सप्तम सोपान
उत्तरकाण्ड
अयोध्या वापसी, राज्याभिषेक एवं रामराज्य की कथा।
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अयोध्या वापसी, राज्याभिषेक एवं रामराज्य की कथा।
यह कथा शीघ्र ही यहाँ सुनने हेतु भी उपलब्ध होगी
केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नंशोभाढ्यं पीतवस्त्रं सरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्नम्।पाणौ नाराचचापं कपिनिकरयुतं बन्धुना सेव्यमानंनौमीड्यं जानकीशं रघुवरमनिशं पुष्पकारूढरामम्॥॥१॥
मोरके कंठकी नीलिमा-सी श्यामल कान्तिवाले, ऋषिके चरण-चिह्नसे अंकित, पीताम्बरधारी, कमलनयन, सदा प्रसन्नचित्त, हाथमें धनुष-बाण लिये, वानरसेनासे घिरे और भाई लक्ष्मणसे सेवित, वन्दनीय, जानकीनाथ, पुष्पकविमानपर विराजमान श्रीरघुनाथको मैं बारम्बार प्रणाम करता हूँ।
कोसलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुलौ कोमलावजमहेशवन्दितौ।जानकीकरसरोजलालितौ चिन्तकस्य मनभृङ्गसड्गिनौ॥॥२॥
कोसलनरेशके वे सुकुमार चरणकमल, जिन्हें ब्रह्मा और शिव वन्दन करते हैं, जो जानकीजीके हाथोंसे दुलराये जाते हैं और साधककी मनोरूपी भ्रमरीको सदा अपने पास बाँधे रखते हैं, उन्हें मैं नमन करता हूँ।
कुन्दइन्दुदरगौरसुन्दरं अम्बिकापतिमभीष्टसिद्धिदम्।कारुणीककलकञ्जलोचनं नौमि शंकरमनंगमोचनम्॥॥३॥
कुन्दपुष्प और चन्द्रमाकी-सी गौर, सुन्दर कान्तिवाले, पार्वतीके स्वामी, इच्छित सिद्धि देनेवाले, करुणाके सागर, कमलनयन तथा कामको भस्म करनेवाले शिवजीको मैं प्रणाम करता हूँ।
रहा एक दिन अवधि कर अति आरत पुर लोग।जहँ तहँ सोचहिं नारि नर कृस तन राम बियोग॥सगुन होहिं सुंदर सकल मन प्रसन्न सब केर।प्रभु आगवन जनाव जनु नगर रम्य चहुँ फेर॥कौसल्यादि मातु सब मन अनंद अस होइ।आयउ प्रभु श्री अनुज जुत कहन चहत अब कोइ॥भरत नयन भुज दच्छिन फरकत बारहिं बार।जानि सगुन मन हरष अति लागे करन बिचार॥
वनवासकी अवधिका अन्तिम दिन आ पहुँचा और अवधके नर-नारी विरहमें दुबले होकर व्याकुल थे। तभी सुन्दर शकुन होने लगे, सबके मन प्रफुल्लित हो उठे मानो नगर स्वयं प्रभुके आगमनकी सूचना दे रहा हो। माताओंके हृदयमें भी वैसा ही आनन्द उमड़ आया जैसे कोई अभी कह उठेगा कि सीता-लक्ष्मणसहित प्रभु आ गये। भरतका दाहिना नेत्र और दाहिनी भुजा बार-बार फड़कने लगी; इस शुभ शकुनको जानकर उनका मन हर्षसे भर गया और वे सोचने लगे।
रहेउ एक दिन अवधि अधारा। समुझत मन दुख भयउ अपारा॥कारन कवन नाथ नहिं आयउ। जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ॥॥१॥
पर वनवासका अन्तिम दिन बीता जा रहा था, फिर भी प्रभु नहीं लौटे; यह सोचकर भरतका मन असीम दुःखसे भर गया। वे व्याकुल होकर विचारने लगे कि आखिर क्या बात हुई कि नाथ नहीं आये—कहीं मुझे कुटिल समझकर उन्होंने भुला तो नहीं दिया?
अहह धन्य लछिमन बड़भागी। राम पदारबिंदु अनुरागी॥कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा। ताते नाथ संग नहिं लीन्हा॥॥२॥
वे कहते हैं कि लक्ष्मण सचमुच धन्य और भाग्यशाली हैं, जो श्रीरामके चरणोंसे कभी अलग नहीं हुए। मुझे ही प्रभुने कपटी और कुटिल समझा होगा, इसीलिये साथ नहीं ले गये।
जौं करनी समुझै प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कलप सत कोरी॥जन अवगुन प्रभु मान न काऊ। दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ॥॥३॥
यदि प्रभु मेरे कर्मोंको तौलें तो करोड़ों कल्पोंमें भी मेरा उद्धार सम्भव नहीं; फिर भी यह धीरज है कि वे सेवकके दोषको कभी हृदयमें नहीं रखते, क्योंकि वे दीनोंके सहारे और अत्यन्त कोमल स्वभावके हैं।
मोरि जियँ भरोस दृढ़ सोई। मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई॥बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना। अधम कवन जग मोहि समाना॥॥४॥
इसी भरोसेपर भरतका मन टिका है कि शुभ शकुन देखकर श्रीराम अवश्य लौटेंगे; पर वे यह भी कहते हैं कि यदि अवधि बीत गयी और वे जीवित रह गये, तो संसारमें उनसे नीच कोई न होगा।
राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत।बिप्र रूप धरि पवन सुत आइ गयउ जनु पोत॥॥१(क)॥
भरत जब विरहके इस सागरमें डूबते जा रहे थे, ठीक उसी क्षण हनुमानजी ब्राह्मणका वेश धरकर वहाँ आ पहुँचे, मानो डूबतेको बचानेके लिये कोई नाव आ लगी हो।
बैठि देखि कुसासन जटा मुकुट कृस गात।राम राम रघुपति जपत स्त्रवत नयन जलजात॥॥१(ख)॥
उन्होंने देखा—भरत कुशके आसनपर बैठे हैं, जटाओंका मुकुट बना है, शरीर दुबला पड़ गया है, और वे नेत्रोंसे अश्रु बहाते हुए निरन्तर 'राम राम' रट रहे हैं।
देखत हनूमान अति हरषेउ। पुलक गात लोचन जल बरषेउ॥मन महँ बहुत भाँति सुख मानी। बोलेउ श्रवन सुधा सम बानी॥॥१॥
भरतको देखते ही हनुमानजीका हृदय हर्षसे उमड़ पड़ा, रोम-रोम पुलकित हो उठा और नेत्र भर आये। भीतर ही भीतर अपार सुख अनुभव करते हुए वे कानोंको अमृत-सी लगनेवाली वाणीमें बोल उठे।
जासु बिरहँ सोचहु दिन राती। रटहु निरंतर गुन गन पाँती॥रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता। आयउ कुसल देव मुनि त्राता॥॥२॥
उन्होंने कहा—जिनके वियोगमें आप रात-दिन घुलते रहते हैं और जिनके गुणोंकी माला निरन्तर जपते रहते हैं, वे ही रघुकुलतिलक, सज्जनोंको सुख देनेवाले, देव-मुनियोंके रक्षक श्रीराम कुशलपूर्वक लौट आये हैं।
रिपु रन जीति सुजस सुर गावत। सीता सहित अनुज प्रभु आवत॥सुनत बचन बिसरे सब दूखा। तृषावंत जिमि पाइ पियूषा॥॥३॥
शत्रुको युद्धमें परास्त कर, देवताओंसे स्तुत हो, सीता और लक्ष्मणसहित प्रभु आ रहे हैं—यह सुनते ही भरतका सारा दुःख वैसे ही विलीन हो गया जैसे प्यासेको अमृत मिलते ही तृष्णा शान्त हो जाती है।
को तुम्ह तात कहाँ ते आए। मोहि परम प्रिय बचन सुनाए॥मारुत सुत मैं कपि हनुमाना। नामु मोर सुनु कृपानिधाना॥॥४॥
चकित भरतने पूछा—तुम कौन हो, कहाँसे आये, जिसने मुझे यह अत्यन्त प्रिय समाचार सुनाया? हनुमानजीने उत्तर दिया—हे कृपानिधान, मैं वायुपुत्र वानर हनुमान हूँ।
दीनबंधु रघुपति कर किंकर। सुनत भरत भेंटेउ उठि सादर॥मिलत प्रेम नहिं हृदयँ समाता। नयन स्त्रवत जल पुलकित गाता॥॥५॥
मैं उन दीनबन्धु रघुनाथका सेवक हूँ—यह सुनते ही भरत उठकर बड़े आदरसे उनसे गले मिले। इस मिलनमें प्रेम हृदयमें समाता नहीं था, नेत्रोंसे अश्रु बह चले और शरीर रोमांचित हो उठा।
कपि तव दरस सकल दुख बीते। मिले आजु मोहि राम पिरीते॥बार बार बूझी कुसलाता। तो कहुँ देउँ काह सुनु भ्राता॥॥६॥
भरत बोले—हे कपि, तुम्हारे दर्शनसे ही मेरे सारे दुःख मिट गये, मानो आज मुझे साक्षात् प्रिय राम ही मिल गये हों। उन्होंने बार-बार कुशल पूछी और कहा—भाई, बताओ, इस समाचारके बदले तुम्हें क्या दूँ?
एहि संदेस सरिस जग माहीं। करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं॥नाहिन तात उरिन मैं तोही। अब प्रभु चरित सुनावहु मोही॥॥७॥
फिर स्वयं ही विचार कर बोले—इस समाचारके समान संसारमें कुछ भी नहीं है, मैं तुमसे कभी उऋण नहीं हो सकता। अब कृपाकर प्रभुका सारा वृत्तान्त मुझे सुनाओ।
तब हनुमंत नाइ पद माथा। कहे सकल रघुपति गुन गाथा॥कहु कपि कबहुँ कृपाल गोसाईं। सुमिरहिं मोहि दास की नाईं॥॥८॥
तब हनुमानजीने भरतके चरणोंमें मस्तक नवाकर श्रीरघुनाथकी सम्पूर्ण गुणगाथा सुनायी। भरतने विनम्रतापूर्वक पूछा—हे कपि, कभी कृपालु स्वामी मुझे भी अपने दासकी भाँति स्मरण करते हैं क्या?
निज दास ज्यों रघुबंसभूषन कबहुँ मम सुमिरन कर्यो।सुनि भरत बचन बिनीत अति कपि पुलकि तन चरनन्हि पर्यो॥रघुबीर निज मुख जासु गुन गन कहत अग जग नाथ जो।काहे न होइ बिनीत परम पुनीत सदगुन सिंधु सो॥
भरतके इतने विनम्र वचन सुनकर हनुमानजी पुलकित हो उनके चरणोंमें गिर पड़े और मन-ही-मन सोचने लगे—जिनके गुणोंको स्वयं रघुवीर सारे जगतके सामने गाते हैं, वे भरत ऐसे विनम्र, पवित्र और सद्गुणोंके सागर क्यों न हों।
राम प्रान प्रिय नाथ तुम्ह सत्य बचन मम तात।पुनि पुनि मिलत भरत सुनि हरष न हृदयँ समात॥२(क)॥
हनुमानजीने कहा—आप श्रीरामको प्राणोंसे भी प्रिय हैं, यह मेरा सत्य वचन है। यह सुनते ही भरत बार-बार उनसे गले मिलने लगे, हृदयका हर्ष किसी तरह समाता नहीं था।
भरत चरन सिरु नाइ तुरित गयउ कपि राम पहिं।कही कुसल सब जाइ हरषि चलेउ प्रभु जान चढ़ि॥२(ख)॥
भरतने कहा—प्रभुने दुःखी जानकर अपने दासको दर्शन दिये, इसीसे अब सब कुशल है; विरहके सागरमें डूबते हुए मुझे कृपानिधानने हाथ पकड़कर उबार लिया। फिर हनुमानजी भरतके चरणोंमें सिर नवाकर तुरन्त श्रीरामके पास लौट गये, सारा समाचार सुनाया, और प्रभु हर्षित होकर विमानपर सवार हो चल पड़े।
हरषि भरत कोसलपुर आए। समाचार सब गुरहि सुनाए॥पुनि मंदिर महँ बात जनाई। आवत नगर कुसल रघुराई॥॥१॥
इधर भरत भी प्रसन्न मन अयोध्या लौटे और गुरु वसिष्ठको सारा समाचार सुनाया। फिर राजमहलमें भी यह शुभ सूचना पहुँचायी कि रघुनाथ कुशलपूर्वक नगरकी ओर आ रहे हैं।
सुनत सकल जननीं उठि धाईं। कहि प्रभु कुसल भरत समुझाई॥समाचार पुरबासिन्ह पाए। नर अरु नारि हरषि सब धाए॥॥२॥
यह सुनते ही सब माताएँ उठ दौड़ीं; भरतने प्रभुकी कुशलता कहकर उन्हें धीरज बँधाया। नगरवासियोंने भी यह समाचार पाया तो स्त्री-पुरुष सब हर्षसे भरकर दौड़ पड़े।
दधि दुर्बा रोचन फल फूला। नव तुलसी दल मंगल मूला॥भरि भरि हेम थार भामिनी। गावत चलिं सिंधु सिंधुरगामिनी॥॥३॥
स्वागतके लिये सुहागिन स्त्रियाँ दही, दूब, रोचन, फल-फूल और नयी तुलसीदल सोनेके थालोंमें भर-भरकर हथिनीकी-सी चालसे गीत गाती हुई चल पड़ीं।
जे जैसेहिं तैसेहिं उठि धावहिं। बाल बृद्ध कहँ संग न लावहिं॥एक एकन्ह कहँ बूझहिं भाई। तुम्ह देखे दयाल रघुराई॥॥४॥
हर कोई जिस दशामें था उसी दशामें दौड़ पड़ा, न बालकोंकी सुध रही न वृद्धोंकी। एक-दूसरेसे बस यही पूछते जाते—भाई, तुमने दयालु रघुनाथको देखा क्या?
अवधपुरी प्रभु आवत जानी। भई सकल सोभा के खानी॥बहइ सुहावन त्रिबिध समीरा। भइ सरजू अति निर्मल नीरा॥॥५॥
प्रभुका आगमन जानकर अवधपुरी मानो समस्त शोभाकी खान बन गयी, तीनों प्रकारकी सुखद वायु बहने लगी और सरयूका जल अपने-आप निर्मल हो उठा।
हरषित गुर परिजन अनुज भूसुर बृंद समेत।चले भरत मन प्रेम अति सन्मुख कृपानिकेत॥३(क)॥
अत्यन्त प्रेमसे भरे मनसे गुरु वसिष्ठ, कुटुम्बीजन, छोटे भाई शत्रुघ्न और ब्राह्मणोंके समूहके साथ भरत कृपानिधान श्रीरामकी अगवानीके लिये चल पड़े।
बहुतक चढ़ी अटारिन्ह निरखहिं गगन बिमान।देखि मधुर सुर हरषित करहिं सुमंगल गान॥३(ख)॥
अनेक स्त्रियाँ अटारियोंपर चढ़कर आकाशमें आते विमानको निहार रही थीं, और उसे देखते ही मधुर स्वरमें मंगलगीत गाने लगीं।
राका ससि रघुपति पुर सिंधु देखि हरषान।बढ़यो कोलाहल करत जनु नारि तरंग समान॥३(ग)॥
श्रीराम मानो पूर्णिमाके चन्द्रमा हैं और अयोध्या समुद्र, जो उन्हें देखकर हर्षसे उमड़ पड़ा है; उसका कोलाहल ऐसा लगता है मानो उठती हुई तरंगोंके समान इधर-उधर दौड़ती स्त्रियाँ ही उसकी लहरें हों।
इहाँ भानुकुल कमल दिवाकर। कपिन्ह देखावत नगर मनोहर॥सुनु कपीस अंगद लंकेसा। पावन पुरी रुचिर यह देसा॥॥१॥
उधर आकाशसे सूर्यकुलके सूर्य श्रीराम वानरोंको सुन्दर नगर दिखाते हुए कहते हैं—हे सुग्रीव, अंगद, विभीषण, सुनो, यह पावन नगरी और सुन्दर देश है।
जद्यपि सब बैकुंठ बखाना। बेद पुरान बिदित जगु जाना॥अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ॥॥२॥
वेद-पुराणोंमें भले ही वैकुण्ठकी बड़ाई गायी गयी हो और सारा जगत उसे जानता हो, पर यह अवधपुरी मुझे उतनी ही प्रिय है—यह भेद विरले ही जानते हैं।
जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि। उत्तर दिसि बह सरजू पावनि॥जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा। मम समीप नर पावहिं बासा॥॥३॥
यह सुहावनी नगरी मेरी जन्मभूमि है; इसके उत्तरमें पवित्र सरयू बहती है, जिसमें स्नान करते ही मनुष्य बिना किसी परिश्रमके मेरे सामीप्यको प्राप्त हो जाते हैं।
अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी। मम धामदा पुरी सुख रासी॥हरषे सब कपि सुनि प्रभु बानी। धन्य अवध जो राम बखानी॥॥४॥
यहाँके निवासी मुझे विशेष प्रिय हैं; यह नगरी सुखकी राशि है और मेरे परमधामको देनेवाली है। प्रभुके ये वचन सुनकर सब वानर हर्षित हो उठे और बोले—धन्य है वह अवध, जिसकी बड़ाई स्वयं रामने की।
आवत देखि लोग सब कृपासिंधु भगवान।नगर निकट प्रभु प्रेरेउ उतरेउ भूमि बिमान॥४(क)॥
सबको आते देख कृपासागर भगवानने विमानको नगरके निकट उतरनेकी आज्ञा दी, और वह पृथ्वीपर उतर आया।
उतरि कहेउ प्रभु पुष्पकहि तुम्ह कुबेर पहिं जाहु।प्रेरित राम चलेउ सो हरषु बिरहु अति ताहु॥४(ख)॥
विमानसे उतरकर प्रभुने पुष्पकसे कहा—अब तुम कुबेरके पास लौट जाओ। आज्ञा पाते ही वह चल दिया—स्वामीके पास जानेकी प्रसन्नता और प्रभुसे बिछड़नेका दुःख, दोनों साथ लिये।
आए भरत संग सब लोगा। कृस तन श्रीरघुबीर बियोगा॥बामदेव बसिष्ठ मुनिनायक। देखे प्रभु महि धरि धनु सायक॥॥१॥
भरत सबके साथ आ पहुँचे, सबके शरीर श्रीरामके वियोगसे क्षीण हो चले थे। प्रभुने वामदेव, वसिष्ठ आदि मुनिश्रेष्ठोंको देखा तो धनुष-बाण भूमिपर रख दिये।
धाइ धरे गुर चरन सरोरुह। अनुज सहित अति पुलक तनोरुह॥भेंटि कुसल बूझी मुनिराया। हमरें कुसल तुम्हारिहिं दाया॥॥२॥
फिर लक्ष्मणसहित दौड़कर गुरुके चरणकमल पकड़ लिये, रोम-रोम पुलकित हो उठा। वसिष्ठजीने गले लगाकर कुशल पूछी तो प्रभुने कहा—आपकी ही कृपासे हमारा कुशल है।
सकल द्विजन्ह मिलि नायउ माथा। धर्म धुरंधर रघुकुलनाथा॥गहे भरत पुनि प्रभु पद पंकज। नमत जिन्हहि सुर मुनि संकर अज॥॥३॥
धर्मकी धुरी धारण करनेवाले रघुकुलनाथने सब ब्राह्मणोंसे मिलकर उन्हें प्रणाम किया। फिर भरतने वे चरणकमल पकड़े जिन्हें देव, मुनि, शिव और ब्रह्मा भी नमन करते हैं।
परे भूमि नहिं उठत उठाए। बर करि कृपासिंधु उर लाए॥स्यामल गात रोम भए ठाढ़े। नव राजीव नयन जल बाढ़े॥॥४॥
भरत भूमिपर गिरकर उठनेका नाम ही नहीं ले रहे थे; अन्ततः कृपासिंधुने बलपूर्वक उन्हें उठाकर हृदयसे लगा लिया। उनके साँवले शरीरपर रोमांच छा गया और नवकमल-से नेत्रोंमें अश्रुओंकी बाढ़ आ गयी।
राजीव लोचन स्त्रवत जल तन ललित पुलकावलि बनी।अति प्रेम हृदयँ लगाइ अनुजहि मिले प्रभु त्रिभुअन धनी॥प्रभु मिलत अनुजहि सोह मो पहिं जाति नहिं उपमा कही।जनु प्रेम अरु सिंगार तनु धरि मिले बर सुषमा लही॥॥१॥
कमलनयनोंसे अश्रु बह रहे हैं, सुन्दर देहपर पुलकावली शोभित हो उठी है; त्रिभुवनके स्वामी प्रभु अपने छोटे भाईको अगाध प्रेमसे हृदयसे लगाकर मिले। उस मिलनकी शोभाका वर्णन मुझसे नहीं हो सकता—मानो प्रेम और शृंगार स्वयं देह धरकर मिले हों और परम सुषमाको प्राप्त हुए हों।
बूझत कृपानिधि कुसल भरतहि बचन बेगि न आवई।सुनु सिवा सो सुख बचन मन ते भिन्न जान जो पावई॥अब कुसल कौसलनाथ आरत जानि जन दरसन दियो।बूड़त बिरह बारीस कृपानिधान मोहि कर गहि लियो॥
कृपानिधि कुशल पूछते हैं, पर हर्षके मारे भरतके मुँहसे शब्द ही नहीं फूटते। शिवजी कहते हैं—हे उमा, वह सुख वाणी और मनसे परे है, उसे वही जानता है जो उसे भोगता है। भरत कहते हैं—हे कोसलनाथ, आपने दुःखी जानकर दासको दर्शन दिये, अब सब कुशल है; विरहसागरमें डूबते हुए कृपानिधानने मेरा हाथ थाम लिया।
पुनि प्रभु हरषि सत्रुहन भेंटे हृदयँ लगाइ।लछिमन भरत मिले तब परम प्रेम दोउ भाइ॥५॥
फिर प्रभुने हर्षित होकर शत्रुघ्नको हृदयसे लगाया, और लक्ष्मण-भरत दोनों भाई भी परम प्रेमसे आपसमें मिले।
भरतानुज लछिमन पुनि भेंटे। दुसह बिरह संभव दुख मेटे॥सीता चरन भरत सिरु नावा। अनुज समेत परम सुख पावा॥॥१॥
भरतके छोटे भाई लक्ष्मणने शत्रुघ्नसे गले मिलकर विरहका असह्य दुःख मिटाया। फिर भरत भी शत्रुघ्नसहित सीताके चरणोंमें सिर नवाकर परम सुखको प्राप्त हुए।
प्रभु बिलोकि हरषे पुरबासी। जनित बियोग बिपति सब नासी॥प्रेमातुर सब लोग निहारी। कौतुक कीन्ह कृपाल खरारी॥॥२॥
प्रभुको देखकर अयोध्यावासी हर्षित हो उठे, वियोगका सारा दुःख मिट गया। सबको प्रेमविह्वल देखकर करुणामय श्रीरामने एक अद्भुत लीला रची।
अमित रूप प्रगटे तेहि काला। जथाजोग मिले सबहि कृपाला॥कृपादृष्टि रघुबीर बिलोकी। किए सकल नर नारि बिसोकी॥॥३॥
उसी क्षण वे असंख्य रूपोंमें प्रकट हो गये और सबसे यथायोग्य मिले; अपनी कृपादृष्टिसे सब नर-नारियोंको शोकरहित कर दिया।
छन महिं सबहि मिले भगवाना। उमा मरम यह काहुँ न जाना॥एहि बिधि सबहि सुखी करि रामा। आगें चले सील गुन धामा॥॥४॥
भगवान क्षणभरमें ही सबसे मिल गये—यह रहस्य किसीको समझमें नहीं आया, कहते हैं शिवजी। इस तरह सबको सुखी करके शील और गुणोंके धाम श्रीराम आगे बढ़े।
कौसल्यादि मातु सब धाई। निरखि बच्छ जनु धेनु लवाई॥॥५॥
कौसल्या आदि माताएँ ऐसे दौड़ीं मानो नयी ब्यायी गौएँ अपने बछड़ोंको देखकर दौड़ पड़ी हों।
जनु धेनु बालक बच्छ तजि गृहँ चरन बन परबस गईं।दिन अंत पुर रुख स्त्रवत थन हुंकार करि धावत भई।।अति प्रेम प्रभु सब मातु भेटीं बचन मृदु बहुबिधि कहे।गइ बिषम बियोग भव तिन्ह हरष सुख अगनित लहे॥
जैसे गौएँ अपने बछड़ोंको घरमें छोड़कर दिनभर वनमें विवश होकर चरती हैं, और साँझ ढलते ही गाँवकी ओर देख हुंकार भरती, थनोंसे दूध टपकाती दौड़ पड़ती हैं—वैसे ही अपार प्रेमसे प्रभु सब माताओंसे मिले और उन्हें अनेक मधुर वचन कहे। वियोगकी वह भीषण विपत्ति दूर हो गयी और सबने असीम हर्ष-सुख पाया।
भेंटेउ तनय सुमित्राँ राम चरन रति जानि।रामहि मिलत कैकेई हृदयँ बहुत सकुचानि॥६(क)॥
सुमित्राजी अपने पुत्र लक्ष्मणकी रामचरणोंमें अटूट प्रीति देखकर उनसे गले मिलीं; और जब श्रीराम कैकेयीसे मिलने बढ़े तो उनका हृदय संकोचसे भर उठा।
लछिमन सब मातन्ह मिलि हरषे आसिष पाई।कैकेइ कहँ पुनि पुनि मिले मन कर छोभु न जाइ॥॥६(ख)॥
लक्ष्मणजी भी सब माताओंसे मिलकर आशीर्वाद पाकर हर्षित हुए; कैकेयीसे भी वे बार-बार मिले, पर मनका क्षोभ किसी तरह शान्त नहीं हो रहा था।
सासुन्ह सबनि मिली बैदेही। चरनन्हि लागि हरषु अति तेही॥देहिं असीस बूझि कुसलाता। होइ अचल तुम्हार अहिवाता॥॥१॥
सीताजी सब सासुओंसे मिलीं और उनके चरणोंमें लगकर अत्यन्त हर्षित हुईं; सासुएँ कुशल पूछकर आशीर्वाद देती हैं कि तुम्हारा सुहाग सदा अटल रहे।
सब रघुपति मुख कमल बिलोकहिं। मंगल जानि नयन जल रोकहिं॥कनक थार आरति उतारहिं। बार बार प्रभु गात निहारहिं॥॥२॥
सब माताएँ रघुनाथके कमल-से मुखको निहार रही हैं; शुभ अवसर जानकर आँसुओंको नेत्रोंमें ही थाम लेती हैं। सोनेके थालसे आरती उतारती हैं और बार-बार प्रभुका रूप देखती हैं।
नाना भाँति निछावरि करहीं। परमानंद हरष उर भरहीं॥कौसल्या पुनि पुनि रघुबीरहि। चितवति कृपासिंधु रनधीरहि॥॥३॥
वे अनेक प्रकारसे निछावर करती हैं, हृदय परमानन्दसे भर उठता है। कौसल्याजी बार-बार कृपासागर और रणधीर रघुवीरको निहारती हैं।
हृदयँ बिचारति बारहिं बारा। कवन भाँति लंकापति मारा॥अति सुकुमार जुगल मेरे बारे। निसिचर सुभट महाबल भारे॥॥४॥
वे मन-ही-मन बार-बार सोचती हैं—इन्होंने लंकापतिको आखिर कैसे मार डाला? मेरे ये दोनों बालक तो अत्यन्त सुकुमार थे, और वे राक्षस-योद्धा भारी बलशाली थे।
लछिमन अरु सीता सहित प्रभुहि बिलोकति मातु।परमानंद मगन मन पुनि पुनि पुलकित गातु॥७॥
लक्ष्मण और सीतासहित प्रभुको माता निहार रही हैं, उनका मन परमानन्दमें डूबा है और शरीर बार-बार पुलकित हो उठता है।
लंकापति कपीस नल नीला। जामवंत अंगद सुभसीला॥हनुमदादि सब बानर बीरा। धरे मनोहर मनुज सरीरा॥॥१॥
लंकापति विभीषण, वानरराज सुग्रीव, नल, नील, जाम्बवान, अंगद और हनुमान आदि सभी शूरवीर वानरोंने मनोहर मनुष्य-रूप धारण कर लिया।
भरत सनेह सील ब्रत नेमा। सादर सब बरनहिं अति प्रेमा॥देखि नगरबासिन्ह के रीती। सकल सराहहिं प्रभु पद प्रीती॥॥२॥
सब लोग बड़े प्रेमसे भरतके स्नेह, शील और व्रत-नियमकी सराहना कर रहे हैं; नगरवासियोंकी विनम्र रीति देखकर सब प्रभुके चरणोंमें उनकी प्रीतिको सराहते हैं।
पुनि रघुपति सब सखा बोलाए। मुनि पद लागहु सकल सिखाए॥गुर बसिष्ट कुलपूज्य हमारे। इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे॥॥३॥
फिर रघुनाथने अपने सब सखाओंको बुलाकर मुनिके चरणोंमें प्रणाम करनेको कहा—ये गुरु वसिष्ठ हमारे पूरे कुलके पूज्य हैं, इन्हींकी कृपासे युद्धमें राक्षस मारे गये।
ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे। भए समर सागर कहँ बेरे॥मम हित लागि जन्म इन्ह हारे। भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे॥॥४॥
उन्होंने गुरुसे कहा—हे मुनि, ये सब मेरे सखा हैं, युद्धरूपी सागरमें ये मेरे लिये जहाजके समान बने; मेरे लिये इन्होंने अपने प्राणतक दाँवपर लगा दिये, ये मुझे भरतसे भी बढ़कर प्रिय हैं।
सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। निमिष निमिष उपजत सुख नए॥॥५॥
प्रभुके ये वचन सुनकर सब प्रेममें डूब गये; पल-पल उन्हें नये-नये सुखकी अनुभूति होने लगी।
कौसल्या के चरनन्हि पुनि तिन्ह नायउ माथ।आसिष दीन्हे हरषि तुम्ह प्रिय मम जिमि रघुनाथ॥८(क)॥
फिर सबने कौसल्याके चरणोंमें सिर नवाया; उन्होंने हर्षित होकर आशीर्वाद दिया—तुम मुझे रघुनाथके समान ही प्रिय हो।
सुमन बृष्टि नभ संकुल भवन चले सुखकंद।चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नगर नारि नर बृंद॥८(ख)॥
आनन्दके मूल श्रीराम अपने महलकी ओर चले, आकाश पुष्पवृष्टिसे भर उठा; नगरके स्त्री-पुरुषोंकी भीड़ अटारियोंपर चढ़कर उन्हें निहारने लगी।
कंचन कलस बिचित्र सँवारे। सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे॥बंदनवार पताका केतू। सबन्हि बनाए मंगल हेतू॥॥१॥
लोगोंने सोनेके सुन्दर सजे कलश अपने-अपने द्वारपर रख दिये; मंगलके लिये सब जगह बंदनवार, ध्वजा और पताकाएँ सजायी गयीं।
बीथीं सकल सुगंध सिंचाई। गजमनि रचि बहु चौक पुराई॥नाना भाँति सुमंगल साजे। हरषि नगर निसान बहु बाजे॥॥२॥
सारी गलियाँ सुगन्धसे सिंचायी गयीं, मोतियोंसे बहुत-सी रंगोलियाँ रचायी गयीं; अनेक मंगल-साज सजे और नगरमें हर्षपूर्वक ढेरों नगाड़े बजने लगे।
जहँ तहँ नारि निछावरि करहीं। देहिं असीस हरष उर भरहीं॥कंचन थार आरती नाना। जुबती सजें करहिं सुभ गाना॥॥३॥
स्त्रियाँ जहाँ-तहाँ निछावर करती हैं, हृदय हर्षसे भरकर आशीर्वाद देती हैं; सजी-धजी युवतियाँ सोनेके थालोंमें विविध आरती लिये मंगलगान करती हैं।
करहिं आरती आरतिहर कें। रघुकुल कमल बिपिन दिनकर कें॥पुर सोभा संपति कल्याना। निगम सेष सारदा बखाना॥॥४॥
वे दुःखहर्ता, सूर्यकुलरूपी कमलवनको खिलानेवाले सूर्य श्रीरामकी आरती उतार रही हैं। नगरकी वह शोभा, सम्पदा और मंगल ऐसा है कि वेद, शेष और सरस्वती भी उसका वर्णन करते रहते हैं।
तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं। उमा तासु गुन नर किमि कहहीं॥॥५॥
पर वे भी यह दृश्य देखकर चकित रह जाते हैं—शिवजी कहते हैं, हे उमा, फिर साधारण मनुष्य उनके गुणोंका वर्णन भला कैसे कर सकते हैं?
नारि कुमुदिनीं अवध सर रघुपति बिरह दिनेस।अस्त भए बिगसत भईं निरखि राम राकेस॥९(क)॥
स्त्रियाँ मानो कुमुदिनी हैं और अयोध्या सरोवर, जो रामके विरहरूपी सूर्यसे मुरझा गया था; अब उस विरह-सूर्यके अस्त होते ही रामरूपी पूर्णचन्द्रको देखकर वे फिर खिल उठीं।
होहिं सगुन सुभ बिबिध बिधि बाजहिं गगन निसान।पुर नर नारि सनाथ करि भवन चले भगवान॥९(ख)॥
अनेक प्रकारके शुभ शकुन होने लगे, आकाशमें नगाड़े बज उठे; नगरके सब स्त्री-पुरुषोंको दर्शनसे कृतार्थ करते हुए भगवान महलकी ओर चल पड़े।
प्रभु जानी कैकेई लजानी। प्रथम तासु गृह गए भवानी॥ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा। पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा॥॥१॥
शिवजी कहते हैं, हे भवानी, प्रभुने समझ लिया कि माता कैकेयी संकोचमें हैं, इसलिये पहले उन्हींके महल गये, उन्हें समझा-बुझाकर सुख दिया, तब अपने महल गये।
कृपासिंधु जब मंदिर गए। पुर नर नारि सुखी सब भए॥गुर बसिष्ट द्विज लिए बुलाई। आजु सुघरी सुदिन समुदाई॥॥२॥
कृपासागर जब अपने महलमें पहुँचे, नगरके स्त्री-पुरुष सब सुखी हो उठे; गुरु वसिष्ठने ब्राह्मणोंको बुलाकर कहा—आज हर दृष्टिसे शुभ घड़ी और सुन्दर दिन है।
सब द्विज देहु हरषि अनुसासन। रामचंद्र बैठहिं सिंघासन॥मुनि बसिष्ट के बचन सुहाए। सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए॥॥३॥
उन्होंने कहा—आप सब हर्षपूर्वक आज्ञा दें ताकि रामचन्द्र सिंहासनपर विराजें; वसिष्ठजीके ये सुहावने वचन सुनते ही सब ब्राह्मणोंको बहुत भाये।
कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका। जग अभिराम राम अभिषेका॥अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजे। महाराज कहँ तिलक करीजै॥॥४॥
अनेक ब्राह्मण कोमल वाणीमें बोल उठे कि रामका राज्याभिषेक सारे जगतको आनन्द देनेवाला है, अब हे मुनिश्रेष्ठ, विलम्ब न करें, महाराजका तिलक शीघ्र कर दें।
तब मुनि कहेउ सुमंत्र सन सुनत चलेउ हरषाइ।रथ अनेक बहु बाजि गज तुरत सँवारे जाइ॥१०(क)॥
तब मुनिने सुमन्त्रसे कहा; वे सुनते ही हर्षित हो चले और तुरंत बहुत-से रथ, घोड़े और हाथी सजवा लिये।
जहँ तहँ धावन पठइ पुनि मंगल द्रब्य मगाइ।हरष समेत बसिष्ट पद पुनि सिरु नायउ आइ॥१०(ख)॥
उन्होंने जहाँ-तहाँ दूत भेजकर मंगल-सामग्री मँगायी, फिर हर्षसे लौटकर वसिष्ठके चरणोंमें सिर नवाया।
अवधपुरी अति रुचिर बनाई। देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई॥राम कहा सेवकन्ह बुलाई। प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई॥॥१॥
अवधपुरी अत्यन्त सुन्दर सजायी गयी, देवताओंने फूलोंकी झड़ी लगा दी; रामने सेवकोंको बुलाकर कहा—पहले जाकर मेरे सखाओंको स्नान कराओ।
सुनत बचन जहँ तहँ जन धाए। सुग्रीवादि तुरत अन्हवाए॥पुनि करुनानिधि भरतु हँकारे। निज कर राम जटा निरुआरे॥॥२॥
यह सुनते ही सेवक जहाँ-तहाँ दौड़े और सुग्रीव आदिको तुरंत स्नान कराया; फिर करुणानिधानने भरतको बुलाकर स्वयं अपने हाथोंसे उनकी जटाएँ सुलझायीं।
अन्हवाए प्रभु तीनिउ भाई। भगत बछल कृपाल रघुराई॥भरत भाग्य प्रभु कोमलताई। सेष कोटि सत सकहिं न गाई॥॥३॥
भक्तवत्सल कृपालु प्रभुने तीनों भाइयोंको स्नान कराया; भरतका भाग्य और प्रभुकी वह कोमलता ऐसी है कि करोड़ों शेष भी उसका वर्णन नहीं कर सकते।
पुनि निज जटा राम बिबराए। गुर अनुसासन मागि नहाए॥करि मज्जन प्रभु भूषन साजे। अंग अनंग देखि सत लाजे॥॥४॥
फिर रामने स्वयं अपनी जटाएँ खोलीं और गुरुकी आज्ञा लेकर स्नान किया; स्नानके बाद आभूषण धारण किये तो उनके अंगोंकी शोभा देखकर सैकड़ों कामदेव लजा गये।
सासुन्ह सादर जानकिहि मज्जन तुरत कराइ।दिब्य बसन बर भूषन अँग अंग सजे बनाइ॥११(क)॥
उधर सासुओंने जानकीको आदरपूर्वक तुरंत स्नान कराकर उनके अंग-अंगपर दिव्य वस्त्र और श्रेष्ठ आभूषण सजा दिये।
राम बाम दिसि सोभति रमा रूप गुन खानि।देखि मातु सब हरषीं जन्म सुफल निज जानि॥११(ख)॥
रामके बायीं ओर रूप-गुणकी खान रमा (सीता) शोभित हो रही हैं; उन्हें देखकर हर माता अपना जीवन सफल मानकर हर्षित हुई।
सुनु खगेस तेहि अवसर ब्रह्मा सिव मुनि बृंद।चढ़ि बिमान आए सब सुर देखन सुखकंद॥११(ग)॥
काकभुशुण्डि कहते हैं—हे गरुड़, उसी क्षण ब्रह्मा, शिव और मुनियोंके समूह तथा विमानोंपर सवार सब देवता उस आनन्दकन्दके दर्शनके लिये वहाँ आ पहुँचे।
प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा। तुरत दिब्य सिंघासन मागा॥रबि सम तेज सो बरनि न जाई। बैठे राम द्विजन्ह सिरु नाई॥॥१॥
प्रभुको देखकर मुनि वसिष्ठका हृदय प्रेमसे भर उठा, उन्होंने तुरंत सूर्यके समान तेजस्वी, अवर्णनीय दिव्य सिंहासन मँगवाया; रामने ब्राह्मणोंको सिर नवाकर उसपर आसन ग्रहण किया।
जनकसुता समेत रघुराई। पेखि प्रहरषे मुनि समुदाई॥बेद मंत्र तब द्विजन्ह उचारे। नभ सुर मुनि जय जयति पुकारे॥॥२॥
जानकीसहित रघुनाथको देखकर मुनियोंका समूह अत्यन्त हर्षित हो उठा; ब्राह्मणोंने वेदमंत्र पढ़े और आकाशमें देव-मुनि जय-जयकार करने लगे।
प्रथम तिलक बसिष्ट मुनि कीन्हा। पुनि सब बिप्रन्ह आयसु दीन्हा॥सुत बिलोकि हरषीं महतारी। बार बार आरती उतारी॥॥३॥
सबसे पहले वसिष्ठमुनिने तिलक किया, फिर सब ब्राह्मणोंको भी वैसी अनुमति दी; पुत्रको सिंहासनपर देखकर माताएँ हर्षित हुईं और बार-बार आरती उतारने लगीं।
बिप्रन्ह दान बिबिध बिधि दीन्हे। जाचक सकल अजाचक कीन्हे॥सिंघासन पर त्रिभुअन साई। देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई॥॥४॥
ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके दान दिये गये, हर याचक मालामाल हो गया; त्रिभुवनके स्वामीको सिंहासनपर देखकर देवताओंने नगाड़े बजाये।
नभ दुंदुभीं बाजहिं बिपुल गंधर्ब किंनर गावहीं।नाचहिं अपछरा बृंद परमानंद सुर मुनि पावहीं॥भरतादि अनुज बिभीषनांगद हनुमदादि समेत ते।गहें छत्र चामर ब्यजन धनु असि चर्म सक्ति बिराजते॥॥१॥
आकाशमें अनेक नगाड़े बज रहे हैं, गन्धर्व और किन्नर गा रहे हैं, अप्सराओंके झुंड नाच रहे हैं, देव-मुनि परमानन्दमें डूबे हैं; भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, विभीषण, अंगद और हनुमान आदि छत्र, चँवर, पंखा, धनुष, तलवार, ढाल और शक्ति लिये सुशोभित खड़े हैं।
श्री सहित दिनकर बंस भूषन काम बहु छबि सोहई।नव अंबुधर बर गात अंबर पीत सुर मन मोहई॥मुकुटांगदादि बिचित्र भूषन अंग अंगन्हि प्रति सजे।अंभोज नयन बिसाल उर भुज धन्य नर निरखंति जे॥॥२॥
सीतासहित सूर्यवंशके इस भूषणके शरीरमें अनगिनत कामदेवोंकी छटा झलक रही है; नवजलधर-सा साँवला रूप, पीताम्बर देवताओंके मनको भी मोह लेता है; मुकुट-बाजूबंद जैसे विचित्र आभूषण अंग-अंगपर सजे हैं, कमल-से विशाल नेत्र, चौड़ी छाती और लम्बी भुजाएँ—धन्य हैं वे जो इस रूपको निहारते हैं।
वह सोभा समाज सुख कहत न बनइ खगेस।बरनहिं सारद सेष श्रुति सो रस जान महेस॥१२(क)॥
शिवजी कहते हैं—हे गरुड़, वह शोभा, वह समागम, वह सुख मुझसे वर्णन नहीं होता; सरस्वती, शेष और वेद उसका बखान करते रहते हैं, पर उसका रस तो महादेव ही जानते हैं।
भिन्न भिन्न अस्तुति करि गए सुर निज निज धाम।बंदी बेष बेद तब आए जहँ श्रीराम॥१२(ख)॥
सब देवता अलग-अलग स्तुति करके अपने-अपने लोक लौट गये; फिर भाटका वेष धरकर स्वयं चारों वेद वहाँ आये जहाँ राम विराजमान थे।
प्रभु सर्बग्य कीन्ह अति आदर कृपानिधान।लखेउ न काहूँ मरम कछु लगे करन गुन गान॥१२(ग)॥
सर्वज्ञ कृपानिधान प्रभुने उनका बड़ा आदर किया, पर किसीको भी उनका भेद नहीं मालूम हुआ; वेद वहाँ उनका गुणगान करने लगे।
जय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने।दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुज बल हने॥अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दुख दहे।जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संजुक्त सक्ति नमामहे॥॥१॥
जय हो, हे सगुण-निर्गुण दोनों रूपोंवाले, अनुपम सुन्दरता और राजाओंके शिरोमणि! रावण आदि प्रचंड दुष्ट राक्षसोंको आपने अपनी भुजाओंसे मार गिराया; मनुष्य-रूप धरकर आपने धरतीका भार उतारा और घोर दुःखोंको भस्म किया। जय हो, हे शरणागतके रक्षक दयालु प्रभु! हम शक्तिसहित शक्तिमान आपको नमस्कार करते हैं।
तव बिषम माया बस सुरासुर नाग नर अग जग हरे।भव पंथ भ्रमत अमित दिवस निसि काल कर्म गुननि भरे॥जे नाथ करि करुना बिलोके त्रिबिधि दुख ते निर्बहे।भव खेद छेदन दच्छ हम कहुँ रच्छ राम नमामहे॥॥२॥
आपकी दुर्निवार मायाके वशीभूत होकर देव, दानव, नाग, मनुष्य—सभी चराचर काल, कर्म और गुणोंमें बँधकर दिन-रात अनंत जन्म-मरणके पथपर भटकते रहते हैं। पर हे नाथ, जिन्हें आपने एक बार भी कृपादृष्टिसे देख लिया, वे तीनों तापोंसे मुक्त हो गये। संसारकी थकानको काटनेमें कुशल हे राम, हमारी रक्षा कीजिये, हम आपको नमस्कार करते हैं।
जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी।ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी॥बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे।जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव नाथ सो समरामहे॥॥३॥
जो झूठे ज्ञानके घमंडमें डूबकर जन्म-मृत्युका नाश करनेवाली आपकी भक्तिका कभी आदर नहीं करते, हे हरि, उन्हें हमने देवताओंको भी दुर्लभ पद पाकर भी वहाँसे गिरते देखा है। पर जो हर आशा त्यागकर आप ही पर भरोसा रख आपके दास बन जाते हैं, वे केवल आपका नाम जपकर बिना किसी परिश्रमके भवसागर पार कर जाते हैं—हे नाथ, हम आपको इसी रूपमें स्मरण करते हैं।
जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपतिनी तरी।नख निर्गता मुनि बंदिता त्रेलोक पावनि सुरसरी॥ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे।पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेस नित्य भजामहे॥॥४॥
जिन चरणोंको शिव और ब्रह्मा भी पूजते हैं, जिनकी पावन रजके स्पर्शमात्रसे मुनिपत्नी अहल्या तर गयी, जिनके नखसे निकलकर मुनिवन्दित, त्रैलोक्यको पावन करनेवाली गंगा प्रवाहित हुई, और जो ध्वजा, वज्र, अंकुश व कमलके चिह्नोंसे युक्त होकर भी वनमें भटकते समय काँटोंसे घट्टे पड़ गये—हे मुकुन्द, हे राम, हे रमापति, हम आपके उन्हीं युगल चरणोंको सदा भजते हैं।
अब्यक्तमूलमनादि तरु त्वच चारि निगमागम भने।षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने॥फल जुगल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे।पल्लवत फूलत नवल नित संसार बिटप नमामहे॥॥५॥
वेद-शास्त्र कहते हैं—इस संसाररूपी वृक्षका मूल अव्यक्त है, यह अनादि है, इसकी चार छालें, छह तने और पच्चीस शाखाएँ हैं, अनगिनत पत्ते और फूल हैं; इसमें कड़वे-मीठे दो फल लगते हैं, एक ही बेल इसके सहारे टिकी रहती है, और इसमें सदा नये पत्ते-फूल निकलते रहते हैं—हे संसारवृक्षरूप प्रभु, हम आपको नमस्कार करते हैं।
जे ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य मनपर ध्यावहीं।ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं॥करुनायतन प्रभु सदगुनाकर देव यह बर मागहीं।मन बचन कर्म बिकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं॥॥६॥
जो लोग ब्रह्मको अजन्मा, अद्वैत, अनुभवगम्य और मनसे परे मानकर ध्यान करते हैं, वे वैसा ही कहें और जानें; पर हे नाथ, हम तो सदा आपके सगुण यशका ही गान करते हैं। हे करुणाके धाम, सद्गुणोंकी खान प्रभु, हम बस यही वर माँगते हैं कि मन, वचन और कर्मसे सब विकार त्यागकर आपके चरणोंमें अनुराग बना रहे।
सब के देखत बेदन्ह बिनती कीन्हि उदार।अंतर्धान भए पुनि गए ब्रह्म आगार॥१३(क)॥
सबके सामने वेदोंने यह उदार विनती की, फिर वे अन्तर्धान होकर ब्रह्मलोक चले गये।
बैनतेय सुनु संभु तब आए जहँ रघुबीर।बिनय करत गदगद गिरा पूरित पुलक सरीर॥१३(ख)॥
काकभुशुण्डि कहते हैं—हे गरुड़, तब शिवजी वहाँ आये जहाँ रघुवीर विराजमान थे और गद्गद वाणीमें विनयपूर्वक स्तुति करने लगे, उनका शरीर रोमांचसे भर उठा।
जय राम रमारमनं समनं। भव ताप भयाकुल पाहि जनं॥अवधेस सुरेस रमेस बिभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो॥॥१॥
जय हो राम, लक्ष्मीके रमण, संसार-तापको शान्त करनेवाले! भवभयसे व्याकुल इस सेवककी रक्षा कीजिये। हे अवधपति, हे देवोंके स्वामी, हे रमापति, हे विभो! शरण आया यह सेवक बस यही माँगता है—हे प्रभो, मेरी रक्षा कीजिये।
दससीस बिनासन बीस भुजा। कृत दूरि महा महि भूरि रुजा॥रजनीचर बृंद पतंग रहे। सर पावक तेज प्रचंड दहे॥॥२॥
हे दस सिर और बीस भुजाओंवाले रावणके संहारक, जिन्होंने पृथ्वीके समस्त महारोगोंको दूर किया! रात्रिचर राक्षससमूह पतंगोंकी भाँति थे, वे सब आपके बाणरूपी अग्निके प्रचंड तेजसे भस्म हो गये।
महि मंडल मंडन चारुतरं। धृत सायक चाप निषंग बरं॥मद मोह महा ममता रजनी। तम पुंज दिवाकर तेज अनी॥॥३॥
आप ही पृथ्वीके सबसे सुंदर आभूषण हैं, हाथमें बाण-धनुष-तरकस सदा धारण किये रहते हैं; मद, मोह और ममतारूपी घोर रात्रिके अंधकारको मिटानेके लिये आप सूर्यके प्रखर तेज हैं।
मनजात किरात निपात किए। मृग लोग कुभोग सरेन हिए॥हति नाथ अनाथनि पाहि हरे। बिषया बन पावर भूलि परे॥॥४॥
कामरूपी भीलने मनुष्यरूपी हिरनोंके हृदयमें कुभोगके बाण चलाकर उन्हें गिरा दिया है; हे नाथ, हे हरि, उसे मारकर विषयवनमें भटकते इन असहाय पामर जीवोंकी रक्षा कीजिये।
बहु रोग बियोगन्हि लोग हए। भवदंघ्रि निरादर के फल ए॥भव सिंधु अगाध परे नर ते। पद पंकज प्रेम न जे करते॥॥५॥
लोग अनेक रोगों और वियोगोंसे पीड़ित हैं—यह सब आपके चरणोंके अनादरका ही फल है। जो आपके चरणकमलोंसे प्रेम नहीं करते, वे अथाह भवसागरमें डूबे रहते हैं।
अति दीन मलीन दुखी नितहीं। जिन्ह के पद पंकज प्रीति नहीं॥अवलंब भवंत कथा जिन्ह के।। प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें॥॥६॥
जिन्हें आपके चरणोंमें प्रीति नहीं, वे सदा दीन, मलिन और दुःखी रहते हैं; पर जिन्हें आपकी लीला-कथाका सहारा है, उन्हें संत और अनंत प्रभु सदा प्रिय लगते हैं।
नहिं राग न लोभ न मान मदा।। तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा॥एहि ते तव सेवक होत मुदा। मुनि त्यागत जोग भरोस सदा॥॥७॥
उनमें न राग है, न लोभ, न मान, न मद; सुख-दुःख उनके लिये समान है। इसीसे मुनि भी योगका भरोसा छोड़कर सहर्ष आपके सेवक बन जाते हैं।
करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ। पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ॥सम मानि निरादर आदरही। सब संत सुखी बिचरंति मही॥॥८॥
वे निरंतर प्रेमपूर्वक नियम लेकर शुद्ध हृदयसे आपके चरणकमलोंकी सेवा करते हैं, आदर-अनादरको एक समान मानते हुए ऐसे संत पृथ्वीपर सुखपूर्वक विचरते हैं।
मुनि मानस पंकज भृंग भजे। रघुबीर महा रनधीर अजे॥तव नाम जपामि नमामि हरी। भव रोग महागद मान अरी॥॥९॥
हे मुनियोंके मनरूपी कमलके भ्रमर, महान् रणधीर, अजेय रघुवीर, मैं आपकी शरण लेता हूँ; हे हरि, आपका नाम जपता और आपको नमन करता हूँ—आप जन्म-मृत्युरूपी रोगकी महौषधि और अभिमानके शत्रु हैं।
गुन सील कृपा परमायतनं। प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं॥रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं। महिपाल बिलोकय दीन जनं॥॥१०॥
गुण, शील और कृपाके परम धाम, लक्ष्मीपति, मैं निरंतर आपको प्रणाम करता हूँ। हे रघुनंदन, मेरे भीतरके सब द्वंद्व मिटा दीजिये; हे पृथ्वीपाल, इस दीन जनकी ओर भी कृपादृष्टि डालिये।
बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग।पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग॥॥१४(क)॥
मैं बार-बार यही वर माँगता हूँ—हे श्रीरंग, हर्षपूर्वक मुझे अपने चरणोंकी अटूट भक्ति और सदा सत्संग प्रदान कीजिये।
बरनि उमापति राम गुन हरषि गए कैलास।तब प्रभु कपिन्ह दिवाए सब बिधि सुखप्रद बास॥१४(ख)॥
इस प्रकार रामके गुणोंका बखान कर उमापति शिवजी प्रसन्न होकर कैलास लौट गये; फिर प्रभुने वानरोंके लिये हर प्रकारसे सुखद निवासकी व्यवस्था करायी।
सुनु खगपति यह कथा पावनी। त्रिबिध ताप भव भय दावनी॥महाराज कर सुभ अभिषेका। सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका॥॥१॥
काकभुशुण्डि कहते हैं—हे पक्षिराज, यह पावन कथा तीनों तापों और जन्म-मृत्युके भयको दूर करनेवाली है; रामके इस मंगलमय राज्याभिषेकको सुनकर मनुष्य वैराग्य और विवेक पाते हैं।
जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं। सुख संपति नाना बिधि पावहिं॥सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं। अंतकाल रघुपति पुर जाहीं॥॥२॥
जो सकाम भावसे इसे सुनते या गाते हैं, वे भी अनेक प्रकारके सुख और सम्पत्ति पाते हैं; संसारमें देवदुर्लभ भोग भोगकर अंतकालमें रघुनाथके परमधामको जाते हैं।
सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई। लहहिं भगति गति संपति नई॥खगपति राम कथा मैं बरनी। स्वमति बिलास त्रास दुख हरनी॥॥३॥
जीवन्मुक्त, विरक्त और विषयी—जो भी इसे सुनते हैं, वे यथायोग्य भक्ति, मुक्ति या नयी सम्पदा पाते हैं। हे गरुड़, मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार यह रामकथा कही है, जो भय और दुःखको हरनेवाली है।
बिरति बिबेक भगति दृढ़ करनी। मोह नदी कहँ सुंदर तरनी॥नित नव मंगल कौसलपुरी। हरषित रहहिं लोग सब कुल॥॥४॥
यह वैराग्य, विवेक और भक्तिको दृढ़ करती है, मोहरूपी नदीको पार करनेके लिये सुंदर नाव है। अवधपुरीमें नित नये उत्सव होते रहे, हर वर्गके लोग सदा प्रसन्न रहे।
नित नव प्रीति राम पद पंकज। सबकें जिन्हहि नमत सिव मुनि अज॥मंगन बहु प्रकार पहिराए। द्विजन्ह दान नाना बिधि पाए॥॥५॥
रामके उन चरणकमलोंमें, जिन्हें शिव, मुनि और ब्रह्मा भी नमन करते हैं, सबकी नित नयी प्रीति बनी रही। भिक्षुकोंको अनेक वस्त्राभूषण मिले और ब्राह्मणोंने तरह-तरहके दान पाये।
ब्रह्मानंद मगन कपि सब कें प्रभु पद प्रीति।जात न जाने दिवस तिन्ह गए मास षट बीति॥१५॥
सब वानर प्रभुके चरणोंकी प्रीतिमें ब्रह्मानंदमें डूबे रहे, दिन बीतनेका पता ही न चला—देखते-देखते छह महीने बीत गये।
बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं। जिमि परद्रोह संत मन माहीं॥तब रघुपति सब सखा बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिरु नाए॥॥१॥
उन्हें अपना घर स्वप्रमें भी याद न आया, ठीक वैसे ही जैसे संतके मनमें कभी दूसरेसे द्रोहकी बात नहीं आती। तब रघुनाथने सब सखाओंको बुलाया, और सबने आकर आदरसे सिर नवाया।
परम प्रीति समीप बैठारे। भगत सुखद मृदु बचन उचारे॥तुम्ह अति कीन्ह मोरि सेवकाई। मुख पर केहि बिधि करौं बड़ाई॥॥२॥
उन्हें बड़े प्रेमसे अपने पास बिठाकर प्रभुने भक्तोंको सुख देनेवाले कोमल वचन कहे—तुमने मेरी बड़ी सेवा की है, तुम्हारी बड़ाई मुँहपर कैसे करूँ?
ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे। मम हित लागि भवन सुख त्यागे॥अनुज राज संपति बैदेही। देह गेह परिवार सनेही॥॥३॥
इसीसे तुम मुझे अत्यंत प्रिय हो, क्योंकि मेरे लिये तुमने अपने घर-सुख सब त्याग दिये। भाई, राज्य, संपत्ति, सीता, अपनी देह, घर और कुटुम्ब—
सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना। मृषा न कहउँ मोर यह बाना॥सब के प्रिय सेवक यह नीती। मोरें अधिक दास पर प्रीती॥॥४॥
यह सब मुझे प्रिय है, पर तुम्हारे समान नहीं; यह मैं झूठ नहीं कहता, यही मेरा स्वभाव है। सेवक सबको प्रिय होते हैं, यह नीति है, पर मेरा तो दासपर स्वाभाविक ही विशेष प्रेम है।
अब गृह जाहु सखा सब भजेहु मोहि दृढ़ नेम।सदा सर्बगत सर्बहित जानि करेहु अति प्रेम॥१६॥
अब सब घर जाओ, हे सखागण, और दृढ़ नियमसे मुझे भजते रहना; मुझे सर्वव्यापी और सबका हितैषी जानकर मुझसे अत्यंत प्रेम करना।
सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। को हम कहाँ बिसरि तन गए॥एकटक रहे जोरि कर आगे। सकहिं न कछु कहि अति अनुरागे॥॥१॥
प्रभुके वचन सुनकर सब प्रेममग्न हो गये, अपनी सुध-बुध ही भूल गये; हाथ जोड़े टकटकी लगाये खड़े रहे, अत्यंत प्रेमके कारण कुछ कह ही न सके।
परम प्रेम तिन्ह कर प्रभु देखा। कहा बिबिध बिधि ग्यान बिसेषा॥प्रभु सन्मुख कछु कहन न पारहिं। पुनि पुनि चरन सरोज निहारहिं॥॥२॥
उनका ऐसा अगाध प्रेम देखकर प्रभुने उन्हें विशेष ज्ञानका उपदेश दिया; फिर भी वे सम्मुख कुछ कह न सके, बस बार-बार उनके चरणकमलोंको निहारते रहे।
तब प्रभु भूषन बसन मगाए। नाना रंग अनूप सुहाए॥सुग्रीवहि प्रथमहिं पहिराए। बसन भरत निज हाथ बनाए॥॥३॥
तब प्रभुने अनेक रंगोंके सुंदर वस्त्राभूषण मँगवाये; सबसे पहले भरतने अपने ही हाथोंसे सुग्रीवको सजाकर पहनाया।
प्रभु प्रेरित लछिमन पहिराए। लंकापति रघुपति मन भाए॥अंगद बैठ रहा नहिं डोला। प्रीति देखि प्रभु ताहि न बोला॥॥४॥
फिर प्रभुकी प्रेरणासे लक्ष्मणने विभीषणको वस्त्राभूषण पहनाये, जो रघुनाथके मनको बहुत भाये। अंगद बस बैठे ही रह गये, हिले तक नहीं; उनका गहरा प्रेम देखकर प्रभुने उन्हें बुलाया तक नहीं।
जामवंत नीलादि सब पहिराए रघुनाथ।हियँ धरि राम रूप सब चले नाइ पद माथ॥१७(क)॥
जाम्बवान, नील आदि सभीको रघुनाथने स्वयं अपने हाथों वस्त्राभूषण पहनाये; वे सब हृदयमें रामका रूप बसाकर उनके चरणोंमें सिर नवाकर विदा हुए।
तब अंगद उठि नाइ सिरु सजल नयन कर जोरि।अति बिनीत बोलेउ बचन मनहुँ प्रेम रस बोरि॥१७(ख)॥
तब अंगद उठकर सिर नवाकर, आँखोंमें आँसू भरकर, हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्र स्वरमें, मानो प्रेमरसमें डूबे हुए वचन बोले।
सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो। दीन दयाकर आरत बंधो॥मरती बेर नाथ मोहि बाली। गयउ तुम्हारेहि कोंछें घाली॥॥१॥
हे सर्वज्ञ, कृपा और सुखके सागर, दीनदयालु, दुखियोंके बंधु, सुनिये—मरते समय मेरे पिता बालिने मुझे आपकी ही गोदमें डाल दिया था।
असरन सरन बिरदु संभारी। मोहि जनि तजहु भगत हितकारी॥मोरें तुम्ह प्रभु गुर पितु माता। जाउँ कहाँ तजि पद जलजाता॥॥२॥
अपना अशरण-शरण व्रत याद रखकर मुझे त्यागिये मत, हे भक्तवत्सल! मेरे लिये स्वामी, गुरु, माता-पिता सब आप ही हैं—आपके चरण छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ?
तुम्हहि बिचारि कहहु नरनाहा। प्रभु तजि भवन काज मम काहा॥बालक ग्यान बुद्धि बल हीना। राखहु सरन नाथ जन दीना॥॥३॥
हे महाराज, आप स्वयं विचारकर बताइये—आपको छोड़कर घरमें मेरा क्या काम? हे नाथ, ज्ञान-बुद्धि-बलसे हीन इस बालक दीन सेवकको अपनी शरणमें ही रखिये।
नीचि टहल गृह के सब करिहउँ। पद पंकज बिलोकि भव तरिहउँ॥अस कहि चरन परेउ प्रभु पाही। अब जनि नाथ कहहु गृह जाही॥॥४॥
मैं घरकी सबसे नीची सेवा भी करूँगा, बस आपके चरणकमलोंको निहारते हुए भवसागर तर जाऊँगा। ऐसा कहकर वे प्रभुके चरणोंमें गिर पड़े—हे नाथ, अब घर जानेको मत कहिये।
अंगद बचन बिनीत सुनि रघुपति करुना सींव।प्रभु उठाइ उर लायउ सजल नयन राजीव॥१८(क)॥
अंगदके ऐसे विनम्र वचन सुनकर करुणाके पारावार रघुनाथने उसे उठाकर हृदयसे लगा लिया, प्रभुके कमल-नेत्रोंमें प्रेमाश्रु भर आये।
निज उर माल बसन मनि बालितनय पहिराइ।बिदा कीन्हि भगवान तब बहु प्रकार समुझाइ॥१८(ख)॥
तब भगवानने अपने हृदयकी माला, वस्त्र और मणि-आभूषण बालिपुत्र अंगदको स्वयं पहनाये, और बहुत प्रकारसे समझा-बुझाकर उसे विदा किया।
भरत अनुज सौमित्र समेता। पठवन चले भगत कृत चेता॥अंगद हृदयँ प्रेम नहिं थोरा। फिरि फिरि चितव राम कीं ओरा॥॥१॥
अंगदकी भक्ति स्मरण कर भरत छोटे भाई शत्रुघ्न और लक्ष्मणसहित उसे पहुँचाने चले। अंगदके हृदयमें प्रेमका पार नहीं, वह बार-बार पीछे मुड़कर रामकी ओर देखता रहा।
बार बार कर दंड प्रनामा। मन अस रहन कहहिं मोहि रामा॥राम बिलोकनि बोलनि चलनी। सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी॥॥२॥
वह बार-बार दंडवत प्रणाम करता रहा, मनमें बस यही आता कि राम कह दें—रुक जाओ। वह रामके देखने, बोलने, चलने और हँसकर मिलनेकी रीति याद कर-करके व्याकुल होता रहा।
प्रभु रुख देखि बिनय बहु भाषी। चलेउ हृदयँ पद पंकज राखी॥अति आदर सब कपि पहुँचाए। भाइन्ह सहित भरत पुनि आए॥॥३॥
पर प्रभुका आशय समझकर, बहुत विनयवचन कहकर, हृदयमें उनके चरणकमल बसाकर वह चल पड़ा। बड़े आदरसे सब वानरोंको विदा कर भरत भाइयोंसहित लौट आये।
तब सुग्रीव चरन गहि नाना। भाँति बिनय कीन्हे हनुमाना॥दिन दस करि रघुपति पद सेवा। पुनि तव चरन देखिहउँ देवा॥॥४॥
तब हनुमानने सुग्रीवके चरण पकड़कर बड़ी विनती की—हे देव, दस दिन रघुनाथके चरणोंकी सेवा कर फिर मैं आपके दर्शन करने आऊँगा।
पुन्य पुंज तुम्ह पवनकुमारा। सेवहु जाइ कृपा आगारा॥अस कहि कपि सब चले तुरंता। अंगद कहइ सुनहु हनुमंता॥॥५॥
सुग्रीवने कहा—हे पवनकुमार, तुम पुण्यकी राशि हो, जाओ और कृपाधामकी सेवा करो। यह कहकर सब वानर तुरंत चल पड़े; अंगदने कहा—सुनो हनुमान।
कहेहु दंडवत प्रभु सैं तुम्हहि कहउँ कर जोरि।बार बार रघुनायकहि सुरति कराएहु मोरि॥१९(क)॥
हाथ जोड़कर मैं तुमसे कहता हूँ—प्रभुसे मेरा दंडवत कह देना, और रघुनाथको बार-बार मेरी याद दिलाते रहना।
अस कहि चलेउ बालिसुत फिरि आयउ हनुमंत।तासु प्रीति प्रभु सन कहि मगन भए भगवंत॥१९(ख)॥
यह कहकर बालिपुत्र चल पड़ा, और हनुमान लौट आये; उन्होंने प्रभुसे उसका वह प्रेम कह सुनाया, जिसे सुनकर भगवान प्रेममग्न हो गये।
कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसुमहु चाहि।चित्त खगेस राम कर समुझि परइ कहु काहि॥१९(ग)॥
शिवजी कहते हैं—हे गरुड़, रामका हृदय वज्रसे भी कठोर और फूलसे भी कोमल है; अब बताओ, यह किसकी समझमें आ सकता है?
पुनि कृपाल लियो बोलि निषादा। दीन्हे भूषन बसन प्रसादा॥जाहु भवन मम सुमिरन करेहू। मन क्रम बचन धर्म अनुसरेहू॥॥१॥
फिर कृपालु रामने निषादराजको बुलाकर उसे भी वस्त्राभूषण भेंट दिये—अब घर जाओ, कहा, वहाँ मेरा स्मरण करते रहना और मन-वचन-कर्मसे सदा धर्मका पालन करना।
तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता। सदा रहेहु पुर आवत जाता॥बचन सुनत उपजा सुख भारी। परेउ चरन भरि लोचन बारी॥॥२॥
तुम मेरे मित्र हो, भरतके समान भाई हो—अयोध्यामें सदा आते-जाते रहना। यह सुनते ही उसे अपार सुख हुआ, और नेत्र भरकर वह चरणोंमें गिर पड़ा।
चरन नलिन उर धरि गृह आवा। प्रभु सुभाउ परिजनन्हि सुनावा॥रघुपति चरित देखि पुरबासी। पुनि पुनि कहहिं धन्य सुखरासी॥॥३॥
रामके चरणकमल हृदयमें बसाकर वह घर लौटा और परिजनोंको प्रभुका स्वभाव सुनाया; रघुनाथका यह चरित्र देखकर अवधवासी बार-बार कहते—धन्य हैं वे सुखके भंडार राम।
राम राज बैंठें त्रेलोका। हरषित भए गए सब सोका॥बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप बिषमता खोई॥॥४॥
राम जब राजसिंहासनपर विराजे, तीनों लोक हर्षसे भर उठे, सारा शोक जाता रहा; रामके प्रतापसे भेदभाव मिट गया और किसीका किसीसे बैर न रहा।
बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग।चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग॥२०॥
सब लोग अपने-अपने वर्ण और आश्रमके धर्ममें तत्पर रहकर वेदमार्गपर चलते और सुख पाते रहे; उन्हें न भय था, न शोक, न कोई रोग।
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥॥१॥
रामराज्यमें किसीको दैहिक, दैविक या भौतिक कोई ताप न सताता था; सब लोग परस्पर प्रेम करते और वेद-नीतिमें रहकर अपने-अपने धर्मका पालन करते थे।
चारिउ चरन धर्म जग माहीं। पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं॥राम भगति रत नर अरु नारी। सकल परम गति के अधिकारी॥॥२॥
धर्म अपने चारों चरणोंसहित सारे जगतमें परिपूर्ण था, स्वप्रमें भी पाप नहीं था; स्त्री-पुरुष सभी रामभक्तिमें लीन, सब परम गतिके अधिकारी थे।
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा॥नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना॥॥३॥
किसीकी अकाल मृत्यु न होती, किसीको कोई पीड़ा न होती; सबके शरीर सुंदर और नीरोग थे। न कोई दरिद्र, न दुखी, न दीन था; न कोई मूर्ख था, न शुभ लक्षणोंसे रहित।
सब निर्दंभ धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुनी॥सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी॥॥४॥
सभी दंभरहित, धर्मपरायण और पुण्यात्मा हैं; स्त्री-पुरुष सब चतुर और गुणवान हैं। सब गुणग्राही, विद्वान और ज्ञानी हैं; सब कृतज्ञ हैं, किसीमें कपट या धूर्तता नहीं है।
राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं।काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं॥२१॥
काकभुशुण्डि कहते हैं—हे गरुड़, सुनिये, रामके राज्यमें चराचर सारे जगतमें काल, कर्म या स्वभावसे उत्पन्न कोई दुःख किसीको नहीं होता।
भूमि सप्त सागर मेखला। एक भूप रघुपति कोसला॥भुअन अनेक रोम प्रति जासू। यह प्रभुता कछु बहुत न तासू॥॥१॥
सात समुद्रोंसे घिरी इस पृथ्वीके अयोध्यामें रघुनाथ अकेले राजा हैं; पर जिनके एक-एक रोममें अनगिनत ब्रह्मांड समाये हैं, उनके लिये यह सप्तद्वीपी राज्य कुछ बड़ी बात नहीं।
सो महिमा समुझत प्रभु केरी। यह बरनत हीनता घनेरी॥सोउ महिमा खगेस जिन्ह जानी। फिरि एहिं चरित तिन्हहुँ रति मानी॥॥२॥
बल्कि प्रभुकी वह वास्तविक महिमा समझ ली जाय तो उन्हें केवल पृथ्वीका सम्राट कहना उनकी हीनता ही जान पड़ती है; पर हे गरुड़, जिन्होंने वह महिमा जान भी ली, वे भी इस लीलामें उतना ही प्रेम पाते हैं।
सोउ जाने कर फल यह लीला। कहहिं महा मुनिबर दमसीला॥राम राज कर सुख संपदा। बरनि न सकइ फनीस सारदा॥॥३॥
क्योंकि इन्द्रियजयी महामुनि कहते हैं कि उस महिमाको जाननेका फल भी यही लीला है; रामराज्यके सुख-वैभवका वर्णन तो शेष और सरस्वती भी नहीं कर सकते।
सब उदार सब पर उपकारी। बिप्र चरन सेवक नर नारी॥एकनारि ब्रत रत सब झारी। ते मन बच क्रम पति हितकारी॥॥४॥
सब उदार और परोपकारी थे, ब्राह्मणोंके चरणोंके सेवक थे; हर पुरुष एकपत्नीव्रती था और हर स्त्री मन-वचन-कर्मसे पतिका हित करनेवाली थी।
दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज।जीतहु मनहि सुनिअ अस रामचंद्र कें राज॥२२॥
रामके राज्यमें 'दंड' शब्द केवल संन्यासियोंके हाथमें, 'भेद' केवल नर्तकोंके नृत्यमें और 'जीतना' शब्द केवल अपने मनको जीतनेके अर्थमें ही सुनायी पड़ता था।
फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहिं एक संग गज पंचानन॥खग मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई॥॥१॥
वनोंमें वृक्ष सदा फूलते-फलते रहते, हाथी और सिंह साथ-साथ विचरते; पक्षी और पशु अपना स्वाभाविक बैर भुलाकर आपसमें प्रेम बढ़ाते।
कूजहिं खग मृग नाना बृंदा। अभय चरहिं बन करहिं अनंदा॥सीतल सुरभि पवन बह मंदा। गुंजत अलि लै चलि मकरंदा॥॥२॥
पक्षी मीठी बोली बोलते, हर प्रकारके पशु निर्भय होकर वनमें आनंदसे विचरते; शीतल सुगंधित मंद पवन बहता रहता और भौंरे पुष्परस लेकर गुंजार करते।
लता बिटप मागें मधु चवहीं। मनभावतो धेनु पय स्त्रवहीं॥ससि संपन्न सदा रह धरनी। त्रेताँ भई कृतजुग के करनी॥॥३॥
लताएँ और वृक्ष माँगते ही मधु टपका देते, गौएँ मनचाहा दूध देतीं; धरती सदा फसलसे लहलहाती—त्रेतायुगमें मानो सतयुगकी ही रीति लौट आयी।
प्रगटीं गिरिन्ह बिबिध मनि खानी। जगदातमा भूप जग जानी॥सरिता सकल बहहिं बर बारी। सीतल अमल स्वाद सुखकारी॥॥४॥
जगत्के आत्मा भगवानको संसारका राजा जानकर पर्वतोंने अनेक रत्नोंकी खानें प्रकट कर दीं; सब नदियाँ शीतल, निर्मल, स्वादिष्ट जल बहाने लगीं।
सागर निज मरजादाँ रहहीं। डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं॥सरसिज संकुल सकल तड़ागा। अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा॥॥५॥
समुद्र अपनी सीमामें रहते और किनारोंपर रत्न बिखेर देते जिन्हें लोग बीन लेते; हर तालाब कमलोंसे भरा रहता और दसों दिशाएँ परम प्रसन्न दिखतीं।
बिधु महि पूर मयूखन्हि रबि तप जेतनेहि काज।मागें बारिद देहिं जल रामचंद्र के राज॥२३॥
रामके राज्यमें चंद्रमा उतनी ही चाँदनी बिखेरता जितनी आवश्यक हो, सूर्य उतना ही तपता जितना चाहिये, और बादल माँगनेपर ही जल बरसाते।
कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे॥श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर। गुनातीत अरु भोग पुरंदर॥॥१॥
प्रभुने करोड़ों अश्वमेध यज्ञ किये और ब्राह्मणोंको अनगिनत दान दिये; वे वेदमार्गके रक्षक, धर्मकी धुरी, त्रिगुणोंसे परे और भोग-वैभवमें इन्द्रके समान थे।
पति अनुकूल सदा रह सीता। सोभा खानि सुसील बिनीता॥जानति कृपासिंधु प्रभुताई। सेवति चरन कमल मन लाई॥॥२॥
शोभाकी खान, सुशील और विनम्र सीता सदा पतिके अनुकूल रहतीं; वे कृपासागर रामकी महिमाको जानती थीं और मन लगाकर उनके चरणोंकी सेवा करतीं।
जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी। बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी॥निज कर गृह परिचरजा करई। रामचंद्र आयसु अनुसरई॥॥३॥
घरमें अनगिनत दास-दासियाँ सेवामें कुशल थीं, फिर भी सीता स्वयं अपने हाथों घरकी सेवा करतीं और रामकी हर आज्ञाका पालन करतीं।
जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ। सोइ कर श्री सेवा बिधि जानइ॥कौसल्यादि सासु गृह माहीं। सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं॥॥४॥
कृपासागर जिस बातसे प्रसन्न होते, सीता वही करतीं, क्योंकि वे सेवाका मर्म जानती थीं; घरमें कौसल्या आदि सब सासुओंकी वे बिना किसी अभिमानके सेवा करतीं।
उमा रमा ब्रह्मादि बंदिता। जगदंबा संततमनिंदिता॥॥५॥
शिवजी कहते हैं—हे उमा, जगज्जननी रमा (सीता) ब्रह्मा आदि देवताओंसे वंदित और सदा निष्कलंक हैं।
जासु कृपा कटाच्छु सुर चाहत चितव न सोइ।राम पदारबिंद रति करति सुभावहि खोइ॥२४॥
जिनकी कृपादृष्टिको देवता तरसते हैं पर जो उनकी ओर देखती भी नहीं, वही लक्ष्मी अपनी सारी महिमा भुलाकर रामके चरणकमलोंमें अनुराग रखती हैं।
सेवहिं सानकूल सब भाई। राम चरन रति अति अधिकाई॥प्रभु मुख कमल बिलोकत रहहीं। कबहुँ कृपाल हमहि कछु कहहीं॥॥१॥
सब भाई अनुकूल भावसे उनकी सेवा करते, रामके चरणोंमें उनकी प्रीति असीम थी; वे सदा प्रभुका मुख निहारते रहते कि कभी कृपालु उन्हें कुछ करनेको कहें।
राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती। नाना भाँति सिखावहिं नीती॥हरषित रहहिं नगर के लोगा। करहिं सकल सुर दुर्लभ भोगा॥॥२॥
राम भी भाइयोंपर प्रेम रखते और उन्हें अनेक नीतियाँ सिखाते; नगरके लोग सदा प्रसन्न रहते और देवदुर्लभ सुख भोगते।
अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीं। श्रीरघुबीर चरन रति चहहीं॥दुइ सुत सुंदर सीताँ जाए। लव कुस बेद पुरानन्ह गाए॥॥३॥
वे दिन-रात ब्रह्माको मनाते रहते कि रघुबीरके चरणोंमें उनकी प्रीति बनी रहे; सीतासे लव और कुश नामक दो सुंदर पुत्र जन्मे, जिनका वेद-पुराणोंमें वर्णन है।
दोउ बिजई बिनई गुन मंदिर। हरि प्रतिबिंब मनहुँ अति सुंदर॥दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे। भए रूप गुन सील घनेरे॥॥४॥
दोनों ही विजयी, विनम्र और गुणोंके धाम थे, मानो हरिके ही सुंदर प्रतिबिंब हों; अन्य भाइयोंके भी दो-दो पुत्र हुए, सब रूप-गुण-शीलमें उत्तम।
ग्यान गिरा गोतीत अज माया मन गुन पार।सोइ सच्चिदानंद घन कर नर चरित उदार॥२५॥
जो ज्ञान, वाणी, इंद्रियों, अजन्मा-भाव, माया, मन और गुणोंसे परे हैं, वही सच्चिदानंदघन भगवान यह श्रेष्ठ मानव-लीला कर रहे हैं।
प्रातकाल सरऊ करि मज्जन। बैठहिं सभाँ संग द्विज सज्जन॥बेद पुरान बसिष्ट बखानहिं। सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं॥॥१॥
प्रातःकाल सरयूमें स्नान कर राम ब्राह्मणों और सज्जनोंके साथ सभामें बैठते; वसिष्ठ वेद-पुराणकी कथा कहते और राम सुनते, यद्यपि वे सब पहलेसे जानते हैं।
अनुजन्ह संजुत भोजन करहीं। देखि सकल जननीं सुख भरहीं॥भरत सत्रुहन दोऊ भाई। सहित पवनसुत उपबन जाई॥॥२॥
वे भाइयोंसहित भोजन करते, यह देख हर माता आनंदसे भर उठती; भरत और शत्रुघ्न दोनों भाई हनुमानसहित उपवनोंमें जाते,
बूझहिं बैठि राम गुन गाहा। कह हनुमान सुमति अवगाहा॥सुनत बिमल गुन अति सुख पावहिं। बहुरि बहुरि करि बिनय कहावहिं॥॥३॥
और वहाँ बैठकर रामके गुणोंकी कथा पूछते; हनुमान अपनी सुंदर बुद्धिसे उन गुणोंमें डूबकर उनका वर्णन करते। उनके निर्मल गुण सुनकर दोनों भाई अत्यंत सुखी होते और बार-बार विनयपूर्वक और सुनानेको कहते।
सब के गृह गृह होहिं पुराना। रामचरित पावन बिधि नाना॥नर अरु नारि राम गुन गानहिं। करहिं दिवस निसि जात न जानहिं॥॥४॥
घर-घरमें रामके पावन चरित्रकी नाना कथाएँ होतीं; स्त्री-पुरुष सब उनका गुणगान करते और आनंदमें दिन-रात बीतनेका पता ही न चलता।
अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज।सहस सेष नहिं कहि सकहिं जहँ नृप राम बिराज॥२६॥
जहाँ स्वयं राम राजा होकर विराजते हैं, उस अवधपुरीके निवासियोंके सुख-वैभवका वर्णन हजारों शेष भी नहीं कर सकते।
नारदादि सनकादि मुनीसा। दरसन लागि कोसलाधीसा॥दिन प्रति सकल अजोध्या आवहिं। देखि नगरु बिरागु बिसरावहिं॥॥१॥
नारद, सनक आदि मुनीश्वर कोसलनाथके दर्शनके लिये रोज अयोध्या आते और उस नगरको देखकर अपना वैराग्य भी भूल जाते।
जातरूप मनि रचित अटारीं। नाना रंग रुचिर गच ढारीं॥पुर चहुँ पास कोट अति सुंदर। रचे कँगूरा रंग रंग बर॥॥२॥
सोने-रत्नोंसे बनी अटारियाँ थीं, जिनमें रंग-बिरंगी सुंदर फर्श जड़ी थी; नगरके चारों ओर सुंदर परकोटा था, जिसपर रंग-बिरंगे कँगूरे बने थे।
नव ग्रह निकर अनीक बनाई। जनु घेरी अमरावति आई॥महि बहु रंग रचित गच काँचा। जो बिलोकि मुनिबर मन नाचा॥॥३॥
मानो नवग्रहोंने सेना बनाकर अमरावतीको घेर लिया हो; धरतीपर रंग-बिरंगे रत्नोंकी फर्श बिछी थी, जिसे देख श्रेष्ठ मुनियोंका भी मन नाच उठता।
धवल धाम ऊपर नभ चुंबत। कलस मनहुँ रबि ससि दुति निंदत॥बहु मनि रचित झरोखा भ्राजहिं। गृह गृह प्रति मनि दीप बिराजहिं॥॥४॥
उज्ज्वल महल आकाशको छूते थे, उनके कलश मानो सूर्य-चंद्रकी चमकको भी मात देते; मणिजड़ित झरोखे शोभित थे और घर-घरमें रत्न-दीपक जगमगाते।
मनि दीप राजहिं भवन भ्राजहिं देहरीं बिद्रुम रची।मनि खंभ भीति बिरंचि बिरची कनक मनि मरकत खची॥सुंदर मनोहर मंदिरायत अजिर रुचिर फटिक रचे।प्रति द्वार द्वार कपाट पुरट बनाइ बहु बज्रन्हि खचे॥
हर घरमें मणि-दीपक जगमगाते, मूँगेकी देहलियाँ चमकतीं, रत्नोंके खंभे और मरकतमणि-जड़ित सोनेकी दीवारें मानो ब्रह्माने विशेष यत्नसे रची हों। सुंदर विशाल महलोंमें स्फटिकके आँगन थे, और हर द्वारपर हीरे जड़े सोनेके किंवाड़ बने थे।
चारु चित्रसाला गृह गृह प्रति लिखे बनाइ।राम चरित जे निरख मुनि ते मन लेहिं चोराइ॥२७॥
हर घरमें सुंदर चित्रशाला थी जिसमें रामके चरित्र सुंदरतासे अंकित थे; जो मुनि भी उन्हें देखते, उनका मन चुरा लिये बिना नहीं रहते।
सुमन बाटिका सबहिं लगाई। बिबिध भाँति करि जतन बनाई॥लता ललित बहु जाति सुहाई। फूलहिं सदा बंसत कि नाई॥॥१॥
सबने यत्नपूर्वक फूलोंकी वाटिकाएँ लगा रखी थीं, जिनमें अनेक जातिकी सुंदर लताएँ मानो सदा वसंतकी भाँति खिली रहतीं।
गुंजत मधुकर मुखर मनोहर। मारुत त्रिबिध सदा बह सुंदर॥नाना खग बालकन्हि जिआए। बोलत मधुर उड़ात सुहाए॥॥२॥
भौंरे मनोहर स्वरमें गुंजार करते, तीनों प्रकारकी शीतल सुगंधित वायु सदा बहती रहती; बालकोंने पाले अनेक पक्षी मीठी बोली बोलते और सुंदर उड़ान भरते।
मोर हंस सारस पारावत। भवननि पर सोभा अति पावत॥जहँ तहँ देखहिं निज परिछाहीं। बहु बिधि कूजहिं नृत्य कराहीं॥॥३॥
मोर, हंस, सारस और कबूतर घरोंकी छतोंपर शोभा पाते; वे जहाँ-तहाँ अपनी परछाईं देखकर मानो दूसरे पक्षीसे मिलकर तरह-तरहसे बोलते और नाचते।
सुक सारिका पढ़ावहिं बालक। कहहु राम रघुपति जनपालक॥राज दुआर सकल बिधि चारू। बीथीं चौहट रुचिर बजारू॥॥४॥
बालक तोता-मैनाको सिखाते—कहो 'राम', 'रघुपति', 'जनपालक'; राजद्वार हर तरहसे सुंदर था, गलियाँ, चौराहे और बाजार सब मनोहर।
बाजार रुचिर न बनइ बरनत बस्तु बिनु गथ पाइए।जहँ भूप रमानिवास तहँ की संपदा किमि गाइए॥बैठे बजाज सराफ बनिक अनेक मनहुँ कुबेर ते।सब सुखी सब सच्चरित सुंदर नारि नर सिसु जरठ जे॥
ऐसा सुंदर बाजार कि वर्णन ही न हो सके, वहाँ वस्तुएँ मानो बिना मोलके ही मिल जातीं; जहाँ स्वयं लक्ष्मीपति राजा हों, वहाँकी संपदाका क्या कहना! कपड़े और सोने-चाँदीके व्यापारी बैठे मानो साक्षात् कुबेर हों; स्त्री-पुरुष, बालक-वृद्ध सभी सुखी, सदाचारी और सुंदर थे।
उत्तर दिसि सरजू बह निर्मल जल गंभीर।बाँधे घाट मनोहर स्वल्प पंक नहिं तीर॥२८॥
नगरके उत्तरमें सरयू बहती, जिसका जल निर्मल और गहरा था; मनोहर घाट बने थे और किनारेपर तनिक भी कीचड़ नहीं था।
दूरि फराक रुचिर सो घाटा। जहँ जल पिअहिं बाजि गज ठाटा॥पनिघट परम मनोहर नाना। तहाँ न पुरुष करहिं अस्नाना॥॥१॥
कुछ दूर वह घाट था जहाँ घोड़े-हाथियोंके झुंड जल पीते; और भी परम मनोहर घाट थे जहाँ स्त्रियाँ पानी भरतीं, वहाँ पुरुष स्नान नहीं करते।
राजघाट सब बिधि सुंदर बर। मज्जहिं तहाँ बरन चारिउ नर॥तीर तीर देवन्ह के मंदिर। चहुँ दिसि तिन्ह के उपबन सुंदर॥॥२॥
राजघाट सब तरहसे सुंदर था, जहाँ चारों वर्णके लोग स्नान करते; सरयूके किनारे-किनारे देवमंदिर थे, चारों ओर सुंदर उपवन सजे थे।
कहुँ कहुँ सरिता तीर उदासी। बसहिं ग्यान रत मुनि संन्यासी॥तीर तीर तुलसिका सुहाई। बृंद बृंद बहु मुनिन्ह लगाई॥॥३॥
कहीं-कहीं नदीतटपर ज्ञानपरायण मुनि और संन्यासी निवास करते; किनारे-किनारे मुनियोंने बहुत-सी सुंदर तुलसी लगा रखी थी।
पुर सोभा कछु बरनि न जाई। बाहेर नगर परम रुचिराई॥देखत पुरी अखिल अघ भागा। बन उपबन बापिका तड़ागा॥॥४॥
नगरकी शोभाका तो वर्णन ही नहीं हो सकता, नगरके बाहर भी वैसी ही सुंदरता थी; अयोध्याके दर्शनमात्रसे सब पाप भाग जाते, वन-उपवन-बावली-तालाब सब शोभा पाते।
बापीं तड़ाग अनूप कूप मनोहरायत सोहहीं।सोपान सुंदर नीर निर्मल देखि सुर मुनि मोहहीं॥बहु रंग कंज अनेक खग कूजहिं मधुप गुंजारहीं।आराम रम्य पिकादि खग रव जनु पथिक हंकारहीं॥
अनुपम बावलियाँ, तालाब और विशाल मनोहर कुएँ शोभित थे, जिनकी सुंदर सीढ़ियाँ और निर्मल जल देखकर देव-मुनि तक मोहित हो जाते। रंग-बिरंगे कमल खिलते, पक्षी कूजते, भौंरे गुंजार करते, और बगीचोंमें कोयलकी बोली मानो राहगीरोंको बुलाती।
रमानाथ जहँ राजा सो पुर बरनि कि जाइ।अनिमादिक सुख संपदा रहीं अवध सब छाइ॥२९॥
जहाँ स्वयं लक्ष्मीपति राजा हों, उस नगरका वर्णन कैसे हो? अणिमा आदि सिद्धियाँ और सारी सुख-संपदा अयोध्यापर छायी रहती।
जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं। बैठि परसपर इहइ सिखावहिं॥भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि। सोभा सील रूप गुन धामहि॥॥१॥
लोग जहाँ-तहाँ रघुनाथके गुण गाते और बैठकर एक-दूसरेको सिखाते—शरणागतके पालक, शोभा-शील-रूप-गुणके धाम रामको भजो।
जलज बिलोचन स्यामल गातहि। पलक नयन इव सेवक त्रातहि॥धृत सर रुचिर चाप तूनीरहि। संत कंज बन रबि रनधीरहि॥॥२॥
कमलनयन साँवले शरीरवालेको भजो, जो पलककी भाँति अपने सेवककी रक्षा करते हैं; सुंदर बाण-धनुष-तरकस धारण करनेवाले, संतरूपी कमलवनको खिलानेवाले सूर्य-समान रणधीर रामको भजो।
काल कराल ब्याल खगराजहि। नमत राम अकाम ममता जहि॥लोभ मोह मृगजूथ किरातहि। मनसिज करि हरि जन सुखदातहि॥॥३॥
काल-सर्पको ग्रसनेवाले गरुड़रूप रामको भजो, जिनके निष्काम प्रणाममात्रसे ममता नष्ट हो जाती है; लोभ-मोहरूपी मृगोंके शिकारी, कामरूपी हाथीके लिये सिंह और भक्तोंको सुख देनेवाले रामको भजो।
संसय सोक निबिड़ तम भानुहि। दनुज गहन घन दहन कृसानुहि॥जनकसुता समेत रघुबीरहि। कस न भजहु भंजन भव भीरहि॥॥४॥
संशय और शोकरूपी घने अंधकारका नाश करनेवाले सूर्यरूप रामको भजो, राक्षसरूपी सघन वनको भस्म करनेवाली अग्निरूप रामको भजो; जानकीसहित रघुवीर, जन्म-मृत्युके भयको मिटानेवाले, उन्हें क्यों न भजें?
बहु बासना मसक हिम रासिहि। सदा एकरस अज अबिनासिहि॥मुनि रंजन भंजन महि भारहि। तुलसिदास के प्रभुहि उदारहि॥॥५॥
अनगिनत वासनारूपी मच्छरोंको नष्ट करनेवाले हिमराशिरूप रामको भजो, सदा एकरस, अजन्मा, अविनाशीको भजो; मुनियोंको आनंद देनेवाले, पृथ्वीका भार हरनेवाले, तुलसीदासके उदार स्वामीको भजो।
एहि बिधि नगर नारि नर करहिं राम गुन गान।सानुकूल सब पर रहहिं संतत कृपानिधान॥३०॥
इस प्रकार नगरके स्त्री-पुरुष रामके गुण गाते रहे, और कृपानिधान सदा सबपर समान रूपसे प्रसन्न बने रहे।
जब ते राम प्रताप खगेसा। उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा॥पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका। बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका॥॥१॥
काकभुशुण्डि कहते हैं—हे गरुड़, जबसे रामके प्रतापरूपी प्रचंड सूर्यका उदय हुआ, तीनों लोकोंमें प्रकाश भर गया—इससे किसीको सुख मिला, किसीके मनमें शोक जागा।
जिन्हहि सोक ते कहउँ बखानी। प्रथम अबिद्या निसा नसानी॥अघ उलूक जहँ तहाँ लुकाने। काम क्रोध कैरव सकुचाने॥॥२॥
जिन्हें शोक हुआ, उन्हें बताता हूँ—पहले तो अविद्यारूपी रात्रि नष्ट हुई, पापरूपी उल्लू जहाँ-तहाँ छिप गये और काम-क्रोधरूपी कुमुद मुरझा गये।
बिबिध कर्म गुन काल सुभाऊ। ए चकोर सुख लहहिं न काऊ॥मत्सर मान मोह मद चोरा। इन्ह कर हुनर न कवनिहुँ ओरा॥॥३॥
तरह-तरहके कर्म, गुण, काल और स्वभाव—ये चकोर इस प्रकाशमें कभी सुख नहीं पाते; मत्सर, अभिमान, मोह और मदरूपी चोरोंकी कोई चाल यहाँ नहीं चलती।
धरम तड़ाग ग्यान बिग्याना। ए पंकज बिकसे बिधि नाना॥सुख संतोष बिराग बिबेका। बिगत सोक ए कोक अनेका॥॥४॥
धर्मरूपी सरोवरमें ज्ञान-विज्ञानरूपी अनेक कमल खिल उठे; सुख, संतोष, वैराग्य और विवेकरूपी असंख्य चकवे शोकरहित हो गये।
यह प्रताप रबि जाकें उर जब करइ प्रकास।पछिले बाढ़हिं प्रथम जे कहे ते पावहिं नास॥३१॥
यह रामप्रतापरूपी सूर्य जिसके हृदयमें उदय होता है, उसमें पहले बताये गुण बढ़ने लगते हैं और पहले बताये दोष नष्ट हो जाते हैं।
भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा। संग परम प्रिय पवनकुमारा॥सुंदर उपबन देखन गए। सब तरु कुसुमित पल्लव नए॥॥१॥
एक बार राम भाइयोंसहित और परमप्रिय हनुमानको साथ लेकर सुंदर उपवन देखने गये, जहाँ हर वृक्ष नये पत्तों और फूलोंसे लदा था।
जानि समय सनकादिक आए। तेज पुंज गुन सील सुहाए॥ब्रह्मानंद सदा लयलीना। देखत बालक बहुकालीना॥॥२॥
ठीक उसी समय तेजपुंज, गुण-शीलसंपन्न और सदा ब्रह्मानंदमें लीन रहनेवाले सनकादि मुनि वहाँ आ पहुँचे—देखनेमें बालक जैसे, पर आयुमें अत्यंत प्राचीन।
रूप धरें जनु चारिउ बेदा। समदरसी मुनि बिगत बिभेदा॥आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं॥॥३॥
मानो साक्षात् चारों वेद ही बाल-रूप धरे हों—समदर्शी, भेदरहित मुनि, दिशाएँ ही जिनका वस्त्र थीं; उनका बस एक ही व्यसन था कि जहाँ रघुनाथकी कथा हो, वहीं जाकर सुनें।
तहाँ रहे सनकादि भवानी। जहँ घटसंभव मुनिबर ग्यानी॥राम कथा मुनिबर बहु बरनी। ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी॥॥४॥
शिवजी कहते हैं—हे भवानी, सनकादि मुनि वहींसे आ रहे थे जहाँ ज्ञानी अगस्त्यजी रहते हैं, जिन्होंने रामकी अनेक कथाएँ सुनायी थीं, जो अरणिकाष्ठसे अग्निकी तरह ज्ञान प्रज्वलित करती हैं।
देखि राम मुनि आवत हरषि दंडवत कीन्ह।स्वागत पूँछि पीत पट प्रभु बैठन कहँ दीन्ह॥३२॥
मुनियोंको आते देख रामने हर्षित होकर दंडवत की, कुशल पूछी और उनके बैठनेके लिये अपना पीताम्बर बिछा दिया।
कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई। सहित पवनसुत सुख अधिकाई॥मुनि रघुपति छबि अतुल बिलोकी। भए मगन मन सके न रोकी॥॥१॥
फिर हनुमानसहित तीनों भाइयोंने भी दंडवत की, सबको अपार सुख हुआ; मुनि रघुनाथकी अतुल छवि देखकर उसीमें ऐसे डूब गये कि स्वयंको रोक न सके।
स्यामल गात सरोरुह लोचन। सुंदरता मंदिर भव मोचन॥एकटक रहे निमेष न लावहिं। प्रभु कर जोरें सीस नवावहिं॥॥२॥
साँवला शरीर, कमलनयन, सुंदरताके धाम, जन्म-मृत्युसे छुड़ानेवाले रामको वे टकटकी लगाये देखते ही रहे, पलक तक न झपकी; और प्रभु स्वयं हाथ जोड़े उन्हें सिर नवाते रहे।
तिन्ह के दसा देखि रघुबीरा। स्त्रवत नयन जल पुलक सरीरा॥कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे। परम मनोहर बचन उचारे॥॥३॥
उनकी वह प्रेमविह्वल दशा देखकर रघुवीरके भी नेत्रोंसे अश्रु बहने लगे और शरीर पुलकित हो उठा; फिर हाथ पकड़कर उन्होंने श्रेष्ठ मुनियोंको बिठाया और परम मनोहर वचन कहे।
आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा। तुम्हरें दरस जाहिं अघ खीसा॥बड़े भाग पाइब सतसंगा। बिनहिं प्रयास होहिं भव भंगा॥॥४॥
आज मैं धन्य हूँ, हे मुनीश्वरो, सुनिये—आपके दर्शनमात्रसे पाप नष्ट हो जाते हैं; बड़े भाग्यसे सत्संग मिलता है, जिससे बिना परिश्रम ही जन्म-मृत्युका चक्र टूट जाता है।
संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ।कहहिं संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ॥३३॥
संतका संग मोक्षका मार्ग है और कामीका संग संसार-बंधनका मार्ग—यही संत, कवि, पंडित और वेद-पुराण जैसे सद्ग्रंथ भी कहते हैं।
सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी। पुलकित तन अस्तुति अनुसारी॥जय भगवंत अनंत अनामय। अनघ अनेक एक करुनामय॥॥१॥
प्रभुके वचन सुनकर चारों मुनि हर्षसे पुलकित हो स्तुति करने लगे—जय हो अनंत, अविकारी, निष्पाप, अनेकरूप होते हुए भी एक और करुणामय भगवान!
जय निर्गुन जय जय गुन सागर। सुख मंदिर सुंदर अति नागर॥जय इंदिरा रमन जय भूधर। अनुपम अज अनादि सोभाकर॥॥२॥
जय निर्गुण, जय-जय गुणसागर, सुखधाम, सुंदर और चतुर! जय लक्ष्मीपति, जय पृथ्वीधारक, अनुपम, अजन्मा, अनादि, शोभाके स्रोत!
ग्यान निधान अमान मानप्रद। पावन सुजस पुरान बेद बद॥तग्य कृतग्य अग्यता भंजन। नाम अनेक अनाम निरंजन॥॥३॥
ज्ञानके भंडार, स्वयं मानरहित पर औरोंको मान देनेवाले, वेद-पुराण जिनका पावन यश गाते हैं; तत्त्वज्ञ, कृतज्ञ, अज्ञानको हरनेवाले—हे निरंजन, आपके अनंत नाम हैं और फिर भी आप नामातीत हैं।
सर्ब सर्बगत सर्ब उरालय। बससि सदा हम कहुँ परिपालय॥द्वंद बिपति भव फंद बिभंजय। ह्रदि बसि राम काम मद गंजय॥॥४॥
सर्वरूप, सर्वव्यापी, सबके हृदयमें निवास करनेवाले—सदा हमारी रक्षा कीजिये; द्वंद्व, विपत्ति और भवबंधनका जाल काट दीजिये, हे राम, हृदयमें बसकर काम और मदको नष्ट कर दीजिये।
परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम।प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम॥३४॥
परमानंदस्वरूप, कृपाधाम, मनकी हर कामना पूर्ण करनेवाले—हे श्रीराम, हमें अपनी अटूट प्रेमाभक्ति प्रदान कीजिये।
देहु भगति रघुपति अति पावनि। त्रिबिध ताप भव दाप नसावनि॥प्रनत काम सुरधेनु कलपतरु। होइ प्रसन्न दीजै प्रभु यह बरु॥॥१॥
हे रघुनाथ, हमें वह परम पावन भक्ति दीजिये जो तीनों ताप और भवके क्लेशको मिटा दे; शरणागतोंकी कामधेनु और कल्पवृक्ष प्रभु, प्रसन्न होकर बस यही वरदान दीजिये।
भव बारिधि कुंभज रघुनायक। सेवत सुलभ सकल सुख दायक॥मन संभव दारुन दुख दारय। दीनबंधु समता बिस्तारय॥॥२॥
हे रघुनाथ, जन्म-मृत्युरूपी समुद्रको सोखनेवाले अगस्त्य-समान, सेवामें सुलभ और सब सुख देनेवाले! हे दीनबंधु, मनके दारुण दुःखोंको काटिये और हममें समदृष्टि फैलाइये।
आस त्रास इरिषादि निवारक। बिनय बिबेक बिरति बिस्तारक॥भूप मौलि मन मंडन धरनी। देहि भगति संसृति सरि तरनी॥॥३॥
आशा, भय और ईर्ष्याको मिटानेवाले, विनय-विवेक-वैराग्यको फैलानेवाले! हे राजाओंके शिरोमणि, पृथ्वीके भूषण, संसाररूपी नदीके लिये नौकास्वरूप अपनी भक्ति हमें दीजिये।
मुनि मन मानस हंस निरंतर। चरन कमल बंदित अज संकर॥रघुकुल केतु सेतु श्रुति रच्छक। काल करम सुभाउ गुन भच्छक॥॥४॥
मुनियोंके मनरूपी मानसरोवरमें सदा विहार करनेवाले हंस, जिनके चरण ब्रह्मा-शिव भी वंदित करते हैं; रघुकुलकी ध्वजा, वेदमर्यादाके रक्षक, काल-कर्म-स्वभाव-गुणके भक्षक!
तारन तरन हरन सब दूषन। तुलसिदास प्रभु त्रिभुवन भूषन॥॥५॥
स्वयं तरे हुए और औरोंको तारनेवाले, सब दोषोंको हरनेवाले—हे तुलसीदासके स्वामी, त्रिभुवनके भूषण!
बार बार अस्तुति करि प्रेम सहित सिरु नाइ।ब्रह्म भवन सनकादि गे अति अभीष्ट बर पाइ॥३५॥
इस प्रकार बार-बार प्रेमसहित स्तुति करके और सिर नवाकर, अपना मनचाहा वरदान पाकर सनकादि मुनि ब्रह्मलोक चले गये।
सनकादिक बिधि लोक सिधाए। भ्रातन्ह राम चरन सिरु नाए॥पूछत प्रभुहि सकल सकुचाहीं। चितवहिं सब मारुतसुत पाहीं॥॥१॥
सनकादि मुनि ब्रह्मलोक चले गये, तब भाइयोंने रामके चरणोंमें सिर नवाया; कुछ पूछते हुए सब सकुचा रहे थे, इसलिये सब हनुमानकी ओर देखने लगे।
सुनि चहहिं प्रभु मुख के बानी। जो सुनि होइ सकल भ्रम हानी॥अंतरजामी प्रभु सभ जाना। बूझत कहहु काह हनुमाना॥॥२॥
वे प्रभुके अपने मुखसे वह बात सुनना चाहते थे, जिससे उनका हर भ्रम मिट जाय। अंतर्यामी प्रभु सब समझ गये और पूछा—बोलो हनुमान, बात क्या है?
जोरि पानि कह तब हनुमंता। सुनहु दीनदयाल भगवंता॥नाथ भरत कछु पूँछन चहहीं। प्रस्न करत मन सकुचत अहहीं॥॥३॥
तब हनुमानने हाथ जोड़कर कहा—हे दीनदयालु भगवान सुनिये, भरत कुछ पूछना चाहते हैं पर मनमें सकुचा रहे हैं।
तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ। भरतहि मोहि कछु अंतर काऊ॥सुनि प्रभु बचन भरत गहे चरना। सुनहु नाथ प्रनतारति हरना॥॥४॥
प्रभुने कहा—हनुमान, तुम तो मेरा स्वभाव जानते ही हो, भरत और मेरे बीच कभी कोई अंतर रहा है क्या? यह सुनते ही भरतने उनके चरण पकड़ लिये—सुनिये नाथ, शरणागतकी पीड़ा हरनेवाले!
नाथ न मोहि संदेह कछु सपनेहुँ सोक न मोह।केवल कृपा तुम्हारिहि कृपानंद संदोह॥३६॥
हे नाथ, मुझे कोई संदेह नहीं, स्वप्रमें भी शोक-मोह नहीं है; यह केवल आपकी ही कृपा है, हे कृपा और आनंदके समूह!
करउँ कृपानिधि एक ढिठाई। मैं सेवक तुम्ह जन सुखदाई॥संतन्ह कै महिमा रघुराई। बहु बिधि बेद पुरानन्ह गाई॥॥१॥
फिर भी, कृपानिधान, मैं एक धृष्टता करता हूँ—मैं सेवक हूँ और आप सेवकको सुख देनेवाले हैं। हे रघुनाथ, संतोंकी महिमा वेद-पुराणोंने अनेक प्रकारसे गायी है,
श्रीमुख तुम्ह पुनि कीन्हि बड़ाई। तिन्ह पर प्रभुहि प्रीति अधिकाई॥सुना चहउँ प्रभु तिन्ह कर लच्छन। कृपासिंधु गुन ग्यान बिचच्छन॥॥२॥
और आपने भी स्वयं अपने मुखसे उनकी बड़ाई की है, उनपर आपका प्रेम भी अपार है। हे प्रभु, मैं उनके लक्षण सुनना चाहता हूँ, आप ही कृपासागर और गुण-ज्ञानमें निपुण हैं।
संत असंत भेद बिलगाई। प्रनतपाल मोहि कहहु बुझाई॥संतन्ह के लच्छन सुनु भ्राता। अगनित श्रुति पुरान बिख्याता॥॥३॥
हे शरणागतपालक, संत और असंतका भेद अलग-अलग करके मुझे समझाइये। रामने कहा—सुनो भाई, संतोंके लक्षण असंख्य हैं, जो वेद-पुराणोंमें प्रसिद्ध हैं।
संत असंतन्हि के असि करनी। जिमि कुठार चंदन आचरनी॥काटइ परसु मलय सुनु भाई। निज गुन देइ सुगंध बसाई॥॥४॥
संत और असंतकी करनी कुल्हाड़ी और चंदनके स्वभाव जैसी है—सुनो भाई, कुल्हाड़ी चंदनको काटती है, पर चंदन अपने स्वभाववश उसे भी अपनी सुगंधसे बसा देता है।
ताते सुर सीसन्ह चढ़त जग बल्लभ श्रीखंड।अनल दाहि पीटत घनहिं परसु बदन यह दंड॥३७॥
इसी गुणके कारण चंदन देवताओंके मस्तकपर चढ़ता और जगतका प्रिय बनता है, जबकि कुल्हाड़ीको यह सजा मिलती है कि उसे आगमें तपाकर घनसे पीटा जाता है।
बिषय अलंपट सील गुनाकर। पर दुख दुख सुख सुख देखे पर॥सम अभूतरिपु बिमद बिरागी। लोभामरष हरष भय त्यागी॥॥१॥
संत विषयोंमें आसक्त नहीं होते, शील और सद्गुणोंकी खान होते हैं; परायी पीड़ासे दुःखी और परायी खुशीसे सुखी होते हैं, सम रहते हैं, किसीको शत्रु नहीं मानते, अभिमानरहित और वैराग्यवान होते हैं, लोभ-क्रोध-हर्ष-भय त्याग चुके होते हैं।
कोमलचित दीनन्ह पर दाया। मन बच क्रम मम भगति अमाया॥सबहि मानप्रद आपु अमानी। भरत प्रान सम मम ते प्रानी॥॥२॥
उनका हृदय अत्यंत कोमल होता है, दीनोंपर दया करते हैं, मन-वचन-कर्मसे निष्कपट भक्ति करते हैं; सबको आदर देते हैं, स्वयं मानरहित रहते हैं—हे भरत, ऐसे संत मुझे प्राणोंके समान प्रिय हैं।
बिगत काम मम नाम परायन। सांति बिरति बिनती मुदितायन॥सीतलता सरलता मयत्री। द्विज पद प्रीति धर्म जनयत्री॥॥३॥
उन्हें कोई कामना नहीं होती, केवल मेरे नामके आश्रित रहते हैं, शांति-वैराग्य-विनय-प्रसन्नताके घर होते हैं; शीतलता, सरलता, सबसे मैत्री और ब्राह्मणोंके चरणोंमें प्रीति उनमें बसी रहती है, जो धर्मको जन्म देती है।
ए सब लच्छन बसहिं जासु उर। जानेहु तात संत संतत फुर॥सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं। परुष बचन कबहूँ नहिं बोलहिं॥॥४॥
हे तात, ये सब लक्षण जिसके हृदयमें बसें, उसे सदा सच्चा संत जानना—जो संयम, नियम और नीतिसे कभी विचलित नहीं होते और कभी कठोर वचन नहीं बोलते;
निंदा अस्तुति उभय सम ममता मम पद कंज।ते सज्जन मम प्रानप्रिय गुन मंदिर सुख पुंज॥३८॥
निंदा और स्तुति जिन्हें समान लगती है, जिनकी ममता केवल मेरे चरणकमलोंमें है—वे ही गुणोंके धाम, सुखकी राशि संतजन मुझे प्राणोंसे प्रिय हैं।
सुनहु असंतन्ह केर सुभाऊ। भूलेहुँ संगति करिअ न काऊ॥तिन्ह कर संग सदा दुखदाई। जिमि कलपहि घालइ हरहाई॥॥१॥
अब असंतोंका स्वभाव सुनो—भूलकर भी उनकी संगति मत करना; उनका साथ सदा दुःख देता है, जैसे दुष्ट गाय अपने संगसे अच्छी दुधारू गायको भी बिगाड़ देती है।
खलन्ह हृदयँ अति ताप बिसेषी। जरहिं सदा पर संपति देखी॥जहँ कहुँ निंदा सुनहिं पराई। हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई॥॥२॥
दुष्टोंके हृदयमें भारी संताप रहता है, दूसरेकी संपत्ति देखकर सदा जलते रहते हैं; कहीं दूसरेकी निंदा सुन लें तो ऐसे हर्षित होते हैं मानो राहमें खजाना मिल गया हो।
काम क्रोध मद लोभ परायन। निर्दय कपटी कुटिल मलायन॥बयरु अकारन सब काहू सों। जो कर हित अनहित ताहू सों॥॥३॥
वे काम, क्रोध, मद और लोभके अधीन, निर्दयी, कपटी, कुटिल और पापोंके घर होते हैं; बिना कारण सबसे बैर रखते हैं और भलाई करनेवालेके साथ भी बुराई करते हैं।
झूठइ लेना झूठ देना। झूठ भोजन झूठ चबेना॥बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा। खाइ महा अति हृदय कठोरा॥॥४॥
उनका लेना-देना, खाना-चबाना सब झूठ ही होता है; वे मोरकी तरह मीठा बोलते हैं, पर उनका हृदय इतना कठोर होता है कि वह भयंकर सर्पको भी निगल जाय।
पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद।ते नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद॥३९॥
जो दूसरोंसे द्रोह करते हैं, परायी स्त्री, परायाधन और परायी निंदामें रत रहते हैं—वे पामर, पापी मनुष्य मानव-देह धरे राक्षस ही हैं।
लोभइ ओढ़न लोभइ डासन। सिस्त्रोदर पर जमपुर त्रास न॥काहू की जौं सुनहिं बड़ाई। स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई॥॥१॥
लोभ ही उनका ओढ़ना-बिछौना है, पशुतुल्य भोग-भोजनमें डूबे रहते हैं, यमपुरका भय भी नहीं मानते; किसीकी प्रशंसा सुन लें तो ऐसी साँस लेते हैं मानो बुखार चढ़ आया हो।
जब काहू कै देखहिं बिपती। सुखी भए मानहुँ जग नृपती॥स्वारथ रत परिवार बिरोधी। लंपट काम लोभ अति क्रोधी॥॥२॥
और जब किसी और की विपत्ति देखते हैं, तो ऐसे सुखी होते हैं मानो संसारके राजा बन गये हों; वे स्वार्थपरायण, अपने ही परिवारके विरोधी, काम-लोभमें लिप्त और अत्यंत क्रोधी होते हैं।
मातु पिता गुर बिप्र न मानहिं। आपु गए अरु घालहिं आनहिं॥करहिं मोह बस द्रोह परावा। संत संग हरि कथा न भावा॥॥३॥
वे माता, पिता, गुरु और ब्राह्मणको कुछ नहीं मानते; स्वयं तो नष्ट रहते ही हैं, दूसरोंको भी नष्ट करते हैं। मोहवश दूसरोंसे द्रोह करते हैं, न उन्हें संतोंका संग भाता है, न हरिकथा।
अवगुन सिंधु मंदमति कामी। बेद बिदूषक परधन स्वामी॥बिप्र द्रोह पर द्रोह बिसेषा। दंभ कपट जियँ धरें सुबेषा॥॥४॥
वे अवगुणोंके सागर, मंदबुद्धि, कामी, वेदोंके निंदक और परायी संपत्तिको हड़पनेवाले होते हैं; सबसे द्रोह करते हैं, पर ब्राह्मणसे विशेष; हृदयमें दंभ-कपट भरा होता है, पर बाहरसे सुंदर वेष धारण किये रहते हैं।
ऐसे अधम मनुज खल कृतजुग त्रेता नाहिं।द्वापर कछुक बृंद बहु होइहहिं कलिजुग माहिं॥॥४०॥
ऐसे नीच दुष्ट मनुष्य सतयुग और त्रेतामें नहीं होते; द्वापरमें कुछ थोड़े होंगे, पर कलियुगमें इनके झुंड-के-झुंड होंगे।
पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥निर्नय सकल पुरान बेद कर। कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर॥॥१॥
हे भाई, दूसरोंका भला करनेके समान कोई धर्म नहीं और दूसरेको दुःख देनेके समान कोई अधर्म नहीं—यह सभी वेद-पुराणोंका निश्चित सिद्धांत है, विद्वान इसे जानते हैं।
नर सरीर धरि जे पर पीरा। करहिं ते सहहिं महा भव भीरा॥करहिं मोह बस नर अघ नाना। स्वारथ रत परलोक नसाना॥॥२॥
मनुष्यशरीर पाकर भी जो दूसरोंको पीड़ा देते हैं, उन्हें जन्म-मृत्युके भारी संकट सहने पड़ते हैं; मोहवश स्वार्थमें डूबे लोग अनेक पाप करते हैं और अपना परलोक बिगाड़ लेते हैं।
कालरूप तिन्ह कहँ मैं भ्राता। सुभ अरु असुभ कर्म फल दाता॥अस बिचारि जे परम सयाने। भजहिं मोहि संसृत दुख जाने॥॥३॥
उनके लिये, भाई, मैं स्वयं कालरूप हूँ, उनके शुभ-अशुभ कर्मोंका फल देनेवाला। ऐसा जानकर जो परम बुद्धिमान हैं, वे संसारको दुःखरूप जानकर मुझे ही भजते हैं।
त्यागहिं कर्म सुभासुभ दायक। भजहिं मोहि सुर नर मुनि नायक॥संत असंतन्ह के गुन भाषे। ते न परहिं भव जिन्ह लखि राखे॥॥४॥
वे शुभ-अशुभ फल देनेवाले कर्मोंको त्यागकर देव-मनुष्य-मुनियोंके स्वामी मुझको भजते हैं। इस तरह संत-असंतके गुण मैंने कहे; जिसने इन्हें समझ लिया, वह जन्म-मृत्युके चक्रमें नहीं पड़ता।
सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक।गुन यह उभय न देखिअहिं देखिअ सो अबिबेक॥४१॥
सुनो तात, माया-रचित गुण और दोष दोनों ही अनेक हैं; इन दोनोंको न देखना ही विवेक है, इन्हें देखना ही अविवेक है।
श्रीमुख बचन सुनत सब भाई। हरषे प्रेम न हृदयँ समाई॥करहिं बिनय अति बारहिं बारा। हनूमान हियँ हरष अपारा॥॥१॥
प्रभुके ये वचन सुनकर सब भाई हर्षित हो उठे, प्रेम हृदयमें समाता न था; वे बार-बार विनती करने लगे, और हनुमानके हृदयमें तो अपार हर्ष था।
पुनि रघुपति निज मंदिर गए। एहि बिधि चरित करत नित नए॥बार बार नारद मुनि आवहिं। चरित पुनीत राम के गावहिं॥॥२॥
फिर रघुनाथ अपने महलको गये, इस प्रकार वे नित नयी लीला रचते रहे; नारदमुनि बार-बार आते और रामके पावन चरित्र गाते।
नित नव चरन देखि मुनि जाहीं। ब्रह्मलोक सब कथा कहाहीं॥सुनि बिरंचि अतिसय सुख मानहिं। पुनि पुनि तात करहु गुन गानहिं॥॥३॥
मुनि यहाँसे नित नयी लीलाएँ देखकर जाते और ब्रह्मलोकमें जाकर सब कथा सुनाते; ब्रह्माजी सुनकर अत्यंत सुख पाते और कहते—तात, बार-बार रामके गुण गाओ।
सनकादिक नारदहि सराहहिं। जद्यपि ब्रह्म निरत मुनि आहहिं॥सुनि गुन गान समाधि बिसारी।। सादर सुनहिं परम अधिकारी॥॥४॥
सनकादि मुनि नारदकी सराहना करते; यद्यपि वे स्वयं ब्रह्मनिष्ठ हैं, फिर भी रामका गुणगान सुनकर अपनी समाधि भूल जाते और आदरसे सुनते हैं—वे ही इस कथाके सच्चे अधिकारी हैं।
जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान।जे हरि कथाँ न करहिं रति तिन्ह के हिय पाषान॥४२॥
जीवन्मुक्त, ब्रह्मपरायण मुनि भी ध्यान छोड़कर रामका चरित्र सुनते हैं; यह जानकर भी जो हरिकथासे प्रेम नहीं करते, उनका हृदय पत्थरके समान है।
एक बार रघुनाथ बोलाए। गुर द्विज पुरबासी सब आए॥बैठे गुर मुनि अरु द्विज सज्जन। बोले बचन भगत भव भंजन॥॥१॥
एक बार रघुनाथने बुलाया तो गुरु, ब्राह्मण और सब नगरवासी सभामें आये; सब यथायोग्य बैठ गये, तब भक्तोंके भवबंधनको मिटानेवाले रामने वचन कहे।
सुनहु सकल पुरजन मम बानी। कहउँ न कछु ममता उर आनी॥नहिं अनीति नहिं कछु प्रभुताई। सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई॥॥२॥
हे नगरवासियो, मेरी बात सुनो—मैं इसे किसी ममतासे नहीं कहता, न इसमें कोई अनीति है, न प्रभुताका आग्रह; सुनो और जो अच्छा लगे वही करो।
सोइ सेवक प्रियतम मम सोई। मम अनुसासन मानै जोई॥जौं अनीति कछु भाषौं भाई। तौ मोहि बरजहु भय बिसराई॥॥३॥
जो मेरी आज्ञा माने, वही मेरा सेवक और प्रियतम है। और भाई, यदि मैं कभी कोई अनुचित बात कहूँ, तो निर्भय होकर मुझे रोक देना।
बड़ें भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथिन्ह गावा॥साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा॥॥४॥
बड़े भाग्यसे यह मनुष्यशरीर मिलता है, जिसे सब शास्त्र देवताओंको भी दुर्लभ कहते हैं; यह साधनाका धाम और मोक्षका द्वार है—इसे पाकर भी जिसने परलोक न सँवारा,
सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ।कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोष लगाइ॥४३॥
वह परलोकमें दुःख भोगता है, सिर पीट-पीटकर पछताता है और अपनी भूल न समझकर काल, कर्म और ईश्वरपर व्यर्थ दोष मढ़ता है।
एहि तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं। पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं॥॥१॥
भाई, इस शरीरका फल विषयभोग नहीं है; स्वर्गका सुख भी थोड़ा है और अंततः दुःखदायी। मनुष्यशरीर पाकर भी जो मन विषयोंमें लगा देते हैं, वे मूर्ख अमृतके बदले विष चुन लेते हैं।
ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई। गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई॥आकर चारि लच्छ चौरासी। जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी॥॥२॥
जो पारसमणि खोकर घुँघची बीन ले, उसे कोई बुद्धिमान नहीं कहता। यह अविनाशी जीव चौरासी लाख योनियोंमें युगों-युगोंसे भटकता रहता है,
फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म सुभाव गुन घेरा॥कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही॥॥३॥
मायाकी प्रेरणासे काल, कर्म, स्वभाव और गुणोंसे घिरा सदा भटकता रहता है; बिना किसी कारणके स्नेह करनेवाला ईश्वर कभी-कभी दया करके इसे मनुष्यशरीर दे देता है।
नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो॥करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा॥॥४॥
यह मनुष्यशरीर भवसागर पार करनेके लिये बेड़ा है, मेरी कृपा अनुकूल पवन है, सद्गुरु इस दृढ़ नावके कर्णधार हैं—इस तरह दुर्लभ साधन सहज ही सुलभ हो जाते हैं।
जो न तर भव सागर नर समाज अस पाइ।सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ॥४४॥
जो ऐसा अवसर पाकर भी भवसागर पार नहीं करता, वह कृतघ्न और मंदबुद्धि है, और आत्मघाती जैसी दुर्गति पाता है।
जौं परलोक इहाँ सुख चहहू। सुनि मम बचन हृदय दृढ़ गहहू॥सुलभ सुखद मारग यह भाई। भगति मोरि पुरान श्रुति गाई॥॥१॥
यदि इस लोक और परलोक दोनोंमें सुख चाहते हो, तो मेरे वचन हृदयमें दृढ़तासे धारण कर लो; हे भाई, यह मेरी भक्तिका मार्ग सुलभ और सुखद है, वेद-पुराणोंने इसे गाया है।
ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका। साधन कठिन न मन कहुँ टेका॥करत कष्ट बहु पावइ कोऊ। भक्ति हीन मोहि प्रिय नहिं सोऊ॥॥२॥
ज्ञानका मार्ग दुर्गम है, उसमें अनेक विघ्न हैं, साधन कठिन है और मनको कोई सहारा नहीं मिलता; बड़े कष्टसे कोई उसे पा भी ले, तो भक्तिहीन होनेके कारण वह मुझे प्रिय नहीं।
भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी॥पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता॥॥३॥
भक्ति स्वतंत्र और सब सुखोंकी खान है, पर सत्संगके बिना कोई इसे नहीं पाता; और संत भी पुण्यके बिना नहीं मिलते—सत्संग ही जन्म-मृत्युके चक्रका अंत करता है।
पुन्य एक जग महुँ नहिं दूजा। मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा॥सानुकूल तेहि पर मुनि देवा। जो तजि कपटु करइ द्विज सेवा॥॥४॥
संसारमें एक ही पुण्य है, दूसरा कोई नहीं—मन-वचन-कर्मसे ब्राह्मणके चरणोंकी पूजा। जो कपट त्यागकर ब्राह्मणकी सेवा करता है, उसपर मुनि और देवता प्रसन्न रहते हैं।
औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउँ कर जोरि।संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि॥४५॥
और एक गुप्त बात भी है, जो मैं हाथ जोड़कर सबसे कहता हूँ—शिवजीके भजन बिना मनुष्य मेरी भक्ति कभी नहीं पाता।
कहहु भगति पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा॥सरल सुभाव न मन कुटिलाई। जथा लाभ संतोष सदाई॥॥१॥
भक्तिके मार्गमें कौन-सा परिश्रम है? न योग चाहिये, न यज्ञ-जप-तप-उपवास; बस सरल स्वभाव हो, मनमें कुटिलता न हो और जो मिले उसीमें सदा संतोष रखे।
मोर दास कहाइ नर आसा। करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा॥बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई। एहि आचरन बस्य मैं भाई॥॥२॥
मेरा दास कहलाकर भी जो मनुष्योंसे आशा रखे, उसका मुझपर कैसा विश्वास? अधिक क्या कहूँ, भाई, मैं तो बस इस आचरणका ही वशीभूत हूँ।
बैर न बिग्रह आस न त्रासा। सुखमय ताहि सदा सब आसा॥अनारंभ अनिकेत अमानी। अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी॥॥३॥
जो न वैर करे, न झगड़ा, न आशा रखे, न भय—उसके लिये सभी दिशाएँ सुखमय हैं। जो फलेच्छासे कर्म नहीं करता, जिसकी घरमें ममता नहीं, जो मानहीन, निष्पाप, क्रोधहीन, दक्ष और विज्ञानवान है,
प्रीति सदा सज्जन संसर्गा। तन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा॥भगति पच्छ हठ नहिं सठताई। दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई॥॥४॥
जिसे सदा संतोंके संगमें प्रीति है, जिसे विषय-सुख, स्वर्ग और मोक्ष तक तृणके समान लगते हैं, जो भक्तिका आग्रही तो है पर मूर्खतावश हठ नहीं करता और सब कुतर्कोंको दूर बहा चुका है,
मम गुन ग्राम नाम रत गत ममता मद मोह।ता कर सुख सोइ जानइ परानंद संदोह॥४६॥
जो मेरे गुणों और नामका ही परायण है, ममता-मद-मोहसे मुक्त है—उसका सुख वही जानता है जो स्वयं परमानंदको प्राप्त हो चुका है।
सुनत सुधासम बचन राम के। गहे सबनि पद कृपाधाम के॥जननि जनक गुर बंधु हमारे। कृपा निधान प्रान ते प्यारे॥॥१॥
रामके अमृत-सम वचन सुनकर सबने कृपाधामके चरण पकड़ लिये—आप ही हमारे माता-पिता, गुरु और भाई हैं, हे कृपानिधान, प्राणोंसे भी प्रिय।
तनु धनु धाम राम हितकारी। सब बिधि तुम्ह प्रनतारति हारी॥असि सिख तुम्ह बिनु देइ न कोऊ। मातु पिता स्वारथ रत ओऊ॥॥२॥
हे शरणागतकी पीड़ा हरनेवाले, आप ही हमारे तन-धन-घर और हर तरहसे हितकारी हैं; ऐसी शिक्षा आपके सिवा कोई नहीं दे सकता—माता-पिता भी स्वार्थके वशीभूत रहते हैं।
हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी॥स्वारथ मीत सकल जग माहीं। सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं॥॥३॥
हे असुरोंके शत्रु, संसारमें निःस्वार्थ उपकार करनेवाले बस दो ही हैं—आप और आपके सेवक; बाकी सब स्वार्थके ही मित्र हैं, प्रभु, उनके मनमें स्वप्रमें भी परमार्थ नहीं।
सबके बचन प्रेम रस साने। सुनि रघुनाथ हृदयँ हरषाने॥निज निज गृह गए आयसु पाई। बरनत प्रभु बतकही सुहाई॥॥४॥
सबके प्रेमरससे सने वचन सुनकर रघुनाथका हृदय हर्षसे भर गया; फिर आज्ञा पाकर सब प्रभुकी सुंदर बातें कहते हुए अपने-अपने घर लौट गये।
उमा अवधबासी नर नारि कृतारथ रूप।ब्रह्म सच्चिदानंद घन रघुनायक जहँ भूप॥४७॥
शिवजी कहते हैं—हे उमा, अवधके नर-नारी सब कृतार्थ हैं, क्योंकि वहाँ स्वयं सच्चिदानंदघन रघुनाथ राजा हैं।
एक बार बसिष्ट मुनि आए। जहाँ राम सुखधाम सुहाए॥अति आदर रघुनायक कीन्हा। पद पखारि पादोदक लीन्हा॥॥१॥
एक बार वसिष्ठमुनि वहाँ आये जहाँ सुखधाम राम विराजते थे; रघुनाथने उनका बड़ा आदर किया, चरण धोकर चरणामृत ग्रहण किया।
राम सुनहु मुनि कह कर जोरी। कृपासिंधु बिनती कछु मोरी॥देखि देखि आचरन तुम्हारा। होत मोह मम हृदयँ अपारा॥॥२॥
मुनिने हाथ जोड़कर कहा—हे कृपासागर राम, मेरी एक विनती सुनिये; आपका मनुष्योचित आचरण देख-देखकर मेरे हृदयमें अपार विस्मय होता है।
महिमा अमित बेद नहिं जाना। मैं केहि भाँति कहउँ भगवाना॥उपरोहित्य कर्म अति मंदा। बेद पुरान सुमृति कर निंदा॥॥३॥
आपकी महिमा असीम है, जिसे वेद भी नहीं जानते, फिर मैं कैसे कहूँ! पुरोहिती तो बहुत नीचा पेशा है, वेद-पुराण-स्मृति सब इसकी निंदा करते हैं—
जब न लेउँ मैं तब बिधि मोही। कहा लाभ आगें सुत तोही॥परमातमा ब्रह्म नर रूपा। होइहि रघुकुल भूषन भूपा॥॥४॥
जब मैंने इसे स्वीकार नहीं किया था, तब ब्रह्माजीने कहा था—पुत्र, आगे इससे तुम्हें बड़ा लाभ होगा, क्योंकि स्वयं परमात्मा मनुष्यरूप धरकर रघुकुलके भूषण राजा बनेंगे।
-तब मैं हृदयँ बिचारा जोग जग्य ब्रत दान।जा कहुँ करिअ सो पैहउँ धर्म न एहि सम आन॥४८॥
तब मैंने मन-ही-मन सोचा—जिस फलके लिये योग, यज्ञ, व्रत और दान किये जाते हैं, वह मुझे इसी कर्मसे मिल जायगा; फिर इसके समान कोई धर्म ही नहीं।
जप तप नियम जोग निज धर्मा। श्रुति संभव नाना सुभ कर्मा॥ग्यान दया दम तीरथ मज्जन। जहँ लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन॥॥१॥
जप, तप, नियम, योग, अपना-अपना धर्म, वेदविहित शुभ कर्म, ज्ञान, दया, संयम, तीर्थस्नान—जहाँतक वेद और सज्जनोंने धर्म बताया है,
आगम निगम पुरान अनेका। पढ़े सुने कर फल प्रभु एका॥तब पद पंकज प्रीति निरंतर। सब साधन कर यह फल सुंदर॥॥२॥
और अनेक शास्त्रों, वेदों-पुराणोंके पढ़ने-सुननेका फल भी अंततः एक ही है, प्रभु—और सब साधनोंका भी बस यही सुंदर फल है कि आपके चरणकमलोंमें अटूट प्रेम बना रहे।
छूटइ मल कि मलहि के धोएँ। घृत कि पाव कोइ बारि बिलोएँ॥प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुँ न जाई॥॥३॥
क्या मैलसे मैल धुलता है? क्या जल बिलोनेसे घी निकलता है? वैसे ही, हे रघुनाथ, प्रेमभक्तिरूपी जलके बिना हृदयका मैल कभी नहीं जाता।
सोइ सर्बग्य तग्य सोइ पंडित। सोइ गुन गृह बिग्यान अखंडित॥दच्छ सकल लच्छन जुत सोई। जाकें पद सरोज रति होई॥॥४॥
वही सर्वज्ञ है, वही तत्त्वज्ञ और पंडित है, वही गुणोंका घर और पूर्ण विज्ञानी है, वही चतुर और सर्वगुणसंपन्न है, जिसका आपके चरणकमलोंमें प्रेम है।
नाथ एक बर मागउँ राम कृपा करि देहु।जन्म जन्म प्रभु पद कमल कबहुँ घटै जनि नेहु॥४९॥
हे नाथ राम, मैं आपसे एक ही वर माँगता हूँ, कृपा करके दीजिये—आपके चरणकमलोंमें मेरा प्रेम जन्म-जन्मांतरमें भी कभी कम न हो।
अस कहि मुनि बसिष्ट गृह आए। कृपासिंधु के मन अति भाए॥हनूमान भरतादिक भ्राता। संग लिए सेवक सुखदाता॥॥१॥
ऐसा कहकर वसिष्ठमुनि घर लौट गये, उनकी बातें कृपासागरके मनको बहुत भायीं; फिर सेवकोंको सुख देनेवाले रामने हनुमान और भरत आदि भाइयोंको साथ लिया।
पुनि कृपाल पुर बाहेर गए। गज रथ तुरग मगावत भए॥देखि कृपा करि सकल सराहे। दिए उचित जिन्ह जिन्ह तेइ चाहे॥॥२॥
फिर कृपालु राम नगरके बाहर गये और हाथी, रथ, घोड़े मँगवाये; उन्हें देखकर कृपापूर्वक सबकी सराहना की और जिस-जिसने चाहा, उसे उचित जानकर वह भेंट दी।
हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई। गए जहाँ सीतल अवँराई॥भरत दीन्ह निज बसन डसाई। बैठे प्रभु सेवहिं सब भाई॥॥३॥
जगतके सारे श्रमको हरनेवाले प्रभुको ही जब कुछ थकान महसूस हुई, तो वे शीतल अमराईमें गये; वहाँ भरतने अपना वस्त्र बिछाया, प्रभु उसपर बैठे और सब भाई सेवामें लग गये।
मारुतसुत तब मारुत करई। पुलक बपुष लोचन जल भरई॥
तब पवनपुत्र हनुमान पंखा झलने लगे, उनका शरीर पुलकित हो उठा और नेत्र भर आए।
हनूमान सम नहिं बड़भागी। नहिं कोउ राम चरन अनुरागी॥गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई। बार बार प्रभु निज मुख गाई॥
शिवजी कहते हैं—हे गिरिजा, हनुमान के समान न कोई बड़भागी है, न कोई राम के चरणों का ऐसा प्रेमी, जिसकी सेवा-भक्ति की प्रभु ने स्वयं अपने मुख से बार-बार सराहना की।
तेहिं अवसर मुनि नारद आए करतल बीन।गावन लगे राम कल कीरति सदा नबीन॥॥५०॥
ठीक उसी समय नारदमुनि हाथ में वीणा लिए आ पहुँचे और राम के सदा नये-से मधुर यश का गान करने लगे।
मामवलोकय पंकज लोचन। कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन॥नील तामरस स्याम काम अरि। हृदय कंज मकरंद मधुप हरि॥॥१॥
हे कमलनयन, कृपादृष्टिमात्रसे शोक हरनेवाले, मेरी ओर देखिये; हे नीलकमल-श्याम, कामारि शिवके हृदयकमलके मकरंदको पीनेवाले भ्रमर हरि!
जातुधान बरूथ बल भंजन। मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन॥भूसुर ससि नव बृंद बलाहक। असरन सरन दीन जन गाहक॥॥२॥
राक्षससेनाके बलको तोड़नेवाले, मुनि-संतोंको आनंद देनेवाले, पापोंके नाशक; ब्राह्मणरूपी खेतीके लिये नवमेघ, शरणहीनोंके शरणदाता, दीनोंके रक्षक!
भुज बल बिपुल भार महि खंडित। खर दूषन बिराध बध पंडित॥रावनारि सुखरूप भूपबर। जय दसरथ कुल कुमुद सुधाकर॥॥३॥
अपनी भुजाओंसे पृथ्वीका भारी बोझ उतारनेवाले, खर-दूषण-विराधके संहारमें कुशल, रावणके शत्रु, आनंदस्वरूप, राजाओंमें श्रेष्ठ, दशरथकुलरूपी कुमुदिनीके चंद्रमा—आपकी जय हो!
सुजस पुरान बिदित निगमागम। गावत सुर मुनि संत समागम॥कारुनीक ब्यलीक मद खंडन। सब बिधि कुसल कोसला मंडन॥॥४॥
आपका सुंदर यश पुराण-वेदोंमें प्रसिद्ध है, देव-मुनि-संत सब मिलकर उसे गाते हैं; करुणामय, झूठे अभिमानको तोड़नेवाले, सब तरहसे कुशल, आप ही कोसलपुरीके भूषण हैं।
कलि मल मथन नाम ममताहन। तुलसीदास प्रभु पाहि प्रनत जन॥॥५॥
आपका नाम कलियुगके पापोंको मथ डालता और ममताको मार डालता है—हे तुलसीदासके स्वामी, इस शरणागतकी रक्षा कीजिये।
प्रेम सहित मुनि नारद बरनि राम गुन ग्राम।सोभासिंधु हृदयँ धरि गए जहाँ बिधि धाम॥५१॥
इस प्रकार प्रेमपूर्वक रामके गुणोंका वर्णन कर नारदमुनि उस शोभाके सागरको हृदयमें बसाकर ब्रह्मलोक चले गये।
गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा। मैं सब कही मोरि मति जथा॥राम चरित सत कोटि अपारा। श्रुति सारदा न बरनै पारा॥॥१॥
शिवजी कहते हैं—हे गिरिजा, सुनो, यह उज्ज्वल कथा मैंने अपनी बुद्धिभर पूरी कह दी; रामके चरित्र तो सौ करोड़से भी अधिक हैं, वेद और सरस्वती भी उनका पूरा वर्णन नहीं कर सकते।
राम अनंत अनंत गुनानी। जन्म कर्म अनंत नामानी॥जल सीकर महि रज गनि जाहीं। रघुपति चरित न बरनि सिराहीं॥॥२॥
राम अनंत हैं, उनके गुण अनंत, जन्म-कर्म-नाम भी अनंत; जलकी बूँदें और धरतीकी धूल गिनी जा सकती है, पर रघुनाथके चरित्रोंका वर्णन कभी समाप्त नहीं होता।
बिमल कथा हरि पद दायनी। भगति होइ सुनि अनपायनी॥उमा कहिउँ सब कथा सुहाई। जो भुसुंडि खगपतिहि सुनाई॥॥३॥
यह पवित्र कथा हरिके परमपदको देनेवाली है, इसे सुननेसे अटूट भक्ति मिलती है। हे उमा, मैंने वह सब सुंदर कथा कही जो काकभुशुण्डिने गरुड़को सुनायी थी।
कछुक राम गुन कहेउँ बखानी। अब का कहौं सो कहहु भवानी॥सुनि सुभ कथा उमा हरषानी। बोली अति बिनीत मृदु बानी॥॥४॥
मैंने रामके कुछ थोड़े ही गुण बखानकर कहे, अब हे भवानी, तुम्हीं बताओ और क्या कहूँ? यह मंगलमय कथा सुनकर पार्वतीजी हर्षित हुईं और अत्यंत विनम्र, कोमल वाणीमें बोलीं।
धन्य धन्य मैं धन्य पुरारी। सुनेउँ राम गुन भव भय हारी॥॥५॥
हे त्रिपुरारि, मैं धन्य हूँ, धन्य-धन्य हूँ, जो मैंने जन्म-मृत्युका भय हरनेवाले रामके गुण सुने।
तुम्हरी कृपाँ कृपायतन अब कृतकृत्य न मोह।जानेउँ राम प्रताप प्रभु चिदानंद संदोह॥५२(क)॥
हे कृपाधाम, आपकी कृपासे अब मैं कृतकृत्य हो गयी, मोह जाता रहा; प्रभु, मैं सच्चिदानंदघन रामके प्रतापको जान गयी।
नाथ तवानन ससि स्रवत कथा सुधा रघुबीर।श्रवन पुटन्हि मन पान करि नहिं अघात मतिधीर॥५२(ख)॥
हे नाथ, आपका मुखरूपी चंद्रमा रघुवीरकी कथारूपी अमृत बरसाता है; हे धीरबुद्धि, मेरा मन कानोंसे उसे पीकर भी कभी तृप्त नहीं होता।
राम चरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं॥जीवनमुक्त महामुनि जेऊ। हरि गुन सुनहिं निरंतर तेऊ॥॥१॥
रामके चरित्र सुनते-सुनते जो तृप्त हो जाते हैं, उन्होंने उसका असली रस जाना ही नहीं; जीवन्मुक्त महामुनि भी हरिके गुण निरंतर सुनते ही रहते हैं।
भव सागर चह पार जो पावा। राम कथा ता कहँ दृढ़ नावा॥बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा। श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा॥॥२॥
जो भवसागर पार करना चाहता है, उसके लिये रामकथा दृढ़ नाव है; और हरिके गुण तो विषयासक्त लोगोंके भी कानोंको सुख और मनको आनंद देते हैं।
श्रवनवंत अस को जग माहीं। जाहि न रघुपति चरित सोहाहीं॥ते जड़ जीव निजात्मक घाती। जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती॥॥३॥
संसारमें ऐसा कौन कानवाला है जिसे रघुनाथके चरित्र न भाते हों? जिन्हें यह कथा नहीं भाती, वे मूर्ख जीव अपनी ही आत्माके हत्यारे हैं।
हरिचरित्र मानस तुम्ह गावा। सुनि मैं नाथ अमिति सुख पावा॥तुम्ह जो कही यह कथा सुहाई। कागभसुंडि गरुड़ प्रति गाई॥॥४॥
आपने रामचरितमानसका गान किया, हे नाथ, सुनकर मैंने अपार सुख पाया; आपने बताया कि यह सुंदर कथा काकभुशुण्डिने गरुड़को सुनायी थी—
बिरति ग्यान बिग्यान दृढ़ राम चरन अति नेह।बायस तन रघुपति भगति मोहि परम संदेह॥५३॥
—और वे काकभुशुण्डि, कौएका शरीर पाकर भी वैराग्य-ज्ञान-विज्ञानमें दृढ़ हैं, रामचरणोंमें उनका गहरा प्रेम है और उन्हें रघुनाथकी भक्ति भी प्राप्त है—यह सुनकर मुझे बड़ा विस्मय हो रहा है।
नर सहस्त्र महँ सुनहु पुरारी। कोउ एक होइ धर्म ब्रतधारी॥धर्मसील कोटिक महँ कोई। बिषय बिमुख बिराग रत होई॥॥१॥
हे त्रिपुरारि, सुनिये, हजारों मनुष्योंमें कोई एक धर्मव्रती होता है, और करोड़ों धर्मात्माओंमें कोई एक विषयोंसे विमुख होकर वैराग्यमें रत होता है।
कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई। सम्यक ग्यान सकृत कोउ लहई॥ग्यानवंत कोटिक महँ कोऊ। जीवनमुक्त सकृत जग सोऊ॥॥२॥
करोड़ों विरक्तोंमें श्रुति कहती है कोई एक ही सम्यक् ज्ञान पाता है; और करोड़ों ज्ञानियोंमें कोई एक ही जीवन्मुक्त होता है, संसारमें ऐसा कोई विरला ही मिलेगा।
तिन्ह सहस्त्र महुँ सब सुख खानी। दुर्लभ ब्रह्मलीन बिग्यानी॥धर्मसील बिरक्त अरु ग्यानी। जीवनमुक्त ब्रह्मपर प्रानी॥॥३॥
हजारों जीवन्मुक्तोंमें भी सब सुखोंकी खान, ब्रह्ममें लीन विज्ञानी और दुर्लभ है; धर्मात्मा, वैराग्यवान, ज्ञानी, जीवन्मुक्त और ब्रह्मलीन—
सब ते सो दुर्लभ सुरराया। राम भगति रत गत मद माया॥सो हरिभगति काग किमि पाई। बिस्वनाथ मोहि कहहु बुझाई॥॥४॥
—इन सबमें भी, हे देवाधिदेव, वह अत्यंत दुर्लभ है जो मद-मायासे मुक्त होकर रामभक्तिमें रत हो। हे विश्वनाथ, ऐसी दुर्लभ हरिभक्ति एक कौआ कैसे पा गया, मुझे समझाकर कहिये।
राम परायन ग्यान रत गुनागार मति धीर।नाथ कहहु केहि कारन पायउ काक सरीर॥५४॥
हे नाथ, बताइये—रामपरायण, ज्ञाननिष्ठ, गुणोंके धाम, धीरबुद्धि भुशुण्डिने किस कारण कौएका शरीर पाया?
यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा। कहहु कृपाल काग कहँ पावा॥तुम्ह केहि भाँति सुना मदनारी। कहहु मोहि अति कौतुक भारी॥॥१॥
यह प्रभुका पवित्र सुंदर चरित्र उस कौएने कहाँसे पाया, कृपालु? और हे कामारि, यह भी बताइये कि आपने इसे कैसे सुना—मुझे बड़ी उत्सुकता है।
गरुड़ महाग्यानी गुन रासी। हरि सेवक अति निकट निवासी॥तेहिं केहि हेतु काग सन जाई। सुनी कथा मुनि निकर बिहाई॥॥२॥
गरुड़ तो महाज्ञानी, सद्गुणोंकी राशि, हरिके सेवक और उनके अत्यंत निकटवासी हैं—फिर मुनियोंका समूह छोड़कर वे कौएके पास जाकर कथा सुनने क्यों गये?
कहहु कवन बिधि भा संबादा। दोउ हरिभगत काग उरगादा॥गौरि गिरा सुनि सरल सुहाई। बोले सिव सादर सुख पाई॥॥३॥
बताइये, इन दोनों हरिभक्तों—कौआ और गरुड़—के बीच यह संवाद किस तरह हुआ? पार्वतीकी सरल, सुंदर वाणी सुनकर शिवजी आदरसहित सुखपूर्वक बोले—
धन्य सती पावन मति तोरी। रघुपति चरन प्रीति नहिं थोरी॥सुनहु परम पुनीत इतिहासा। जो सुनि सकल लोक भ्रम नासा॥॥४॥
हे सती, तुम धन्य हो, तुम्हारी बुद्धि परम पवित्र है, रघुनाथके चरणोंमें तुम्हारा प्रेम कम नहीं है; अब वह परम पावन इतिहास सुनो, जिसे सुनते ही सारे लोकोंका भ्रम मिट जाता है,
उपजइ राम चरन बिस्वासा। भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा॥॥५॥
और रामचरणोंमें ऐसा विश्वास जगता है कि मनुष्य बिना किसी परिश्रमके ही भवसागर पार कर जाता है।
ऐसिअ प्रस्न बिहंगपति कीन्ह काग सन जाइ।सो सब सादर कहिहउँ सुनहु उमा मन लाइ॥५५॥
गरुड़ने भी जाकर काकभुशुण्डिसे लगभग यही प्रश्न किये थे; हे उमा, मैं वह सब आदरसहित कहूँगा, तुम मन लगाकर सुनो।
मैं जिमि कथा सुनी भव मोचनि। सो प्रसंग सुनु सुमुखि सुलोचनि॥प्रथम दच्छ गृह तव अवतारा। सती नाम तब रहा तुम्हारा॥॥१॥
जिस तरह मैंने वह भवबंधन काटनेवाली कथा सुनी, हे सुमुखी सुलोचनी, वह प्रसंग सुनो। पहले तुम्हारा जन्म दक्षके घर हुआ था, तब तुम्हारा नाम सती था।
दच्छ जग्य तब भा अपमाना। तुम्ह अति क्रोध तजे तब प्राना॥मम अनुचरन्ह कीन्ह मख भंगा। जानहु तुम्ह सो सकल प्रसंगा॥॥२॥
दक्षके यज्ञमें तुम्हारा अपमान हुआ, तुमने क्रोधवश प्राण त्याग दिये; फिर मेरे गणोंने वह यज्ञ ध्वंस कर डाला—यह सब प्रसंग तुम पहलेसे ही जानती हो।
तब अति सोच भयउ मन मोरें। दुखी भय बियोग प्रिय तोरें॥सुंदर बन गिरि सरित तड़ागा। कौतुक देखत फिरउँ बेरागा॥॥३॥
तब मेरे मनमें बड़ा शोक हुआ, प्रिये, तुम्हारे वियोगसे मैं दुखी हो गया; विरक्त होकर मैं सुंदर वन, पर्वत, नदी-तालाबोंके दृश्य देखता हुआ भटकता रहा।
गिरि सुमेर उत्तर दिसि दूरी। नील सैल एक सुंदर भूरी॥तासु कनकमय सिखर सुहाए। चारि चारु मोरे मन भाए॥॥४॥
सुमेरु पर्वतसे उत्तरमें, बहुत दूर, एक अत्यंत सुंदर नीला पर्वत है; उसके स्वर्णमय सुंदर शिखरोंमेंसे चार शिखर मेरे मनको विशेष भाये।
तिन्ह पर एक एक बिटप बिसाला। बट पीपर पाकरी रसाला॥सैलोपरि सर सुंदर सोहा। मनि सोपान देखि मन मोहा॥॥५॥
उन शिखरोंमें से एक-एकपर बरगद, पीपल, पाकर और आमका विशाल वृक्ष है; पर्वतके ऊपर एक सुंदर सरोवर शोभित है, जिसकी मणि-सीढ़ियाँ देखकर मन मोहित हो जाता है।
सीतल अमल मधुर जल जलज बिपुल बहुरंग।कूजत कल रव हंस गन गुंजत मंजुल भृंग॥५६॥
उसका जल शीतल, निर्मल और मीठा है, उसमें रंग-बिरंगे अनेक कमल खिले हैं; हंस मधुर स्वरमें बोलते हैं और भौंरे सुंदर गुंजार करते हैं।
तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग सोई। तासु नास कल्पांत न होई॥माया कृत गुन दोष अनेका। मोह मनोज आदि अबिबेका॥॥१॥
उसी सुंदर पर्वतपर वह पक्षी (काकभुशुण्डि) निवास करता है, जिसका नाश कल्पके अंतमें भी नहीं होता; माया-रचित अनेक गुण-दोष, मोह-काम आदि अविवेक,
रहे ब्यापि समस्त जग माहीं। तेहि गिरि निकट कबहुँ नहिं जाहीं॥तहँ बसि हरिहि भजइ जिमि कागा। सो सुनु उमा सहित अनुरागा॥॥२॥
जो सारे संसारमें व्याप्त हैं, वे उस पर्वतके पास कभी फटकते तक नहीं। हे उमा, वहाँ रहकर वह कौआ हरिको कैसे भजता है, यह प्रेमसहित सुनो।
पीपर तरु तर ध्यान सो धरई। जाप जग्य पाकरि तर करई॥आँब छाहँ कर मानस पूजा। तजि हरि भजनु काजु नहिं दूजा॥॥३॥
पीपलके नीचे वह ध्यान लगाता है, पाकरके नीचे जप-यज्ञ करता है, आमकी छायामें मानस-पूजा करता है—हरिभजनके सिवा उसे कोई दूसरा काम नहीं।
बर तर कह हरि कथा प्रसंगा। आवहिं सुनहिं अनेक बिहंगा॥राम चरित बिचित्र बिधि नाना। प्रेम सहित कर सादर गाना॥॥४॥
बरगदके नीचे वह हरिकी कथाएँ सुनाता है, अनेक पक्षी वहाँ आकर सुनते हैं; वह विचित्र रामचरित्रको प्रेम और आदरसहित तरह-तरहसे गाता है।
सुनहिं सकल मति बिमल मराला। बसहिं निरंतर जे तेहिं ताला॥जब मैं जाइ सो कौतुक देखा। उर उपजा आनंद बिसेषा॥॥५॥
उस सरोवरपर सदा बसनेवाले निर्मल बुद्धिके सब हंस भी उसे सुनते हैं। जब मैंने वहाँ जाकर यह अद्भुत दृश्य देखा, तो मेरे हृदयमें विशेष आनंद उमड़ आया।
तब कछु काल मराल तनु धरि तहँ कीन्ह निवास।सादर सुनि रघुपति गुन पुनि आयउँ कैलास॥५७॥
तब मैंने हंसका रूप धरकर कुछ समय वहाँ निवास किया, आदरसहित रघुनाथके गुण सुने, फिर कैलास लौट आया।
गिरिजा कहेउँ सो सब इतिहासा। मैं जेहि समय गयउँ खग पासा॥अब सो कथा सुनहु जेहि हेतू। गयउ काग पहिं खग कुल केतू॥॥१॥
हे गिरिजा, मैंने वह सारा इतिहास कहा जब मैं स्वयं उस पक्षीके पास गया था; अब वह कथा सुनो जिस कारण पक्षिकुलके ध्वज गरुड़ उस कौएके पास गये।
जब रघुनाथ कीन्हि रन क्रीड़ा। समुझत चरित होति मोहि ब्रीड़ा॥इंद्रजीत कर आपु बँधायो। तब नारद मुनि गरुड़ पठायो॥॥२॥
जब रघुनाथने वह रणलीला की—जिसे याद करते मुझे भी लज्जा होती है, कि उन्होंने मेघनादके हाथों स्वयं बँध जाना स्वीकार किया—तब नारदमुनिने गरुड़को वहाँ भेजा।
बंधन काटि गयो उरगादा। उपजा हृदयँ प्रचंड बिषादा॥प्रभु बंधन समुझत बहु भाँती। करत बिचार उरग आराती॥॥३॥
सर्पभक्षी गरुड़ बंधन काटकर लौटे, पर उनके हृदयमें भारी विषाद उठा; प्रभुके उस बंधनको बार-बार सोचकर सर्पशत्रु गरुड़ तरह-तरहके विचार करने लगे—
ब्यापक ब्रह्म बिरज बागीसा। माया मोह पार परमीसा॥सो अवतार सुनेउँ जग माहीं। देखेउँ सो प्रभाव कछु नाहीं॥॥४॥
जो सर्वव्यापी, विकाररहित, वाणीके स्वामी और माया-मोहसे परे परमेश्वर हैं, सुना था कि उन्हींका यह अवतार है, पर मैंने तो उनका वह प्रभाव कहीं देखा ही नहीं।
भव बंधन ते छूटहिं नर जपि जा कर नाम।खर्च निसाचर बाँधेउ नागपास सोइ राम॥५८॥
जिनका नाम जपकर मनुष्य भवबंधनसे मुक्त हो जाते हैं, उन्हीं रामको एक तुच्छ राक्षसने नागपाशसे बाँध लिया!
नाना भाँति मनहि समुझावा। प्रगट न ग्यान हृदयँ भ्रम छावा॥खेद खिन्न मन तर्क बढ़ाई। भयउ मोहबस तुम्हरिहिं नाई॥॥१॥
गरुड़ने अपने मनको बहुत तरहसे समझाया, पर स्पष्टता नहीं आयी, हृदयमें भ्रम और गहरा गया; दुःख और कुतर्कसे व्याकुल होकर वे भी, हे उमा, ठीक तुम्हारी ही तरह मोहमें पड़ गये।
ब्याकुल गयउ देवरिषि पाहीं। कहेसि जो संसय निज मन माहीं॥सुनि नारदहि लागि अति दाया। सुनु खग प्रबल राम कै माया॥॥२॥
व्याकुल होकर गरुड़ देवर्षि नारदके पास गये और अपने मनका संदेह कह सुनाया; सुनकर नारदको बड़ी दया आयी—हे पक्षिराज, सुनिये, रामकी माया अत्यंत बलवती है।
जो ग्यानिन्ह कर चित अपहरई। बरिआई बिमोह मन करई॥जेहिं बहु बार नचावा मोही। सोइ ब्यापी बिहंगपति तोही॥॥३॥
वह ज्ञानियोंके चित्तको भी छीन लेती है और जबरन गहरा मोह उत्पन्न कर देती है; जिसने मुझे भी बार-बार नचाया है, हे पक्षिराज, वही माया अब आपको भी घेर चुकी है।
महामोह उपजा उर तोरें। मिटिहि न बेगि कहें खग मोरें॥चतुरानन पहिं जाहु खगेसा। सोइ करेहु जेहि होइ निदेसा॥॥४॥
आपके हृदयमें बड़ा भारी मोह उठ खड़ा हुआ है, यह मेरे समझानेसे शीघ्र नहीं मिटेगा; इसलिये हे पक्षिराज, आप ब्रह्माजीके पास जाइये और वहाँसे जो आदेश मिले, वही कीजिये।
अस कहि चले देवरिषि करत राम गुन गान।हरि माया बल बरनत पुनि पुनि परम सुजान॥५९॥
ऐसा कहकर परम सुजान देवर्षि नारद रामके गुण गाते और बार-बार हरिकी मायाका बल वर्णन करते हुए चल पड़े।
तब खगपति बिरंचि पहिं गयऊ। निज संदेह सुनावत भयऊ॥सुनि बिरंचि रामहि सिरु नावा। समुझि प्रताप प्रेम अति छावा॥॥१॥
तब पक्षिराज गरुड़ ब्रह्माजीके पास गये और अपना संदेह सुनाया; सुनकर ब्रह्माजीने रामको सिर नवाया, और उनका प्रताप समझते ही उनके हृदयमें अपार प्रेम छा गया।
मन महुँ करइ बिचार बिधाता। माया बस कबि कोबिद ग्याता॥हरि माया कर अमिति प्रभावा। बिपुल बार जेहिं मोहि नचावा॥॥२॥
ब्रह्माजी मन-ही-मन विचारने लगे—कवि, विद्वान, ज्ञानी सभी मायाके वशमें हैं; हरिकी मायाका प्रभाव असीम है, जिसने मुझे भी अनगिनत बार नचाया है।
अग जगमय जग मम उपराजा। नहिं आचरज मोह खगराजा॥तब बोले बिधि गिरा सुहाई। जान महेस राम प्रभुताई॥॥३॥
यह सारा चराचर जगत तो मेरा ही रचा है, फिर भी मैं मायावश नाचता हूँ—तो पक्षिराजको मोह होना कोई अचरज नहीं। फिर ब्रह्माजी सुंदर वाणीमें बोले—रामकी महिमा तो महादेव ही जानते हैं।
बैनतेय संकर पहिं जाहू। तात अनत पूछहु जनि काहू॥तहँ होइहि तव संसय हानी। चलेउ बिहंग सुनत बिधि बानी॥॥४॥
हे गरुड़, तुम शंकरजीके पास जाओ, और तात, बीचमें और किसीसे मत पूछना; वहीं तुम्हारा संदेह मिटेगा। ब्रह्माजीकी यह वाणी सुनते ही गरुड़ चल पड़े।
परमातुर बिहंगपति आयउ तब मो पास।जात रहेउँ कुबेर गृह रहिहु उमा कैलास॥६०॥
तब बड़ी आतुरतासे पक्षिराज गरुड़ मेरे पास आये; हे उमा, उस समय मैं कुबेरके घर जा रहा था और तुम कैलासपर थीं।
तेहिं मम पद सादर सिरु नावा। पुनि आपन संदेह सुनावा॥सुनि ता करि बिनती मृदु बानी। प्रेम सहित मैं कहेउँ भवानी॥॥१॥
उन्होंने आदरसे मेरे चरणोंमें सिर नवाकर अपना संदेह सुनाया; हे भवानी, उनकी विनम्र, कोमल वाणी सुनकर मैंने प्रेमसहित उनसे कहा—
मिलेहु गरुड़ मारग महँ मोही। कवन भाँति समुझावौं तोही॥तबहिं होइ सब संसय भंगा। जब बहु काल करिअ सतसंगा॥॥२॥
गरुड़, तुम मुझे राहमें मिले हो, इतनेमें तुम्हें कैसे समझाऊँ? हर संदेह तभी मिटता है जब दीर्घकाल तक सत्संग किया जाय।
सुनिअ तहाँ हरि कथा सुहाई। नाना भाँति मुनिन्ह जो गाई॥जेहि महुँ आदि मध्य अवसाना। प्रभु प्रतिपाद्य राम भगवाना॥॥३॥
वहाँ जाकर सुंदर हरिकथा सुनो, जिसे मुनियोंने अनेक प्रकारसे गाया है और जिसके आदि, मध्य और अंतमें भगवान राम ही प्रतिपाद्य हैं।
नित हरि कथा होत जहँ भाई। पठवउँ तहाँ सुनहु तुम्ह जाई॥जाइहि सुनत सकल संदेहा। राम चरन होइहि अति नेहा॥॥४॥
भाई, जहाँ नित्य हरिकथा होती है, वहीं मैं तुम्हें भेजता हूँ, जाकर सुनो; सुनते ही तुम्हारा सारा संदेह मिट जायगा और रामचरणोंमें गहरा प्रेम जागेगा।
बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग।मोह गए बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग॥६१॥
सत्संगके बिना हरिकथा नहीं मिलती, कथाके बिना मोह नहीं भागता, और मोह गये बिना रामचरणोंमें दृढ़ प्रेम नहीं जगता।
मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा। किएँ जोग तप ग्यान बिरागा॥उत्तर दिसि सुंदर गिरि नीला। तहँ रह काकभुसुंडि सुसीला॥॥१॥
प्रेमके बिना केवल योग, तप, ज्ञान-वैराग्यसे रघुनाथ नहीं मिलते। उत्तर दिशामें एक सुंदर नीला पर्वत है, वहाँ परम सुशील काकभुशुण्डि रहते हैं।
राम भगति पथ परम प्रबीना। ग्यानी गुन गृह बहु कालीना॥राम कथा सो कहइ निरंतर। सादर सुनहिं बिबिध बिहंगबर॥॥२॥
वे रामभक्तिके मार्गमें अत्यंत निपुण, ज्ञानी, गुणोंके धाम और चिरायु हैं; वे निरंतर रामकथा कहते रहते हैं, जिसे अनेक श्रेष्ठ पक्षी आदरपूर्वक सुनते हैं।
जाइ सुनहु तहँ हरि गुन भूरी। होइहि मोह जनित दुख दूरी॥मैं जब तेहि सब कहा बुझाई। चलेउ हरषि मम पद सिरु नाई॥॥३॥
वहाँ जाकर हरिके अनगिनत गुण सुनो, मोहसे उपजा तुम्हारा दुःख दूर हो जायगा। जब मैंने उसे यह सब समझाकर कहा, तब वह मेरे चरणोंमें सिर नवाकर हर्षित होकर चल पड़ा।
ताते उमा न मैं समुझावा। रघुपति कृपाँ मरमु मैं पावा॥होइहि कीन्ह कबहुँ अभिमाना। सो खौवै चह कृपानिधाना॥॥४॥
हे उमा, मैंने उसे स्वयं इसलिये नहीं समझाया कि रघुनाथकी कृपासे मैं पहले ही उसका मर्म जान गया था। उसने शायद कभी कुछ अभिमान किया होगा, जिसे कृपानिधान मिटाना चाहते थे।
कछु तेहि ते पुनि मैं नहिं राखा। समुझइ खग खगही कै भाषा॥प्रभु माया बलवंत भवानी। जाहि न मोह कवन अस ग्यानी॥॥५॥
और कुछ इस कारण भी मैंने उसे अपने पास नहीं रखा कि पक्षी पक्षीकी ही भाषा समझते हैं। हे भवानी, प्रभुकी माया इतनी बलवती है कि ऐसा कौन ज्ञानी है जिसे वह मोहित न कर दे?
ग्यानी भगत सिरोमनि त्रिभुवनपति कर जान।ताहि मोह माया नर पावर करहिं गुमान॥६२(क)॥
ज्ञानियों और भक्तोंके शिरोमणि, त्रिभुवनपतिके वाहन गरुड़को भी माया मोहित कर गयी—फिर भी नीच मनुष्य मूर्खतावश घमंड करते ही रहते हैं।
सिव बिरंचि कहुँ मोहइ को है बपुरा आन।अस जियँ जानि भजहिं मुनि माया पति भगवान॥६२(ख)॥
यह माया शिव और ब्रह्माको भी मोहित कर लेती है, तो बेचारा और कौन है? यह जानकर ही मुनिजन उस मायाके स्वामी भगवानको भजते हैं।
गयउ गरुड़ जहँ बसइ भुसुंडा। मति अकुंठ हरि भगति अखंडा॥देखि सैल प्रसन्न मन भयऊ। माया मोह सोच सब गयऊ॥॥१॥
गरुड़ वहाँ पहुँचे जहाँ अखंड बुद्धि और अटूट हरिभक्तिवाले काकभुशुण्डि रहते थे; उस पर्वतको देखते ही उनका मन प्रसन्न हो गया और सारी माया, मोह, चिंता जाती रही।
करि तड़ाग मज्जन जलपाना। बट तर गयउ हृदयँ हरषाना॥बृद्ध बृद्ध बिहंग तहँ आए। सुने राम के चरित सुहाए॥॥२॥
सरोवरमें स्नान और जलपान कर वे प्रसन्न हृदयसे बरगदके नीचे गये; वहाँ पहले से ही अनेक वयोवृद्ध पक्षी रामके सुंदर चरित्र सुननेको एकत्र थे।
कथा अरंभ करै सोइ चाहा। तेही समय गयउ खगनाहा॥आवत देखि सकल खगराजा। हरषेउ बायस सहित समाजा॥॥३॥
भुशुण्डि कथा आरंभ ही करना चाहते थे कि उसी क्षण पक्षिराज गरुड़ वहाँ आ पहुँचे; उन्हें आते देख काकभुशुण्डिसहित सारा पक्षिसमाज हर्षसे भर उठा।
अति आदर खगपति कर कीन्हा। स्वागत पूछि सुआसन दीन्हा॥करि पूजा समेत अनुरागा। मधुर बचन तब बोलेउ कागा॥॥४॥
उन्होंने गरुड़का भरपूर आदर किया, कुशल पूछी और बैठनेको सुंदर आसन दिया; फिर प्रेमपूर्वक पूजा करके मधुर वाणीमें बोले—
नाथ कृतारथ भयउँ मैं तव दरसन खगराज।आयसु देहु सो करौं अब प्रभु आयहु केहि काज॥६३(क)॥
हे नाथ, हे पक्षिराज, आपके दर्शनसे मैं कृतार्थ हो गया; अब आज्ञा दीजिये, मैं वही करूँ। प्रभु, आप किस कार्यसे यहाँ पधारे हैं?
सदा कृतारथ रूप तुम्ह कह मृदु बचन खगेस।जेहि के अस्तुति सादर निज मुख कीन्हि महेस॥६३(ख)॥
गरुड़ने कोमल वाणीमें कहा—आप तो सदा ही कृतार्थ हैं, जिनकी बड़ाई स्वयं महादेवने अपने मुखसे आदरपूर्वक की है।
सुनहु तात जेहि कारन आयउँ। सो सब भयउ दरस तव पायउँ॥देखि परम पावन तव आश्रम। गयउ मोह संसय नाना भ्रम॥॥१॥
सुनिये तात, जिस कारण मैं आया था, वह तो आपके दर्शन पाते ही पूरा हो गया; आपका यह परम पावन आश्रम देखते ही मेरा मोह, संदेह और हर तरहका भ्रम मिट गया।
अब श्रीराम कथा अति पावनि। सदा सुखद दुख पुंज नसावनि॥सादर तात सुनावहु मोही। बार बार बिनवउँ प्रभु तोही॥॥२॥
अब हे तात, कृपया आदरसहित मुझे रामकी वह अत्यंत पावन, सदा सुखदायी और दुःखराशिको मिटानेवाली कथा सुनाइये—मैं बार-बार यही विनती करता हूँ।
सुनत गरुड़ के गिरा बिनीता। सरल सुप्रेम सुखद सुपुनीता॥भयउ तासु मन परम उछाहा। लाग कहै रघुपति गुन गाहा॥॥३॥
गरुड़की विनम्र, सरल, प्रेमसे भरी, सुखद और पवित्र वाणी सुनकर भुशुण्डिके मनमें अपार उत्साह जागा और वे रघुनाथके गुणोंकी कथा कहने लगे।
प्रथमहिं अति अनुराग भवानी। रामचरित सर कहेसि बखानी॥पुनि नारद कर मोह अपारा। कहेसि बहुरि रावन अवतारा॥॥४॥
हे भवानी, पहले उन्होंने बड़े प्रेमसे रामचरितमानस सरोवरका रूपक विस्तारसे कहा, फिर नारदके अपार मोहकी और फिर रावणके जन्मकी कथा कही।
प्रभु अवतार कथा पुनि गाई। तब सिसु चरित कहेसि मन लाई॥॥५॥
फिर प्रभुके अवतारकी कथा गायी, और तब मन लगाकर रामकी बाल-लीलाएँ सुनायीं।
बालचरित कहिं बिबिध बिधि मन महँ परम उछाह।रिषि आगवन कहेसि पुनि श्री रघुबीर बिबाह॥६४॥
मनमें उत्साह भरकर विविध बाल-लीलाएँ कहने के बाद उन्होंने विश्वामित्रके आगमन और रघुवीरके विवाहका वर्णन किया।
बहुरि राम अभिषेक प्रसंगा। पुनि नृप बचन राज रस भंगा॥पुरबासिन्ह कर बिरह बिषादा। कहेसि राम लछिमन संबादा॥॥१॥
फिर रामके राज्याभिषेकका प्रसंग, राजाके वचनसे उस उत्सवमें बाधा, नगरवासियोंका विरह-विषाद, और राम-लक्ष्मणका संवाद कहा।
बिपिन गवन केवट अनुरागा। सुरसरि उतरि निवास प्रयागा॥बालमीक प्रभु मिलन बखाना। चित्रकूट जिमि बसे भगवाना॥॥२॥
वनगमन, केवटका प्रेम, गंगा पार कर प्रयागमें निवास, वाल्मीकिसे मिलन, और जैसे भगवान चित्रकूटमें बसे, वह सब सुनाया।
सचिवागवन नगर नृप मरना। भरतागवन प्रेम बहु बरना॥करि नृप क्रिया संग पुरबासी। भरत गए जहँ प्रभु सुख रासी॥॥३॥
फिर सुमंत्रका नगर लौटना, राजाका देहांत, भरतका आगमन और उनके गहरे प्रेमका विस्तृत वर्णन किया; राजाकी अंत्येष्टि कर नगरवासियोंसहित भरत वहाँ गये जहाँ सुखराशि प्रभु थे।
पुनि रघुपति बहु बिधि समुझाए। लै पादुका अवधपुर आए॥भरत रहनि सुरपति सुत करनी। प्रभु अरु अत्रि भेंट पुनि बरनी॥॥४॥
फिर रघुनाथने उन्हें बहुत समझाया, जिससे वे खड़ाऊँ लेकर अयोध्या लौट आये—यह कहा; फिर भरतकी नंदिग्राम-वासकी रीति, इंद्रपुत्र जयंतकी नीचता, और प्रभु-अत्रि मिलन वर्णित किया।
कहि बिराध बध जेहि बिधि देह तजी सरभंग।बरनि सुतीछन प्रीति पुनि प्रभु अगस्ति सतसंग॥६५॥
विराधका वध और शरभंगका देहत्याग कहकर, फिर सुतीक्ष्णके प्रेमका वर्णन कर, प्रभु और अगस्त्यके सत्संगकी कथा कही।
कहि दंडक बन पावनताई। गीध मइत्री पुनि तेहिं गाई॥पुनि प्रभु पंचवटीं कृत बासा। भंजी सकल मुनिन्ह की त्रासा॥॥१॥
दंडकवनके पवित्र होनेकी कथा कहकर फिर गिद्ध जटायुसे मैत्रीका वर्णन किया; फिर प्रभुने पंचवटीमें कैसे निवास किया और सब मुनियोंका भय कैसे दूर किया, वह कहा।
पुनि लछिमन उपदेस अनूपा। सूपनखा जिमि कीन्हि कुरूपा॥खर दूषन बध बहुरि बखाना। जिमि सब मरमु दसानन जाना॥॥२॥
फिर लक्ष्मणको दिया अनुपम उपदेश और शूर्पणखाका कुरूप होना वर्णित किया; फिर खर-दूषणका वध और रावणने सब कैसे जाना, वह बखाना।
दसकंधर मारीच बतकहीं। जेहि बिधि भई सो सब तेहिं कही॥पुनि माया सीता कर हरना। श्रीरघुबीर बिरह कछु बरना॥॥३॥
रावण और मारीचकी बातचीत जैसी हुई, वैसी ही कही; फिर मायासीताका हरण और रघुवीरके विरहका कुछ वर्णन किया।
पुनि प्रभु गीध क्रिया जिमि कीन्ही। बधि कबंध सबरिहि गति दीन्ही॥बहुरि बिरह बरनत रघुबीरा। जेहि बिधि गए सरोबर तीरा॥॥४॥
फिर प्रभुने जटायुका अंतिम संस्कार कैसे किया, कबंधका वध कर शबरीको कैसी गति दी, और विरहमें रघुवीर जैसे पंपासरोवरके तट गये, वह सब कहा।
प्रभु नारद संबाद कहि मारुति मिलन प्रसंग।पुनि सुग्रीव मिताई बालि प्रान कर भंग।। 66(॥६६(क)॥
प्रभु और नारदका संवाद और हनुमानसे भेंटका प्रसंग कहकर फिर सुग्रीवसे मित्रता और बालिके प्राणांतका वर्णन किया।
कपिहि तिलक करि प्रभु कृत सैल प्रबरषन बास।बरनन बर्षा सरद अरु राम रोष कपि त्रास॥६६(ख)॥
सुग्रीवका राजतिलक कर प्रभुका प्रवर्षण पर्वतपर निवास, वर्षा-शरदका वर्णन, रामका सुग्रीवपर रोष और सुग्रीवका भय—ये सब प्रसंग कहे।
जेहि बिधि कपिपति कीस पठाए। सीता खोज सकल दिसि धाए॥बिबर प्रबेस कीन्ह जेहि भाँती। कपिन्ह बहोरि मिला संपाती॥॥१॥
सुग्रीवने जैसे वानरोंको भेजा और वे सीताकी खोजमें सब दिशाओंमें दौड़े, जैसे उन्होंने गुफामें प्रवेश किया और फिर संपाती मिला, वह कथा कही।
सुनि सब कथा समीरकुमारा। नाघत भयउ पयोधि अपारा॥लंकाँ कपि प्रबेस जिमि कीन्हा। पुनि सीतहि धीरजु जिमि दीन्हा॥॥२॥
संपातीसे सब सुनकर हनुमान जैसे अपार समुद्र लाँघ गये, फिर जैसे लंकामें प्रवेश किया और सीताको धीरज दिया, वह सब कहा।
बन उजारि रावनहि प्रबोधी। पुर दहि नाघेउ बहुरि पयोधी॥आए कपि सब जहँ रघुराई। बैदेही कि कुसल सुनाई॥॥३॥
अशोकवन उजाड़कर, रावणको समझाकर, लंका जलाकर फिर जैसे समुद्र लाँघा और सब वानर रघुनाथके पास पहुँचकर जानकीकी कुशल सुनायी, वह सब वर्णित किया।
सेन समेति जथा रघुबीरा। उतरे जाइ बारिनिधि तीरा॥मिला बिभीषन जेहि बिधि आई। सागर निग्रह कथा सुनाई॥॥४॥
फिर सेनासहित रघुवीर समुद्रतटपर जा उतरे, विभीषण आकर मिले, और समुद्रको बाँधनेकी कथा भी सुनायी।
सेतु बाँधि कपि सेन जिमि उतरी सागर पार।गयउ बसीठी बीरबर जेहि बिधि बालिकुमार॥६७(क)॥
पुल बाँधकर जैसे वानरसेना समुद्र पार गयी और वीरश्रेष्ठ बालिपुत्र अंगद जैसे दूत बनकर गये, वह सब कहा।
निसिचर कीस लराई बरनिसि बिबिध प्रकार।कुंभकरन घननाद कर बल पौरुष संघार॥६७(ख)॥
फिर राक्षस-वानर युद्धका अनेक प्रकारसे वर्णन किया, और कुंभकर्ण-मेघनादके बल, पराक्रम और संहारकी कथा सुनायी।
निसिचर निकर मरन बिधि नाना। रघुपति रावन समर बखाना॥रावन बध मंदोदरि सोका। राज बिभीषन देव असोका॥॥१॥
उन्होंने राक्षससमूहके नाना प्रकारके वधका और रघुनाथ-रावणके युद्धका वर्णन किया; फिर रावणवध, मंदोदरीका शोक, विभीषणका राज्याभिषेक और देवताओंका शोकमुक्त होना कहा,
सीता रघुपति मिलन बहोरी। सुरन्ह कीन्ह अस्तुति कर जोरी॥पुनि पुष्पक चढ़ि कपिन्ह समेता। अवध चले प्रभु कृपा निकेता॥॥२॥
फिर सीता-रघुनाथका मिलन, देवताओंकी हाथ जोड़कर स्तुति, और फिर जैसे वानरोंसहित पुष्पकविमानपर चढ़कर कृपाधाम प्रभु अवधकी ओर चले, वह सुनाया।
जेहि बिधि राम नगर निज आए। बायस बिसद चरित सब गाए॥कहेसि बहोरि राम अभिषैका। पुर बरनत नृपनीति अनेका॥॥३॥
राम जिस तरह अपने नगर आये, वे सब उज्ज्वल चरित्र भुशुण्डिने विस्तारसे गाये; फिर रामके राज्याभिषेककी और अयोध्याकी तथा अनेक राजनीतियोंकी कथा कही।
कथा समस्त भुसुंड बखानी। जो मैं तुम्ह सन कही भवानी॥सुनि सब राम कथा खगनाहा। कहत बचन मन परम उछाहा॥॥४॥
भुशुण्डिने वही सारी कथा कही जो, हे भवानी, मैंने तुम्हें सुनायी है। सारी रामकथा सुनकर पक्षिराज गरुड़का मन परम उत्साहसे भर गया और वे बोल उठे—
गयउ मोर संदेह सुनेउँ सकल रघुपति चरित।भयउ राम पद नेह तव प्रसाद बायस तिलक॥६८(क)॥
रघुनाथके सारे चरित्र सुनकर मेरा संदेह जाता रहा; हे काकशिरोमणि, आपकी कृपासे मुझे रामचरणोंमें प्रेम हो गया।
मोहि भयउ अति मोह प्रभु बंधन रन महुँ निरखि।चिदानंद संदोह राम बिकल कारन कवन॥६८(ख)॥
युद्धमें प्रभुका नागपाशसे बंधन देखकर मुझे बड़ा मोह हुआ था—सच्चिदानंदघन राम आखिर किस कारण व्याकुल हुए?
देखि चरित अति नर अनुसारी। भयउ हृदयँ मम संसय भारी॥सोइ भ्रम अब हित करि मैं माना। कीन्ह अनुग्रह कृपानिधाना॥॥१॥
बिलकुल मनुष्योंके-जैसा चरित्र देखकर मेरे हृदयमें भारी संदेह उठा था; अब मैं उस भ्रमको ही अपने हितकारी मानता हूँ—कृपानिधानने मुझपर यह बड़ा अनुग्रह किया।
जो अति आतप ब्याकुल होई। तरु छाया सुख जानइ सोई॥जौं नहिं होत मोह अति मोही। मिलतेउँ तात कवन बिधि तोही॥॥२॥
जो तेज धूपसे व्याकुल होता है, वही वृक्षकी छायाका सुख जानता है; तात, यदि मुझे इतना गहरा मोह न होता, तो मैं आपसे कैसे मिल पाता?
सुनतेउँ किमि हरि कथा सुहाई। अति बिचित्र बहु बिधि तुम्ह गाई॥निगमागम पुरान मत एहा। कहहिं सिद्ध मुनि नहिं संदेहा॥॥३॥
और कैसे सुनता यह अद्भुत, सुंदर हरिकथा जो आपने इतने रूपोंमें गायी? यही वेद-शास्त्र-पुराणोंका मत है, सिद्ध और मुनि भी यही कहते हैं, इसमें संदेह नहीं—
संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही। चितवहिं राम कृपा करि जेही॥राम कृपाँ तव दरसन भयऊ। तव प्रसाद सब संसय गयऊ॥॥४॥
—कि शुद्ध संत उसीको मिलते हैं जिसपर राम कृपाकर दृष्टि डालें। रामकी कृपासे मुझे आपके दर्शन हुए, और आपकी कृपासे मेरा सारा संदेह मिट गया।
सुनि बिहंगपति बानी सहित बिनय अनुराग।पुलक गात लोचन सजल मन हरषेउ अति काग॥६९(क)॥
पक्षिराज गरुड़की विनम्र, प्रेमभरी वाणी सुनकर काकभुशुण्डिका शरीर पुलकित हो उठा, नेत्रोंमें जल भर आया और मन अत्यंत हर्षसे भर गया।
श्रोता सुमति सुसील सुचि कथा रसिक हरि दास।पाइ उमा अति गोप्यमपि सज्जन करहिं प्रकास॥६९(ख)॥
हे उमा, सुंदर बुद्धि, सुशील स्वभाव, पवित्रता, कथाप्रेम और हरिभक्तिवाला श्रोता पाकर सज्जन अपने सबसे गुप्त रहस्य भी खोलकर रख देते हैं।
बोलेउ काकभसुंड बहोरी। नभग नाथ पर प्रीति न थोरी॥सब बिधि नाथ पूज्य तुम्ह मेरे। कृपापात्र रघुनायक केरे॥॥१॥
काकभुशुण्डिने फिर कहा—पक्षिराजपर उनका प्रेम कम न था—हे नाथ, आप सब तरहसे मेरे पूज्य हैं और रघुनाथकी कृपाके पात्र हैं।
तुम्हहि न संसय मोह न माया। मो पर नाथ कीन्ह तुम्ह दाया॥पठइ मोह मिस खगपति तोही। रघुपति दीन्हि बड़ाई मोही॥॥२॥
आपको न संदेह है, न मोह, न माया—नाथ, आपने तो मुझपर केवल दया की है। हे पक्षिराज, मोहका बहाना बनाकर रघुनाथने आपको यहाँ भेजकर मुझे ही बड़ाई दी है।
तुम्ह निज मोह कही खग साईं। सो नहिं कछु आचरज गोसाईं॥नारद भव बिरंचि सनकादी। जे मुनिनायक आतमबादी॥॥३॥
आपने अपना मोह बताया, यह कुछ आश्चर्यकी बात नहीं, हे स्वामी—क्योंकि नारद, शिव, ब्रह्मा और सनकादि जैसे आत्मज्ञानके मर्मज्ञ श्रेष्ठ मुनि भी—
मोह न अंध कीन्ह केहि केही। को जग काम नचाव न जेही॥तृस्नाँ केहि न कीन्ह बौराहा। केहि कर हृदय क्रोध नहिं दाहा॥॥४॥
—उनमें भी किसे मोहने अंधा नहीं किया? संसारमें ऐसा कौन है जिसे कामने न नचाया हो? तृष्णाने किसे पागल नहीं बनाया? क्रोधने किसका हृदय नहीं जलाया?
ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद गुन आगार।केहि कै लौभ बिडंबना कीन्हि न एहिं संसार॥७०(क)॥
इस संसारमें ऐसा कौन ज्ञानी, तपस्वी, शूरवीर, कवि, विद्वान या गुणवान है, जिसे लोभने कभी बदनाम न किया हो?
श्री मद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि।मृगलोचनि के नैन सर को अस लाग न जाहि॥७०(ख)॥
धनके मदने किसे टेढ़ा नहीं किया, सत्ताने किसे बहरा नहीं किया? ऐसा कौन है जिसे किसी सुंदरीके नेत्र-बाण कभी न लगे हों?
गुन कृत सन्यपात नहिं केही। कोउ न मान मद तजेउ निबेही॥जोबन ज्वर केहि नहिं बलकावा। ममता केहि कर जस न नसावा॥॥१॥
गुणोंके सन्निपातसे कौन बचा है? मान-मदने किसे नहीं छुआ? यौवनके ज्वरने किसे बेकाबू नहीं किया? ममताने किसका यश नष्ट नहीं किया?
मच्छर काहि कलंक न लावा। काहि न सोक समीर डोलावा॥चिंता साँपिनि को नहिं खाया। को जग जाहि न ब्यापी माया॥॥२॥
ईर्ष्याने किसपर दाग नहीं लगाया? शोककी आँधीने किसे नहीं हिलाया? चिंतारूपी सर्पिणीने किसे नहीं डँसा? संसारमें ऐसा कौन है जिसे माया न घेरे हो?
कीट मनोरथ दारु सरीरा। जेहि न लाग घुन को अस धीरा॥सुत बित लोक ईषना तीनी। केहि के मति इन्ह कृत न मलीनी॥॥३॥
मनोरथ कीड़ा है और शरीर लकड़ी—ऐसा कौन धैर्यवान है जिसे यह कीड़ा न लगा हो? पुत्र, धन और यशकी तीन प्रबल इच्छाओंने किसकी बुद्धिको मलिन नहीं किया?
यह सब माया कर परिवारा। प्रबल अमिति को बरनै पारा॥सिव चतुरानन जाहि डेराहीं। अपर जीव केहि लेखे माहीं॥॥४॥
यह सब मायाका ही विशाल, बलवान परिवार है, जिसका पूरा वर्णन कोई नहीं कर सकता; शिव और ब्रह्मा तक जिससे डरते हैं, तो साधारण जीवोंकी क्या गिनती?
ब्यापि रहेउ संसार महुँ माया कटक प्रचंड।सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाषंड॥७१(क)॥
मायाकी प्रचंड सेना पूरे संसारमें फैली है—काम-क्रोध-लोभ उसके सेनापति हैं, और दंभ, कपट, पाखंड उसके योद्धा।
सो दासी रघुबीर के समुझें मिथ्या सोपि।छूट न राम कृपा बिनु नाथ कहउँ पद रोपि॥७१(ख)॥
पर वह माया रघुवीरकी दासी है—समझ लेनेपर मिथ्या ही है, फिर भी रामकी कृपा बिना कभी नहीं छूटती। नाथ, यह मैं प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ।
जो माया सब जगहि नचावा। जासु चरित लखि काहुँ न पावा॥सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा। नाच नटी इव सहित समाजा॥॥१॥
जो माया सारे संसारको नचाती है और जिसकी करनी कोई पकड़ नहीं पाया, हे गरुड़, वही माया प्रभुकी भौंहके इशारेपर अपने पूरे परिवारसहित नर्तकीकी तरह नाचती है।
सोइ सच्चिदानंद घन रामा। अज बिग्यान रूप बल धामा॥ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता। अखिल अमोघसक्ति भगवंता॥॥२॥
वे राम स्वयं वही सच्चिदानंदघन हैं—अजन्मा, विज्ञानस्वरूप, रूप-बलके धाम, सर्वव्यापी और सर्वरूप, अखंड, अनंत, संपूर्ण, अमोघशक्ति भगवान।
अगुन अदभ्र गिरा गोतीता। सबदरसी अनवद्य अजीता॥निर्मम निराकार निरमोहा। नित्य निरंजन सुख संदोहा॥॥३॥
निर्गुण, महान, वाणी-इंद्रियोंसे परे, सर्वद्रष्टा, निर्दोष, अजेय, ममतारहित, निराकार, मोहरहित,
प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी। ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी॥इहाँ मोह कर कारन नाहीं। रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं॥॥४॥
नित्य, मायातीत, सुखराशि, प्रकृतिसे परे, सबके हृदयमें बसनेवाले, इच्छारहित, अविकारी, अविनाशी ब्रह्म हैं। यहाँ मोहका कोई कारण ही नहीं—क्या अंधकार कभी सूर्यके सामने टिक सकता है?
भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप।किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप॥७२(क)॥
भक्तोंके लिये भगवान रामने राजाका शरीर धारण किया और साधारण मनुष्योंकी तरह अनेकों परम पावन चरित्र किये।
जथा अनेक बेष धरि नृत्य करइ नट कोइ।सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ॥७२(ख)॥
जैसे कोई नट अनेक वेष धरकर नाचता है और हर वेषके अनुरूप भाव दिखाता है, पर स्वयं उनमेंसे कोई बनता नहीं,
असि रघुपति लीला उरगारी। दनुज बिमोहनि जन सुखकारी॥जे मति मलिन बिषयबस कामी। प्रभु पर मोह धरहिं इमि स्वामी॥॥१॥
—वैसी ही है रघुनाथकी यह लीला, हे गरुड़, जो राक्षसोंको मोहित करती और भक्तोंको सुख देती है। जो मलिनबुद्धि, विषयासक्त और कामी हैं, वे ही प्रभुपर ऐसा मोहका आरोप लगाते हैं।
नयन दोष जा कहँ जब होई। पीत बरन ससि कहुँ कह सोई॥जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा। सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा॥॥२॥
जिसे आँखका दोष हो, वह चंद्रमाको भी पीला कहता है; हे गरुड़, जिसे दिशाभ्रम हो, वह कहता है सूर्य पश्चिममें उगा।
नौकारूढ़ चलत जग देखा। अचल मोह बस आपुहि लेखा॥बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादीं। कहहिं परस्पर मिथ्याबादी॥॥३॥
नावपर चढ़ा मनुष्य संसारको चलता देखता है और मोहवश स्वयंको स्थिर मान बैठता है; बच्चे घूमते हैं, घर नहीं घूमता, पर वे आपसमें एक-दूसरेको झूठा कहते हैं।
हरि बिषइक अस मोह बिहंगा। सपनेहुँ नहिं अग्यान प्रसंगा॥मायाबस मतिमंद अभागी। हृदयँ जमनिका बहुबिधि लागी॥॥४॥
हरिके विषयमें मोहकी कल्पना भी ऐसी ही है, हे गरुड़—भगवानमें स्वप्रमें भी अज्ञानका कोई प्रसंग नहीं। पर जो मायाके वश, मंदबुद्धि और अभागे हैं, जिनके हृदयपर अनेक परदे पड़े हैं,
ते सठ हठ बस संसय करहीं। निज अग्यान राम पर धरहीं॥॥५॥
वे मूर्ख हठवश संदेह करते हैं और अपना ही अज्ञान रामपर मढ़ देते हैं।
काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूप।ते किमि जानहिं रघुपतिहि मूढ़ परे तम कूप॥७३(क)॥
जो काम-क्रोध-मद-लोभमें डूबे और दुःखरूपी घरमें आसक्त हैं, वे रघुनाथको कैसे जानें—वे मूर्ख तो अंधकाररूपी कुएँमें पड़े हैं।
निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ।सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ॥७३(ख)॥
निर्गुण रूप तो सहज ही समझमें आ जाता है, पर सगुण रूपको कोई नहीं जान पाता; इसीलिये सगुण भगवानके सुगम-अगम चरित्र सुनकर मुनियोंका भी मन भ्रमित हो जाता है।
सुनु खगेस रघुपति प्रभुताई। कहउँ जथामति कथा सुहाई॥जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही। सोउ सब कथा सुनावउँ तोही॥॥१॥
हे गरुड़, अब रघुनाथकी प्रभुता सुनिये, मैंने यह सुंदर कथा अपनी बुद्धिभर कही; अब मुझे जिस तरह मोह हुआ, वह सब कथा भी आपको सुनाता हूँ।
राम कृपा भाजन तुम्ह ताता। हरि गुन प्रीति मोहि सुखदाता॥ताते नहिं कछु तुम्हहिं दुरावउँ। परम रहस्य मनोहर गावउँ॥॥२॥
तात, आप रामके कृपापात्र हैं, हरिके गुणोंमें आपकी प्रीति है, इसीसे आप मुझे सुख देते हैं; इसीलिये मैं आपसे कुछ नहीं छिपाता, अत्यंत गोपनीय बात भी गाकर सुनाता हूँ।
सुनहु राम कर सहज सुभाऊ। जन अभिमान न राखहिं काऊ॥संसृत मूल सूलप्रद नाना। सकल सोक दायक अभिमाना॥॥३॥
सुनिये रामका सहज स्वभाव—वे भक्तमें कभी अभिमान नहीं टिकने देते, क्योंकि अभिमान ही संसार-बंधनका मूल है और हर तरहके दुःख-शोकको जन्म देता है।
ताते करहिं कृपानिधि दूरी। सेवक पर ममता अति भूरी॥जिमि सिसु तन ब्रन होइ गोसाई। मातु चिराव कठिन की नाईं॥॥४॥
इसीलिये कृपानिधि उसे दूर कर देते हैं, क्योंकि सेवकपर उनकी ममता अपार है। हे गोसाईं, जैसे बच्चेके शरीरमें फोड़ा होनेपर माता कठोर हृदय बनकर उसे चिरवा डालती है,
जदपि प्रथम दुख पावइ रोवइ बाल अधीर।ब्याधि नास हित जननी गनति न सो सिसु पीर॥७४(क)॥
यद्यपि बच्चा पहले दर्दसे रोता-तड़पता है, फिर भी माता रोगके नाशके लिये उस क्षणिक पीड़ाकी परवा नहीं करती।
तिमि रघुपति निज दासकर हरहिं मान हित लागि।तुलसिदास ऐसे प्रभुहि कस न भजहु भ्रम त्यागि॥७४(ख)॥
उसी तरह रघुनाथ अपने दासका अभिमान उसीके हितके लिये हर लेते हैं। तुलसीदास कहते हैं—ऐसे प्रभुको भ्रम त्यागकर क्यों न भजें?
राम कृपा आपनि जड़ताई। कहउँ खगेस सुनहु मन लाई॥जब जब राम मनुज तनु धरहीं। भक्त हेतु लीला बहु करहीं॥॥१॥
हे गरुड़, अब रामकी कृपा और अपनी मूर्खताकी बात मन लगाकर सुनिये—जब-जब राम मनुष्यशरीर धरते हैं और भक्तोंके लिये अनेक लीलाएँ करते हैं,
तब तब अवधपुरी मैं जाऊँ। बालचरित बिलोकि हरषाऊँ॥जन्म महोत्सव देखउँ जाई। बरष पाँच तहँ रहउँ लोभाई॥॥२॥
तब-तब मैं अयोध्या जाता हूँ और उनकी बाल-लीला देखकर हर्षित होता हूँ; जन्मोत्सव देखकर मैं वहाँ लुभाकर पाँच वर्षतक ठहर जाता हूँ।
इष्टदेव मम बालक रामा। सोभा बपुष कोटि सत कामा॥निज प्रभु बदन निहारि निहारी। लोचन सुफल करउँ उरगारी॥॥३॥
मेरे इष्टदेव वही बालक राम हैं, जिनके शरीरमें अरबों कामदेवोंकी शोभा है; हे गरुड़, अपने प्रभुका मुख बार-बार निहारकर मैं अपने नेत्र सफल करता हूँ।
लघु बायस बपु धरि हरि संगा। देखउँ बालचरित बहुरंगा॥॥४॥
छोटे कौएका रूप धरकर और हरिके साथ-साथ फिरकर मैं उनकी रंग-बिरंगी बाल-लीलाएँ देखता रहता हूँ।
लरिकाईं जहँ जहँ फिरहिं तहँ तहँ संग उड़ाउँ।जूठनि परइ अजिर महँ सो उठाइ करि खाउँ॥७५(क)॥
बचपनमें वे जहाँ-जहाँ घूमते हैं, वहाँ-वहाँ मैं भी साथ उड़ता हूँ, और आँगनमें गिरी उनकी जूठन उठाकर खा लेता हूँ।
एक बार अतिसय सब चरित किए रघुबीर।सुमिरत प्रभु लीला सोइ पुलकित भयउ सरीर॥७५(ख)॥
एक बार रघुवीरने सब लीलाएँ विशेष उमंगसे कीं; उस लीलाका स्मरण करते ही आज भी मेरा शरीर पुलकित हो उठता है।
कहइ भसुंड सुनहु खगनायक। रामचरित सेवक सुखदायक॥नृपमंदिर सुंदर सब भाँती। खचित कनक मनि नाना जाती॥॥१॥
भुशुण्डि कहने लगे—सुनिये पक्षिराज, रामका चरित्र सेवकोंको सुख देनेवाला है। राजमहल सब तरहसे सुंदर था, सोनेकी दीवारोंमें नाना प्रकारके रत्न जड़े थे।
बरनि न जाइ रुचिर अँगनाई। जहँ खेलहिं नित चारिउ भाई॥बालबिनोद करत रघुराई। बिचरत अजिर जननि सुखदाई॥॥२॥
उस सुंदर आँगनका वर्णन नहीं हो सकता, जहाँ चारों भाई नित्य खेलते हैं; माताको सुख देते हुए रघुनाथ बाल-विनोद करते हुए वहाँ विचरते हैं।
मरकत मृदुल कलेवर स्यामा। अंग अंग प्रति छबि बहु कामा॥नव राजीव अरुन मृदु चरना। पदज रुचिर नख ससि दुति हरना॥॥३॥
मरकतमणि-सा कोमल साँवला शरीर है, हर अंगमें अनगिनत कामदेवोंकी छटा; नव-लाल कमलसे कोमल लाल चरण, सुंदर अंगुलियाँ, नख चंद्रमाकी चमकको भी मात देते।
ललित अंक कुलिसादिक चारी। नूपुर चारु मधुर रवकारी॥चारु पुरट मनि रचित बनाई। कटि किंकिन कल मुखर सुहाई॥॥४॥
तलवोंमें वज्र आदि चार सुंदर चिह्न हैं, चरणोंमें मधुर बजते सुंदर नूपुर हैं; सोने-रत्नोंसे जड़ी कमरबंदकी मधुर झंकार सुहावनी लगती है।
रेखा त्रय सुंदर उदर नाभी रुचिर गँभीर।उर आयत भ्राजत बिबिध बाल बिभूषन चीर॥७६॥
पेटपर तीन सुंदर रेखाएँ हैं, नाभि सुंदर और गहरी है; चौड़े वक्षपर बालकोचित अनेक आभूषण और वस्त्र शोभा दे रहे हैं।
अरुन पानि नख करज मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर॥कंध बाल केहरि दर ग्रीवा। चारु चिबुक आनन छबि सींवा॥॥१॥
लाल हथेलियाँ, नख और अंगुलियाँ मन मोह लेती हैं, विशाल भुजाओंपर सुंदर आभूषण हैं; सिंहशावक-से कंधे, शंख-सी ग्रीवा, सुंदर ठुड्डी और मुख तो सौंदर्यकी सीमा ही है।
कलबल बचन अधर अरुनारे। दुइ दुइ दसन बिसद बर बारे॥ललित कपोल मनोहर नासा। सकल सुखद ससि कर सम हासा॥॥२॥
तोतली बोली, लाल-लाल ओंठ, ऊपर-नीचे दो-दो उजली, सुंदर, नन्ही दंतुलियाँ; सुंदर गाल, मनोहर नासिका और चंद्रकिरणों-सी सुखद मुसकान।
नील कंज लोचन भव मोचन। भ्राजत भाल तिलक गोरोचन॥बिकट भृकुटि सम श्रवन सुहाए। कुंचित कच मेचक छबि छाए॥॥३॥
नीले कमल-से नेत्र जन्म-मृत्युसे मुक्त करनेवाले हैं, ललाटपर गोरोचनका तिलक शोभित है; टेढ़ी भौंहें, सुडौल कान और घुँघराले काले केश—सब मिलकर अनुपम छटा बिखेरते हैं।
पीत झीनि झगुली तन सोही। किलकनि चितवनि भावति मोही॥रूप रासि नृप अजिर बिहारी। नाचहिं निज प्रतिबिंब निहारी॥॥४॥
पीली महीन झँगुली शरीरपर सुशोभित है, उनकी किलकारी और चितवन मुझे बहुत प्रिय लगती है; रूपराशि राम राजा दशरथके आँगनमें विचरते हुए अपनी परछाईं देखकर नाचने लगते हैं,
मोहि सन करहीं बिबिध बिधि क्रीड़ा। बरनत मोहि होति अति ब्रीड़ा॥किलकत मोहि धरन जब धावहिं। चलउँ भागि तब पूप देखावहिं॥॥५॥
और मुझसे तरह-तरहके खेल करते हैं, जिनका वर्णन करते मुझे लाज आती है! किलकारी भरकर जब वे मुझे पकड़नेको दौड़ते और मैं भाग जाता, तो मुझे पूआ दिखाकर लुभाते।
आवत निकट हँसहिं प्रभु भाजत रुदन कराहिं।जाउँ समीप गहन पद फिरि फिरि चितइ पराहिं॥७७(क)॥
मेरे पास आते ही प्रभु हँसते, भागते ही रोने लगते; और जब मैं उनके चरण छूनेको पास जाता, तो वे बार-बार पीछे मुड़कर देखते हुए भाग जाते।
प्राकृत सिसु इव लीला देखि भयउ मोहि मोह।कवन चरित्र करत प्रभु चिदानंद संदोह॥७७(ख)॥
साधारण बच्चोंकी-सी यह लीला देखकर मुझे मोह हुआ—सच्चिदानंदघन प्रभु आखिर यह कैसा चरित्र कर रहे हैं?
एतना मन आनत खगराया। रघुपति प्रेरित ब्यापी माया॥सो माया न दुखद मोहि काहीं। आन जीव इव संसृत नाहीं॥॥१॥
मनमें इतनी शंका आते ही, हे पक्षिराज, रघुनाथकी ही प्रेरित माया मुझपर छा गयी; पर वह माया न मुझे दुःख देनेवाली हुई, न दूसरे जीवोंकी भाँति संसारमें फँसानेवाली।
नाथ इहाँ कछु कारन आना। सुनहु सो सावधान हरिजाना॥ग्यान अखंड एक सीताबर। माया बस्य जीव सचराचर॥॥२॥
नाथ, इसका कुछ और ही कारण है, हे हरिवाहन, ध्यानसे सुनिये—केवल सीतापति राम ही अखंड ज्ञानस्वरूप हैं, बाकी सभी जड़-चेतन जीव मायाके वशमें हैं।
जौं सब कें रह ग्यान एकरस। ईस्वर जीवहि भेद कहहु कस॥माया बस्य जीव अभिमानी। ईस बस्य माया गुनखानी॥॥३॥
यदि सबको एकरस ज्ञान बना रहे, तो फिर ईश्वर और जीवमें भेद ही कैसा? अभिमानी जीव मायाके वश है, और तीनों गुणोंकी खान वह माया स्वयं ईश्वरके वशमें है।
परबस जीव स्वबस भगवंता। जीव अनेक एक श्रीकंता॥मुधा भेद जद्यपि कृत माया। बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया॥॥४॥
जीव परतंत्र है, भगवान स्वतंत्र; जीव अनेक हैं, लक्ष्मीपति एक। यद्यपि मायाकृत यह भेद असत् है, फिर भी हरिभजनके बिना करोड़ों उपायोंसे भी नहीं मिटता।
रामचंद्र के भजन बिनु जो चह पद निर्बान।ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिषान॥७८(क)॥
रामके भजन बिना जो मोक्षपद चाहता है, वह चाहे कितना ही ज्ञानी क्यों न हो, बिना पूँछ-सींगके पशु ही है।
राकापति षोड़स उअहिं तारागन समुदाइ।सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ॥७८(ख)॥
सोलहों कलाओंसे पूर्ण चंद्रमा तारागणसहित उदय हो जाय और सारे पर्वतोंमें दावाग्नि लगा दी जाय, तब भी सूर्यके उदय बिना रात्रि नहीं टलती।
ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा। मिटइ न जीवन्ह केर कलेसा॥हरि सेवकहि न ब्याप अबिद्या। प्रभु प्रेरित ब्यापइ तेहि बिद्या॥॥१॥
उसी तरह, हे पक्षिराज, हरिभजन बिना जीवोंका क्लेश नहीं मिटता। हरिके सेवकको अविद्या नहीं छूती, उसे तो प्रभुकी ही प्रेरित विद्या घेरे रहती है।
ताते नास न होइ दास कर। भेद भगति भाढ़इ बिहंगबर॥भ्रम ते चकित राम मोहि देखा। बिहँसे सो सुनु चरित बिसेषा॥॥२॥
इसीलिये दासका कभी नाश नहीं होता, हे पक्षिश्रेष्ठ, और भेद-भक्ति बढ़ती ही जाती है। रामने जब मुझे भ्रमसे चकित देखा तो हँस दिये—अब वह विशेष चरित्र सुनिये।
तेहि कौतुक कर मरमु न काहूँ। जाना अनुज न मातु पिताहूँ॥जानु पानि धाए मोहि धरना। स्यामल गात अरुन कर चरना॥॥३॥
उस खेलका भेद न छोटे भाइयोंने जाना, न माता-पिताने। साँवले शरीरवाले, लाल हथेली-चरणोंवाले बालक राम घुटनों-हाथोंके बल मुझे पकड़ने दौड़े।
तब मैं भागि चलेउँ उरगामी। राम गहन कहँ भुजा पसारी॥जिमि जिमि दूरि उड़ाउँ अकासा। तहँ भुज हरि देखउँ निज पासा॥॥४॥
तब मैं भाग चला, हे सर्पशत्रु गरुड़; रामने मुझे पकड़नेको भुजा फैलायी। मैं जितना ही आकाशमें दूर उड़ता, उतनी ही हरिकी वह भुजा मुझे अपने पास दिखती।
ब्रह्मलोक लगि गयउँ मैं चितयउँ पाछ उड़ात।जुग अंगुल कर बीच सब राम भुजहि मोहि तात॥७९(क)॥
मैं ब्रह्मलोकतक जा पहुँचा, और उड़ते-उड़ते पीछे देखा तो, हे तात, रामकी भुजा और मेरे बीच बस दो अंगुल ही अंतर रह गया था।
सप्ताबरन भेद करि जहाँ लगें गति मोरि।गयउँ तहाँ प्रभु भुज निरखि ब्याकुल भय बहोरि॥७९(ख)॥
सातों आवरणोंको भेदकर जहाँतक मेरी गति थी, वहाँतक गया; पर वहाँ भी प्रभुकी भुजाको अपने पीछे देखकर मैं फिर व्याकुल हो उठा।
मूदेउँ नयन त्रसित जब भयउँ। पुनि चितवत कोसलपुर गयऊँ॥मोहि बिलोकि राम मुसुकाहीं। बिहँसत तुरत गयउँ मुख माहीं॥॥१॥
डरकर जब मैंने आँखें मूँद लीं, फिर खोलकर देखा तो अवधपुरीमें पहुँच चुका था। मुझे देखकर राम मुसकरा दिये, और हँसते ही मैं सीधा उनके मुखमें चला गया।
उदर माझ सुनु अंडज राया। देखेउँ बहु ब्रह्मांड निकाया॥अति बिचित्र तहँ लोक अनेका। रचना अधिक एक ते एका॥॥२॥
उनके पेटके भीतर, हे पक्षिराज, मैंने अनगिनत ब्रह्मांडोंके समूह देखे; वहाँ विचित्र-से-विचित्र अनेक लोक थे, हर एककी रचना दूसरेसे भी बढ़कर।
कोटिन्ह _ चतुरानन गौरीसा। अगनित उडगन रबि रजनीसा॥अगनित लोकपाल जम काला। अगनित भूधर भूमि बिसाला॥॥३॥
करोड़ों ब्रह्मा-शिव, अनगिनत तारे, सूर्य-चंद्र, अनगिनत लोकपाल, यम और काल, अनगिनत विशाल पर्वत और भूमि,
सागर सरि सर बिपिन अपारा। नाना भाँति सृष्टि बिस्तारा॥सुर मुनि सिद्ध नाग नर किंनर। चारि प्रकार जीव सचराचर॥॥४॥
अपार समुद्र, नदी, तालाब, वन और नाना प्रकारकी सृष्टिका विस्तार; देव, मुनि, सिद्ध, नाग, मनुष्य, किन्नर और चारों तरहके जड़-चेतन जीव—सब मैंने वहाँ देखे।
जो नहिं देखा नहिं सुना जो मनहूँ न समाइ।सो सब अद्भुत देखेउँ बरनि कवनि बिधि जाइ॥८०(क)॥
जो कभी न देखा, न सुना, न मनमें भी समा सकता था, वह सब अद्भुत मैंने वहाँ देखा—अब उसका वर्णन कैसे हो?
एक एक ब्रह्मांड महुँ रहउँ बरष सत एक।एहि बिधि देखत फिरउँ मैं अंड कटाह अनेक॥८०(ख)॥
मैं हर एक ब्रह्मांडमें सौ-सौ वर्ष रहता, इस तरह घूमते-घूमते अनगिनत ब्रह्मांड मैंने देख डाले।
लोक लोक प्रति भिन्न बिधाता। भिन्न बिष्नु सिव मनु दिसित्राता॥नर गंधर्ब भूत बेताला। किंनर निसिचर पसु खग ब्याला॥॥१॥
हर लोकमें अलग ब्रह्मा, अलग विष्णु, शिव, मनु और दिक्पाल थे; अलग मनुष्य, गंधर्व, भूत, वैताल, किन्नर, राक्षस, पशु-पक्षी, सर्प,
देव दनुज गन नाना जाती। सकल जीव तहँ आनहि भाँती॥महि सरि सागर सर गिरि नाना। सब प्रपंच तहँ आनइ आना॥॥२॥
अलग जाति-जातिके देव-दानव—हर जगह सब जीव भिन्न ही थे; अनेक पृथ्वी, नदी, समुद्र, तालाब, पर्वत—सारी सृष्टि हर जगह अलग-ही-अलग थी।
अंडकोस प्रति प्रति निज रुपा। देखेउँ जिनस अनेक अनूपा॥अवधपुरी प्रति भुवन निनारी। सरजू भिन्न भिन्न नर नारी॥॥३॥
हर ब्रह्मांडमें मैंने अपना ही रूप और अनेकों अनुपम वस्तुएँ देखीं; हर भुवनमें न्यारी अवधपुरी, न्यारी सरयू और न्यारे ही नर-नारी थे।
दसरथ कौसल्या सुनु ताता। बिबिध रूप भरतादिक भ्राता॥प्रति ब्रह्मांड राम अवतारा। देखउँ बालबिनोद अपारा॥॥४॥
सुनिये तात, दशरथ, कौसल्या और भरत आदि भाई भी हर जगह अलग-अलग रूपोंके थे; हर ब्रह्मांडमें मैं रामावतार और उनकी अपार बाल-लीलाएँ देखता फिरता था।
भिन्न भिन्न मै दीख सबु अति बिचित्र हरिजान।अगनित भुवन फिरेउँ प्रभु राम न देखेउँ आन॥८१(क)॥
हे हरिवाहन, मैंने सब कुछ भिन्न और अत्यंत विचित्र देखा; अनगिनत भुवनोंमें घूमकर भी प्रभु रामको मैंने कहीं भिन्न नहीं देखा।
सोइ सिसुपन सोइ सोभा सोइ कृपाल रघुबीर।भुवन भुवन देखत फिरउँ प्रेरित मोह समीर॥८१(ख)॥
हर जगह वही बालपन, वही शोभा, वही कृपालु रघुवीर! इस तरह मोहरूपी पवनकी प्रेरणासे मैं भुवन-भुवनमें भटकता फिरता रहा।
भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका। बीते मनहुँ कल्प सत एका॥फिरत फिरत निज आश्रम आयउँ। तहँ पुनि रहि कछु काल गवाँयउँ॥॥१॥
अनेक ब्रह्मांडोंमें भटकते-भटकते मानो सौ कल्प बीत गये; घूमते-घूमते अंततः मैं अपने आश्रम लौटा और वहाँ कुछ समय बिताया।
निज प्रभु जन्म अवध सुनि पायउँ। निर्भर प्रेम हरषि उठि धायउँ॥देखउँ जन्म महोत्सव जाई। जेहि बिधि प्रथम कहा मैं गाई॥॥२॥
जब मैंने सुना कि मेरे प्रभुका अवधमें जन्म हुआ है, तो प्रेमसे भरकर हर्षित हो दौड़ पड़ा; जाकर जन्मोत्सव देखा, ठीक जैसा पहले वर्णन कर चुका हूँ।
राम उदर देखेउँ जग नाना। देखत बनइ न जाइ बखाना॥तहँ पुनि देखेउँ राम सुजाना। माया पति कृपाल भगवाना॥॥३॥
रामके उदरमें मैंने फिर वही अनगिनत जगत देखे, जो वर्णनसे परे थे; वहाँ फिर मैंने सुजान, मायाके स्वामी, कृपालु भगवानको देखा।
करउँ बिचार बहोरि बहोरी। मोह कलिल ब्यापित मति मोरी॥उभय घरी महँ मैं सब देखा। भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा॥॥४॥
मैं बार-बार विचार करने लगा, मेरी बुद्धि मोहके कीचड़में डूबी थी; यह सब मैंने बस दो घड़ीमें देख लिया था, फिर भी मन अत्यंत भ्रमित होकर थक गया।
देखि कृपाल बिकल मोहि बिहँसे तब रघुबीर।बिहँसतहीं मुख बाहेर आयउँ सुनु मतिधीर॥८२(क)॥
मुझे व्याकुल देखकर कृपालु रघुवीर हँस दिये; हे धीरबुद्धि गरुड़, सुनिये, उनके हँसते ही मैं तुरंत मुखसे बाहर आ गया।
सोइ लरिकाई मो सन करन लगे पुनि राम।कोटि भाँति समुझावउँ मनु न लहइ बिश्राम॥८२(ख)॥
राम फिर मेरे साथ वही बालसुलभ खेल करने लगे; मैं करोड़ों तरहसे अपने मनको समझाता, पर उसे कहीं शांति नहीं मिलती थी।
देखि चरित यह सो प्रभुताई। समुझत देह दसा बिसराई॥धरनि परेउ मुख आव न बाता। त्राहि त्राहि आरत जन त्राता॥॥१॥
यह लीला देखकर और वह भीतर देखी हुई प्रभुता याद कर मैं देहकी सुध भूल गया; 'त्राहि त्राहि, हे आर्तजनोंके रक्षक' पुकारता हुआ धरतीपर गिर पड़ा, मुँहसे बोल न फूटता था।
प्रेमाकुल प्रभु मोहि बिलोकी। निज माया प्रभुता तब रोकी॥कर सरोज प्रभु मम सिर धरेऊ। दीनदयाल सकल दुख हरेऊ॥॥२॥
मुझे प्रेमविह्वल देख प्रभुने अपनी मायाकी शक्तिको रोक लिया; अपना करकमल मेरे सिरपर रखा, और उस दीनदयालुने मेरा सारा दुःख हर लिया।
कीन्ह राम मोहि बिगत बिमोहा। सेवक सुखद कृपा संदोहा॥प्रभुता प्रथम बिचारि बिचारी। मन महँ होइ हरष अति भारी॥॥३॥
सेवकोंको सुख देनेवाले, कृपासागर रामने मुझे मोहसे पूरी तरह मुक्त कर दिया; उस पहलेवाली प्रभुताको याद कर-करके मेरे मनमें अपार हर्ष हुआ।
भगत बछलता प्रभु के देखी। उपजी मम उर प्रीति बिसेषी॥सजल नयन पुलकित कर जोरी। कीन्हिउँ बहु बिधि बिनय बहोरी॥॥४॥
प्रभुकी भक्तवत्सलता देखकर मेरे हृदयमें विशेष प्रेम उमड़ आया; नेत्र भरकर, पुलकित होकर, हाथ जोड़कर मैंने फिर बहुत तरहसे विनती की।
सुनि सप्रेम मम बानी देखि दीन निज दास।बचन सुखद गंभीर मृदु बोले रमानिवास॥८३(क)॥
मेरी प्रेमभरी वाणी सुनकर और अपने दासको दीन देखकर रमानिवास राम सुखद, गंभीर, कोमल वचन बोले—
काकभसुंडि मागु बर अति प्रसन्न मोहि जानि।अनिमादिक सिधि अपर रिधि मोच्छ सकल सुख खानि॥८३(ख)॥
हे काकभुशुण्डि, मुझे अत्यंत प्रसन्न जानकर वर माँग—अणिमा आदि सिद्धियाँ, अन्य ऋद्धियाँ और सब सुखोंकी खान मोक्ष,
ग्यान बिबेक बिरति बिग्याना। मुनि दुर्लभ गुन जे जग नाना॥आजु देउँ सब संसय नाहीं। मागु जो तोहि भाव मन माहीं॥॥१॥
ज्ञान, विवेक, वैराग्य, विज्ञान और वे सब गुण जो जगतमें मुनियोंको भी दुर्लभ हैं—यह सब मैं आज तुझे दूँगा, इसमें संदेह मत कर; जो मन भाये सो माँग ले।
सुनि प्रभु बचन अधिक अनुरागेउँ। मन अनुमान करन तब लागेऊँ॥प्रभु कह देन सकल सुख सही। भगति आपनी देन न कही॥॥२॥
प्रभुके वचन सुनकर मेरा प्रेम और बढ़ गया, पर मन ही मन सोचने लगा—प्रभुने सब सुख देनेकी बात कही सही, पर अपनी भक्ति देनेकी बात तो नहीं कही।
भगति हीन गुन सब सुख ऐसे। लवन बिना बहु बिंजन जैसे॥भजन हीन सुख कवने काजा। अस बिचारि बोलेउ खगराजा॥॥३॥
भक्तिरहित सब गुण और सुख वैसे ही हैं जैसे नमकके बिना अनेक व्यंजन; भजनरहित सुख किस कामका? ऐसा सोचकर मैं, पक्षिराज, बोल उठा—
जौं प्रभु होइ प्रसन्न बर देहू। मो पर करहु कृपा अरु नेहू॥मन भावत बर मागउँ स्वामी। तुम्ह उदार उर अंतरजामी॥॥४॥
यदि प्रभु आप प्रसन्न होकर वर दें और मुझपर कृपा-स्नेह करें, तो हे स्वामी, मैं अपने मनचाहा वर ही माँगता हूँ—आप उदार हैं और हृदयकी हर बात जाननेवाले हैं।
अबिरल भगति बिसुध्द तव श्रुति पुरान जो गाव।जेहि खोजत जोगीस मुनि प्रभु प्रसाद कोउ पाव॥८४(क)॥
आपकी वह अविरल, विशुद्ध भक्ति जिसे वेद-पुराण गाते हैं, जिसे योगीश्वर मुनि खोजते फिरते हैं, और जिसे आपकी कृपासे कोई विरला ही पाता है—
भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपा सिंधु सुख धाम।सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम॥८४(ख)॥
हे भक्तोंके कल्पवृक्ष, शरणागतके हितकारी, कृपासागर, सुखधाम राम! दया करके मुझे अपनी वही भक्ति प्रदान कीजिये।
एवमस्तु कहि रघुकुलनायक। बोले बचन परम सुखदायक॥सुनु बायस तें सहज सयाना। काहे न मागसि अस बरदाना॥॥१॥
'एवमस्तु' कहकर रघुकुलनाथ परम सुखदायी वचन बोले—सुन काक, तू स्वभावसे ही बुद्धिमान है, ऐसा वरदान न माँगे तो भला और क्या माँगे?
सब सुख खानि भगति तैं मागी। नहिं जग कोउ तोहि सम बड़भागी॥जो मुनि कोटि जतन नहिं लहहीं। जे जप जोग अनल तन दहहीं॥॥२॥
तूने सब सुखोंकी खान भक्ति माँग ली, संसारमें तेरे समान भाग्यशाली कोई नहीं। जिस भक्तिको मुनि करोड़ों जप-योगकी अग्निमें शरीर तपाकर भी नहीं पाते,
रीझेउँ देखि तोरि चतुराई। मागेहु भगति मोहि अति भाई॥सुनु बिहंग प्रसाद अब मोरें। सब सुभ गुन बसिहहिं उर तोरें॥॥३॥
वही तूने माँगी—तेरी यह चतुराई देखकर मैं रीझ गया, यह मुझे बहुत भायी। सुन पक्षी, अब मेरी कृपासे सब शुभ गुण तेरे हृदयमें बस जायेंगे।
भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। जोग चरित्र रहस्य बिभागा॥जानब तें सबही कर भेदा। मम प्रसाद नहिं साधन खेदा॥॥४॥
भक्ति, ज्ञान, विज्ञान, वैराग्य, योग, मेरी लीलाओंके रहस्य और भेद—यह सब तू मेरी ही कृपासे जान जायगा, तुझे साधनाका कोई कष्ट नहीं उठाना पड़ेगा।
माया संभव भ्रम सब अब न ब्यापिहहिं तोहि।जानेसु ब्रह्म अनादि अज अगुन गुनाकर मोहि॥८५(क)॥
मायासे उपजे सब भ्रम अब तुझपर नहीं छाएँगे; मुझे अनादि, अजन्मा, निर्गुण और गुणोंकी खान ब्रह्म ही जानना।
मोहि भगत प्रिय संतत अस बिचारि सुनु काग।कायँ बचन मन मम पद करेसु अचल अनुराग॥८५(ख)॥
सुन काक, जान ले कि मुझे भक्त सदा प्रिय होते हैं—यह विचारकर तन, वचन, मनसे मेरे चरणोंमें अटूट प्रेम बनाये रखना।
अब सुनु परम बिमल मम बानी। सत्य सुगम निगमादि बखानी॥निज सिद्धांत सुनावउँ तोही। सुनु मन धरु सब तजि भजु मोही॥॥१॥
अब सुन मेरी परम निर्मल वाणी, जो सत्य और सुगम है, वेदोंने भी जिसका वर्णन किया है; मैं तुझे अपना यह मूल सिद्धांत सुनाता हूँ—सुनकर हृदयमें धारण कर, सब त्यागकर मुझे ही भज।
मम माया संभव संसारा। जीव चराचर बिबिधि प्रकारा॥सब मम प्रिय सब मम उपजाए। सब ते अधिक मनुज मोहि भाए॥॥२॥
यह सारा संसार मेरी मायासे ही उपजा है, इसमें अनेक तरहके चराचर जीव हैं; वे सब मुझे प्रिय हैं क्योंकि सब मेरे ही रचे हैं, पर इन सबमें मनुष्य मुझे सबसे प्रिय लगते हैं।
तिन्ह महँ द्विज द्विज महँ श्रुतिधारी। तिन्ह महुँ निगम धरम अनुसारी॥तिन्ह महँ प्रिय बिरक्त पुनि ग्यानी। ग्यानिहु ते अति प्रिय बिग्यानी॥॥३॥
उनमें भी ब्राह्मण, ब्राह्मणोंमें भी वेदधारी, उनमें भी वेदोक्त धर्मपर चलनेवाले, और उनमें भी विरक्त मुझे प्रिय हैं; विरक्तोंमें ज्ञानी और ज्ञानियोंसे भी अधिक विज्ञानी प्रिय हैं।
तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा। जेहि गति मोरि न दूसरि आसा॥पुनि पुनि सत्य कहउँ तोहि पाहीं। मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं॥॥४॥
विज्ञानियोंसे भी बढ़कर मुझे अपना दास प्रिय है, जिसे मेरे सिवा कोई दूसरी आशा नहीं। मैं बार-बार सत्य कहता हूँ—मुझे अपने सेवकके समान प्रिय कोई नहीं है।
भगति हीन बिरंचि किन होई। सब जीवहु सम प्रिय मोहि सोई॥भगतिवंत अति नीचउ प्रानी। मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी॥॥५॥
भक्तिहीन तो चाहे ब्रह्मा ही क्यों न हो, वह मुझे बाकी सब जीवोंके समान ही प्रिय है; पर भक्तिवान तो अत्यंत नीच प्राणी भी मुझे प्राणोंके समान प्रिय है—यह मेरी घोषणा है।
सुचि सुसील सेवक सुमति प्रिय कहु काहि न लाग।श्रुति पुरान कह नीति असि सावधान सुनु काग॥८६॥
पवित्र, सुशील, सुबुद्धि सेवक भला किसे प्रिय नहीं लगता? वेद-पुराण भी यही नीति कहते हैं—सावधान होकर सुन, काक।
एक पिता के बिपुल कुमारा। होहिं पृथक गुन सील अचारा॥कोउ पंडित कोउ तापस ग्याता। कोउ धनवंत सूर कोउ दाता॥॥१॥
एक ही पिताके अनेक पुत्र भिन्न-भिन्न गुण, स्वभाव और आचरणवाले होते हैं—कोई पंडित, कोई तपस्वी, कोई ज्ञानी, कोई धनी, कोई शूरवीर, कोई दानी,
कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई। सब पर पितहि प्रीति सम होई॥कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा। सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा॥॥२॥
कोई सर्वज्ञ, कोई धर्मपरायण—पर पिताका प्रेम सबपर समान रहता है। किन्तु इनमेंसे जो मन-वचन-कर्मसे केवल पिताका ही भक्त हो, स्वप्रमें भी और कोई धर्म न जाने,
सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना। जद्यपि सो सब भाँति अयाना॥एहि बिधि जीव चराचर जेते। त्रिजग देव नर असुर समेते॥॥३॥
वही पुत्र पिताको प्राणोंके समान प्रिय होता है, चाहे वह सब तरहसे अनजान ही क्यों न हो। इसी तरह पशु-पक्षी, देव, मनुष्य और असुरोंसहित जितने भी जड़-चेतन जीव हैं,
अखिल बिस्व यह मोर उपाया। सब पर मोहि बराबरि दाया॥तिन्ह महँ जो परिहरि मद माया। भजै मोहि मन बच अरु काया॥॥४॥
यह सारा विश्व मेरा ही रचा हुआ है, इसलिये सबपर मेरी दया समान है। पर इनमें से जो मद-माया त्यागकर मन-वचन-कायासे मुझे भजता है,
पुरुष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ।सर्ब भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ॥८७(क)॥
वह पुरुष हो, नपुंसक हो, स्त्री हो या कोई भी चर-अचर जीव—जो भी कपट त्यागकर सर्वभावसे मुझे भजता है, वही मुझे परम प्रिय है।
सत्य कहउँ खग तोहि सुचि सेवक मम प्रानप्रिय।अस बिचारि भजु मोहि परिहरि आस भरोस सब॥८७(ख)॥
हे पक्षी, मैं तुझसे सत्य कहता हूँ—मेरा पवित्र सेवक मुझे प्राणोंके समान प्रिय है। यह विचारकर सब आशा-भरोसा छोड़कर केवल मुझे ही भज।
कबहूँ काल न ब्यापिहि तोही। सुमिरेसु भजेसु निरंतर मोही॥प्रभु बचनामृत सुनि न अघाऊँ। तनु पुलकित मन अति हरषाऊँ॥॥१॥
काल तुझे कभी नहीं छू पायेगा—निरंतर मेरा स्मरण-भजन करते रहना। प्रभुके इस अमृतवचनको सुनते-सुनते मैं तृप्त ही नहीं हो पाता था, शरीर पुलकित और मन हर्षसे भरा था।
सो सुख जानइ मन अरु काना। नहिं रसना पहिं जाइ बखाना॥प्रभु सोभा सुख जानहिं नयना। कहि किमि सकहिं तिन्हहि नहिं बयना॥॥२॥
वह सुख तो केवल मन और कान ही जानते हैं, जीभसे उसे कहा नहीं जा सकता; प्रभुकी शोभाका सुख नेत्र जानते हैं, पर उनकी अपनी कोई वाणी नहीं, वे कैसे कहें?
बहु बिधि मोहि प्रबोधि सुख देई। लगे करन सिसु कौतुक तेई॥सजल नयन कछु मुख करि रूखा। चितइ मातु लागी अति भूखा॥॥३॥
मुझे बहुत तरहसे समझा-बुझाकर सुख देनेके बाद प्रभु फिर बाल-सुलभ खेलमें रम गये; आँखें भरकर, मुँह कुछ रूखा बनाकर उन्होंने माँकी ओर देखा—मानो कह रहे हों, बड़ी भूख लगी है।
देखि मातु आतुर उठि धाई। कहि मृदु बचन लिए उर लाई॥गोद राखि कराव पय पाना। रघुपति चरित ललित कर गाना॥॥४॥
यह देखते ही माता उठ दौड़ीं, कोमल वचन कहकर उन्हें छातीसे लगा लिया; गोदमें लेकर दूध पिलाने लगीं और साथ ही रघुनाथकी सुंदर लीलाएँ गुनगुनाने लगीं।
जेहि सुख लागि पुरारि असुभ बेष कृत सिव सुखद।अवधपुरी नर नारि तेहि सुख महुँ संतत मगन॥८८(क)॥
जिस सुखके लिये सबको सुख देनेवाले त्रिपुरारि शिवने अशुभ वेष धारण किया, उसी सुखमें अवधके नर-नारी निरंतर डूबे रहते थे।
सोइ सुख लवलेस जिन्ह बारक सपनेहुँ लहेउ।ते नहिं गनहिं खगेस ब्रह्मसुखहि सज्जन सुमति॥८८(ख)॥
उस सुखकी एक झलक जिन्हें स्वप्रमें भी एक बार मिल जाय, हे पक्षिराज, वे सुबुद्धि सज्जन फिर ब्रह्मसुखको भी कुछ नहीं गिनते।
मैं पुनि अवध रहेउँ कछु काला। देखेउँ बालबिनोद रसाला॥राम प्रसाद भगति बर पायउँ। प्रभु पद बंदि निजाश्रम आयउँ॥॥१॥
मैं कुछ और समय अवधमें रहा, रामकी रसीली बाल-लीलाएँ देखता रहा; रामकी कृपासे भक्तिका वरदान पाकर, फिर प्रभुके चरणोंकी वंदना कर अपने आश्रम लौट आया।
तब ते मोहि न ब्यापी माया। जब ते रघुनायक अपनाया॥यह सब गुप्त चरित मैं गावा। हरि मायाँ जिमि मोहि नचावा॥॥२॥
जबसे रघुनाथने मुझे अपनाया, तबसे माया मुझे कभी नहीं छू पायी। हरिकी माया मुझे कैसे नचाती थी, वह सब गुप्त वृत्तांत मैंने तुझे सुना दिया।
निज अनुभव अब कहउँ खगेसा। बिनु हरि भजन न जाहि कलेसा॥राम कृपा बिनु सुनु खगराई। जानि न जाइ राम प्रभुताई॥॥३॥
अब हे गरुड़, मैं अपना निजी अनुभव कहता हूँ—हरिभजन बिना दुःख नहीं मिटते। सुनो, रामकी कृपा बिना रामकी प्रभुता नहीं जानी जा सकती,
जानें बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती॥प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई। जिमि खगपति जल के चिकनाई॥॥४॥
प्रभुताको जाने बिना विश्वास नहीं जमता, विश्वासके बिना प्रेम नहीं होता, और प्रेमके बिना भक्ति दृढ़ नहीं होती—जैसे, हे पक्षिराज, जलमें तेल कभी टिकता नहीं।
बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु।गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु॥८९(क)॥
गुरुके बिना कहीं ज्ञान होता है? वैराग्यके बिना ज्ञान होता है? वेद-पुराण भी कहते हैं—हरिभक्तिके बिना सुख कहाँ मिलता है?
कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु।चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ॥८९(ख)॥
तात, सहज संतोषके बिना क्या कोई शांति पाता है? करोड़ों उपाय करके थक जाओ, पर क्या जल बिना नाव कभी चलती है?
बिनु संतोष न काम नसाहीं। काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं॥राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा। थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा॥॥१॥
संतोषके बिना कामना नहीं मिटती, और कामना रहते सुख स्वप्रमें भी नहीं मिलता। रामभजन बिना कामनाएँ कैसे मिटें? क्या भूमि बिना कहीं पेड़ उगता है?
बिनु बिग्यान कि समता आवइ। कोउ अवकास कि नभ बिनु पावइ॥श्रद्धा बिना धर्म नहिं होई। बिनु महि गंध कि पावइ कोई॥॥२॥
विज्ञानके बिना समता कैसे आये? क्या आकाश बिना कोई स्थान मिलता है? श्रद्धाके बिना धर्म नहीं होता, क्या पृथ्वीतत्त्व बिना गंध मिल सकती है?
बिनु तप तेज कि कर बिस्तारा। जल बिनु रस कि होइ संसारा॥सील कि मिल बिनु बुध सेवकाई। जिमि बिनु तेज न रूप गोसाई॥॥३॥
तपके बिना तेज कैसे फैले? जलतत्त्वके बिना संसारमें रस कहाँ? विद्वानोंकी सेवाके बिना शील कैसे मिले? जैसे अग्नितत्त्वके बिना रूप नहीं मिलता, गोसाईं,
निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा। परस कि होइ बिहीन समीरा॥कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा। बिनु हरि भजन न भव भय नासा॥॥४॥
आत्मसुखके बिना मन कैसे स्थिर हो? वायुतत्त्वके बिना स्पर्श कैसे हो? विश्वासके बिना कोई सिद्धि मिलती है? वैसे ही हरिभजन बिना जन्म-मृत्युका भय कभी नहीं मिटता।
बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु।राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु॥॥९०(क)॥
विश्वासके बिना भक्ति नहीं, भक्तिके बिना राम पिघलते नहीं, और रामकी कृपाके बिना जीव स्वप्रमें भी शांति नहीं पाता।
अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल।भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद॥॥९०(ख)॥
यह विचारकर, हे धीरबुद्धि, सब कुतर्क और संदेह त्यागकर करुणाके सागर, सुंदर और सुखदायक रघुवीर रामका भजन करो।
निज मति सरिस नाथ मैं गाई। प्रभु प्रताप महिमा खगराई॥कहेउँ न कछु करि जुगुति बिसेषी। यह सब मैं निज नयनन्हि देखी॥॥१॥
हे पक्षिराज, हे नाथ, मैंने अपनी बुद्धिभर प्रभुके प्रताप और महिमाका गान किया; कहीं कुछ बढ़ाकर नहीं कहा, यह सब मैंने अपनी आँखों देखा है।
महिमा नाम रूप गुन गाथा। सकल अमित अनंत रघुनाथा॥निज निज मति मुनि हरि गुन गावहिं। निगम सेष सिव पार न पावहिं॥॥२॥
रघुनाथकी महिमा, नाम, रूप और गुणोंकी कथा सब अपार और अनंत है, और वे स्वयं भी अनंत हैं; मुनि अपनी-अपनी बुद्धिसे हरिके गुण गाते हैं, पर वेद, शेष और शिव भी उनका पार नहीं पाते।
तुम्हहि आदि खग मसक प्रजंता। नभ उड़ाहिं नहिं पावहिं अंता॥तिमि रघुपति महिमा अवगाहा। तात कबहुँ कोउ पाव कि थाहा॥॥३॥
तुमसे लेकर मच्छरतक सब आकाशमें उड़ते हैं, पर आकाशका अंत कोई नहीं पाता; वैसे ही, तात, रघुनाथकी महिमा भी अथाह है—भला उसकी थाह कोई कभी पा सकता है?
रामु काम सत कोटि सुभग तन। दुर्गा कोटि अमित अरि मर्दन॥सक्र कोटि सत सरिस बिलासा। नभ सत कोटि अमित अवकासा॥॥४॥
रामका सुंदर शरीर करोड़ों कामदेवोंके समान है, वे अनगिनत दुर्गाओंके समान शत्रुनाशक हैं; उनका ऐश्वर्य अरबों इंद्रोंके समान और उनका विस्तार अरबों आकाशोंके समान असीम है।
मरुत कोटि सत बिपुल बल रबि सत कोटि प्रकास।ससि सत कोटि सुसीतल समन सकल भव त्रास॥९१(क)॥
उनका बल अरबों पवनोंके समान, उनकी आभा अरबों सूर्योंके समान, और उनकी शीतलता अरबों चंद्रमाओंके समान है, जो संसारके सारे भयको मिटा देती है।
काल कोटि सत सरिस अति दुस्तर दुर्ग दुरंत।धूमकेतु सत कोटि सम दुराधरष भगवंत॥९१(ख)॥
वे अरबों कालोंके समान दुर्गम, दुर्ग और दुर्निवार हैं; भगवान अरबों धूमकेतुओंके समान अत्यंत प्रबल और अजेय हैं।
प्रभु अगाध सत कोटि पताला। समन कोटि सत सरिस कराला॥तीरथ अमित कोटि सम पावन। नाम अखिल अघ पूग नसावन॥॥१॥
प्रभु अरबों पातालोंके समान अथाह हैं, अरबों यमोंके समान भयंकर; अनगिनत तीर्थोंके समान पवित्र करनेवाले हैं, और उनका नाम समस्त पापोंका नाश करता है।
हिमगिरि कोटि अचल रघुबीरा। सिंधु कोटि सत सम गंभीरा॥कामधेनु सत कोटि समाना। सकल काम दायक भगवाना॥॥२॥
रघुवीर करोड़ों हिमालयोंके समान अटल और अरबों समुद्रोंके समान गंभीर हैं; भगवान अरबों कामधेनुओंके समान सब इच्छाएँ पूरी करनेवाले हैं।
सारद कोटि अमित चतुराई। बिधि सत कोटि सृष्टि निपुनाई॥बिष्नु कोटि सम पालन कर्ता। रुद्र कोटि सत सम संहर्ता॥॥३॥
उनमें अनगिनत सरस्वतियोंकी चतुराई है, अरबों ब्रह्माओंकी सृष्टि-निपुणता है; वे करोड़ों विष्णुओंके समान पालनकर्ता और अरबों रुद्रोंके समान संहारकर्ता हैं।
धनद कोटि सत सम धनवाना। माया कोटि प्रपंच निधाना॥भार धरन सत कोटि अहीसा। निरवधि निरुपम प्रभु जगदीसा॥॥४॥
वे अरबों कुबेरोंके समान धनवान और करोड़ों मायाओंके भंडार हैं; भार वहनमें अरबों शेषोंके समान हैं—संक्षेपमें, जगदीश्वर प्रभु सीमारहित और उपमारहित हैं।
निरुपम न उपमा आन राम समान रामु निगम कहै।जिमि कोटि सत खद्योत सम रबि कहत अति लघुता लहै॥एहि भाँति निज निज मति बिलास मुनीस हरिहि बखानहीं।प्रभु भाव गाहक अति कृपाल सप्रेम सुनि सुख मानहीं॥
राम उपमारहित हैं, राम-जैसा दूसरा कोई नहीं—वेद यही कहते हैं। जैसे सूर्यको करोड़ों जुगनुओंके समान कहना उसकी महिमा घटाना ही है, वैसे ही मुनिजन अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार हरिका वर्णन करते हैं; पर अत्यंत कृपालु प्रभु तो बस भक्तोंके भावको ग्रहण करते हैं, और उस वर्णनको प्रेमसहित सुनकर प्रसन्न होते हैं।
रामु अमित गुन सागर थाह कि पावइ कोई।संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हहि सुनायउँ सोइ॥९२(क)॥
श्रीरामजी तो अनन्त गुणोंके अथाह सागर हैं, उनकी थाह भला कौन पा सकता है! संतोंसे मैंने जैसा कुछ उनके विषयमें सुना था, वही तुम्हें कह सुनाया।
भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन।तजि ममता मद मान भजिअ सदा सीता रवन॥९२(ख)॥
भगवान् सुखके अक्षय भण्डार और करुणाके धाम हैं, पर वे केवल प्रेमके ही वश होते हैं। इसलिये ममता, अभिमान और दम्भ त्यागकर सदा श्रीजानकीवल्लभका ही भजन करना चाहिये।
सुनि भुसुंडि के बचन सुहाए। हरषित खगपति पंख फुलाए॥नयन नीर मन अति हरषाना। श्रीरघुपति प्रताप उर आना॥॥१॥
भुशुण्डिजीके ये मधुर वचन सुनकर पक्षिराज गरुड़ हर्षसे पुलकित हो उठे, उनके पंख फूल गये। नेत्रोंमें प्रेमाश्रु भर आये और मनमें श्रीरघुनाथजीका प्रताप स्मरण होते ही अपार आनन्दकी लहर दौड़ गयी।
पाछिल मोह समुझि पछिताना। ब्रह्म अनादि मनुज करि माना॥पुनि पुनि काग चरन सिरु नावा। जानि राम सम प्रेम बढ़ावा॥॥२॥
गरुड़जीको अपना पूर्व मोह याद आया और वे पछताने लगे कि उन्होंने अनादि ब्रह्मको साधारण मनुष्य मान लिया था। उन्होंने बार-बार सिर झुकाकर काकभुशुण्डिजीके चरण छुए और उन्हें साक्षात् श्रीरामके समान जानकर उनके प्रति अपना प्रेम और बढ़ा लिया।
गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई॥संसय सर्प ग्रसेउ मोहि ताता। दुखद लहरि कुतर्क बहु ब्राता॥॥३॥
गुरुकी शरण लिये बिना कोई भी भवसागर पार नहीं कर सकता, चाहे वह ब्रह्मा या शिवके समान ही सामर्थ्यवान् क्यों न हो। गरुड़जी बोले—हे तात! मुझे सन्देहरूपी सर्पने ऐसा डस लिया था कि भाँति-भाँतिके कुतर्कोंकी दुःखदायी लहरें मेरे भीतर उठती रहती थीं।
तव सरूप गारुड़ि रघुनायक। मोहि जिआयउ जन सुखदायक॥तव प्रसाद मम मोह नसाना। राम रहस्य अनूपम जाना॥॥४॥
आपके ही स्वरूपरूपी गारुड़ी-मंत्रने, जो भक्तोंको सुख देनेवाला है, मुझ श्रीरघुनाथजीके सेवकको फिरसे जीवन दे दिया। आपकी कृपासे मेरा वह मोह मिट गया और मैंने श्रीरामके अनुपम रहस्यको पहचान लिया।
ताहि प्रसंसि बिबिध बिधि सीस नाइ कर जोरि।बचन बिनीत सप्रेम मृदु बोलेउ गरुड़ बहोरि॥९३(क)॥
इस प्रकार भुशुण्डिजीकी बारम्बार प्रशंसा करके, सिर झुकाकर और हाथ जोड़कर गरुड़जी फिर बड़े ही विनम्र और प्रेमभीने कोमल स्वरमें बोले।
प्रभु अपने अबिबेक ते बूझउँ स्वामी तोहि।कृपासिंधु सादर कहहु जानि दास निज मोहि॥९३(ख)॥
हे प्रभो, हे स्वामी! मैं अपनी नासमझीके कारण ही आपसे यह पूछ रहा हूँ। हे कृपासागर! मुझे अपना ही सेवक जानकर आदरपूर्वक मेरी जिज्ञासाका समाधान कीजिये।
तुम्ह सर्बग्य तन्य तम पारा। सुमति सुसील सरल आचारा॥ग्यान बिरति बिग्यान निवासा। रघुनायक के तुम्ह प्रिय दासा॥॥१॥
आप सर्वज्ञ हैं, तत्त्वके पूर्ण ज्ञाता हैं, माया-मोहसे परे हैं, उत्तम बुद्धि और सरल स्वभावके धनी हैं। ज्ञान, वैराग्य और विज्ञान आपमें साक्षात् बसते हैं, और आप स्वयं श्रीरघुनाथजीके परम प्रिय दास हैं।
कारन कवन देह यह पाई। तात सकल मोहि कहहु बुझाई॥राम चरित सर सुंदर स्वामी। पायहु कहाँ कहहु नभगामी॥॥२॥
फिर भी हे तात! यह बतलाइये कि आपने यह काकका शरीर किस कारणसे पाया। और हे आकाशगामी स्वामी! यह सुन्दर रामकथा आपने कहाँसे और कैसे प्राप्त की, वह भी मुझे सुनाइये।
नाथ सुना मैं अस सिव पाहीं। महा प्रलयहुँ नास तव नाहीं॥मुधा बचन नहिं ईस्वर कहई। सोऊ मोरें मन संसय अहई॥॥३॥
हे नाथ! मैंने स्वयं शिवजीसे यह सुना है कि महाप्रलयमें भी आपका नाश नहीं होता, और ईश्वर कभी झूठ नहीं बोलते—फिर भी मेरे मनमें एक सन्देह बना हुआ है।
अग जग जीव नाग नर देवा। नाथ सकल जगु काल कलेवा॥अंड कटाह अमित लय कारी। कालु सदा दुरतिक्रम भारी॥॥४॥
क्योंकि हे नाथ! समस्त चराचर जीव—नाग, मनुष्य, देवता—और यह सम्पूर्ण जगत् कालका ग्रास बन जाता है। असंख्य ब्रह्माण्डोंको लील जानेवाला वह काल सदा अत्यन्त प्रबल और अजेय माना जाता है।
तुम्हहि न ब्यापत काल अति कराल कारन कवन।मोहि सो कहहु कृपाल ग्यान प्रभाव कि जोग बल॥९४(क)॥
फिर वही अत्यन्त भयंकर काल आपपर कोई प्रभाव क्यों नहीं डालता? हे कृपालु! मुझे बतलाइये—क्या यह आपके ज्ञानका प्रताप है या योगबलका चमत्कार?
प्रभु तव आश्रम आएँ मोर मोह भ्रम भाग।कारन कवन सो नाथ सब कहहु सहित अनुराग॥९४(ख)॥
और हे प्रभो! एक और बात—आपके आश्रममें आते ही मेरा सारा मोह और भ्रम क्षणभरमें कैसे भाग गया? हे नाथ! यह सब भी प्रेमपूर्वक मुझे विस्तारसे समझाइये।
गरुड़ गिरा सुनि हरषेउ कागा। बोलेउ उमा परम अनुरागा॥धन्य धन्य तव मति उरगारी। प्रस्न तुम्हारि मोहि अति प्यारी॥॥१॥
हे उमा! गरुड़जीके ये वचन सुनकर काकभुशुण्डिजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और परम प्रेमसे बोले—हे सर्पशत्रु! तुम्हारी बुद्धि धन्य है, धन्य है! तुम्हारे ये प्रश्न मुझे बहुत ही भाये।
सुनि तव प्रस्न सप्रेम सुहाई। बहुत जनम के सुधि मोहि आई॥सब निज कथा कहउँ मैं गाई। तात सुनहु सादर मन लाई॥॥२॥
तुम्हारे इन प्रेमभरे सुन्दर प्रश्नोंको सुनकर मुझे अपने अनेकों पूर्वजन्मोंकी स्मृति ताज़ा हो आयी है। अब मैं अपनी सम्पूर्ण कथा विस्तारसे कहता हूँ, हे तात! तुम आदरपूर्वक मन लगाकर सुनो।
जप तप मख सम दम ब्रत दाना। बिरति बिबेक जोग बिग्याना॥सब कर फल रघुपति पद प्रेमा। तेहि बिनु कोउ न पावइ छेमा॥॥३॥
जप, तप, यज्ञ, संयम, व्रत, दान, वैराग्य, विवेक, योग और विज्ञान—इन सब साधनाओंका अन्तिम फल एक ही है: श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें सच्चा प्रेम जाग उठे। इसके बिना किसी भी साधनसे सच्चा कल्याण सम्भव नहीं।
एहि तन राम भगति मैं पाई। ताते मोहि ममता अधिकाई॥जेहि तें कछु निज स्वारथ होई। तेहि पर ममता कर सब कोई॥॥४॥
इसी शरीरसे मुझे श्रीरामकी भक्ति प्राप्त हुई, इसीलिये मुझे इस देहसे इतना अधिक स्नेह है। यह स्वाभाविक भी है—जिस वस्तुसे हमारा कोई सच्चा प्रयोजन सिद्ध होता है, उसीसे सबका मन बँध जाता है।
पन्नगारि असि नीति श्रुति संमत सज्जन कहहिं।अति नीचहु सन प्रीति करिअ जानि निज परम हित॥९५(क)॥
हे गरुड़! वेदोंने भी यही नीति मानी है और सज्जन भी यही कहते हैं कि अपने परम हितको समझकर अत्यन्त तुच्छ वस्तुसे भी प्रेम रखना चाहिये।
पाट कीट तें होइ तेहि तें पाटंबर रुचिर।कृमि पालइ सबु कोइ परम अपावन प्रान सम॥९५(ख)॥
देखो न, रेशमका सुन्दर वस्त्र आखिर एक तुच्छ कीड़ेसे ही तो बनता है, फिर भी उस अपावन कीड़ेको हर कोई अपने प्राणोंके समान सँभालकर पालता है।
स्वारथ साँच जीव कहुँ एहा। मन क्रम बचन राम पद नेहा॥सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा। जो तनु पाइ भजिअ रघुबीरा॥॥१॥
जीवका सच्चा स्वार्थ बस इतना ही है कि उसका मन, वचन और कर्म सदा श्रीरामके चरणोंमें रमा रहे। वही शरीर वास्तवमें पवित्र और सुन्दर है, जिसे पाकर श्रीरघुवीरका भजन किया जाय।
राम बिमुख लहि बिधि सम देही। कबि कोबिद न प्रसंसहिं तेही॥राम भगति एहिं तन उर जामी। ताते मोहि परम प्रिय स्वामी॥॥२॥
श्रीरामसे विमुख व्यक्ति चाहे ब्रह्माके समान भी दिव्य शरीर पा जाय, तो भी विद्वान् और कवि उसकी प्रशंसा नहीं करते। इसी काकशरीरमें मेरे हृदयमें रामभक्तिका अंकुर फूटा, इसीलिये हे स्वामी! यह देह मुझे अत्यन्त प्रिय है।
तजउँ न तन निज इच्छा मरना। तन बिनु बेद भजन नहिं बरना॥प्रथम मोहँ मोहि बहुत बिगोवा। राम बिमुख सुख कबहुँ न सोवा॥॥३॥
मैं इस शरीरको अपनी इच्छासे मरना होते हुए भी नहीं छोड़ता, क्योंकि शास्त्रोंने स्पष्ट कहा है कि देहके बिना भजन सम्भव ही नहीं। इससे पहले, मोहके वशीभूत होकर मेरी बड़ी दुर्गति हुई थी और श्रीरामसे विमुख रहकर मुझे कभी चैनकी नींद नहीं आयी।
नाना जनम कर्म पुनि नाना। किए जोग जप तप मख दाना॥कवन जोनि जनमेउँ जहँ नाहीं। मैं खगेस भ्रमि भ्रमि जग माहीं॥॥४॥
अनेकानेक जन्मोंमें मैंने भाँति-भाँतिके योग, जप, तप, यज्ञ और दान आदि साधन किये। हे गरुड़! ऐसी कोई योनि नहीं बची जिसमें मैंने बार-बार भटककर जन्म न लिया हो।
देखेउँ करि सब करम गोसाई। सुखी न भयउँ अबहिं की नाई॥सुधि मोहि नाथ जन्म बहु केरी। सिव प्रसाद मति मोहँ न घेरी॥॥५॥
हर तरहके कर्म करके देख लिये, पर जितना सुख अब इस जन्ममें मिला उतना पहले कभी नहीं मिला। हे नाथ! मुझे अपने अनेक पूर्वजन्मोंकी स्मृति बनी रहती है, क्योंकि शिवजीकी कृपासे मेरी बुद्धिको कभी मोहने घेर नहीं पाया।
प्रथम जन्म के चरित अब कहउँ सुनहु बिहगेस।सुनि प्रभु पद रति उपजइ जातें मिटहिं कलेस॥९६(क)॥
अब मैं अपने प्रथम जन्मकी कथा सुनाता हूँ, हे पक्षिराज! इसे सुनकर प्रभुके चरणोंमें ऐसी प्रीति उपजती है जिससे सारे क्लेश मिट जाते हैं।
पूरुब कल्प एक प्रभु जुग कलिजुग मल मूल।नर अरु नारि अधर्म रत सकल निगम प्रतिकूल॥९६(ख)॥
हे प्रभो! एक पूर्वकल्पमें ऐसा कलियुग था जो समस्त पापोंका मूल था, जिसमें सभी स्त्री-पुरुष अधर्ममें रत और वेदके सर्वथा विरोधी हो चुके थे।
तेहि कलिजुग कोसलपुर जाई। जन्मत भय सूद्र तनु पाई॥सिव सेवक मन क्रम अरु बानी। आन देव निंदक अभिमानी॥॥१॥
उसी कलियुगमें मैं अयोध्यापुरीमें शूद्रके शरीरमें जन्मा। मन, वचन और कर्मसे शिवजीका सेवक तो था, पर साथ ही दूसरे देवताओंकी निन्दा करनेवाला घमण्डी भी था।
धन मद मत्त परम बाचाला। उग्रबुद्धि उर दंभ बिसाला॥जदपि रहेउँ रघुपति रजधानी। तदपि न कछु महिमा तब जानी॥॥२॥
धनके नशेमें चूर, अत्यन्त बकवादी और उग्रबुद्धि—मेरे हृदयमें बड़ा भारी दम्भ भरा था। श्रीरघुनाथजीकी ही राजधानीमें रहते हुए भी उस समय मैंने उसकी महिमाको तनिक भी नहीं पहचाना।
अब जाना मैं अवध प्रभावा। निगमागम पुरान अस गावा॥कवनेहुँ जन्म अवध बस जोई। राम परायन सो परि होई॥॥३॥
अब जाकर मैंने अयोध्याका सच्चा प्रभाव समझा है। वेद, शास्त्र और पुराण सभी यही गाते हैं कि जो कोई भी किसी भी जन्ममें अयोध्यामें निवास करता है, वह अन्ततः अवश्य ही श्रीरामका भक्त बन जाता है।
अवध प्रभाव जान तब प्रानी। जब उर बसहिं रामु धनुपानी॥सो कलिकाल कठिन उरगारी। पाप परायन सब नर नारी॥॥४॥
पर अयोध्याका यह प्रभाव जीवको तभी अनुभव होता है जब धनुर्धारी श्रीराम स्वयं उसके हृदयमें बस जायँ। हे गरुड़! वह कलिकाल अत्यन्त कठोर था, जिसमें सभी नर-नारी पापमें ही डूबे रहते थे।
कलिमल ग्रसे धर्म सब लुप्त भए सदग्रंथ।दंभिन्ह निज मति कल्पि करि प्रगट किए बहु पंथ॥९७(क)॥
कलियुगके पापोंने सारे धर्मको निगल लिया, सद्ग्रन्थ लुप्तप्राय हो गये, और पाखण्डियोंने अपनी मनमानी कल्पनाओंसे अनेकों नये-नये पंथ खड़े कर दिये।
भए लोग सब मोहबस लोभ ग्रसे सुभ कर्म।सुनु हरिजान ग्यान निधि कहउँ कछुक कलिधर्म॥९७(ख)॥
सब लोग मोहके अंधकारमें डूब गये, लोभने शुभ कर्मोंको निगल लिया। हे ज्ञानभण्डार, हे हरिवाहन! अब सुनिये, मैं कलियुगके कुछ और लक्षण बतलाता हूँ।
बरन धर्म नहिं आश्रम चारी। श्रुति बिरोध रत सब नर नारी॥द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन। कोउ नहिं मान निगम अनुसासन॥॥१॥
कलियुगमें न वर्णधर्म शेष रहता है, न चारों आश्रम। स्त्री-पुरुष सभी वेदके विरोधमें उतर आते हैं, ब्राह्मण वेदको बेचनेवाले और राजा प्रजाका शोषण करनेवाले हो जाते हैं—वेदकी आज्ञा माननेवाला कोई नहीं बचता।
मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा॥मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहुँ संत कह सब कोई॥॥२॥
जिसे जो अच्छा लगे, वही उसके लिये सच्चा मार्ग बन जाता है; जो केवल डींगें हाँकना जानता है, वही पण्डित कहलाता है। जो झूठा आडम्बर और पाखण्ड रचता है, उसीको सब लोग संत मानने लगते हैं।
सोइ सयान जो परधन हारी। जो कर दंभ सो बड़ आचारी॥जो कह झूँठ मसखरी जाना। कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना॥॥३॥
जो किसी तरह दूसरेका धन हड़प ले, वही चतुर समझा जाता है; जो पाखण्ड करे, वही बड़ा आचारवान् माना जाता है। जो झूठ बोलना और मज़ाक उड़ाना जानता है, कलियुगमें उसीको गुणवान् कहा जाता है।
निराचार जो श्रुति पथ त्यागी। कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी॥जाकें नख अरु जटा बिसाला। सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला॥॥४॥
जो आचारहीन है और वेदमार्गको त्याग चुका है, कलियुगमें वही ज्ञानी और वही वैरागी माना जाता है। जिसके नाखून बढ़े हुए और जटाएँ लम्बी हों, वही उस युगमें प्रसिद्ध तपस्वी बन बैठता है।
असुभ बेष भूषन धरें भच्छाभच्छ जे खाहिं।तेइ जोगी तेइ सिद्ध नर पूज्य ते कलिजुग माहिं॥९८(क)॥
जो अशुभ वेष-भूषा धारण करते हैं और खाने-न खाने योग्यका कोई भेद किये बिना सब कुछ खा लेते हैं, कलियुगमें वे ही योगी, वे ही सिद्ध और वे ही पूज्य पुरुष माने जाते हैं।
जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ।मन क्रम बचन लबार तेइ बकता कलिकाल महुँ॥९८(ख)॥
जिनका आचरण ही दूसरोंका अहित करनेवाला हो, उन्हींका गौरव होता है और वे ही आदरके पात्र बनते हैं। मन, वचन, कर्मसे झूठ बोलनेवाले ही कलिकालमें बड़े वक्ता माने जाते हैं।
नारि बिबस नर सकल गोसाई। नाचहिं नट मर्कट की नाई॥सूद्र द्विजन्ह उपदेसहिं ग्याना। मेलि जनेऊ लेहिं कुदाना॥॥१॥
हे गोसाईं! सभी पुरुष स्त्रियोंके पूर्ण वशमें होकर मदारीके बंदरकी तरह नाचते हैं। शूद्र ब्राह्मणोंको ज्ञानका उपदेश देने लगते हैं और गलेमें जनेऊ डालकर नीच दान तक ग्रहण करने लगते हैं।
सब नर काम लोभ रत क्रोधी। देव बिप्र श्रुति संत बिरोधी॥गुन मंदिर सुंदर पति त्यागी। भजहिं नारि पर पुरुष अभागी॥॥२॥
सभी पुरुष काम, लोभ और क्रोधमें डूबे रहते हैं तथा देवता, ब्राह्मण, वेद और संतोंसे बैर रखते हैं। अभागी स्त्रियाँ गुणवान् और सुन्दर पतिको त्यागकर पराये पुरुषका सेवन करने लगती हैं।
सौभागिनीं बिभूषन हीना। बिधवन्ह के सिंगार नबीना॥गुर सिष बधिर अंध का लेखा। एक न सुनइ एक नहिं देखा॥॥३॥
सुहागिनें आभूषणहीन रहती हैं, जबकि विधवाएँ नित नये शृंगार सजाती हैं। गुरु और शिष्यके बीच बहरे और अंधेका-सा सम्बन्ध रह जाता है—एक उपदेश सुनता नहीं, दूसरा उसे सच्ची दृष्टि देता नहीं।
हरइ सिष्य धन सोक न हरई। सो गुर घोर नरक महुँ परई॥मातु पिता बालकन्हि बोलाबहिं। उदर भरे सोइ धर्म सिखावहिं॥॥४॥
जो गुरु शिष्यका धन तो हर लेता है पर उसका दुःख नहीं हरता, वह घोर नरकमें गिरता है। माता-पिता भी बच्चोंको वही धर्म सिखाते हैं जिससे बस उनका पेट भर जाय।
ब्रह्म ग्यान बिनु नारि नर कहहिं न दूसरि बात।कौड़ी लागि लोभ बस करहिं बिप्र गुर घात॥९९(क)॥
स्त्री-पुरुष ब्रह्मज्ञानकी बड़ी-बड़ी बातें ही करते रहते हैं, पर लोभवश एक कौड़ीके लिये भी ब्राह्मण और गुरुकी हत्या करनेसे नहीं चूकते।
बादहिं सूद्र द्विजन्ह सन हम तुम्ह ते कछु घाटि।जानइ ब्रह्म सो बिप्रबर आँखि देखावहिं डाटि॥९९(ख)॥
शूद्र ब्राह्मणोंसे विवाद करके कहते हैं—हम तुमसे किस बातमें कम हैं? जो ब्रह्मको जान ले वही असली ब्राह्मण है—यों कहकर वे उन्हें आँखें दिखाकर डाँटने लगते हैं।
पर त्रिय लंपट कपट सयाने। मोह द्रोह ममता लपटाने॥तेइ अभेदबादी ग्यानी नर। देखा मैं चरित्र कलिजुग कर॥॥१॥
परायी स्त्रीमें आसक्त, छल-कपटमें निपुण, मोह-द्रोह-ममतामें उलझे हुए लोग ही स्वयंको ब्रह्म और जीवको एक बतानेवाला ज्ञानी घोषित करते हैं। मैंने उस कलियुगका यही स्वरूप प्रत्यक्ष देखा।
आपु गए अरु तिन्हहू घालहिं। जे कहुँ सत मारग प्रतिपालहिं॥कल्प कल्प भरि एक एक नरका। परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका॥॥२॥
ऐसे लोग स्वयं तो नष्ट होते ही हैं, साथ ही जो सन्मार्गपर चलते हैं उन्हें भी भ्रष्ट कर देते हैं। जो कुतर्कोंसे वेदकी निन्दा करते हैं, वे युगों-युगों तक नरकमें पड़े रहते हैं।
जे बरनाधम तेलि कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा॥नारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं सन्यासी॥॥३॥
तेली, कुम्हार, चाण्डाल, भील, कोल, कलवार जैसे नीची जातिके लोग भी पत्नीकी मृत्यु या घर-सम्पत्तिके नाशपर सिर मुँड़ाकर संन्यासी बन बैठते हैं।
