्रह्म रति उर अधिकाई॥

जिससे भी मैं पूछता, वह मुनि यही कहता कि ईश्वर तो सर्वभूतमय है। पर यह निर्गुण मत मुझे कभी नहीं जँचा—मेरे हृदयमें सगुण ब्रह्मके प्रति प्रेम ही बढ़ता जाता था।

दोहा

गुर के बचन सुरति करि राम चरन मनु लाग।रघुपति जस गावत फिरउँ छन छन नव अनुराग११०(क)

गुरुजीके वचन याद करके मेरा मन श्रीरामके चरणोंमें रम गया, और मैं क्षण-प्रतिक्षण नया-नया प्रेम पाते हुए श्रीरघुनाथजीका यशोगान करता फिरने लगा।

दोहा

मेरु सिखर बट छायाँ मुनि लोमस आसीन।देखि चरन सिरु नायउँ बचन कहेउँ अति दीन११०(ख)

सुमेरु पर्वतके शिखरपर एक बरगदकी छायामें लोमश मुनि विराजमान थे। उन्हें देखकर मैंने चरणोंमें सिर झुकाया और बड़ी दीनतासे अपनी बात कही।

दोहा

सुनि मम बचन बिनीत मृदु मुनि कृपाल खगराज।मोहि सादर पूँछत भए द्विज आयहु केहि काज११०(ग)

हे पक्षिराज! मेरे विनम्र और कोमल वचन सुनकर कृपालु मुनि आदरपूर्वक पूछने लगे—हे ब्राह्मण! तुम यहाँ किस प्रयोजनसे आये हो?

दोहा

तब मैं कहा कृपानिधि तुम्ह सर्बग्य सुजान।सगुन ब्रह्म अवराधन मोहि कहहु भगवान११०(घ)

तब मैंने कहा—हे कृपानिधि! आप सर्वज्ञ और सुजान हैं। हे भगवन्! मुझे सगुण ब्रह्मकी आराधनाका मार्ग बतलाइये।

तब मुनीस रघुपति गुन गाथा। कहे कछुक सादर खगनाथा॥ब्रह्मग्यान रत मुनि बिग्यानि। मोहि परम अधिकारी जानी॥

तब हे पक्षिराज! उन मुनिवरने आदरपूर्वक श्रीरामकी कुछ गुणगाथाएँ सुनायीं। फिर ब्रह्मज्ञानमें रत उन विज्ञानी मुनिने मुझे इसका सच्चा अधिकारी मानकर—

लागे करन ब्रह्म उपदेसा। अज अद्वेत अगुन हृदयेसा॥अकल अनीह अनाम अरुपा। अनुभव गम्य अखंड अनूपा॥

ब्रह्मका उपदेश देना आरम्भ किया—कि वह अजन्मा, अद्वैत, निर्गुण और सबके हृदयका स्वामी है; इच्छारहित, नामरहित, रूपरहित, केवल अनुभवसे जाना जानेवाला, अखण्ड और अनुपम है।

मन गोतीत अमल अबिनासी। निर्बिकार निरवधि सुख रासी॥सो तें ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहिं बेदा॥

वह मन-इन्द्रियोंसे परे, निर्मल, अविनाशी, निर्विकार, असीम और सुखकी राशि है। वेद यही गाते हैं कि वही तू है—जैसे जल और उसकी लहरमें कोई भेद नहीं, वैसे ही उसमें और तुझमें कोई अन्तर नहीं।

बिबिध भाँति मोहि मुनि समुझावा। निर्गुन मत मम हृदयँ न आवा॥पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा। सगुन उपासन कहहु मुनीसा॥

मुनिने मुझे कई तरहसे समझाया, पर निर्गुण मत मेरे हृदयमें उतरा ही नहीं। मैंने फिर उनके चरणोंमें सिर झुकाकर कहा—हे मुनीश्वर! अब मुझे सगुणकी उपासना समझाइये।

राम भगति जल मम मन मीना। किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना॥सोइ उपदेस कहहु करि दाया। निज नयनन्हि देखौं रघुराया॥

मेरा मन तो रामभक्तिरूपी जलमें मछलीकी तरह रम चुका है, हे प्रवीण मुनीश्वर! फिर वह उससे अलग कैसे हो सकता है? कृपा करके मुझे वही उपाय बताइये जिससे मैं अपनी आँखोंसे श्रीरघुनाथजीको देख सकूँ।

भरि लोचन बिलोकि अवधेसा। तब सुनिहऊँ निर्गुन उपदेसा॥मुनि पुनि कहि हरिकथा अनूपा। खंडि सगुन मत अगुन निरूपा॥

पहले नेत्र भरकर श्रीअयोध्यानाथका दर्शन कर लूँ, तब निर्गुणका उपदेश सुनूँगा—मैंने ऐसा कहा। मुनिने फिर अनुपम हरिकथा सुनाकर सगुण मतका खण्डन करते हुए निर्गुणका प्रतिपादन किया।

तब मैं निर्गुन मत कर दूरी। सगुन निरूपउँ करि हठ भूरी॥उत्तर प्रतिउत्तर मैं कीन्हा। मुनि तन भए क्रोध के चीन्हा॥

तब मैं निर्गुण मतको परे हटाकर बड़े हठके साथ सगुणका ही समर्थन करने लगा। मेरे बार-बार उत्तर-प्रत्युत्तर देनेसे मुनिके शरीरपर क्रोधके चिह्न उभरने लगे।

सुनु प्रभु बहुत अवग्या किएँ। उपज क्रोध ग्यानिन्ह के हिएँ॥अति संघरषन जौं कर कोई। अनल प्रगट चंदन ते होई॥

हे प्रभो! सुनिये, बहुत अधिक अपमानित होनेपर ज्ञानीके हृदयमें भी क्रोध जाग उठता है—जैसे चन्दनकी लकड़ीको बहुत रगड़ा जाय, तो उससे भी आग निकल आती है।

दोहा

-बारंबार सकोप मुनि करइ निरुपन ग्यान।मैं अपनें मन बैठ तब करउँ बिबिध अनुमान१११(क)

मुनि बार-बार क्रोधसहित ज्ञानका प्रतिपादन करने लगे। तब मैं बैठे-बैठे अपने मनमें तरह-तरहके अनुमान लगाने लगा—

दोहा

क्रोध कि द्वेतबुद्धि बिनु द्वैत कि बिनु अग्यान।मायाबस परिछिन्न जड़ जीव कि ईस समान१११(ख)

क्या द्वैतबुद्धिके बिना क्रोध सम्भव है, और क्या अज्ञानके बिना द्वैतबुद्धि उठ सकती है? क्या मायाके वशीभूत यह सीमित जड़ जीव ईश्वरके समान हो सकता है?

कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें। तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें॥परद्रोही की होहिं निसंका। कामी पुनि कि रहहिं अकलंका॥

क्या सबका भला चाहनेवालेको कभी दुःख हो सकता है? जिसके पास पारसमणि हो, क्या वह दरिद्र रह सकता है? क्या दूसरोंसे द्रोह करनेवाला निर्भय रह सकता है, और क्या कामी व्यक्ति निष्कलंक रह सकता है?

बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें। कर्म कि होहिं स्वरूपहि चीन्हें॥काहू सुमति कि खल सँग जामी। सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी॥

क्या ब्राह्मणका अहित करनेसे किसीका वंश बचा रह सकता है? क्या आत्मस्वरूपको पहचान लेनेके बाद भी आसक्तिपूर्ण कर्म हो सकते हैं? क्या दुष्टोंकी संगतिसे किसीकी बुद्धि निर्मल हुई है? क्या परस्त्रीगामी कभी उत्तम गति पा सकता है?

भव कि परहिं परमात्मा बिंदक। सुखी कि होहिं कबहुँ हरिनिंदक॥राजु कि रहइ नीति बिनु जानें। अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें॥

क्या परमात्माको जाननेवाला फिर जन्म-मृत्युके चक्रमें पड़ सकता है? क्या भगवान्की निन्दा करनेवाला कभी सुखी रह सकता है? क्या नीति जाने बिना राज्य टिक सकता है? और क्या श्रीहरिके चरित्रका बखान करते रहनेपर कोई पाप शेष रह सकता है?

पावन जस कि पुन्य बिनु होई। बिनु अघ अजस कि पावइ कोई॥लाभु कि किछु हरि भगति समाना। जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना॥

बिना पुण्यके पवित्र यश कभी मिलता है क्या? बिना पापके भी क्या कभी अपयश मिलता है? और जिसकी महिमा वेद, संत और पुराण सब गाते हैं, उस हरिभक्तिके समान भला कोई दूसरा लाभ भी है क्या?

हानि कि जग एहि सम किछु भाई। भजिअ न रामहि नर तनु पाई॥अघ कि पिसुनता सम कछु आना। धर्म कि दया सरिस हरिजाना॥

हे भाई! मनुष्य-शरीर पाकर भी श्रीरामका भजन न करना—इससे बड़ी हानि जगत्में और क्या होगी? चुगली करनेसे बढ़कर कोई पाप है क्या? और हे गरुड़! दयासे बढ़कर कोई धर्म है क्या?

एहि बिधि अमिति जुगुति मन गुनऊँ। मुनि उपदेस न सादर सुनऊँ॥पुनि पुनि सगुन पच्छ मैं रोपा। तब मुनि बोले बचन सकोपा॥

इस तरह मैं मनमें अनगिनत तर्क गढ़ता रहता और मुनिका उपदेश आदरसे सुनता ही नहीं था। जब मैंने बार-बार सगुणका ही पक्ष लेकर हठ किया, तो मुनि क्रोधमें भरकर बोले—

मूढ़ परम सिख देउँ न मानसि। उत्तर प्रतिउत्तर बहु आनसि॥सत्य बचन बिस्वास न करही। बायस इव सबही ते डरही॥

अरे मूर्ख! मैं तुझे इतनी अच्छी शिक्षा देता हूँ, फिर भी तू नहीं मानता और तर्क-पर-तर्क गढ़ता जाता है। मेरे सत्य वचनपर भी भरोसा नहीं करता—कौएकी तरह हर किसीसे शंकित रहता है!

सठ स्वपच्छ तब हृदयँ बिसाला। सपदि होहि पच्छी चंडाला॥लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई। नहिं कछु भय न दीनता आई॥

अरे मूर्ख! तेरे हृदयमें अपने ही पक्षका इतना बड़ा हठ है, तो तू शीघ्र चाण्डाल-पक्षी (कौआ) बन जा। मैंने उनका यह शाप सहर्ष सिर-माथे ले लिया—न कोई भय हुआ, न मनमें कोई दीनता आयी।

दोहा

तुरत भयउँ मैं काग तब पुनि मुनि पद सिरु नाइ।सुमिरि राम रघुबंस मनि हरषित चलेउँ उड़ाइ११२(क)

तत्क्षण ही मैं कौआ बन गया। फिर मुनिके चरणोंमें सिर झुकाकर और रघुकुलमणि श्रीरामका स्मरण करते हुए मैं प्रसन्न मन उड़ चला।

दोहा

उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध।निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध११२(ख)

हे उमा! जो श्रीरामजीके चरणोंके प्रेमी हैं और काम, अभिमान तथा क्रोधसे रहित हैं, वे जगत्को अपने प्रभुसे भरा हुआ देखते हैं, फिर वे किससे वैर करें?

सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन। उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन॥कृपासिंधु मुनि मति करि भोरी। लीन्हि प्रेम परिच्छा मोरी॥

काकभुशुण्डिजी बोले—हे पक्षिराज! सुनिये, इसमें ऋषिका तनिक भी दोष नहीं था। स्वयं रघुकुलभूषण श्रीराम ही सबके हृदयमें यह प्रेरणा भर रहे थे। कृपासागर प्रभुने मुनिकी बुद्धिको ही भुलावा देकर असलमें मेरे प्रेमकी परख ली थी।

मन बच क्रम मोहि निज जन जाना। मुनि मति पुनि फेरी भगवाना॥रिषि मम महत सीलता देखी। राम चरन बिस्वास बिसेषी॥

मन-वचन-कर्मसे जब प्रभुने मुझे अपना ही जन माना, तो उन्होंने मुनिकी बुद्धि फिर पलट दी। ऋषिने मेरा वह महान् धीरजभरा स्वभाव और श्रीरामके चरणोंमें मेरी अटूट श्रद्धा देखी,

अति बिसमय पुनि पुनि पछिताई। सादर मुनि मोहि लीन्ह बोलाई॥मम परितोष बिबिध बिधि कीन्हा। हरषित राममंत्र तब दीन्हा॥

तो वे बहुत आश्चर्यचकित होकर बार-बार पछताने लगे और आदरपूर्वक मुझे बुला लिया। उन्होंने तरह-तरहसे मुझे संतुष्ट किया और फिर हर्षपूर्वक मुझे राममन्त्र प्रदान किया।

बालकरूप राम कर ध्याना। कहेउ मोहि मुनि कृपानिधाना॥सुंदर सुखद मोहि अति भावा। सो प्रथमहिं मैं तुम्हहि सुनावा॥

कृपानिधान मुनिने मुझे बालरूप श्रीरामके ध्यानकी विधि बतायी। वह सुन्दर और सुखद ध्यान मुझे इतना भाया कि मैं वही आपको पहले ही सुना चुका हूँ।

मुनि मोहि कछुक काल तहँ राखा। रामचरितमानस तब भाषा॥सादर मोहि यह कथा सुनाई। पुनि बोले मुनि गिरा सुहाई॥

मुनिने मुझे कुछ काल अपने पास रखा और तभी मुझे रामचरितकी यह पूरी कथा सुनायी। आदरपूर्वक यह कथा सुनाकर फिर वे मुझसे मधुर वाणीमें बोले—

रामचरित सर गुप्त सुहावा। संभु प्रसाद तात मैं पावा॥तोहि निज भगत राम कर जानी। ताते मैं सब कहेउँ बखानी॥

हे तात! यह सुन्दर और गुह्य रामचरितमानस मैंने शिवजीकी कृपासे ही पाया था। तुम्हें श्रीरामका सच्चा भक्त जानकर ही मैंने यह सब विस्तारसे तुम्हें सुनाया है।

राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं। कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं॥मुनि मोहि बिबिध भाँति समुझावा। मैं सप्रेम मुनि पद सिरु नावा॥

हे तात! जिनके हृदयमें रामभक्ति नहीं है, उनके सामने यह कथा कभी मत कहना। मुनिने मुझे इस तरह भाँति-भाँतिसे समझाया, और मैंने प्रेमपूर्वक उनके चरणोंमें सिर झुकाया।

निज कर कमल परसि मम सीसा। हरषित आसिष दीन्ह मुनीसा॥राम भगति अबिरल उर तोरें। बसिहि सदा प्रसाद अब मोरें॥

मुनीश्वरने अपने कर-कमलोंसे मेरा सिर छूकर हर्षपूर्वक आशीर्वाद दिया कि अब मेरी कृपासे तेरे हृदयमें सदा अटूट रामभक्ति बसी रहेगी।

दोहा

सदा राम प्रिय होहु तुम्ह सुभ गुन भवन अमान।कामरूप इच्धामरन ग्यान बिराग निधान११३(क)

तुम सदा श्रीरामके प्रिय बने रहो, शुभ गुणोंके निरभिमान धाम बनो, इच्छानुसार रूप धारण कर सको, इच्छामृत्युके स्वामी बनो, और ज्ञान-वैराग्यके भण्डार बनो।

दोहा

जेहिं आश्रम तुम्ह बसब पुनि सुमिरत श्रीभगवंत।ब्यापिहि तहँ न अबिद्या जोजन एक प्रजंत११३(ख)

इतना ही नहीं, तुम जिस भी आश्रममें भगवान्का स्मरण करते हुए निवास करोगे, वहाँ चारों ओर एक योजनतक अविद्याका साया भी नहीं पड़ेगा।

काल कर्म गुन दोष सुभाऊ। कछु दुख तुम्हहि न ब्यापिहि काऊ॥राम रहस्य ललित बिधि नाना। गुप्त प्रगट इतिहास पुराना॥

काल, कर्म, गुण-दोष या स्वभावसे उपजनेवाला कोई भी दुःख तुम्हें कभी नहीं छुएगा। श्रीरामके अनेक सुन्दर रहस्य, जो इतिहास और पुराणोंमें कहीं गुप्त और कहीं प्रकट रूपमें छिपे हैं,

बिनु श्रम तुम्ह जानब सब सोऊ। नित नव नेह राम पद होऊ॥जो इच्छा करिहहु मन माहीं। हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं॥

वह सब तुम बिना किसी परिश्रमके जान जाओगे। श्रीरामके चरणोंमें तुम्हारा प्रेम प्रतिदिन नया-नया बना रहे। और मनमें जो भी इच्छा करोगे, हरिकृपासे उसे पाना तुम्हारे लिये कभी दुर्लभ नहीं होगा।

सुनि मुनि आसिष सुनु मतिधीरा। ब्रह्मगिरा भई गगन गँभीरा॥एवमस्तु तव बच मुनि ग्यानी। यह मम भगत कर्म मन बानी॥

हे धीरबुद्धि गरुड़! सुनिये, मुनिका यह आशीर्वाद सुनते ही आकाशमें गम्भीर ब्रह्मवाणी गूँज उठी—हे ज्ञानी मुनि! तुम्हारा वचन सत्य होकर रहेगा, क्योंकि यह मन-वचन-कर्मसे मेरा ही भक्त है।

सुनि नभगिरा हरष मोहि भयऊ। प्रेम मगन सब संसय गयऊ॥करि बिनती मुनि आयसु पाई। पद सरोज पुनि पुनि सिरु नाई॥

यह आकाशवाणी सुनकर मुझे अपार हर्ष हुआ, मैं प्रेममें डूब गया और मेरा सारा सन्देह जाता रहा। फिर मुनिसे विनती करके, उनकी आज्ञा पाकर, बार-बार उनके चरणकमलोंमें सिर नवाकर—

हरष सहित एहिं आश्रम आयउँ। प्रभु प्रसाद दुर्लभ बर पायउँ॥इहाँ बसत मोहि सुनु खग ईसा। बीते कलप सात अरु बीसा॥

मैं प्रसन्नतापूर्वक इसी आश्रममें आ गया, क्योंकि प्रभुकी कृपासे मुझे यह दुर्लभ वरदान मिल चुका था। हे पक्षिराज! सुनिये, यहाँ निवास करते-करते मुझे सत्ताईस कल्प बीत चुके हैं।

करउँ सदा रघुपति गुन गाना। सादर सुनहिं बिहंग सुजाना॥जब जब अवधपुरीं रघुबीरा। धरहिं भगत हित मनुज सरीरा॥

मैं यहाँ सदा श्रीरघुनाथजीके गुणोंका गान करता रहता हूँ, और सुजान पक्षी उसे आदरपूर्वक सुनते हैं। जब-जब श्रीरघुवीर भक्तोंके हितके लिये अयोध्यामें मनुष्यरूप धारण करते हैं,

तब तब जाइ राम पुर रहऊँ। सिसुलीला बिलोकि सुख लहऊँ॥पुनि उर राखि राम सिसुरूपा। निज आश्रम आवउँ खगभूपा॥

तब-तब मैं वहाँ जाकर रहने लगता हूँ और प्रभुकी बाललीलाएँ देखकर आनन्दमग्न हो जाता हूँ। फिर हे पक्षिराज! उस शिशुरूपको हृदयमें सँजोकर मैं वापस अपने आश्रम लौट आता हूँ।

कथा सकल मैं तुम्हहि सुनाई। काग देह जेहिं कारन पाई॥कहेउँ तात सब प्रस्न तुम्हारी। राम भगति महिमा अति भारी॥

इस तरह मैंने वह पूरी कथा तुम्हें सुना दी, जिस कारण मुझे यह काकशरीर मिला। हे तात! तुम्हारे सभी प्रश्नोंका उत्तर मैंने विस्तारसे दे दिया—सचमुच, रामभक्तिकी महिमा अपार है।

दोहा

ताते यह तन मोहि प्रिय भयउ राम पद नेह।निज प्रभु दरसन पायउँ गए सकल संदेह११४(क)

इसीलिये यह काकशरीर मुझे प्रिय है, क्योंकि इसीमें मुझे श्रीरामके चरणोंका प्रेम मिला। इसी देहसे मैंने अपने प्रभुका साक्षात् दर्शन पाया और मेरे सारे सन्देह मिट गये।

दोहा

भगति पच्छ हठ करि रहेउँ दीन्हि महारिषि साप।मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप११४(ख)

मैं हठपूर्वक भक्तिके पक्षपर अड़ा रहा, जिसके कारण महर्षि लोमशने मुझे शाप दे दिया—पर देखो, उसीका फल यह हुआ कि मुझे वह वरदान मिला जो बड़े-बड़े मुनियोंको भी दुर्लभ है। यही तो भजनका सच्चा प्रताप है।

जे असि भगति जानि परिहरहीं। केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं॥ते जड़ कामधेनु गृह त्यागी। खोजत आकु फिरहिं पय लागी॥

जो लोग भक्तिकी यह महिमा जानते हुए भी उसे त्याग देते हैं और केवल ज्ञानके लिये ही साधना करते हैं, वे मूर्ख वैसे ही हैं जैसे घरमें खड़ी कामधेनुको छोड़कर आककी झाड़ीमें दूध खोजते फिरें।

सुनु खगेस हरि भगति बिहाई। जे सुख चाहहिं आन उपाई॥ते सठ महासिंधु बिनु तरनी। पैरि पार चाहहिं जड़ करनी॥

हे पक्षिराज! सुनिये, जो लोग हरिभक्तिको छोड़कर सुखके लिये दूसरे उपाय ढूँढ़ते हैं, वे मूर्ख उसी तरह भूल करते हैं जैसे कोई बिना जहाजके ही महासागर तैरकर पार करना चाहे।

सुनि भसुंडि के बचन भवानी। बोलेउ गरुड़ हरषि मृदु बानी॥तव प्रसाद प्रभु मम उर माहीं। संसय सोक मोह भ्रम नाहीं॥

भुशुण्डिके ये वचन सुनकर, हे भवानी, गरुड़जी हर्षित हो कोमल स्वरमें बोले—हे प्रभो! आपकी कृपासे अब मेरे हृदयमें न कोई सन्देह बचा, न शोक, न मोह और न भ्रम।

सुनेउँ पुनीत राम गुन ग्रामा। तुम्हरी कृपाँ लहेउँ बिश्रामा॥एक बात प्रभु पूँछउँ तोही। कहहु बुझाइ कृपानिधि मोही॥

आपकी कृपासे मैंने श्रीरामके पवित्र गुण सुने और मुझे परम शान्ति मिली। अब हे प्रभो! एक बात और पूछता हूँ—हे कृपासागर! कृपया मुझे समझाकर बतलाइये।

कहहिं संत मुनि बेद पुराना। नहिं कछु दुर्लभ ग्यान समाना॥सोइ मुनि तुम्ह सन कहेउ गोसाईं। नहिं आदरेहु भगति की नाईं॥

संत, मुनि, वेद और पुराण सब यही कहते हैं कि ज्ञानके समान दुर्लभ कुछ नहीं। हे गोसाईं! वही ज्ञान उन मुनिने आपको दिया था, पर आपने भक्तिकी तरह उसका आदर नहीं किया—

ग्यानहि भगतिहि अंतर केता। सकल कहहु प्रभु कृपा निकेता॥सुनि उरगारि बचन सुख माना। सादर बोलेउ काग सुजाना॥

तो हे कृपानिधान प्रभो! ज्ञान और भक्तिमें आखिर कितना अन्तर है? यह मुझे पूरा बतलाइये। गरुड़जीके ये वचन सुनकर सुजान काकभुशुण्डिजीको बड़ा सुख हुआ, और वे आदरपूर्वक कहने लगे—

भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा। उभय हरहिं भव संभव खेदा॥नाथ मुनीस कहहिं कछु अंतर। सावधान सोउ सुनु बिहंगबर॥

भक्ति और ज्ञानमें वस्तुतः कोई भेद नहीं है, दोनों ही संसारसे उपजे क्लेशको दूर करते हैं। पर हे नाथ! मुनिजन इनमें कुछ अन्तर बताते हैं, हे श्रेष्ठ पक्षी! उसे ध्यान लगाकर सुनिये—

ग्यान बिराग जोग बिग्याना। ए सब पुरुष सुनहु हरिजाना॥पुरुष प्रताप प्रबल सब भाँती। अबला अबल सहज जड़ जाती॥

हे हरिवाहन! सुनिये, ज्ञान, वैराग्य, योग और विज्ञान—ये सब पुरुष-तत्त्व हैं, और पुरुषका प्रभाव सब तरहसे प्रबल होता है, जबकि माया स्वभावसे ही निर्बल और जन्मजात मूढ़ है।

दोहा

पुरुष त्यागि सक नारिहि जो बिरक्त मति धीर।न तु कामी बिषयाबस बिमुख जो पद रघुबीर११५(क)

पर स्त्री (माया) को केवल वही धीरबुद्धि, वैराग्यवान् पुरुष त्याग सकता है—न कि वह कामी जो विषयोंका दास है और श्रीरघुवीरके चरणोंसे विमुख है।

सोरठा

सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि।बिबस होइ हरिजान नारि बिष्नु माया प्रगट११५(ख)

यहाँतक कि बड़े-बड़े ज्ञानभण्डार मुनि भी किसी मृगनयनी सुन्दरीका मुख देखकर विवश हो उठते हैं। हे गरुड़! असलमें स्त्रीरूपमें साक्षात् भगवान् विष्णुकी माया ही प्रकट होती है।

इहाँ न पच्छपात कछु राखउँ। बेद पुरान संत मत भाषऊँ॥मोह न नारि नारि कें रूपा। पन्नगारि यह रीति अनूपा॥

यहाँ मैं किसी पक्षपातसे नहीं, वेद-पुराण और संतोंके मतके आधारपर ही कह रहा हूँ। हे गरुड़! यह भी एक विलक्षण बात है कि एक स्त्री दूसरी स्त्रीके रूपपर कभी मोहित नहीं होती।

माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ। नारि बर्ग जानइ सब कोऊ॥पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी। माया खलु नर्तकी बिचारी॥

सुनिये, माया और भक्ति—ये दोनों ही स्त्रीरूप मानी गयी हैं, यह सब जानते हैं। पर श्रीरघुवीरको भक्ति ही प्रिय है, जबकि बेचारी माया तो निरी नर्तकीके समान है।

भगतिहि सानुकूल रघुराया। ताते तेहि डरपति अति माया॥राम भगति निरुपम निरुपाधी। बसइ जासु उर सदा अबाधी॥

श्रीरघुनाथजी भक्तिपर विशेष कृपा रखते हैं, इसीलिये माया उससे सदा भयभीत रहती है। जिसके हृदयमें उपमारहित, निर्मल रामभक्ति निर्बाध रूपसे बस जाती है,

तेहि बिलोकि माया सकुचाई। करि न सकइ कछु निज प्रभुताई॥अस बिचारि जे मुनि बिग्यानी। जाचहीं भगति सकल सुख खानी॥

उसे देखते ही माया सकुचाकर पीछे हट जाती है, उसपर अपना कोई प्रभाव नहीं जमा पाती। यही समझकर ज्ञानी मुनि भी अन्ततः सब सुखोंकी खान भक्तिकी ही याचना करते हैं।

दोहा

यह रहस्य रघुनाथ कर बेगि न जानइ कोई।जो जानइ रघुपति कृपाँ सपनेहुँ मोह न होइ११६(क)

श्रीरघुनाथजीका यह रहस्य कोई भी जल्दी नहीं समझ पाता। पर जो उनकी कृपासे इसे जान लेता है, उसे स्वप्नमें भी मोह नहीं सताता।

दोहा

औरउ ग्यान भगति कर भेद सुनहु सुप्रबीन।जो सुनि होइ राम पद प्रीति सदा अबिछीन११६(ख)

हे सुचतुर गरुड़! अब ज्ञान और भक्तिका एक और भेद सुनिये, जिसे सुनकर श्रीरामके चरणोंमें तुम्हारा प्रेम सदाके लिये अटूट हो जायगा।

सुनहु तात यह अकथ कहानी। समुझत बनइ न जाइ बखानी॥ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥

हे तात! यह कथा इतनी सूक्ष्म है कि इसे शब्दोंमें पूरी तरह बाँधा नहीं जा सकता, केवल अनुभवसे ही समझी जा सकती है—जीव ईश्वरका ही अंश है, इसलिये वह भी अविनाशी, चेतन, निर्मल और स्वभावतः आनन्दस्वरूप है।

सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाई॥जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई॥

पर हे गोसाईं! वही जीव मायाके वशीभूत होकर वैसे ही बँध जाता है जैसे तोता या बन्दर अपनी ही करतूतसे फँस जाता है। इस तरह जड़ और चेतनके बीच एक गाँठ पड़ जाती है, और यद्यपि वह गाँठ मिथ्या ही है, फिर भी उसे खोलना कठिन हो जाता है।

तब ते जीव भयउ संसारी। छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी॥श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई॥

तभीसे जीव संसारके चक्रमें बँध जाता है—न वह गाँठ खुलती है, न उसे सुख मिलता है। वेद और पुराणोंने इसके अनेक उपाय बताये हैं, पर वह गाँठ छूटनेके बजाय उलटे और उलझती चली जाती है।

जीव हृदयँ तम मोह बिसेषी। ग्रंथि छूट किमि परइ न देखी॥अस संजोग ईस जब करई। तबहुँ कदाचित सो निरुअरई॥

जीवके हृदयमें अज्ञानका इतना गहरा अन्धकार छाया रहता है कि वह गाँठ उसे दिखायी ही नहीं देती, फिर खुले तो कैसे? जब कभी ईश्वर स्वयं ऐसा शुभ संयोग बनाते हैं, तभी कहीं वह गाँठ खुल पाती है।

सात्त्विक श्रद्धा धेनु सुहाई। जौं हरि कृपाँ हृदयँ बस आई॥जप तप ब्रत जम नियम अपारा। जे श्रुति कह सुभ धर्म अचारा॥

यदि हरिकी कृपासे सात्त्विकी श्रद्धारूपी सुन्दर गौ हृदयके आँगनमें आ बसे, तो शास्त्रोंमें बताये गये अनगिनत जप, तप, व्रत, यम-नियम जैसे शुभ धर्माचार—

तेइ तृन हरित चरै जब गाई। भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई॥नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा। निर्मल मन अहीर निज दासा॥

यही सब उस गौके लिये हरी घास बन जाते हैं, जिसे चरकर वह आस्तिक भावरूपी अपने बछड़ेको दूध पिलाती है। निवृत्ति उसकी नोई है, विश्वास दूध दुहनेका पात्र है, और निर्मल, स्ववश मन ही उसे दुहनेवाला ग्वाला है।

परम धर्ममय पय दुहि भाई। अवटै अनल अकाम बनाई॥तोष मरुत तब छमा जुड़ावै। धृति सम जावनु देइ जमावै॥

हे भाई! इस तरह परम धर्ममय दूध दुहकर उसे निष्कामभावरूपी अग्निपर भलीभाँति औटाया जाता है। फिर संतोषरूपी हवासे उसे ठंडा किया जाता है और धैर्य-संयमरूपी जामन देकर जमाया जाता है।

मुदिताँ मथैं बिचार मथानी। दम अधार रजु सत्य सुबानी॥तब मथि काढ़ि लेइ नवनीता। बिमल बिराग सुभग सुपुनीता॥

फिर प्रसन्नतारूपी मटकीमें तत्त्वविचाररूपी मथानी और इन्द्रियसंयमके सहारे, सत्य व मधुर वाणीरूपी रस्सी लगाकर उसे मथा जाय, तो उसमेंसे निर्मल, सुन्दर, अत्यन्त पवित्र वैराग्यरूपी मक्खन निकल आता है।

दोहा

जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ।बुद्धि सिरावैं ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ११७(क)

फिर योगरूपी अग्नि जलाकर उसमें सारे शुभ-अशुभ कर्मोंको ईंधनकी तरह भस्म कर दिया जाय, तो ममतारूपी मैल जल जाता है और शेष बचे ज्ञानरूपी घीको निश्चयात्मिका बुद्धिसे ठंडा किया जाता है।

दोहा

तब बिग्यानरूपिनि बुद्धि बिसद घृत पाइ।चित्त दिआ भरि धर दृढ़ समता दिअटि बनाइ११७(ख)

तब विज्ञानरूपिणी बुद्धि उस निर्मल घीको पाकर उससे चित्तरूपी दीपकको भरती है, समताकी दीवटपर उसे दृढ़तासे टिकाकर रखती है।

दोहा

तीनि अवस्था तीनि गुन तेहि कपास तें काढ़ि।तूल तुरीय सँवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि११७(ग)

जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओं तथा सत्त्व-रज-तमरूपी कपाससे तुरीयावस्थारूपी रुई निकाली जाती है, फिर उसे सँवारकर एक सुन्दर, सुदृढ़ बत्ती बनायी जाती है।

सोरठा

एहि बिधि लेसै दीप तेज रासि बिग्यानमय।जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलभ सब११७(घ)

इस विधिसे विज्ञानमय तेजकी राशिरूप दीपक जलाया जाता है, जिसके पास पहुँचते ही मद आदि सारे पतंगे स्वयं जल मरते हैं।

सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा॥आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा॥

"सोऽहमस्मि" यानी "वह मैं ही हूँ" का यह अखण्ड, अटूट भाव ही उस दीपककी सबसे प्रचण्ड लौ है। जब आत्मानुभवके इस सुखका प्रकाश फैलता है, तब संसारकी जड़ भेदभ्रम मिट जाता है,

प्रबल अबिद्या कर परिवारा। मोह आदि तम मिटइ अपारा॥तब सोइ बुद्धि पाइ उँजिआरा। उर गृहँ बैठि ग्रंथि निरुआरा॥

और मोह आदि प्रबल अविद्याके पूरे परिवारका अपार अन्धकार छँट जाता है। तब वही बुद्धि इस प्रकाशको पाकर हृदयरूपी घरमें बैठे-बैठे जड़-चेतनकी उस गाँठको खोलने लगती है।

छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई। तब यह जीव कृतारथ होई॥छोरत ग्रंथि जानि खगराया। बिघ्न अनेक करइ तब माया॥

यदि वह बुद्धि उस गाँठको खोल पाये, तभी यह जीव सचमुच कृतार्थ होता है। पर हे पक्षिराज! गाँठ खुलती देख माया तुरन्त इसमें अनेक विघ्न डालने लगती है।

रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई। बुद्धहि लोभ दिखावहिं आई॥कल बल छल करि जाहिं समीपा। अंचल बात बुझावहिं दीपा॥

हे भाई! वह अनेक ऋद्धि-सिद्धियोंको भेजकर बुद्धिको लालच दिखाती है। वे चतुराई, बल और छलसे पास आकर अपने आँचलकी हवासे उस ज्ञानदीपकको बुझा देनेकी कोशिश करती हैं।

होइ बुद्धि जौं परम सयानी। तिन्ह तन चितव न अनहित जानी॥जौं तेहि बिघ्न बुद्धि नहिं बाधी। तौ बहोरि सुर करहिं उपाधी॥

यदि बुद्धि अत्यन्त चतुर हो, तो वह इन्हें हानिकारक समझकर इनकी ओर देखती तक नहीं। और यदि इन विघ्नोंसे भी बुद्धि विचलित नहीं होती, तो फिर स्वयं देवता ही नयी बाधाएँ खड़ी करने लगते हैं।

इंद्रीं द्वार झरोखा नाना। तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना॥आवत देखहिं बिषय बयारी। ते हठि देहिं कपाट उघारी॥

इन्द्रियोंके द्वार मानो हृदयरूपी घरके अनेक झरोखे हैं, जहाँ-जहाँ देवता पहरा देकर बैठे रहते हैं। ज्योंही विषयरूपी हवा आती दिखती है, वे तुरन्त हठपूर्वक किवाड़ खोल देते हैं।

जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई। तबहिं दीप बिग्यान बुझाई॥ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा। बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा॥

और वह तेज़ हवा जैसे ही हृदयरूपी घरमें घुसती है, वैसे ही वह ज्ञानदीपक बुझ जाता है—न गाँठ खुलती है, न वह प्रकाश टिकता है, बुद्धि विषयरूपी आँधीमें फिरसे व्याकुल हो उठती है।

इंद्रिन्ह सुरन्ह न ग्यान सोहाई। बिषय भोग पर प्रीति सदाई॥बिषय समीर बुद्धि कृत भोरी। तेहि बिधि दीप को बार बहोरी॥

इन्द्रियों और उनके अधिष्ठाता देवताओंको ज्ञान कभी नहीं सुहाता, क्योंकि उनकी रुचि तो सदा विषय-भोगमें ही रहती है। और बुद्धि भी विषयरूपी वायुसे भरमायी जा चुकी होती है—अब उस दीपकको फिरसे कौन जलाये?

दोहा

तब फिरि जीव बिबिध बिधि पावइ संसृति क्लेस।हरि माया अति दुस्तर तरि न जाइ बिहगेस११८(क)

तब जीव बार-बार जन्म-मरणके क्लेश भोगता है। हे पक्षिराज! श्रीहरिकी माया इतनी दुस्तर है कि वह यों ही सहजमें पार नहीं की जा सकती।

दोहा

कहत कठिन समुझत कठिन साधन कठिन बिबेक।होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक११८(ख)

ज्ञान कहना जितना कठिन है, समझना उससे भी कठिन है, और उसे सिद्ध करना तो और भी कठिन। कदाचित् संयोगवश यह प्राप्त भी हो जाय, तो भी आगे उसकी रक्षामें अनेकों विघ्न खड़े रहते हैं।

ग्यान पंथ कृपान के धारा। परत खगेस होइ नहिं बारा॥जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई। सो कैवल्य परम पद लहई॥

ज्ञानका मार्ग तलवारकी धारके समान है, हे पक्षिराज! इसपरसे फिसलते देर नहीं लगती। जो इसे बिना किसी बाधाके पार कर ले, वही अन्ततः कैवल्यरूपी परम पद पाता है।

अति दुर्लभ कैवल्य परम पद। संत पुरान निगम आगम बद॥राम भजत सोइ मुकुति गोसाई। अनइच्छित आवइ बरिआई॥

संत, पुराण, वेद और शास्त्र सब कहते हैं कि कैवल्य पाना अत्यन्त दुर्लभ है, पर हे गोसाईं! वही दुर्लभ मुक्ति श्रीरामके भजनसे बिना माँगे भी अपने-आप चली आती है।

जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई। कोटि भाँति कोउ करै उपाई॥तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई। रहि न सकइ हरि भगति बिहाई॥

जैसे धरतीके बिना जल कभी नहीं ठहर सकता, चाहे कोई करोड़ों उपाय क्यों न कर ले—वैसे ही हे पक्षिराज! मोक्षका सुख भी श्रीहरिकी भक्तिके बिना कभी टिक नहीं सकता।

अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने॥भगति करत बिनु जतन प्रयासा। संसृति मूल अबिद्या नासा॥

यह समझकर ही बुद्धिमान् हरिभक्त भक्तिमें ऐसे रम जाते हैं कि मुक्तितकको तुच्छ मान बैठते हैं। भक्ति करते-करते बिना किसी अतिरिक्त प्रयासके ही संसारकी जड़ अविद्या अपने-आप नष्ट हो जाती है,

भोजन करिअ तृपिति हित लागी। जिमि सो असन पचवै जठरागी॥असि हरिभगति सुगम सुखदाई। को अस मूढ़ न जाहि सोहाई॥

ठीक वैसे ही जैसे भोजन तृप्तिके लिये किया जाता है और उसे पचाना जठराग्निका अपना काम है। ऐसी सहज और सुखदायी हरिभक्ति जिसे न भाये, ऐसा मूर्ख भला कौन होगा?

दोहा

सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि।भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि११९(क)

हे गरुड़! सेवक और स्वामीके भावके बिना भवसागर पार नहीं हो सकता। यह सिद्धान्त समझकर श्रीरामके चरणकमलोंका ही भजन कीजिये।

दोहा

जो चेतन कहँ जड़ करइ जड़हि करइ चैतन्य।अस समर्थ रघुनायकहिं भजहिं जीव ते धन्य११९(ख)

जो चेतनको जड़ बना सकते हैं और जड़को चेतन—ऐसे समर्थ श्रीरघुनाथजीको जो जीव भजते हैं, वे धन्य हैं।

कहेउँ ग्यान सिद्धांत बुझाई। सुनहु भगति मनि के प्रभुताई॥राम भगति चिंतामनि सुंदर। बसइ गरुड़ जाके उर अंतर॥

इस तरह मैंने ज्ञानका सिद्धान्त समझाकर कह दिया। अब भक्तिरूपी मणिकी महिमा सुनिये—श्रीरामकी भक्ति एक सुन्दर चिन्तामणि है, हे गरुड़! जिसके हृदयमें यह बस जाती है,

परम प्रकास रूप दिन राती। नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती॥मोह दरिद्र निकट नहिं आवा। लोभ बात नहिं ताहि बुझावा॥

वह दिन-रात स्वयं ही परम प्रकाशरूप बना रहता है, उसे दीपक, घी या बत्ती कुछ भी नहीं चाहिये। न उसके पास मोहरूपी दरिद्रता फटकती है, न लोभरूपी हवा उस दीपको कभी बुझा पाती है।

प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई। हारहिं सकल सलभ समुदाई॥खल कामादि निकट नहिं जाहीं। बसइ भगति जाके उर माहीं॥

उस मणिके प्रकाशसे अविद्याका घना अन्धकार मिट जाता है, मदादि पतंगोंका पूरा समूह हार मान लेता है। जिसके हृदयमें यह भक्ति बसती है, काम-क्रोध-लोभ जैसे दुष्ट उसके पास फटकते तक नहीं।

गरल सुधासम अरि हित होई। तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई॥ब्यापहिं मानस रोग न भारी। जिन्ह के बस सब जीव दुखारी॥

उसके लिये विष भी अमृत बन जाता है और शत्रु भी मित्र। उस मणिके बिना कोई सच्चा सुख नहीं पाता, और जिन भयंकर मानसिक रोगोंसे संसारभरके जीव दुखी रहते हैं, वे उसे छू भी नहीं पाते।

राम भगति मनि उर बस जाकें। दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें॥चतुर सिरोमनि तेइ जग माहीं। जे मनि लागि सुजतन कराहीं॥

जिसके हृदयमें रामभक्तिरूपी यह मणि बस जाय, उसे स्वप्नमें भी लेशमात्र दुःख नहीं होता। संसारमें वही लोग सच्चे बुद्धिमान् हैं जो इस मणिको पानेके लिये सच्चा प्रयत्न करते हैं।

सो मनि जदपि प्रगट जग अहई। राम कृपा बिनु नहिं कोउ लहई॥सुगम उपाय पाइबे केरे। नर हतभाग्य देहिं भटमेरे॥

यद्यपि यह मणि जगत्में सबके सामने ही प्रकट है, फिर भी श्रीरामकी कृपाके बिना इसे कोई नहीं पा सकता। इसे पानेके उपाय भी बहुत सहज हैं, पर अभागे लोग उन्हें ठुकरा देते हैं।

पावन पर्बत बेद पुराना। राम कथा रुचिराकर नाना॥मर्मी सज्जन सुमति कुदारी। ग्यान बिराग नयन उरगारी॥

वेद-पुराण मानो पवित्र पर्वत हैं और श्रीरामकी अनेक कथाएँ उनकी सुन्दर खदानें। संत उन खदानोंके मर्मज्ञ हैं और उनकी सुबुद्धि ही कुदाल है। हे गरुड़! ज्ञान और वैराग्य ही उनकी दो आँखें हैं।

भाव सहित खोजइ जो प्रानी। पाव भगति मनि सब सुख खानी॥मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा। राम ते अधिक राम कर दासा॥

जो प्राणी प्रेमके साथ इसे खोजता है, वह सब सुखोंकी खान इस भक्तिरूपी मणिको पा ही लेता है। हे प्रभो! मेरा तो यह दृढ़ विश्वास है कि श्रीरामके दास स्वयं श्रीरामसे भी बढ़कर हैं।

राम सिंधु घन सज्जन धीरा। चंदन तरु हरि संत समीरा॥सब कर फल हरि भगति सुहाई। सो बिनु संत न काहूँ पाई॥

श्रीराम समुद्र हैं, धीर संत मेघ हैं; श्रीहरि चन्दनका वृक्ष हैं, संत उसे सींचनेवाली हवा हैं। सारी साधनाओंका अन्तिम फल यही सुन्दर हरिभक्ति है, और यह संतके बिना किसीको कभी नहीं मिली।

अस बिचारि जोइ कर सतसंगा। राम भगति तेहि सुलभ बिहंगा॥१०

यह समझकर जो भी सत्संग करता है, हे गरुड़! उसके लिये श्रीरामकी भक्ति सहज ही सुलभ हो जाती है।

दोहा

ब्रह्म पयोनिधि मंदर ग्यान संत सुर आहिं।कथा सुधा मथि काढ़हिं भगति मधुरता जाहिं१२०(क)

वेद मानो समुद्र हैं, ज्ञान मन्दराचल पर्वत है और संत देवता हैं, जो इस समुद्रको मथकर कथारूपी अमृत निकालते हैं, जिसमें भक्तिकी मधुरता घुली रहती है।

दोहा

बिरति चर्म असि ग्यान मद लोभ मोह रिपु मारि।जय पाइअ सो हरि भगति देखु खगेस बिचारि१२०(ख)

वैराग्यरूपी ढालसे अपनी रक्षा करते हुए और ज्ञानरूपी तलवारसे मद, लोभ और मोहरूपी शत्रुओंको मारकर जो विजय पायी जाती है, वही हरिभक्ति है—हे पक्षिराज! इसे भलीभाँति विचार कर देखिये।

पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ। जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ॥नाथ मोहि निज सेवक जानी। सप्त प्रस्न मम कहहु बखानी॥

तब गरुड़जी फिर प्रेमपूर्वक बोले—हे कृपालु! यदि मुझपर आपका स्नेह है, तो हे नाथ! मुझे अपना ही सेवक मानकर मेरे सात प्रश्नोंका उत्तर विस्तारसे दीजिये।

प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा। सब ते दुर्लभ कवन सरीरा॥बड़ दुख कवन कवन सुख भारी। सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी॥

हे नाथ, हे धीरबुद्धि! पहले तो यह बताइये कि सबसे दुर्लभ शरीर कौन-सा है? फिर सबसे बड़ा दुःख और सबसे बड़ा सुख क्या है, यह भी संक्षेपमें समझाइये।

संत असंत मरम तुम्ह जानहु। तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु॥कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला। कहहु कवन अघ परम कराला॥

आप संत और असंतका भेद भलीभाँति जानते हैं, उनका सहज स्वभाव भी बतलाइये। साथ ही यह भी कहिये कि वेदोंमें बताया गया सबसे बड़ा पुण्य क्या है और सबसे भयंकर पाप कौन-सा है?

मानस रोग कहहु समुझाई। तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई॥तात सुनहु सादर अति प्रीती। मैं संछेप कहउँ यह नीती॥

फिर मानसिक रोगोंको भी समझाकर कहिये—आप सर्वज्ञ हैं और मुझपर आपकी कृपा भी अपार है। काकभुशुण्डिजी बोले—हे तात! अत्यन्त आदर और प्रेमसे सुनिये, मैं यह सारी नीति संक्षेपमें कहता हूँ।

नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही॥नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी॥

मनुष्यके शरीरके समान दूसरा कोई शरीर नहीं है—चराचर सभी जीव इसीकी कामना करते हैं। यह देह नरक, स्वर्ग और मोक्ष तीनोंकी सीढ़ी है और कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य व भक्ति देनेवाली है।

सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर। होहिं बिषय रत मंद मंद तर॥काँच किरिच बदलें ते लेही। कर ते डारि परस मनि देहीं॥

ऐसा दुर्लभ शरीर पाकर भी जो लोग श्रीहरिका भजन नहीं करते और नीच विषयोंमें ही डूबे रहते हैं, वे मानो पारसमणिको हाथसे फेंककर बदलेमें काँचके टुकड़े उठा लेते हैं।

नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं। संत मिलन सम सुख जग नाहीं॥पर उपकार बचन मन काया। संत सहज सुभाउ खगराया॥

संसारमें दरिद्रताके समान कोई दुःख नहीं और संतोंके मिलनके समान कोई सुख नहीं। हे गरुड़! मन, वचन और शरीरसे परोपकार करना ही संतोंका सहज स्वभाव है।

संत सहहिं दुख परहित लागी। परदुख हेतु असंत अभागी॥भूर्ज तरू सम संत कृपाला। परहित निति सह बिपति बिसाला॥

संत दूसरोंकी भलाईके लिये दुःख सहते हैं, जबकि अभागे दुष्ट दूसरोंको दुःख देनेके लिये ही जीते हैं। कृपालु संत भोजवृक्षकी तरह होते हैं, जो दूसरोंके हितके लिये सदा बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ सह लेते हैं।

सन इव खल पर बंधन करई। खाल कढ़ाइ बिपति सहि मरई॥खल बिनु स्वारथ पर अपकारी। अहि मूषक इव सुनु उरगारी॥

पर दुष्ट सनकी भाँति दूसरोंको बाँधनेके काम आते हैं और अपनी ही खाल उधड़वाकर विपत्ति सहते हुए नष्ट होते हैं। हे गरुड़! दुष्ट लोग साँप और चूहेकी तरह बिना किसी स्वार्थके भी दूसरोंका अहित करते हैं।

पर संपदा बिनासि नसाहीं। जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं॥दुष्ट उदय जग आरति हेतू। जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू॥१०

वे दूसरोंकी सम्पत्ति नष्ट करके स्वयं भी नष्ट हो जाते हैं, जैसे फ़सल बर्बाद करके ओले खुद भी पिघल जाते हैं। दुष्टका उभार जगत्के लिये वैसे ही अशुभ होता है जैसे अशुभ ग्रह केतुका उदय।

संत उदय संतत सुखकारी। बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी॥परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा। पर निंदा सम अघ न गरीसा॥११

इसके विपरीत संतोंका उभार सदा सुखकारी होता है, जैसे चन्द्रमा और सूर्यका उदय सारे संसारको सुख देता है। वेदोंमें अहिंसाको परम धर्म कहा गया है, और परनिन्दाके समान भारी पाप कोई नहीं।

हर गुर निंदक दादुर होई। जन्म सहस्त्र पाव तन सोई॥द्विज निंदक बहु नरक भोग करि। जग जनमइ बायस सरीर धरि॥१२

शिव और गुरुकी निन्दा करनेवाला अगले जन्ममें मेढक बनता है और हज़ार जन्मोंतक वही योनि पाता है। ब्राह्मणोंकी निन्दा करनेवाला बहुत नरक भोगनेके बाद कौएका शरीर पाकर जन्म लेता है।

सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी। रौरव नरक परहिं ते प्रानी॥होहिं उलूक संत निंदा रत। मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत॥१३

जो अभिमानी देवताओं और वेदोंकी निन्दा करते हैं, वे रौरव नरकमें पड़ते हैं। और जो संतोंकी निन्दामें रत रहते हैं, वे उल्लू बनते हैं, जिन्हें मोहरूपी रात ही प्रिय होती है और ज्ञानरूपी सूर्य जिनके लिये सदा अस्त रहता है।

सब के निंदा जे जड़ करहीं। ते चमगादुर होइ अवतरहीं॥सुनहु तात अब मानस रोगा। जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा॥१४

जो मूर्ख सबकी ही निन्दा करते फिरते हैं, वे चमगादड़ बनकर जन्मते हैं। अब हे तात! उन मानसिक रोगोंको सुनिये, जिनसे संसारके सभी लोग दुःख भोगते हैं।

मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला॥काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा॥१५

सभी रोगोंकी जड़ मोह ही है, और उसीसे आगे अनेक व्याधियाँ जन्म लेती हैं—काम मानो वात है, अपार लोभ कफ है, और क्रोध पित्त है जो सदा छातीको जलाता रहता है।

प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई। उपजइ सन्यपात दुखदाई॥बिषय मनोरथ दुर्लभ नाना। ते सब सूल नाम को जाना॥१६

यदि कहीं ये तीनों भाई—वात, पित्त और कफ—आपसमें मिल जायँ, तो दुखदायी सन्निपात रोग उठ खड़ा होता है। विषय-भोगकी दुर्लभ इच्छाएँ भी ऐसे ही असंख्य शूल हैं, जिनके नाम गिनना भी असम्भव है।

ममता दादु कंडु इरषाई। हरष बिषाद गरह बहुताई॥पर सुख देखि जरनि सोइ छई। कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई॥१७

ममता मानो दाद है, ईर्ष्या खुजली है, अति हर्ष और विषाद गलेके रोगोंकी भरमार है। पराया सुख देखकर जो जलन होती है वही क्षय-रोग है, और दुष्टता व मनकी कुटिलता ही कोढ़ है।

अहंकार अति दुखद डमरुआ। दंभ कपट मद मान नेहरुआ॥तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी। त्रिबिध ईषना तरुन तिजारी॥१८

अहंकार बहुत ही कष्टदायक गाँठका रोग है, दम्भ-कपट-मद-अभिमान मानो नसोंकी बीमारी है। तृष्णा भयंकर जलोदर है, और पुत्र-धन-मानकी तीव्र लालसाएँ प्रबल तिजारी बुखार हैं।

जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका। कहँ लागि कहौं कुरोग अनेका॥१९

ईर्ष्या और अविवेक दो प्रकारके ज्वर हैं—इस तरह अनगिनत बुरे रोग हैं, इन्हें कहाँतक गिनाऊँ।

दोहा

एक ब्याधि बस नर मरहिं ए असाधि बहु ब्याधि।पीड़हिं संतत जीव कहुँ सो किमि लहै समाधि१२१(क)

एक ही रोगके वश होकर मनुष्य मर जाते हैं—फिर ये तो बहुत-से असाध्य रोग हैं, जो जीवको निरन्तर सताते रहते हैं। ऐसी दशामें वह शान्ति भला कैसे पाये?

दोहा

नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान।भेषज पुनि कोटिन्ह नहिं रोग जाहिं हरिजान१२१(ख)

नियम, धर्म, सदाचार, तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान—और इनके अलावा करोड़ों औषधियाँ भी क्यों न हों, हे गरुड़! इन रोगोंका इनसे कभी नाश नहीं होता।

एहि बिधि सकल जीव जग रोगी। सोक हरष भय प्रीति बियोगी॥मानस रोग कछुक मैं गाए। हहिं सब कें लखि बिरलेन्ह पाए॥

इस तरह जगत्के सभी जीव रोगी हैं, शोक-हर्ष-भय-प्रीति और वियोगसे बुरी तरह पीड़ित हैं। मैंने तो बस कुछ मानस-रोग ही गिनाये हैं। ये तो सबमें होते हैं, पर इन्हें पहचान पाना किसी विरलेके ही बसकी बात है।

जाने ते छीजहिं कछु पापी। नास न पावहिं जन परितापी॥बिषय कुपथ्य पाइ अंकुरे। मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे॥

ये पीड़ादायी रोग पहचान लिये जानेपर कुछ कमज़ोर तो पड़ जाते हैं, पर पूरी तरह मिटते नहीं। विषयरूपी कुपथ्य पाकर तो ये मुनियोंके हृदयतक में फिरसे अंकुरित हो उठते हैं—फिर बेचारे साधारण मनुष्यकी क्या बिसात!

राम कृपाँ नासहि सब रोगा। जौं एहि भाँति बनै संयोगा॥सदगुर बैद बचन बिस्वासा। संजम यह न बिषय के आसा॥

यदि श्रीरामकी कृपासे ऐसा संयोग बन जाय तो ये सारे रोग जड़से मिट सकते हैं—सद्गुरुरूपी वैद्यके वचनोंपर पूरा विश्वास हो और विषयोंकी कोई आशा न रखी जाय, यही सच्चा परहेज़ है।

रघुपति भगति सजीवन मूरी। अनूपान श्रद्धा मति पूरी॥एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं। नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं॥

श्रीरघुनाथकी भक्ति ही असली संजीवनी बूटी है, और श्रद्धासे भरी बुद्धि ही उसका अनुपान है। ऐसा संयोग बन जाय तो ये रोग सचमुच मिट जाते हैं, वरना करोड़ों उपाय करनेपर भी नहीं मिटते।

जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई। जब उर बल बिराग अधिकाई॥सुमति छुधा बाढ़इ नित नई। बिषय आस दुर्बलता गई॥

हे गोसाईं! मनको सच्चे अर्थमें निरोग तब समझना जब हृदयमें वैराग्यका बल बढ़ जाय, उत्तम बुद्धिरूपी भूख हर दिन नयी होकर बढ़ती जाय, और विषयोंकी आशारूपी दुर्बलता पूरी तरह मिट जाय।

बिमल ग्यान जल जब सो नहाई। तब रह राम भगति उर छाई॥सिव अज सुक सनकादिक नारद। जे मुनि ब्रह्म बिचार बिसारद॥

जब मनुष्य इस तरह निर्मल ज्ञानरूपी जलमें स्नान कर लेता है, तब उसके हृदयमें रामभक्ति छा जाती है। शिव, ब्रह्मा, शुकदेव, सनकादि और नारदजी जैसे ब्रह्मविद्या-निपुण मुनि भी,

सब कर मत खगनायक एहा। करिअ राम पद पंकज नेहा॥श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं। रघुपति भगति बिना सुख नाहीं॥

हे पक्षिराज! उन सबका यही निष्कर्ष है कि श्रीरामके चरणकमलोंमें प्रेम रखना चाहिये। वेद, पुराण और सभी ग्रन्थ यही कहते हैं कि श्रीरघुनाथकी भक्तिके बिना सुख कहीं नहीं है।

कमठ पीठ जामहिं बरु बारा। बंध्या सुत बरु काहुहि मारा॥फूलहिं नभ बरु बहुबिधि फूला। जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला॥

कछुएकी पीठपर बाल उग आयें, बाँझका बेटा किसीको मार डाले, या आकाशमें तरह-तरहके फूल खिल जायँ—भले ऐसा हो जाय, पर श्रीहरिसे मुँह मोड़कर जीव कभी सुख नहीं पा सकता।

तृषा जाइ बरु मृगजल पाना। बरु जामहिं सस सीस बिषाना॥अंधकारु बरु रबिहि नसावै। राम बिमुख न जीव सुख पावै॥

मृगतृष्णाका पानी पीकर प्यास बुझ जाय, खरगोशके सिरपर सींग उग आयें, या अन्धकार सूर्यको ही निगल जाय—भले यह हो जाय, पर श्रीरामसे विमुख होकर जीव सुखी नहीं हो सकता।

हिम ते अनल प्रगट बरु होई। बिमुख राम सुख पाव न कोई॥१०

बर्फसे आग निकल आये—भले यह असम्भव भी सम्भव हो जाय, पर श्रीरामसे विमुख रहकर कोई भी कभी सुख नहीं पा सकता।

दोहा

उबारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल।बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल१२२(क)

पानी मथनेसे घी निकल आये, बालूसे तेल निचुड़ आये—भले यह हो जाय, पर श्रीहरिके भजनके बिना भवसागर पार करना असम्भव है, यह सिद्धान्त कभी नहीं बदलता।

दोहा

मसकहि करइ बिरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन।अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन१२२(ख)

प्रभु चाहें तो मच्छरको ब्रह्मा बना दें और ब्रह्माको मच्छरसे भी तुच्छ कर दें—यह समझकर चतुर पुरुष सारा सन्देह त्यागकर बस श्रीरामका ही भजन करते हैं।

श्लोक

विनिच्श्रितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे।हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते१२२(ग)

मैं तुम्हें पूरे निश्चयके साथ कहता हूँ, मेरे ये वचन कभी झूठे नहीं होंगे—जो मनुष्य श्रीहरिको भजते हैं, वे इस अत्यन्त दुस्तर संसार-सागरको सहज ही पार कर जाते हैं।

कहेउँ नाथ हरि चरित अनूपा। ब्यास समास स्वमति अनुरुपा॥श्रुति सिद्धांत इहइ उरगारी। राम भजिअ सब काज बिसारी॥

हे नाथ! मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार श्रीहरिका यह अनुपम चरित्र कहीं विस्तारसे तो कहीं संक्षेपमें कह दिया। हे गरुड़! वेदोंका यही सार-सिद्धान्त है कि सब कुछ भुलाकर बस श्रीरामका भजन करना चाहिये।

प्रभु रघुपति तजि सेइअ काही। मोहि से सठ पर ममता जाही॥तुम्ह बिग्यानरूप नहिं मोहा। नाथ कीन्हि मो पर अति छोहा॥

प्रभु श्रीरघुनाथको छोड़कर और किसकी सेवा की जाय, जिनका मुझ-जैसे मूर्खपर भी इतना स्नेह है! हे नाथ! आप तो स्वयं ज्ञानस्वरूप हैं, आपको भला मोह कैसे होगा—आपने तो मुझपर केवल बड़ी कृपा ही की है।

पूछिहुँ राम कथा अति पावनि। सुक सनकादि संभु मन भावनि॥सत संगति दुर्लभ संसारा। निमिष दंड भरि एकउ बारा॥

आपने मुझसे शुकदेव, सनकादि और शिवजीके मनको भानेवाली वह अत्यन्त पवित्र रामकथा पूछी। संसारमें घड़ीभर, यहाँतक कि पलभरका भी एक सच्चा सत्संग पाना बड़ा दुर्लभ है।

देखु गरुड़ निज हृदयँ बिचारी। मैं रघुबीर भजन अधिकारी॥सकुनाधम सब भाँति अपावन। प्रभु मोहि कीन्ह बिदित जग पावन॥

हे गरुड़! अपने हृदयमें विचार करके देखिये—क्या सचमुच मैं श्रीरामके भजनका अधिकारी हूँ? मैं तो पक्षियोंमें सबसे नीच और हर तरहसे अपवित्र हूँ, फिर भी प्रभुने मुझे जगत्को पावन करनेवाला बना दिया।

दोहा

आजु धन्य मैं धन्य अति जद्यपि सब बिधि हीन।निज जन जानि राम मोहि संत समागम दीन१२३(क)

यद्यपि मैं हर तरहसे हीन हूँ, फिर भी आज मैं धन्य हूँ, अत्यन्त धन्य हूँ—क्योंकि श्रीरामने मुझे अपना ही जन मानकर तुम्हारा यह संत-समागम दिया।

दोहा

नाथ जथामति भाषेउँ राखेउ नहिं कछु गोइ।चरित सिंधु रघुनायक थाह कि पावइ कोइ१२३(ख)

हे नाथ! मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार जो कुछ जानता था, बिना कुछ छिपाये कह दिया। पर श्रीरघुवीरका चरित्र तो समुद्रके समान अथाह है—उसकी थाह भला कोई कैसे पा सकता है?

सुमिरि राम के गुन गन नाना। पुनि पुनि हरष भुसुंडि सुजाना॥महिमा निगम नेति करि गाई। अतुलित बल प्रताप प्रभुताई॥

श्रीरामके अनगिनत गुणोंका बार-बार स्मरण करते हुए सुजान भुशुण्डिजी हर्षसे भर उठते हैं—जिनकी महिमा वेदोंने "नेति-नेति" कहकर गायी है, जिनका बल-प्रताप-प्रभुत्व अतुलनीय है,

सिव अज पूज्य चरन रघुराई। मो पर कृपा परम मृदुलाई॥अस सुभाउ कहुँ सुनउँ न देखउँ। केहि खगेस रघुपति सम लेखउँ॥

जिनके चरण शिव और ब्रह्मा तक पूजते हैं, उन्हींकी इतनी कृपा मुझपर होना उनकी अपार कोमलताका ही प्रमाण है। ऐसा स्वभाव मैंने न कभी सुना, न देखा। हे गरुड़! फिर श्रीरघुनाथके समान मैं किसे मानूँ?

साधक सिद्ध बिमुक्त उदासी। कबि कोबिद कृतग्य संन्यासी॥जोगी सूर सुतापस ग्यानी। धर्म निरत पंडित बिग्यानी॥

साधक, सिद्ध, मुक्त, विरक्त, कवि, विद्वान्, कृतज्ञ, संन्यासी, योगी, शूरवीर, महान् तपस्वी, ज्ञानी, धर्मपरायण, पण्डित, विज्ञानी—

तरहिं न बिनु सेएँ मम स्वामी। राम नमामि नमामि नमामी॥सरन गए मो से अघ रासी। होहिं सुद्ध नमामि अबिनासी॥

ये सब भी बिना मेरे स्वामी श्रीरामकी सेवाके पार नहीं हो सकते। मैं उन्हींको बार-बार नमस्कार करता हूँ—जिनकी शरणमें जाते ही मुझ-जैसा पापोंका ढेर भी शुद्ध हो जाता है, उन अविनाशी श्रीरामको मेरा प्रणाम है।

दोहा

जासु नाम भव भेषज हरन घोर त्रय सूल।सो कृपाल मोहि तो पर सदा रहउ अनुकूल१२४(क)

जिनका नाम जन्म-मरणके रोगकी अचूक औषधि है और तीनों भयंकर तापोंको हरनेवाला है, वे कृपालु श्रीराम मुझपर और आपपर सदा प्रसन्न बने रहें।

दोहा

सुनि भुसुंडि के बचन सुभ देखि राम पद नेह।बोलेउ प्रेम सहित गिरा गरुड़ बिगत संदेह१२४(ख)

भुशुण्डिजीके इन मंगलमय वचनोंको सुनकर और श्रीरामके चरणोंमें उनका गहरा प्रेम देखकर, हर सन्देहसे मुक्त हो चुके गरुड़जी प्रेमसे भरकर बोले—

मै कृत्कृत्य भयउँ तव बानी। सुनि रघुबीर भगति रस सानी॥राम चरन नूतन रति भई। माया जनित बिपति सब गई॥

आपकी भक्ति-रससे सनी वाणी सुनकर मैं कृतकृत्य हो गया। श्रीरामके चरणोंमें मेरा नया प्रेम जाग उठा और मायासे उपजी सारी विपत्तियाँ दूर हो गयीं।

मोह जलधि बोहित तुम्ह भए। मो कहँ नाथ बिबिध सुख दए॥मो पहिं होइ न प्रति उपकारा। बंदउँ तव पद बारहिं बारा॥

मोहके समुद्रमें डूबते हुए मेरे लिये आप जहाज़ बन गये, हे नाथ! आपने मुझे भाँति-भाँतिका सुख दिया। इसका बदला चुकाना मेरे बसकी बात नहीं—मैं तो बस बार-बार आपके चरणोंकी वन्दना ही करता हूँ।

पूरन काम राम अनुरागी। तुम्ह सम तात न कोउ बड़भागी॥संत बिटप सरिता गिरि धरनी। पर हित हेतु सबन्ह के करनी॥

आप पूर्णकाम हैं और श्रीरामके सच्चे प्रेमी हैं—हे तात! आपके समान भाग्यशाली कोई नहीं। संत, वृक्ष, नदी, पर्वत और पृथ्वी—इन सभीका स्वभाव ही दूसरोंका भला करना है।

संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना॥निज परिताप द्रवइ नवनीता। पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता॥

कवियोंने संतोंके हृदयको मक्खनके समान बताया है, पर उन्होंने असली बात नहीं समझी—मक्खन तो अपनी ही आँच पाकर पिघलता है, जबकि पावन संत दूसरोंके दुःखसे पिघल जाते हैं।

जीवन जन्म सुफल मम भयऊ। तव प्रसाद संसय सब गयऊ॥जानेहु सदा मोहि निज किंकर। पुनि पुनि उमा कहइ बिहंगबर॥

मेरा जीवन और जन्म आज सार्थक हो गया, आपकी कृपासे मेरा सारा सन्देह मिट गया—मुझे सदा अपना सेवक ही समझियेगा। शिवजी कहते हैं—हे उमा! श्रेष्ठ पक्षी गरुड़ बार-बार ऐसा ही कहते रहे।

दोहा

तासु चरन सिरु नाइ करि प्रेम सहित मतिधीर।गयउ गरुड़ बैकुंठ तब हृदयँ राखि रघुबीर१२५(क)

फिर उन भुशुण्डिजीके चरणोंमें प्रेमसहित सिर झुकाकर और हृदयमें श्रीरघुवीरको बसाये हुए धीरबुद्धि गरुड़जी वैकुण्ठकी ओर चल पड़े।

दोहा

गिरिजा संत समागम सम न लाभ कछु आन।बिनु हरि कृपा न होइ सो गावहिं बेद पुरान१२५(ख)

हे गिरिजे! संत-समागमके समान दूसरा कोई लाभ नहीं है। पर वेद-पुराण यही कहते हैं कि यह हरिकृपाके बिना कभी सम्भव नहीं होता।

कहेउँ परम पुनीत इतिहासा। सुनत श्रवन छूटहिं भव पासा॥प्रनत कल्पतरु करुना पुंजा। उपजइ प्रीति राम पद कंजा॥

मैंने यह परम पवित्र कथा सुना दी, जिसे कानों सुनते ही संसारके बन्धन कट जाते हैं और शरणागतोंके कल्पवृक्ष, करुणाके सागर श्रीरामके चरणकमलोंमें सच्चा प्रेम जाग उठता है।

मन क्रम बचन जनित अघ जाई। सुनहिं जे कथा श्रवन मन लाई॥तीर्थाटन साधन समुदाई। जोग बिराग ग्यान निपुनाई॥

जो लोग कान और मन लगाकर इस कथाको सुनते हैं, उनके मन-वचन-कर्मसे उपजे सारे पाप धुल जाते हैं। तीर्थयात्रा जैसे अनेक साधन, योग-वैराग्य-ज्ञानकी निपुणता—

नाना कर्म धर्म ब्रत दाना। संजम दम जप तप मख नाना॥भूत दया द्विज गुर सेवकाई। बिद्या बिनय बिबेक बड़ाई॥

तरह-तरहके कर्म, धर्म, व्रत, दान, संयम, इन्द्रियदमन, जप-तप-यज्ञ, प्राणियोंपर दया, गुरु-ब्राह्मणकी सेवा, विद्या-विनय-विवेककी महानता—

जहँ लगि साधन बेद बखानी। सब कर फल हरि भगति भवानी॥सो रघुनाथ भगति श्रुति गाई। राम कृपाँ काहूँ एक पाई॥

हे भवानी! वेदोंने जितने भी साधन बताये हैं, उन सबका अन्तिम फल श्रीहरिकी भक्ति ही है। पर वेदोंमें गायी गयी वह भक्ति श्रीरामकी कृपासे किसी विरलेको ही मिल पाती है।

दोहा

मुनि दुर्लभ हरि भगति नर पावहिं बिनहिं प्रयास।जे यह कथा निरंतर सुनहिं मानि बिस्वास१२६

जो लोग श्रद्धा और विश्वाससहित यह कथा निरन्तर सुनते रहते हैं, वे मुनियोंको भी दुर्लभ उस हरिभक्तिको बिना किसी विशेष परिश्रमके ही पा लेते हैं।

सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता। सोइ महि मंडित पंडित दाता॥धर्म परायन सोइ कुल त्राता। राम चरन जा कर मन राता॥

जिसका मन श्रीरामके चरणोंमें रम गया, वही सचमुच सर्वज्ञ है, वही गुणी है, वही ज्ञानी है। वही पृथ्वीका आभूषण, सच्चा पण्डित और दानी है, वही धर्मपरायण है और वही अपने कुलका सच्चा रक्षक है।

नीति निपुन सोइ परम सयाना। श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना॥सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा। जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा॥

जो छल छोड़कर श्रीरघुवीरका भजन करता है, वही नीतिमें निपुण है, वही सबसे बुद्धिमान् है, उसीने वेदोंका सार समझा है—वही सच्चा कवि, विद्वान् और रणधीर भी है।

धन्य देस सो जहँ सुरसरी। धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी॥धन्य सो भूपु नीति जो करई। धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई॥

वह देश धन्य है जहाँ गंगाजी बहती हैं, वह स्त्री धन्य है जो पातिव्रत्यका पालन करती है, वह राजा धन्य है जो न्यायसे शासन करता है, और वह ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्मसे कभी नहीं डिगता।

सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी॥धन्य घरी सोइ जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा॥

वह धन धन्य है जो दानमें लगता है, वही बुद्धि धन्य और परिपक्व है जो पुण्यमें रमी रहती है, वही घड़ी धन्य है जिसमें सत्संग मिले, और वही जन्म धन्य है जिसमें अखण्ड रामभक्ति हो।

दोहा

सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत।श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत१२७

हे उमा! सुनो, वह कुल धन्य है, जगत्भरके लिये पूज्य और परम पवित्र है, जिसमें कोई विनम्र, श्रीरघुवीरका अनन्य भक्त पुरुष जन्म ले।

मति अनुरूप कथा मैं भाषी। जद्यपि प्रथम गुप्त करि राखी॥तव मन प्रीति देखि अधिकाई। तब मैं रघुपति कथा सुनाई॥

मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार यह कथा तुम्हें सुनायी, यद्यपि इसे पहले मैंने छिपाकर ही रखा था। पर जब तुम्हारे मनमें प्रेमकी गहराई देखी, तभी मैंने श्रीरघुनाथकी यह कथा तुम्हें सुनायी।

यह न कहिअ सठही हठसीलहि। जो मन लाइ न सुनइ हरि लीलहि॥कहिअ न लोभिहि क्रोधहि कामिहि। जो न भजइ सचराचर स्वामिहि॥

यह कथा उन्हें कभी नहीं सुनानी चाहिये जो धूर्त और हठी हों, जो मन लगाकर श्रीहरिकी लीला न सुनते हों। लोभी, क्रोधी और कामीको भी नहीं, जो चराचरके स्वामीको कभी नहीं भजते।

द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ। सुरपति सरिस होइ नृप जबहूँ॥राम कथा के तेइ अधिकारी। जिन्ह कें सतसंगति अति प्यारी॥

ब्राह्मणद्रोहीको यह कथा कभी न सुनानी चाहिये, भले ही वह इन्द्रके समान वैभवशाली राजा ही क्यों न हो। रामकथाके सच्चे अधिकारी तो वे ही हैं जिन्हें सत्संगति सबसे अधिक प्रिय है।

गुर पद प्रीति नीति रत जेई। द्विज सेवक अधिकारी तेई॥ता कहँ यह बिसेष सुखदाई। जाहि प्रानप्रिय श्रीरघुराई॥

जिनकी गुरुके चरणोंमें प्रीति है, जो नीतिपरायण हैं और ब्राह्मणोंके सेवक हैं, वे ही इस कथाके अधिकारी हैं। और जिसे श्रीरघुनाथजी प्राणोंसे भी प्यारे हों, उसके लिये तो यह कथा विशेष सुखदायी है।

दोहा

राम चरन रति जो चह अथवा पद निर्बान।भाव सहित सो यह कथा करउ श्रवन पुट पान१२८

जो श्रीरामके चरणोंमें प्रेम चाहता हो या मोक्षपद पाना चाहता हो, वह इस कथारूपी अमृतको प्रेमपूर्वक अपने कानोंके दोनेमें भरकर पिये।

राम कथा गिरिजा मैं बरनी। कलि मल समनि मनोमल हरनी॥संसृति रोग सजीवन मूरी। राम कथा गावहिं श्रुति सूरी॥

हे गिरिजे! मैंने कलियुगके पापोंका नाश करनेवाली और मनके मैलको धोनेवाली यह रामकथा तुम्हें सुनायी। वेद और मनीषी यही कहते हैं कि यह रामकथा जन्म-मरणरूपी रोगकी संजीवनी बूटी है।

एहि महँ रुचिर सप्त सोपाना। रघुपति भगति केर पंथाना॥अति हरि कृपा जाहि पर होई। पग देइ एहिं मारग सोई॥

इसमें रामभक्तिको पानेके सुन्दर सात सोपान हैं। जिसपर श्रीहरिकी अपार कृपा होती है, वही इस मार्गपर पहला कदम रख पाता है।

मन कामना सिद्धि नर पावा। जे यह कथा कपट तजि गावा॥कहहिं सुनहिं अनुमोदन करहीं। ते गोपद इव भवनिधि तरहीं॥

जो लोग कपट त्यागकर यह कथा गाते हैं, वे अपनी मनोकामना पूरी कर लेते हैं। जो इसे कहते, सुनते और सराहते हैं, वे संसार-सागरको गौके खुरके गड्ढेजैसी छोटी बाधाकी तरह सहज ही पार कर जाते हैं।

सुनि सब कथा हृदयँ अति भाई। गिरिजा बोली गिरा सुहाई॥नाथ कृपाँ मम गत संदेहा। राम चरन उपजेउ नव नेहा॥

यह सारी कथा सुनकर पार्वतीजीके हृदयको बहुत भायी, और वे मधुर वाणीमें बोलीं—हे नाथ! आपकी कृपासे मेरा सन्देह मिट गया और श्रीरामके चरणोंमें मेरा नया प्रेम जाग उठा।

दोहा

मैं कृतकृत्य भई अब तव प्रसाद बिस्वेस।उपजी राम भगति दृढ़ बीते सकल कलेस१२९

हे विश्वनाथ! आपकी कृपासे अब मैं सचमुच कृतार्थ हो गयी—मुझमें दृढ़ रामभक्ति जन्म ले चुकी है और मेरे सारे क्लेश बीत गये।

यह सुभ संभु उमा संबादा। सुख संपादन समन बिषादा॥भव भंजन गंजन संदेहा। जन रंजन सज्जन प्रिय एहा॥

शिव-पार्वतीका यह कल्याणकारी संवाद सुख देनेवाला और शोकका नाश करनेवाला है। यह जन्म-मरणका अन्त करता है, सन्देह मिटाता है, भक्तोंको आनन्द देता है और संतोंको सबसे प्रिय है।

राम उपासक जे जग माहीं। एहि सम प्रिय तिन्ह के कछु नाहीं॥रघुपति कृपाँ जथामति गावा। मैं यह पावन चरित सुहावा॥

जगत्में जितने भी रामोपासक हैं, उन्हें इस कथाके समान प्रिय और कुछ भी नहीं। श्रीरघुनाथकी कृपासे ही मैंने यह पवित्र और सुन्दर चरित्र अपनी बुद्धिके अनुसार गाया है।

एहिं कलिकाल न साधन दूजा। जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा॥रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि। संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि॥

इस कलिकालमें योग, यज्ञ, जप, तप, व्रत या पूजा—इनमें से कोई भी दूसरा साधन काम नहीं आता। बस श्रीरामका ही स्मरण करना है, उन्हींका गुण गाना है और निरन्तर उन्हींके गुणसमूह सुनने हैं।

जासु पतित पावन बड़ बाना। गावहिं कबि श्रुति संत पुराना॥ताहि भजहि मन तजि कुटिलाई। राम भजें गति केहिं नहिं पाई॥

पतितोंको पवित्र करना जिनका प्रसिद्ध स्वभाव है—ऐसा कवि, वेद, संत और पुराण सब गाते हैं। हे मन! कुटिलता त्यागकर उन्हींको भज—श्रीरामको भजकर आजतक किसने परम गति नहीं पायी?

छंद

पाई न केहिं गति पतित पावन राम भजि सुनु सठ मना।गनिका अजामिल ब्याध गीध गजादि खल तारे घना॥आभीर जमन किरात खस स्वपचादि अति अघरूप जे।कहि नाम बारक तेपि पावन होहिं राम नमामि ते॥

अरे मूर्ख मन! सुन—पतितोंको भी पावन करनेवाले श्रीरामको भजकर किसने परम गति नहीं पायी? गणिका, अजामिल, बहेलिया, गीध, हाथी जैसे अनेक दुष्टोंको उन्होंने तार दिया। अहीर, यवन, किरात, खस, चाण्डाल जैसे अत्यन्त पापी लोग भी उनका नाम एक बार लेकर पवित्र हो जाते हैं—उन श्रीरामको मैं नमस्कार करता हूँ।

दोहा

रघुबंस भूषन चरित यह नर कहहिं सुनहिं जे गावहीं।कलि मल मनोमल धोइ बिनु श्रम राम धाम सिधावहीं॥सत पंच चौपाईं मनोहर जानि जो नर उर धरै।दारुन अबिद्या पंच जनित बिकार श्रीरघुबर हरै॥

जो मनुष्य रघुकुलभूषण श्रीरामके इस चरित्रको कहते, सुनते या गाते हैं, वे कलियुगके पाप और मनका मैल धोकर बिना किसी परिश्रमके ही श्रीरामके परम धामको चले जाते हैं। यहाँतक कि जो पाँच-सात चौपाइयोंको भी मनोहर जानकर हृदयमें बसा लेता है, उसके भी पाँचों अविद्याजनित भयंकर विकारोंको श्रीराम हर लेते हैं।

दोहा

सुंदर सुजान कृपा निधान अनाथ पर कर प्रीति जो।सो एक राम अकाम हित निर्बानप्रद सम आन को॥जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ।पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ॥

परम सुन्दर, सुजान और कृपानिधान, अनाथोंपर प्रेम करनेवाले तो एकमात्र श्रीराम ही हैं। इनके समान निःस्वार्थ हित करनेवाला और मोक्ष देनेवाला दूसरा कौन है? जिनकी लेशमात्र कृपासे मन्दबुद्धि तुलसीदासने भी परम शान्ति पायी, उन श्रीरामके समान कोई प्रभु कहीं नहीं है।

दोहा

मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर।अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर१३०(क)

हे श्रीरघुवीर! मेरे समान कोई दीन नहीं और आपके समान दीनोंका हित करनेवाला कोई नहीं—हे रघुवंशमणि! यह विचारकर मेरे भयंकर जन्म-मरणके भयको हर लीजिये।

दोहा

कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभहि प्रिय जिमि दाम।तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम१३०(ख)

जैसे कामीको स्त्री प्रिय लगती है और लोभीको धन, वैसे ही हे रघुनाथ, हे राम! आप मुझे सदा-सर्वदा प्रिय लगते रहिये।

श्लोक

यत्पूर्वं प्रभुणा कृतं सुकविना श्रीशम्भुना दुर्गमंश्रॆमद्रामपदाब्जभक्तिमनिशम प्राप्त्यै तू रामायणं।मत्वा तद्रघुनाथनामनिरतम स्वान्तस्तम:शान्तयेभाषाबद्ध्मिदम चकार तुलसीदासस्तथा मानसं॥

जो दुर्गम रामायण पहले भगवान् शिवने, उत्तम कवि होते हुए, श्रीरामके चरणकमलोंमें निरन्तर भक्ति पानेके लिये रचा था, उसीको समझकर, सदा रघुनाथके नाममें रत रहते हुए, अपने हृदयके अन्धकारको शान्त करनेके लिये तुलसीदासने इस "मानस" को लोकभाषामें बाँधा।

श्लोक

पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानाभाक्तिप्रदममायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम।श्रीमद्रामचरितमानसमिदं भक्त्यावगाहन्ति येते संसारपतंगघोरकिरणैर्दह्यन्ति नो मानवाः॥

यह पवित्र, पापोंका नाश करनेवाला, सदा कल्याणकारी, विज्ञान और भक्ति देनेवाला, माया-मोहके मैलको धोनेवाला, अत्यन्त निर्मल और प्रेमरूपी जलसे भरा शुभ रामचरितमानस—जो मनुष्य इसमें भक्तिपूर्वक डुबकी लगाते हैं, वे संसाररूपी सूर्यकी भयंकर किरणोंसे कभी नहीं झुलसते।

श्लोक

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने सप्तमः सोपानः समाप्तः।

कलियुगके समस्त पापोंका नाश करनेवाले इस श्रीरामचरितमानसका यह सातवाँ सोपान, उत्तरकाण्ड, यहाँ समाप्त हुआ।

छंद

आरति श्री रामायण जी की। कीरति कलित ललित सिय पी की॥गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद। बाल्मीकि बिग्यान बिसारद॥सुक सनकादिक सेष अरु सारद। बरनि पवनसुत कीरति नीकी॥गावत बेद पुरान अष्टदस। छओ सास्त्र सब ग्रंथन को रस॥मुनि जन धन संतन को सरबस। सार अंस सम्मत सबही की॥गावत संतत संभु भवानी। अरु घटसंभव मुनि बिग्यानी॥ब्यास आदिक कबिबर्ज बखानी। कागभुसुंडि गरुड़ के ही की॥कलिमल हरनि बिषय रस फीकी। सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की॥दलन रोग भव मूरि अमी की। तात मात सब बिधि तुलसी की॥

यह श्रीरामायणजीकी आरती है, जो सीतापतिकी सुन्दर और उज्ज्वल कीर्तिका बखान करती है। इसे ब्रह्मा आदि देवता, नारदजी, विज्ञानमें निपुण वाल्मीकिजी, शुकदेव, सनकादि मुनि, शेषजी और सरस्वतीजी गाते हैं, और हनुमानजीकी सुन्दर कीर्तिका वर्णन करती है। अठारहों पुराण और वेद इसे गाते हैं, यही छहों शास्त्रों और समस्त ग्रन्थोंका सार है, मुनियों और संतोंकी सबसे बड़ी थाती है, तथा सबके सम्मत सारका ही अंश है। शिव-पार्वती और घटसंभव अगस्त्य मुनि सदा इसे गाते हैं, व्यास आदि श्रेष्ठ कवियोंने इसे बखाना है, और यह काकभुशुण्डि तथा गरुड़के संवादका ही सार है। यह कलियुगके पापोंको हरनेवाली है, विषय-भोगके नीरस रसको फीका कर देनेवाली है, मुक्तिरूपी युवतीका सुन्दर शृंगार है, संसारके रोगोंको मिटानेवाली अमृत-जड़ी है, और तुलसीदासके लिये हर तरहसे माता-पिताके समान है।