षष्ठ सोपान
लंकाकाण्ड
सेतु बंधन, राम-रावण युद्ध एवं विजय की कथा।
लंकाकाण्ड — सुनें
लंकाकाण्ड — पढ़ें भी, सुनें भी
सेतु बंधन, राम-रावण युद्ध एवं विजय की कथा।
यह कथा शीघ्र ही यहाँ सुनने हेतु भी उपलब्ध होगी
रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्।मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं वन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम्॥१॥
जो योगियोंमें श्रेष्ठ हैं, ज्ञानसे ही जिनकी प्राप्ति होती है, जो कामदेवके शत्रु शिवजीके पूज्य और जन्म-मरणके भयको हरनेवाले हैं, जो कालरूपी मतवाले हाथीके लिये सिंहके समान हैं, जो समस्त गुणोंके भंडार, अजेय, निर्गुण और विकाररहित हैं; जो मायासे परे, देवताओंके स्वामी और दुष्टोंका वध करनेमें सदा तत्पर रहते हैं, जो समस्त ब्रह्माओंके भी एकमात्र आराध्यदेव हैं—उन कमलनयन, कन्दके समान श्यामल-गौर शरीरवाले, राजारूपमें प्रकट श्रीरामको मैं वन्दना करता हूँ।
शंखेन्द्वाभमतीवसुन्दरतनुं शार्दूलचर्माम्बरं कालव्यालकरालभूषणधरं गंगाशशांकप्रियम्।काशीशं कलिकल्मषौघशमनं कल्याणकल्पद्रुमं नौमीड्यं गिरिजापतिं गुणनिधिं कन्दर्पहं शङ्करम्॥२॥
जिनका अत्यन्त सुन्दर शरीर शंख और चन्द्रमाके समान उज्ज्वल है, जो व्याघ्रचर्म पहनते हैं, कालसर्पके समान भयानक आभूषण धारण करते हैं और जिन्हें गंगा तथा चन्द्रमा प्रिय हैं; जो काशीके स्वामी हैं, कलियुगके पापसमूहको शान्त करनेवाले और कल्याणके कल्पवृक्ष हैं—उन स्तुतियोग्य, पार्वतीपति, गुणनिधान और कामदेवका नाश करनेवाले शिवजीको मैं नमस्कार करता हूँ।
यो ददाति सतां शम्भुः कैवल्यमपि दुर्लभम्।खलानां दण्डकृद्योऽसौ शङ्करः शं तनोतु मे॥३॥
जो सत्पुरुषोंको अत्यन्त दुर्लभ कैवल्य (मोक्ष) भी दे देते हैं और जो दुष्टोंको दण्ड देनेवाले हैं, वे ही कल्याणस्वरूप शंकरजी मेरा कल्याण करें।
लव निमेष परमानु जुग बरष कलप सर चंड।भजसि न मन तेहि राम को कालु जासु कोदंड॥
काल जिनका धनुष है और लव, निमेष, परमाणु, वर्ष, युग तथा कल्प जिनके प्रचंड बाण हैं, हे मन! तू उन श्रीरामको छोड़कर और किसे भजेगा?
सिंधु बचन सुनि राम सचिव बोलि प्रभु अस कहेउ।अब बिलंबु केहि काम करहु सेतु उतरे कटकु॥
समुद्रके वचन सुनकर श्रीरामने मन्त्रियोंको बुलाकर कहा—अब देर किस बातकी, शीघ्र सेतु बाँधो जिससे सेना उस पार जा सके।
सुनहु भानुकुल केतु जामवंत कर जोरि कह।नाथ नाम तव सेतु नर चढ़ि भव सागर तरिहिं॥
जाम्बवान् ने हाथ जोड़कर कहा—हे सूर्यवंश की ध्वजास्वरूप प्रभु! आपका नाम ही सबसे बड़ा सेतु है, जिसके सहारे मनुष्य संसार-सागर से पार हो जाते हैं।
यह लघु जलधि तरत कति बारा। अस सुनि पुनि कह पवनकुमारा॥प्रभु प्रताप बड़वानल भारी। सोषेउ प्रथम पयोनिधि बारी॥
यह सुनकर पवनपुत्र हनुमान ने कहा—फिर यह छोटा-सा समुद्र पार करने में कितनी देर लगेगी? प्रभु का प्रताप तो प्रचंड बड़वानल के समान है, इसने तो पहले ही समुद्र का सारा जल सोख लिया था।
तब रिपु नारी रुदन जल धारा। भरेउ बहोरि भयउ तेहिं खारा॥सुनि अति उकुति पवनसुत केरी। हरषे कपि रघुपति तन हेरी॥॥२॥
हाँ, पर आपके शत्रुओंकी स्त्रियोंके आँसुओंकी धारासे यह फिर भर गया और उसी कारण खारा हो गया। हनुमानकी यह चतुर उक्ति सुनकर सब वानर श्रीरघुनाथकी ओर देखकर हर्षित हो उठे।
जामवंत बोले दोउ भाई। नल नीलहि सब कथा सुनाई॥राम प्रताप सुमिरि मन माहीं। करहु सेतु प्रयास कछु नाहीं॥॥३॥
जाम्बवानने नल और नील दोनों भाइयोंको बुलाकर सारी बात कह सुनायी—मनमें श्रीरामके प्रतापका स्मरण करते हुए सेतु बाँधो, इसमें कोई परिश्रम नहीं लगेगा।
बोलि लिए कपि निकर बहोरी। सकल सुनहु बिनती कछु मोरी॥राम चरन पंकज उर धरहू। कौतुक एक भालु कपि करहू॥॥४॥
फिर उन्होंने वानरोंके समूहको बुलाकर कहा—मेरी एक विनती सुनो, अपने हृदयमें श्रीरामके चरण-कमल धारण करो और सब मिलकर एक खेल करो।
धावहु मर्कट बिकट बरूथा। आनहु बिटप गिरिन्ह के जूथा॥सुनि कपि भालु चले करि हूहा। जय रघुबीर प्रताप समूहा॥॥५॥
जाओ, विकट वानरो! पेड़ों और पर्वतोंके समूह उखाड़ लाओ। यह सुनते ही वानर-भालू हुंकार भरते और श्रीरघुवीरके प्रतापकी जय बोलते हुए चल पड़े।
अति उतंग गिरि पादप लीलहिं लेहिं उठाइ।आनि देहिं नल नीलहि रचहिं ते सेतु बनाइ॥॥१॥
वे बहुत ऊँचे-ऊँचे पर्वत और वृक्ष खेल-खेलमें उठा लाते हैं और नल-नीलको दे देते हैं, जो उन्हें गढ़कर सुन्दर सेतु बनाते जाते हैं।
सैल बिसाल आनि कपि देहीं। कंदुक इव नल नील ते लेहीं॥देखि सेतु अति सुंदर रचना। बिहसि कृपानिधि बोले बचना॥॥१॥
वानर बड़े-बड़े पहाड़ ला-लाकर देते जाते हैं, और नल-नील उन्हें गेंदकी तरह पकड़ लेते हैं। सेतुकी यह अद्भुत रचना देखकर कृपासिन्धु श्रीराम हँसकर बोले—
परम रम्य उत्तम यह धरनी। महिमा अमित जाइ नहिं बरनी॥करिहउँ इहाँ संभु थापना। मोरे हृदयँ परम कलपना॥॥२॥
यह भूमि अत्यन्त रमणीय और उत्तम है, इसकी महिमा कही नहीं जा सकती। मेरे मनमें बड़ी इच्छा है कि यहाँ शिवजीकी स्थापना करूँ।
सुनि कपीस बहु दूत पठाए। मुनिबर सकल बोलि लै आए॥लिंग थापि बिधिवत करि पूजा। सिव समान प्रिय मोहि न दूजा॥॥३॥
यह सुनकर सुग्रीवने बहुतसे दूत भेजकर सब श्रेष्ठ मुनियोंको बुलवा लिया। विधिपूर्वक शिवलिंगकी स्थापना और पूजा करके श्रीरामने कहा—शिवजीके समान मुझे और कोई प्रिय नहीं है।
सिव द्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा॥संकर बिमुख भगति चह मोरी। सो नारकी मूढ़ मति थोरी॥॥४॥
जो शिवसे द्वेष रखते हुए भी मेरा भक्त कहलाता है, वह स्वप्नमें भी मुझे नहीं पा सकता। और जो शंकरसे विमुख होकर मेरी भक्ति चाहता है, वह मूर्ख नरकका ही अधिकारी है।
संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास।ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास॥॥२॥
जो शंकरको तो मानते हैं पर मेरे द्रोही हैं, और जो शिवके द्रोही होकर मेरे भक्त बनना चाहते हैं—ऐसे लोग कल्पभर घोर नरकमें ही वास करते हैं।
जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं। ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं॥जो गंगाजलु आनि चढ़ाइहि। सो साजुज्य मुक्ति नर पाइहि॥॥१॥
जो इस रामेश्वरका दर्शन करेंगे, वे शरीर त्यागकर मेरे लोकको जायँगे, और जो गंगाजल लाकर इनपर चढ़ायेगा, वह सायुज्य मुक्ति पायेगा।
होइ अकाम जो छल तजि सेइहि। भगति मोरि तेहि संकर देइहि॥मम कृत सेतु जो दरसनु करिही। सो बिनु श्रम भवसागर तरिही॥॥२॥
जो निष्काम होकर छल छोड़कर रामेश्वरकी सेवा करेगा, उसे शिवजी मेरी भक्ति देंगे, और जो मेरे बनाये इस सेतुका दर्शन करेगा, वह बिना ही परिश्रम भवसागरसे पार हो जायेगा।
राम बचन सब के जिय भाए। मुनिबर निज निज आश्रम आए॥गिरिजा रघुपति के यह रीती। संतत करहिं प्रनत पर प्रीती॥॥३॥
श्रीरामके ये वचन सबके मनको भा गये, और श्रेष्ठ मुनि अपने-अपने आश्रमको लौट गये। शिवजी कहते हैं—हे पार्वती! श्रीरघुनाथकी यह रीति है कि वे सदा शरणागतपर प्रेम करते हैं।
बाँधा सेतु नील नल नागर। राम कृपाँ जसु भयउ उजागर॥बूड़हिं आनहि बोरहिं जेई। भए उपल बोहित सम तेई॥॥४॥
चतुर नल-नीलने सेतु बाँध दिया, और श्रीरामकी कृपासे उनका यह उजला यश सब ओर फैल गया। जो पत्थर स्वयं डूबते और दूसरोंको डुबाते थे, वे ही अब जहाजकी तरह तैरने और पार ले जानेवाले बन गये।
महिमा यह न जलधि कइ बरनी। पाहन गुन न कपिन्ह कइ करनी॥॥५॥
यह न तो समुद्रकी महिमा है, न पत्थरोंका कोई गुण और न वानरोंकी ही कोई करामात—
श्री रघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान।ते मतिमंद जे राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन॥॥३॥
यह तो केवल श्रीरघुवीरके प्रतापका ही चमत्कार है कि पत्थर भी समुद्रपर तैर गये। जो ऐसे श्रीरामको छोड़कर किसी और स्वामीको भजते हैं, वे निश्चय ही मन्दबुद्धि हैं।
बाँधि सेतु अति सुदृढ़ बनावा। देखि कृपानिधि के मन भावा॥चली सेन कछु बरनि न जाई। गर्जहिं मर्कट भट समुदाई॥॥१॥
नल-नीलने सेतु बाँधकर उसे बहुत ही मजबूत बना दिया, जिसे देखकर कृपानिधान श्रीरामका मन प्रसन्न हो गया। फिर सेना चली, जिसका वर्णन करना कठिन है—योद्धा वानरोंके समूह गरज रहे हैं।
सेतुबंध ढिग चढ़ि रघुराई। चितव कृपाल सिंधु बहुताई॥देखन कहुँ प्रभु करुना कंदा। प्रगट भए सब जलचर बृंदा॥॥२॥
कृपालु श्रीराम सेतुबन्धके किनारे चढ़कर समुद्रका विस्तार निहारने लगे। करुणाके सागर प्रभुके दर्शनके लिये सब जलचर जीव जलके ऊपर निकल आये।
मकर नक्र नाना झष ब्याला। सत जोजन तन परम बिसाला॥अइसेउ एक तिन्हहि जे खाहीं। एकन्ह कें डर तेपि डेराहीं॥॥३॥
वहाँ नाना प्रकारके मगर, घड़ियाल, मच्छ और सर्प थे, जिनके शरीर सौ-सौ योजन तक विशाल थे। कुछ तो ऐसे भी थे जो इन बड़े जन्तुओंको भी निगल जायँ, और उनसे भी कुछ और डरते थे।
प्रभुहि बिलोकहिं टरहिं न टारे। मन हरषित सब भए सुखारे॥तिन्ह की ओट न देखिअ बारी। मगन भए हरि रूप निहारी॥॥४॥
वे सब वैर भूलकर प्रभुको एकटक निहार रहे हैं, हटाये भी नहीं हटते। उनके मन हर्षसे भरे हैं, सब सुखी हो गये हैं। उनकी भीड़के कारण जल तक नहीं दीखता, सब भगवानका रूप देखकर आनन्दमें मग्न हो गये हैं।
चला कटकु प्रभु आयसु पाई। को कहि सक कपि दल बिपुलाई॥॥५॥
प्रभुकी आज्ञा पाकर सेना चल पड़ी—वानर-सेनाकी अपार संख्याको भला कौन बता सकता है!
सेतुबंध भइ भीर अति कपि नभ पंथ उड़ाहिं।अपर जलचरन्हि ऊपर चढ़ि चढ़ि पारहि जाहिं॥॥४॥
सेतुपर इतनी भीड़ हो गयी कि कुछ वानर आकाशमार्गसे उड़ने लगे, और कुछ जलचर जीवोंकी पीठपर चढ़-चढ़कर ही पार जाने लगे।
अस कौतुक बिलोकि द्वौ भाई। बिहँसि चले कृपाल रघुराई॥सेन सहित उतरे रघुबीरा। कहि न जाइ कपि जूथप भीरा॥॥१॥
यह कौतुक देखकर कृपालु राम-लक्ष्मण दोनों भाई हँसते हुए आगे बढ़े। सेनासहित श्रीरघुवीर समुद्रके पार उतर गये—वानर-सेनापतियोंकी उस भीड़का वर्णन नहीं हो सकता।
सिंधु पार प्रभु डेरा कीन्हा। सकल कपिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा॥खाहु जाइ फल मूल सुहाए। सुनत भालु कपि जहँ तहँ धाए॥॥२॥
समुद्रके उस पार प्रभुने डेरा डाला और सब वानरोंको आज्ञा दी—जाओ, सुन्दर फल-मूल खाओ। यह सुनते ही रीछ-वानर जहाँ-तहाँ दौड़ पड़े।
सब तरु फरे राम हित लागी। रितु अरु कुरितु काल गति त्यागी॥खाहिं मधुर फल बिटप हलावहिं। लंका सन्मुख सिखर चलावहिं॥॥३॥
श्रीरामके हितके लिये मानो ऋतु-अऋतुका बन्धन ही टूट गया और सभी वृक्ष फलोंसे लद गये। वानर मीठे फल खाते, डालियाँ हिलाते और पर्वत-शिखरोंको लंकाकी ओर उछालते चले।
जहँ कहुँ फिरत निसाचर पावहिं। घेरि सकल बहु नाच नचावहिं॥दसनन्हि काटि नासिका काना। कहि प्रभु सुजसु देहिं तब जाना॥॥४॥
जहाँ-कहीं कोई राक्षस मिल जाता, सब मिलकर उसे घेर लेते और खूब नचाते, फिर दाँतोंसे उसके नाक-कान काटकर, प्रभुका यश सुनाकर उसे छोड़ देते।
जिन्ह कर नासा कान निपाता। तिन्ह रावनहि कही सब बाता॥सुनत श्रवन बारिधि बंधाना। दस मुख बोलि उठा अकुलाना॥॥५॥
जिनके नाक-कान काटे गये थे, उन्होंने जाकर रावणको सब हाल कह सुनाया। समुद्रपर सेतु बँध जानेकी बात सुनते ही रावण घबराकर दसों मुखोंसे बोल उठा—
बांध्यो बननिधि नीरनिधि जलधि सिंधु बारीस।सत्य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि नदीस॥॥५॥
क्या सचमुच ही इस समुद्रको बाँध लिया गया?
निज बिकलता बिचारि बहोरी। बिहँसि गयउ गृह करि भय भोरी॥मंदोदरीं सुन्यो प्रभु आयो। कौतुकहीं पाथोधि बँधायो॥॥१॥
अपनी घबराहटको छिपाते हुए वह ऊपरसे हँसता हुआ भय भुलाकर महलमें चला गया। जब मन्दोदरीने सुना कि प्रभु आ गये हैं और खेल-ही-खेलमें समुद्रको बँधवा लिया है,
कर गहि पतिहि भवन निज आनी। बोली परम मनोहर बानी॥चरन नाइ सिरु अंचलु रोपा। सुनहु बचन पिय परिहरि कोपा॥॥२॥
तो वह पतिका हाथ पकड़कर उन्हें अपने कक्षमें ले आयी और अत्यन्त मधुर वाणीमें बोली। चरणोंमें सिर नवाकर आँचल पसारते हुए कहा—हे प्रियतम! क्रोध छोड़कर मेरी बात सुनिये।
नाथ बयरु कीजे ताही सों। बुधि बल सकिअ जीति जाही सों॥तुम्हहि रघुपतिहि अंतर कैसा। खलु खद्योत दिनकरहि जैसा॥॥३॥
हे नाथ! वैर उन्हींसे करना चाहिये जिन्हें बल-बुद्धिसे जीता जा सके। आपमें और श्रीरामजीमें उतना ही अन्तर है जितना जुगनू और सूर्यमें।
अतिबल मधु कैटभ जेहिं मारे। महाबीर दितिसुत संघारे॥जेहिं बलि बाँधि सहजभुज मारा। सोइ अवतरेउ हरन महि भारा॥॥४॥
जिन्होंने बड़े-बड़े बलवान मधु-कैटभको मारा और हिरण्याक्ष-हिरण्यकशिपुका संहार किया, जिन्होंने बलिको बाँधा और सहस्रबाहुको मारा, वे ही अब पृथ्वीका भार उतारनेके लिये अवतरित हुए हैं।
तासु बिरोध न कीजिअ नाथा। काल करम जिव जाकें हाथा॥॥५॥
हे नाथ! उनसे विरोध मत कीजिये, जिनके हाथमें काल, कर्म और सारे प्राणी हैं।
रामहि सौपि जानकी नाइ कमल पद माथ।सुत कहुँ राज समर्पि बन जाइ भजिअ रघुनाथ॥॥६॥
उनके चरणकमलोंमें सिर नवाकर जानकीजीको लौटा दीजिये, पुत्रको राज्य सौंपकर वनमें जाकर श्रीरघुनाथका भजन कीजिये।
नाथ दीनदयाल रघुराई। बाघउ सनमुख गएँ न खाई॥चाहिअ करन सो सब करि बीते। तुम्ह सुर असुर चराचर जीते॥॥१॥
हे नाथ! श्रीराम तो दीनोंपर दया करनेवाले हैं, शरण जानेपर तो बाघ भी नहीं खाता। जो करना था वह आप कर चुके, देवता-दानव और चराचर सबको जीत लिया।
संत कहहिं असि नीति दसानन। चौथेंपन जाइहि नृप कानन॥तासु भजन कीजिअ तहँ भर्ता। जो कर्ता पालक संहर्ता॥॥२॥
संतजन ऐसी नीति बताते हैं कि बुढ़ापेमें राजाको वनको चला जाना चाहिये। वहाँ जाकर उन्हींका भजन कीजिये जो सृष्टिके रचयिता, पालक और संहारक हैं।
सोइ रघुबीर प्रनत अनुरागी। भजहु नाथ ममता सब त्यागी॥मुनिबर जतनु करहिं जेहि लागी। भूप राजु तजि होहिं बिरागी॥॥३॥
वे ही श्रीराम शरणागतपर प्रेम करनेवाले हैं, हे नाथ! सारी ममता त्यागकर उन्हींका भजन कीजिये—जिनके लिये बड़े-बड़े मुनि साधना करते हैं और राजा राज्य छोड़कर वैरागी बन जाते हैं।
सोइ कोसलाधीस रघुराया। आयउ करन तोहि पर दाया॥जौं पिय मानहु मोर सिखावन। सुजसु होइ तिहुँ पुर अति पावन॥॥४॥
वे ही कोसलाधीश श्रीराम आपपर दया करने आये हैं। हे प्रियतम! यदि मेरी यह सीख मान लेंगे तो आपका पवित्र यश तीनों लोकोंमें फैल जायेगा।
अस कहि नयन नीर भरि गहि पद कंपित गात।नाथ भजहु रघुनाथहि अचल होइ अहिवात॥॥७॥
ऐसा कहकर, आँखोंमें आँसू भरकर और पतिके चरण पकड़कर काँपते शरीरसे मन्दोदरी बोली—हे नाथ! श्रीरामका भजन कीजिये, जिससे मेरा सुहाग सदा अचल बना रहे।
तब रावन मयसुता उठाई। कहै लाग खल निज प्रभुताई॥सुनु तें प्रिया बृथा भय माना। जग जोधा को मोहि समाना॥॥१॥
तब रावणने मन्दोदरीको उठाकर अपनी प्रभुताकी डींग हाँकनी शुरू कर दी—हे प्रिये! तू व्यर्थ ही डर रही है, बता तो, संसारमें मेरे समान योद्धा और कौन है?
बरुन कुबेर पवन जम काला। भुज बल जितेउँ सकल दिगपाला॥देव दनुज नर सब बस मोरें। कवन हेतु उपजा भय तोरें॥॥२॥
वरुण, कुबेर, पवन, यम आदि सभी दिक्पालोंको और कालको भी मैंने अपने भुजबलसे जीत रखा है। देवता, दानव और मनुष्य सब मेरे वशमें हैं, फिर तुझे यह भय किसलिये हुआ?
नाना बिधि तेहि कहेसि बुझाई। सभाँ बहोरि बैठ सो जाई॥मंदोदरीं हदयँ अस जाना। काल बस्य उपजा अभिमाना॥॥३॥
उसने मन्दोदरीको बहुत तरहसे समझाया-बुझाया, फिर सभामें जाकर बैठ गया। मन्दोदरीने मनमें समझ लिया कि कालवश होनेके कारण ही पतिको यह अभिमान हो गया है।
सभाँ आइ मंत्रिन्ह तेंहि बूझा। करब कवन बिधि रिपु सैं जूझा॥कहहिं सचिव सुनु निसिचर नाहा। बार बार प्रभु पूछहु काहा॥॥४॥
सभामें आकर उसने मन्त्रियोंसे पूछा—शत्रुसे किस तरह युद्ध किया जाय? मन्त्री बोले—हे राक्षसराज! आप बार-बार यह क्या पूछते हैं?
कहहु कवन भय करिअ बिचारा। नर कपि भालु अहार हमारा॥॥५॥
कहिये तो, ऐसा कौन-सा बड़ा भय है जिसका विचार किया जाय—मनुष्य और वानर-भालू तो हमारा भोजन ही हैं।
सब के बचन श्रवन सुनि कह प्रहस्त कर जोरि।नीति बिरोध न करिअ प्रभु मत्रिंन्ह मति अति थोरि॥॥८॥
प्रहस्तने सबके वचन कानोंसे सुनकर हाथ जोड़कर कहा—हे प्रभु! नीतिके विरुद्ध कुछ न करें, इन मन्त्रियोंकी बुद्धि बहुत ही थोड़ी है।
कहहिं सचिव सठ ठकुरसोहाती। नाथ न पूर आव एहि भाँती॥बारिधि नाघि एक कपि आवा। तासु चरित मन महुँ सबु गावा॥॥१॥
ये मूर्ख मन्त्री तो बस मुँहदेखी बातें कह रहे हैं, हे नाथ! इस तरहसे काम नहीं चलेगा। एक ही वानर समुद्र लाँघकर आया था, उसीका चरित्र लोग आज भी मन-ही-मन गाते रहते हैं।
छुधा न रही तुम्हहि तब काहू। जारत नगरु कस न धरि खाहू॥सुनत नीक आगें दुख पावा। सचिवन अस मत प्रभुहि सुनावा॥॥२॥
उस समय क्या तुममेंसे किसीको भूख नहीं थी? नगर जलाते समय ही उसे पकड़कर क्यों नहीं खा लिया? इन मन्त्रियोंने आपको जो सलाह दी है, वह सुननेमें अच्छी लगती है पर आगे चलकर दुःख ही देगी।
जेहिं बारीस बँधायउ हेला। उतरेउ सेन समेत सुबेला॥सो भनु मनुज खाब हम भाई। बचन कहहिं सब गाल फुलाई॥॥३॥
जिसने खेल-खेलमें समुद्र बँधवा लिया और सेनासहित सुबेल पर्वतपर उतर आया, हे भाई! उसे मनुष्य कहते हो जिसे तुम खा जाओगे? ये सब गाल फुलाकर व्यर्थकी डींगें हाँक रहे हैं।
तात बचन मम सुनु अति आदर। जनि मन गुनहु मोहि करि कादर॥प्रिय बानी जे सुनहिं जे कहहीं। ऐसे नर निकाय जग अहहीं॥॥४॥
हे तात! मेरे वचन बड़े आदरसे सुनिये, मुझे कायर मत समझिये। संसारमें ऐसे मनुष्य बहुत हैं जो केवल मीठी बात ही सुनना और कहना जानते हैं।
बचन परम हित सुनत कठोरे। सुनहिं जे कहहिं ते नर प्रभु थोरे॥प्रथम बसीठ पठउ सुनु नीती। सीता देइ करहु पुनि प्रीती॥॥५॥
पर जो सुननेमें कठोर किंतु परिणाममें हितकारी वचन कहते-सुनते हैं, ऐसे लोग बहुत कम मिलते हैं। नीति यही है कि पहले दूत भेजिये, फिर सीताको लौटाकर श्रीरामसे मेल कर लीजिये।
नारि पाइ फिरि जाहिं जौं तौ न बढ़ाइअ रारि।नाहिं त सन्मुख समर महि तात करिअ हठि मारि॥॥९॥
यदि वे स्त्री पाकर लौट जायँ तो व्यर्थका झगड़ा न बढ़ाइये, नहीं तो हे तात! रणभूमिमें डटकर उनसे युद्ध कीजिये।
यह मत जौं मानहु प्रभु मोरा। उभय प्रकार सुजसु जग तोरा॥सुत सन कह दसकंठ रिसाई। असि मति सठ केहिं तोहि सिखाई॥॥१॥
हे प्रभु! यदि मेरी यह सलाह मान लेंगे तो दोनों ही तरहसे संसारमें आपका यश होगा। यह सुनकर रावण क्रोधमें भरकर पुत्रसे बोला—अरे मूर्ख! तुझे यह बुद्धि किसने सिखायी?
अबहीं ते उर संसय होई। बेनुमूल सुत भयहु घमोई॥सुनि पितु गिरा परुष अति घोरा। चला भवन कहि बचन कठोरा॥॥२॥
अभीसे तेरे मनमें डर बैठ गया? तू तो बाँसकी जड़में उगे घमोईकी तरह मेरे वंशके अनुकूल ही नहीं निकला! पिताके ये कठोर वचन सुनकर प्रहस्त कड़वे शब्द कहता हुआ अपने घर चला गया।
हित मत तोहि न लागत कैसें। काल बिबस कहुँ भेषज जैसें॥संध्या समय जानि दससीसा। भवन चलेउ निरखत भुज बीसा॥॥३॥
हितकी बात रावणको कैसे समझमें आती, जैसे मृत्युके निकट पहुँचे रोगीको दवा असर नहीं करती। संध्या होते देख रावण अपनी बीसों भुजाओंको निहारता हुआ महलकी ओर चल दिया।
लंका सिखर उपर आगारा। अति बिचित्र तहँ होइ अखारा॥बैठ जाइ तेही मंदिर रावन। लागे किंनर गुन गन गावन॥॥४॥
लंकाकी चोटीपर एक अत्यन्त विचित्र महल था, जहाँ नित्य नाच-गानका अखाड़ा जमता था। रावण उसी महलमें जा बैठा और किन्नर उसके गुणगान गाने लगे।
बाजहिं ताल पखाउज बीना। नृत्य करहिं अपछरा प्रबीना॥॥५॥
करताल, मृदंग और वीणा बज रहे हैं, और नृत्यकुशल अप्सराएँ नाच रही हैं।
सुनासीर सत सरिस सो संतत करइ बिलास।परम प्रबल रिपु सीस पर तद्यपि सोच न त्रास॥॥१०॥
वह सैकड़ों इन्द्रोंके समान भोग-विलासमें डूबा रहता है—यद्यपि सिरपर अत्यन्त प्रबल शत्रु मँडरा रहा है, फिर भी उसे न कोई चिन्ता है, न डर।
इहाँ सुबेल सैल रघुबीरा। उतरे सेन सहित अति भीरा॥सिखर एक उतंग अति देखी। परम रम्य सम सुभ्र बिसेषी॥॥१॥
उधर सुबेल पर्वतपर श्रीरघुवीर अपनी विशाल सेनासहित उतरे। वहाँ एक बहुत ऊँचा, परम रमणीय, समतल और उज्ज्वल शिखर देखकर—
तहँ तरु किसलय सुमन सुहाए। लछिमन रचि निज हाथ डसाए॥ता पर रुचिर मृदुल मृगछाला। तेहीं आसान आसीन कृपाला॥॥२॥
लक्ष्मणने वहाँ कोमल पत्ते और सुन्दर फूल अपने हाथों सजाकर बिछाये, और उसपर मुलायम मृगछाला डाल दी। उसी आसनपर कृपालु श्रीराम विराजमान हुए।
प्रभु कृत सीस कपीस उछंगा। बाम दहिन दिसि चाप निषंगा॥दुहुँ कर कमल सुधारत बाना। कह लंकेस मंत्र लगि काना॥॥३॥
प्रभुने अपना सिर सुग्रीवकी गोदमें रखा है, बायीं ओर धनुष और दायीं ओर तरकस है। वे अपने दोनों कर-कमलोंसे बाण सुधार रहे हैं, और विभीषण कानमें सलाह दे रहे हैं।
बड़भागी अंगद हनुमाना। चरन कमल चापत बिधि नाना॥प्रभु पाछें लछिमन बीरासन। कटि निषंग कर बान सरासन॥॥४॥
परम भाग्यशाली अंगद और हनुमान अनेक प्रकारसे प्रभुके चरण दबा रहे हैं, और लक्ष्मण कमरमें तरकस बाँधे, हाथोंमें धनुष-बाण लिये वीरासनमें प्रभुके पीछे बैठे हैं।
एहि बिधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन।धन्य ते नर एहिं ध्यान जे रहत सदा लयलीन॥॥११(क)॥
इस प्रकार कृपा, सौन्दर्य और गुणोंके धाम श्रीराम विराजमान हैं। धन्य हैं वे मनुष्य जो सदा इसी ध्यानमें लीन रहते हैं।
पूरब दिसा बिलोकि प्रभु देखा उदित मंयक।कहत सबहि देखहु ससिहि मृगपति सरिस असंक॥॥११(ख)॥
पूर्व दिशाकी ओर देखकर प्रभुने उदय होते चन्द्रमाको देखा और सबसे कहा—देखो तो, चन्द्रमा कैसा सिंहके समान निर्भय है!
पूरब दिसि गिरिगुहा निवासी। परम प्रताप तेज बल रासी॥मत्त नाग तम कुंभ बिदारी। ससि केसरी गगन बन चारी॥॥१॥
पूर्व दिशारूपी पर्वतकी गुफामें रहनेवाला यह चन्द्रमारूपी सिंह, जो प्रताप, तेज और बलकी राशि है, अन्धकाररूपी मतवाले हाथीका मस्तक विदीर्ण करके आकाशरूपी वनमें निर्भय विचर रहा है।
बिथुरे नभ मुकुताहल तारा। निसि सुंदरी केर सिंगारा॥कह प्रभु ससि महुँ मेचकताई। कहहु काह निज निज मति भाई॥॥२॥
आकाशमें बिखरे तारे मानो रात्रिरूपी सुन्दरीके शृंगारके मोती हैं। प्रभुने कहा—भाइयो, बताओ तो, चन्द्रमामें यह कालापन क्या है, अपनी-अपनी बुद्धिसे कहो।
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। ससि महुँ प्रगट भूमि के झाँई॥मारेउ राहु ससिहि कह कोई। उर महँ परी स्यामता सोई॥॥३॥
सुग्रीवने कहा—हे रघुनाथ! सुनिये, चन्द्रमामें पृथ्वीकी ही छाया दीख रही है। किसीने कहा—चन्द्रमाको राहुने मारा था, वही चोटका दाग उसके हृदयपर बना रह गया है।
कोउ कह जब बिधि रति मुख कीन्हा। सार भाग ससि कर हरि लीन्हा॥छिद्र सो प्रगट इंदु उर माहीं। तेहि मग देखिअ नभ परिछाहीं॥॥४॥
किसीने कहा—जब ब्रह्माने रतिका मुख गढ़ा, तब उन्होंने चन्द्रमाका सार भाग निकाल लिया, जिससे उसके हृदयमें छेद हो गया। वही छेद आकाशकी काली छायाके रूपमें उसमें दीखता है।
प्रभु कह गरल बंधु ससि केरा। अति प्रिय निज उर दीन्ह बसेरा॥बिष संजुत कर निकर पसारी। जारत बिरहवंत नर नारी॥॥५॥
प्रभुने कहा—विष चन्द्रमाका बहुत प्यारा भाई है, इसीलिये उसने उसे अपने हृदयमें बसा रखा है। वह विषभरी किरणें फैलाकर वियोगी नर-नारियोंको जलाता रहता है।
कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हारा प्रिय दास।तव मूरति बिधु उर बसति सोइ स्यामता अभास॥॥१२(क)॥
हनुमानने कहा—हे प्रभु! सुनिये, चन्द्रमा आपका प्रिय दास है। आपकी सुन्दर श्याम मूर्ति ही उसके हृदयमें बसती है, वही श्यामताकी झलक है।
पवन तनय के बचन सुनि बिहँसे रामु सुजान।दच्छिन दिसि अवलोकि प्रभु बोले कृपा निधान॥॥१२(ख)॥
पवनपुत्रके ये वचन सुनकर सुजान श्रीराम मुसकराये, फिर दक्षिण दिशाकी ओर देखकर कृपानिधान प्रभु बोले—
देखु बिभीषन दच्छिन आसा। घन घंमड दामिनि बिलासा॥मधुर मधुर गरजइ घन घोरा। होइ बृष्टि जनि उपल कठोरा॥॥१॥
हे विभीषण! दक्षिण दिशाकी ओर देखो, कैसे बादल घुमड़ रहे हैं और बिजली चमक रही है। यह गरजता हुआ भयानक बादल कहीं कठोर ओलोंकी वर्षा न कर दे!
कहत बिभीषन सुनहु कृपाला। होइ न तड़ित न बारिद माला॥लंका सिखर उपर आगारा। तहँ दसकंधर देख अखारा॥॥२॥
विभीषणने कहा—हे कृपालु! सुनिये, यह न तो बिजली है, न बादलोंकी घटा। लंकाकी चोटीपर बना वह महल है, जहाँ रावण अपना नाच-गानका अखाड़ा देख रहा है।
छत्र मेघडंबर सिर धारी। सोइ जनु जलद घटा अति कारी॥मंदोदरी श्रवन ताटंका। सोइ प्रभु जनु दामिनी दमंका॥॥३॥
उसने सिरपर जो विशाल काला छत्र धारण कर रखा है, वही मानो बादलोंकी घनी काली घटा है। और मन्दोदरीके कानोंमें हिलते कर्णफूल ही मानो बिजलीकी चमक हैं।
बाजहिं ताल मृदंग अनूपा। सोइ रव मधुर सुनहु सुरभूपा॥प्रभु मुसुकान समुझि अभिमाना। चाप चढ़ाइ बान संधाना॥॥४॥
हे देवराज! सुनिये, वे अनुपम ताल-मृदंग ही बज रहे हैं, वही मधुर ध्वनि गर्जनकी तरह सुनायी पड़ रही है। रावणका यह अभिमान समझकर प्रभु मुसकराये और धनुष चढ़ाकर बाण चढ़ा लिया।
छत्र मुकुट ताटंक तब हते एकहीं बान।सबकें देखत महि परे मरमु न कोऊ जान॥॥१३(क)॥
और एक ही बाणसे रावणका छत्र-मुकुट तथा मन्दोदरीके कर्णफूल काटकर गिरा दिये। सबके देखते-देखते वे जमीनपर आ गिरे, पर इसका भेद किसीको समझमें नहीं आया।
अस कौतुक करि राम सर प्रबिसेउ आई निषंग।रावन सभा ससंक सब देखि महा रसभंग॥॥१३(ख)॥
ऐसा चमत्कार करके श्रीरामका बाण लौटकर फिर तरकसमें जा समाया। यह रंगमें भंग देखकर रावणकी सारी सभा भयभीत हो उठी।
कंप न भूमि न मरुत बिसेषा। अस्त्र सस्त्र कछु नयन न देखा॥सोचहिं सब निज हृदय मझारी। असगुन भयउ भयंकर भारी॥॥१॥
न धरती काँपी, न कोई तेज आँधी चली, न किसीने कोई अस्त्र-शस्त्र ही देखा। सब अपने-अपने मनमें सोचने लगे कि यह बहुत ही भयानक अपशकुन हुआ है!
दसमुख देखि सभा भय पाई। बिहसि बचन कह जुगुति बनाई॥सिरउ गिरे संतत सुभ जाही। मुकुट परे कस असगुन ताही॥॥२॥
सभाको भयभीत देखकर रावणने हँसते हुए युक्ति गढ़कर कहा—जिसके लिये सिर कटना भी सदा शुभ ही रहा है, उसके लिये मुकुटका गिरना भला अपशकुन कैसे हो सकता है?
सयन करहु निज निज गृह जाई। गवने भवन सकल सिर नाई॥मंदोदरी सोच उर बसेऊ। जब ते श्रवनपूर महि खसेऊ॥॥३॥
जाओ, अपने-अपने घर जाकर सो रहो—यह सुनकर सब सिर नवाकर अपने घर चले गये। पर जबसे कर्णफूल गिरा था, तबसे मन्दोदरीके मनमें चिन्ता बैठ गयी थी।
सजल नयन कह जुग कर जोरी। सुनहु प्रानपति बिनती मोरी॥कंत राम बिरोध परिहरहू। जानि मनुज जनि हठ मन धरहू॥॥४॥
आँखोंमें आँसू भरकर, दोनों हाथ जोड़कर वह बोली—हे प्राणनाथ! मेरी विनती सुनिये। श्रीरामसे यह विरोध छोड़ दीजिये, उन्हें साधारण मनुष्य समझकर हठ न कीजिये।
बिस्वरुप रघुबंस मनि करहु बचन बिस्वासु।लोक कल्पना बेद कर अंग अंग प्रति जासु॥॥१४॥
मेरे इन वचनोंपर विश्वास कीजिये कि रघुकुलशिरोमणि श्रीराम विश्वरूप हैं—यह सारा विश्व ही मानो उनके अंग-अंगमें बसा है, ऐसी वेदोंकी कल्पना है।
पद पाताल सीस अज धामा। अपर लोक अँग अँग बिश्रामा॥भृकुटि बिलास भयंकर काला। नयन दिवाकर कच घन माला॥॥१॥
पाताल उनका चरण है, ब्रह्मलोक सिर है, शेष सब लोक उनके भिन्न-भिन्न अंगोंमें बसे हैं। भयानक काल उनकी भौंहोंका चलना है, सूर्य नेत्र और बादल उनके केश हैं।
जासु घ्रान अस्विनीकुमारा। निसि अरु दिवस निमेष अपारा॥श्रवन दिसा दस बेद बखानी। मारुत स्वास निगम निज बानी॥॥२॥
अश्विनीकुमार उनकी नासिका हैं, रात-दिन उनकी अपार पलकें हैं। दसों दिशाएँ कान हैं—ऐसा वेद कहते हैं। वायु उनकी श्वास है और वेद स्वयं उनकी वाणी हैं।
अधर लोभ जम दसन कराला। माया हास बाहु दिगपाला॥आनन अनल अंबुपति जीहा। उतपति पालन प्रलय समीहा॥॥३॥
लोभ उनका अधर है, यमराज भयानक दाँत हैं, माया उनकी हँसी है, दिक्पाल भुजाएँ हैं। अग्नि मुख है, वरुण जीभ है, और सृष्टिकी उत्पत्ति-पालन-प्रलय ही उनकी लीला है।
रोम राजि अष्टादस भारा। अस्थि सैल सरिता नस जारा॥उदर उदधि अधगो जातना। जगमय प्रभु का बहु कलपना॥॥४॥
असंख्य वनस्पतियाँ उनकी रोमावली हैं, पर्वत हड्डियाँ हैं, नदियाँ नसोंका जाल हैं, समुद्र उनका पेट है और नरक उनकी निम्न इन्द्रियाँ। इस तरह प्रभु सम्पूर्ण जगत्रूप ही हैं, इससे अधिक कल्पना क्या की जाय!
अहंकार सिव बुद्धि अज मन ससि चित्त महान।मनुज बास सचराचर रूप राम भगवान॥॥१५(क)॥
शिव उनका अहंकार हैं, ब्रह्मा बुद्धि हैं, चन्द्रमा मन है और महान् विष्णु स्वयं चित्त हैं। उन्हीं सर्वव्यापी भगवानने श्रीरामके रूपमें मनुष्यरूप धारण किया है।
अस बिचारि सुनु प्रानपति प्रभु सन बयरु बिहाइ।प्रीति करहु रघुबीर पद मम अहिवात न जाइ॥॥१५(ख)॥
हे प्राणनाथ! ऐसा विचारकर प्रभुसे वैर छोड़िये और श्रीरघुवीरके चरणोंमें प्रेम कीजिये, जिससे मेरा सुहाग बना रहे।
बिहँसा नारि बचन सुनि काना। अहो मोह महिमा बलवाना॥नारि सुभाउ सत्य सब कहहीं। अवगुन आठ सदा उर रहहीं॥॥१॥
पत्नीकी बात कानोंसे सुनकर रावण खूब हँसा—अहो, मोहकी महिमा भी क्या बलवान है! स्त्रीका स्वभाव सचमुच ऐसा ही होता है, उसके हृदयमें सदा आठ अवगुण बसे रहते हैं—
साहस अनृत चपलता माया। भय अबिबेक असौच अदाया॥रिपु कर रूप सकल तें गावा। अति बिसाल भय मोहि सुनावा॥॥२॥
साहस, झूठ, चंचलता, छल, भय, अविवेक, अपवित्रता और निर्दयता। तूने शत्रुका इतना बड़ा रूप गा दिया और मुझे बड़ा भारी भय सुना दिया!
सो सब प्रिया सहज बस मोरें। समुझि परा प्रसाद अब तोरें॥जानिउँ प्रिया तोरि चतुराई। एहि बिधि कहहु मोरि प्रभुताई॥॥३॥
हे प्रिये! यह सारा विश्व तो स्वभावसे ही मेरे वशमें है, यह मुझे अब तेरी ही कृपासे समझमें आया। मैं तेरी चतुराई समझ गया—तू इसी बहाने मेरी प्रभुता बखान कर रही है।
तव बतकही गूढ़ मृगलोचनि। समुझत सुखद सुनत भय मोचनि॥मंदोदरि मन महुँ अस ठयऊ। पियहि काल बस मतिभ्रम भयऊ॥॥४॥
हे मृगनयनी! तेरी बातें बड़ी गूढ़ हैं, समझनेपर सुख देती हैं और सुननेमात्रसे भय दूर कर देती हैं। मन्दोदरीने मनमें समझ लिया कि पतिको कालवश बुद्धिभ्रम हो गया है।
एहि बिधि करत बिनोद बहु प्रात प्रगट दसकंध।सहज असंक लंकपति सभाँ गयउ मद अंध॥॥१६(क)॥
इस तरह बहुत विनोद करते-करते रावणको सबेरा हो गया। तब स्वभावसे ही निडर और मदमें अंधा लंकापति सभामें जा पहुँचा।
फूलह फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद।मूरुख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम॥॥१६(ख)॥
बादल भले ही अमृत-सा जल बरसायें, फिर भी बेत कभी फूलता-फलता नहीं। वैसे ही चाहे ब्रह्माके समान ज्ञानी गुरु भी मिल जायँ, तो भी मूर्खके हृदयमें ज्ञान नहीं जागता।
इहाँ प्रात जागे रघुराई। पूछा मत सब सचिव बोलाई॥कहहु बेगि का करिअ उपाई। जामवंत कह पद सिरु नाई॥॥१॥
उधर सुबेल पर्वतपर सबेरे श्रीरघुनाथ जागे और सब मन्त्रियोंको बुलाकर सलाह पूछी—शीघ्र बताओ, अब क्या उपाय किया जाय? जाम्बवानने चरणोंमें सिर नवाकर कहा—
सुनु सर्बग्य सकल उर बासी। बुधि बल तेज धर्म गुन रासी॥मंत्र कहउँ निज मति अनुसारा। दूत पठाइअ बालिकुमारा॥॥२॥
सर्वज्ञ, सबके हृदयमें बसनेवाले, बुद्धि-बल-तेज-धर्म और गुणोंकी राशि प्रभु! सुनिये, मैं अपनी मतिके अनुसार सलाह देता हूँ—बालिपुत्र अंगदको दूत बनाकर भेजा जाय।
नीक मंत्र सब के मन माना। अंगद सन कह कृपानिधाना॥बालितनय बुधि बल गुन धामा। लंका जाहु तात मम कामा॥॥३॥
यह सलाह सबके मनको भा गयी। कृपानिधान श्रीरामने अंगदसे कहा—हे बल-बुद्धि-गुणोंके धाम बालिपुत्र! तात, तुम मेरे कामके लिये लंका जाओ।
बहुत बुझाइ तुम्हहि का कहऊँ। परम चतुर मैं जानत अहऊँ॥काजु हमार तासु हित होई। रिपु सन करेहु बतकही सोई॥॥४॥
तुम्हें अधिक समझाकर क्या कहूँ, मैं जानता हूँ तुम परम चतुर हो। शत्रुसे वही बात करना जिससे हमारा काम बने और उसका भी भला हो।
प्रभु अग्या धरि सीस चरन बंदि अंगद उठेउ।सोइ गुन सागर ईस राम कृपा जा पर करहु॥॥१७(क)॥
प्रभुकी आज्ञा सिरपर धारण कर, चरणोंकी वन्दना करके अंगद उठे—हे भगवन्! आप जिसपर कृपा करें, वही गुणोंका सागर बन जाता है।
स्वयं सिद्ध सब काज नाथ मोहि आदरु दियउ।अस बिचारि जुबराज तन पुलकित हरषित हियउ॥॥१७(ख)॥
स्वामीके सब काम तो स्वयं ही सिद्ध हैं, यह तो प्रभुने मुझे आदर दिया है—यह सोचकर युवराज अंगदका शरीर पुलकित और हृदय हर्षसे भर गया।
बंदि चरन उर धरि प्रभुताई। अंगद चलेउ सबहि सिरु नाई॥प्रभु प्रताप उर सहज असंका। रन बाँकुरा बालिसुत बंका॥॥१॥
चरणोंकी वन्दना करके, प्रभुकी महिमा हृदयमें धारण करके अंगद सबको सिर नवाकर चल पड़े। प्रभुके प्रतापको हृदयमें लिये वे रणबाँके वीर बालिपुत्र स्वभावसे ही निर्भय हैं।
पुर पैठत रावन कर बेटा। खेलत रहा सो होइ गै भैंटा॥बातहिं बात करष बढ़ि आई। जुगल अतुल बल पुनि तरुनाई॥॥२॥
लंकामें प्रवेश करते ही रावणके पुत्रसे भेंट हो गयी, जो वहाँ खेल रहा था। बातों-ही-बातोंमें दोनोंमें ठन गयी, क्योंकि दोनों ही अतुल बलशाली और युवा थे।
तेहि अंगद कहुँ लात उठाई। गहि पद पटकेउ भूमि भवाँई॥निसिचर निकर देखि भट भारी। जहँ तहँ चले न सकहिं पुकारी॥॥३॥
उसने अंगदपर लात उठायी, अंगदने वही पैर पकड़कर उसे घुमाकर धरतीपर पटक दिया। यह देखकर राक्षसोंके समूह जहाँ-तहाँ भाग चले, डरके मारे पुकार भी न मचा सके।
एक एक सन मरमु न कहहीं। समुझि तासु बध चुप करि रहहीं॥भयउ कोलाहल नगर मझारी। आवा कपि लंका जेहिं जारी॥॥४॥
कोई किसीको असली बात नहीं बताता, सब उसकी मृत्यु समझकर चुप रह जाते हैं। पर नगरभरमें कोलाहल मच गया कि जिसने लंका जलायी थी, वही वानर फिर आ गया है।
अब धौं कहा करिहि करतारा। अति सभीत सब करहिं बिचारा॥बिनु पूछें मगु देहिं दिखाई। जेहि बिलोक सोइ जाइ सुखाई॥॥५॥
सब अत्यन्त भयभीत होकर सोचने लगे—अब पता नहीं विधाता क्या करेगा। वे बिना पूछे ही अंगदको राह दिखाने लगे, जिसे भी वे देखते वही डरके मारे सूख जाता।
गयउ सभा दरबार तब सुमिरि राम पद कंज।सिंह ठवनि इत उत चितव धीर बीर बल पुंज॥॥१८॥
श्रीरामके चरणकमलोंका स्मरण करके अंगद रावणकी सभाके द्वारपर पहुँचे, और सिंहकी-सी चालमें, धीर-वीर और बलकी राशि अंगद इधर-उधर देखने लगे।
तुरत निसाचर एक पठावा। समाचार रावनहि जनावा॥सुनत बिहँसि बोला दससीसा। आनहु बोलि कहाँ कर कीसा॥॥१॥
तुरंत एक राक्षसको भेजकर रावणको उनके आनेकी सूचना दी गयी। यह सुनकर रावण हँसकर बोला—बुला लाओ, देखें कहाँका बंदर है।
आयसु पाइ दूत बहु धाए। कपिकुंजरहि बोलि लै आए॥अंगद दीख दसानन बैंसें। सहित प्रान कज्जलगिरि जैसें॥॥२॥
आज्ञा पाकर बहुत-से दूत दौड़े और वानरोंमें गजराजके समान अंगदको बुला लाये। अंगदने रावणको ऐसे बैठा देखा मानो कोई सजीव काजलका पहाड़ हो।
भुजा बिटप सिर सृंग समाना। रोमावली लता जनु नाना॥मुख नासिका नयन अरु काना। गिरि कंदरा खोह अनुमाना॥॥३॥
उसकी भुजाएँ वृक्षोंके और सिर पर्वत-शिखरोंके समान थे, रोमावली मानो अनेक लताएँ थीं। मुँह, नाक, नेत्र और कान पर्वतकी गुफा-कन्दराओंके समान जान पड़ते थे।
गयउ सभाँ मन नेकु न मुरा। बालितनय अतिबल बाँकुरा॥उठे सभासद कपि कहुँ देखी। रावन उर भा क्रोध बिसेषी॥॥४॥
अत्यन्त बलवान बालिपुत्र अंगद मनमें तनिक भी झिझके बिना सभामें चले गये। उन्हें देखते ही सब सभासद उठ खड़े हुए, यह देखकर रावणके हृदयमें बड़ा क्रोध भर आया।
जथा मत्त गज जूथ महुँ पंचानन चलि जाइ।राम प्रताप सुमिरि मन बैठ सभाँ सिरु नाइ॥॥१९॥
जैसे मतवाले हाथियोंके झुंडमें सिंह निर्भय होकर चला जाता है, वैसे ही श्रीरामके प्रतापका मनमें स्मरण करते हुए अंगद निडर होकर सभामें सिर नवाकर बैठ गये।
कह दसकंठ कवन तें बंदर। मैं रघुबीर दूत दसकंधर॥मम जनकहि तोहि रही मिताई। तव हित कारन आयउँ भाई॥॥१॥
रावणने कहा—अरे बंदर, तू कौन है? अंगदने कहा—हे दशग्रीव! मैं श्रीरघुवीरका दूत हूँ। मेरे पितासे तुम्हारी मित्रता थी, इसीलिये हे भाई! मैं तुम्हारे ही भलेके लिये आया हूँ।
उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती। सिव बिरंचि पूजेहु बहु भाँती॥बर पायहु कीन्हेहु सब काजा। जीतेहु लोकपाल सब राजा॥॥२॥
तुम्हारा कुल उत्तम है, तुम पुलस्त्य ऋषिके पौत्र हो। शिव-ब्रह्माकी तुमने बहुत आराधना की है, वर पाये हैं, सब काम सिद्ध किये हैं और लोकपालों-राजाओंको जीत लिया है।
नृप अभिमान मोह बस किंबा। हरि आनिहु सीता जगदंबा॥अब सुभ कहा सुनहु तुम्ह मोरा। सब अपराध छमिहि प्रभु तोरा॥॥३॥
राजमद या मोहवश तुमने जगज्जननी सीताको हर लिया है। अब मेरी हितकी बात सुनो, इसे मानोगे तो प्रभु तुम्हारे सब अपराध क्षमा कर देंगे।
दसन गहहु तृन कंठ कुठारी। परिजन सहित संग निज नारी॥सादर जनकसुता करि आगें। एहि बिधि चलहु सकल भय त्यागें॥॥४॥
दाँतोंमें तिनका दबाकर, गलेमें कुल्हाड़ी डालकर, कुटुम्बियों और अपनी पत्नियोंसहित, जानकीजीको आदरपूर्वक आगे करके, सब भय त्यागकर इस तरह चलो—
प्रनतपाल रघुबंसमनि त्राहि त्राहि अब मोहि।आरत गिरा सुनत प्रभु अभय करैगो तोहि॥॥२०॥
और कहो—हे शरणागतपालक रघुवंशशिरोमणि! अब मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। यह आर्त पुकार सुनते ही प्रभु तुम्हें निर्भय कर देंगे।
रे कपिपोत बोलु संभारी। मूढ़ न जानेहि मोहि सुरारी॥कहु निज नाम जनक कर भाई। केहि नातें मानिऐ मिताई॥॥१॥
रावणने कहा—अरे बंदरके बच्चे! सँभलकर बोल, मूर्ख! मुझ देवशत्रुको तूने पहचाना नहीं? अपना और अपने पिताका नाम बता, किस नातेसे मित्रता जताता है?
अंगद नाम बालि कर बेटा। तासों कबहुँ भई ही भेटा॥अंगद बचन सुनत सकुचाना। रहा बालि बानर मैं जाना॥॥२॥
अंगदने कहा—मेरा नाम अंगद है, मैं बालिका पुत्र हूँ, कभी तुम्हारी उनसे भेंट हुई थी? यह सुनते ही रावण कुछ सकुचाया—हाँ, मुझे याद आया, बालि नामका एक वानर था।
अंगद तहीं बालि कर बालक। उपजेहु बंस अनल कुल घालक॥गर्भ न गयहु ब्यर्थ तुम्ह जायहु। निज मुख तापस दूत कहायहु॥॥३॥
अरे अंगद! तू ही बालिका पुत्र है? अरे कुलनाशक! तू तो अपने ही कुलके लिये आगकी लपट बनकर जन्मा है। तू गर्भमें ही क्यों नहीं मर गया, व्यर्थ ही पैदा हुआ जो अपने मुँहसे तपस्वियोंका दूत कहलाया!
अब कहु कुसल बालि कहँ अहई। बिहँसि बचन तब अंगद कहई॥दिन दस गए बालि पहिं जाई। बूझेहु कुसल सखा उर लाई॥॥४॥
अब बता, बालि कहाँ है और कैसा है? अंगदने हँसकर कहा—कुछ दिन बीतनेपर स्वयं ही बालिके पास जाकर, अपने मित्रको हृदयसे लगाकर, उसीसे कुशल पूछ लेना।
राम बिरोध कुसल जसि होई। सो सब तोहि सुनाइहि सोई॥सुनु सठ भेद होइ मन ताकें। श्रीरघुबीर हृदय नहिं जाकें॥॥५॥
श्रीरामसे विरोध करनेपर जैसी कुशल मिलती है, वह सब वे स्वयं तुम्हें बता देंगे। अरे मूर्ख! भेदनीति उसीके मनमें असर करती है जिसके हृदयमें श्रीरघुवीर नहीं बसते।
हम कुल घालक सत्य तुम्ह कुल पालक दससीस।अंधउ बधिर न अस कहहिं नयन कान तव बीस॥॥२१॥
यह सच है कि मैं कुलनाशक हूँ और हे रावण! तुम कुलरक्षक हो—अंधे-बहरे भी ऐसी बात नहीं कहते, जबकि तुम्हारे तो बीसों नेत्र और बीसों कान हैं!
सिव बिरंचि सुर मुनि समुदाई। चाहत जासु चरन सेवकाई॥तासु दूत होइ हम कुल बोरा। अइसिहुँ मति उर बिहर न तोरा॥॥१॥
शिव-ब्रह्मा-देवता-मुनि सब जिनके चरणोंकी सेवा चाहते हैं, उन्हींका दूत होकर मैं कुल डुबो रहा हूँ? ऐसी बुद्धि रखते हुए भी तेरा हृदय फटता नहीं?
सुनि कठोर बानी कपि केरी। कहत दसानन नयन तरेरी॥खल तव कठिन बचन सब सहऊँ। नीति धर्म मैं जानत अहऊँ॥॥२॥
वानरकी यह कठोर वाणी सुनकर रावण आँखें तरेरकर बोला—अरे दुष्ट! मैं तेरे ये कड़वे वचन इसलिये सह रहा हूँ कि मैं नीति और धर्मको जानता हूँ।
कह कपि धर्मसीलता तोरी। हमहुँ सुनी कृत पर त्रिय चोरी॥देखी नयन दूत रखवारी। बूड़ि न मरहु धर्म ब्रतधारी॥॥३॥
अंगदने कहा—तुम्हारी यह धर्मशीलता तो मैंने भी सुनी है कि तुमने परायी स्त्रीकी चोरी की है, और दूतकी रक्षाकी बात भी अपनी आँखों देख ली—ऐसे धर्मव्रती तुम डूबकर मरते क्यों नहीं!
कान नाक बिनु भगिनि निहारी। छमा कीन्हि तुम्ह धर्म बिचारी॥धर्मसीलता तव जग जागी। पावा दरसु हमहुँ बड़भागी॥॥४॥
नाक-कान कटी बहनको देखकर तुमने बड़े धर्मसे विचारकर क्षमा कर दिया था न! तुम्हारी यह धर्मशीलता जगत्में विख्यात है, मैं भी बड़भागी हूँ कि तुम्हारा दर्शन पा गया।
जनि जल्पसि जड़ जंतु कपि सठ बिलोकु मम बाहु।लोकपाल बल बिपुल ससि ग्रसन हेतु सब राहु॥॥२२(क)॥
रावणने कहा—अरे जड़ वानर! व्यर्थ बकवास मत कर, मेरी भुजाएँ तो देख—ये सब लोकपालोंके विशाल बलरूपी चन्द्रमाको ग्रसनेवाले राहु हैं।
पुनि नभ सर मम कर निकर कमलन्हि पर करि बास।सोभत भयउ मराल इव संभु सहित कैलास॥॥२२(ख)॥
फिर मेरी भुजारूपी कमलोंपर बैठकर आकाशरूपी सरोवरमें शिवजीसहित कैलास पर्वत हंसकी तरह शोभा पा चुका है, यह भी सुन!
तुम्हरे कटक माझ सुनु अंगद। मो सन भिरिहि कवन जोधा बद॥तव प्रभु नारि बिरहँ बलहीना। अनुज तासु दुख दुखी मलीना॥॥१॥
सुन अंगद, मेरी सेनामें बता ऐसा कौन योद्धा है जो मुझसे भिड़ सके? तेरा स्वामी तो स्त्रीवियोगमें बलहीन पड़ा है, और उसका छोटा भाई भी उसीके शोकमें दुखी और उदास है।
तुम्ह सुग्रीव कूलद्रुम दोऊ। अनुज हमार भीरु अति सोऊ॥जामवंत मंत्री अति बूढ़ा। सो कि होइ अब समरारूढ़ा॥॥२॥
तू और सुग्रीव, दोनों तो नदी-तटके पेड़ हो। मेरा भाई विभीषण भी बड़ा डरपोक है, और मन्त्री जाम्बवान तो बहुत बूढ़ा है—वह भला अब युद्धमें क्या करेगा?
सिल्पि कर्म जानहिं नल नीला। है कपि एक महा बलसीला॥आवा प्रथम नगरु जेंहिं जारा। सुनत बचन कह बालिकुमारा॥॥३॥
नल-नील तो बस शिल्पकर्म जानते हैं, हाँ एक वानर जरूर बड़ा बलवान है जो पहले आकर नगर जला गया था। यह सुनते ही अंगदने कहा—
सत्य बचन कहु निसिचर नाहा। साँचेहुँ कीस कीन्ह पुर दाहा॥रावन नगर अल्प कपि दहई। सुनि अस बचन सत्य को कहई॥॥४॥
हे राक्षसराज! सच बताओ, क्या सचमुच उस वानरने तुम्हारा नगर जला दिया था? यह सुनकर भला कौन विश्वास करेगा कि तुम्हारे-जैसे विजयी योद्धाका नगर एक साधारण वानरने जला दिया!
जो अति सुभट सराहेहु रावन। सो सुग्रीव केर लघु धावन॥चलइ बहुत सो बीर न होई। पठवा खबरि लेन हम सोई॥॥५॥
जिस महान योद्धाकी तुमने इतनी प्रशंसा की, वह तो सुग्रीवका एक छोटा-सा दौड़नेवाला हरकारा भर है, जो खूब दौड़ सकता है पर वीर नहीं है—उसे तो हमने बस खबर लेनेके लिये भेजा था।
सत्य नगरु कपि जारेउ बिनु प्रभु आयसु पाइ।फिरि न गयउ सुग्रीव पहिं तेहिं भय रहा लुकाइ॥॥२३(क)॥
सचमुच वह वानर प्रभुकी आज्ञा पाये बिना ही तुम्हारा नगर जला गया, तभी तो डरके मारे लौटकर सुग्रीवके पास न जाकर कहीं छिप गया।
सत्य कहहि दसकंठ सब मोहि न सुनि कछु कोह।कोउ न हमारें कटक अस तो सन लरत जो सोह॥॥२३(ख)॥
तुम सब सच ही कहते हो, मुझे सुनकर तनिक भी क्रोध नहीं आता। सचमुच हमारी सेनामें कोई ऐसा नहीं जो तुमसे लड़नेमें शोभा पाये।
प्रीति बिरोध समान सन करिअ नीति असि आहि।जौं मृगपति बध मेड़ुकन्हि भल कि कहइ कोउ ताहि॥॥२३(ग)॥
प्रीति और वैर बराबरीवालेसे ही करना चाहिये, यही नीति है। यदि सिंह मेढकोंको मारे तो उसे भला कौन कहेगा?
जद्यपि लघुता राम कहुँ तोहि बधें बड़ दोष।तदपि कठिन दसकंठ सुनु छत्र जाति कर रोष॥॥२३(घ)॥
यद्यपि तुम्हें मारनेमें श्रीरामकी लघुता है और यह बड़ा दोष भी है, फिर भी हे रावण! सुनो, क्षत्रियका क्रोध बड़ा कठोर होता है।
बक्र उक्ति धनु बचन सर हृदय दहेउ रिपु कीस।प्रतिउत्तर सड़सिन्ह मनहुँ काढ़त भट दससीस॥हँसि बोलेउ दसमौलि तब कपि कर बड़ गुन एक।जो प्रतिपालइ तासु हित करइ उपाय अनेक॥॥२३(ङ)॥
वक्रोक्तिरूपी धनुषसे वचन-बाण चलाकर अंगदने शत्रुका हृदय जला दिया, मानो रावण उन बाणोंको प्रत्युत्तररूपी सँड़ासियोंसे खींच निकाल रहा हो। तब रावण हँसकर बोला—वानरमें यह एक बड़ा गुण तो है कि जो उसे पालता-पोसता है, वह उसीका सैकड़ों उपायोंसे हित करनेकी चेष्टा करता है।
धन्य कीस जो निज प्रभु काजा। जहँ तहँ नाचइ परिहरि लाजा॥नाचि कूदि करि लोग रिझाई। पति हित करइ धर्म निपुनाई॥॥१॥
वानर सचमुच धन्य है, जो अपने स्वामीके कामके लिये लाज छोड़कर जहाँ-तहाँ नाच लेता है। नाच-कूदकर, लोगोंको रिझाकर वह अपने स्वामीका हित करता है—यही तो उसके धर्मकी निपुणता है।
अंगद स्वामिभक्त तव जाती। प्रभु गुन कस न कहसि एहि भाँती॥मैं गुन गाहक परम सुजाना। तव कटु रटनि करउँ नहिं काना॥॥२॥
हे अंगद! तेरी जाति तो स्वामिभक्त है ही, फिर तू अपने स्वामीके गुण क्यों न गाये? मैं तो गुणग्राही और परम सुजान हूँ, इसीलिये तेरी जली-कटी बातोंपर ध्यान नहीं देता।
कह कपि तव गुन गाहकताई। सत्य पवनसुत मोहि सुनाई॥बन बिधंसि सुत बधि पुर जारा। तदपि न तेहिं कछु कृत अपकारा॥॥३॥
अंगदने कहा—तुम्हारी यह सच्ची गुणग्राहकता तो मुझे हनुमानने ही सुनायी थी—उसने तुम्हारा अशोकवन उजाड़ा, पुत्रको मारा और नगर जला दिया, फिर भी तुमने यही समझा कि उसने कुछ अपकार नहीं किया!
सोइ बिचारि तव प्रकृति सुहाई। दसकंधर मैं कीन्हि ढिठाई॥देखेउँ आइ जो कछु कपि भाषा। तुम्हरें लाज न रोष न माखा॥॥४॥
तुम्हारा यही सुन्दर स्वभाव समझकर, हे दशग्रीव! मैंने भी थोड़ी धृष्टता कर डाली। हनुमानने जो कुछ कहा था, वह आकर मैंने प्रत्यक्ष देख लिया—तुम्हें न लाज है, न क्रोध और न ही कोई चिढ़।
जौं असि मति पितु खाए कीसा। कहि अस बचन हँसा दससीसा॥पितहि खाइ खातेऊँ पुनि तोही। अबहीं समुझि परा कछु मोही॥॥५॥
रावण बोला—अरे वानर! तेरी ऐसी ही बुद्धि है तभी तो तू अपने पिताको खा गया! ऐसा कहकर रावण हँसा। अंगदने कहा—पिताको खाकर फिर तुम्हें भी खा जाता, पर अभी कुछ और ही बात समझमें आ गयी!
बालि बिमल जस भाजन जानी। हतउँ न तोहि अधम अभिमानी॥कहु रावन रावन जग केते। मैं निज श्रवन सुने सुनु जेते॥॥६॥
बालिके निर्मल यशका पात्र समझकर ही, अरे नीच अभिमानी! मैं तुझे नहीं मारता। रावण, यह तो बता कि जगत्में कितने रावण हैं—मैंने अपने कानों जितने रावण सुने हैं, उतने सुन ले।
बलिहि जितन एक गयउ पताला। राखेउ बाँधि सिसुन्ह हयसाला॥खेलहिं बालक मारहिं जाई। दया लागि बलि दीन्ह छोड़ाई॥॥७॥
एक रावण तो बलिको जीतने पातालमें गया था, वहाँ बच्चोंने उसे घुड़सालमें बाँध दिया था। बालक खेलते-खेलते जा-जाकर उसे मारते, फिर बलिको दया आ गयी तो उसे छुड़ा दिया।
एक बहोरि सहसभुज देखा। धाइ धरा जिमि जंतु बिसेषा॥कौतुक लागि भवन लै आवा। सो पुलस्ति मुनि जाइ छोड़ावा॥॥८॥
फिर एक रावणको सहस्रबाहुने देख लिया, और उसे किसी विचित्र जन्तुकी तरह दौड़कर पकड़ लिया। तमाशेके लिये वह उसे अपने घर ले आया, तब पुलस्त्य मुनिने जाकर उसे छुड़ाया।
एक कहत मोहि सकुच अति रहा बालि की काँख।इन्ह महुँ रावन तें कवन सत्य बदहि तजि माख॥॥२४॥
एक रावणकी बात कहते तो मुझे बड़ा संकोच होता है—वह बालिकी काँखमें दबा पड़ा रहा था। बता, इनमेंसे तू कौन-सा रावण है? क्रोध छोड़कर सच-सच बता।
सुनु सठ सोइ रावन बलसीला। हरगिरि जान जासु भुज लीला॥जान उमापति जासु सुराई। पूजेउँ जेहि सिर सुमन चढ़ाई॥॥१॥
रावणने कहा—अरे मूर्ख! सुन, मैं वही बलशाली रावण हूँ जिसकी भुजाओंकी लीला कैलास पर्वत जानता है, जिसकी वीरता स्वयं उमापति शिव जानते हैं, जिन्हें मैंने अपने सिरोंके फूल चढ़ा-चढ़ाकर पूजा था।
सिर सरोज निज करन्हि उतारी। पूजेउँ अमित बार त्रिपुरारी॥भुज बिक्रम जानहिं दिगपाला। सठ अजहूँ जिन्ह कें उर साला॥॥२॥
अपने ही हाथोंसे सिररूपी कमल उतार-उतारकर मैंने अनगिनत बार त्रिपुरारि शिवकी पूजा की है। अरे मूर्ख! मेरी भुजाओंका पराक्रम दिक्पाल जानते हैं, जिनके हृदयमें वह चोट आज भी चुभती है।
जानहिं दिग्गज उर कठिनाई। जब जब भिरउँ जाइ बरिआई॥जिन्ह के दसन कराल न फूटे। उर लागत मूलक इव टूटे॥॥३॥
दिग्गज मेरी छातीकी कठोरता जानते हैं, जब-जब मैं उनसे जबरदस्ती जा भिड़ा। उनके भयानक दाँत मेरी छातीमें कभी नहीं गड़े, बल्कि छूते ही मूलीकी तरह टूट गये।
जासु चलत डोलति इमि धरनी। चढ़त मत्त गज जिमि लघु तरनी॥सोइ रावन जग बिदित प्रतापी। सुनेहि न श्रवन अलीक प्रलापी॥॥४॥
मेरे चलनेसे धरती वैसे ही डोलती है जैसे मतवाले हाथीके चढ़नेसे छोटी नाव। मैं वही जगत्विख्यात प्रतापी रावण हूँ। अरे झूठा बकवादी! क्या तूने मेरा नाम कभी कानोंसे नहीं सुना?
तेहि रावन कहँ लघु कहसि नर कर करसि बखान।रे कपि बर्बर खर्ब खल अब जाना तव ग्यान॥॥२५॥
उस महान रावणको तू छोटा कहता है और एक मनुष्यकी बड़ाई करता है? अरे गँवार, तुच्छ, दुष्ट वानर! अब मैंने तेरी बुद्धि पहचान ली।
सुनि अंगद सकोप कह बानी। बोलु सँभारि अधम अभिमानी॥सहसबाहु भुज गहन अपारा। दहन अनल सम जासु कुठारा॥॥१॥
रावणके ये वचन सुनकर अंगद क्रोधसहित बोले—अरे नीच अभिमानी! सँभलकर बोल। जिनका फरसा सहस्रबाहुकी अपार भुजाओंको जलानेके लिये आगके समान था,
जासु परसु सागर खर धारा। बूड़े नृप अगनित बहु बारा॥तासु गर्ब जेहि देखत भागा। सो नर क्यों दससीस अभागा॥॥२॥
जिनके फरसारूपी समुद्रकी तीखी धारमें अनगिनत बड़े-बड़े राजा कई बार डूब चुके, और जिन परशुरामको देखते ही तेरा गर्व भाग खड़ा हुआ था—अरे अभागे दशशीश! वे भला मनुष्य कैसे हो सकते हैं?
राम मनुज कस रे सठ बंगा। धन्वी कामु नदी पुनि गंगा॥पसु सुरधेनु कल्पतरु रूखा। अन्न दान अरु रस पीयूषा॥॥३॥
अरे मूर्ख उद्दंड! श्रीराम मनुष्य कैसे हैं? क्या कामदेव भी धनुर्धर नहीं? क्या गंगा भी नदी नहीं? क्या कामधेनु भी पशु नहीं और कल्पवृक्ष भी वृक्ष नहीं? क्या अन्नदान भी दान नहीं और अमृत भी रस नहीं?
बैनतेय खग अहि सहसानन। चिंतामनि पुनि उपल दसानन॥सुनु मतिमंद लोक बैकुंठा। लाभ कि रघुपति भगति अकुंठा॥॥४॥
क्या गरुड़ भी पक्षी नहीं और शेषनाग भी सर्प नहीं? अरे रावण! क्या चिन्तामणि भी पत्थर नहीं? अरे मूर्ख! सुन, क्या वैकुंठ भी लोक नहीं और श्रीरघुनाथकी अखंड भक्ति भी और लाभोंकी तरह ही एक लाभ नहीं?
सेन सहित तब मान मथि बन उजारि पुर जारि।कस रे सठ हनुमान कपि गयउ जो तव सुत मारि॥॥२६॥
सेनासहित तेरा मान मथकर, अशोकवन उजाड़कर, नगर जलाकर और तेरे पुत्रको मारकर जो लौट गये, तू उनका कुछ भी न बिगाड़ सका—अरे दुष्ट! वे हनुमान क्या केवल एक वानर हैं?
सुनु रावन परिहरि चतुराई। भजसि न कृपासिंधु रघुराई॥जौं खल भएसि राम कर द्रोही। ब्रह्म रुद्र सक राखि न तोही॥॥१॥
अरे रावण! चतुराई छोड़कर सुन। कृपासागर श्रीरघुनाथका भजन क्यों नहीं करता? अरे दुष्ट! यदि तू श्रीरामका शत्रु बना रहा, तो तुझे ब्रह्मा और शिव भी नहीं बचा सकेंगे।
मूढ़ बृथा जनि मारसि गाला। राम बयर अस होइहि हाला॥तव सिर निकर कपिन्ह के आगें। परिहहिं धरनि राम सर लागें॥॥२॥
अरे मूर्ख! व्यर्थ डींग न हाँक। श्रीरामसे वैर करनेपर तेरा ऐसा हाल होगा कि तेरे सिरोंके ढेर उनके बाण लगते ही वानरोंके सामने धरतीपर लोटेंगे,
ते तव सिर कंदुक सम नाना। खेलहहिं भालु कीस चौगाना॥जबहिं समर कोपहि रघुनायक। छुटिहहिं अति कराल बहु सायक॥॥३॥
और रीछ-वानर तेरे उन गेंद-जैसे सिरोंसे मैदानमें चौगान खेलेंगे। जब श्रीरघुनाथ युद्धमें क्रुद्ध होंगे और उनके अत्यन्त भयानक बहुत-से बाण छूटेंगे,
तब कि चलिहि अस गाल तुम्हारा। अस बिचारि भजु राम उदारा॥सुनत बचन रावन परजरा। जरत महानल जनु घृत परा॥॥४॥
तब क्या तेरी यह डींग टिकेगी? ऐसा सोचकर उदार श्रीरामको भज। अंगदके ये वचन सुनकर रावण ऐसे जल उठा मानो जलती हुई प्रचंड आगमें घी पड़ गया हो।
कुंभकरन अस बंधु मम सुत प्रसिद्ध सक्रारि।मोर पराक्रम नहिं सुनेहि जितेउँ चराचर झारि॥॥२७॥
रावण बोला—अरे मूर्ख! कुम्भकर्ण-जैसा मेरा भाई है, और इन्द्रका शत्रु सुविख्यात मेघनाद मेरा पुत्र है। मेरा पराक्रम तो तूने सुना ही नहीं—मैंने सारे चराचर जगत्को जीत लिया है!
सठ साखामृग जोरि सहाई। बाँधा सिंधु इहइ प्रभुताई॥नाघहिं खग अनेक बारीसा। सूर न होहिं ते सुनु सब कीसा॥॥१॥
अरे दुष्ट! वानरोंकी सहायतासे समुद्र बँधवा लेना, बस यही रामकी प्रभुता है! समुद्रको तो अनेक पक्षी भी लाँघ जाते हैं, पर इससे वे सब शूरवीर नहीं बन जाते। अरे मूर्ख वानर! सुन—
मम भुज सागर बल जल पूरा। जहँ बूड़े बहु सुर नर सूरा॥बीस पयोधि अगाध अपारा। को अस बीर जो पाइहि पारा॥॥२॥
मेरी एक-एक भुजारूपी समुद्र बलरूपी जलसे भरा है, जिसमें बड़े-बड़े शूरवीर देवता और मनुष्य डूब चुके हैं। बता, ऐसा कौन वीर है जो मेरे इन अथाह बीस समुद्रोंको पार कर सके?
दिगपालन्ह मैं नीर भरावा। भूप सुजस खल मोहि सुनावा॥जौं पै समर सुभट तव नाथा। पुनि पुनि कहसि जासु गुन गाथा॥॥३॥
अरे दुष्ट! मैंने दिक्पालोंतकको जल भरवाने पर मजबूर किया, और तू मुझे एक साधारण राजाका यश सुनाता है! यदि तेरा स्वामी, जिसकी गुणगाथा तू बार-बार गाता है, सचमुच युद्धका योद्धा है—
तौ बसीठ पठवत केहि काजा। रिपु सन प्रीति करत नहिं लाजा॥हरगिरि मथन निरखु मम बाहू। पुनि सठ कपि निज प्रभुहि सराहू॥॥४॥
तो फिर वह दूत क्यों भेजता है? शत्रुसे सन्धिकी बात करते उसे लाज नहीं आती? पहले कैलास हिला देनेवाली मेरी भुजाओंको तो देख, फिर अरे मूर्ख वानर! अपने स्वामीकी बड़ाई करना।
सूर कवन रावन सरिस स्वकर काटि जेहिं सीस।हुने अनल अति हरष बहु बार साखि गौरीस॥॥२८॥
रावणके समान शूरवीर और कौन है, जिसने अपने ही हाथोंसे बार-बार सिर काटकर बड़े हर्षके साथ अग्निमें होम दिये! इस बातके साक्षी स्वयं गौरीपति शिव हैं।
जरत बिलोकेउँ जबहिं कपाला। बिधि के लिखे अंक निज भाला॥नर कें कर आपन बध बाँची। हसेउँ जानि बिधि गिरा असाँची॥॥१॥
सिर जलते समय जब मैंने अपने ललाटपर लिखे विधाताके अक्षर देखे और पढ़ा कि मेरी मृत्यु किसी मनुष्यके हाथों लिखी है, तो विधाताकी वाणीको झूठी समझकर मैं हँस पड़ा।
सोउ मन समुझि त्रास नहिं मोरें। लिखा बिरंचि जरठ मति भोरें॥आन बीर बल सठ मम आगें। पुनि पुनि कहसि लाज पति त्यागे॥॥२॥
उस बातको याद करके भी मेरे मनमें कोई डर नहीं, क्योंकि मैं मानता हूँ कि बूढ़े ब्रह्माने बुद्धिभ्रमवश ही ऐसा लिख दिया होगा। अरे मूर्ख! तू लाज-मर्यादा छोड़कर बार-बार मेरे सामने दूसरे वीरका बल क्यों बखानता है!
कह अंगद सलज्ज जग माहीं। रावन तोहि समान कोउ नाहीं॥लाजवंत तव सहज सुभाऊ। निज मुख निज गुन कहसि न काऊ॥॥३॥
अंगदने कहा—अरे रावण! तेरे समान लजीला जगत्में और कोई नहीं। लज्जा तो मानो तेरा सहज स्वभाव ही बन गयी है, तभी तो तू कभी अपने मुँहसे अपने गुण नहीं गाता।
सिर अरु सैल कथा चित रही। ताते बार बीस तें कही॥सो भुजबल राखेउ उर घाली। जीतेहु सहसबाहु बलि बाली॥॥४॥
सिर काटने और कैलास उठानेकी वही कथा तेरे चित्तपर चढ़ी रह गयी, इसीलिये तूने उसे बीसों बार दुहरा दिया। पर जिस भुजबलसे तूने सहस्रबाहु, बलि और बालिको जीता था, वह बल तो तूने चुपचाप हृदयमें ही दबा रखा है।
सुनु मतिमंद देहि अब पूरा। काटें सीस कि होइअ सूरा॥इंद्रजालि कहु कहिअ न बीरा। काटइ निज कर सकल सरीरा॥॥५॥
अरे मन्दबुद्धि! सुन, अब बस कर। क्या सिर काट लेनेभरसे कोई शूरवीर बन जाता है? इन्द्रजाल रचनेवालेको वीर नहीं कहा जाता, भले ही वह अपने ही हाथों अपना सारा शरीर काट डाले।
जरहिं पतंग मोह बस भार बहहिं खर बृंद।ते नहिं सूर कहावहिं समुझि देखु मतिमंद॥॥२९॥
पतंगे मोहवश आगमें जलकर मर जाते हैं, गधे बोझ लादकर चलते रहते हैं—पर इतनेभरसे वे शूरवीर नहीं कहलाते, अरे मन्दबुद्धि! जरा समझकर देख।
अब जनि बतबढ़ाव खल करही। सुनु मम बचन मान परिहरही॥दसमुख मैं न बसीठीं आयउँ। अस बिचारि रघुबीर पठायउँ॥॥१॥
अरे दुष्ट! अब बतबढ़ाव छोड़, मेरी बात सुन और अभिमान त्याग दे। हे दशमुख! मैं दूत बनकर सन्धि करने नहीं आया हूँ—श्रीरघुवीरने यह विचारकर ही मुझे भेजा है कि—
बार बार अस कहइ कृपाला। नहिं गजारि जसु बधें सृकाला॥मन महुँ समुझि बचन प्रभु केरे। सहेउँ कठोर बचन सठ तेरे॥॥२॥
कृपालु श्रीराम बार-बार यही कहते हैं कि सियारको मारनेसे सिंहको कोई यश नहीं मिलता। अरे मूर्ख! प्रभुके इन्हीं वचनोंको याद रखकर मैंने अभीतक तेरे कठोर वचन सह लिये हैं।
नाहिं त करि मुख भंजन तोरा। लै जातेउँ सीतहि बरजोरा॥जानेउँ तव बल अधम सुरारी। सूनें हरि आनिहि परनारी॥॥३॥
नहीं तो तेरा मुँह तोड़कर मैं सीताजीको जबरदस्ती लेकर चला जाता। अरे नीच, देवताओंके शत्रु! तेरा बल तो मैंने तभी जान लिया था जब तू सूने घरमें परायी स्त्रीको चुराकर ले आया।
तैं निसिचर पति गर्ब बहूता। मैं रघुपति सेवक कर दूता॥जौं न राम अपमानहि डरऊँ। तोहि देखत अस कौतुक करऊँ॥॥४॥
तू राक्षसराज होकर बड़ा अभिमानी है, पर मैं तो श्रीरघुनाथके सेवकका ही दूत हूँ। यदि मुझे श्रीरामके अपमानका डर न हो, तो तेरे देखते-देखते ऐसा तमाशा कर दिखाऊँ कि—
तोहि पटकि महि सेन हति चौपट करि तव गाउँ।तव जुबतिन्ह समेत सठ जनकसुतहि लै जाउँ॥॥३०॥
तुझे धरतीपर पटककर, तेरी सेनाका संहार करके और तेरा नगर उजाड़कर, अरे मूर्ख! तेरी युवतियोंसहित जानकीजीको लेकर चला जाऊँ।
जौं अस करौं तदपि न बड़ाई। मुएहि बधें नहिं कछु मनुसाई॥कौल कामबस कृपिन बिमूढ़ा। अति दरिद्र अजसी अति बूढ़ा॥॥१॥
पर ऐसा करूँ तो भी इसमें कोई बहादुरी नहीं—मरे हुएको मारनेमें भला कैसा पुरुषार्थ! वाममार्गी, कामी, कंजूस, अत्यन्त मूर्ख, गरीब, बदनाम और अत्यन्त बूढ़ा—
सदा रोगबस संतत क्रोधी। बिष्नु बिमुख श्रुति संत बिरोधी॥तनु पोषक निंदक अघ खानी। जीवन सव सम चौदह प्रानी॥॥२॥
सदा रोगी, निरन्तर क्रोधी, विष्णुसे विमुख, वेद-संतोंका विरोधी, केवल अपना ही शरीर पालनेवाला, दूसरोंकी निन्दा करनेवाला और पापकी खान—ऐसे चौदह प्रकारके मनुष्य जीते-जी मुर्देके समान होते हैं।
अस बिचारि खल बधउँ न तोही। अब जनि रिस उपजावसि मोही॥सुनि सकोप कह निसिचर नाथा। अधर दसन दसि मीजत हाथा॥॥३॥
अरे दुष्ट! यही सोचकर मैं तुझे नहीं मारता—अब तू मुझमें क्रोध मत जगा। यह सुनते ही रावण क्रोधित होकर, दाँतोंसे होंठ काटता और हाथ मलता हुआ बोला—
रे कपि अधम मरन अब चहसी। छोटे बदन बात बड़ि कहसी॥कटु जल्पसि जड़ कपि बल जाकें। बल प्रताप बुधि तेज न ताकें॥॥४॥
अरे नीच वानर! अब तू मरना ही चाहता है, तभी तो छोटे मुँह इतनी बड़ी बात कह रहा है! अरे मूर्ख! जिसके बलपर तू ऐसे कड़वे वचन बोल रहा है, उसमें न बल है, न प्रताप, न बुद्धि और न तेज।
अगुन अमान जानि तेहि दीन्ह पिता बनबास।सो दुख अरु जुबती बिरह पुनि निसि दिन मम त्रास॥॥३१(क)॥
उसे गुणहीन और मानहीन समझकर ही तो पिताने उसे वनवास दे दिया—उसे एक तो वही दुःख, फिर पत्नीके वियोगका शोक, और ऊपरसे रात-दिन मेरा भय बना रहता है।
जिन्ह के बल कर गर्ब तोहि अइसे मनुज अनेक।खाहीं निसाचर दिवस निसि मूढ़ समुझु तजि टेक॥॥३१(ख)॥
जिनके बलका तुझे इतना गर्व है, ऐसे अनगिनत मनुष्योंको तो राक्षस रोज दिन-रात खा जाते हैं। अरे मूर्ख! यह हठ छोड़कर जरा समझ।
जब तेहिं कीन्ह राम कै निंदा। क्रोधवंत अति भयउ कपिंदा॥हरि हर निंदा सुनइ जो काना। होइ पाप गोघात समाना॥॥१॥
जब रावणने श्रीरामकी निन्दा की, तब कपिश्रेष्ठ अंगद अत्यन्त क्रोधित हो उठे—क्योंकि जो कानोंसे विष्णु और शिवकी निन्दा सुनता है, उसे गोवधके समान पाप लगता है।
कटकटान कपिकुंजर भारी। दुहु भुजदंड तमकि महि मारी॥डोलत धरनि सभासद खसे। चले भाजि भय मारुत ग्रसे॥॥२॥
अंगद जोरसे कटकटाये और तमककर अपने दोनों भुजदंड धरतीपर दे मारे। धरती डोलने लगी, सभासद गिर पड़े और भयसे भागने लगे।
गिरत सँभारि उठा दसकंधर। भूतल परे मुकुट अति सुंदर॥कछु तेहिं लै निज सिरन्हि सँवारे। कछु अंगद प्रभु पास पबारे॥॥३॥
गिरते-गिरते सँभलकर रावण उठ खड़ा हुआ, पर उसके सुन्दर मुकुट धरतीपर बिखर गये। कुछ उसने उठाकर अपने सिरोंपर वापस रख लिये, और कुछ अंगदने उठाकर श्रीरामके पास फेंक दिये।
आवत मुकुट देखि कपि भागे। दिनहीं लूक परन बिधि लागे॥की रावन करि कोप चलाए। कुलिस चारि आवत अति धाए॥॥४॥
उड़ते मुकुटोंको आता देख वानर भाग खड़े हुए—सोचने लगे, यह क्या दिनमें ही उल्कापात होने लगा, या रावणने क्रोधमें आकर चार वज्र चला दिये जो वेगसे उड़े आ रहे हैं?
कह प्रभु हँसि जनि हृदयँ डेराहू। लूक न असनि केतु नहिं राहू॥ए किरीट दसकंधर केरे। आवत बालितनय के प्रेरे॥॥५॥
प्रभुने हँसकर कहा—मनमें डरो मत, ये न उल्का हैं, न वज्र, न केतु और न राहु—ये तो रावणके मुकुट हैं, जो बालिपुत्र अंगदके फेंकनेसे उड़े आ रहे हैं।
तरकि पवनसुत कर गहे आनि धरे प्रभु पास।कौतुक देखहिं भालु कपि दिनकर सरिस प्रकास॥॥३२(क)॥
पवनपुत्र हनुमानने उछलकर उन्हें हाथोंमें थाम लिया और लाकर प्रभुके पास रख दिया। रीछ-वानर सूर्यके समान चमकते इस तमाशेको देखने लगे।
उहाँ सकोपि दसानन सब सन कहत रिसाइ।धरहु कपिहि धरि मारहु सुनि अंगद मुसुकाइ॥॥३२(ख)॥
उधर सभामें क्रोधित रावण सबसे रिसाकर कहने लगा—इस वानरको पकड़ो और पकड़कर मार डालो! यह सुनकर अंगद मुसकरा उठे।
एहि बिधि बेगि सुभट सब धावहु। खाहु भालु कपि जहँ जहँ पावहु॥मर्कटहीन करहु महि जाई। जिअत धरहु तापस द्वौ भाई॥॥१॥
फिर रावणने कहा—इसे मारकर सब योद्धा तुरंत दौड़ो, जहाँ-कहीं रीछ-वानर मिलें वहीं खा डालो, धरतीको वानरोंसे खाली कर दो और उन दोनों तपस्वी भाइयोंको जीते-जी पकड़ लाओ।
पुनि सकोप बोलेउ जुबराजा। गाल बजावत तोहि न लाजा॥मरु गर काटि निलज कुलघाती। बल बिलोकि बिहरति नहिं छाती॥॥२॥
यह सुनकर युवराज अंगद क्रोधित होकर बोले—डींग हाँकते तुझे लाज नहीं आती! अरे निर्लज्ज कुलघाती! गला काटकर मर जा—मेरा बल देखकर भी क्या तेरी छाती नहीं फटती?
रे त्रिय चोर कुमारग गामी। खल मल रासि मंदमति कामी॥सन्यपात जल्पसि दुर्बादा। भएसि कालबस खल मनुजादा॥॥३॥
अरे स्त्रीके चोर, कुमार्गगामी! अरे दुष्ट, पापोंकी राशि, मंदबुद्धि और कामी! तू सन्निपातके रोगीकी तरह क्या बकवास कर रहा है? अरे नराधम! तू कालके वश हो गया है!
याको फलु पावहिगो आगें। बानर भालु चपेटन्हि लागें॥रामु मनुज बोलत असि बानी। गिरहिं न तव रसना अभिमानी॥॥४॥
इसका फल तुझे आगे वानर-भालुओंके थप्पड़ पड़नेपर मिलेगा। श्रीरामको मनुष्य कहते हुए, अरे अभिमानी! तेरी जीभ जमीनपर गिर क्यों नहीं पड़ती?
गिरिहहिं रसना संसय नाहीं। सिरन्हि समेत समर महि माहीं॥॥५॥
इसमें कोई सन्देह नहीं कि तेरी जीभें सिरोंके साथ ही रणभूमिमें गिरेंगी।
सो नर क्यों दसकंध बालि बध्यो जेहिं एक सर।बीसहुँ लोचन अंध धिग तव जन्म कुजाति जड़॥॥३३(क)॥
अरे दशकंठ! जिसने एक ही बाणसे बालिको मार गिराया, वह भला मनुष्य कैसे हो सकता है? अरे कुजाति, अरे जड़! तेरी बीसों आँखें होते हुए भी तू अंधा है, तेरे जन्मको धिक्कार है।
तब सोनित की प्यास तृषित राम सायक निकर।तजउँ तोहि तेहि त्रास कटु जल्पक निसिचर अधम॥॥३३(ख)॥
श्रीरामके बाणसमूह तेरे रक्तके प्यासे हैं। इसी डरसे, अरे कड़वी बकवास करनेवाले नीच राक्षस! मैं अभी तुझे छोड़े देता हूँ।
मै तव दसन तोरिबे लायक। आयसु मोहि न दीन्ह रघुनायक॥असि रिस होति दसउ मुख तोरौं। लंका गहि समुद्र महँ बोरौं॥॥१॥
मैं तो तेरे दाँत तोड़ देनेमें समर्थ हूँ, पर क्या करूँ, श्रीरघुनाथने मुझे आज्ञा नहीं दी। ऐसा क्रोध आता है कि तेरे दसों मुँह तोड़ डालूँ और लंकाको पकड़कर समुद्रमें डुबो दूँ।
गूलरि फल समान तव लंका। बसहु मध्य तुम्ह जंतु असंका॥मैं बानर फल खात न बारा। आयसु दीन्ह न राम उदारा॥॥२॥
तेरी लंका तो गूलरके फलके समान है, तुम सब उसमें कीड़ोंकी तरह निडर होकर बसते हो। मैं वानर हूँ, मुझे यह फल खाते क्या देर लगती? पर उदार श्रीरामने वैसी आज्ञा नहीं दी।
जुगुति सुनत रावन मुसुकाई। मूढ़ सिखिहि कहँ बहुत झुठाई॥बालि न कबहुँ गाल अस मारा। मिलि तपसिन्ह तें भएसि लबारा॥॥३॥
अंगदकी यह युक्ति सुनकर रावण मुसकराया—अरे मूर्ख! इतना झूठ बोलना तूने कहाँसे सीखा? बालिने तो कभी ऐसी डींग नहीं हाँकी, लगता है तपस्वियोंके साथ रहकर तू भी झूठा हो गया है।
साँचेहुँ मैं लबार भुज बीहा। जौं न उपारिउँ तव दस जीहा॥समुझि राम प्रताप कपि कोपा। सभा माझ पन करि पद रोपा॥॥४॥
अंगदने कहा—अरे बीस भुजावाले! यदि मैंने तेरी दसों जीभें न उखाड़ीं तो सचमुच मैं ही झूठा। श्रीरामके प्रतापका स्मरण करते ही अंगद क्रोधित हो उठे और रावणकी सभामें दृढ़ प्रतिज्ञा करके अपना पैर जमा दिया।
जौं मम चरन सकसि सठ टारी। फिरहिं रामु सीता मैं हारी॥सुनहु सुभट सब कह दससीसा। पद गहि धरनि पछारहु कीसा॥॥५॥
और कहा—अरे मूर्ख! यदि तू मेरा यह चरण हटा सके तो श्रीराम लौट जायँगे और मैं सीताजीको हारा हुआ मानूँगा। रावणने कहा—हे वीरो! सुनो, इस वानरका पैर पकड़कर इसे धरतीपर पछाड़ दो।
इंद्रजीत आदिक बलवाना। हरषि उठे जहँ तहँ भट नाना॥झपटहिं करि बल बिपुल उपाई। पद न टरइ बैठहिं सिरु नाई॥॥६॥
इन्द्रजीत आदि अनेक बलवान योद्धा जोश भरकर उठे और पूरे बलसे कई उपाय करके झपटे, पर पैर टलता न देख सिर झुकाकर वापस अपनी जगह बैठ जाते हैं।
पुनि उठि झपटहीं सुर आराती। टरइ न कीस चरन एहि भाँती॥पुरुष कुजोगी जिमि उरगारी। मोह बिटप नहिं सकहिं उपारी॥॥७॥
देवताओंके शत्रु राक्षस फिर उठकर झपटते हैं, पर अंगदका चरण उसी तरह नहीं टलता जैसे कुयोगी पुरुष मोहरूपी वृक्षको उखाड़ नहीं पाते।
कोटिन्ह मेघनाद सम सुभट उठे हरषाइ।झपटहिं टरै न कपि चरन पुनि बैठहिं सिर नाइ॥॥३४(क)॥
मेघनादके समान बलशाली करोड़ों योद्धा हर्षित होकर उठे, बार-बार झपटे, पर वानरका चरण टला नहीं, अंततः लज्जित होकर सिर झुकाकर बैठ गये।
भूमि न छाँडत कपि चरन देखत रिपु मद भाग।कोटि बिघ्न ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग॥॥३४(ख)॥
जैसे करोड़ों विघ्न आनेपर भी संतका मन नीतिको नहीं छोड़ता, वैसे ही अंगदका चरण धरतीको नहीं छोड़ता। यह देखकर रावणका सारा दर्प चूर-चूर हो गया।
कपि बल देखि सकल हियँ हारे। उठा आपु कपि कें परचारे॥गहत चरन कह बालिकुमारा। मम पद गहें न तोर उबारा॥॥१॥
अंगदका बल देखकर सब हृदयमें हार मान चुके थे, तब अंगदकी ललकारपर रावण स्वयं उठ खड़ा हुआ। जब वह उनका चरण पकड़ने लगा, तो बालिकुमारने कहा—मेरा पैर पकड़नेसे तेरा बचाव नहीं होगा।
गहसि न राम चरन सठ जाई। सुनत फिरा मन अति सकुचाई॥भयउ तेजहत श्री सब गई। मध्य दिवस जिमि ससि सोहई॥॥२॥
अरे मूर्ख! जाकर श्रीरामके ही चरण क्यों नहीं पकड़ता? यह सुनते ही रावण मनमें बहुत सकुचाकर लौट गया, उसकी सारी शोभा जाती रही, वह वैसे ही तेजहीन दिखा जैसे दोपहरमें चन्द्रमा फीका पड़ जाता है।
सिंघासन बैठेउ सिर नाई। मानहुँ संपति सकल गँवाई॥जगदातमा प्रानपति रामा। तासु बिमुख किमि लह बिश्रामा॥॥३॥
वह सिर झुकाये सिंहासनपर जा बैठा, मानो सारी सम्पत्ति गँवा चुका हो। जगत्की आत्मा और प्राणोंके स्वामी श्रीरामसे विमुख रहनेवाला भला शान्ति कैसे पा सकता है?
उमा राम की भृकुटि बिलासा। होइ बिस्व पुनि पावइ नासा॥तृन ते कुलिस कुलिस तृन करई। तासु दूत पन कहु किमि टरई॥॥४॥
शिवजी कहते हैं—हे उमा! जिनकी भौंहके इशारेभरसे विश्व उत्पन्न होकर फिर लीन हो जाता है, जो तिनकेको वज्र और वज्रको तिनका बना देते हैं, उनके दूतका प्रण भला कैसे टल सकता है?
पुनि कपि कही नीति बिधि नाना। मान न ताहि कालु निअराना॥रिपु मद मथि प्रभु सुजसु सुनायो। यह कहि चल्यो बालि नृप जायो॥॥५॥
अंगदने फिर अनेक प्रकारसे नीतिकी बातें कहीं, पर काल निकट आ जानेके कारण रावणने कुछ न माना। शत्रुका गर्व चूरकर, प्रभुका सुयश सुनाकर बालिपुत्र अंगद यह कहते हुए चल पड़े—
हतौं न खेत खेलाइ खेलाई। तोहि अबहिं का करौं बड़ाई॥प्रथमहिं तासु तनय कपि मारा। सो सुनि रावन भयउ दुखारा॥॥६॥
रणभूमिमें खेला-खेलाकर न मार दूँ तो अभीसे क्या डींग हाँकूँ! अंगदने सभामें आनेसे पहले ही उसके पुत्रको मार डाला था, यह समाचार सुनकर रावण बहुत दुखी हुआ।
जातुधान अंगद पन देखी। भय ब्याकुल सब भए बिसेषी॥॥७॥
अंगदकी प्रतिज्ञा सफल होते देख सब राक्षस अत्यन्त भयसे व्याकुल हो उठे।
रिपु बल धरषि हरषि कपि बालितनय बल पुंज।पुलक सरीर नयन जल गहे राम पद कंज॥॥३५(क)॥
शत्रुके बलको कुचलकर, बलकी राशि अंगद हर्षित होकर श्रीरामके चरणकमल पकड़ बैठे—उनका शरीर पुलकित था और नेत्रोंमें आनन्दके आँसू भरे थे।
साँझ जानि दसकंधर भवन गयउ बिलखाइ।मंदोदरी रावनहि बहुरि कहा समुझाइ॥॥३५(ख)॥
संध्या होते देख दशग्रीव उदास मनसे महलमें गया, तब मन्दोदरीने रावणको फिर समझाते हुए कहा—
कंत समुझि मन तजहु कुमतिही। सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही॥रामानुज लघु रेख खचाई। सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई॥॥१॥
हे प्रियतम! अब भी मन बदलकर कुबुद्धि छोड़ दीजिये, श्रीरघुनाथसे युद्ध करना आपको शोभा नहीं देता। उनके छोटे भाईने बस एक रेखा खींची थी, उसे भी आप न लाँघ सके—यही आपका पुरुषार्थ है!
पिय तुम्ह ताहि जितब संग्रामा। जाके दूत केर यह कामा॥कौतुक सिंधु नाघी तव लंका। आयउ कपि केहरी असंका॥॥२॥
हे प्रियतम! उन्हें आप युद्धमें कैसे जीतेंगे, जिनके दूतने ऐसा कारनामा किया—खेल-खेलमें समुद्र लाँघकर वह वानरसिंह हनुमान निडर होकर आपकी लंकामें चला आया था!
रखवारे हति बिपिन उजारा। देखत तोहि अच्छ तेहिं मारा॥जारि सकल पुर कीन्हेसि छारा। कहाँ रहा बल गर्ब तुम्हारा॥॥३॥
उसने रखवालोंको मारकर अशोकवन उजाड़ डाला, आपके देखते-देखते अक्षयकुमारको मार डाला और पूरे नगरको जलाकर राख कर दिया—उस समय आपका बलगर्व कहाँ चला गया था?
अब पति मृषा गाल जनि मारहु। मोर कहा कछु हृदयँ बिचारहु॥पति रघुपतिहि नृपति जनि मानहु। अग जग नाथ अतुल बल जानहु॥॥४॥
अब हे स्वामी! व्यर्थ डींग न हाँकिये, मेरी बात मानकर जरा मनमें विचार कीजिये। श्रीरघुनाथको साधारण राजा मत समझिये, वे तो चराचरके स्वामी और अतुलनीय बलवान हैं।
बान प्रताप जान मारीचा। तासु कहा नहिं मानेहि नीचा॥जनक सभाँ अगनित भूपाला। रहे तुम्हउ बल अतुल बिसाला॥॥५॥
मारीच-जैसा नीच भी श्रीरामके बाणका प्रताप जानता था, फिर भी आपने उसकी बात नहीं मानी। जनककी सभामें अनगिनत राजा थे, वहाँ अतुलनीय बल रखनेवाले आप भी उपस्थित थे,
भंजि धनुष जानकी बिआही। तब संग्राम जितेहु किन ताही॥सुरपति सुत जानइ बल थोरा। राखा जिअत आँखि गहि फोरा॥॥६॥
पर शिवका धनुष तोड़कर श्रीरामने जानकीसे विवाह किया, तब आपने उन्हें युद्धमें जीत क्यों नहीं लिया? इन्द्रपुत्र जयन्त उनके बलको कुछ-कुछ जानता है—श्रीरामने उसे पकड़कर केवल एक आँख फोड़ी और जीता छोड़ दिया।
सूपनखा के गति तुम्ह देखी। तदपि हृदयँ नहिं लाज बिसेषी॥॥७॥
शूर्पणखाकी दुर्दशा तो आपने स्वयं देखी, फिर भी आपके हृदयमें उनसे युद्ध करनेकी बात सोचकर तनिक भी लाज नहीं आती!
बधि बिराध खर दूषनहि लींलाँ हत्यो कबंध।बालि एक सर मारयो तेहि जानहु दसकंध॥॥३६॥
जिन्होंने विराध और खर-दूषणको मारकर लीलामात्रसे कबन्धका भी वध किया, और जिन्होंने बालिको एक ही बाणसे मार गिराया—हे दशकंठ! उन्हींको समझिये कि वे कौन हैं।
जेहिं जलनाथ बँधायउ हेला। उतरे प्रभु दल सहित सुबेला॥कारुनीक दिनकर कुल केतू। दूत पठायउ तव हित हेतू॥॥१॥
जिन्होंने खेल-खेलमें समुद्र बँधवा लिया और जो सेनासहित सुबेल पर्वतपर उतरे, उन्हीं सूर्यवंशके करुणामय शिरोमणिने आपके ही हितके लिये दूत भेजा था।
सभा माझ जेहिं तव बल मथा। करि बरूथ महुँ मृगपति जथा॥अंगद हनुमत अनुचर जाके। रन बाँकुरे बीर अति बाँके॥॥२॥
उसने बीच सभामें आकर आपके बलको वैसे ही मथ डाला जैसे हाथियोंके झुंडमें सिंह घुसकर सबको तितर-बितर कर देता है। अंगद और हनुमान-जैसे विकट वीर जिनके सेवक हैं,
तेहि कहँ पिय पुनि पुनि नर कहहू। मुधा मान ममता मद बहहू॥अहह कंत कृत राम बिरोधा। काल बिबस मन उपज न बोधा॥॥३॥
उन्हें आप बार-बार मनुष्य कहते हैं! व्यर्थ ही मान-ममता और मदका बोझ ढो रहे हैं। हाय प्रियतम! आपने श्रीरामसे विरोध मोल ले लिया, और कालके वशीभूत होनेके कारण आपके मनमें अब भी सद्बुद्धि नहीं जागती।
काल दंड गहि काहु न मारा। हरइ धर्म बल बुद्धि बिचारा॥निकट काल जेहि आवत साईं। तेहि भ्रम होइ तुम्हारिहि नाईं॥॥४॥
काल किसीको लाठी लेकर नहीं मारता, वह तो धर्म, बल, बुद्धि और विवेक ही हर लेता है। हे स्वामी! जिसका अन्तकाल निकट आता है, उसे आपकी ही तरह भ्रम हो जाता है।
दुइ सुत मरे दहेउ पुर अजहुँ पूर पिय देहु।कृपासिंधु रघुनाथ भजि नाथ बिमल जसु लेहु॥॥३७॥
आपके दो पुत्र मारे गये, नगर जल गया, फिर भी अब तो इस भूलको पूरा कर दीजिये—हे नाथ! कृपासागर श्रीरघुनाथको भजकर निर्मल यश पाइये।
नारि बचन सुनि बिसिख समाना। सभाँ गयउ उठि होत बिहाना॥बैठ जाइ सिंघासन फूली। अति अभिमान त्रास सब भूली॥॥१॥
पत्नीके बाणसदृश वचन सुनकर वह सबेरा होते ही उठकर सभामें गया और सारा भय भुलाकर अत्यन्त अभिमानमें फूला हुआ सिंहासनपर जा बैठा।
इहाँ राम अंगदहि बोलावा। आइ चरन पंकज सिरु नावा॥अति आदर समीप बैठारी। बोले बिहँसि कृपाल खरारी॥॥२॥
उधर सुबेल पर्वतपर श्रीरामने अंगदको बुलाया। उन्होंने आकर चरणकमलोंमें सिर नवाया, कृपालु खरारि श्रीरामने बड़े आदरसे उन्हें पास बिठाकर हँसते हुए कहा—
बालितनय कौतुक अति मोही। तात सत्य कहु पूछउँ तोही॥रावनु जातुधान कुल टीका। भुज बल अतुल जासु जग लीका॥॥३॥
हे बालिपुत्र! मुझे बड़ा कौतूहल है, तात, इसीलिये पूछता हूँ, सच बताना। राक्षसकुलका तिलक रावण, जिसके अतुलनीय बाहुबलकी जगत्भरमें धाक है,
तासु मुकुट तुम्ह चारि चलाए। कहहु तात कवनी बिधि पाए॥सुनु सर्बग्य प्रनत सुखकारी। मुकुट न होहिं भूप गुन चारी॥॥४॥
उसके चार मुकुट तुमने फेंके, बताओ तात, वे तुम्हें कैसे मिले? अंगदने कहा—हे सर्वज्ञ, हे शरणागतवत्सल! सुनिये, वे मुकुट नहीं थे, वे तो राजाके चार गुण थे—
साम दान अरु दंड बिभेदा। नृप उर बसहिं नाथ कह बेदा॥नीति धर्म के चरन सुहाए। अस जियँ जानि नाथ पहिं आए॥॥५॥
साम, दान, दंड और भेद—वेद कहते हैं ये चारों राजाके हृदयमें बसते हैं, ये नीति-धर्मके सुन्दर चरण हैं। पर रावणमें इनका अभाव जानकर ये गुण आपके पास चले आये हैं।
धर्महीन प्रभु पद बिमुख काल बिबस दससीस।तेहि परिहरि गुन आए सुनहु कोसलाधीस॥॥३८(क)॥
धर्महीन, प्रभुके चरणोंसे विमुख और कालके वशमें पड़े दशमुखको छोड़कर, हे कोसलाधीश! सुनिये, वे गुण अब आपके ही पास आ गये हैं।
परम चतुरता श्रवन सुनि बिहँसे रामु उदार।समाचार पुनि सब कहे गढ़ के बालिकुमार॥॥३८(ख)॥
अंगदकी यह अद्भुत चतुराई सुनकर उदार श्रीराम हँस पड़े, फिर बालिपुत्रने लंकाके सारे समाचार विस्तारसे कह सुनाये।
रिपु के समाचार जब पाए। राम सचिव सब निकट बोलाए॥लंका बाँके चारि दुआरा। केहि बिधि लागिअ करहु बिचारा॥॥१॥
शत्रुके समाचार मिलते ही श्रीरामने सब मन्त्रियोंको बुलाया—लंकाके चार बड़े विकट द्वार हैं, इनपर कैसे आक्रमण किया जाय, इसपर विचार करो।
तब कपीस रिच्छेस बिभीषन। सुमिरि हृदयँ दिनकर कुल भूषन॥करि बिचार तिन्ह मंत्र दृढ़ावा। चारि अनी कपि कटकु बनावा॥॥२॥
तब सुग्रीव, जाम्बवान और विभीषणने हृदयमें सूर्यवंशभूषण श्रीरामका स्मरण करके विचार-विमर्श किया और वानरसेनाके चार दल बना दिये।
जथाजोग सेनापति कीन्हे। जूथप सकल बोलि तब लीन्हे॥प्रभु प्रताप कहि सब समुझाए। सुनि कपि सिंघनाद करि धाए॥॥३॥
यथायोग्य सेनापति नियुक्त करके सब यूथपतियोंको बुलाया गया, और प्रभुका प्रताप सुनाकर सबको समझाया गया, जिसे सुनते ही वानर सिंहगर्जना करते हुए दौड़ पड़े।
हरषित राम चरन सिर नावहिं। गहि गिरि सिखर बीर सब धावहिं॥गर्जहिं तर्जहिं भालु कपीसा। जय रघुबीर कोसलाधीसा॥॥४॥
वे हर्षित होकर श्रीरामके चरणोंमें सिर नवाते हैं और पर्वत-शिखर उठाये सब वीर दौड़ते हैं—"कोसलाधीश श्रीरघुवीरकी जय" पुकारते हुए भालू-वानर गरजते-ललकारते हैं।
जानत परम दुर्ग अति लंका। प्रभु प्रताप कपि चले असंका॥घटाटोप करि चहुँ दिसि घेरी। मुखहिं निसान बजावहीं भेरी॥॥५॥
लंकाको अत्यन्त दुर्गम किला जानते हुए भी वानर प्रभुके प्रतापपर निर्भर होकर निडर आगे बढ़े, और बादलोंकी घटाकी तरह उन्होंने लंकाको चारों ओरसे घेरकर मुँहसे ही नगाड़े-भेरी बजानी शुरू कर दी।
जयति राम जय लछिमन जय कपीस सुग्रीव।गर्जहिं सिंघनाद कपि भालु महा बल सींव॥॥३९॥
श्रीरामकी जय, लक्ष्मणकी जय, वानरराज सुग्रीवकी जय—महान बलकी सीमा वे रीछ-वानर सिंहकी तरह गरज-गरजकर ऐसी जय-जयकार करने लगे।
लंकाँ भयउ कोलाहल भारी। सुना दसानन अति अहँकारी॥देखहु बनरन्ह केरि ढिठाई। बिहँसि निसाचर सेन बोलाई॥॥१॥
लंकामें भारी कोलाहल मच गया, अहंकारी रावणने यह सुनकर कहा—वानरोंकी यह ढिठाई तो देखो! ऐसा कहते हुए उसने हँसकर राक्षससेनाको बुला लिया।
आए कीस काल के प्रेरे। छुधावंत सब निसिचर मेरे॥अस कहि अट्टहास सठ कीन्हा। गृह बैठे अहार बिधि दीन्हा॥॥२॥
कहा—ये वानर कालकी प्रेरणासे चले आये हैं, मेरे राक्षस सब भूखे हैं, विधाताने इन्हें घर बैठे भोजन भेज दिया! ऐसा कहकर उस मूर्खने जोरका अट्टहास किया।
सुभट सकल चारिहुँ दिसि जाहू। धरि धरि भालु कीस सब खाहू॥उमा रावनहि अस अभिमाना। जिमि टिट्टिभ खग सूत उताना॥॥३॥
सब योद्धाओ! चारों दिशाओंमें जाओ और रीछ-वानरोंको पकड़-पकड़कर खाओ—शिवजी कहते हैं, हे उमा! रावणको ऐसा अभिमान था जैसे टिटिहरी पक्षी पैर ऊपर करके सोता है, मानो आकाशको थाम रखा हो।
चले निसाचर आयसु मागी। गहि कर भिंडिपाल बर साँगी॥तोमर मुग्दर परसु प्रचंडा। सूल कृपान परिघ गिरिखंडा॥॥४॥
आज्ञा माँगकर राक्षस हाथोंमें उत्तम भिंदिपाल, साँगी, तोमर, मुद्गर, प्रचंड फरसे, त्रिशूल, दुधारी तलवार, परिघ और पहाड़ोंके टुकड़े लेकर निकल पड़े।
जिमि अरुनोपल निकर निहारी। धावहिं सठ खग मांस अहारी॥चोंच भंग दुख तिन्हहि न सूझा। तिमि धाए मनुजाद अबूझा॥॥५॥
जैसे मूर्ख मांसाहारी पक्षी लाल पत्थरोंके ढेरको मांस समझकर उसपर झपटते हैं, बिना यह सोचे कि इससे उनकी चोंच टूट जायगी—वैसे ही ये नासमझ राक्षस दौड़ पड़े।
नानायुध सर चाप धर जातुधान बल बीर।कोट कँगूरन्हि चढ़ि गए कोटि कोटि रनधीर॥॥४०॥
नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र और धनुष-बाण थामे बलवान और रणधीर राक्षस वीरोंकी करोड़ोंकी संख्या परकोटेके कँगूरोंपर चढ़ गयी।
कोट कँगूरन्हि सोहहिं कैसे। मेरु के सृंगनि जनु घन बैसे॥बाजहिं ढोल निसान जुझाऊ। सुनि धुनि होइ भटन्हि मन चाऊ॥॥१॥
वे परकोटेके कँगूरोंपर ऐसे शोभित हो रहे हैं मानो सुमेरु पर्वतके शिखरोंपर बादल छाये हों। युद्धके ढोल-नगाड़े बज रहे हैं, जिनकी ध्वनि सुनते ही योद्धाओंके मनमें उत्साह उमड़ आता है।
बाजहिं भेरि नफीरि अपारा। सुनि कादर उर जाहिं दरारा॥देखिन्ह जाइ कपिन्ह के ठट्टा। अति बिसाल तनु भालु सुभट्टा॥॥२॥
असंख्य भेरी-नफीरी बज रही हैं, जिन्हें सुनकर कायरोंके हृदयमें दरारें पड़ जाती हैं। उन्होंने जाकर देखा—विशालकाय वानर-भालू योद्धाओंके समूह-के-समूह जमा हैं।
धावहिं गनहिं न अवघट घाटा। पर्बत फोरि करहिं गहि बाटा॥कटकटाहिं कोटिन्ह भट गर्जहिं। दसन ओठ काटहिं अति तर्जहिं॥॥३॥
रीछ-वानर दौड़ते हैं, ऊँची-नीची विकट घाटियोंकी परवाह नहीं करते, पर्वतोंको फोड़-फोड़कर रास्ता बना लेते हैं। करोड़ों योद्धा कटकटाते-गरजते हैं, दाँतोंसे होंठ काटकर खूब डपटते हैं।
उत रावन इत राम दोहाई। जयति जयति जय परी लराई॥निसिचर सिखर समूह ढहावहिं। कूदि धरहिं कपि फेरि चलावहिं॥॥४॥
उधर रावणकी और इधर श्रीरामकी दुहाई गूँज उठी, जय-जयकारके साथ ही युद्ध छिड़ गया। राक्षस पहाड़ोंके ढेरके ढेर शिखर फेंकते हैं, वानर उन्हें बीचमें ही कूदकर पकड़ लेते हैं और वापस उन्हींकी ओर फेंक देते हैं।
धरि कुधर खंड प्रचंड मर्कट भालु गढ़ पर डारहीं।झपटहिं चरन गहि पटकि महि भजि चलत बहुरि पचारहीं॥अति तरल तरुन प्रताप तरपहिं तमकि गढ़ चढ़ि चढ़ि गए।कपि भालु चढ़ि मंदिरन्ह जहँ तहँ राम जसु गावत भए॥
प्रचंड वानर-भालू पर्वतोंके टुकड़े उठाकर किलेपर पटकते हैं, झपटकर राक्षसोंके पैर पकड़ते हैं, उन्हें धरतीपर पछाड़कर भाग निकलते हैं और फिर ललकारते हैं। बड़े चंचल और तेजस्वी वानर-भालू फुर्तीसे उछल-उछलकर किलेपर चढ़ गये और महलों-महलोंमें घुसकर जहाँ-तहाँ श्रीरामका यशगान करने लगे।
एकु एकु निसिचर गहि पुनि कपि चले पराइ।ऊपर आपु हेठ भट गिरहिं धरनि पर आइ॥॥४१॥
फिर एक-एक राक्षसको पकड़कर वानर भाग चले—ऊपर वानर और नीचे राक्षस योद्धा, इस तरह वे किलेसे धरतीपर आ गिरते हैं।
राम प्रताप प्रबल कपिजूथा। मर्दहिं निसिचर सुभट बरूथा॥चढ़े दुर्ग पुनि जहँ तहँ बानर। जय रघुबीर प्रताप दिवाकर॥॥१॥
श्रीरामके प्रतापसे बलशाली वानरोंके झुंड राक्षस योद्धाओंके समूहोंको मसल रहे हैं। वानर फिर जहाँ-तहाँ किलेपर चढ़ गये और सूर्यके समान तेजस्वी श्रीरघुवीरकी जय बोलने लगे।
चले निसाचर निकर पराई। प्रबल पवन जिमि घन समुदाई॥हाहाकार भयउ पुर भारी। रोवहिं बालक आतुर नारी॥॥२॥
राक्षसोंके झुंड ऐसे भाग चले जैसे तेज हवा चलनेपर बादलोंके समूह बिखर जाते हैं। लंकामें भारी हाहाकार मच गया, बालक और घबरायी स्त्रियाँ रोने लगीं।
सब मिलि देहिं रावनहि गारी। राज करत एहिं मृत्यु हँकारी॥निज दल बिचल सुनी तेहिं काना। फेरि सुभट लंकेस रिसाना॥॥३॥
सब मिलकर रावणको कोसने लगे कि राज करते-करते इसने मृत्युको ही न्यौता दे दिया। जब रावणने सुना कि उसकी सेना भाग रही है, तो उसने भागते योद्धाओंको लौटाकर क्रोधसे कहा—
जो रन बिमुख सुना मैं काना। सो मैं हतब कराल कृपाना॥सर्बसु खाइ भोग करि नाना। समर भूमि भए बल्लभ प्राना॥॥४॥
जो कोई रणसे पीठ दिखाकर भागा सुनूँगा, उसे अपनी भयानक तलवारसे स्वयं मार डालूँगा! अरे, इतने दिनों मेरा सब-कुछ खाकर, तरह-तरहके भोग भोगकर, अब रणभूमिमें आकर प्राण प्यारे हो गये!
उग्र बचन सुनि सकल डेराने। चले क्रोध करि सुभट लजाने॥सन्मुख मरन बीर कै सोभा। तब तिन्ह तजा प्रान कर लोभा॥॥५॥
रावणके ये कठोर वचन सुनकर सब भयभीत हुए, फिर लज्जित होकर क्रोधसे युद्धकी ओर लौट पड़े—यह सोचकर कि शत्रुके सामने डटकर मरना ही वीरकी शोभा है, उन्होंने प्राणोंका मोह त्याग दिया।
बहु आयुध धर सुभट सब भिरहिं पचारि पचारि।ब्याकुल किए भालु कपि परिघ त्रिसूलन्हि मारी॥॥४२॥
तरह-तरहके अस्त्र-शस्त्र थामे सब वीर ललकार-ललकारकर भिड़ने लगे, और परिघ-त्रिशूलोंसे मार-मारकर रीछ-वानरोंको व्याकुल कर दिया।
भय आतुर कपि भागन लागे। जद्यपि उमा जीतिहहिं आगे॥कोउ कह कहँ अंगद हनुमंता। कहँ नल नील दुबिद बलवंता॥॥१॥
शिवजी कहते हैं—हे उमा! वानर भयसे घबराकर भागने लगे, यद्यपि आगे चलकर विजय उन्हींकी होनी थी। कोई पुकारता है—अंगद-हनुमान कहाँ हैं? बलवान नल-नील और द्विविद कहाँ हैं?
निज दल बिकल सुना हनुमाना। पच्छिम द्वार रहा बलवाना॥मेघनाद तहँ करइ लराई। टूट न द्वार परम कठिनाई॥॥२॥
हनुमानने जब सुना कि अपना दल विचलित हो गया है, तब वे स्वयं पश्चिम द्वारपर डटे थे, जहाँ मेघनाद उनसे युद्ध कर रहा था। वह द्वार टूट नहीं रहा था, बड़ी कठिनाई हो रही थी।
पवनतनय मन भा अति क्रोधा। गर्जेउ प्रबल काल सम जोधा॥कूदि लंक गढ़ ऊपर आवा। गहि गिरि मेघनाद कहुँ धावा॥॥३॥
पवनपुत्रके मनमें भारी क्रोध उमड़ आया, वे काल-जैसे योद्धा जोरसे गरजे और कूदकर लंकाके किलेपर जा चढ़े, फिर पर्वत उठाकर मेघनादकी ओर दौड़े।
भंजेउ रथ सारथी निपाता। ताहि हृदय महुँ मारेसि लाता॥दुसरें सूत बिकल तेहि जाना। स्यंदन घालि तुरत गृह आना॥॥४॥
उन्होंने उसका रथ तोड़ डाला, सारथिको मार गिराया और मेघनादकी छातीमें लात जमायी। दूसरा सारथि मेघनादको विकल देखकर उसे तुरंत रथमें डालकर घर ले गया।
अंगद सुना पवनसुत गढ़ पर गयउ अकेल।रन बाँकुरा बालिसुत तरकि चढ़ेउ कपि खेल॥॥४३॥
इधर अंगदने सुना कि पवनपुत्र किलेपर अकेले चढ़ गये हैं, तो रणमें बाँके बालिपुत्र भी वानरोंकी उछल-कूदसे किलेपर जा चढ़े।
जुद्ध बिरुद्ध क्रुद्ध द्वौ बंदर। राम प्रताप सुमिरि उर अंतर॥रावन भवन चढ़े द्वौ धाई। करहि कोसलाधीस _ दोहाई॥॥१॥
युद्धमें शत्रुसे क्रुद्ध दोनों वानर हृदयमें श्रीरामके प्रतापका स्मरण करते हुए दौड़कर रावणके महलपर जा चढ़े और कोसलाधीश श्रीरामकी दुहाई पुकारने लगे।
कलस सहित गहि भवनु ढहावा। देखि निसाचरपति भय पावा॥नारि बृंद कर पीटहिं छाती। अब दुइ कपि आए उतपाती॥॥२॥
उन्होंने कलशसहित महलको पकड़कर ढहा दिया, यह देखकर रावण भयभीत हो गया। स्त्रियाँ हाथोंसे छाती पीटने लगीं—अबकी बार दो उत्पाती वानर एकसाथ आ गये!
कपिलीला करि तिन्हहि डेरावहिं। रामचंद्र कर सुजसु सुनावहिं॥पुनि कर गहि कंचन के खंभा। कहेन्हि करिअ उतपात अरंभा॥॥३॥
वानरलीला दिखाकर वे उन्हें डराते और श्रीरामका सुयश सुनाते रहे। फिर सोनेके खंभे पकड़कर दोनोंने कहा—अब असली उत्पात मचाया जाय।
गर्जि परे रिपु कटक मझारी। लागे मर्दै भुज बल भारी॥काहुहि लात चपेटन्हि केहू। भजहु न रामहि सो फल लेहू॥॥४॥
वे गरजते हुए शत्रुसेनाके बीच कूद पड़े और अपने भारी भुजबलसे उसे रौंदने लगे। किसीको लातसे, किसीको थप्पड़से मारते और कहते—श्रीरामको नहीं भजते, यही इसका फल लो!
एक एक सों मर्दहिं तोरि चलावहिं मुंड।रावन आगें परहिं ते जनु फूटहिं दधि कुंड॥॥४४॥
वे एकको दूसरेसे रगड़कर मसल डालते हैं और सिर तोड़कर फेंकते हैं। वे सिर रावणके सामने जा गिरते हैं, मानो दहीके घड़े फूट रहे हों।
महा महा मुखिआ जे पावहिं। ते पद गहि प्रभु पास चलावहिं॥कहइ बिभीषनु तिन्ह के नामा। देहिं राम तिन्हहू निज धामा॥॥१॥
जो भी बड़े-बड़े मुखिया हाथ लगते, उनके पैर पकड़कर वे प्रभुके पास फेंक देते। विभीषण उनके नाम बताते और श्रीराम उन्हें भी अपना परमपद दे देते।
खल मनुजाद द्विजामिष भोगी। पावहिं गति जो जाचत जोगी।उमा राम मृदुचित करुनाकर। बयर भाव सुमिरत मोहि निसिचर॥॥२॥
शिवजी कहते हैं—हे उमा! ब्राह्मणोंका मांस खानेवाले वे नरभक्षी दुष्ट राक्षस भी वही परमगति पाते हैं जिसे योगी भी तरसते हैं। कोमलहृदय, करुणाके सागर श्रीराम सोचते हैं कि राक्षस वैरभावसे ही सही, मुझे स्मरण तो करते हैं।
देहिं परम गति सो जियँ जानी। अस कृपाल को कहहु भवानी॥अस प्रभु सुनि न भजहिं भ्रम त्यागी। नर मतिमंद ते परम अभागी॥॥३॥
यही जानकर वे उन्हें परमगति दे देते हैं। हे भवानी! ऐसा कृपालु और कौन होगा! प्रभुका ऐसा स्वभाव सुनकर भी जो भ्रम त्यागकर उनका भजन नहीं करते, वे अत्यन्त मन्दबुद्धि और परम अभागे हैं।
अंगद अरु हनुमंत प्रबेसा। कीन्ह दुर्ग अस कह अवधेसा॥लंका द्वौ कपि सोहहिं कैसें। मथहि सिंधु दुइ मंदर जैसें॥॥४॥
श्रीरामने कहा—अंगद और हनुमान किलेके भीतर घुस गये हैं। दोनों वानर लंकामें ऐसे शोभित हो रहे हैं मानो दो मन्दराचल समुद्रको मथ रहे हों।
भुज बल रिपु दल दलमलि देखि दिवस कर अंत।कूदे जुगल बिगत श्रम आए जहँ भगवंत॥॥४५॥
भुजबलसे शत्रुसेनाको कुचल-मसलकर और दिनका अन्त होते देखकर, दोनों वीर थकानरहित होकर वहाँ कूद आये जहाँ भगवान श्रीराम विराजते थे।
प्रभु पद कमल सीस तिन्ह नाए। देखि सुभट रघुपति मन भाए॥राम कृपा करि जुगल निहारे। भए बिगतश्रम परम सुखारे॥॥१॥
उन्होंने प्रभुके चरणकमलोंमें सिर नवाया। इन उत्तम योद्धाओंको देखकर श्रीरघुनाथका मन प्रसन्न हो उठा। श्रीरामने कृपापूर्वक दोनोंको निहारा, जिससे वे थकानरहित और परम सुखी हो गये।
गए जानि अंगद हनुमाना। फिरे भालु मर्कट भट नाना॥जातुधान प्रदोष बल पाई। धाए करि दससीस दोहाई॥॥२॥
अंगद-हनुमानको जा चुका देखकर सब भालू-वानर वीर लौट पड़े। इधर राक्षसोंने साँझका बल पाकर रावणकी दुहाई देते हुए वानरोंपर धावा बोल दिया।
निसिचर अनी देखि कपि फिरे। जहँ तहँ कटकटाइ भट भिरे॥द्वौ दल प्रबल पचारि पचारी। लरत सुभट नहिं मानहिं हारी॥॥३॥
राक्षससेना आती देख वानर भी लौट पड़े, और योद्धा जहाँ-तहाँ कटकटाकर भिड़ गये। दोनों ही दल बड़े बलशाली थे, योद्धा ललकार-ललकारकर लड़ते और कोई हार नहीं मानता था।
महाबीर निसिचर सब कारे। नाना बरन बलीमुख भारे॥सबल जुगल दल समबल जोधा। कौतुक करत लरत करि क्रोधा॥॥४॥
सभी राक्षस महान वीर और घने काले रंगके थे, वानर विशालकाय और अनेक रंगोंके। दोनों दल समान बलके योद्धाओंसे भरे थे, वे क्रोधसे लड़ते हुए भी मानो कोई खेल खेल रहे हों।
प्राबिट सरद पयोद घनेरे। लरत मनहुँ मारुत के प्रेरे॥अनिप अकंपन अरु अतिकाया। बिचलत सेन कीन्हि इन्ह माया॥॥५॥
दोनों सेनाएँ यों भिड़ीं मानो वर्षा और शरदके घने बादल तेज हवासे टकरा रहे हों। अकंपन और अतिकाय नामके सेनापतियोंने अपनी सेनाको डगमगाते देखकर एक माया रच दी।
भयउ निमिष महँ अति अँधियारा। बृष्टि होइ रुधिरोपल छारा॥॥६॥
पलभरमें ही चारों ओर घोर अंधकार छा गया, और खून, पत्थर तथा राखकी वर्षा होने लगी।
देखि निबिड़ तम दसहुँ दिसि कपिदल भयउ खभार।एकहि एक न देखई जहँ तहँ करहिं पुकार॥॥४६॥
दसों दिशाओंमें घना अंधकार देखकर वानरसेनामें खलबली मच गयी—कोई किसीको देख नहीं पा रहा था, सब जहाँ-तहाँ पुकार रहे थे।
सकल मरमु रघुनायक जाना। लिए बोलि अंगद हनुमाना॥समाचार सब कहि समुझाए। सुनत कोपि कपिकुंजर धाए॥॥१॥
श्रीरघुनाथ सारा रहस्य समझ गये। उन्होंने अंगद-हनुमानको बुलाकर सब समाचार समझाया, जिसे सुनते ही वे दोनों कपिश्रेष्ठ क्रोधित होकर दौड़ पड़े।
पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा। पावक सायक सपदि चलावा॥भयउ प्रकास कतहुँ तम नाहीं। ग्यान उदयँ जिमि संसय जाहीं॥॥२॥
फिर कृपालु श्रीरामने हँसकर धनुष चढ़ाया और तुरंत अग्निबाण छोड़ दिया, जिससे चारों ओर प्रकाश फैल गया और कहीं अंधेरा न रहा—जैसे ज्ञानका उदय होते ही सारे संशय मिट जाते हैं।
भालु बलीमुख पाइ प्रकासा। धाए हरष बिगत श्रम त्रासा॥हनूमान अंगद रन गाजे। हाँक सुनत रजनीचर भाजे॥॥३॥
प्रकाश पाते ही भालू-वानर थकान-भय भुलाकर हर्षित होकर दौड़ पड़े। हनुमान-अंगद युद्धमें गरज उठे, उनकी हुंकार सुनते ही राक्षस भाग खड़े हुए।
भागत पट पटकहिं धरि धरनी। करहिं भालु कपि अद्भुत करनी॥गहि पद डारहिं सागर माहीं। मकर उरग झष धरि धरि खाहीं॥॥४॥
भागते हुए राक्षस योद्धाओंको वानर-भालू पकड़कर धरतीपर पटक देते हैं और तरह-तरहकी अद्भुत करामातें दिखाते हैं। वे उनके पैर पकड़कर समुद्रमें फेंक देते हैं, जहाँ मगर, साँप और मच्छ उन्हें पकड़-पकड़कर खा जाते हैं।
कछु मारे कछु घायल कछु गढ़ चढ़े पराइ।गर्जहिं भालु बलीमुख रिपु दल बल बिचलाइ॥॥४७॥
कुछ मारे गये, कुछ घायल हुए, कुछ भागकर किलेपर चढ़ गये। शत्रुदलको हिलाकर रीछ-वानर गरज-गरजकर विजयघोष करने लगे।
निसा जानि कपि चारिउ अनी। आए जहाँ कोसला धनी॥राम कृपा करि चितवा सबही। भए बिगतश्रम बानर तबही॥॥१॥
रात होते देख वानरोंकी चारों सेनाएँ वहाँ लौट आयीं जहाँ कोसलपति श्रीराम थे। श्रीरामने कृपादृष्टिसे सबकी ओर देखा और वे सब वानर तत्क्षण थकानरहित हो गये।
उहाँ दसानन सचिव हँकारे। सब सन कहेसि सुभट जे मारे॥आधा कटकु कपिन्ह संघारा। कहहु बेगि का करिअ बिचारा॥॥२॥
उधर लंकामें रावणने मन्त्रियोंको बुलाकर मारे गये योद्धाओंकी पूरी सूची सुनायी—वानरोंने आधी सेना ही खत्म कर दी, अब जल्दी बताओ क्या उपाय किया जाय?
माल्यवंत अति जरठ निसाचर। रावन मातु पिता मंत्री बर॥बोला बचन नीति अति पावन। सुनहु तात कछु मोर सिखावन॥॥३॥
माल्यवंत नामका अत्यन्त वृद्ध राक्षस, जो रावणका नाना और उसका श्रेष्ठ मन्त्री भी था, अत्यन्त पवित्र नीतिकी बात बोला—हे तात! जरा मेरी भी सीख सुन लो—
जब ते तुम्ह सीता हरि आनी। असगुन होहिं न जाहिं बखानी॥बेद पुरान जासु जसु गायो। राम बिमुख काहुँ न सुख पायो॥॥४॥
जबसे तूने सीताको हर लाया है, तबसे इतने अपशकुन हो रहे हैं जिनका वर्णन ही नहीं हो सकता। वेद-पुराणोंने जिनका यशगान किया है, उन श्रीरामसे विमुख होकर आजतक किसीने सुख नहीं पाया।
हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान।जेहि मारे सोइ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान॥॥४८(क)॥
जिन्होंने भाई हिरण्यकशिपुसहित हिरण्याक्षको और बलवान मधु-कैटभको मारा था, वे ही कृपासागर भगवान श्रीरामके रूपमें अवतरित हुए हैं।
कालरूप खल बन दहन गुनागार घनबोध।सिव बिरंचि जेहि सेवहिं तासों कवन बिरोध॥॥४८(ख)॥
जो कालस्वरूप हैं, दुष्टोंके वनको भस्म करनेवाली अग्नि हैं, गुणोंके धाम और ज्ञानघन हैं, जिनकी सेवा स्वयं शिव और ब्रह्मा भी करते हैं—उनसे भला वैर कैसा?
परिहरि बयरु देहु बैदेही। भजहु कृपानिधि परम सनेही॥ताके बचन बान सम लागे। करिआ मुह करि जाहि अभागे॥॥१॥
इसलिये वैर छोड़कर जानकीजीको लौटा दो और उन परम स्नेही कृपानिधानका भजन करो। माल्यवंतके ये वचन रावणको बाणकी तरह चुभ गये—अरे अभागे! मुँह काला करके यहाँसे चला जा!
बूढ़ भएसि न त मरतेउँ तोही। अब जनि नयन देखावसि मोही॥तेहि अपने मन अस अनुमाना। बध्यो चहत एहि कृपानिधाना॥॥२॥
तू बूढ़ा हो गया है, नहीं तो अभी तुझे मार डालता—अब दुबारा मुझे अपना मुँह मत दिखाना। रावणके ये वचन सुनकर माल्यवंतने मनमें समझ लिया कि कृपानिधान श्रीराम अब इसे मारना ही चाहते हैं।
सो उठि गयउ कहत दुर्बादा। तब सकोप बोलेउ घननादा॥कौतुक प्रात देखिअहु मोरा। करिहउँ बहुत कहौं का थोरा॥॥३॥
वह रावणको दुर्वचन कहता हुआ उठकर चला गया। तब मेघनाद क्रोधसे बोला—सबेरे मेरी करामात देखना, मैं इतना कुछ कर दिखाऊँगा कि थोड़ा कहना भी कम होगा।
सुनि सुत बचन भरोसा आवा। प्रीति समेत अंक बैठावा॥करत बिचार भयउ भिनुसारा। लागे कपि पुनि चहूँ दुआरा॥॥४॥
पुत्रके ये वचन सुनकर रावणको ढाढ़स बँधा, उसने प्रेमसे उसे गोदमें बिठा लिया। यों विचार करते-करते सबेरा हो गया, और वानर फिर चारों द्वारोंपर जा डटे।
कोपि कपिन्ह दुर्घट गढ़ घेरा। नगर कोलाहलु भयउ घनेरा॥बिबिधायुध धर निसिचर धाए। गढ़ ते पर्बत सिखर ढहाए॥॥५॥
वानरोंने क्रोधमें आकर उस दुर्गम किलेको घेर लिया, नगरमें भारी कोलाहल मच गया। राक्षस तरह-तरहके अस्त्र-शस्त्र लेकर दौड़े और किलेसे पर्वत-शिखर ढहाने लगे।
ढाहे महीधर सिखर कोटिन्ह बिबिध बिधि गोला चले।घहरात जिमि पबिपात गर्जत जनु प्रलय के बादले॥मर्कट बिकट भट जुटत कटत न लटत तन जर्जर भए।गहि सैल तेहि गढ़ पर चलावहिं जहँ सो तहँ निसिचर हए॥
उन्होंने पर्वतोंके करोड़ों शिखर ढहा दिये, अनेक प्रकारके गोले चलने लगे, जो वज्रपातकी तरह घहराते और प्रलयके बादलोंकी तरह गरजते हैं। विकट वानर योद्धा भिड़ते हैं, कट जाते हैं, शरीर छलनी हो जाते हैं फिर भी हिम्मत नहीं हारते—वे पर्वत उठाकर किलेपर फेंकते रहते हैं, जिससे राक्षस जहाँ-के-तहाँ ढेर होते जाते हैं।
मेघनाद सुनि श्रवन अस गढ़ पुनि छेंका आइ।उतर्यो बीर दुर्ग तें सन्मुख चल्यो बजाइ॥॥४९॥
मेघनादने सुना कि वानरोंने फिर आकर किला घेर लिया है, तो वह वीर किलेसे उतरकर डंका बजाता हुआ उनके सामने आ डटा।
कहँ कोसलाधीस द्वौ भ्राता। धन्वी सकल लोक बिख्याता॥कहँ नल नील दुबिद सुग्रीवा। अंगद हनूमंत बल सींवा॥॥१॥
उसने पुकारकर कहा—समस्त लोकोंमें प्रसिद्ध धनुर्धर कोसलाधीश दोनों भाई कहाँ हैं? नल, नील, द्विविद, सुग्रीव और बलकी सीमा अंगद-हनुमान कहाँ हैं?
कहाँ बिभीषनु भ्राताद्रोही। आजु सबहि हठि मारउँ ओही॥अस कहि कठिन बान संधाने। अतिसय क्रोध श्रवन लगि ताने॥॥२॥
भाईसे द्रोह करनेवाला विभीषण कहाँ है? आज मैं सबको और उसे भी हठपूर्वक मारूँगा! ऐसा कहकर उसने अत्यन्त क्रोधमें धनुषपर कठिन बाण चढ़ाकर कानतक खींच लिया।
सर समूह सो छाड़ै लागा। जनु सपच्छ धावहिं बहु नागा॥जहँ तहँ परत देखिअहिं बानर। सन्मुख होइ न सके तेहि अवसर॥॥३॥
वह बाणोंकी झड़ी लगाने लगा, मानो बहुतसे पंखवाले साँप उड़े जा रहे हों। जहाँ-तहाँ वानर गिरते दिखायी देने लगे, कोई भी उस समय उसके सामने टिक न सका।
जहँ तहँ भागि चले कपि रीछा। बिसरी सबहि जुद्ध कै ईछा॥सो कपि भालु न रन महँ देखा। कीन्हेसि जेहि न प्रान अवसेषा॥॥४॥
रीछ-वानर जहाँ-तहाँ भाग खड़े हुए, सबकी युद्धकी इच्छा जाती रही। रणभूमिमें ऐसा कोई वानर या भालू नहीं बचा जिसे उसने घायल न किया हो।
दस दस सर सब मारेसि परे भूमि कपि बीर।सिंहनाद करि गर्जा मेघनाद बल धीर॥॥५०॥
फिर उसने सबको दस-दस बाण मारे, वानर वीर धरतीपर गिर पड़े। बलवान और धीर मेघनाद सिंहगर्जना करते हुए दहाड़ने लगा।
देखि पवनसुत कटक बिहाला। क्रोधवंत जनु धायउ काला॥महासैल एक तुरत उपारा। अति रिस मेघनाद पर डारा॥॥१॥
सारी सेना बेहाल देखकर पवनपुत्र हनुमान क्रोधसे ऐसे दौड़े मानो साक्षात काल दौड़ा आ रहा हो। उन्होंने तुरंत एक विशाल पर्वत उखाड़ लिया और उसे बड़े क्रोधसे मेघनादपर फेंक दिया।
आवत देखि गयउ नभ सोई। रथ सारथी तुरग सब खोई॥बार बार पचार हनुमाना। निकट न आव मरमु सो जाना॥॥२॥
पर्वतको आता देख वह आकाशमें उड़ गया, उसका रथ, सारथि और घोड़े सब चकनाचूर हो गये। हनुमान उसे बार-बार ललकारते रहे, पर वह निकट न आया क्योंकि वह उनके बलका भेद जानता था।
रघुपति निकट गयउ घननादा। नाना भाँति करेसि दुर्बादा॥अस्त्र सस्त्र आयुध सब डारे। कौतुकहीं प्रभु काटि निवारे॥॥३॥
फिर मेघनाद श्रीरामके पास गया और उन्हें कई तरहसे दुर्वचन कहे, और अपने सारे अस्त्र-शस्त्र उनपर छोड़ दिये। प्रभुने खेल-खेलमें ही सबको काटकर हटा दिया।
देखि प्रताप मूढ़ खिसिआना। करै लाग माया बिधि नाना॥जिमि कोउ करै गरुड़ सैं खेला। डरपावै गहि स्वल्प सपेला॥॥४॥
श्रीरामका यह प्रताप देखकर वह मूर्ख लज्जित हो गया और अनेक प्रकारकी माया रचने लगा—जैसे कोई नन्हा साँप हाथमें लेकर गरुड़को डराने और उससे खेलने की कोशिश करे।
जासु प्रबल माया बल सिव बिरंचि बड़ छोट।ताहि दिखावइ निसिचर निज माया मति खोट॥॥५१॥
शिव-ब्रह्मा जैसे बड़े-छोटे सभी जिस प्रबल मायाके वशमें हैं, वही नीचबुद्धि राक्षस अपनी माया उन्हींको दिखा रहा है!
नभ चढ़ि बरष बिपुल अंगारा। महि ते प्रगट होहिं जलधारा॥नाना भाँति पिसाच पिसाची। मारु काटु धुनि बोलहिं नाची॥॥१॥
वह आकाशमें चढ़कर बहुत-से अंगारे बरसाने लगा, धरतीसे जलकी धाराएँ फूट पड़ीं, और अनेक पिशाच-पिशाचिनियाँ नाच-नाचकर "मारो, काटो" चिल्लाने लगीं।
बिष्टा पूय रुधिर कच हाड़ा। बरषइ कबहुँ उपल बहु छाड़ा॥बरषि धूरि कीन्हेसि अँधिआरा। सूझ न आपन हाथ पसारा॥॥२॥
वह कभी विष्ठा, पीब, खून, बाल और हड्डियाँ बरसाता, कभी ढेरों पत्थर फेंकता। फिर उसने धूल बरसाकर ऐसा घोर अंधकार कर दिया कि अपना ही फैलाया हाथ नहीं दिखता था।
कपि अकुलाने माया देखें। सब कर मरन बना एहि लेखें॥कौतुक देखि राम मुसुकाने। भए सभीत सकल कपि जाने॥॥३॥
यह माया देखकर वानर घबरा उठे—लगा जैसे अब सबका अन्त निश्चित है। यह देखकर श्रीराम मुसकराये, वे जान गये कि सब वानर भयभीत हो गये हैं।
एक बान काटी सब माया। जिमि दिनकर हर तिमिर निकाया॥कृपादृष्टि कपि भालु बिलोके। भए प्रबल रन रहहिं न रोके॥॥४॥
तब उन्होंने एक ही बाणसे सारी मायाको वैसे ही काट डाला जैसे सूर्य अंधकारको हर लेता है। फिर उन्होंने वानर-भालुओंपर कृपादृष्टि डाली, जिससे वे इतने प्रबल हो गये कि रणमें रोके न रुकते थे।
आयसु मागि राम पहिं अंगदादि कपि साथ।लछिमन चले क्रुद्ध होइ बान सरासन हाथ॥॥५२॥
श्रीरामसे आज्ञा लेकर लक्ष्मण अंगद आदि वानरोंको साथ लिये, हाथोंमें धनुष-बाण थामे क्रोधसे भरकर आगे बढ़े।
छतज नयन उर बाहु बिसाला। हिमगिरि निभ तनु कछु एक लाला॥इहाँ दसानन सुभट पठाए। नाना अस्त्र सस्त्र गहि धाए॥॥१॥
उनके लाल नेत्र, चौड़ी छाती और विशाल भुजाएँ हैं, हिमाचलकी तरह गौरवर्ण शरीरमें हल्की ललाई है। इधर रावणने भी अपने बड़े-बड़े योद्धा भेजे, जो तरह-तरहके अस्त्र-शस्त्र लेकर दौड़ पड़े।
भूधर नख बिटपायुध धारी। धाए कपि जय राम पुकारी॥भिरे सकल जोरिहि सन जोरी। इत उत जय इच्छा नहिं थोरी॥॥२॥
पर्वत, नाखून और वृक्षोंको ही हथियार बनाये वानर "श्रीरामकी जय" पुकारते हुए दौड़े। दोनों ओरसे जोड़ी-जोड़ी भिड़ गये, दोनों ही पक्ष विजयके लिये उतने ही उतावले थे।
मुठिकन्ह लातन्ह दातन्ह काटहिं। कपि जयसील मारि पुनि डाटहिं॥मारु मारु धरु धरु धरु मारू। सीस तोरि गहि भुजा उपारू॥॥३॥
वानर उन्हें घूँसों-लातोंसे मारते, दाँतोंसे काटते, और मारकर फिर डाँटते भी—"मारो, मारो, पकड़ो, पकड़ो, पकड़कर मार डालो, सिर तोड़ दो, भुजा उखाड़ लो!"
असि रव पूरि रही नव खंडा। धावहिं जहँ तहँ रुंड प्रचंडा॥देखहिं कौतुक नभ सुर बृंदा। कबहुँक बिसमय कबहुँ अनंदा॥॥४॥
ऐसी हुंकार नवों खंडोंमें गूँज उठी, कटे हुए धड़ जहाँ-तहाँ इधर-उधर दौड़ रहे हैं। आकाशमें देवतागण यह तमाशा देख रहे हैं—कभी विस्मित होते हैं, कभी आनन्दित।
रुधिर गाड़ भरि भरि जम्यो ऊपर धूरि उड़ाइ।जनु अँगार रासिन्ह पर मृतक धूम रह्यो छाइ॥॥५३॥
गड्ढोंमें खून भर-भरकर जम गया, ऊपरसे धूल उड़-उड़कर उसपर बिछ गयी—मानो अंगारोंके ढेरोंपर राख छायी हो।
घायल बीर बिराजहिं कैसे। कुसुमित किंसुक के तरु जैसे॥लछिमन मेघनाद द्वौ जोधा। भिरहिं परसपर करि अति क्रोधा॥॥१॥
घायल वीर ऐसे शोभित हो रहे हैं मानो फूले हुए पलासके वृक्ष हों। इधर लक्ष्मण और मेघनाद दोनों योद्धा अत्यन्त क्रोधसे एक-दूसरेसे भिड़ गये।
एकहि एक सकइ नहिं जीती। निसिचर छल बल करइ अनीती॥क्रोधवंत तब भयउ अनंता। भंजेउ रथ सारथी तुरंता॥॥२॥
दोनोंमें कोई एक-दूसरेको जीत नहीं पा रहा था, तब राक्षस छल-बल और अनीतिपर उतर आया। यह देख शेषावतार लक्ष्मण क्रोधित हो उठे और तुरंत उसका रथ तोड़कर सारथिको मार डाला।
नाना बिधि प्रहार कर सेषा। राच्छस भयउ प्रान अवसेषा॥रावन सुत निज मन अनुमाना। संकठ भयउ हरिहि मम प्राना॥॥३॥
लक्ष्मण उसपर अनेक प्रकारसे प्रहार करने लगे, राक्षसके प्राण बस कंठतक आ पहुँचे। मेघनादने मनमें समझ लिया—अब तो प्राणसंकट आ गया, ये मेरे प्राण हर ही लेंगे।
बीरघातिनी छाड़िसि साँगी। तेज पुंज लछिमन उर लागी॥मुरुछा भई सक्ति के लागें। तब चलि गयउ निकट भय त्यागें॥॥४॥
तब उसने वीरघातिनी शक्ति चला दी, वह तेजस्वी शक्ति लक्ष्मणकी छातीमें जा लगी। शक्तिके लगते ही उन्हें मूर्छा आ गयी, तब मेघनाद निर्भय होकर उनके पास चला गया।
मेघनाद सम कोटि सत जोधा रहे उठाइ।जगदाधार सेष किमि उठे चले खिसिआइ॥॥५४॥
मेघनादके समान करोड़ों योद्धा मिलकर लक्ष्मणको उठानेकी कोशिश करते रहे, पर जगत्के आधार शेषावतार भला कैसे उठते? अंततः वे लज्जित होकर लौट गये।
सुनु गिरिजा क्रोधानल जासू। जारइ भुवन चारिदस आसू॥सक संग्राम जीति को ताही। सेवहिं सुर नर अग जग जाही॥॥१॥
शिवजी कहते हैं—हे पार्वती! जिनके क्रोधकी अग्नि चौदहों भुवनोंको पल भरमें जला सकती है, और देवता-मनुष्य-चराचर सब जिनकी सेवा करते हैं, उन्हें युद्धमें भला कौन जीत सकता है?
यह कौतूहल जानइ सोई। जा पर कृपा राम के होई॥संध्या भइ फिरि द्वौ बाहनी। लगे सँभारन निज निज अनी॥॥२॥
इस रहस्यको वही समझ सकता है जिसपर श्रीरामकी कृपा हो। संध्या होते ही दोनों सेनाएँ लौट पड़ीं, सेनापति अपनी-अपनी सेनाएँ सँभालने लगे।
ब्यापक ब्रह्म अजित भुवनेस्वर। लछिमन कहाँ बूझ करुनाकर॥तब लगि लै आयउ हनुमाना। अनुज देखि प्रभु अति दुख माना॥॥३॥
सर्वव्यापी, ब्रह्मस्वरूप, अजेय, सम्पूर्ण ब्रह्मांडके स्वामी और करुणाके सागर श्रीरामने पूछा—लक्ष्मण कहाँ हैं? तभीतक हनुमान उन्हें ले आये, छोटे भाईकी यह दशा देखकर प्रभुको बड़ा दुःख हुआ।
जामवंत कह बैद सुषेना। लंकाँ रहइ को पठई लेना॥धरि लघु रूप गयउ हनुमंता। आनेउ भवन समेत तुरंता॥॥४॥
जाम्बवानने कहा—लंकामें सुषेण वैद्य रहता है, उसे लानेके लिये किसे भेजा जाय? हनुमान तुरंत छोटा रूप धरकर गये और सुषेणको उसके घरसमेत ही उठा लाये।
राम पदारबिंद सिर नायउ आइ सुषेन।कहा नाम गिरि औषधी जाहु पवनसुत लेन॥॥५५॥
सुषेणने आकर श्रीरामके चरणकमलोंमें सिर नवाया, फिर उसने पर्वत और औषधिका नाम बताया—हे पवनपुत्र! जाकर वह औषधि ले आओ।
राम चरन सरसिज उर राखी। चला प्रभंजन सुत बल भाषी॥उहाँ दूत एक मरमु जनावा। रावन कालनेमि गृह आवा॥॥१॥
श्रीरामके चरणकमलोंको हृदयमें बसाकर पवनपुत्र अपना बल जताते हुए चल पड़े। उधर एक गुप्तचरने रावणको यह रहस्य बता दिया, तब रावण कालनेमिके घर पहुँचा।
दसमुख कहा मरमु तेहिं सुना। पुनि पुनि कालनेमि सिरु धुना॥देखत तुम्हहि नगरु जेहिं जारा। तासु पंथ को रोकन पारा॥॥२॥
रावणने उसे सारा हाल बताया, यह सुनकर कालनेमिने बार-बार सिर पीट लिया—तुम्हारे देखते-देखते जिसने पूरा नगर जला डाला, उसका रास्ता कौन रोक सकता है?
भजि रघुपति करु हित आपना। छाँड़हु नाथ मृषा जल्पना॥नील कंज तनु सुंदर स्यामा। हृदयँ राखु लोचनाभिरामा॥॥३॥
श्रीरघुनाथका भजन करके अपना कल्याण कर लो, हे नाथ! अब झूठी बकवास छोड़ दो। नेत्रोंको सुख देनेवाले नीलकमल-जैसे सुन्दर श्यामवर्णको हृदयमें बसा लो।
मैं तैं मोर मूढ़ता त्यागू। महा मोह निसि सूतत जागू॥काल ब्याल कर भच्छक जोई। सपनेहुँ समर कि जीतिअ सोई॥॥४॥
मैं-तू और ममताकी यह मूर्खता त्याग दो, महामोहकी इस नींदसे जाग उठो। जो कालरूपी सर्पका भी भक्षक है, भला उसे स्वप्नमें भी युद्धमें जीता जा सकता है?
सुनि दसकंठ रिसान अति तेहिं मन कीन्ह बिचार।राम दूत कर मरौं बरु यह खल रत मल भार॥॥५६॥
यह सुनकर रावण अत्यन्त क्रोधित हुआ, तब कालनेमिने मनमें सोचा—इसके हाथों मरनेकी बजाय श्रीरामके दूतके हाथों मरना ही अच्छा है, यह दुष्ट तो पापोंके बोझमें ही डूबा हुआ है।
अस कहि चला रचिसि मग माया। सर मंदिर बर बाग बनाया॥मारुतसुत देखा सुभ आश्रम। मुनिहि बूझि जल पियौं जाइ श्रम॥॥१॥
ऐसा सोचकर वह चल पड़ा और मार्गमें माया रचकर एक तालाब, मन्दिर और सुन्दर बाग बना दिया। हनुमानने वह सुन्दर आश्रम देखा और सोचा—मुनिसे पूछकर जल पी लूँ, जिससे थकान मिट जाय।
राच्छस कपट बेष तहँ सोहा। मायापति दूतहि चह मोहा॥जाइ पवनसुत नायउ माथा। लाग सो कहै राम गुन गाथा॥॥२॥
राक्षस वहाँ कपटी मुनिका वेश धरे बैठा था, वह मायावी दूतको भी मोहमें फँसाना चाहता था। हनुमानने पास जाकर मस्तक नवाया, तो वह श्रीरामके गुणोंकी कथा सुनाने लगा।
होत महा रन रावन रामहिं। जितहहिं राम न संसय या महिं॥इहाँ भए मैं देखेउँ भाई। ग्यान दृष्टि बल मोहि अधिकाई॥॥३॥
उसने कहा—रावण और रामके बीच घोर युद्ध चल रहा है, इसमें सन्देह नहीं कि जीत श्रीरामकी ही होगी। भाई, मैं यहीं बैठा सब कुछ देख रहा हूँ, मुझे ज्ञानदृष्टिका बड़ा बल प्राप्त है।
मागा जल तेहिं दीन्ह कमंडल। कह कपि नहिं अघाउँ थोरें जल॥सर मज्जन करि आतुर आवहु। दिच्छा देउँ ग्यान जेहिं पावहु॥॥४॥
हनुमानने उससे जल माँगा तो उसने कमंडल थमा दिया। हनुमानने कहा—इतने थोड़े जलसे मेरी प्यास नहीं बुझेगी। तब वह बोला—पहले तालाबमें स्नान करके लौट आओ, फिर मैं तुम्हें दीक्षा दूँगा जिससे तुम्हें ज्ञान प्राप्त हो।
सर पैठत कपि पद गहा मकरीं तब अकुलान।मारी सो धरि दिव्य तनु चली गगन चढ़ि जान॥॥५७॥
हनुमान जैसे ही तालाबमें उतरे, एक मगरीने घबराकर उनका पैर पकड़ लिया। हनुमानने उसे मार डाला, तो वह दिव्य देह धारण कर विमानपर चढ़कर आकाशमें उड़ चली।
कपि तव दरस भइउँ निष्पापा। मिटा तात मुनिबर कर सापा॥मुनि न होइ यह निसिचर घोरा। मानहु सत्य बचन कपि मोरा॥॥१॥
उसने कहा—हे वानर! तुम्हारे दर्शनमात्रसे मैं पापमुक्त हो गयी, तात, मुझे मुनिवरका शाप छूट गया। यह कोई मुनि नहीं, घोर राक्षस है—मेरी बात सच मानो।
अस कहि गई अपछरा जबहीं। निसिचर निकट गयउ कपि तबहीं॥कह कपि मुनि गुरदछिना लेहू। पाछें हमहि मंत्र तुम्ह देहू॥॥२॥
ऐसा कहकर ज्योंही वह अप्सरा चली गयी, त्योंही हनुमान उस राक्षसके पास पहुँचे। हनुमानने कहा—हे मुनि! पहले गुरुदक्षिणा ले लीजिये, फिर मुझे मन्त्र दीजियेगा।
सिर लंगूर लपेटि पछारा। निज तनु प्रगटेसि मरती बारा॥राम राम कहि छाड़ेसि प्राना। सुनि मन हरषि चलेउ हनुमाना॥॥३॥
हनुमानने उसका सिर अपनी पूँछमें लपेटकर उसे पटक दिया। मरते समय उसने अपना असली राक्षसी रूप प्रकट किया और "राम-राम" कहते हुए प्राण त्याग दिये। यह सुनकर हनुमान मनमें प्रसन्न होकर आगे बढ़े।
देखा सैल न औषध चीन्हा। सहसा कपि उपारि गिरि लीन्हा॥गहि गिरि निसि नभ धावत भयऊ। अवधपुरी ऊपर कपि गयऊ॥॥४॥
उन्होंने पर्वत तो देखा, पर औषधि पहचान न सके। तब हनुमानने तुरंत पूरा पर्वत ही उखाड़ लिया, और उसे लेकर रातके अंधेरेमें आकाशमार्गसे उड़ते हुए अयोध्यापुरीके ऊपर जा पहुँचे।
देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन अनुमानि।बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि॥॥५८॥
भरतने आकाशमें यह अत्यन्त विशाल आकृति देखी, तो मनमें अनुमान लगाया कि यह कोई राक्षस है। उन्होंने कानतक धनुष खींचकर बिना फलका एक बाण चलाया।
परेउ मुरुछि महि लागत सायक। सुमिरत राम राम रघुनायक॥सुनि प्रिय बचन भरत तब धाए। कपि समीप अति आतुर आए॥॥१॥
बाण लगते ही हनुमान "राम, राम, रघुनायक" रटते हुए मूर्छित होकर धरतीपर गिर पड़े। यह प्रिय नाम सुनकर भरत तुरंत उठकर बड़ी उतावलीसे हनुमानके पास दौड़े आये।
बिकल बिलोकि कीस उर लावा। जागत नहिं बहु भाँति जगावा॥मुख मलीन मन भए दुखारी। कहत बचन भरि लोचन बारी॥॥२॥
उन्हें व्याकुल देखकर भरतने हृदयसे लगा लिया, बहुत तरहसे जगाया पर वे जागे नहीं। तब भरतका मुख उदास हो गया, मनमें बहुत दुखी होकर आँखोंमें आँसू भरकर वे बोले—
जेहिं बिधि राम बिमुख मोहि कीन्हा। तेहिं पुनि यह दारुन दुख दीन्हा॥जौं मोरें मन बच अरु काया। प्रीति राम पद कमल अमाया॥॥३॥
जिस विधाताने मुझे श्रीरामसे विमुख किया, उसीने यह भयानक दुःख भी दिया है। यदि मन, वचन और कर्मसे श्रीरामके चरणकमलोंमें मेरा निष्कपट प्रेम हो,
तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला। जौं मो पर रघुपति अनुकूला॥सुनत बचन उठि बैठ कपीसा। कहि जय जयति कोसलाधीसा॥॥४॥
और यदि श्रीरघुनाथ मुझपर प्रसन्न हों, तो यह वानर थकान और पीड़ासे मुक्त हो जाय! यह वचन सुनते ही हनुमान "कोसलाधीश श्रीरामकी जय, जय हो" कहते हुए उठ बैठे।
लीन्ह कपिहि उर लाइ पुलकित तनु लोचन सजल।प्रीति न हृदयँ समाइ सुमिरि राम रघुकुल तिलक॥॥५९॥
भरतने हनुमानको हृदयसे लगा लिया, उनका शरीर पुलकित हो उठा और नेत्रोंमें आँसू छलक आये। रघुकुलतिलक श्रीरामका स्मरण करते ही उनके हृदयमें प्रेम समाता न था।
तात कुसल कहु सुखनिधान की। सहित अनुज अरु मातु जानकी॥कपि सब चरित समास बखाने। भए दुखी मन महुँ पछिताने॥॥१॥
भरतने पूछा—हे तात! छोटे भाई लक्ष्मण और माता जानकीसहित सुखनिधान श्रीरामकी कुशल तो कहो। हनुमानने सारी कथा संक्षेपमें सुनायी, सुनकर भरत दुखी होकर मनमें पछताने लगे।
अहह दैव मैं कत जग जायउँ। प्रभु के एकहु काज न आयउँ॥जानि कुअवसरु मन धरि धीरा। पुनि कपि सन बोले बलबीरा॥॥२॥
हाय! मैं जगत्में क्यों जन्मा, प्रभुके किसी भी काम न आ सका! फिर असमय जानकर मनमें धैर्य धारण करके बलवीर भरत हनुमानसे बोले—
तात गहरु होइहि तोहि जाता। काजु नसाइहि होत प्रभाता॥चढ़ु मम सायक सैल समेता। पठवौं तोहि जहँ कृपानिकेता॥॥३॥
हे तात! तुम्हें जानेमें देर होगी और सबेरा होते ही सारा काम बिगड़ जायगा। इसलिये पर्वतसहित मेरे बाणपर चढ़ जाओ, मैं तुम्हें वहीं भेज दूँगा जहाँ कृपानिधान श्रीराम हैं।
सुनि कपि मन उपजा अभिमाना। मोरें भार चलिहि किमि बाना॥राम प्रभाव बिचारि बहोरी। बंदि चरन कह कपि कर जोरी॥॥४॥
यह सुनकर हनुमानके मनमें क्षणभर अभिमान उठा कि मेरे बोझसे बाण कैसे चलेगा? पर फिर श्रीरामके प्रभावका विचार करके उन्होंने भरतके चरणोंकी वन्दना कर हाथ जोड़कर कहा—
तव प्रताप उर राखि प्रभु जेहउँ नाथ तुरंत।अस कहि आयसु पाइ पद बंदि चलेउ हनुमंत॥॥६०(क)॥
हे नाथ! मैं आपका प्रताप हृदयमें रखकर अभी चला जाऊँगा। ऐसा कहकर आज्ञा लेकर, भरतके चरणोंकी वन्दना करके हनुमान चल पड़े।
भरत बाहु बल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार।मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार॥॥६०(ख)॥
भरतके बाहुबल, शील, गुण और श्रीरामके चरणोंमें उनके अपार प्रेमकी मन-ही-मन बारंबार सराहना करते हुए पवनपुत्र आगे बढ़ते जा रहे थे।
उहाँ राम लछिमनहिं निहारी। बोले बचन मनुज अनुसारी॥अर्ध राति गई कपि नहिं आयउ। राम उठाइ अनुज उर लायउ॥॥१॥
उधर लक्ष्मणकी यह दशा देखकर श्रीराम एक साधारण मनुष्यकी तरह विलाप करने लगे—आधी रात बीत गयी, हनुमान अभी तक नहीं लौटे। ऐसा कहकर उन्होंने लक्ष्मणको उठाकर हृदयसे लगा लिया।
सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ। बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ॥मम हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता॥॥२॥
और बोले—हे भाई! तुम मुझे कभी दुःखी नहीं देख सकते थे, तुम्हारा स्वभाव सदा ही कोमल रहा है। मेरे लिये ही तुमने माता-पिताको छोड़ा और वनमें जाड़ा-गरमी-हवा सब कुछ सहा।
सो अनुराग कहाँ अब भाई। उठहु न सुनि मम बच बिकलाई॥जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू। पिता बचन मनतेउँ नहिं ओहू॥॥३॥
हे भाई! वह प्रेम अब कहाँ चला गया? मेरी व्याकुल पुकार सुनकर भी क्यों नहीं उठते? यदि मुझे पता होता कि वनमें तुमसे बिछड़ना पड़ेगा, तो मैं पिताकी आज्ञा भी न मानता।
सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा॥अस बिचारि जियँ जागहु ताता। मिलइ न जगत सहोदर भ्राता॥॥४॥
पुत्र, धन, पत्नी, घर और परिवार तो संसारमें बार-बार मिलते-बिछड़ते रहते हैं, पर सगा भाई फिर नहीं मिलता। यह सोचकर हे तात! जागो।
जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना॥अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही॥॥५॥
जैसे पंखके बिना पक्षी, मणिके बिना सर्प और सूँड़के बिना गजराज अत्यन्त दीन हो जाते हैं, वैसे ही हे भाई! यदि विधाता मुझे तुम्हारे बिना जीवित रखे, तो मेरा जीवन भी वैसा ही निरर्थक होगा।
जैहउँ अवध कवन मुहु लाई। नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई॥बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं॥॥६॥
स्त्रीके लिये प्यारे भाईको खोकर मैं किस मुँहसे अयोध्या जाऊँगा? संसारमें बदनामी तो मैं सह लेता, स्त्रीकी हानिमें कोई बड़ी बात नहीं थी।
अब अपलोकु सोकु सुत तोरा। सहिहि निठुर कठोर उर मोरा॥निज जननी के एक कुमारा। तात तासु तुम्ह प्रान अधारा॥॥७॥
पर अब हे पुत्र! मेरा यह निष्ठुर हृदय अपयश और तुम्हारा शोक दोनों साथ-साथ सहेगा। तुम अपनी माताके इकलौते पुत्र और उसके प्राणाधार हो।
सौंपेसि मोहि तुम्हहि गहि पानी। सब बिधि सुखद परम हित जानी॥उतरु काह दैहउँ तेहि जाई। उठि किन मोहि सिखावहु भाई॥॥८॥
उन्होंने तुम्हें सब तरहसे सुखद और परम हितकारी समझकर ही मेरे हाथमें सौंपा था, अब मैं जाकर उन्हें क्या उत्तर दूँगा? हे भाई! उठकर मुझे क्यों नहीं समझाते?
बहु बिधि सिचत सोच बिमोचन। स्त्रवत सलिल राजिव दल लोचन॥उमा एक अखंड रघुराई। नर गति भगत कृपाल देखाई॥॥९॥
दुःखहर्ता श्रीराम इस तरह बहुत सोच रहे थे, उनके कमलदल-जैसे नेत्रोंसे आँसू बह रहे थे। शिवजी कहते हैं—हे उमा! श्रीरघुनाथ तो एक और अखंड हैं, भक्तोंपर कृपा करनेवाले भगवानने यह मनुष्यकी लीला दिखायी है।
प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस॥॥६१॥
प्रभुका यह विलाप सुनकर वानरोंके समूह व्याकुल हो उठे, तभी हनुमान आ पहुँचे—मानो करुणरसमें अचानक वीररस प्रकट हो गया हो।
हरषि राम भेंटेउ हनुमाना। अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना॥तुरत बैद तब कीन्ह उपाई। उठि बैठे लछिमन हरषाई॥॥१॥
श्रीराम हर्षित होकर हनुमानसे गले मिले, प्रभु परम सुजान और अत्यन्त कृतज्ञ हैं। तब वैद्यने तुरंत उपचार किया, जिससे लक्ष्मण हर्षित होकर उठ बैठे।
हृदयँ लाइ प्रभु भेंटेउ भ्राता। हरषे सकल भालु कपि ब्राता॥कपि पुनि बैद तहाँ पहुँचावा। जेहि बिधि तबहिं ताहि लइ आवा॥॥२॥
प्रभुने भाईको हृदयसे लगाकर मिलाया, सब भालू-वानर हर्षित हो उठे। फिर हनुमानने वैद्यको उसी तरह वापस पहुँचा दिया जिस तरह पहले उन्हें ले आये थे।
यह बृत्तांत दसानन सुनेऊ। अति बिषाद पुनि पुनि सिर धुनेऊ॥ब्याकुल कुंभकरन पहिं आवा। बिबिध जतन करि ताहि जगावा॥॥३॥
यह समाचार जब रावणने सुना, तो वह अत्यन्त शोकसे बार-बार सिर पीटने लगा। व्याकुल होकर वह कुम्भकर्णके पास गया और अनेक उपाय करके उसे जगाया।
जागा निसिचर देखिअ कैसा। मानहुँ कालु देह धरि बैसा॥कुंभकरन बूझा कहु भाई। काहे तव मुख रहे सुखाई॥॥४॥
कुम्भकर्ण जागा तो ऐसा दिखा मानो स्वयं काल शरीर धरकर बैठा हो। उसने पूछा—भाई, बताओ तो, तुम्हारा मुँह क्यों सूखा हुआ है?
कथा कही सब तेहिं अभिमानी। जेहि प्रकार सीता हरि आनी॥तात कपिन्ह सब निसिचर मारे। महामहा जोधा संघारे॥॥५॥
अभिमानी रावणने सीता हरण करनेसे लेकर अबतककी सारी कथा उसे सुनायी—हे तात! वानरोंने हमारे सब राक्षस मार डाले, बड़े-बड़े योद्धाओंतकका संहार कर डाला।
दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी। भट अतिकाय अकंपन भारी॥अपर महोदर आदिक बीरा। परे समर महि सब रनधीरा॥॥६॥
दुर्मुख, देवान्तक, नरान्तक, विशाल योद्धा अतिकाय, अकंपन और महोदर आदि दूसरे सभी रणधीर वीर रणभूमिमें मारे जा चुके हैं।
सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरन बिलखान।जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान॥॥६२॥
यह सुनकर कुम्भकर्ण दुखी होकर बोला—अरे मूर्ख! जगज्जननी सीताको हरकर अब तू कल्याण चाहता है?
भल न कीन्ह तें निसिचर नाहा। अब मोहि आइ जगाएहि काहा॥अजहूँ तात त्यागि अभिमाना। भजहु राम होइहि कल्याना॥॥१॥
हे राक्षसराज! तूने यह अच्छा नहीं किया, अब मुझे जगाकर क्या लाभ हुआ? हे तात! अब भी अभिमान त्यागकर श्रीरामको भज ले, कल्याण होगा।
हैं दससीस मनुज रघुनायक। जाके हनूमान से पायक॥अहह बंधु तें कीन्हि खोटाई। प्रथमहिं मोहि न सुनाएहि आई॥॥२॥
जिनके हनुमान-जैसे सेवक हैं, वे श्रीराम भला मनुष्य कैसे हो सकते हैं? हाय भाई! तूने बड़ी भूल की कि पहले ही आकर यह हाल मुझे नहीं सुनाया।
कीन्हेहु प्रभु बिरोध तेहि देवक। सिव बिरंचि सुर जाके सेवक॥नारद मुनि मोहि ग्यान जो कहा। कहतेउँ तोहि समय निरबहा॥॥३॥
तूने उस परम देवताका विरोध कर लिया जिसके शिव, ब्रह्मा जैसे देवता भी सेवक हैं। नारदमुनिने मुझे जो ज्ञान दिया था, वह तुझे बताता, पर अब समय ही नहीं रहा।
अब भरि अंक भेंटु मोहि भाई। लोचन सूफल करौ मैं जाई॥स्याम गात सरसीरुह लोचन। देखौं जाइ ताप त्रय मोचन॥॥४॥
अब तो हे भाई! अंतिम बार मुझे भरपूर अँकवारमें भर ले, मैं जाकर अपने नेत्र सफल कर लूँ। तीनों तापोंको हरनेवाले श्यामवर्ण, कमलनयन श्रीरामके दर्शन करने जाता हूँ।
राम रूप गुन सुमिरत मगन भयउ छन एक।रावन मागेउ कोटि घट मद अरु महिष अनेक॥॥६३॥
श्रीरामके रूप-गुणका स्मरण करते ही वह क्षणभरके लिये प्रेममें मगन हो गया। फिर रावणने करोड़ों घड़े मदिरा और अनेकों भैंसे मँगवाये।
महिष खाइ करि मदिरा पाना। गर्जा बज्राघात समाना॥कुंभकरन दुर्मद रन रंगा। चला दुर्ग तजि सेन न संगा॥॥१॥
भैंसे खाकर और मदिरा पीकर कुम्भकर्ण वज्रपातकी तरह गरज उठा। मदमत्त और युद्धोत्साहसे भरा वह सेनाको साथ लिये बिना ही अकेला किला छोड़कर चल पड़ा।
देखि बिभीषनु आगें आयउ। परेउ चरन निज नाम सुनायउ॥अनुज उठाइ हृदयँ तेहि लायो। रघुपति भक्त जानि मन भायो॥॥२॥
उसे देखकर विभीषण आगे बढ़े और उसके चरणोंमें गिरकर अपना नाम बताया। उसने छोटे भाईको उठाकर हृदयसे लगा लिया—श्रीरघुनाथका भक्त जानकर विभीषण उसके मनको बहुत भाये।
तात लात रावन मोहि मारा। कहत परम हित मंत्र बिचारा॥तेहिं गलानि रघुपति पहिं आयउँ। देखि दीन प्रभु के मन भायउँ॥॥३॥
विभीषणने कहा—हे तात! परम हितकी सलाह देनेपर रावणने मुझे लात मारी थी। उसी ग्लानिसे मैं श्रीरघुनाथके पास चला आया, और दीन जानकर प्रभुके मनको मैं प्रिय लगा।
सुनु सुत भयउ कालबस रावन। सो कि मान अब परम सिखावन॥धन्य धन्य तें धन्य बिभीषन। भयहु तात निसिचर कुल भूषन॥॥४॥
कुम्भकर्णने कहा—हे पुत्र! सुन, रावण अब कालके वशमें आ चुका है, वह भला अब उत्तम शिक्षा कैसे मानेगा? हे विभीषण! तू धन्य है, तू ही राक्षसकुलका सच्चा भूषण बना है।
बंधु बंस तें कीन्ह उजागर। भजेहु राम सोभा सुख सागर॥॥५॥
हे भाई! तूने श्रीराम-जैसे शोभा और सुखके सागरको भजकर अपने कुलको उजागर कर दिया।
बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर।जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर॥॥६४॥
मन, वचन और कर्मसे कपट छोड़कर रणधीर श्रीरामका भजन करते रहना। अब मैं कालके वशमें आ चुका हूँ, मुझे अपना-पराया कुछ नहीं सूझ रहा, इसलिये तुम अभी यहाँसे चले जाओ।
बंधु बचन सुनि चला बिभीषन। आयउ जहँ त्रैलोक बिभूषन॥नाथ भूधराकार सरीरा। कुंभकरन आवत रनधीरा॥॥१॥
भाईकी यह बात सुनकर विभीषण लौट चले और वहाँ पहुँचे जहाँ त्रिलोकभूषण श्रीराम विराजते थे। उन्होंने कहा—हे नाथ! पर्वत-जैसे विशाल शरीरवाला रणधीर कुम्भकर्ण चला आ रहा है।
एतना कपिन्ह सुना जब काना। किलकिलाइ धाए बलवाना॥लिए उठाइ बिटप अरु भूधर। कटकटाइ डारहिं ता ऊपर॥॥२॥
वानरोंने जब इतना ही सुना, तो बलवान वानर हर्षध्वनि करते हुए दौड़ पड़े और वृक्ष-पर्वत उखाड़कर दाँत पीसते हुए उसपर बरसाने लगे।
कोटि कोटि गिरि सिखर प्रहारा। करहिं भालु कपि एक एक बारा॥मुर्यो न मनु तनु टर्यो न टार्यो। जिमि गज अर्क फलनि को मार्यो॥॥३॥
रीछ-वानर एक ही बारमें करोड़ों पर्वत-शिखर उसपर दे मारते हैं, पर न तो उसका मन विचलित होता है, न शरीरपर कोई असर पड़ता है—जैसे मदारके फलोंकी मारसे हाथीको कुछ भी नहीं होता।
तब मारुतसुत मुठिका हन्यो। परथो धरनि ब्याकुल सिर धुन्यो॥पुनि उठि तेहिं मारेउ हनुमंता। घुर्मित भूतल परेउ तुरंता॥॥४॥
तब हनुमानने उसे एक जोरदार घूँसा मारा, जिससे वह व्याकुल होकर धरतीपर गिर पड़ा और सिर पीटने लगा। फिर उठकर उसने हनुमानको ऐसा मारा कि वे चक्कर खाकर तुरंत धरतीपर गिर पड़े।
पुनि नल नीलहि अवनि पछारेसि। जहँ तहँ पटकि पटकि भट डारेसि॥चली बलीमुख सेन पराई। अति भय त्रसित न कोउ समुहाई॥॥५॥
फिर उसने नल-नीलको भी धरतीपर पछाड़ दिया, और दूसरे योद्धाओंको भी जहाँ-तहाँ पटक-पटककर गिरा दिया। वानरसेना भयभीत होकर भाग खड़ी हुई, कोई उसके सामने नहीं टिक सका।
अंगदादि कपि मुरुछित करि समेत सुग्रीव।काँख दाबि कपिराज कहुँ चला अमित बल सींव॥॥६५॥
फिर वह सुग्रीवसमेत अंगद आदि सभी वानरोंको मूर्छित करके, अपार बलकी सीमा कुम्भकर्ण वानरराज सुग्रीवको काँखमें दबाकर आगे बढ़ चला।
उमा करत रघुपति नरलीला। खेलत गरुड़ जिमि अहिगन मीला॥भृकुटि भंग जो कालहि खाई। ताहि कि सोहइ ऐसि लराई॥॥१॥
शिवजी कहते हैं—हे उमा! श्रीरघुनाथ ऐसे मनुष्यलीला कर रहे हैं जैसे गरुड़ साँपोंके झुंडमें घुसकर खेल रहा हो। जो भौंहके इशारेभरसे कालको भी निगल जाते हैं, उन्हें भला ऐसी लड़ाई क्या शोभा देती है?
जग पावनि कीरति बिस्तरिहहिं। गाइ गाइ भवनिधि नर तरिहहिं॥मुरुछा गई मारुतसुत जागा। सुग्रीवहि तब खोजन लागा॥॥२॥
भगवान इस लीलाके द्वारा वह जगत्को पवित्र करनेवाली कीर्ति फैलायेंगे जिसे गा-गाकर मनुष्य भवसागरसे पार हो जायँगे। इतनेमें मूर्छा टूटी और हनुमान जाग उठे, फिर वे सुग्रीवको खोजने लगे।
सुग्रीवहु कै मुरुछा बीती। निबुक गयउ तेहि मृतक प्रतीती॥काटेसि दसन नासिका काना। गरजि अकास चलेउ तेहिं जाना॥॥३॥
सुग्रीवकी भी मूर्छा टूट गयी, तब वे चुपचाप खिसक गये और कुम्भकर्णने उन्हें मरा हुआ ही समझा। सुग्रीवने दाँतोंसे उसके नाक-कान काट लिये और गरजते हुए आकाशकी ओर उड़ चले, तब कुम्भकर्णको असलियत पता चली।
गहेउ चरन गहि भूमि पछारा। अति लाघवँ उठि पुनि तेहि मारा॥पुनि आयसु प्रभु पहिं बलवाना। जयति जयति जय कृपानिधाना॥॥४॥
उसने सुग्रीवका पैर पकड़कर उन्हें धरतीपर पछाड़ दिया, पर सुग्रीव फुर्तीसे उठकर उसे मारकर प्रभुके पास आ गये और बोले—कृपानिधान प्रभुकी जय हो, जय हो, जय हो!
नाक कान काटे जियँ जानी। फिरा क्रोध करि भइ मन ग्लानी॥सहज भीम पुनि बिनु श्रुति नासा। देखत कपि दल उपजी त्रासा॥॥५॥
नाक-कान कटे जानकर कुम्भकर्णको बड़ी ग्लानि हुई, वह क्रोधसे भरकर लौटा। वैसे ही वह स्वभावसे भयंकर था, अब बिना नाक-कानके तो और भी भयानक दिखने लगा—उसे देखते ही वानरसेनामें भय फैल गया।
जय जय जय रघुबंस मनि धाए कपि दै हूह।एकहि बार तासु पर छाड़ेन्हि गिरि तरु जूह॥॥६६॥
"रघुवंशमणिकी जय हो, जय हो, जय हो" ऐसी पुकार लगाकर वानर हुँकार भरते हुए दौड़े और सबने एक साथ ही उसपर पर्वत और वृक्षोंके समूह बरसा दिये।
कुंभकरन रन रंग बिरुद्धा। सन्मुख चला काल जनु क्रुद्धा॥कोटि कोटि कपि धरि धरि खाई। जनु टीड़ी गिरि गुहाँ समाई॥॥१॥
रणके नशेमें चूर कुम्भकर्ण उनके सामने ऐसे बढ़ा मानो क्रोधित काल ही चला आ रहा हो। वह करोड़ों वानरोंको एक साथ पकड़-पकड़कर निगलने लगा, मानो पर्वतकी गुफामें टिड्डियाँ समा रही हों।
कोटिन्ह गहि सरीर सन मर्दा। कोटिन्ह मीजि मिलव महि गर्दा॥मुख नासा श्रवनन्हि कीं बाटा। निसरि पराहिं भालु कपि ठाटा॥॥२॥
उसने करोड़ों वानरोंको पकड़कर शरीरसे ही मसल डाला, करोड़ोंको हाथोंसे मलकर धूलमें मिला दिया। भालू-वानरोंके झुंड-के-झुंड उसके मुँह, नाक और कानोंके रास्ते निकल-निकलकर भाग रहे हैं।
रन मद मत्त निसाचर दर्पा। बिस्व ग्रसिहि जनु एहि बिधि अर्पा॥मुरे सुभट सब फिरहिं न फेरे। सूझ न नयन सुनहिं नहिं टेरे॥॥३॥
युद्धके मदमें चूर वह राक्षस ऐसा इतरा उठा मानो विधाताने पूरा विश्व ही उसे निगलनेके लिये सौंप दिया हो। सब योद्धा भागते ही जा रहे हैं, लौटाये भी नहीं लौटते, आँखोंसे कुछ सूझता नहीं, पुकारनेपर भी सुनते नहीं।
कुंभकरन कपि फौज बिडारी। सुनि धाई रजनीचर धारी॥देखि राम बिकल कटकाई। रिपु अनीक नाना बिधि आई॥॥४॥
कुम्भकर्णने वानरसेनाको तितर-बितर कर दिया, यह सुनकर राक्षससेना भी दौड़ पड़ी। श्रीरामने देखा कि अपनी सेना व्याकुल है और शत्रुकी नाना प्रकारकी सेना चढ़ आयी है।
सुनु सुग्रीव बिभीषन अनुज सँभारेहु सैन।मैं देखउँ खल बल दलहि बोले राजिवनैन॥॥६७॥
कमलनयन श्रीरामने कहा—हे सुग्रीव, विभीषण और लक्ष्मण! सुनो, तुम सब सेनाको सँभालो, मैं स्वयं इस दुष्टके बल और उसकी सेनाको देख लेता हूँ।
कर सारंग साजि कटि भाथा। अरि दल दलन चले रघुनाथा॥प्रथम कीन्ह प्रभु धनुष टँकोरा। रिपु दल बधिर भयउ सुनि सोरा॥॥१॥
हाथमें धनुष और कमरमें तरकस सजाकर श्रीरघुनाथ शत्रुसेनाका दलन करने चले। प्रभुने पहले धनुषकी टंकार की, जिसकी भयानक ध्वनि सुनते ही शत्रुसेना बहरी हो गयी।
सत्यसंध छाँड़े सर लच्छा। कालसर्प जनु चले सपच्छा॥जहँ तहँ चले बिपुल नाराचा। लगे कटन भट बिकट पिसाचा॥॥२॥
फिर सत्यप्रतिज्ञ श्रीरामने एक लाख बाण छोड़े, जो पंखवाले कालसर्पोंकी तरह चले। जहाँ-तहाँ अनगिनत बाण चले, जिनसे भयानक राक्षस योद्धा कटने लगे।
कटहिं चरन उर सिर भुजदंडा। बहुतक बीर होहिं सत खंडा॥घुर्मि घुर्मि घायल महि परहीं। उठि संभारि सुभट पुनि लरहीं॥॥३॥
उनके चरण, छाती, सिर और भुजाएँ कट रही हैं, अनेक वीरोंके सैकड़ों टुकड़े हो जाते हैं। घायल चक्कर खाकर धरतीपर गिरते हैं, फिर सँभलकर उठते हैं और फिर लड़ते हैं।
लागत बान जलद जिमि गाजहीं। बहुतक देखि कठिन सर भाजहिं॥रुंड प्रचंड मुंड बिनु धावहिं। धरु धरु मारू मारु धुनि गावहिं॥॥४॥
बाण लगते ही वे बादलकी तरह गरजते हैं, कई तो कठिन बाण देखते ही भाग खड़े होते हैं। बिना सिरके प्रचंड धड़ दौड़ रहे हैं और "पकड़ो, पकड़ो, मारो, मारो" चिल्ला रहे हैं।
छन महुँ प्रभु के सायकन्हि काटे बिकट पिसाच।पुनि रघुबीर निषंग महुँ प्रबिसे सब नाराच॥॥६८॥
प्रभुके बाणोंने पलभरमें ही भयानक राक्षससेनाको काट डाला, फिर वे सब बाण लौटकर श्रीरघुनाथके तरकसमें वापस जा समाये।
कुंभकरन मन दीख बिचारी। हति धन माझ निसाचर धारी॥भा अति क्रुद्ध महाबल बीरा। कियो मृगनायक नाद गँभीरा॥॥१॥
कुम्भकर्णने मनमें देखा कि श्रीरामने क्षणभरमें राक्षससेनाका संहार कर दिया। तब वह महाबली वीर अत्यन्त क्रोधित होकर गम्भीर सिंहगर्जना करने लगा।
कोपि महीधर लेइ उपारी। डारइ जहँ मर्कट भट भारी॥आवत देखि सैल प्रभु भारे। सरन्हि काटि रज सम करि डारे॥॥२॥
वह क्रोधसे पर्वत उखाड़ लेता और जहाँ भारी वानर योद्धा होते वहीं फेंक देता। बड़े-बड़े पर्वतोंको आते देख प्रभुने उन्हें बाणोंसे काटकर धूलकी तरह चूर-चूर कर दिया।
पुनि धनु तानि कोपि रघुनायक। छाँड़े अति कराल बहु सायक॥तनु महुँ प्रबिसि निसरि सर जाहीं। जिमि दामिनि घन माझ समाहीं॥॥३॥
फिर श्रीरघुनाथने क्रोधसे धनुष तानकर अत्यन्त भयानक बाण छोड़े, जो कुम्भकर्णके शरीरमें घुसकर उसी तरह पार निकल गये जैसे बिजलियाँ बादलमें समा जाती हैं।
सोनित स्त्रवत सोह तन कारे। जनु कज्जल गिरि गेरु पनारे॥बिकल बिलोकि भालु कपि धाए। बिहँसा जबहिं निकट कपि आए॥॥४॥
उसके काले शरीरसे बहता रक्त ऐसा शोभित हो रहा है मानो काजलके पर्वतसे गेरूकी धाराएँ बह रही हों। उसे व्याकुल देखकर रीछ-वानर दौड़े, पर वे निकट आते ही वह हँस पड़ा।
महानाद करि गर्जा कोटि कोटि गहि कीस।महि पटकइ गजराज इव सपथ करइ दससीस॥॥६९॥
फिर वह घोर गर्जना करके करोड़ों वानरोंको पकड़-पकड़कर गजराजकी तरह धरतीपर पटकने लगा और रावणकी जय-जयकार करने लगा।
भागे भालु बलीमुख जूथा। बृकु बिलोकि जिमि मेष बरूथा।॥चले भागि कपि भालु भवानी। बिकल पुकारत आरत बानी॥॥१॥
यह देखकर भालू-वानरोंके झुंड ऐसे भागे जैसे भेड़ियेको देखकर भेड़ोंके झुंड भागते हैं। शिवजी कहते हैं—हे भवानी! वानर-भालू व्याकुल होकर आर्तस्वरमें पुकारते हुए भाग खड़े हुए।
यह निसिचर दुकाल सम अहई। कपिकुल देस परन अब चहई॥कृपा बारिधर राम खरारी। पाहि पाहि प्रनतारति हारी॥॥२॥
वे कहने लगे—यह राक्षस तो अकालकी तरह है, जो अब वानरकुलरूपी देशको ही उजाड़ना चाहता है। हे कृपाके मेघ, खरके शत्रु श्रीराम! हे शरणागतका दुःख हरनेवाले! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।
सकरुन बचन सुनत भगवाना। चले सुधारि सरासन बाना॥राम सेन निज पाछें घाली। चले सकोप महा बलसाली॥॥३॥
यह करुणाभरी पुकार सुनते ही भगवान धनुष-बाण सँभालकर चल पड़े। महाबलशाली श्रीरामने सेनाको अपने पीछे रखकर स्वयं क्रोधपूर्वक आगे बढ़े।
खैंचि धनुष सर सत संधाने। छूटे तीर सरीर समाने॥लागत सर धावा रिस भरा। कुधर डगमगत डोलति धरा॥॥४॥
उन्होंने धनुष खींचकर सौ बाण छोड़े, जो सीधे उसके शरीरमें जा समाये। बाण लगते ही वह क्रोधसे भरकर दौड़ा, जिससे पर्वत डगमगाने और धरती हिलने लगी।
लीन्ह एक तेहिं सैल उपाटी। रघुकुल तिलक भुजा सोइ काटी॥धावा बाम बाहु गिरि धारी। प्रभु सोउ भुजा काटि महि पारी॥॥५॥
उसने एक पर्वत उखाड़ लिया, तो रघुकुलतिलक श्रीरामने उसकी वही भुजा काट डाली। वह बायें हाथमें पर्वत उठाकर फिर दौड़ा, प्रभुने वह भुजा भी काटकर धरतीपर गिरा दी।
काटें भुजा सोह खल कैसा। पच्छहीन मंदर गिरि जैसा॥उग्र बिलोकनि प्रभुहि बिलोका। ग्रसन चहत मानहुँ त्रेलोका॥॥६॥
दोनों भुजाएँ कट जानेपर वह दुष्ट ऐसा दिखने लगा जैसे बिना पंखोंका मन्दराचल पर्वत। उसने उग्र दृष्टिसे प्रभुको देखा, मानो तीनों लोकोंको ही निगल जाना चाहता हो।
करि चिक्कार घोर अति धावा बदनु पसारि।गगन सिद्ध सुर त्रासित हा हा हेति पुकारि॥॥७०॥
वह घोर चीत्कार करते हुए मुँह फैलाकर दौड़ा। आकाशमें सिद्ध और देवता भयभीत होकर "हा! हा!" पुकार उठे।
सभय देव करुनानिधि जान्यो। श्रवन प्रजंत सरासनु तान्यो॥बिसिख निकर निसिचर मुख भरेऊ। तदपि महाबल भूमि न परेऊ॥॥१॥
करुणानिधान प्रभुने देवताओंको भयभीत जाना, तब धनुषको कानतक खींचकर उसके मुँहको बाणोंसे भर दिया। फिर भी वह महाबली धरतीपर नहीं गिरा।
सरन्हि भरा मुख सन्मुख धावा। काल त्रोन सजीव जनु आवा॥तब प्रभु कोपि तीब्र सर लीन्हा। धर ते भिन्न तासु सिर कीन्हा॥॥२॥
मुँह बाणोंसे भरा होने पर भी वह सामने दौड़ा, मानो कालरूपी सजीव तरकस ही चला आ रहा हो। तब प्रभुने क्रोधसे एक तीक्ष्ण बाण लेकर उसका सिर धड़से अलग कर दिया।
सो सिर परेउ दसानन आगें। बिकल भयउ जिमि फनि मनि त्यागें॥धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब प्रभु काटि कीन्ह दुइ खंडा॥॥३॥
वह सिर रावणके सामने जा गिरा, जिसे देखकर रावण ऐसा व्याकुल हुआ जैसे मणि खो देनेपर साँप। कुम्भकर्णका प्रचंड धड़ दौड़ता रहा, जिससे धरती धँसती जा रही थी, तब प्रभुने उसे काटकर दो टुकड़े कर दिये।
परे भूमि जिमि नभ तें भूधर। हेठ दाबि कपि भालु निसाचर॥तासु तेज प्रभु बदन समाना। सुर मुनि सबहिं अचंभव माना॥॥४॥
वे दोनों टुकड़े वानर-भालू और राक्षसोंको अपने नीचे दबाते हुए धरतीपर ऐसे गिरे मानो आकाशसे दो पर्वत गिरे हों। उसका तेज प्रभुके मुखमें जा समाया, यह देखकर देवता और मुनि सब आश्चर्यचकित रह गये।
सुर दुंदुभीं बजावहिं हरषहिं। अस्तुति करहिं सुमन बहु बरषहिं॥करि बिनती सुर सकल सिधाए। तेही समय देवरिषि आए॥॥५॥
देवता नगाड़े बजाते, हर्षित होते और स्तुति करते हुए फूलोंकी वर्षा करने लगे। विनती करके सब देवता चले गये, उसी समय देवर्षि नारद आ पहुँचे।
गगनोपरि हरि गुन गन गाए। रुचिर बीररस प्रभु मन भाए॥बेगि हतहु खल कहि मुनि गए। राम समर महि सोभत भए॥॥६॥
उन्होंने आकाशसे श्रीहरिके वीररसभरे गुणोंका गान किया, जो प्रभुके मनको बहुत भाया। मुनि यह कहकर चले गये कि अब शीघ्र ही दुष्ट रावणका वध कीजिये—श्रीराम रणभूमिमें ऐसे सुशोभित हुए।
संग्राम भूमि बिराज रघुपति अतुल बल कोसल धनी।श्रम बिंदु मुख राजीव लोचन अरुन तन सोनित कनी॥भुज जुगल फेरत सर सरासन भालु कपि चहु दिसि बने।कह दास तुलसी कहि न सक छबि सेष जेहि आनन घने॥
अतुलनीय बलवाले कोसलपति श्रीरघुनाथ रणभूमिमें सुशोभित हैं, मुखपर पसीनेकी बूँदें और कमलनयनोंमें हल्की लाली है, शरीरपर रक्तके छींटे हैं, दोनों हाथोंसे धनुष-बाण घुमा रहे हैं और चारों ओर रीछ-वानर शोभित हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभुकी इस छविका वर्णन तो हजार मुखवाले शेषजी भी नहीं कर सकते।
निसिचर अधम मलाकर ताहि दीन्ह निज धाम।गिरिजा ते नर मंदमति जे न भजहिं श्रीराम॥॥७१॥
शिवजी कहते हैं—हे गिरिजे! जो नीच राक्षस और पापकी खान था, उस कुम्भकर्णको भी श्रीरामने अपना परमधाम दे दिया! अतः जो मनुष्य उन श्रीरामको नहीं भजते, वे निश्चय ही मन्दबुद्धि हैं।
दिन के अंत फिरीं दोउ अनी। समर भई सुभटन्ह श्रम घनी॥राम कृपाँ कपि दल बल बाढ़ा। जिमि तृन पाइ लाग अति डाढ़ा॥॥१॥
दिनका अन्त होते ही दोनों सेनाएँ लौट पड़ीं, आज योद्धाओंको बड़ी थकान हुई। पर श्रीरामकी कृपासे वानरसेनाका बल उसी तरह बढ़ गया जैसे घास पाकर आग और भी भड़क उठती है।
छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती। निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती॥बहु बिलाप दसकंधर करई। बंधु सीस पुनि पुनि उर धरई॥॥२॥
उधर राक्षस दिन-रात इस तरह घटते जा रहे हैं जैसे अपने ही मुँहसे पुण्य बखाननेपर पुण्य घटता है। रावण बहुत विलाप कर रहा है, बार-बार भाई कुम्भकर्णका सिर छातीसे लगाता है।
रोवहिं नारि हृदय हति पानी। तासु तेज बल बिपुल बखानी॥मेघनाद तेहि अवसर आयउ। कहि बहु कथा पिता समुझायउ॥॥३॥
स्त्रियाँ उसके तेज-बलका बखान करते हुए छाती पीट-पीटकर रो रही हैं। उसी समय मेघनाद वहाँ आया और उसने कई बातें कहकर पिताको समझाया।
देखेहु कालि मोरि मनुसाई। अबहिं बहुत का करौं बड़ाई॥इष्टदेव सैं बल रथ पायउँ। सो बल तात न तोहि देखायउँ॥॥४॥
और कहा—कल मेरा पराक्रम देखियेगा, अभी बहुत बड़ाई करनेकी क्या जरूरत! हे तात! मुझे अपने इष्टदेवसे जो बल और रथ मिला है, वह अबतक आपको नहीं दिखाया था।
एहि बिधि जल्पत भयउ बिहाना। चहुँ दुआर लागे कपि नाना॥इत कपि भालु काल सम बीरा। उत रजनीचर अति रनधीरा॥॥५॥
इस तरह डींग हाँकते-हाँकते सबेरा हो गया। लंकाके चारों द्वारोंपर बहुतसे वानर जा डटे—इधर काल-जैसे वीर वानर-भालू और उधर अत्यन्त रणधीर राक्षस।
लरहिं सुभट निज निज जय हेतू। बरनि न जाइ समर खगकेतू॥॥६॥
दोनों ओरके योद्धा अपनी-अपनी विजयके लिये लड़ रहे हैं। हे गरुड़! उस युद्धका वर्णन करना असंभव है।
मेघनाद मायामय रथ चढ़ि गयउ अकास।गर्जेउ अट्टहास करि भइ कपि कटकहि त्रास॥॥७२॥
मेघनाद अपने मायामय रथपर चढ़कर आकाशमें जा पहुँचा और जोरसे अट्टहास करके गरजा, जिससे वानरसेनामें भय फैल गया।
सक्ति सूल तरवारि कृपाना। अस्त्र सस्त्र कुलिसायुध नाना॥डारह परसु परिघ पाषाना। लागेउ बृष्टि करै बहु बाना॥॥१॥
वह शक्ति, त्रिशूल, तलवार, कृपाण आदि तरह-तरहके अस्त्र-शस्त्र चलाने लगा, और फरसे, परिघ, पत्थर फेंकने तथा बाणोंकी झड़ी लगाने लगा।
दस दिसि रहे बान नभ छाई। मानहुँ मघा मेघ झरि लाई॥धरु धरु मारु सुनिअ धुनि काना। जो मारइ तेहि कोउ न जाना॥॥२॥
दसों दिशाओंमें बाण छा गये, मानो मघा नक्षत्रके बादलोंने झड़ी लगा दी हो। "पकड़ो, पकड़ो, मारो" की आवाजें कानोंमें पड़ती हैं, पर मारनेवाला कौन है, यह कोई नहीं जान पाता।
गहि गिरि तरु अकास कपि धावहिं। देखहिं तेहि न दुखित फिरि आवहिं॥अवघट घाट बाट गिरि कंदर। माया बल कीन्हेसि सर पंजर॥॥३॥
पर्वत और वृक्ष लेकर वानर आकाशमें दौड़ते हैं, पर उसे देख नहीं पाते और दुखी होकर लौट आते हैं—मेघनादने अपनी मायासे विकट घाटियों, रास्तों और पर्वत-कन्दराओंको बाणोंसे भर दिया था।
जाहिं कहाँ ब्याकुल भए बंदर। सुरपति बंदि परे जनु मंदर॥मारुतसुत अंगद नल नीला। कीन्हेसि बिकल सकल बलसीला॥॥४॥
कहाँ जायँ, यह न सूझनेसे वानर व्याकुल हो उठे, मानो इन्द्रकी कैदमें पड़े पर्वत हों। मेघनादने हनुमान, अंगद, नल और नील—सभी बलवानोंको व्याकुल कर दिया।
पुनि लछिमन सुग्रीव बिभीषन। सरन्हि मारि कीन्हेसि जर्जर तन॥पुनि रघुपति सैं जूझे लागा। सर छाँड़इ होइ लागहिं नागा॥॥५॥
फिर उसने लक्ष्मण, सुग्रीव और विभीषणको भी बाणोंसे बींधकर उनके शरीर छलनी कर दिये। फिर वह श्रीरघुनाथसे भी युद्ध करने लगा—उसके छोड़े बाण साँप बनकर लगते।
ब्याल पास बस भए खरारी। स्वबस अनंत एक अबिकारी॥नट इव कपट चरित कर नाना। सदा स्वतंत्र एक भगवाना॥॥६॥
जो सर्वथा स्वतंत्र, अनंत, अखंड और निर्विकार हैं, वे खरारि श्रीराम लीलावश नागपाशमें बँध गये। श्रीराम तो सदा स्वतंत्र, अद्वितीय भगवान ही हैं, वे नटकी तरह अनेक दिखावटी लीलाएँ रचते हैं।
रन सोभा लगि प्रभुहिं बँधायो। नागपास देवन्ह भय पायो॥॥७॥
रणकी शोभाके लिये ही मानो प्रभुने स्वयंको नागपाशमें बँधा लिया, पर इससे देवताओंमें भारी भय फैल गया।
गिरिजा जासु नाम जपि मुनि काटहिं भव पास।सो कि बंध तर आवइ ब्यापक बिस्व निवास॥॥७३॥
शिवजी कहते हैं—हे गिरिजे! जिनका नाम जपकर मुनि जन्म-मृत्युके बन्धन काट डालते हैं, वे सर्वव्यापी और विश्वके आधार प्रभु भला किसी बन्धनमें कैसे बँध सकते हैं?
चरित राम के सगुन भवानी। तर्कि न जाहिं बुद्धि बल बानी॥अस बिचारि जे तग्य बिरागी। रामहि भजहिं तर्क सब त्यागी॥॥१॥
हे भवानी! श्रीरामकी इन सगुण लीलाओंको बुद्धि या वाणीके तर्कसे नहीं समझा जा सकता। यही सोचकर तत्त्वज्ञानी और विरक्त पुरुष सब तर्क छोड़कर श्रीरामका भजन ही करते हैं।
ब्याकुल कटकु कीन्ह घननादा। पुनि भा प्रगट कहइ दुर्बादा॥जामवंत कह खल रहु ठाढ़ा। सुनि करि ताहि क्रोध अति बाढ़ा॥॥२॥
मेघनादने सेनाको व्याकुल कर दिया, फिर वह स्वयं प्रकट होकर दुर्वचन बोलने लगा। जाम्बवानने कहा—अरे दुष्ट! वहीं खड़ा रह। यह सुनकर उसे बड़ा क्रोध आया।
बूढ़ जानि सठ छाँड़ेउँ तोही। लागेसि अधम पचारै मोही॥अस कहि तरल त्रिसूल चलायो। जामवंत कर गहि सोइ धायो॥॥३॥
उसने कहा—अरे मूर्ख! मैंने तुझे बूढ़ा समझकर छोड़ दिया था, अरे नीच! अब तू मुझे ही ललकारने लगा? ऐसा कहकर उसने चमकता त्रिशूल चलाया, जाम्बवानने उसे हाथसे ही पकड़कर उसीकी ओर दौड़ा दिया।
मारिसि मेघनाद के छाती। परा भूमि घुर्मित सुरघाती॥पुनि रिसान गहि चरन फिरायौ। महि पछारि निज बल देखरायो॥॥४॥
और उसे मेघनादकी छातीपर दे मारा। वह देवशत्रु चक्कर खाकर धरतीपर गिर पड़ा। जाम्बवानने फिर क्रोधसे उसका पैर पकड़कर घुमाया और धरतीपर पछाड़कर अपना बल दिखा दिया।
बर प्रसाद सो मरइ न मारा। तब गहि पद लंका पर डारा॥इहाँ देवरिषि गरुड़ पठायो। राम समीप सपदि सो आयो॥॥५॥
पर वरदानके प्रभावसे वह मारे नहीं मरता। तब जाम्बवानने उसका पैर पकड़कर उसे लंकापर फेंक दिया। इधर देवर्षि नारदने गरुड़को भेजा, वे तुरंत ही श्रीरामके पास आ पहुँचे।
खगपति सब धरि खाए माया नाग बरूथ।माया बिगत भए सब हरषे बानर जूथ॥॥७४(क)॥
पक्षिराज गरुड़ने सब मायावी नागोंके समूहको पकड़-पकड़कर खा लिया, तब सब वानरोंके झुंड मायासे मुक्त होकर हर्षित हो उठे।
गहि गिरि पादप उपल नख धाए कीस रिसाइ।चले तमीचर बिकलतर गढ़ पर चढ़े पराइ॥॥७४(ख)॥
पर्वत, वृक्ष, पत्थर और नाखून लिये वानर क्रोधसे दौड़ पड़े। राक्षस अत्यन्त व्याकुल होकर भाग खड़े हुए और भागकर किलेपर जा चढ़े।
मेघनाद के मुरछा जागी। पितहि बिलोकि लाज अति लागी॥तुरत गयउ गिरिबर कंदरा। करौं अजय मख अस मन धरा॥॥१॥
मेघनादकी मूर्छा टूटी, तो पिताको देखकर उसे बड़ी लज्जा आयी। मैं अजेय होनेके लिये यज्ञ करूँगा, ऐसा निश्चय करके वह तुरंत एक श्रेष्ठ पर्वत-कन्दरामें चला गया।
इहाँ बिभीषन मंत्र बिचारा। सुनहु नाथ बल अतुल उदारा॥मेघनाद मख करइ अपावन। खल मायावी देव सतावन॥॥२॥
इधर विभीषणने यह सलाह दी—हे अतुलनीय बलवान, उदार प्रभु! सुनिये, देवताओंको सतानेवाला दुष्ट मायावी मेघनाद एक अपवित्र यज्ञ कर रहा है।
जौं प्रभु सिद्ध होइ सो पाइहि। नाथ बेगि पुनि जीति न जाइहि॥सुनि रघुपति अतिसय सुख माना। बोले अंगदादि कपि नाना॥॥३॥
हे प्रभु! यदि वह यज्ञ पूर्ण हो गया तो फिर मेघनाद शीघ्र जीता न जा सकेगा। यह सुनकर श्रीराम बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने अंगद आदि अनेक वानरोंको बुलाया।
लछिमन संग जाहु सब भाई। करहु बिधंस जग्य कर जाई॥तुम्ह लछिमन मारेहु रन ओही। देखि सभय सुर दुख अति मोही॥॥४॥
और कहा—हे भाइयो! तुम सब लक्ष्मणके साथ जाओ और जाकर उसका यज्ञ विध्वंस कर दो। हे लक्ष्मण! युद्धमें तुम उसे मारना, देवताओंको भयभीत देखकर मुझे बड़ा दुःख हो रहा है।
मारेहु तेहि बल बुद्धि उपाई। जेहिं छीजै निसिचर सुनु भाई॥जामवंत सुग्रीव बिभीषन। सेन समेत रहेहु तीनिउ जन॥॥५॥
हे भाई! ऐसी बल-बुद्धिकी युक्तिसे उसे मारना कि राक्षसका ही नाश हो। हे जाम्बवान, सुग्रीव और विभीषण! तुम तीनों सेनासहित इनके साथ रहना।
जब रघुबीर दीन्हि अनुसासन। कटि निषंग कसि साजि सरासन॥प्रभु प्रताप उर धरि रनधीरा। बोले घन इव गिरा गँभीरा॥॥६॥
जब श्रीरघुवीरने यह आज्ञा दी, तब रणधीर लक्ष्मणने कमरमें तरकस कसकर, धनुष चढ़ाकर, प्रभुके प्रतापको हृदयमें धारण करते हुए बादलकी तरह गम्भीर वाणीमें कहा—
जौं तेहि आजु बधें बिनु आवौं। तौ रघुपति सेवक न कहावौं॥जौं सत संकर करहिं सहाई। तदपि हतउँ रघुबीर दोहाई॥॥७॥
यदि मैं आज उसे बिना मारे लौटूँ, तो श्रीरघुनाथका सेवक कहलानेके योग्य नहीं। भले ही सैकड़ों शंकर उसकी सहायता करें, फिर भी श्रीरघुवीरकी दुहाई है, आज मैं उसे अवश्य मारूँगा।
रघुपति चरन नाइ सिरु चलेउ तुरंत अनंत।अंगद नील मयंद नल संग सुभट हनुमंत॥॥७५॥
श्रीरघुनाथके चरणोंमें सिर नवाकर शेषावतार लक्ष्मण तुरंत चल पड़े, उनके साथ अंगद, नील, मयंद, नल और हनुमान-जैसे उत्तम योद्धा थे।
जाइ कपिन्ह सो देखा बैसा। आहुति देत रुधिर अरु भैंसा॥कीन्ह कपिन्ह सब जग्य बिधंसा। जब न उठइ तब करहिं प्रसंसा॥॥१॥
वानरोंने जाकर देखा कि मेघनाद बैठा हुआ रक्त और भैंसकी आहुति दे रहा है। वानरोंने उसका सारा यज्ञ ध्वस्त कर दिया, फिर भी जब वह नहीं उठा तो वे उसकी खिल्ली उड़ाने लगे।
तदपि न उठइ धरेन्हि कच जाई। लातन्हि हति हति चले पराई॥लै त्रिसुल धावा कपि भागे। आए जहँ रामानुज आगे॥॥२॥
फिर भी जब वह नहीं उठा, तो उन्होंने उसके बाल पकड़कर लातें जमायीं और भाग चले। वह त्रिशूल उठाकर दौड़ा, वानर भागकर वहाँ आ गये जहाँ आगे लक्ष्मण खड़े थे।
आवा परम क्रोध कर मारा। गर्ज घोर रव बारहिं बारा॥कोपि मरुतसुत अंगद धाए। हति त्रिसूल उर धरनि गिराए॥॥३॥
वह अत्यन्त क्रोधमें भरा हुआ आया और बार-बार भयानक गर्जना करने लगा। हनुमान और अंगद क्रोधसे दौड़े, पर उसने त्रिशूलसे छातीपर मारकर दोनोंको धरतीपर गिरा दिया।
प्रभु कहँ छाँड़ेसि सूल प्रचंडा। सर हति कृत अनंत जुग खंडा॥उठि बहोरि मारुति जुबराजा। हतहिं कोपि तेहि घाउ न बाजा॥॥४॥
फिर उसने लक्ष्मणपर प्रचंड त्रिशूल छोड़ा, पर अनंतरूप लक्ष्मणने बाणसे उसके दो टुकड़े कर दिये। हनुमान और युवराज अंगद फिर उठकर क्रोधसे उसे मारने लगे, पर उसे कोई चोट नहीं लगती थी।
फिरे बीर रिपु मरइ न मारा। तब धावा करि घोर चिकारा॥आवत देखि क्रुद्ध जनु काला। लछिमन छाड़े बिसिख कराला॥॥५॥
शत्रु मारे नहीं मर रहा, यह देख वीर लौटे, तो वह घोर चीत्कार करते हुए दौड़ा। उसे क्रुद्ध कालकी तरह आता देखकर लक्ष्मणने भयानक बाण छोड़े।
देखेसि आवत पबि सम बाना। तुरत भयउ खल अंतरधाना॥बिबिध बेष धरि करइ लराई। कबहुँक प्रगट कबहुँ दुरि जाई॥॥६॥
वज्रके समान बाणोंको आते देखकर वह दुष्ट तुरंत अन्तर्धान हो गया और फिर तरह-तरहके रूप धरकर लड़ने लगा—कभी प्रकट होता, कभी छिप जाता।
देखि अजय रिपु डरपे कीसा। परम क्रुद्ध तब भयउ अहीसा॥लछिमन मन अस मंत्र दृढ़ावा। एहि पापिहि मैं बहुत खेलावा॥॥७॥
शत्रुको पराजित होता न देखकर वानर डर गये, तब शेषावतार लक्ष्मण अत्यन्त क्रोधित हो उठे। उन्होंने मनमें दृढ़ निश्चय किया—इस पापीको मैं बहुत खेला चुका, अब इसे समाप्त ही कर देना चाहिये।
सुमिरि कोसलाधीस प्रतापा। सर संधान कीन्ह करि दापा॥छाड़ा बान माझ उर लागा। मरती बार कपटु सब त्यागा॥॥८॥
कोसलपति श्रीरामके प्रतापका स्मरण करके लक्ष्मणने वीरोचित दर्पके साथ बाण चढ़ाया। बाण छूटते ही उसकी छातीके बीचमें जा लगा, मरते समय उसने सारा कपट त्याग दिया।
रामानुज कहँ रामु कहँ अस कहि छाँड़ेसि प्रान।धन्य धन्य तव जननी कह अंगद हनुमान॥॥७६॥
"लक्ष्मण कहाँ हैं? राम कहाँ हैं?" ऐसा कहते हुए उसने प्राण त्याग दिये। अंगद और हनुमान बोल उठे—तेरी माता धन्य है, धन्य है, जो तू मरते समय भी राम-लक्ष्मणका ही स्मरण करता रहा।
बिनु प्रयास हनुमान उठायो। लंका द्वार राखि पुनि आयो॥तासु मरन सुनि सुर गंधर्बा। चढ़ि बिमान आए नभ सर्बा॥॥१॥
हनुमानने उसे बिना किसी परिश्रमके उठा लिया और लंकाके द्वारपर रखकर लौट आये। उसका मरना सुनकर देवता और गन्धर्व सब विमानोंपर चढ़कर आकाशमें आ पहुँचे।
बरषि सुमन दुंदुभीं बजावहिं। श्रीरघुनाथ बिमल जसु गावहिं॥जय अनंत जय जगदाधारा। तुम्ह प्रभु सब देवन्हि निस्तारा॥॥२॥
वे फूल बरसाकर नगाड़े बजाते हैं और श्रीरघुनाथका निर्मल यश गाते हैं—हे अनंत! आपकी जय हो, हे जगदाधार! आपकी जय हो, आपने सब देवताओंका महासंकटसे उद्धार कर दिया।
अस्तुति करि सुर सिद्ध सिधाए। लछिमन कृपासिंधु पहिं आए॥सुत बध सुना दसानन जबहीं। मुरुछित भयउ परेउ महि तबहीं॥॥३॥
स्तुति करके देवता-सिद्ध चले गये, तब लक्ष्मण कृपासागर श्रीरामके पास आये। इधर रावणने ज्योंही पुत्रवधका समाचार सुना, त्योंही वह मूर्छित होकर धरतीपर गिर पड़ा।
मंदोदरी रुदन कर भारी। उर ताड़न बहु भाँति पुकारी॥नगर लोग सब ब्याकुल सोचा। सकल कहहिं दसकंधर पोचा॥॥४॥
मन्दोदरी छाती पीट-पीटकर तरह-तरहसे पुकारते हुए बड़ा भारी विलाप करने लगी। नगरके सब लोग शोकसे व्याकुल हो उठे, सब रावणको ही दोषी ठहराने लगे।
तब दसकंठ बिबिध बिधि समुझाईं सब नारि।नस्वर रूप जगत सब देखहु हृदयँ बिचारि॥॥७७॥
तब रावणने सब स्त्रियोंको अनेक प्रकारसे यह समझाया—सारे संसारका यह रूप नाशवान है, हृदयमें विचारकर देख लो।
तिन्हहि ग्यान उपदेसा रावन। आपुन मंद कथा सुभ पावन॥पर उपदेस कुसल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनेरे॥॥१॥
रावणने उन्हें ज्ञानका उपदेश दिया—वह स्वयं तो नीच था, पर उसकी बातें शुभ और पवित्र थीं। दूसरोंको उपदेश देनेमें तो बहुत लोग निपुण होते हैं, पर उस उपदेशपर आचरण करनेवाले बहुत कम मिलते हैं।
निसा सिरानि भयउ भिनुसारा। लगे भालु कपि चारिहुँ द्वारा॥सुभट बोलाइ दसानन बोला। रन सन्मुख जा कर मन डोला॥॥२॥
रात बीत गयी, सबेरा हुआ। रीछ-वानर फिर चारों द्वारोंपर जा डटे। योद्धाओंको बुलाकर रावणने कहा—युद्धमें शत्रुके सामने जिसका भी मन डगमगाये,
सो अबहीं बरु जाउ पराई। संजुग बिमुख भएँ न भलाई॥निज भुज बल मैं बयरु बढ़ावा। देहउँ उतरु जो रिपु चढ़ि आवा॥॥३॥
वह अभी भाग जाय, युद्धमें आकर पीठ दिखाना अच्छा नहीं है। मैंने अपनी भुजाओंके बलपर यह वैर बढ़ाया है, जो शत्रु चढ़ आया है उसे मैं स्वयं उत्तर दूँगा।
अस कहि मरुत बेग रथ साजा। बाजे सकल जुझाऊ बाजा॥चले बीर सब अतुलित बली। जनु कज्जल कै आँधी चली॥॥४॥
ऐसा कहकर उसने पवन-जैसा वेगवान रथ सजवाया, सभी युद्ध-वाद्य बज उठे। सब अतुलनीय बलशाली वीर ऐसे चले मानो काजलकी आँधी उठी हो।
असगुन अमित होहिं तेहि काला। गनइ न भुजबल गर्ब बिसाला॥॥५॥
उस समय अनगिनत अपशकुन होने लगे, पर अपनी भुजाओंके बलके गर्वमें रावण उनकी परवाह ही नहीं करता।
अति गर्ब गनइ न सगुन असगुन स्त्रवहिं आयुध हाथ ते।भट गिरत रथ ते बाजि गज चिक्करत भाजहिं साथ ते॥गोमाय गीध कराल खर रव स्वान बोलहिं अति घने।जनु कालदूत उलूक बोलहिं बचन परम भयावने॥
अत्यन्त गर्वके कारण वह शकुन-अशकुनकी परवाह नहीं करता। हाथोंसे हथियार गिर रहे हैं, योद्धा रथसे लुढ़क रहे हैं, घोड़े-हाथी साथ छोड़कर चीखते हुए भाग रहे हैं। सियार, गिद्ध, कौए और गधे भयानक बोलियाँ बोल रहे हैं, बहुत-से कुत्ते भौंक रहे हैं, और उल्लू ऐसे डरावने बोल रहे हैं मानो साक्षात कालके दूत हों।
ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन बिश्राम।भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम॥॥७८॥
जो जीवोंसे द्रोह करनेमें रत है, मोहके वशमें है, रामसे विमुख है और कामासक्त है, उसे भला स्वप्नमें भी शुभ सम्पत्ति, शुभ शकुन या मनकी शान्ति कैसे मिल सकती है?
चलेउ निसाचर कटकु अपारा। चतुरंगिनी अनी बहु धारा॥बिबिध भाँति बाहन रथ जाना। बिपुल बरन पताक ध्वज नाना॥॥१॥
राक्षसोंकी अपार सेना चल पड़ी, चतुरंगिणी सेनाकी अनेक टुकड़ियाँ थीं। तरह-तरहके वाहन, रथ और सवारियाँ थीं, और बहुरंगी अनगिनत पताकाएँ-ध्वजाएँ लहरा रही थीं।
चले मत्त गज जूथ घनेरे। प्राबिट जलद मरुत जनु प्रेरे॥बरन बरद बिरदैत निकाया। समर सूर जानहिं बहु माया॥॥२॥
मतवाले हाथियोंके अनेक झुंड चले, मानो पवनसे प्रेरित वर्षा-ऋतुके बादल हों। रंग-बिरंगे वस्त्र धारण किये योद्धाओंके समूह थे, जो युद्धमें शूरवीर और मायाके ज्ञाता थे।
अति बिचित्र बाहिनी बिराजी। बीर बसंत सेन जनु साजी॥चलत कटक दिगसिधुंर डगहीं। छुभित पयोधि कुधर डगमगहीं॥॥३॥
अत्यन्त विचित्र सेना ऐसी शोभित थी मानो वीर वसंतने अपनी सेना सजायी हो। सेनाके चलनेसे दिशाओंके हाथी डगमगाने लगे, समुद्र क्षुब्ध हो उठा और पर्वत हिलने लगे।
उठी रेनु रबि गयउ छपाई। मरुत थकित बसुधा अकुलाई॥पनव निसान घोर रव बाजहिं। प्रलय समय के घन जनु गाजहिं॥॥४॥
इतनी धूल उड़ी कि सूर्य ढक गये, हवा थम गयी और धरती व्याकुल हो उठी। ढोल-नगाड़े भीषण ध्वनिसे बज रहे हैं, मानो प्रलयकालके बादल गरज रहे हों।
भेरि नफीरि बाज सहनाई। मारू राग सुभट सुखदाई॥केहरि नाद बीर सब करहीं। निज निज बल पौरुष उच्चरहीं॥॥५॥
भेरी, नफीरी और शहनाईपर योद्धाओंको सुख देनेवाला युद्धगीत बज रहा है। सब वीर सिंहगर्जना करते हुए अपने-अपने बल-पौरुषका बखान कर रहे हैं।
कहइ दसानन सुनहु सुभट्टा। मर्दहु भालु कपिन्ह के ठट्टा॥हौं मारिहउँ भूप द्वौ भाई। अस कहि सन्मुख फौज रेंगाई॥॥६॥
रावणने कहा—हे श्रेष्ठ योद्धाओ! सुनो, तुम रीछ-वानरोंके झुंडोंको कुचल डालो, मैं स्वयं दोनों राजकुमार भाइयोंको मारूँगा। ऐसा कहकर उसने अपनी सेना आगे बढ़ा दी।
यह सुधि सकल कपिन्ह जब पाई। धाए करि रघुबीर दोहाई॥॥७॥
यह समाचार जब सब वानरोंने पाया, तो वे श्रीरघुवीरकी दुहाई देते हुए दौड़ पड़े।
धाए बिसाल कराल मर्कट भालु काल समान ते।मानहुँ सपच्छ उड़ाहिं भूधर बृंद नाना बान ते॥नख दसन सैल महाद्रुमायुध सबल संक न मानहीं।जय राम रावन मत्त गज मृगराज सुजसु बखानहीं॥
विशाल और काल-जैसे भयंकर वानर-भालू दौड़े, मानो पंखवाले पर्वत उड़े जा रहे हों। नाखून, दाँत और बड़े-बड़े वृक्ष ही उनके हथियार थे, वे बड़े बलशाली थे और किसीसे नहीं डरते थे—वे रावणरूपी मतवाले हाथीके लिये सिंहरूप श्रीरामका जय-जयकार करते हुए उनका सुयश गा रहे थे।
दुहु दिसि जय जयकार करि निज निज जोरी जानि।भिरे बीर इत रामहि उत रावनहि बखानि॥॥७९॥
दोनों ओरके योद्धा जय-जयकार करते हुए अपनी-अपनी जोड़ी चुनकर, इधर श्रीरामका और उधर रावणका नाम लेकर आपसमें भिड़ गये।
रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा॥अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा॥॥१॥
रावणको रथपर और श्रीरघुवीरको बिना रथके देखकर विभीषण अधीर हो उठे। स्नेहवश उनके मनमें सन्देह हुआ, तो श्रीरामके चरणोंकी वन्दना करके वे स्नेहसे बोले—
नाथ न रथ नहिं तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥॥२॥
हे नाथ! आपके पास न रथ है, न कवच और न ही जूते—भला इतने बलवान रावणको कैसे जीता जायगा? कृपानिधान श्रीरामने कहा—हे सखा! सुनो, जिससे विजय मिलती है, वह रथ तो कोई और ही है।
सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥॥३॥
शौर्य और धैर्य उस रथके पहिये हैं, सत्य और सदाचार उसकी मजबूत ध्वजा-पताका हैं। बल, विवेक, संयम और परोपकार—ये चारों उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समताकी डोरीसे जुते हुए हैं।
ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना॥दान परसु बुधि सक्ति प्रचंड़ा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा॥॥४॥
ईश्वरका भजन ही उस रथका चतुर सारथी है, वैराग्य ढाल है और संतोष तलवार है। दान फरसा है, बुद्धि प्रचंड शक्ति है, और श्रेष्ठ विवेक कठिन धनुष है।
अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना॥कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा॥॥५॥
निर्मल और स्थिर मन तरकसके समान है, शम, यम और नियम उसके अनेक बाण हैं। ब्राह्मण-गुरुकी पूजा अभेद्य कवच है—इसके समान विजयका दूसरा कोई उपाय नहीं।
सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें॥॥६॥
हे सखा! जिसके पास ऐसा धर्ममय रथ हो, उसके लिये जीतनेको संसारमें कोई शत्रु ही शेष नहीं रह जाता।
महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर।जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर॥॥८०(क)॥
हे धीरबुद्धि सखा! सुनो, जिसके पास ऐसा दृढ़ रथ हो, वह वीर संसाररूपी महान दुर्जय शत्रुको भी जीत सकता है, रावणकी तो बात ही क्या।
सुनि प्रभु बचन बिभीषन हरषि गहे पद कंज।एहि मिस मोहि उपदेसेहु राम कृपा सुख पुंज॥॥८०(ख)॥
प्रभुके ये वचन सुनकर विभीषणने हर्षित होकर उनके चरणकमल पकड़ लिये—हे कृपा और सुखके सागर श्रीराम! आपने इसी बहाने मुझे भी महान उपदेश दे दिया।
उत पचार दसकंधर इत अंगद हनुमान।लरत निसाचर भालु कपि करि निज निज प्रभु आन॥॥८०(ग)॥
उधरसे रावण ललकार रहा है और इधरसे अंगद-हनुमान। राक्षस और रीछ-वानर अपने-अपने स्वामीकी दुहाई देते हुए लड़ रहे हैं।
सुर ब्रह्मादि सिद्ध मुनि नाना। देखत रन नभ चढ़े बिमाना॥हमहू उमा रहे तेहि संगा। देखत राम चरित रन रंगा॥॥१॥
सूर्य-चंद्र, ब्रह्मा आदि देवता और अनगिनत सिद्ध-मुनि विमानों पर सवार होकर आकाशसे यह युद्ध निहार रहे हैं। शिवजी कहते हैं—हे उमा! मैं भी उसी देव-समूहमें खड़ा श्रीरामके रणकौशलकी यह लीला देख रहा था।
सुभट समर रस दुहु दिसि माते। कपि जयसील राम बल ताते॥एक एक सन भिरहिं पचारहिं। एकन्ह एक मर्दि महि पारहिं॥॥२॥
दोनों दलोंके योद्धा युद्धके नशेमें चूर हैं, पर श्रीरामके बलसे वानर सेना ही विजयी होती जा रही है। योद्धा एक-दूसरेको ललकारते हुए भिड़ते हैं और परस्पर एक-दूसरेको रौंदकर धरतीपर पटक देते हैं।
मारहिं काटहिं धरहिं पछारहिं। सीस तोरि सीसन्ह सन मारहिं॥उदर बिदारहिं भुजा उपारहिं। गहि पद अवनि पटकि भट डारहिं॥॥३॥
कोई मारता है, कोई काटता है, कोई पकड़कर पछाड़ देता है; कटे सिरोंसे ही दूसरोंके सिर फोड़े जा रहे हैं। किसीका पेट चीरा जा रहा है, किसीकी भुजा उखाड़ी जा रही है, तो किसीको पैर पकड़कर धरतीपर दे मारा जा रहा है।
निसिचर भट महि गाड़हि भालू। ऊपर ढारि देहिं बहु बालू॥बीर बलिमुख जुद्ध बिरुद्धे। देखिअत बिपुल काल जनु क्रुद्धे॥॥४॥
भालू राक्षस योद्धाओंको धरतीमें गाड़कर ऊपरसे ढेरों बालू लाद देते हैं। युद्धमें शत्रुओंसे भिड़े वीर वानर मानो असंख्य क्रुद्ध कालके रूप धरकर उतर आये हों।
क्रुद्धे कृतांत समान कपि तन स्त्रवत सोनित राजहीं।मर्दहिं निसाचर कटक भट बलवंत घन जिमि गाजहीं॥मारहिं चपेटन्हि डाटि दातन्ह काटि लातन्ह मीजहीं।चिक्करहिं मर्कट भालु छल बल करहिं जेहिं खल छीजहीं॥
क्रोधसे भरे काल-सरीखे वे वानर लहू-लुहान शरीरोंसे भी शोभा पा रहे हैं। बलवान वानर-वीर राक्षस-सेनाको मसल डालते हैं और मेघकी भाँति गरज उठते हैं। कभी चाँटोंसे धमकाकर मारते हैं, कभी दाँतोंसे काटकर लातोंसे रौंद डालते हैं। वानर-भालू चीत्कार करते और ऐसी युक्ति-बल भिड़ाते हैं कि दुष्ट राक्षस नष्ट हो जायँ।
धरि गाल फारहिं उर बिदारहिं गल अँतावरि मेलहीं।प्रहलादपति जनु बिबिध तनु धरि समर अंगन खेलहीं॥धरु मारु काटु पछारु घोर गिरा गगन महि भरि रही।जय राम जो तृन ते कुलिस कर कुलिस ते कर तृन सही॥
वे राक्षसोंके गाल पकड़कर चीर डालते हैं, छाती फाड़ देते हैं और अँतड़ियाँ निकालकर उन्हींके गलेमें डाल देते हैं—मानो नृसिंह भगवान ही अनेक रूप धरकर रणभूमिमें क्रीड़ा कर रहे हों। 'पकड़ो, मारो, काटो, पछाड़ो'—इन घोर पुकारोंसे आकाश और धरती गूँज उठे हैं। जय हो श्रीरामकी, जो तिनकेको वज्र और वज्रको तिनका बना देते हैं!
निज दल बिचलत देखेसि बीस भुजाँ दस चाप।रथ चढ़ि चलेउ दसानन फिरहु फिरहु करि दाप॥॥८१॥
अपनी सेनाको यों बिखरते देख रावण बीस भुजाओंमें दस धनुष सँभालकर रथपर सवार हो गया और 'लौटो, लौटो' की गर्जना करता हुआ मैदानमें आ डटा।
धायउ परम क्रुद्ध दसकंधर। सन्मुख चले हूह दै बंदर॥गहि कर पादप उपल पहारा। डारेन्हि ता पर एकहिं बारा॥॥१॥
परम क्रुद्ध रावण दौड़ पड़ा। वानर भी हुंकार भरते हुए उसके सामने आ डटे और उन्होंने वृक्ष, पत्थर और पहाड़ एक साथ उठाकर उसपर बरसा दिये।
लागहिं सैल बज्र तन तासू। खंड खंड होइ फूटहिं आसू॥चला न अचल रहा रथ रोपी। रन दुर्मद रावन अति कोपी॥॥२॥
वे पहाड़ रावणके वज्र-सरीखे शरीरसे टकराते ही चूर-चूर होकर बिखर जाते हैं। रणके नशेमें चूर अत्यन्त क्रोधी रावण रथ थामे वहीं अडिग खड़ा रहा, टस-से-मस न हुआ।
इत उत झपटि दपटि कपि जोधा। मर्दै लाग भयउ अति क्रोधा॥चले पराइ भालु कपि नाना। त्राहि त्राहि अंगद हनुमाना॥॥३॥
क्रोधसे जलता रावण इधर-उधर झपटकर वानर योद्धाओंको रौंदने लगा। यह देख अनेक वानर-भालू 'बचाओ, बचाओ, हे अंगद! हे हनुमान!' पुकारते हुए भाग खड़े हुए।
पाहि पाहि रघुबीर गोसाई। यह खल खाइ काल की नाई॥तेहि देखे कपि सकल पराने। दसहुँ चाप सायक संधाने॥॥४॥
'बचाओ, हे रघुवीर! हे स्वामी! यह दुष्ट काल बनकर हमें निगले जा रहा है'—यह हाहाकार मच गया। सब वानरोंको भागते देख रावणने दसों धनुषोंपर बाण चढ़ा लिये।
संधानि धनु सर निकर छाड़ेसि उरग जिमि उड़ि लागहीं।रहे पूरि सर धरनी गगन दिसि बिदसि कहँ कपि भागहीं॥भयो अति कोलाहल बिकल कपि दल भालु बोलहिं आतुरे।रघुबीर करुना सिंधु आरत बंधु जन रच्छक हरे॥
उसने धनुषोंपर बाणोंकी झड़ी छोड़ी, जो सर्पकी भाँति उड़ते हुए जा लगते हैं। धरती, आकाश और दिशाएँ बाणोंसे भर गयीं—वानर भागें भी तो किधर? भारी कोलाहल मच गया और व्याकुल वानर-भालू सेना गिड़गिड़ाकर पुकार उठी—हे रघुवीर! हे करुणासागर! हे आर्तोंके बन्धु और सेवकोंके दुःख हरनेवाले हरि, अब रक्षा करो।
निज दल बिकल देखि कटि कसि निषंग धनु हाथ।लछिमन चले क्रुद्ध होइ नाइ राम पद माथ॥॥८२॥
अपनी सेनाको यों व्याकुल देख लक्ष्मणजी कमरमें तरकस कस लिया, हाथमें धनुष उठाया और श्रीरामके चरणोंमें मस्तक नवाकर क्रोधसे भरे हुए युद्धके लिये चल पड़े।
रे खल का मारसि कपि भालू। मोहि बिलोकु तोर मैं कालू॥खोजत रहेउँ तोहि सुतघाती। आजु निपाति जुड़ावउँ छाती॥॥१॥
लक्ष्मणजीने पास जाकर ललकारा—'रे दुष्ट! वानर-भालुओंको क्या मार रहा है, मुझे देख, मैं तेरा काल हूँ।' रावण बोला—'अरे मेरे पुत्रके घातक! तुझे ही ढूँढ़ रहा था, आज तुझे मारकर छाती ठंडी करूँगा।'
अस कहि छाड़ेसि बान प्रचंडा। लछिमन किए सकल सत खंडा॥कोटिन्ह आयुध रावन डारे। तिल प्रवान करि काटि निवारे॥॥२॥
यों कहकर रावणने प्रचंड बाण छोड़े, पर लक्ष्मणजीने उन सबके सैकड़ों टुकड़े कर डाले। रावणने करोड़ों अस्त्र-शस्त्र चलाये, लक्ष्मणजीने उन्हें भी काट-काटकर तिल-तिल कर डाला।
पुनि निज बानन्ह कीन्ह प्रहारा। स्यंदनु भंजि सारथी मारा॥सत सत सर मारे दस भाला। गिरि सृंगन्ह जनु प्रबिसहिं ब्याला॥॥३॥
फिर लक्ष्मणजीने अपने बाणोंसे रावणके रथको तोड़ डाला और सारथिको मार गिराया। रावणके दसों सिरोंमें सौ-सौ बाण ऐसे धँस गये मानो पर्वत-शिखरोंमें सर्प घुस रहे हों।
पुनि सत सर मारा उर माहीं। परेउ धरनि तल सुधि कछु नाहीं॥उठा प्रबल पुनि मुरुछा जागी। छाड़िसि ब्रह्म दीन्हि जो साँगी॥॥४॥
फिर सौ बाण रावणकी छातीमें मारे, जिससे वह धरतीपर गिर पड़ा और उसे कुछ सुध न रही। मूर्च्छा टूटते ही वह उठा और उसने वह प्रचंड शक्ति चला दी जो ब्रह्माजीने उसे दी थी।
सो ब्रह्म दत्त प्रचंड सक्ति अनंत उर लागी सही।परेउ बीर बिकल उठाव दसमुख अतुल बल महिमा रही॥ब्रह्मांड भवन बिराज जाकें एक सिर जिमि रज कनी।तेहि चह उठावन मूढ़ रावन जान नहिं त्रिभुअन धनी॥
ब्रह्माकी दी वह प्रचंड शक्ति सीधे लक्ष्मणजीकी छातीमें आ लगी और वे व्याकुल होकर गिर पड़े। रावण उन्हें उठाने लगा, पर उसका सारा बल व्यर्थ रह गया—भला जिनके एक सिरपर ब्रह्मांडरूपी भवन धूलके कणके समान टिका है, उन्हें यह मूर्ख रावण उठाना चाहता है, वह तीनों लोकके स्वामीको पहचानता ही नहीं।
देखि पवनसुत धायउ बोलत बचन कठोर।आवत कपिहि हन्यो तेहिं मुष्टि प्रहार प्रघोर॥॥८३॥
यह देखकर पवनपुत्र हनुमान कठोर वचन बोलते हुए दौड़ पड़े। उनके पास आते ही रावणने एक भयंकर मुक्का जड़ दिया।
जानु टेकि कपि भूमि न गिरा। उठा सँभारि बहुत रिस भरा॥मुठिका एक ताहि कपि मारा। परेउ सैल जनु बज्र प्रहारा॥॥१॥
हनुमानजी घुटनोंके बल झुके, गिरे नहीं, और क्रोधसे भरकर तुरंत सँभलकर उठ खड़े हुए। फिर उन्होंने रावणको ऐसा घूँसा जड़ा कि वह वज्रकी चोटसे टूटते पर्वतकी भाँति गिर पड़ा।
मुरुछा गै बहोरि सो जागा। कपि बल बिपुल सराहन लागा॥धिग धिग मम पौरुष धिग मोही। जौं तें जिअत रहेसि सुरद्रोही॥॥२॥
मूर्च्छा टूटते ही रावण जागा और हनुमानजीके अपार बलकी सराहना करने लगा—'धिक्कार है मेरे पौरुषको, धिक्कार है मुझको, हे देवद्रोही! कि तू अब भी जीवित बच गया।'
अस कहि लछिमन कहुँ कपि ल्यायो। देखि दसानन बिसमय पायो॥कह रघुबीर समुझु जियँ भ्राता। तुम्ह कृतांत भच्छक सुर त्राता॥॥३॥
यों कहकर हनुमानजी लक्ष्मणजीको उठा लाये और श्रीरामके पास ले आये। यह देख रावण चकित रह गया। श्रीरघुवीरने कहा—'भाई! धीरज धरो, तुम तो काल तकके भक्षक और देवताओंके रक्षक हो।'
सुनत बचन उठि बैठ कृपाला। गई गगन सो सकति कराला॥पुनि कोदंड बान गहि धाए। रिपु सन्मुख अति आतुर आए॥॥४॥
यह सुनते ही कृपालु लक्ष्मणजी उठ बैठे और वह भयंकर शक्ति आकाशको लौट गयी। फिर वे धनुष-बाण सँभालकर दौड़े और बड़ी फुर्तीसे शत्रुके सामने जा डटे।
आतुर बहोरि बिभंजि स्यंदन सूत हति ब्याकुल कियो।गिरयो धरनि दसकंधर बिकलतर बान सत बेध्यो हियो॥सारथी दूसर घालि रथ तेहि तुरत लंका लै गयो।रघुबीर बंधु प्रताप पुंज बहोरि प्रभु चरनन्हि नयो॥
लक्ष्मणजीने बड़ी फुर्तीसे रावणका रथ तोड़ डाला और सारथिको मारकर उसे व्याकुल कर दिया। सौ बाणोंसे उसका हृदय बेध डाला, जिससे रावण अत्यन्त व्याकुल होकर धरतीपर गिर पड़ा। दूसरा सारथि उसे रथमें डालकर तुरंत लंका ले गया, और प्रताप-पुंज लक्ष्मणजी लौटकर प्रभुके चरणोंमें झुक गये।
उहाँ दसानन जागि करि करै लाग कछु जग्य।राम बिरोध बिजय चह सठ हठ बस अति अग्य॥॥८४॥
उधर लंकामें रावण मूर्च्छासे जागकर कोई यज्ञ करने बैठ गया। वह मूर्ख और अत्यन्त अज्ञानी हठपूर्वक श्रीरामसे विरोध करके भी विजय पानेकी आस लगाये है।
इहाँ बिभीषन सब सुधि पाई। सपदि जाइ रघुपतिहि सुनाई॥नाथ करइ रावन एक जागा। सिद्ध भएँ नहिं मरिहि अभागा॥॥१॥
'यहाँ विभीषणजीको इसकी खबर लगी और उन्होंने तुरंत जाकर श्रीरामको बता दिया—नाथ! रावण एक यज्ञ कर रहा है, वह सिद्ध हो गया तो यह अभागा सहज ही नहीं मरेगा।'
पठवहु नाथ बेगि भट बंदर। करहिं बिधंस आव दसकंधर॥प्रात होत प्रभु सुभट पठाए। हनुमदादि अंगद सब धाए॥॥२॥
'हे नाथ! शीघ्र ही वानर योद्धाओंको भेजिये कि वे यज्ञ भंग कर दें, जिससे रावण स्वयं युद्धमें उतरे।' सवेरा होते ही प्रभुने वीर योद्धाओंको भेज दिया और हनुमान-अंगद आदि सब दौड़ पड़े।
कौतुक कूदि चढ़े कपि लंका। पैठे रावन भवन असंका॥जग्य करत जबहीं सो देखा। सकल कपिन्ह भा क्रोध बिसेषा॥॥३॥
वानर खेल-खेलमें कूदकर लंकापर जा चढ़े और निर्भय होकर रावणके महलमें घुस गये। उसे यज्ञ करते देखते ही सब वानरोंको बड़ा क्रोध आ गया।
रन ते निलज भाजि गृह आवा। इहाँ आइ बक ध्यान लगावा॥अस कहि अंगद मारा लाता। चितव न सठ स्वारथ मन राता॥॥४॥
'अरे निर्लज! युद्धसे भागकर घर आ बैठा और यहाँ बगुलेकी तरह ध्यान लगाये बैठा है!' यों कहकर अंगदने लात जड़ी, पर स्वार्थमें डूबे उस दुष्टने पलटकर देखा तक नहीं।
नहिं चितव जब करि कोप कपि गहि दसन लातन्ह मारहीं।धरि केस नारि निकारि बाहेर तेऽतिदीन पुकारहीं॥तब उठेउ क्रुद्ध कृतांत सम गहि चरन बानर डारई।एहि बीच कपिन्ह बिधंस कृत मख देखि मन महुँ हारई॥
जब उसने ध्यान न दिया तो वानर क्रोधित होकर उसे दाँतोंसे काटने और लातोंसे मारने लगे। स्त्रियोंके बाल पकड़कर उन्हें घरसे घसीट बाहर निकाल लाये, वे बेचारी बड़ी दीनतासे चीख उठीं। तब रावण काल-सा क्रोधित होकर उठा और वानरोंको पैर पकड़कर पटकने लगा, पर तब तक वानर यज्ञ नष्ट कर चुके थे—यह देख वह भीतर-ही-भीतर हार मान बैठा।
जग्य बिधंसि कुसल कपि आए रघुपति पास।चलेउ निसाचर क्रुद्ध होइ त्यागि जिवन के आस॥॥८५॥
यज्ञ नष्ट करके सब चतुर वानर श्रीरामके पास लौट आये। रावण अब जीनेकी आस छोड़कर क्रोधसे भरा हुआ रणके लिये चल पड़ा।
चलत होहिं अति असुभ भयंकर। बैठहिं गीध उड़ाइ सिरन्ह पर॥भयउ कालबस काहु न माना। कहेसि बजावहु जुद्ध निसाना॥॥१॥
चलते ही चारों ओर भयंकर अपशकुन होने लगे, गिद्ध उड़-उड़कर उसके सिरोंपर आ बैठे। पर काल-वश वह किसी अपशकुनको मानता ही न था—बस इतना ही कहा, 'युद्धका डंका बजाओ।'
चली तमीचर अनी अपारा। बहु गज रथ पदाति असवारा॥प्रभु सन्मुख धाए खल कैंसें। सलभ समूह अनल कहँ जैंसें॥॥२॥
निशाचरोंकी अपार सेना चल पड़ी, जिसमें अनगिनत हाथी, रथ, घुड़सवार और पैदल सैनिक थे। वे दुष्ट प्रभुके सामने कुछ यों दौड़े जैसे पतंगे जल मरनेके लिये आगकी ओर दौड़ पड़ते हैं।
इहाँ देवतन्ह अस्तुति कीन्ही। दारुन बिपति हमहि एहिं दीन्ही॥अब जनि राम खेलावहु एही। अतिसय दुखित होति बैदेही॥॥३॥
उधर देवताओंने स्तुति करते हुए कहा—'हे राम! इसने हमें बड़े दारुण कष्ट दिये हैं, अब इसे और मत खिलाइये, जानकीजी भी इससे अत्यन्त दुखी हो रही हैं।'
देव बचन सुनि प्रभु मुसकाना। उठि रघुबीर सुधारे बाना॥जटा जूट दृढ़ बाँधै माथे। सोहहिं सुमन बीच बिच गाथे॥॥४॥
देवताओंकी यह विनती सुनकर प्रभु मुसकरा दिये और उठकर अपने बाण सँवारने लगे। उनके मस्तकपर जटाओंका जूड़ा कसकर बँधा है, जिसमें बीच-बीचमें गुँथे फूल शोभा दे रहे हैं।
अरुन नयन बारिद तनु स्यामा। अखिल लोक लोचनाभिरामा॥कटितट परिकर कस्यो निषंगा। कर कोदंड कठिन सारंगा॥॥५॥
लाल नेत्र और मेघ-से श्याम शरीरवाले प्रभु सम्पूर्ण लोकोंके नेत्रोंको आनंद देनेवाले हैं। उन्होंने कमरमें फेंट और तरकस कसकर हाथमें कठोर शार्ङ्ग धनुष उठा लिया।
सारंग कर सुंदर निषंग सिलीमुखाकर कटि कस्यो।भुजदंड पीन मनोहरायत उर धरासुर पद लस्यो॥कह दास तुलसी जबहिं प्रभु सर चाप कर फेरन लगे।ब्रह्मांड दिग्गज कमठ अहि महि सिंधु भूधर डगमगे॥
प्रभुने हाथमें शार्ङ्ग धनुष लेकर कमरमें अक्षय बाणोंसे भरा सुंदर तरकस कस लिया। उनकी पुष्ट भुजाएँ और चौड़ी छाती परम मनोहर है, जिसपर भृगुजीके चरणका चिह्न सुशोभित है। तुलसीदासजी कहते हैं, प्रभु ज्यों ही धनुष-बाण हाथमें लेकर घुमाने लगे, त्यों ही ब्रह्मांड, दिशाओंके गज, कच्छप, शेषनाग, धरती, समुद्र और पर्वत—सब डगमगा उठे।
सोभा देखि हरषि सुर बरषहिं सुमन अपार।जय जय जय करुनानिधि छबि बल गुन आगार॥॥८६॥
प्रभुकी यह शोभा देखकर देवता हर्षसे फूलोंकी अपार वर्षा करने लगे और 'जय हो, जय हो, जय हो, शोभा-बल-गुणके धाम करुणानिधानकी जय हो' पुकार उठे।
एहीं बीच निसाचर अनी। कसमसात आई अति घनी॥देखि चले सन्मुख कपि भट्टा। प्रलयकाल के जनु घन घट्टा॥॥१॥
इसी बीच निशाचरोंकी घनघोर सेना आपसमें ठेलमठेल करती हुई आ पहुँची। उसे देख वानर योद्धा भी इस तरह आगे बढ़े मानो प्रलयकालके बादलोंके झुंड उमड़ आये हों।
बहु कृपान तरवारि चमंकहिं। जनु दहँ दिसि दामिनीं दमंकहिं॥गज रथ तुरग चिकार कठोरा। गर्जहिं मनहुँ बलाहक घोरा॥॥२॥
कृपाण और तलवारें ऐसी चमक रही हैं मानो दसों दिशाओंमें बिजलियाँ कौंध रही हों। हाथी, रथ और घोड़ोंकी कर्कश गर्जना ऐसी लग रही है मानो घोर मेघ गरज रहे हों।
कपि लंगूर बिपुल नभ छाए। मनहुँ इंद्रधनु उए सुहाए॥उठइ धूरि मानहुँ जलधारा। बान बुंद भै बृष्टि अपारा॥॥३॥
वानरोंकी अनगिनत पूँछें आकाशमें यों फैली हैं मानो सुंदर इंद्रधनुष उग आये हों। चारों ओर उठती धूल जलकी धाराके समान दीख रही है और बाणोंकी बूँदोंसे मानो वर्षा हो रही हो।
दुहुँ दिसि पर्बत करहिं प्रहारा। बज्रपात जनु बारहिं बारा॥रघुपति कोपि बान झरि लाई। घायल भै निसिचर समुदाई॥॥४॥
दोनों ओरसे योद्धा पर्वतोंके प्रहार करते हैं, मानो बारंबार वज्रपात हो रहा हो। श्रीरामने क्रोधित होकर बाणोंकी झड़ी लगा दी, जिससे राक्षस-सेना घायल होकर तड़पने लगी।
लागत बान बीर चिक्करहीं। घुर्मि घुर्मि जहँ तहँ महि परहीं॥स्त्रवहिं सैल जनु निर्झर भारी। सोनित सरि कादर भयकारी॥॥५॥
बाण लगते ही वीर चीत्कार कर उठते हैं और चक्कर खाते हुए यहाँ-वहाँ धरतीपर गिर पड़ते हैं। उनके लहूसे मानो पर्वतोंके भारी झरने बह चले हों—यह खूनकी नदी कायरोंके मनमें भय भर रही है।
कादर भयंकर रुधिर सरिता चली परम अपावनी।दोउ कूल दल रथ रेत चक्र अबर्त बहति भयावनी॥जल जंतुगज पदचर तुरग खर बिबिध बाहन को गने।सर सक्ति तोमर सर्प चाप तरंग चर्म कमठ घने॥
कायरोंको भयभीत करती वह अत्यन्त अपवित्र रक्तकी नदी बह चली, जिसके दोनों किनारे दोनों सेनाएँ ही हैं। रथ उसकी रेत हैं और पहिये उसमें बनते भँवर—यह नदी बड़ी भयावनी बहती है। हाथी, पैदल, घोड़े, गदहे आदि अनगिनत सवारियाँ ही उसके जलजंतु हैं; बाण, शक्ति और तोमर उसके सर्प हैं, धनुष उसकी लहरें हैं और ढालें उसके अनगिनत कछुए हैं।
बीर परहिं जनु तीर तरु मज्जा बहु बह फेन।कादर देखि डरहिं तहँ सुभटन्ह के मन चेन॥॥८७॥
वीर इस तरह गिर रहे हैं मानो नदी-तटके वृक्ष ढह रहे हों, और बहती मज्जा ही मानो उसका फेन है। कायर इसे देखकर काँप उठते हैं, पर श्रेष्ठ योद्धाओंके मनको यह देखकर संतोष होता है।
मज्जहि भूत पिसाच बेताला। प्रमथ महा झोटिंग कराला॥काक कंक लै भुजा उड़ाहीं। एक ते छीनि एक लै खाहीं॥॥१॥
उस नदीमें भूत, पिशाच, बेताल और बड़े-बड़े झोंटोंवाले भयंकर झोटिंग तथा प्रमथगण स्नान कर रहे हैं। कौए और गिद्ध कटी भुजाएँ लेकर उड़ते हैं और एक-दूसरेसे छीनकर खा जाते हैं।
एक कहहिं ऐसिउ सौंघाई। सठहु तुम्हार दरिद्र न जाई॥कहँरत भट घायल तट गिरे। जहँ तहँ मनहुँ अर्धजल परे॥॥२॥
'कोई कहता है—अरे मूर्खो! इतनी बहुतायत होते हुए भी तुम्हारी दरिद्रता नहीं मिटती!' घायल योद्धा तटपर पड़े कराह रहे हैं, मानो जहाँ-तहाँ अधमरे पड़े हों।
खैंचहिं गीध आँत तट भए। जनु बंसी खेलत चित दए॥बहु भट बहहिं चढ़े खग जाहीं। जनु नावरि खेलहिं सरि माहीं॥॥३॥
गिद्ध आँतें खींच रहे हैं, मानो मछुआरे मन लगाकर बंसी डाल रहे हों। बहते हुए योद्धाओंपर पक्षी सवार होकर बहे जा रहे हैं, मानो नदीमें नौका-विहार कर रहे हों।
जोगिनि भरि भरि खप्पर संचहिं। भूत पिसाच बधू नभ नंचहिं॥भट कपाल करताल बजावहिं। चामुंडा नाना बिधि गावहिं॥॥४॥
योगिनियाँ खप्परोंमें रक्त भर-भरकर बटोर रही हैं और भूत-पिशाचोंकी स्त्रियाँ आकाशमें नाच रही हैं। योद्धाओंकी खोपड़ियोंको करताल बनाकर चामुंडाएँ बजाती और तरह-तरहसे गा रही हैं।
जंबुक निकर कटक्कट कट्टहिं। खाहिं हुआहिं अघाहिं दपट्टहिं॥कोटिन्ह रुंड मुंड बिनु डोल्लहिं। सीस परे महि जय जय बोल्लहिं॥॥५॥
गीदड़ोंके झुंड कट-कट शब्द करते हुए शवोंको काट-खा रहे हैं, हुआँ-हुआँ करते और पेट भर जानेपर आपसमें डाँट-डपट रहे हैं। करोड़ों धड़ बिना सिरके ही घूम रहे हैं और कटे सिर धरतीपर पड़े 'जय-जय' पुकार रहे हैं।
बोल्लहिं जो जय जय मुंड रुंड प्रचंड सिर बिनु धावहीं।खप्परिन्ह खग्ग अलुज्झि जुज्झहिं सुभट भटन्ह ढहावहीं॥बानर निसाचर निकर मर्दहिं राम बल दर्पित भए।संग्राम अंगन सुभट सोवहिं राम सर निकरन्हि हए॥
करोड़ों कटे सिर 'जय-जय' पुकार रहे हैं और सिर-रहित धड़ प्रचंड वेगसे दौड़ रहे हैं। पक्षी खोपड़ियोंमें उलझकर आपसमें लड़-मरते हैं और श्रेष्ठ योद्धा एक-दूसरेको ढहा रहे हैं। श्रीरामके बलसे उन्मत्त वानर राक्षस-सेनाको रौंद रहे हैं और उन्हींके बाणोंसे मारे गये योद्धा रणभूमिमें मानो सो रहे हैं।
रावन हृदयँ बिचारा भा निसिचर संघार।मैं अकेल कपि भालु बहु माया करौं अपार॥॥८८॥
रावणने मन-ही-मन सोचा—मेरी राक्षस-सेना तो नष्ट हो गयी; मैं अकेला हूँ और वानर-भालू अनगिनत, इसलिये अब मैं भारी माया रचूँगा।
देवन्ह प्रभुहि पयादें देखा। उपजा उर अति छोभ बिसेषा॥सुरपति निज रथ तुरत पठावा। हरष सहित मातलि लै आवा॥॥१॥
प्रभुको पैदल युद्ध करते देख देवताओंके हृदयमें बड़ा क्षोभ हुआ। इंद्रने तुरंत अपना रथ भेजा, जिसे सारथि मातलि हर्षपूर्वक ले आया।
तेज पुंज रथ दिब्य अनूपा। हरषि चढ़े कोसलपुर भूपा॥चंचल तुरग मनोहर चारी। अजर अमर मन सम गतिकारी॥॥२॥
उस दिव्य, अनुपम और तेजोमय रथपर कोसलपति श्रीराम प्रसन्न होकर सवार हुए। रथमें चार चंचल, मनोहर, अजर-अमर और मनकी गतिके समान वेगवान घोड़े जुते थे।
रथारूढ़ रघुनाथहि देखी। धाए कपि बलु पाइ बिसेषी॥सही न जाइ कपिन्ह के मारी। तब रावन माया बिस्तारी॥॥३॥
श्रीरामको रथपर आरूढ़ देख वानर विशेष बल पाकर दौड़ पड़े। उनकी मार सही न जाने पर रावणने तब माया फैलायी।
सो माया रघुबीरहि बाँची। लछिमन कपिन्ह सो मानी साँची॥देखी कपिन्ह निसाचर अनी। अनुज सहित बहु कोसलधनी॥॥४॥
वह माया अकेले श्रीरामपर न चली, पर लक्ष्मणजी और वानरोंने उसे सच मान लिया—उन्हें राक्षस-सेनामें लक्ष्मणसहित अनेक रामोंके रूप दिखने लगे।
बहु राम लछिमन देखि मर्कट भालु मन अति अपडरे।जनु चित्र लिखित समेत लछिमन जहँ सो तहँ चितवहिं खरे॥निज सेन चकित बिलोकि हँसि सर चाप सजि कोसल धनी।माया हरी हरि निमिष महुँ हरषी सकल मर्कट अनी॥
अनेक राम-लक्ष्मण देखकर वानर-भालू भ्रमवश डर गये और चित्रलिखितसे जहाँ-के-तहाँ ठिठककर देखते रह गये। अपनी सेनाको यों चकित देख कोसलपति हँसे और धनुष-बाण उठाकर पल भरमें सारी माया हर ली, जिससे वानर-सेना फिर हर्षसे भर उठी।
बहुरि राम सब तन चितइ बोले बचन गँभीर।द्वंदजुद्ध देखहु सकल श्रमित भए अति बीर॥॥८९॥
फिर श्रीरामने सबकी ओर देखकर गंभीर वाणीमें कहा—हे वीरो! तुम सब बहुत थक गये हो, अब यह द्वंद्वयुद्ध देखो।
अस कहि रथ रघुनाथ चलावा। बिप्र चरन पंकज सिरु नावा॥तब लंकेस क्रोध उर छावा। गर्जत तर्जत सन्मुख धावा॥॥१॥
यों कहकर श्रीरामने ब्राह्मणोंके चरणकमलोंमें मस्तक नवाया और रथ आगे बढ़ाया। यह देख रावणके हृदयमें क्रोध उमड़ आया और वह गरजता-ललकारता हुआ सामने दौड़ पड़ा।
जीतेहु जे भट संजुग माहीं। सुनु तापस मैं तिन्ह सम नाहीं॥रावन नाम जगत जस जाना। लोकप जाकें बंदीखाना॥॥२॥
रावण बोला—अरे तपस्वी! तूने जिन योद्धाओंको जीता है, मैं उनके समान नहीं। मेरा नाम रावण है, जिसका यश सारा संसार जानता है और जिसके बंदीगृहमें लोकपाल तक बंद हैं।
खर दूषन बिराध तुम्ह मारा। बधेहु ब्याध इव बालि बिचारा॥निसिचर निकर सुभट संघारेहु। कुंभकरन घननादहि मारेहु॥॥३॥
तूने खर, दूषण और विराधको मारा, बेचारे बालिको व्याधकी तरह छिपकर वध किया, बड़े-बड़े राक्षस योद्धाओंका संहार किया और कुम्भकर्ण-मेघनादको भी मार डाला।
आजु बयरु सबु लेउँ निबाही। जौं रन भूप भाजि नहिं जाहीं॥आजु करउँ खलु काल हवाले। परेहु कठिन रावन के पाले॥॥४॥
पर आज अगर तू युद्धसे भागा नहीं तो मैं सारा वैर चुका दूँगा। आज तुझे निश्चय ही काल के हवाले करूँगा, याद रख तू कठोर रावणके पाले पड़ा है।
सुनि दुर्बचन कालबस जाना। बिहँसि बचन कह कृपानिधाना॥सत्य सत्य सब तव प्रभुताई। जल्पसि जनि देखाउ मनुसाई॥॥५॥
रावणके ये दुर्वचन सुनकर और उसे काल-ग्रस्त जानकर कृपानिधान श्रीरामने हँसकर कहा—तेरी सारी प्रभुता सच है, जैसा तू कहता है, पर व्यर्थ बकवास छोड़, अपना पौरुष दिखा।
जनि जल्पना करि सुजसु नासहि नीति सुनहि करहि छमा।संसार महँ पूरुष त्रिबिध पाटल रसाल पनस समा॥एक सुमनप्रद एक सुमन फल एक फलइ केवल लागहीं।एक कहहिं कहहिं करहिं अपर एक करहिं कहत न बागहीं॥
व्यर्थकी डींग हाँककर अपना सुयश मत नष्ट कर; क्षमा करना, पर मैं तुझे एक नीतिकी बात बताता हूँ। संसारमें तीन प्रकारके पुरुष होते हैं—पाटल, आम और कटहलके वृक्षकी भाँति। एक केवल फूल देता है, दूसरा फूल-फल दोनों देता है और तीसरेमें केवल फल ही लगते हैं। ऐसे ही मनुष्योंमें भी कोई केवल कहता है, कोई कहकर करता भी है, और कोई केवल करता है, कहता कुछ नहीं।
राम बचन सुनि बिहँसा मोहि सिखावत ग्यान।बयरु करत नहिं तब डरे अब लागे प्रिय प्रान॥॥९०॥
यह सुनकर रावण खिलखिलाकर हँसा—मुझे ज्ञानकी बात सिखाता है! जब वैर ठाना था तब तो डरा नहीं, अब प्राण प्यारे लगने लगे क्या?
कहि दुर्बचन क्रुद्ध दसकंधर। कुलिस समान लाग छाँड़े सर॥नानाकार सिलीमुख धाए। दिसि अरु बिदिस गगन महि छाए॥॥१॥
दुर्वचन कहकर क्रुद्ध रावणने वज्रके समान बाण छोड़े। नाना आकारके वे बाण दिशा-विदिशा, आकाश और पृथ्वी सब जगह छा गये।
पावक सर छाँड़ेउ रघुबीरा। छन महुँ जरे निसाचर तीरा॥छाड़िसि तीब्र सक्ति खिसिआई। बान संग प्रभु फेरि चलाई॥॥२॥
श्रीरामने अग्निबाण छोड़ा, जिससे रावणके सारे बाण क्षणभरमें जलकर भस्म हो गये। तब खिसियाकर उसने तीव्र शक्ति चलायी, पर प्रभुने उसे भी बाणके साथ वापस लौटा दिया।
कोटिक चक्र त्रिसूल पबारै। बिनु प्रयास प्रभु काटि निवारै॥निफल होहिं रावन सर कैसें। खल के सकल मनोरथ जैसें॥॥३॥
वह करोड़ों चक्र और त्रिशूल फेंकता है, पर प्रभु उन्हें बिना किसी परिश्रमके काटकर हटा देते हैं। रावणके बाण वैसे ही निष्फल होते हैं जैसे दुष्टके सारे मनोरथ निष्फल होते हैं।
तब सत बान सारथी मारेसि। परेउ भूमि जय राम पुकारेसि॥राम कृपा करि सूत उठावा। तब प्रभु परम क्रोध कहुँ पावा॥॥४॥
तब उसने श्रीरामके सारथिको सौ बाण मारे, जो 'राम' की जय पुकारते हुए भूमिपर गिर पड़ा। श्रीरामने कृपा करके उसे उठाया, और तब प्रभुको अत्यंत क्रोध चढ़ आया।
भए क्रुद्ध जुद्ध बिरुद्ध रघुपति त्रोन सायक कसमसे।कोदंड धुनि अति चंड सुनि मनुजाद सब मारुत ग्रसे॥मंदोदरी उर कंप कंपति कमठ भू भूधर त्रसे।चिक्करहिं दिग्गज दसन गहि महि देखि कौतुक सुर हँसे॥
युद्धमें शत्रुके विरुद्ध क्रुद्ध हुए श्रीरामके तरकसमें बाण कसमसाने लगे। उनके धनुषकी प्रचंड टंकार सुनकर सब मनुष्यभक्षी राक्षस भयसे व्याकुल हो उठे। मंदोदरीका हृदय काँप उठा, समुद्र-कच्छप-पृथ्वी-पर्वत तक डर गये, दिशाओंके गज दाँतोंसे धरती पकड़कर चिग्घाड़ने लगे—यह कौतुक देख देवता हँस पड़े।
तानेउ चाप श्रवन लगि छाँड़े बिसिख कराल।राम मारगन गन चले लहलहात जनु ब्याल॥॥९१॥
धनुषको कानतक खींचकर श्रीरामने भयानक बाण छोड़े, जो सर्पोंकी भाँति लहराते हुए चल पड़े।
चले बान सपच्छ जनु उरगा। प्रथमहिं हतेउ सारथी तुरगा॥रथ बिभंजि हति केतु पताका। गर्जा अति अंतर बल थाका॥॥१॥
बाण ऐसे चले मानो पंखवाले सर्प उड़ रहे हों; पहले ही वार में सारथि और घोड़े मारे गये। रथ चूर होकर ध्वजा-पताका गिर गयी, रावण जोरसे गरजा तो सही पर भीतर उसका बल थक चुका था।
तुरत आन रथ चढ़ि खिसिआना। अस्त्र सस्त्र छाँड़ेसि बिधि नाना॥बिफल होहिं सब उद्यम ताके। जिमि परद्रोह निरत मनसा के॥॥२॥
तुरंत दूसरा रथ लेकर खिसियाया रावण नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र चलाने लगा, पर उसके सारे प्रयत्न वैसे ही निष्फल हो रहे हैं जैसे दूसरोंका अहित सोचनेवालेके होते हैं।
तब रावन दस सूल चलावा। बाजि चारि महि मारि गिरावा॥तुरग उठाइ कोपि रघुनायक। खैंचि सरासन छाँड़े सायक॥॥३॥
तब रावणने दस त्रिशूल चलाकर श्रीरामके चारों घोड़ोंको धराशायी कर दिया। श्रीरामने क्रोधसे घोड़ोंको उठाकर धनुष खींचा और बाण छोड़े।
रावन सिर सरोज बनचारी। चलि रघुबीर सिलीमुख धारी॥दस दस बान भाल दस मारे। निसरि गए चले रुधिर पनारे॥॥४॥
रावणके सिररूपी कमलवनमें विचरते श्रीरामके बाणरूपी भ्रमरोंकी पंक्ति चल पड़ी। उन्होंने उसके दसों सिरोंमें दस-दस बाण ऐसे मारे कि वे आर-पार निकल गये और सिरोंसे रक्तकी धाराएँ बह चलीं।
स्त्रवत रुधिर धायउ बलवाना। प्रभु पुनि कृत धनु सर संधाना॥तीस तीर रघुबीर पबारे। भुजन्हि समेत सीस महि पारे॥॥५॥
लहूसे लथपथ बलवान रावण फिर भी दौड़ पड़ा। प्रभुने फिर धनुषपर बाण चढ़ाये और तीस बाणोंसे उसकी बीसों भुजाओंसहित दसों सिर काटकर पृथ्वीपर गिरा दिये।
काटतहीं पुनि भए नबीने। राम बहोरि भुजा सिर छीने॥प्रभु बहु बार बाहु सिर हए। कटत झटिति पुनि नूतन भए॥॥६॥
पर कटते ही वे फिर नये उग आये। श्रीरामने फिर उन्हें काटा, और वे बार-बार काटे जाने पर भी उतनी ही जल्दी नये हो जाते।
पुनि पुनि प्रभु काटत भुज सीसा। अति कौतुकी कोसलाधीसा॥रहे छाइ नभ सिर अरु बाहू। मानहुँ अमित केतु अरु राहू॥॥७॥
प्रभु बार-बार उसकी भुजाएँ और सिर काटते रहे, क्योंकि कोसलपति स्वभावसे ही बड़े लीला-प्रिय हैं। आकाश सिरों और भुजाओंसे यों भर गया मानो असंख्य केतु-राहु उमड़ आये हों।
जनु राहु केतु अनेक नभ पथ स्त्रवत सोनित धावहीं।रघुबीर तीर प्रचंड लागहिं भूमि गिरन न पावहीं॥एक एक सर सिर निकर छेदे नभ उड़त इमि सोहहीं।जनु कोपि दिनकर कर निकर जहँ तहँ बिधुंतुद पोहहीं॥
मानो अनेक राहु-केतु रक्त बहाते हुए आकाशमार्गमें दौड़ रहे हों—श्रीरामके प्रचंड बाणोंकी मारसे वे धरतीपर गिरने ही नहीं पाते। एक-एक बाणसे बिंधे सिरोंके समूह आकाशमें ऐसे उड़ते शोभा दे रहे हैं मानो क्रोधित सूर्यकी किरणें जहाँ-तहाँ राहुओंको बेध रही हों।
जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर तिमि तिमि होहिं अपार।सेवत बिषय बिबर्ध जिमि नित नित नूतन मार॥॥९२॥
ज्यों-ज्यों प्रभु उसके सिर काटते हैं त्यों-त्यों वे और भी बढ़ते जाते हैं—ठीक वैसे ही जैसे विषय-भोगमें रत मनुष्यकी वासना भोगते-भोगते दिन-प्रतिदिन नयी-नयी बढ़ती जाती है।
दसमुख देखि सिरन्ह कै बाढ़ी। बिसरा मरन भई रिस गाढ़ी॥गर्जेउ मूढ़ महा अभिमानी। धायउ दसहु सरासन तानी॥॥१॥
सिरोंकी यह अनंत बाढ़ देखकर रावण अपना मरण भूल गया और उसे और भी गहरा क्रोध चढ़ आया। वह महा अभिमानी मूर्ख गरजता हुआ दसों धनुष ताने दौड़ पड़ा।
समर भूमि दसकंधर कोप्यो। बरषि बान रघुपति रथ तोप्यो॥दंड एक रथ देखि न परेऊ। जनु निहार महुँ दिनकर दुरेऊ॥॥२॥
रणभूमिमें क्रोधित रावणने बाणोंकी वर्षा करके श्रीरामके रथको ढक दिया—इतना कि एक घड़ीतक रथ दिखायी न दिया, मानो कुहासेमें सूर्य छिप गया हो।
हाहाकार सुरन्ह जब कीन्हा। तब प्रभु कोपि कारमुक लीन्हा॥सर निवारि रिपु के सिर काटे। ते दिसि बिदिस गगन महि पाटे॥॥३॥
यह देख देवताओंने हाहाकार मचाया, तब प्रभुने क्रोधसे धनुष उठाया और शत्रुके बाणोंको काटते हुए उसके सिर काट डाले, जिनसे दिशा-विदिशा, आकाश-पृथ्वी सब पट गये।
काटे सिर नभ मारग धावहिं। जय जय धुनि करि भय उपजावहिं॥कहँ लछिमन सुग्रीव कपीसा। कहँ रघुबीर कोसलाधीसा॥॥४॥
कटे हुए सिर आकाशमार्गमें दौड़ते हुए 'जय-जय' की ध्वनिसे भय फैलाने लगे और पुकारने लगे—लक्ष्मण, वानरराज सुग्रीव कहाँ हैं? कोसलपति रघुवीर कहाँ हैं?
कहँ रामु कहि सिर निकर धाए देखि मर्कट भजि चले।संधानि धनु रघुबंसमनि हँसि सरन्हि सिर बेधे भले॥सिर मालिका कर कालिका गहि बृंद बृंदन्हि बहु मिलीं।करि रुधिर सरि मज्जनु मनहुँ संग्राम बट पूजन चलीं॥
'राम कहाँ हैं' कहते हुए वे सिरोंके समूह दौड़े, पर वानरोंको भागते देखकर वापस दौड़ पड़े। रघुकुलमणि श्रीरामने धनुषपर बाण सन्धानकर हँसते हुए उन सिरोंको भलीभाँति बेध डाला। हाथोंमें मुंडमालाएँ लिये कालिकाएँ झुंड-की-झुंड जुट आयीं और रक्तकी नदीमें स्नान करके यों चल पड़ीं मानो संग्राम-रूपी वटवृक्षकी पूजा करने जा रही हों।
पुनि दसकंठ क्रुद्ध होइ छाँड़ी सक्ति प्रचंड।चली बिभीषन सन्मुख मनहुँ काल कर दंड॥॥९३॥
फिर रावण क्रोधित होकर एक प्रचंड शक्ति छोड़ बैठा, जो विभीषणकी ओर मानो साक्षात कालका दंड बनकर चली।
आवत देखि सक्ति अति घोरा। प्रनतारति भंजन पन मोरा॥तुरत बिभीषन पाछें मेला। सन्मुख राम सहेउ सोइ सेला॥॥१॥
उस अत्यंत भयानक शक्तिको आती देख और यह सोचकर कि शरणागतका दुःख हरना ही मेरा व्रत है, श्रीरामने तुरंत विभीषणको पीछे कर लिया और स्वयं सामने होकर वह शक्ति सह ली।
लागि सक्ति मुरुछा कछु भई। प्रभु कृत खेल सुरन्ह बिकलई॥देखि बिभीषन प्रभु श्रम पायो। गहि कर गदा क्रुद्ध होइ धायो॥॥२॥
शक्ति लगते ही उन्हें कुछ मूर्च्छा-सी हो आयी—यह तो प्रभुकी लीला थी, पर देवता व्याकुल हो उठे। प्रभुको श्रम होते देख विभीषण हाथमें गदा लेकर क्रोधसे दौड़ पड़े।
रे कुभाग्य सठ मंद कुबुद्धे। तें सुर नर मुनि नाग बिरुद्धे॥सादर सिव कहुँ सीस चढ़ाए। एक एक के कोटिन्ह पाए॥॥३॥
विभीषणने कहा—रे अभागे मूर्ख दुर्बुद्धि! तूने देवता, मनुष्य, मुनि, नाग—सबसे बैर मोल लिया। पर तूने शिवजीको आदरपूर्वक सिर चढ़ाया था, इसीलिये एक-एकके बदले करोड़ों वरदान पाये।
तेहि कारन खल अब लगि बाँच्यो। अब तव कालु सीस पर नाच्यो॥राम बिमुख सठ चहसि संपदा। अस कहि हनेसि माझ उर गदा॥॥४॥
उसी पुण्यके बलपर अब तक बच रहा है, पर अब काल तेरे सिरपर नाच रहा है। रामसे विमुख होकर भी वैभव चाहता है क्या!—यों कहकर विभीषणने उसकी छातीके ठीक बीचमें गदा दे मारी।
उर माझ गदा प्रहार घोर कठोर लागत महि पर्यो।दस बदन सोनित स्त्रवत पुनि संभारि धायो रिस भर्तो॥द्वौ भिरे अतिबल मल्लजुद्ध बिरुद्ध एकु एकहि हनै।रघुबीर बल दर्पित बिभीषनु घालि नहिं ता कहुँ गनै॥
छातीके बीचमें गदाकी घोर, कठोर चोट लगते ही रावण धरतीपर गिर पड़ा। उसके दसों मुखोंसे रक्त बहने लगा, पर वह फिर सँभलकर क्रोधमें भरा हुआ उठ दौड़ा। दोनों महाबली मल्लयुद्धमें भिड़ गये और एक-दूसरेपर वार करने लगे—श्रीरामके बलसे गर्वित विभीषण तो उसे तिनकेके बराबर भी नहीं गिनते थे।
उमा बिभीषनु रावनहि सन्मुख चितव कि काउ।सो अब भिरत काल ज्यों श्रीरघुबीर प्रभाउ॥॥९४॥
शिवजी कहते हैं—हे उमा! विभीषण कभी रावणकी आँखमें आँख डालकर भी नहीं देख पाता था, पर आज वही उससे काल-सा भिड़ रहा है—यह सब श्रीरामके ही प्रताप का प्रभाव है।
देखा श्रमित बिभीषनु भारी। धायउ हनूमान गिरि धारी॥रथ तुरंग सारथी निपाता। हृदय माझ तेहि मारेसि लाता॥॥१॥
विभीषणको बुरी तरह थका देख हनुमानजी एक पर्वत उठाये दौड़ पड़े। उन्होंने उसी पर्वतसे रावणके रथ, घोड़े और सारथिको ढेर कर दिया और उसकी छातीमें लात जमायी।
ठाढ़ रहा अति कंपित गाता। गयउ बिभीषनु जहँ जनत्राता॥पुनि रावन कपि हतेउ पचारी। चलेउ गगन कपि पूँछ पसारी॥॥२॥
रावण काँपता हुआ खड़ा रह गया, और विभीषण जाकर उस स्वामीके पास पहुँचे जो सेवकोंके रक्षक हैं। फिर रावणने ललकारकर हनुमानजीपर वार किया, पर वे पूँछ फैलाकर आकाशमें उड़ गये।
गहिसि पूँछ कपि सहित उड़ाना। पुनि फिरि भिरेउ प्रबल हनुमाना॥लरत अकास जुगल सम जोधा। एकहि एकु हनत करि क्रोधा॥॥३॥
रावणने उनकी पूँछ पकड़ ली और हनुमानजी उसे लिये हुए ऊपर उड़ते चले गये। फिर लौटकर महाबली हनुमान उससे भिड़ गये, और दोनों समान बलके योद्धा आकाशमें क्रोधपूर्वक एक-दूसरेको मारने लगे।
सोहहिं नभ छल बल बहु करहीं। कज्जल गिरि सुमेरु जनु लरहीं॥बुधि बल निसिचर परइ न पारयो। तब मारुतसुत प्रभु संभार्यो॥॥४॥
दोनों नाना छल-बल दिखाते हुए आकाशमें ऐसे शोभित हो रहे हैं मानो अंजनगिरि और सुमेरु पर्वत आपसमें लड़ रहे हों। जब बुद्धि-बलसे भी रावण पराजित न हो सका, तब हनुमानजीने अपने प्रभुका स्मरण किया।
संभारि श्रीरघुबीर धीर पचारि कपि रावनु हन्यो।महि परत पुनि उठि लरत देवन्ह जुगल कहुँ जय जय भन्यो॥हनुमंत संकट देखि मर्कट भालु क्रोधातुर चले।रन मत्त रावन सकल सुभट प्रचंड भुज बल दलमले॥
श्रीरामका स्मरण करते ही धीर हनुमानजीने ललकारकर रावणपर प्रहार किया। दोनों धरतीपर गिरते और फिर उठकर लड़ते रहे—देवताओंने दोनोंकी 'जय-जय' पुकारी। हनुमानजीपर संकट देख वानर-भालू क्रोधसे भरकर दौड़ पड़े, पर रणमद-मत्त रावणने उन सब योद्धाओंको अपनी प्रचंड भुजाओंसे रौंद डाला।
तब रघुबीर पचारे धाए कीस प्रचंड।कपि बल प्रबल देखि तेहिं कीन्ह प्रगट पाषंड॥॥९५॥
तब श्रीरामके ललकारनेपर प्रचंड वानर-वीर दौड़ पड़े। उनके प्रबल बलको देखकर रावणने फिर एक माया रच डाली।
अंतरधान भयउ छन एका। पुनि प्रगटे खल रूप अनेका॥रघुपति कटक भालु कपि जेते। जहँ तहँ प्रगट दसानन तेते॥॥१॥
वह क्षणभरमें अदृश्य हो गया और फिर अनेक रूपोंमें प्रकट हो उठा। श्रीरामकी सेनामें जितने भालू-वानर थे, चारों ओर उतने ही रावण दीखने लगे।
देखे कपिन्ह अमित दससीसा। जहँ तहँ भजे भालु अरु कीसा॥भागे बानर धरहिं न धीरा। त्राहि त्राहि लछिमन रघुबीरा॥॥२॥
असंख्य रावणोंको देखकर भालू-वानर जहाँ-तहाँ भाग खड़े हुए। वानरोंका धीरज टूट गया और वे 'हे लक्ष्मण! हे रघुवीर! बचाओ, बचाओ!' पुकारते हुए भागने लगे।
दहँ दिसि धावहिं कोटिन्ह रावन। गर्जहिं घोर कठोर भयावन॥डरे सकल सुर चले पराई। जय के आस तजहु अब भाई॥॥३॥
दसों दिशाओंमें करोड़ों रावण दौड़ते और घोर, कर्कश गर्जन करते हैं। यह देख सब देवता डर गये और भागते हुए कहने लगे—हे भाई! अब जीतकी आशा छोड़ दो।
सब सुर जिते एक दसकंधर। अब बहु भए तकहु गिरि कंदर॥रहे बिरंचि संभु मुनि ग्यानी। जिन्ह जिन्ह प्रभु महिमा कछु जानी॥॥४॥
एक ही रावणने सब देवताओंको जीत लिया था, अब तो अनगिनत हो गये हैं—अब तो पहाड़ोंकी गुफाओंमें ही छिप जाओ। वहाँ केवल ब्रह्मा, शिव और वे ज्ञानी मुनि ही डटे रहे, जिन्होंने प्रभुकी महिमाको कुछ पहचाना था।
जाना प्रताप ते रहे निर्भय कपिन्ह रिपु माने फुरे।चले बिचलि मर्कट भालु सकल कृपाल पाहि भयातुरे॥हनुमंत अंगद नील नल अतिबल लरत रन बाँकुरे।मर्दहिं दसानन कोटि कोटिन्ह कपट भू भट अंकुरे॥
जो प्रभुका प्रताप जानते थे, वे निर्भय डटे रहे, पर वानरोंने इन अनेक रावणोंको सच मान लिया। इससे सब वानर-भालू विचलित होकर 'हे कृपालु! रक्षा करो' पुकारते हुए भयसे भाग चले। पर हनुमान, अंगद, नील और नल-जैसे प्रबल रणबाँकुरे डटे रहे और कपटसे उपजे इन करोड़ों मायावी योद्धाओंको रौंदते रहे।
सुर बानर देखे बिकल हँस्यो कोसलाधीस।सजि सारंग एक सर हते सकल दससीस॥॥९६॥
देवताओं और वानरोंको यों व्याकुल देख कोसलपति श्रीराम मुसकराये और शार्ङ्ग धनुषपर एक ही बाण चढ़ाकर सारे मायावी रावणोंको मार गिराया।
प्रभु छन महुँ माया सब काटी। जिमि रबि उएँ जाहिं तम फाटी॥रावनु एकु देखि सुर हरषे। फिरे सुमन बहु प्रभु पर बरषे॥॥१॥
प्रभुने क्षणभरमें सारी माया काट डाली, जैसे सूर्यके उदय होते ही अंधकार छिन्न-भिन्न हो जाता है। एक ही रावणको सामने देख देवता हर्षित हो उठे और लौटकर प्रभुपर फूलोंकी वर्षा करने लगे।
भुज उठाइ रघुपति कपि फेरे। फिरे एक एकन्ह तब टेरे॥प्रभु बलु पाइ भालु कपि धाए। तरल तमकि संजुग महि आए॥॥२॥
श्रीरामने भुजा उठाकर भागे हुए वानरोंको वापस बुलाया। वे एक-दूसरेको पुकारते हुए लौट आये और प्रभुका बल पाकर उछलते-कूदते फिर रणभूमिमें आ डटे।
अस्तुति करत देवतन्हि देखें। भयऊँ एक मैं इन्ह के लेखें॥सठहु सदा तुम्ह मोर मरायल। अस कहि कोपि गगन पर धायल॥॥३॥
देवताओंको प्रभुकी स्तुति करते देख रावणने सोचा—इन्होंने मुझे अब एक ही समझ लिया है। उसने कहा—अरे मूर्खो! तुम तो सदाके लिये मेरी मार खानेवाले ही हो, यों कहकर वह क्रोधसे आकाशकी ओर दौड़ पड़ा।
हाहाकार करत सुर भागे। खलहु जाहु कहँ मोरें आगे॥देखि बिकल सुर अंगद धायो। कूदि चरन गहि भूमि गिरायो॥॥४॥
देवता हाहाकार करते हुए भाग खड़े हुए, रावण बोला—अरे दुष्टो! मेरे आगेसे कहाँ भागोगे! देवताओंको यों व्याकुल देख अंगद दौड़े और उछलकर रावणका पैर पकड़ उसे धरतीपर पटक दिया।
गहि भूमि पार्यो लात मार्यो बालिसुत प्रभु पहिं गयो।संभारि उठि दसकंठ घोर कठोर रव गर्जत भयो॥करि दाप चाप चढ़ाइ दस संधानि सर बहु बरषई।किए सकल भट घायल भयाकुल देखि निज बल हरषई॥
अंगदने उसे पकड़कर धरतीपर पटका, लात मारी और फिर प्रभुके पास लौट गये। रावण सँभलकर उठा और अत्यंत भयंकर, कर्कश स्वरमें गरजने लगा। दर्पसे भरकर उसने दसों धनुष चढ़ाकर उनपर बाणोंकी झड़ी लगा दी, जिससे सब योद्धा घायल और भयभीत हो गये—अपना बल देखकर वह हर्षित होने लगा।
तब रघुपति रावन के सीस भुजा सर चाप।काटे बहुत बढ़े पुनि जिमि तीरथ कर पाप॥॥९७॥
तब श्रीरामने रावणके सिर, भुजाएँ, बाण और धनुष काट डाले, पर वे फिर उसी तरह बहुगुने होकर बढ़ गये जैसे तीर्थमें किया पाप उलटे और बढ़ जाता है।
सिर भुज बाढ़ि देखि रिपु केरी। भालु कपिन्ह रिस भई घनेरी॥मरत न मूढ़ कटेउ भुज सीसा। धाए कोपि भालु भट कीसा॥॥१॥
शत्रुके सिर-भुजाओंकी यह बाढ़ देख रीछ-वानरोंको बड़ा क्रोध आया—यह मूर्ख भुजा-सिर कटनेपर भी मरता ही नहीं, यह सोचकर भालू-वानर योद्धा क्रोधसे भरकर दौड़ पड़े।
बालितनय मारुति नल नीला। बानरराज दुबिद बलसीला॥बिटप महीधर करहिं प्रहारा। सोइ गिरि तरु गहि कपिन्ह सो मारा॥॥२॥
अंगद, हनुमान, नल, नील, सुग्रीव और द्विविद-जैसे बलशाली वीर वृक्ष-पर्वतोंसे उसपर प्रहार करते हैं, और वह उन्हीं वृक्ष-पर्वतोंको छीनकर वानरोंको मारने लगता है।
एक नखन्हि रिपु बपुष बिदारी। भागि चलहिं एक लातन्ह मारी॥तब नल नील सिरन्हि चढ़ि गयऊ। नखन्हि लिलार बिदारत भयऊ॥॥३॥
कोई वानर नखोंसे उसका शरीर चीरकर भाग जाता है, तो कोई लातें मारकर। नल और नील तो उसके सिरोंपर ही चढ़ बैठे और नखोंसे उसका ललाट फाड़ने लगे।
रुधिर देखि बिषाद उर भारी। तिन्हहि धरन कहुँ भुजा पसारी॥गहे न जाहिं करन्हि पर फिरहीं। जनु जुग मधुप कमल बन चरहीं॥॥४॥
खून बहता देख उसे बड़ा दुःख हुआ, उसने उन्हें पकड़नेको हाथ फैलाये, पर वे पकड़में ही नहीं आते, हाथोंपर ही मँडराते रहते हैं मानो दो भौंरे कमल-वनमें विचर रहे हों।
कोपि कूदि द्वौ धरेसि बहोरी। महि पटकत भजे भुजा मरोरी॥पुनि सकोप दस धनु कर लीन्हे। सरन्हि मारि घायल कपि कीन्हे॥॥५॥
क्रोधित होकर उछलकर उसने दोनोंको पकड़ लिया, पर पटकते-पटकते वे उसकी भुजा मरोड़कर भाग निकले। तब उसने क्रोधसे दसों धनुष उठाये और बाणोंसे वानरोंको घायल कर डाला।
हनुमदादि मुरुछित करि बंदर। पाइ प्रदोष हरष दसकंधर॥मुरुछित देखि सकल कपि बीरा। जामवंत धायउ रनधीरा॥॥६॥
हनुमान आदि वानरोंको मूर्च्छित करके और सांझ ढलते देख रावण प्रसन्न हुआ। सब वानर-वीरोंको मूर्च्छित देख रणधीर जाम्बवान दौड़ पड़े।
संग भालु भूधर तरु धारी। मारन लगे पचारि पचारी॥भयउ क्रुद्ध रावन बलवाना। गहि पद महि पटकइ भट नाना॥॥७॥
उनके साथ भालू भी वृक्ष-पर्वत उठाये ललकारते हुए रावणपर टूट पड़े। बलवान रावण क्रोधित होकर पैर पकड़-पकड़कर अनेक योद्धाओंको धरतीपर पटकने लगा।
देखि भालुपति निज दल घाता। कोपि माझ उर मारेसि लाता॥॥८॥
अपनी सेनाकी यह दुर्दशा देख जाम्बवानने क्रोधित होकर रावणकी छातीके बीचोंबीच लात जमायी।
उर लात घात प्रचंड लागत बिकल रथ ते महि परा।गहि भालु बीसहुँ कर मनहुँ कमलन्हि बसे निसि मधुकरा॥मुरुछित बिलोकि बहोरि पद हति भालुपति प्रभु पहिं गयौ।निसि जानि स्यंदन घालि तेहि तब सूत जतनु करत भयो॥
छातीपर वह प्रचंड लात लगते ही रावण व्याकुल होकर रथसे धरतीपर गिर पड़ा। उसने बीसों हाथोंमें भालुओंको यों जकड़ रखा था मानो रातमें भौंरे कमलोंमें बसे हों। उसे मूर्छित देखकर एक लात और जमाकर जाम्बवान प्रभुके पास लौट गये। रात्रि होते देख सारथि रावणको रथमें डालकर होशमें लानेका उपाय करने लगा।
मुरुछा बिगत भालु कपि सब आए प्रभु पास।निसिचर सकल रावनहि घेरि रहे अति त्रास॥९८॥
मूर्च्छा टूटनेपर सब रीछ-वानर प्रभुके पास लौट आये, उधर सब राक्षस भयसे थर्राते हुए रावणको घेरे खड़े रहे।
तेही निसि सीता पहिं जाई। त्रिजटा कहि सब कथा सुनाई॥सिर भुज बाढ़ि सुनत रिपु केरी। सीता उर भइ त्रास घनेरी॥॥१॥
उसी रात त्रिजटाने सीताजीके पास जाकर सारी बात कह सुनायी। शत्रुके सिर-भुजाओंकी बढ़तीकी बात सुनते ही सीताजीके हृदयमें बड़ा भय समा गया।
मुख मलीन उपजी मन चिंता। त्रिजटा सन बोली तब सीता॥होइहि कहा कहसि किन माता। केहि बिधि मरिहि बिस्व दुखदाता॥॥२॥
उनका मुख उदास हो गया, मनमें चिंता उठी। सीताजीने त्रिजटासे कहा—हे माता! बताती क्यों नहीं, क्या होगा? यह विश्वको दुःख देनेवाला किस तरह मरेगा?
रघुपति सर सिर कटेहुँ न मरई। बिधि बिपरीत चरित सब करई॥मोर अभाग्य जिआवत ओही। जेहिं हौ हरि पद कमल बिछोही॥॥३॥
श्रीरामके बाणोंसे सिर कटनेपर भी यह मरता नहीं, विधाता तो सब उलटा ही कर रहा है। सचमुच मेरा ही दुर्भाग्य इसे जिला रहा है, जिसने मुझे प्रभुके चरणोंसे बिछोड़ा है।
जेहिं कृत कपट कनक मृग झूठा। अजहुँ सो देव मोहि पर रूठा॥जेहिं बिधि मोहि दुख दुसह सहाए। लछिमन कहुँ कटु बचन कहाए॥॥४॥
जिसने कपटसे स्वर्णमृगका झूठा रूप रचा था, वही दैव अब भी मुझपर रूठा है। जिस विधाताने मुझे यह असह्य दुःख सहवाया और लक्ष्मणको कटु वचन कहलवाये,
रघुपति बिरह सबिष सर भारी। तकि तकि मार बार बहु मारी॥ऐसेहुँ दुख जो राख मम प्राना। सोइ बिधि ताहि जिआव न आना॥॥५॥
और जो श्रीरामके विरहरूपी विषैले बाणोंसे बार-बार बींध रहा है, फिर भी जो मेरे प्राणोंको बचाये रखता है—वही विधाता उसे भी जिला रहा है, कोई और नहीं।
बहु बिधि कर बिलाप जानकी। करि करि सुरति कृपानिधान की॥कह त्रिजटा सुनु राजकुमारी। उर सर लागत मरइ सुरारी॥॥६॥
कृपानिधान श्रीरामका बार-बार स्मरण करते हुए जानकीजी बहुत प्रकारसे विलाप करने लगीं। त्रिजटाने कहा—हे राजकुमारी! सुनो, हृदयमें बाण लगते ही यह देवशत्रु रावण मर जायगा।
प्रभु ताते उर हतइ न तेही। एहि के हृदयँ बसति बैदेही॥॥७॥
पर प्रभु उसके हृदयमें बाण इसलिये नहीं मारते, क्योंकि उसीके हृदयमें आप जानकी बसती हैं।
एहि के हृदयँ बस जानकी जानकी उर मम बास है।मम उदर भुअन अनेक लागत बान सब कर नास है॥सुनि बचन हरष बिषाद मन अति देखि पुनि त्रिजटाँ कहा।अब मरिहि रिपु एहि बिधि सुनहि सुंदरि तजहि संसय महा॥
इसके हृदयमें जानकी बसती है, जानकीके हृदयमें मेरा वास है और मेरे उदरमें अनेकों भुवन हैं—सो हृदयमें बाण लगते ही सब भुवनोंका नाश हो जायगा। यह सुनकर सीताजीके मनमें हर्ष और विषाद दोनों उमड़ आये, यह देखकर त्रिजटाने फिर कहा—हे सुंदरी! अपना यह बड़ा संशय त्याग दो, अब सुनो, शत्रु इस तरह मरेगा—
काटत सिर होइहि बिकल छुटि जाइहि तव ध्यान।तब रावनहि हृदय महुँ मरिहहिं रामु सुजान॥९९॥
सिर बार-बार कटनेसे जब वह व्याकुल हो उठेगा और उसके हृदयसे तुम्हारा ध्यान छूट जायगा, तभी सुजान श्रीराम उसके हृदयमें बाण मारेंगे।
अस कहि बहुत भाँति समुझाई। पुनि त्रिजटा निज भवन सिधाई॥राम सुभाउ सुमिरि बैदेही। उपजी बिरह बिथा अति तेही॥॥१॥
यों कहकर और सीताजीको भाँति-भाँतिसे समझाकर त्रिजटा अपने घर चली गयी। श्रीरामके स्वभावका स्मरण करते ही जानकीजीको फिर गहरी विरह-व्यथा उठ आयी।
निसिहि ससिहि निंदति बहु भाँती। जुग सम भई सिराति न राती॥करति बिलाप मनहिं मन भारी। राम बिरहँ जानकी दुखारी॥॥२॥
वे रात और चंद्रमाकी बार-बार निंदा करती हैं—रात युगके समान लंबी हो गयी, बीतती ही नहीं। श्रीरामके विरहमें दुःखी जानकी मन-ही-मन भारी विलाप कर रही हैं।
जब अति भयउ बिरह उर दाहू। फरकेउ बाम नयन अरु बाहू॥सगुन बिचारि धरी मन धीरा। अब मिलिहहिं कृपाल रघुबीरा॥॥३॥
जब विरहका दाह हृदयमें असह्य हो उठा, तब उनका बायाँ नेत्र और बाहु फड़क उठे। शुभ शकुन समझकर उन्होंने धैर्य धरा—अब कृपालु रघुवीर अवश्य मिलेंगे।
इहाँ अर्धनिसि रावनु जागा। निज सारथि सन खीझन लागा॥सठ रनभूमि छड़ाइसि मोही। धिग धिग अधम मंदमति तोही॥॥४॥
इधर आधी रातको रावण जागा और अपने सारथिपर बिगड़ने लगा—रे मूर्ख! तूने मुझे रणभूमिसे हटा दिया, धिक्कार है तुझ अधम, मंदबुद्धिको!
तेहिं पद गहि बहु बिधि समुझावा। भौरु भएँ रथ चढ़ि पुनि धावा॥सुनि आगवनु दसानन केरा। कपि दल खरभर भयउ घनेरा॥॥५॥
सारथिने चरण पकड़कर उसे बहुत समझाया-बुझाया। सबेरा होते ही रावण फिर रथपर चढ़कर दौड़ पड़ा। उसका आना सुनते ही वानर-सेनामें बड़ी खलबली मच गयी।
जहँ तहँ भूधर बिटप उपारी। धाए कटकटाइ भट भारी॥॥६॥
वे बड़े-बड़े योद्धा जहाँ-तहाँसे पर्वत-वृक्ष उखाड़कर दाँत पीसते हुए दौड़ पड़े।
धाए जो मर्कट बिकट भालु कराल कर भूधर धरा।अति कोप करहिं प्रहार मारत भजि चले रजनीचरा॥बिचलाइ दल बलवंत कीसन्ह घेरि पुनि रावनु लियो।चहुँ दिसि चपेटन्हि मारि नखन्हि बिदारि तनु ब्याकुल कियो॥
विकराल वानर-भालू हाथोंमें पर्वत लिये दौड़े और भारी क्रोधसे प्रहार करने लगे, जिससे राक्षस भाग खड़े हुए। बलवान वानरोंने राक्षस-सेनाको तितर-बितर करके फिर रावणको घेर लिया और चारों ओरसे चपत मार-मारकर तथा नखोंसे उसका शरीर नोंचकर उसे व्याकुल कर दिया।
देखि महा मर्कट प्रबल रावन कीन्ह बिचार।अंतरहित होइ निमिष महुँ कृत माया बिस्तार॥॥१००॥
वानरोंको इतना प्रबल देखकर रावणने विचार किया और क्षणभरमें अदृश्य होकर उसने फिर माया फैला दी।
जब कीन्ह तेहिं पाषंड। भए प्रगट जंतु प्रचंड॥बेताल भूत पिसाच। कर धरें धनु नाराच॥॥१॥
जब उसने वह पाखंड रचा, तब भयानक जीव प्रकट हो उठे—बेताल, भूत और पिशाच हाथोंमें धनुष-बाण लिये प्रकट हुए।
जोगिनि गहें करबाल। एक हाथ मनुज कपाल॥करि सद्य सोनित पान। नाचहिं करहिं बहु गान॥॥२॥
योगिनियाँ एक हाथमें तलवार और दूसरेमें मनुष्यकी खोपड़ी लिये ताजा खून पीकर नाचने और तरह-तरहके गीत गाने लगीं।
धरु मारु बोलहिं घोर। रहि पूरि धुनि चहुँ ओर॥मुख बाइ धावहिं खान। तब लगे कीस परान॥॥३॥
वे 'पकड़ो, मारो' का घोर शब्द बोलती हैं, जो चारों ओर गूँज उठा। वे मुँह फैलाकर खानेको दौड़ती हैं, तब वानरोंके प्राण सूखने लगे।
जहँ जाहिं मर्कट भागि। तहँ बरत देखहिं आगि॥भए बिकल बानर भालु। पुनि लाग बरषै बालु॥॥४॥
वानर भागकर जहाँ भी जाते, वहीं आग जलती देखते। वानर-भालू व्याकुल हो उठे, फिर रावण उनपर बालू बरसाने लगा।
जहँ तहँ थकित करि कीस। गर्जेउ बहुरि दससीस॥लछिमन कपीस समेत। भए सकल बीर अचेत॥॥५॥
वानरोंको जहाँ-तहाँ थकाकर रावण फिर गरजा—लक्ष्मण और सुग्रीवसहित सब वीर मूर्च्छित हो गये।
हा राम हा रघुनाथ। कहि सुभट मीजहिं हाथ॥एहि बिधि सकल बल तोरि। तेहिं कीन्ह कपट बहोरि॥॥६॥
'हा राम! हा रघुनाथ!' पुकारते हुए योद्धा हाथ मलने लगे। इस तरह सबका बल तोड़कर रावणने फिर एक और माया रच डाली।
प्रगटेसि बिपुल हनुमान। धाए गहे पाषान॥तिन्ह रामु घेरे जाइ। चहुँ दिसि बरूथ बनाइ॥॥७॥
उसने अनेकों हनुमान प्रकट कर दिये, जो पत्थर लिये दौड़े और चारों ओरसे घेरा बनाकर श्रीरामको जा घेरा।
मारहु धरहु जनि जाइ। कटकटहिं पूँछ उठाइ॥दहँ दिसि लँगूर बिराज। तेहिं मध्य कोसलराज॥॥८॥
पूँछ उठाये कटकटाते हुए वे पुकारने लगे—'मारो, पकड़ो, जाने न पाये'; दसों दिशाओंमें उनकी पूँछें शोभा दे रही हैं और उनके बीचोंबीच कोसलराज श्रीराम खड़े हैं।
तेहिं मध्य कोसलराज सुंदर स्याम तन सोभा लही।जनु इंद्रधनुष अनेक की बर बारि तुंग तमालही॥प्रभु देखि हरष बिषाद उर सुर बदत जय जय जय करी।रघुबीर एकहि तीर कोपि निमेष महुँ माया हरी॥॥१॥
उन सबके बीच कोसलराजका सुंदर श्याम शरीर ऐसे शोभित है मानो ऊँचे तमाल-वृक्षके चारों ओर अनेक इंद्रधनुषोंकी सुंदर बाड़ बनी हो। प्रभुको देख देवता हर्ष-विषादमिश्रित हृदयसे 'जय, जय, जय' पुकारने लगे, तभी श्रीरामने क्रोध करके एक ही बाणसे पल भरमें सारी माया हर ली।
माया बिगत कपि भालु हरषे बिटप गिरि गहि सब फिरे।सर निकर छाड़े राम रावन बाहु सिर पुनि महि गिरे॥श्रीराम रावन समर चरित अनेक कल्प जो गावहीं।सत सेष सारद निगम कबि तेउ तदपि पार न पावहीं॥॥२॥
माया दूर होते ही वानर-भालू हर्षित हो उठे और वृक्ष-पर्वत उठाकर सब लौट पड़े। श्रीरामने फिर बाणोंकी झड़ी लगायी, जिससे रावणकी भुजाएँ और सिर कट-कटकर धरतीपर गिरने लगे। श्रीराम-रावणके इस युद्धका वर्णन यदि सैकड़ों शेषनाग, सरस्वती, वेद और कवि भी अनेक कल्पोंतक गाते रहें, तो भी उसका पार नहीं पा सकते।
ताके गुन गन कछु कहे जड़मति तुलसीदास।जिमि निज बल अनुरूप ते माछी उड़इ अकास॥॥१०१ क॥
उसी चरित्रके कुछ गुण मंदबुद्धि तुलसीदासने कहे हैं—ठीक वैसे ही जैसे मक्खी भी अपनी शक्तिभर आकाशमें उड़ान भरती है।
काटे सिर भुज बार बहु मरत न भट लंकेस।प्रभु क्रीड़त सुर सिद्ध मुनि ब्याकुल देखि कलेस॥॥१०१ ख॥
सिर और भुजाएँ बार-बार काटी गयीं, फिर भी वीर रावण मरता नहीं। प्रभु तो यह लीला खेल रहे हैं, पर देवता, सिद्ध और मुनि उसकी यह पीड़ा देखकर व्याकुल हुए जा रहे हैं।
काटत बढ़हिं सीस समुदाई। जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई॥मरइ न रिपु श्रम भयउ बिसेषा। राम बिभीषन तन तब देखा॥॥१॥
काटते ही सिरोंका समूह वैसे ही बढ़ जाता है जैसे हर लाभके साथ लोभ बढ़ता है। शत्रु मरता नहीं, थकान बहुत बढ़ गयी—तब श्रीरामने विभीषणकी ओर देखा।
उमा काल मर जाकीं ईछा। सो प्रभु जन कर प्रीति परीछा॥सुनु सरबग्य चराचर नायक। प्रनतपाल सुर मुनि सुखदायक॥॥२॥
शिवजी कहते हैं—हे उमा! जिनकी इच्छामात्रसे काल भी मर जाता है, वे प्रभु ही अपने सेवककी प्रीतिकी परीक्षा ले रहे हैं। विभीषणने कहा—हे सर्वज्ञ! हे चराचरके स्वामी! हे शरणागतके रक्षक! हे देव-मुनियोंको सुख देनेवाले! सुनिये—
नाभिकुंड पियूष बस याकें। नाथ जिअत रावनु बल ताकें॥सुनत बिभीषन बचन कृपाला। हरषि गहे कर बान कराला॥॥३॥
इसकी नाभिमें अमृतका कुंड है, हे नाथ! रावण उसी अमृतके बलपर जीवित है। विभीषणके ये वचन सुनते ही कृपालु श्रीराम हर्षित होकर हाथमें भयंकर बाण ले उठे।
असुभ होन लागे तब नाना। रोवहिं खर सृकाल बहु स्वाना॥बोलहिं खग जग आरति हेतू। प्रगट भए नभ जहँ तहँ केतू॥॥४॥
उसी क्षण नाना अपशकुन होने लगे—गदहे, सियार और कुत्ते बहुत रोने लगे, पक्षी संसारके संकटकी सूचना देते हुए बोलने लगे और आकाशमें जहाँ-तहाँ पुच्छल तारे प्रकट हो उठे।
दस दिसि दाह होन अति लागा। भयउ परब बिनु रबि उपरागा॥मंदोदरि उर कंपति भारी। प्रतिमा स्त्रवहिं नयन मग बारी॥॥५॥
दसों दिशाओंमें भारी दाह होने लगा, बिना किसी पर्वके ही सूर्यग्रहण हो गया। मंदोदरीका हृदय जोरसे काँप उठा और मूर्तियोंकी आँखोंसे आँसू बहने लगे।
प्रतिमा रुदहिं पबिपात नभ अति बात बह डोलति मही।बरषहिं बलाहक रुधिर कच रज असुभ अति सक को कही॥उतपात अमित बिलोकि नभ सुर बिकल बोलहि जय जय।सुर सभय जानि कृपाल रघुपति चाप सर जोरत भए॥
मूर्तियाँ रोने लगीं, आकाशसे वज्रपात होने लगा, प्रचंड आँधी चलने लगी और पृथ्वी काँप उठी। बादल रक्त, बाल और धूलकी वर्षा करने लगे—इतने अशुभ हुए कि कहते नहीं बनता। इतने भारी उत्पात देखकर आकाशमें व्याकुल देवता 'जय-जय' पुकार उठे। देवताओंको भयभीत जानकर कृपालु श्रीराम धनुषपर बाण चढ़ाने लगे।
खैचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस।रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस॥॥१०२॥
कानोंतक धनुष खींचकर श्रीरामने इकतीस बाण छोड़े, जो ऐसे चले मानो साक्षात कालसर्प ही दौड़ रहे हों।
सायक एक नाभि सर सोषा। अपर लगे भुज सिर करि रोषा॥लै सिर बाहु चले नाराचा। सिर भुज हीन रुंड महि नाचा॥॥१॥
एक बाणने नाभिके अमृतकुंडको सोख लिया, बाकी बाण क्रोधसे उसकी भुजाओं और सिरोंमें जा लगे। सिर और भुजाएँ बाणोंके साथ उड़ चलीं, और शेष रह गया सिर-भुजा-विहीन धड़, जो धरतीपर नाचने लगा।
धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब सर हति प्रभु कृत दुइ खंडा॥गर्जेउ मरत घोर रव भारी। कहाँ रामु रन हतौं पचारी॥॥२॥
वह धड़ प्रचंड वेगसे दौड़ने लगा, जिससे धरती धँसने लगी—तभी श्रीरामने एक बाणसे उसके दो टुकड़े कर दिये। मरते-मरते रावण घोर गर्जनके साथ चिल्लाया—राम कहाँ हैं, मैं उन्हें ललकारकर युद्धमें मार डालूँ!
डोली भूमि गिरत दसकंधर। छुभित सिंधु सरि दिग्गज भूधर॥धरनि परेउ द्वौ खंड बढ़ाई। चापि भालु मर्कट समुदाई॥॥३॥
रावणके गिरते ही धरती डोल उठी, समुद्र-नदियाँ, दिग्गज और पर्वत सब क्षुब्ध हो गये। धड़के दोनों टुकड़े फैलकर भालू-वानरोंकी भीड़को दबाते हुए धरतीपर आ गिरे।
मंदोदरि आगें भुज सीसा। धरि सर चले जहाँ जगदीसा॥प्रबिसे सब निषंग महु जाई। देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई॥॥४॥
रावणके सिर और भुजाएँ मंदोदरीके सामने रखकर श्रीरामके बाण वापस उसी दिशामें चले जहाँ स्वयं जगदीश्वर खड़े थे। सब बाण जाकर तरकसमें समा गये, यह देखकर देवताओंने नगाड़े बजाये।
तासु तेज समान प्रभु आनन। हरषे देखि संभु चतुरानन॥जय जय धुनि पूरी ब्रह्मंडा। जय रघुबीर प्रबल भुजदंडा॥॥५॥
रावणका सारा तेज प्रभुके मुखमें समा गया—यह देखकर शिव और ब्रह्मा हर्षित हुए। ब्रह्मांडभर 'जय-जय' की ध्वनिसे गूँज उठा—प्रबल भुजदंडोंवाले श्रीरघुवीरकी जय हो!
बरषहिं सुमन देव मुनि बृंदा। जय कृपाल जय जयति मुकुंदा॥॥६॥
देवता और मुनियोंके समूह फूल बरसाते हुए बोल उठे—कृपालुकी जय हो, मुकुंदकी जय हो, जय हो!
जय कृपा कंद मुकंद द्वंद हरन सरन सुखप्रद प्रभो।खल दल बिदारन परम कारन कारुनीक सदा बिभो॥सुर सुमन बरषहिं हरष संकुल बाज दुंदुभि गहगही।संग्राम अंगन राम अंग अनंग बहु सोभा लही॥॥१॥
हे कृपाके कंद, हे मुकुंद, हे द्वंद्वोंके हरनेवाले, शरणागतको सुख देनेवाले प्रभो! हे दुष्ट-दलके विनाशक, हे परम कारण, हे सदा करुणामय विभु! आपकी जय हो। देवता हर्षमें भरकर पुष्प बरसा रहे हैं, नगाड़े घमघमा रहे हैं, और रणभूमिमें श्रीरामके अंग अनेक कामदेवोंकी-सी शोभा पा रहे हैं।
सिर जटा मुकुट प्रसून बिच बिच अति मनोहर राजहीं।जनु नीलगिरि पर तड़ित पटल समेत उड़ुगन भ्राजहीं॥भुजदंड सर कोदंड फेरत रुधिर कन तन अति बने।जनु रायमुनीं तमाल पर बैठीं बिपुल सुख आपने॥॥२॥
सिरपर जटाओंका मुकुट है, जिसके बीच-बीच अत्यंत मनोहर फूल शोभित हैं—मानो नीले पर्वतपर बिजलियोंसमेत तारे चमक रहे हों। भुजदंडोंसे धनुष-बाण फिराते हुए शरीरपर रक्तके कण ऐसे शोभा दे रहे हैं मानो तमालके वृक्षपर बहुत-सी ललमुनियाँ अपने सुखमें निश्चल बैठी हों।
कृपादृष्टि करि बृष्टि प्रभु अभय किए सुर बृंद।भालु कीस सब हरषे जय सुख धाम मुकंद॥॥१०३॥
प्रभुने कृपादृष्टिकी वर्षा करके देवसमूहको निर्भय कर दिया। वानर-भालू सब हर्षित होकर 'सुखधाम मुकुंदकी जय हो' पुकारने लगे।
पति सिर देखत मंदोदरी। मुरुछित बिकल धरनि खसि परी॥जुबति बृंद रोवत उठि धाईं। तेहि उठाइ रावन पहिं आई॥॥१॥
पतिका सिर देखते ही मंदोदरी व्याकुल होकर मूर्च्छित हो धरतीपर गिर पड़ी। स्त्रियाँ रोती हुई दौड़ीं और उसे उठाकर रावणके पास ले आयीं।
पति गति देखि ते करहिं पुकारा। छूटे कच नहिं बपुष सँभारा॥उर ताड़ना करहिं बिधि नाना। रोवत करहिं प्रताप बखाना॥॥२॥
पतिकी यह दशा देखकर वे पुकार-पुकारकर रोने लगीं, बाल बिखर गये, देहकी सुधि न रही। वे छाती पीटती और रोते हुए रावणके प्रताप की महिमा गाती हैं।
तव बल नाथ डोल नित धरनी। तेज हीन पावक ससि तरनी॥सेष कमठ सहि सकहिं न भारा। सो तनु भूमि परेउ भरि छारा॥॥३॥
तुम्हारे बलसे धरती सदा काँपती थी, अग्नि-चंद्र-सूर्य तक तुम्हारे आगे फीके पड़ जाते थे। शेषनाग और कच्छप तक जिस भारको न सह सकते थे, वही तुम्हारा शरीर आज धूलमें लथपथ पड़ा है!
बरुन कुबेर सुरेस समीरा। रन सन्मुख धरि काहुँ न धीरा॥भुजबल जितेहु काल जम साईं। आजु परेहु अनाथ की नाईं॥॥४॥
वरुण, कुबेर, इंद्र और वायु—इनमें कोई भी रणमें तुम्हारे सामने टिक न सका। हे स्वामी! तुमने काल और यमराजको भी अपने भुजबलसे जीत लिया था, वही तुम आज अनाथकी भाँति पड़े हो।
जगत बिदित तुम्हारी प्रभुताई। सुत परिजन बल बरनि न जाई॥राम बिमुख अस हाल तुम्हारा। रहा न कोउ कुल रोवनिहारा॥॥५॥
तुम्हारी प्रभुता जगत्भरमें विख्यात थी, पुत्रों-कुटुंबियोंके बलका वर्णन ही नहीं हो सकता। श्रीरामसे विमुख होनेके कारण ही तुम्हारी यह दशा हुई कि आज कुलमें कोई रोनेवाला भी नहीं बचा।
तव बस बिधि प्रपंच सब नाथा। सभय दिसिप नित नावहिं माथा॥अब तव सिर भुज जंबुक खाहीं। राम बिमुख यह अनुचित नाहीं॥॥६॥
हे नाथ! विधाताकी सारी सृष्टि तुम्हारे वश में थी, लोकपाल भयभीत होकर सदा तुम्हें मस्तक नवाते थे। पर आज तुम्हारे सिर-भुजाओंको गीदड़ खा रहे हैं—रामविमुखके लिये यह अनुचित भी नहीं है।
काल बिबस पति कहा न माना। अग जग नाथु मनुज करि जाना॥॥७॥
हे पति! काल के पूर्ण वशमें होनेके कारण तुमने किसीका कहा नहीं माना और चराचरके स्वामी परमात्माको साधारण मनुष्य समझ बैठे।
जान्यो मनुज करि दनुज कानन दहन पावक हरि स्वयं।जेहि नमत सिव ब्रह्मादि सुर पिय भजेहु नहिं करुनामयं॥आजन्म ते परद्रोह रत पापौघमय तव तनु अयं।तुम्हहू दियो निज धाम राम नमामि ब्रह्म निरामयं॥
दैत्यरूपी वनको भस्म करनेवाले साक्षात् अग्निस्वरूप हरिको तुमने मनुष्य समझा। शिव-ब्रह्मा जैसे देवता जिन्हें नमस्कार करते हैं, उन करुणामय प्रभुको, हे प्रियतम! तुमने कभी नहीं भजा। तुम्हारा यह शरीर जन्मसे ही परद्रोहमें रत और पापसे भरा रहा, फिर भी जिन निर्विकार ब्रह्म श्रीरामने तुम्हें अपना धाम दे दिया, उन्हें मैं नमस्कार करती हूँ।
अहह नाथ रघुनाथ सम कृपासिंधु नहिं आन।जोगि बृंद दुर्लभ गति तोहि दीन्हि भगवान॥॥१०४॥
हाय नाथ! श्रीरघुनाथजीके समान करुणासागर दूसरा कोई नहीं, जिन भगवानने तुम्हें वह गति दी जो योगियोंको भी दुर्लभ है।
मंदोदरी बचन सुनि काना। सुर मुनि सिद्ध सबन्हि सुख माना॥अज महेस नारद सनकादी। जे मुनिबर परमारथबादी॥॥१॥
मंदोदरीके ये वचन सुनकर देवता, मुनि और सिद्ध सभीको संतोष हुआ। ब्रह्मा, महादेव, नारद, सनकादि और अन्य जो भी परमार्थवादी श्रेष्ठ मुनि थे,
भरि लोचन रघुपतिहि निहारी। प्रेम मगन सब भए सुखारी॥रुदन करत देखीं सब नारी। गयउ बिभीषनु मन दुख भारी॥॥२॥
वे सब श्रीरामको नेत्र भरकर निहारते हुए प्रेममग्न और परम सुखी हो उठे। अपने घरकी स्त्रियोंको रोता देखकर विभीषणके मनमें भारी दुःख हुआ और वे उनके पास गये।
बंधु दसा बिलोकि दुख कीन्हा। तब प्रभु अनुजहि आयसु दीन्हा॥लछिमन तेहि बहु बिधि समुझायो। बहुरि बिभीषन प्रभु पहिं आयो॥॥३॥
भाईकी यह दशा देखकर उन्हें दुःख हुआ, तब प्रभुने अपने छोटे भाईको आज्ञा दी। लक्ष्मणने उन्हें बहुत प्रकारसे समझाया, फिर विभीषण प्रभुके पास लौट आये।
कृपादृष्टि प्रभु ताहि बिलोका। करहु क्रिया परिहरि सब सोका॥कीन्हि क्रिया प्रभु आयसु मानी। बिधिवत देस काल जियँ जानी॥॥४॥
प्रभुने उन्हें कृपादृष्टिसे देखकर कहा—सब शोक त्यागकर अंत्येष्टि-क्रिया करो। प्रभुकी आज्ञा मानकर विभीषणने देश-कालका विचार करके विधिपूर्वक सारी क्रिया सम्पन्न की।
मंदोदरी आदि सब देइ तिलांजलि ताहि।भवन गई रघुपति गुन गन बरनत मन माहि॥॥१०५॥
मंदोदरी आदि सब स्त्रियाँ रावणको तिलांजलि देकर, मनमें श्रीरामके गुणोंका बखान करती हुई महलको लौट गयीं।
आइ बिभीषन पुनि सिरु नायो। कृपासिंधु तब अनुज बोलायो॥तुम्ह कपीस अंगद नल नीला। जामवंत मारुति नयसीला॥
सब क्रिया-कर्म सम्पन्न करके विभीषण फिर आकर सिर नवाकर खड़े हुए। तब कृपासिंधु श्रीराम ने अनुज लक्ष्मण को बुलाया—साथ ही सुग्रीव, अंगद, नल, नील, जाम्बवान और नीतिनिपुण हनुमान को भी।
सब मिलि जाहु बिभीषन साथा। सारेहु तिलक कहेउ रघुनाथा॥पिता बचन मैं नगर न आवउँ। आपु सरिस कपि अनुज पठावउँ॥
श्रीराम ने कहा—तुम सब मिलकर विभीषण के साथ जाओ और उन्हें राजतिलक कर दो। पिताजी के वचन के कारण मैं स्वयं नगर में नहीं जा सकता, पर अपने ही समान वानर और अपने भाई को भेज रहा हूँ।
तुरत चले कपि सुनि प्रभु बचना। कीन्ही जाइ तिलक की रचना॥सादर सिंहासन बैठारी। तिलक सारि अस्तुति अनुसारी॥
प्रभु के ये वचन सुनते ही वानर तुरंत चल पड़े और जाकर राजतिलक का सारा विधान किया — आदरपूर्वक विभीषण को सिंहासन पर बैठाकर तिलक किया और उनकी स्तुति की।
जोरि पानि सबहीं सिर नाए। सहित बिभीषन प्रभु पहिं आए॥तब रघुबीर बोलि कपि लीन्हे। कहि प्रिय बचन सुखी सब कीन्हे॥॥४॥
सबने हाथ जोड़कर उन्हें सिर नवाया, फिर विभीषणसहित सब प्रभुके पास लौट आये। तब श्रीरामने वानरोंको बुलाकर प्रिय वचन कहे और सबको प्रसन्न कर दिया।
किए सुखी कहि बानी सुधा सम बल तुम्हारें रिपु हयो।पायो बिभीषन राज तिहुँ पुर जसु तुम्हारो नित नयो॥मोहि सहित सुभ कीरति तुम्हारी परम प्रीति जो गाइहैं।संसार सिंधु अपार पार प्रयास बिनु नर पाइहैं॥
अमृतके समान वाणीसे उन्हें सुखी करते हुए प्रभुने कहा—तुम्हारे ही बलसे यह प्रबल शत्रु मारा गया और विभीषणने राज्य पाया, इससे तुम्हारा यश तीनों लोकोंमें सदा नया बना रहेगा। जो कोई मेरे साथ तुम्हारी इस शुभ कीर्तिको परम प्रेमसे गायेगा, वह बिना किसी परिश्रमके इस अपार संसार-सागरका पार पा जायगा।
प्रभु के बचन श्रवन सुनि नहिं अघाहिं कपि पुंज।बार बार सिर नावहिं गहहिं सकल पद कंज॥॥१०६॥
प्रभुके ये वचन कानोंसे सुनकर वानर-समूह तृप्त ही नहीं होते—वे बार-बार सिर नवाते और उनके चरण-कमल पकड़ लेते हैं।
पुनि प्रभु बोलि लियउ हनुमाना। लंका जाहु कहेउ भगवाना॥समाचार जानकिहि सुनावहु। तासु कुसल लै तुम्ह चलि आवहु॥॥१॥
फिर प्रभुने हनुमानको बुलाया और कहा—लंका जाओ, जानकीको सारा समाचार सुनाओ और उनका कुशल-समाचार लेकर लौट आओ।
तब हनुमंत नगर महुँ आए। सुनि निसिचरी निसाचर धाए॥बहु प्रकार तिन्ह पूजा कीन्ही। जनकसुता देखाइ पुनि दीन्ही॥॥२॥
हनुमान नगरमें पहुँचे, यह सुनकर राक्षस-राक्षसियाँ उनके स्वागतको दौड़ पड़े। उन्होंने बहुत प्रकारसे हनुमानकी पूजा की और फिर उन्हें जानकीजीके दर्शन कराये।
दूरहि ते प्रनाम कपि कीन्हा। रघुपति दूत जानकी चीन्हा॥कहहु तात प्रभु कृपानिकेता। कुसल अनुज कपि सेन समेता॥॥३॥
हनुमानने दूरसे ही प्रणाम किया। जानकीजीने पहचान लिया कि यह श्रीरामका ही दूत है—और पूछा, हे तात! बताओ, कृपानिधान प्रभु, छोटे भाई और वानर-सेनासहित कुशलसे तो हैं?
सब बिधि कुसल कोसलाधीसा। मातु समर जीत्यो दससीसा॥अबिचल राजु बिभीषन पायो। सुनि कपि बचन हरष उर छायो॥॥४॥
हनुमानने कहा—हे माता! कोसलपति सब प्रकारसे कुशल हैं। उन्होंने युद्धमें दस सिरवाले रावणको जीत लिया है और विभीषणने अटल राज्य पाया है। यह सुनते ही सीताजीके हृदयमें हर्ष छा गया।
अति हरष मन तन पुलक लोचन सजल कह पुनि पुनि रमा।का देउँ तोहि त्रेलोक महुँ कपि किमपि नहिं बानी समा॥सुनु मातु मैं पायो अखिल जग राजु आजु न संसयं।रन जीति रिपुदल बंधु जुत पस्यामि राममनामयं॥
सीताजीके मनमें अपार हर्ष हुआ, शरीर पुलकित हो उठा और नेत्रोंमें आनंदाश्रु भर आये। वे बार-बार कहती हैं—हे हनुमान! मैं तुझे क्या दूँ, इस समाचारके समान तीनों लोकोंमें और कुछ भी नहीं! हनुमानने कहा—हे माता! सुनिये, आज मैंने निःसंदेह सारे जगतका राज्य पा लिया, क्योंकि मैं रणमें शत्रु-सेनाको जीतकर भाईसहित निर्विकार श्रीरामको देख रहा हूँ।
सुनु सुत सदगुन सकल तव हृदयँ बसहुँ हनुमंत।सानुकूल कोसलपति रहहुँ समेत अनंत॥॥१०७॥
सीताजीने कहा—हे पुत्र! सब सद्गुण सदा तेरे हृदयमें बसें, और शेष लक्ष्मणसहित कोसलपति प्रभु सदा तुझपर प्रसन्न रहें।
अब सोइ जतन करहु तुम्ह ताता। देखौं नयन स्याम मृदु गाता॥तब हनुमान राम पहिं जाई। जनकसुता कै कुसल सुनाई॥॥१॥
हे तात! अब तुम वही उपाय करो जिससे मैं अपनी आँखोंसे प्रभुके कोमल श्याम शरीरके दर्शन कर सकूँ। तब हनुमानने श्रीरामके पास जाकर जानकीजीका कुशल-समाचार सुनाया।
सुनि संदेसु भानुकुलभूषन। बोलि लिए जुबराज बिभीषन॥मारुतसुत के संग सिधावहु। सादर जनकसुतहि लै आवहु॥॥२॥
यह संदेश सुनकर सूर्यकुलभूषण श्रीरामने युवराज अंगद और विभीषणको बुलाकर कहा—हनुमानके साथ जाओ और आदरपूर्वक जानकीको ले आओ।
तुरतहिं सकल गए जहँ सीता। सेवहिं सब निसिचरीं बिनीता॥बेगि बिभीषन तिन्हहि सिखायो। तिन्ह बहु बिधि मज्जन करवायो॥॥३॥
वे सब तुरंत वहाँ गये जहाँ सीताजी थीं, जहाँ राक्षसियाँ विनम्रतापूर्वक उनकी सेवा कर रही थीं। विभीषणने शीघ्र ही उन्हें समझाया और उन लोगोंने सीताजीको भाँति-भाँतिसे स्नान कराया।
बहु प्रकार भूषन पहिराए। सिबिका रुचिर साजि पुनि ल्याए॥ता पर हरषि चढ़ी बैदेही। सुमिरि राम सुखधाम सनेही॥॥४॥
फिर उन्हें तरह-तरहके आभूषण पहनाये और एक सुंदर पालकी सजाकर लायीं। सीताजी सुखधाम प्रियतम श्रीरामका स्मरण करते हुए हर्षपूर्वक उसपर सवार हुईं।
बेतपानि रच्छक चहुँ पासा। चले सकल मन परम हुलासा॥देखन भालु कीस सब आए। रच्छक कोपि निवारन धाए॥॥५॥
चारों ओर हाथोंमें छड़ी लिये रक्षक चले, सबके मनमें परम उल्लास है। दर्शनके लिये सब रीछ-वानर उमड़ पड़े, तब रक्षक क्रोधित होकर उन्हें रोकने दौड़े।
कह रघुबीर कहा मम मानहु। सीतहि सखा पयादें आनहु॥देखहुँ कपि जननी की नाईं। बिहसि कहा रघुनाथ गोसाई॥॥६॥
श्रीरामने कहा—हे मित्र! मेरा कहना मानो, सीताको पैदल ही ले आओ, जिससे वानर उन्हें माताके समान देख सकें। गोसाईं श्रीरामने हँसते हुए यह बात कही।
सुनि प्रभु बचन भालु कपि हरषे। नभ ते सुरन्ह सुमन बहु बरषे॥सीता प्रथम अनल महुँ राखी। प्रगट कीन्हि चह अंतर साखी॥॥७॥
प्रभुके ये वचन सुनकर रीछ-वानर हर्षित हो उठे, आकाशसे देवताओंने फूलोंकी वर्षा की। सीताजीके असली स्वरूपको पहले अग्निमें सुरक्षित रखा गया था, अब अंतर्यामी प्रभु उसे सबके सामने प्रकट करना चाहते हैं।
तेहि कारन करुनानिधि कहे कछुक दुर्बाद।सुनत जातुधानीं सब लागीं करै बिषाद॥१०८॥
इसी कारण करुणानिधान श्रीरामने लीलावश कुछ कठोर वचन कहे, जिन्हें सुनकर सब राक्षसियाँ विषाद करने लगीं।
प्रभु के बचन सीस धरि सीता। बोली मन क्रम बचन पुनीता॥लछिमन होहु धरम के नेगी। पावक प्रगट करहु तुम्ह बेगी॥॥१॥
प्रभुके वचनोंको सिर-माथे लेकर मन-वचन-कर्मसे पवित्र सीताजी बोलीं—हे लक्ष्मण! तुम मेरे धर्मकार्यमें सहायक बनो और शीघ्र अग्नि प्रज्वलित करो।
सुनि लछिमन सीता कै बानी। बिरह बिबेक धरम निति सानी॥लोचन सजल जोरि कर दोऊ। प्रभु सन कछु कहि सकत न ओऊ॥॥२॥
सीताजीकी विरह, विवेक, धर्म और नीतिसे भरी वाणी सुनकर लक्ष्मणके नेत्र भर आये। वे दोनों हाथ जोड़े खड़े रह गये, प्रभुसे कुछ भी कह न सके।
देखि राम रुख लछिमन धाए। पावक प्रगटि काठ बहु लाए॥पावक प्रबल देखि बैदेही। हृदयँ हरष नहिं भय कछु तेही॥॥३॥
श्रीरामका रुख देखकर लक्ष्मण दौड़े और अग्नि प्रज्वलित करके बहुत-सी लकड़ियाँ ले आये। अग्निको प्रचंड होते देखकर भी जानकीजीके हृदयमें हर्ष रहा, तनिक भी भय नहीं हुआ।
जौं मन बच क्रम मम उर माहीं। तजि रघुबीर आन गति नाहीं॥तौ कृसानु सब कै गति जाना। मो कहुँ होउ श्रीखंड समाना॥॥४॥
[सीताजीने लीलासे कहा—] यदि मन, वचन और कर्मसे मेरे हृदयमें श्रीरघुवीरको छोड़कर दूसरा कोई आश्रय नहीं है, तो सबके मनकी बात जाननेवाले अग्निदेव मेरे लिये भी चंदनके समान शीतल हो जायँ।
श्रीखंड सम पावक प्रबेस कियो सुमिरि प्रभु मैथिली।जय कोसलेस महेस बंदित चरन रति अति निर्मली॥प्रतिबिंब अरु लौकिक कलंक प्रचंड पावक महुँ जरे।प्रभु चरित काहुँ न लखे नभ सुर सिद्ध मुनि देखहिं खरे॥॥१॥
प्रभुका स्मरण करके, और जिनके चरण महादेवजीसे वंदित हैं तथा जिनमें अपनी अत्यंत निर्मल प्रीति है, उन कोसलपतिकी जय बोलकर जानकीजीने चंदनके समान शीतल हुई अग्निमें प्रवेश किया। उनकी छायामूर्ति और लौकिक कलंक दोनों उस प्रचंड अग्निमें जलकर भस्म हो गये। प्रभुके इस चरित्रको कोई न जान सका—देवता, सिद्ध और मुनि सब आकाशमें खड़े यह देखते ही रह गये।
धरि रूप पावक पानि गहि श्री सत्य श्रुति जग बिदित जो।जिमि छीरसागर इंदिरा रामहि समर्पी आनि सो॥सो राम बाम बिभाग राजति रुचिर अति सोभा भली।नव नील नीरज निकट मानहुँ कनक पंकज की कली॥॥२॥
तब अग्निदेवने स्वयं शरीर धारण करके, वेद और जगत्में विख्यात असली सीताजीका हाथ पकड़कर उन्हें श्रीरामको वैसे ही सौंप दिया जैसे क्षीरसागरने लक्ष्मीजीको विष्णुभगवान्को सौंपा था। वे श्रीरामके वामभागमें विराजमान हुईं, उनकी वह शोभा ऐसी सुंदर लगती है मानो नये खिले नीले कमलके पास सोनेके कमलकी कली सुशोभित हो।
बरषहिं सुमन हरषि सुर बाजहिं गगन निसान।गावहिं किंनर सुरबधू नाचहिं चढ़ीं बिमान॥१०९(क)॥
देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे, आकाशमें नगाड़े बज उठे। किन्नर गाने लगे और विमानोंपर सवार अप्सराएँ नाचने लगीं।
जनकसुता समेत प्रभु सोभा अमित अपार।देखि भालु कपि हरषे जय रघुपति सुख सार॥१०९(ख)॥
जानकीजीसहित प्रभुकी अपार, अपरिमित शोभा देखकर रीछ-वानर हर्षसे भर उठे और सुखके सार श्रीरघुनाथजीकी जय-जयकार करने लगे।
तब रघुपति अनुसासन पाई। मातलि चलेउ चरन सिरु नाई॥आए देव सदा स्वारथी। बचन कहहिं जनु परमारथी॥॥१॥
श्रीरामकी आज्ञा पाकर इंद्रका सारथि मातलि चरणोंमें सिर नवाकर रथ लेकर लौट गया। इसके बाद सदाके स्वार्थी देवता ऐसी बातें करने आये मानो वे बड़े परमार्थी हों।
दीन बंधु दयाल रघुराया। देव कीन्हि देवन्ह पर दाया॥बिस्व द्रोह रत यह खल कामी। निज अघ गयउ कुमारगगामी॥॥२॥
हे दीनबंधु, हे दयालु रघुराज! आपने देवताओंपर बड़ी कृपा की। विश्वद्रोहमें रत यह कामी, कुमार्गगामी दुष्ट अपने ही पापके बोझसे नष्ट हो गया।
तुम्ह समरूप ब्रह्म अबिनासी। सदा एकरस सहज उदासी॥अकल अगुन अज अनघ अनामय। अजित अमोघसक्ति करुनामय॥॥३॥
आप ही ब्रह्म, अविनाशी, सदा एकरस, स्वभावसे उदासीन, अखंड, निर्गुण, अजन्मा, निष्पाप, निर्विकार, अजेय, अमोघशक्ति और करुणामय हैं।
मीन कमठ सूकर नरहरी। बामन परसुराम बपु धरी॥जब जब नाथ सुरन्ह दुखु पायो। नाना तनु धरि तुम्हईँ नसायो॥॥४॥
आपने ही मत्स्य, कच्छप, वराह, नृसिंह, वामन और परशुरामका शरीर धारण किया। हे नाथ! जब-जब देवताओंने दुःख पाया, तब-तब आपने ही अनेक रूप धरकर उनका दुःख दूर किया।
यह खल मलिन सदा सुरद्रोही। काम लोभ मद रत अति कोही॥अधम सिरोमनि तव पद पावा। यह हमरें मन बिसमय आवा॥॥५॥
यह मलिनहृदय दुष्ट सदा देवताओंका शत्रु, काम-लोभ-मदमें डूबा और अत्यंत क्रोधी था। ऐसे अधमोंके शिरोमणिने भी आपका परमपद पा लिया—इसीका हमें आश्चर्य हो रहा है।
हम देवता परम अधिकारी। स्वारथ रत प्रभु भगति बिसारी॥भव प्रबाहँ संतत हम परे। अब प्रभु पाहि सरन अनुसरे॥॥६॥
हम देवता श्रेष्ठ पद पाकर भी स्वार्थमें डूबे रहे और आपकी भक्तिको भुला बैठे, इसीसे सदा जन्म-मृत्युके चक्रमें भटकते रहे। अब हे प्रभो! हम आपकी शरणमें आये हैं, हमारी रक्षा कीजिये।
करि बिनती सुर सिद्ध सब रहे जहँ तहँ कर जोरि।अति सप्रेम तन पुलकि बिधि अस्तुति करत बहोरि॥॥११०॥
यों विनती करके देवता और सिद्ध सब जहाँ-के-तहाँ हाथ जोड़े खड़े रह गये। तब अत्यंत प्रेमसे पुलकित होकर ब्रह्माजी स्तुति करने लगे—
जय राम सदा सुखधाम हरे। रघुनायक सायक चाप धरे॥भव बारन दारन सिंह प्रभो। गुन सागर नागर नाथ बिभो॥॥१॥
हे सदा सुखके धाम, हे दुःखहारी हरि! धनुष-बाण धारण करनेवाले रघुनाथकी जय हो। हे प्रभो! आप जन्म-मृत्युरूपी हाथीको चीरनेके लिये सिंहके समान हैं, हे नाथ, हे सर्वव्यापक विभो! आप गुणोंके सागर और परम चतुर हैं।
तन काम अनेक अनूप छबी। गुन गावत सिद्ध मुनींद्र कबी॥जसु पावन रावन नाग महा। खगनाथ जथा करि कोप गहा॥॥२॥
आपके शरीरकी छवि अनेक कामदेवोंसे भी अनुपम है, सिद्ध, मुनींद्र और कवि सब आपके गुण गाते हैं। आपका पवित्र यश यह है कि आपने महासर्प-सरीखे रावणको गरुड़की भाँति क्रोध करके पकड़ लिया।
जन रंजन भंजन सोक भयं। गतक्रोध सदा प्रभु बोधमयं॥अवतार उदार अपार गुनं। महि भार बिभंजन ग्यानघनं॥॥३॥
आप सेवकोंको आनंद देनेवाले, शोकका नाश करनेवाले, सदा क्रोधरहित और ज्ञानस्वरूप हैं। आप उदार अवतार और अपार गुणोंवाले हैं, जो पृथ्वीका भार उतारनेवाले और ज्ञानकी घनीभूत राशि हैं।
अज ब्यापकमेकमनादि सदा। करुनाकर राम नमामि मुदा॥रघुबंस बिभूषन दूषन हा। कृत भूप बिभीषन दीन रहा॥॥४॥
आप नित्य, सर्वव्यापक, अद्वितीय और अनादि हैं, हे करुणाके धाम राम! मैं हर्षपूर्वक आपको नमस्कार करता हूँ। हे रघुकुलके भूषण, दूषणको मारनेवाले! विभीषण दीन था, उसे आपने राजा बना दिया।
अज ब्यापकमेकमनादि सदा। करुनाकर राम नमामि मुदा॥रघुबंस बिभूषन दूषन हा। कृत भूप बिभीषन दीन रहा॥॥४॥
यही तो आपकी करुणाकी अपार महिमा है—नित्य, अजन्मा, सर्वव्यापी और अनादि होते हुए भी आपने विभीषण-जैसे दीनको अपनाकर उसे राजपद दे दिया।
गुन ध्यान निधान अमान अजं। नित राम नमामि बिभुं बिरजं॥भुजदंड प्रचंड प्रताप बलं। खल बृंद निकंद महा कुसलं॥॥५॥
हे गुण और ध्यानके निधान, अभिमानरहित, अजन्मा राम! मैं आपको सदा नमस्कार करता हूँ। आपके भुजदंडोंका प्रताप और बल प्रचंड है, दुष्टोंके समूहका नाश करनेमें आप परम कुशल हैं।
बिनु कारन दीन दयाल हितं। छबि धाम नमामि रमा सहितं॥भव तारन कारन काज परं। मन संभव दारुन दोष हरं॥॥६॥
आप बिना किसी कारणके ही दीनोंपर दया करनेवाले और हितकारी हैं, हे शोभाके धाम! लक्ष्मीजीसहित मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आप संसार-सागरसे पार करानेके परम कारण हैं और मनसे उपजे दारुण दोषोंको हरनेवाले हैं।
सर चाप मनोहर त्रोन धरं। जरजारुन लोचन भूपबरं॥सुख मंदिर सुंदर श्रीरमनं। मद मार मुधा ममता समनं॥॥७॥
आपके सुंदर हाथोंमें मनोहर धनुष-बाण-तरकस सुशोभित हैं, आपके नेत्र लाल कमलके समान हैं, हे श्रेष्ठ भूप! आप सुखके मंदिर और सुंदर श्रीरमण हैं, जो कामदेवके मदको व्यर्थ करनेवाले और ममताको शांत करनेवाले हैं।
अनवद्य अखंड न गोचर गो। सबरूप सदा सब होइ न गो॥इति बेद बदंति न दंतकथा। रबि आतप भिन्नमभिन्न जथा॥॥८॥
आप निर्दोष, अखंड और इंद्रियोंसे परे हैं, सब रूप धारण करते हुए भी सदा उनसे अतीत रहते हैं। वेद भी यही कहते हैं, यह कोरी कल्पित कथा नहीं—जैसे सूर्य और उसका आतप एक साथ रहकर भी भिन्न-अभिन्न दोनों हैं, वैसे ही आप हैं।
कृतकृत्य बिभो सब बानर ए। निरखंति तवानन सादर ए॥धिग जीवन देव सरीर हरे। तव भक्ति बिना भव भूलि परे॥॥९॥
हे व्यापक प्रभो! ये सब वानर धन्य हैं, जो आदरपूर्वक आपके मुखका दर्शन कर रहे हैं। हे हरि! हमारे इस अमर जीवन और दिव्य शरीरको धिक्कार है, जो आपकी भक्तिके बिना संसारमें भूले भटक रहे हैं।
अब दीन दयाल दया करिऐ। मति मोरि बिभेदकरी हरिऐ॥जेहि ते बिपरीत क्रिया करिऐ। दुख सो सुख मानि सुखी चरिऐ॥॥१०॥
अब, हे दीनदयाल! दया कीजिये और मेरी वह बुद्धि हर लीजिये जो भेद उत्पन्न करती है, जिसके कारण मैं उलटे कर्म करता हूँ और दुःखको सुख मानकर सुखी होनेका भ्रम पालता हूँ।
खल खंडन मंडन रम्य छमा। पद पंकज सेवित संभु उमा॥नृप नायक दे बरदानमिदं। चरनांबुज प्रेम सदा सुभदं॥॥११॥
आप दुष्टोंका नाश करनेवाले और क्षमाके रम्य आभूषण हैं, शिव-पार्वती भी जिनके चरणकमलोंकी सेवा करते हैं। हे राजाओंके राजा! मुझे यही वरदान दीजिये कि आपके चरणकमलोंमें मेरा प्रेम सदा शुभ बना रहे।
बिनय कीन्हि चतुरानन प्रेम पुलक अति गात।सोभासिंधु बिलोकत लोचन नहीं अघात॥॥१११॥
इस प्रकार ब्रह्माजीने अत्यंत प्रेमसे पुलकित होकर विनती की। शोभाके समुद्र श्रीरामके दर्शन करते-करते उनके नेत्र तृप्त ही नहीं होते थे।
तेहि अवसर दसरथ तहँ आए। तनय बिलोकि नयन जल छाए॥अनुज सहित प्रभु बंदन कीन्हा। आसिरबाद पिताँ तब दीन्हा॥॥१॥
उसी समय दशरथजी वहाँ आये। पुत्रको देखते ही उनके नेत्रोंमें प्रेमाश्रु भर आये। लक्ष्मणसहित प्रभुने उनकी वंदना की, तब पिताने उन्हें आशीर्वाद दिया।
तात सकल तव पुन्य प्रभाऊ। जीत्यों अजय निसाचर राऊ॥सुनि सुत बचन प्रीति अति बाढ़ी। नयन सलिल रोमावलि ठाढ़ी॥॥२॥
श्रीरामने कहा—हे तात! यह सब आपके पुण्योंका ही प्रभाव है कि मैंने अजेय राक्षसराजको जीत लिया। पुत्रके ये वचन सुनकर उनकी प्रीति और बढ़ गयी, नेत्रोंमें जल भर आया और रोमांच हो आया।
रघुपति प्रथम प्रेम अनुमाना। चितइ पितहि दीन्हेउ दृढ़ ग्याना॥ताते उमा मोच्छ नहिं पायो। दसरथ भेद भगति मन लायो॥॥३॥
श्रीरामने पिताके पूर्व-प्रेमको समझकर, उनकी ओर देखकर ही उन्हें अपने स्वरूपका दृढ़ ज्ञान करा दिया। शिवजी कहते हैं—हे उमा! दशरथजीने सगुण भक्तिमें ही मन लगाया था, इसीसे उन्हें कैवल्य मोक्ष नहीं मिला।
सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं। तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं॥बार बार करि प्रभुहि प्रनामा। दसरथ हरषि गए सुरधामा॥॥४॥
सगुणकी उपासना करनेवाले भक्त ऐसा (कैवल्य) मोक्ष लेते भी नहीं, श्रीराम उन्हें अपनी भक्ति ही देते हैं। प्रभुको बार-बार प्रणाम करके दशरथजी हर्षित होकर देवलोकको चले गये।
अनुज जानकी सहित प्रभु कुसल कोसलाधीस।सोभा देखि हरषि मन अस्तुति कर सुर ईस॥११२॥
छोटे भाई लक्ष्मण और जानकीजीसहित परम कुशल कोसलाधीशकी शोभा देखकर देवराज इंद्र मनमें हर्षित होकर स्तुति करने लगे—
जय राम सोभा धाम। दायक प्रनत बिश्राम॥धृत त्रोन बर सर चाप। भुजदंड प्रबल प्रताप॥॥१॥
श्रीरामकी जय हो, जो शोभाके धाम और शरणागतको विश्राम देनेवाले हैं, जिन्होंने श्रेष्ठ तरकस, धनुष-बाण धारण किये हैं और जिनके भुजदंड प्रबल प्रतापी हैं।
जय दूषनारि खरारि। मर्दन निसाचर धारि॥यह दुष्ट मारेउ नाथ। भए देव सकल सनाथ॥॥२॥
हे दूषणके शत्रु, हे खरारि! आपने निशाचरोंकी सेनाका मर्दन किया। इस दुष्टको आपने मार डाला, हे नाथ! जिससे सब देवता फिर सुरक्षित हो गये।
जय हरन धरनी भार। महिमा उदार अपार॥जय रावनारि कृपाल। किए जातुधान बिहाल॥॥३॥
आप पृथ्वीका भार हरनेवाले हैं, आपकी महिमा उदार और अपार है। हे रावणके शत्रु, हे कृपालु! आपने राक्षसोंको तहस-नहस कर डाला।
लंकेस अति बल गर्ब। किए बस्य सुर गंधर्ब॥मुनि सिद्ध नर खग नाग। हठि पंथ सब कें लाग॥॥४॥
लंकापति रावणको अपने बलका अत्यंत गर्व था, उसने देवताओं और गंधर्वोंतकको वश में कर लिया था। मुनि, सिद्ध, मनुष्य, पक्षी और नाग—सभी हठपूर्वक उसीके मार्गपर चलनेको बाध्य थे।
परद्रोह रत अति दुष्ट। पायो सो फलु पापिष्ट॥अब सुनहु दीन दयाल। राजीव नयन बिसाल॥॥५॥
वह परद्रोहमें रत अत्यंत दुष्ट था, अंततः उसने वही पापका फल पाया। अब, हे दीनदयाल! सुनिये, हे कमल-सरीखे विशाल नेत्रोंवाले प्रभु!
मोहि रहा अति अभिमान। नहिं कोउ मोहि समान॥अब देखि प्रभु पद कंज। गत मान प्रद दुख पुंज॥॥६॥
मुझे भी अपने बलका अत्यंत अभिमान था, मैं सोचता था कि मेरे समान कोई नहीं। पर अब प्रभुके चरणकमलोंको देखकर मेरा वह मान और दुःखोंका ढेर दोनों मिट गये।
कोउ ब्रह्म निर्गुन ध्याव। अब्यक्त जेहि श्रुति गाव॥मोहि भाव कोसल भूप। श्रीराम सगुन सरूप॥॥७॥
कोई निर्गुण ब्रह्मका ध्यान करता है, जिसे वेद भी अव्यक्त कहकर गाते हैं; पर मुझे तो कोसलपतिका यह सगुण स्वरूप ही प्रिय है।
बैदेहि अनुज समेत। मम हृदयँ करहु निकेत॥मोहि जानिए निज दास। दे भक्ति रमानिवास॥॥८॥
हे प्रभु! जानकी और अपने छोटे भाईसहित आप मेरे हृदयमें सदा निवास कीजिये। मुझे अपना सेवक जानकर अपनी भक्ति प्रदान कीजिये।
दे भक्ति रमानिवास त्रास हरन सरन सुखदायकं।सुख धाम राम नमामि काम अनेक छबि रघुनायकं॥सुर बृंद रंजन द्वंद भंजन मनुज तनु अतुलितबलं।ब्रह्मादि संकर सेब्य राम नमामि करुना कोमलं॥
हे लक्ष्मीपति! हे भयहारी, शरणागतको सुख देनेवाले! हे सुखधाम, अनेकों कामदेवोंकी शोभावाले रघुनाथ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे देवसमूहको आनंद देनेवाले, द्वंद्वोंका नाश करनेवाले, मनुष्यरूपमें अतुलित बलशाली, ब्रह्मा-शिव आदिसे सेवित, करुणासे कोमल श्रीराम! मैं आपको नमस्कार करता हूँ।
अब करि कृपा बिलोकि मोहि आयसु देहु कृपाल।काह करौं सुनि प्रिय बचन बोले दीनदयाल॥११३॥
हे कृपालु! अब मेरी ओर कृपादृष्टिसे देखकर आज्ञा दीजिये कि मैं क्या करूँ। इंद्रके ये प्रिय वचन सुनकर दीनदयालु श्रीराम बोले—
सुनु सुरपति कपि भालु हमारे। परे भूमि निसचरन्हि जे मारे॥मम हित लागि तजे इन्ह प्राना। सकल जिआउ सुरेस सुजाना॥॥१॥
हे देवराज! सुनो, हमारे जो वानर-भालू निशाचरोंके हाथों मारे जाकर भूमिपर पड़े हैं, उन्होंने मेरे ही हितके लिये प्राण त्यागे हैं। हे सुजान देवराज! इन सबको जिला दो।
सुनु खगेस प्रभु के यह बानी। अति अगाध जानहिं मुनि ग्यानी॥प्रभु सक त्रिभुअन मारि जिआई। केवल सक्रहि दीन्हि बड़ाई॥॥२॥
काकभुशुंडिजी कहते हैं—हे गरुड़! प्रभुके ये वचन अत्यंत गहन हैं, ज्ञानी मुनि ही इन्हें समझ सकते हैं। प्रभु तो तीनों लोकको मारकर भी जिला सकते हैं, पर यहाँ उन्होंने केवल इंद्रको बड़ाई दे दी।
सुधा बरषि कपि भालु जिआए। हरषि उठे सब प्रभु पहिं आए॥सुधाबृष्टि भै दुहु दल ऊपर। जिए भालु कपि नहिं रजनीचर॥॥३॥
इंद्रने अमृत बरसाकर वानर-भालुओंको जिला दिया। वे सब हर्षित होकर उठे और प्रभुके पास आ गये। अमृतकी वर्षा दोनों ही सेनाओंपर हुई, पर उससे रीछ-वानर ही जीवित हुए, राक्षस नहीं।
रामाकार भए तिन्ह के मन। मुक्त भए छूटे भव बंधन॥सुर अंसिक सब कपि अरु रीछा। जिए सकल रघुपति कीं ईछा॥॥४॥
क्योंकि राक्षसोंके मन तो मरते समय ही रामाकार हो गये थे, इसलिये वे मुक्त हो गये और उनके भव-बंधन छूट गये। वानर-भालू तो सब देवांश थे, इसलिये वे श्रीरामकी ही इच्छासे जीवित हो उठे।
राम सरिस को दीन हितकारी। कीन्हे मुकुत निसाचर झारी॥खल मल धाम काम रत रावन। गति पाई जो मुनिबर पाव न॥॥५॥
श्रीरामके समान दीनोंका हित करनेवाला और कौन है, जिन्होंने सारे राक्षसोंको भी मुक्त कर दिया! दुष्ट, पापोंके घर, कामी रावणने भी वह गति पायी जो श्रेष्ठ मुनियोंको भी दुर्लभ है।
सुमन बरषि सब सुर चले चढ़ि चढ़ि रुचिर बिमान।देखि सुअवसरु प्रभु पहिं आयउ संभु सुजान॥११४(क)॥
फूलोंकी वर्षा करके सब देवता सुंदर विमानोंपर चढ़कर लौट चले। तभी अवसर पाकर सुजान शिवजी प्रभुके पास आये—
परम प्रीति कर जोरि जुग नलिन नयन भरि बारि।पुलकित तन गदगद गिराँ बिनय करत त्रिपुरारि॥११४(ख)॥
परम प्रेमसे दोनों हाथ जोड़कर, कमल-सरीखे नेत्रोंमें आँसू भरकर, पुलकित शरीर और गद्गद वाणीमें त्रिपुरारि शिवजी विनती करने लगे—
मामभिरक्षय रघुकुल नायक। धृत बर चाप रुचिर कर सायक॥मोह महा घन पटल प्रभंजन। संसय बिपिन अनल सुर रंजन॥॥१॥
हे रघुकुलके स्वामी! सुंदर हाथोंमें श्रेष्ठ धनुष और बाण धारण किये हुए आप मेरी रक्षा कीजिये। आप महामोहरूपी मेघसमूहको उड़ा देनेके लिये प्रचंड पवन हैं, संशयरूपी वनको भस्म करनेके लिये अग्नि हैं और देवताओंको आनंद देनेवाले हैं।
अगुन सगुन गुन मंदिर सुंदर। भ्रम तम प्रबल प्रताप दिवाकर॥काम क्रोध मद गज पंचानन। बसहु निरंतर जन मन कानन॥॥२॥
आप निर्गुण भी हैं और सगुण भी, दिव्य गुणोंके धाम और परम सुंदर हैं। भ्रमरूपी सघन अंधकारके नाशके लिये आप प्रबल प्रतापी सूर्य हैं। काम, क्रोध और मदरूपी हाथियोंका दमन करनेके लिये सिंहके समान आप इस सेवकके मनरूपी वनमें सदा निवास कीजिये।
बिषय मनोरथ पुंज कंज बन। प्रबल तुषार उदार पार मन॥भव बारिधि मंदर परम दर। बारय तारय संसृति दुस्तर॥॥३॥
विषय-वासनाओंके समूहरूपी कमलवनको जमा देनेके लिये आप प्रबल पाला हैं, फिर भी उदार और मनसे परे हैं। भवसागरको मथनेके लिये आप मंदराचल पर्वत हैं। हमारे परम भयको दूर कीजिये और इस दुस्तर संसार-सागरसे हमें पार लगाइये।
स्याम गात राजीव बिलोचन। दीन बंधु प्रनतारति मोचन॥
हे श्यामसुंदर शरीर, कमलनयन, दीनबंधु, शरणागत के दुःख हरने वाले राजा राम!
अनुज जानकी सहित निरंतर। बसहु राम नृप मम उर अंतर॥॥४॥
आप छोटे भाई लक्ष्मण और जानकीजी सहित सदा मेरे हृदय में निवास कीजिए।
मुनि रंजन महि मंडल मंडन। तुलसिदास प्रभु त्रास बिखंडन॥॥५॥
हे मुनियों को आनंद देने वाले, पृथ्वीमंडल के भूषण, तुलसीदास के प्रभु, भय का नाश करने वाले!
नाथ जबहिं कोसलपुरीं होइहि तिलक तुम्हार।कृपासिंधु मैं आउब देखन चरित उदार॥॥११५॥
हे नाथ! जब कोसलपुरी में आपका राजतिलक होगा, हे कृपासिंधु! मैं वह उदार चरित्र देखने अवश्य आऊँगा।
करि बिनती जब संभु सिधाए। तब प्रभु निकट बिभीषनु आए॥नाइ चरन सिरु कह मृदु बानी। बिनय सुनहु प्रभु सारँगपानी॥॥१॥
शिवजी विनती करके चले गये, तब विभीषणजी प्रभुके पास आये और चरणोंमें सिर नवाकर कोमल वाणीमें बोले—हे शार्ङ्गधनुषधारी प्रभु! मेरी विनती सुनिये—
सकुल सदल प्रभु रावन मारो। पावन जस त्रिभुवन बिस्तार्यो॥दीन मलीन हीन मति जाती। मो पर कृपा कीन्हि बहु भाँती॥॥२॥
आपने कुल-सेनासहित रावणका वध करके त्रिभुवनमें अपना पवित्र यश फैलाया और मुझ दीन, मलिन, बुद्धिहीन जातिहीनपर भी इतनी कृपा की।
अब जन गृह पुनीत प्रभु कीजे। मज्जनु करिअ समर श्रम छीजे॥देखि कोस मंदिर संपदा। देहु कृपाल कपिन्ह कहुँ मुदा॥॥३॥
अब हे प्रभु! इस सेवकके घरको पवित्र कीजिये और वहाँ स्नान कीजिये, जिससे युद्धकी थकान मिट जाय। हे कृपालु! खजाना, महल और सम्पत्ति देखकर प्रसन्नतापूर्वक वानरोंको बाँट दीजिये।
सब बिधि नाथ मोहि अपनाइअ। पुनि मोहि सहित अवधपुर जाइअ॥सुनत बचन मृदु दीनदयाला। सजल भए द्वौ नयन बिसाला॥॥४॥
हे नाथ! मुझे हर तरहसे अपना लीजिये और फिर मुझे साथ लेकर अयोध्या पधारिये। विभीषणके ये कोमल वचन सुनते ही दीनदयालु प्रभुके विशाल नेत्रोंमें प्रेमाश्रु भर आये।
तोर कोस गृह मोर सब सत्य बचन सुनु भ्रात।भरत दसा सुमिरत मोहि निमिष कल्प सम जात॥११६(क)॥
श्रीरामने कहा—हे भाई! सुनो, तुम्हारा खजाना-घर सब मेरा ही है, यह सच है। पर भरतकी दशाका स्मरण करते ही मुझे हर पल कल्पके समान बीतता प्रतीत होता है।
तापस बेष गात कृस जपत निरंतर मोहि।देखौं बेगि सो जतनु करु सखा निहोरउँ तोहि॥॥११६(ख)॥
वे तपस्वीके वेषमें कृश शरीरसे निरंतर मेरा ही नाम जप रहे हैं। हे सखा! ऐसा उपाय करो जिससे मैं शीघ्र ही उन्हें देख सकूँ, मैं तुमसे यह निहोरा करता हूँ।
बीतें अवधि जाउँ जौं जिअत न पावउँ बीर।सुमिरत अनुज प्रीति प्रभु पुनि पुनि पुलक सरीर॥॥११६(ग)॥
यदि अवधि बीतनेके बाद पहुँचूँ तो शायद भाईको जीवित न पाऊँ। छोटे भाईकी प्रीतिका स्मरण करते ही प्रभुका शरीर बार-बार पुलकित हो उठता है।
करेहु कल्प भरि राजु तुम्ह मोहि सुमिरेहु मन माहिं।पुनि मम धाम पाइहहु जहाँ संत सब जाहिं॥॥११६(घ)॥
तुम कल्पभर राज्य करना और मनमें सदा मेरा स्मरण करते रहना। फिर तुम मेरे उसी धामको पाओगे जहाँ सब संत जाते हैं।
सुनत बिभीषन बचन राम के। हरषि गहे पद कृपाधाम के॥बानर भालु सकल हरषाने। गहि प्रभु पद गुन बिमल बखाने॥॥१॥
श्रीरामके ये वचन सुनते ही विभीषणने हर्षित होकर कृपाधाम प्रभुके चरण पकड़ लिये। सभी वानर-भालू भी हर्षित होकर प्रभुके चरण पकड़े उनके निर्मल गुणोंका बखान करने लगे।
बहुरि बिभीषन भवन सिधायो। मनि गन बसन बिमान भरायो॥लै पुष्पक प्रभु आगें राखा। हँसि करि कृपासिंधु तब भाषा॥॥२॥
फिर विभीषण महलको गये और रत्नों तथा वस्त्रोंसे पुष्पक विमानको भर दिया। उसे लाकर प्रभुके सामने रखा, तब कृपासागर श्रीरामने हँसकर कहा—
चढ़ि बिमान सुनु सखा बिभीषन। गगन जाइ बरषहु पट भूषन॥नभ पर जाइ बिभीषन तबही। बरषि दिए मनि अंबर सबही॥॥३॥
हे सखा विभीषण! सुनो, विमानपर चढ़कर आकाशमें जाओ और वस्त्र-आभूषण बरसाओ। आज्ञा सुनते ही विभीषणने आकाशमें जाकर सब मणियाँ और वस्त्र बरसा दिये।
जोइ जोइ मन भावइ सोइ लेहीं। मनि मुख मेलि डारि कपि देहीं॥हँसे रामु श्री अनुज समेता। परम कौतुकी कृपा निकेता॥॥४॥
जिसके मनको जो भाया, वही उसने ले लिया। मणियोंको मुँहमें रखकर, खानेकी चीज न पाकर वानर उन्हें उगल देते हैं—यह तमाशा देखकर परम विनोदी कृपानिधान श्रीराम सीता-लक्ष्मणसहित हँस पड़े।
मुनि जेहि ध्यान न पावहिं नेति नेति कह बेद।कृपासिंधु सोइ कपिन्ह सन करत अनेक बिनोद॥११७(क)॥
जिन्हें मुनि ध्यानमें भी नहीं पाते, जिन्हें वेद 'नेति-नेति' कहते हैं, वही कृपासागर श्रीराम वानरोंके साथ इतने प्रकारके विनोद कर रहे हैं।
उमा जोग जप दान तप नाना मख ब्रत नेम।राम कृपा नहिं करहिं तसि जसि निष्केवल प्रेम॥११७(ख)॥
शिवजी कहते हैं—हे उमा! अनेकों योग, जप, दान, तप, यज्ञ, व्रत और नियम करनेपर भी श्रीराम वैसी कृपा नहीं करते जैसी अनन्य प्रेमसे करते हैं।
भालु कपिन्ह पट भूषन पाए। पहिरि पहिरि रघुपति पहिं आए॥नाना जिनस देखि सब कीसा। पुनि पुनि हँसत कोसलाधीसा॥॥१॥
भालू-वानरोंने वस्त्र-आभूषण पाकर उन्हें पहन-पहनकर श्रीरामके पास आना शुरू किया। इतनी विचित्र जातियोंके वानरोंको देखकर कोसलपति बार-बार हँस रहे हैं।
चितइ सबन्हि पर कीन्हि दाया। बोले मृदुल बचन रघुराया॥तुम्हरें बल मैं रावनु मारयो। तिलक बिभीषन कहूँ पुनि सारयो॥॥२॥
श्रीरामने सबपर कृपादृष्टि डालकर कोमल वाणीमें कहा—तुम्हारे ही बलसे मैंने रावणको मारा और विभीषणका राजतिलक भी सम्पन्न किया।
निज निज गृह अब तुम्ह सब जाहू। सुमिरेहु मोहि डरपहु जनि काहू॥सुनत बचन प्रेमाकुल बानर। जोरि पानि बोले सब सादर॥॥३॥
अब तुम सब अपने-अपने घर जाओ, मेरा स्मरण करते रहना और किसीसे मत डरना। यह सुनते ही सब वानर प्रेमविह्वल होकर हाथ जोड़े आदरपूर्वक बोले—
प्रभु जोइ कहहु तुम्हहि सब सोहा। हमरें होत बचन सुनि मोहा॥दीन जानि कपि किए सनाथा। तुम्ह त्रेलोक ईस रघुनाथा॥॥४॥
प्रभु! आप जो भी कहें, वह सब उचित ही है, पर आपके ये वचन सुनकर हमें मोह होता है। हे रघुनाथ! आप तीनों लोकोंके स्वामी हैं, हमें दीन जानकर ही आपने कृतार्थ किया है।
सुनि प्रभु बचन लाज हम मरहीं। मसक कहूँ खगपति हित करहीं॥देखि राम रुख बानर रीछा। प्रेम मगन नहिं गृह के ईछा॥॥५॥
प्रभुके ऐसे वचन सुनकर हम तो लज्जासे मरे जा रहे हैं—भला मच्छर कहीं गरुड़का हित कर सकता है? श्रीरामका रुख देखकर रीछ-वानर प्रेममें ऐसे मग्न हो गये कि उन्हें घर जानेकी कोई इच्छा ही न रही।
प्रभु प्रेरित कपि भालु सब राम रूप उर राखि।हरष बिषाद सहित चले बिनय बिबिध बिधि भाषि॥११८(क)॥
फिर भी प्रभुकी प्रेरणासे सब वानर-भालू श्रीरामके रूपको हृदयमें बसाकर, भाँति-भाँतिकी विनती करके हर्ष और विषादसहित अपने घरोंको चल पड़े।
कपिपति नील रीछपति अंगद नल हनुमान।सहित बिभीषन अपर जे जूथप कपि बलवान॥॥११८(ख)॥
वानरराज सुग्रीव, नील, ऋक्षराज जाम्बवान, अंगद, नल, हनुमान और विभीषणसहित जो भी अन्य बलवान वानर-सेनापति थे,
कहि न सकहिं कछु प्रेम बस भरि भरि लोचन बारि।सन्मुख चितवहिं राम तन नयन निमेष निवारि॥॥११८(ग)॥
वे प्रेमवश कुछ भी कह नहीं पा रहे थे—नेत्रोंमें आँसू भरकर, पलक झपकाये बिना, टकटकी लगाकर वे श्रीरामकी ओर निहार रहे थे।
अतिसय प्रीति देखि रघुराई। लिन्हे सकल बिमान चढ़ाई॥मन महुँ बिप्र चरन सिरु नायो। उत्तर दिसिहि बिमान चलायो॥॥१॥
उनका यह अपार प्रेम देखकर श्रीरामने सबको विमानपर चढ़ा लिया। फिर मन-ही-मन ब्राह्मणोंके चरणोंमें सिर नवाकर विमानको उत्तर दिशाकी ओर चलाया।
चलत बिमान कोलाहल होई। जय रघुबीर कहइ सबु कोई॥सिंहासन अति उच्च मनोहर। श्री समेत प्रभु बैठे ता पर॥॥२॥
विमान चलते ही चारों ओर कोलाहल मच गया, सब 'रघुवीरकी जय' पुकारने लगे। विमानमें एक अत्यंत ऊँचा, मनोहर सिंहासन था, जिसपर सीतासहित प्रभु विराजमान हुए।
राजत रामु सहित भामिनी। मेरु सृंग जनु घन दामिनी॥रुचिर बिमानु चलेउ अति आतुर। कीन्ही सुमन बृष्टि हरषे सुर॥॥३॥
पत्नीसहित श्रीराम ऐसे शोभित हो रहे हैं मानो सुमेरु-शिखरपर बिजलीसहित काला बादल हो। सुंदर विमान बड़े वेगसे चला, देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे।
परम सुखद चलि त्रिबिध बयारी। सागर सर सरि निर्मल बारी॥सगुन होहिं सुंदर चहुँ पासा। मन प्रसन्न निर्मल नभ आसा॥॥४॥
अत्यंत सुखद तीन प्रकारकी वायु चलने लगी, समुद्र-तालाब-नदियोंका जल निर्मल हो उठा। चारों ओर शुभ शकुन होने लगे, सबके मन प्रसन्न हो उठे और आकाश-दिशाएँ स्वच्छ हो गयीं।
कह रघुबीर देखु रन सीता। लछिमन इहाँ हत्यो इँद्रजीता॥हनूमान अंगद के मारे। रन महि परे निसाचर भारे॥॥५॥
श्रीरामने कहा—हे सीते! यह रणभूमि देखो। यहाँ लक्ष्मणने इंद्रजीत मेघनादको मारा था, यहीं हनुमान और अंगदके हाथों मारे गये ये विशाल राक्षस पड़े हैं।
कुंभकरन रावन द्वौ भाई। इहाँ हते सुर मुनि दुखदाई॥॥६॥
देवता और मुनियोंको संतप्त करनेवाले कुम्भकर्ण और रावण, दोनों भाई यहीं मारे गये।
इहाँ सेतु बाँध्यो अरु थापेउँ सिव सुख धाम।सीता सहित कृपानिधि संभुहि कीन्ह प्रनाम॥११९(क)॥
यहाँ मैंने सेतु बँधवाया और सुखधाम शिवजीकी स्थापना की थी। तब कृपानिधानने सीतासहित श्रीरामेश्वरको प्रणाम किया।
जहँ जहँ कृपासिंधु बन कीन्ह बास बिश्राम।सकल देखाए जानकिहि कहे सबन्हि के नाम॥११९(ख)॥
वनमें जहाँ-जहाँ करुणासागरने निवास और विश्राम किया था, वे सब स्थान प्रभुने जानकीजीको दिखाये और हर स्थानका नाम बताया।
तुरत बिमान तहाँ चलि आवा। दंडक बन जहँ परम सुहावा॥कुंभजादि मुनिनायक नाना। गए रामु सब के अस्थाना॥॥१॥
विमान शीघ्र ही उस परम रमणीय दंडकवनमें जा पहुँचा, जहाँ अगस्त्य आदि अनेक मुनिराज निवास करते थे। श्रीराम इन सबके आश्रमोंमें गये।
सकल रिषिन्ह सन पाइ असीसा। चित्रकूट आए जगदीसा॥तहँ करि मुनिन्ह केर संतोषा। चला बिमानु तहाँ ते चोखा॥॥२॥
सब ऋषियोंसे आशीर्वाद पाकर जगदीश्वर श्रीराम चित्रकूट पहुँचे, वहाँ मुनियोंको संतुष्ट करके विमान वहाँसे फिर तेज गतिसे आगे बढ़ा।
बहुरि राम जानकिहि देखाई। जमुना कलि मल हरनि सुहाई॥पुनि देखी सुरसरी पुनीता। राम कहा प्रनाम करु सीता॥
फिर श्रीराम ने जानकीजी को कलियुग के पाप हरने वाली सुंदर यमुनाजी के दर्शन कराये, फिर पवित्र गंगाजी के दर्शन कराकर कहा—हे सीते! इन्हें प्रणाम करो।
तीरथपति पुनि देखु प्रयागा। निरखत जन्म कोटि अघ भागा॥देखु परम पावनि पुनि बेनी। हरनि सोक हरि लोक निसेनी॥
फिर तीर्थराज प्रयाग के दर्शन कराये, जिन्हें देखने मात्र से करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। फिर परम पवित्र त्रिवेणी के दर्शन कराये, जो शोक हरने वाली और हरिलोक की सीढ़ी-सी है।
पुनि देखु अवधपुरी अति पावनि। त्रिबिध ताप भव रोग नसावनि॥
फिर अत्यंत पवित्र अयोध्यापुरी के दर्शन कराये, जो तीनों तापों और जन्म-मरण के रोग का नाश करने वाली है।
सीता सहित अवध कहुँ कीन्ह कृपाल प्रनाम।सजल नयन तन पुलकित पुनि पुनि हरषित राम॥॥१२०(क)॥
फिर सीतासहित कृपालु श्रीरामने अयोध्याको प्रणाम किया—उनके नेत्र भर आये और शरीर बार-बार पुलकित होकर हर्षित हो उठा।
पुनि प्रभु आइ त्रिबेनीं हरषित मज्जनु कीन्ह।कपिन्ह सहित बिप्रन्ह कहुँ दान बिबिध बिधि दीन्ह॥१२०(ख)॥
फिर त्रिवेणीमें आकर प्रभुने हर्षपूर्वक स्नान किया और वानरोंसहित ब्राह्मणोंको भाँति-भाँतिके दान दिये।
प्रभु हनुमंतहि कहा बुझाई। धरि बटु रूप अवधपुर जाई॥भरतहि कुसल हमारि सुनाएहु। समाचार लै तुम्ह चलि आएहु॥॥१॥
फिर प्रभुने हनुमानको समझाकर कहा—ब्रह्मचारीका रूप धरकर अयोध्या जाओ, भरतको हमारा कुशल-समाचार सुनाना और उनका हाल लेकर लौट आना।
तुरत पवनसुत गवनत भयऊ। तब प्रभु भरद्वाज पहिं गयऊ॥नाना बिधि मुनि पूजा कीन्ही। अस्तुति करि पुनि आसिष दीन्ही॥॥२॥
पवनपुत्र तुरंत ही चल पड़े, और प्रभु भरद्वाज मुनिके पास पहुँचे। मुनिने भाँति-भाँतिसे उनकी पूजा-स्तुति की और फिर आशीर्वाद दिया।
मुनि पद बंदि जुगल कर जोरी। चढ़ि बिमान प्रभु चले बहोरी॥इहाँ निषाद सुना प्रभु आए। नाव नाव कहँ लोग बोलाए॥॥३॥
दोनों हाथ जोड़कर मुनिके चरणोंकी वंदना करके प्रभु फिर विमानपर चढ़कर आगे बढ़े। इधर निषादराजने सुना कि प्रभु आ गये हैं, तो वह 'नाव कहाँ है, नाव कहाँ है' पुकारते हुए लोगोंको बुलाने लगा।
सुरसरि नाघि जान तब आयो। उतरेउ तट प्रभु आयसु पायो॥तब सीताँ पूजी सुरसरी। बहु प्रकार पुनि चरनन्हि परी॥॥४॥
इतनेमें विमान गंगाजीको लाँघकर इस पार आ गया और प्रभुकी आज्ञासे किनारे उतरा। तब सीताजीने भाँति-भाँतिसे गंगाजीकी पूजा करके उनके चरणोंमें प्रणाम किया।
दीन्हि असीस हरषि मन गंगा। सुंदरि तव अहिवात अभंगा॥सुनत गुहा धायउ प्रेमाकुल। आयउ निकट परम सुख संकुल॥॥५॥
गंगाजीने प्रसन्न मनसे आशीर्वाद दिया—हे सुंदरी! तुम्हारा सुहाग सदा अखंड रहे। यह सुनते ही, प्रभुके तटपर उतरनेकी खबर पाकर निषादराज गुह प्रेमविह्वल होकर दौड़ पड़ा।
प्रभुहि सहित बिलोकि बैदेही। परेउ अवनि तन सुधि नहिं तेही॥प्रीति परम बिलोकि रघुराई। हरषि उठाइ लियो उर लाई॥॥६॥
सीतासहित प्रभुको देखते ही वह आनंदमग्न होकर धरतीपर गिर पड़ा, उसे देहकी सुधि तक न रही। उसका यह परम प्रेम देखकर श्रीरामने हर्षपूर्वक उसे उठाकर हृदयसे लगा लिया।
लियो हृदयँ लाइ कृपा निधान सुजान राय रमापती।बैठारि परम समीप बूझी कुसल सो कर बीनती॥अब कुसल पद पंकज बिलोकि बिरंचि संकर सेब्य जे।सुख धाम पूरनकाम राम नमामि राम नमामि ते॥॥१॥
सुजानोंके शिरोमणि, लक्ष्मीपति, कृपानिधान प्रभुने उसे हृदयसे लगाकर अत्यंत निकट बैठाया और कुशल पूछी। वह विनती करने लगा—आपके जिन चरणकमलोंकी सेवा ब्रह्मा-शंकर तक करते हैं, उनके दर्शन पाकर ही मैं अब सचमुच सकुशल हूँ। हे सुखधाम, हे पूर्णकाम राम! मैं आपको बारंबार नमस्कार करता हूँ।
सब भाँति अधम निषाद सो हरि भरत ज्यों उर लाइयो।मतिमंद तुलसीदास सो प्रभु मोह बस बिसराइयो॥यह रावनारि चरित्र पावन राम पद रतिप्रद सदा।कामादिहर बिग्यानकर सुर सिद्ध मुनि गावहिं मुदा॥॥२॥
सर्वथा नीच उस निषादको भी प्रभुने भरतकी ही भाँति हृदयसे लगा लिया। तुलसीदासजी कहते हैं—मुझ मंदबुद्धिने ही मोहवश उस प्रभुको भुला रखा है। रावणके शत्रुका यह पावन चरित्र सदा श्रीरामके चरणोंमें प्रेम उपजानेवाला है, कामादि विकारोंका नाश करनेवाला और परम ज्ञान देनेवाला है—देवता, सिद्ध और मुनि इसे आनंदपूर्वक गाते हैं।
समर बिजय रघुबीर के चरित जे सुनहिं सुजान।बिजय बिबेक बिभूति नित तिन्हहि देहिं भगवान॥१२१(क)॥
जो सुजान लोग श्रीरघुवीरकी इस समर-विजयकी लीलाको सुनते हैं, उन्हें भगवान सदा विजय, विवेक और ऐश्वर्य प्रदान करते हैं।
यह कलिकाल मलायतन मन करि देखु बिचार।श्रीरघुनाथ नाम तजि नाहिन आन अधार॥१२१(ख)॥
अरे मन! विचार करके देख—यह कलिकाल पापोंका घर है। इसमें श्रीरघुनाथके नामके सिवा दूसरा कोई सहारा नहीं है।
इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने षष्ठ: सोपानः समाप्त:।
कलियुगके समस्त पापोंका नाश करनेवाले श्रीरामचरितमानसका यह छठा सोपान (लंकाकांड) यहाँ समाप्त होता है।
धाइ धरे गुर चरन सरोरुह। अनुज सहित अति पुलक तनोरुह॥
श्रीराम दौड़कर गुरु वसिष्ठके चरणकमलोंसे लिपट गये, उनका शरीर छोटे भाई लक्ष्मणसहित अत्यंत पुलकित हो उठा।
