द्वितीय सोपान

अयोध्याकाण्ड

राज्याभिषेक की तैयारी, वनगमन एवं भरत मिलाप की कथा।

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राज्याभिषेक की तैयारी, वनगमन एवं भरत मिलाप की कथा।

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श्लोक

यस्याङ्के च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तकेभाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट्।सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्वदाशर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्रीशङ्करः पातु माम्॥१॥

जिनके अंग पर पर्वतराज की पुत्री पार्वती जी सुशोभित हैं, मस्तक पर गंगा जी, ललाट पर द्वितीया का चंद्रमा, कंठ में हलाहल विष और वक्षस्थल पर सर्पों के राजा शेषनाग विराजमान हैं - वे भस्म से विभूषित, देवताओं में श्रेष्ठ, सबके स्वामी, सर्वव्यापी, चंद्रमा के समान कांतिमान श्री शंकर भगवान मेरी रक्षा करें।

श्लोक

प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः।मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मञ्जुलमंगलप्रदा॥२॥

राज्याभिषेक की बात सुनकर जिनके मुखकमल की शोभा न तो हर्ष से बढ़ी और न वनवास के दुःख से म्लान हुई - रघुनंदन श्रीराम के उस मुखारविंद की शोभा सदा मुझे शुभ मंगल प्रदान करने वाली हो।

श्लोक

नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम्।पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम्॥३॥

नीलकमल के समान श्यामल और कोमल जिनका शरीर है, जिनके वाम भाग में सीता जी विराजमान हैं, और हाथों में सुंदर धनुष-बाण सुशोभित हैं - रघुकुल के स्वामी उन श्रीराम को मैं प्रणाम करता हूँ।

दोहा

श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि।बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि॥

श्रीगुरु के चरण-कमलों की रज से अपने मन-रूपी दर्पण को स्वच्छ करके मैं श्रीराम के उस निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - चारों फल देने वाला है।

जब तें रामु ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए॥भुवन चारिदस भूधर भारी। सुकृत मेघ बरषहिं सुख बारी॥॥१॥

जब से राम विवाह करके घर लौटे, तब से प्रतिदिन नए मंगल-उत्सव होने लगे। चौदहों लोक मानो विशाल पर्वत हैं, जिन पर पुण्य-रूपी बादल सुख की वर्षा कर रहे हैं।

रिधि सिधि संपति नदीं सुहाई। उमगि अवध अंबुधि कहुँ आई॥मनिगन पुर नर नारि सुजाती। सुचि अमोल सुंदर सब भाँती॥॥२॥

ऋद्धि-सिद्धि और संपत्ति सुंदर नदियों के समान उमड़कर अयोध्या-रूपी समुद्र में आ मिलीं। नगर के स्त्री-पुरुष उत्तम कुल के मणियों के समान हैं - पवित्र, अमूल्य और हर प्रकार से सुंदर।

कहि न जाइ कछु नगर बिभूती। जनु एतनिअ बिरंचि करतूती॥सब बिधि सब पुर लोग सुखारी। रामचंद मुख चंदु निहारी॥॥३॥

नगर के ऐश्वर्य का वर्णन नहीं किया जा सकता, मानो ब्रह्मा जी की समस्त कारीगरी यहीं सिमट आई हो। श्रीरामचंद्र के चंद्रमुख को निहारकर नगर के सभी लोग हर प्रकार से सुखी हैं।

मुदित मातु सब सखीं सहेली। फलित बिलोकि मनोरथ बेली॥राम रूपु गुनसीलु सुभाऊ। प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ॥॥४॥

सभी माताएँ और सखी-सहेलियाँ अपनी मनोरथ-रूपी लता को फलती देखकर आनंदित हैं। राम के रूप, गुण, शील और स्वभाव को देख-सुनकर राजा दशरथ अत्यंत प्रसन्न होते हैं।

दोहा

सब कें उर अभिलाषु अस कहहिं मनाइ महेसु।आप अछत जुबराज पद रामहि देउ नरेसु॥१॥

सबके हृदय में यही अभिलाषा है, और सब महादेव जी को मनाकर प्रार्थना करते हैं कि राजा अपने जीते-जी राम को युवराज-पद प्रदान करें।

एक समय सब सहित समाजा। राजसभाँ रघुराजु बिराजा॥सकल सुकृत मूरति नरनाहू। राम सुजसु सुनि अतिहि उछाहू॥॥१॥

एक समय संपूर्ण समाज सहित राजा दशरथ राजसभा में विराजमान थे। समस्त पुण्यों की साक्षात मूर्ति वे राजा, राम का सुयश सुनकर अत्यंत उल्लसित हो रहे थे।

नृप सब रहहिं कृपा अभिलाषें। लोकप करहिं प्रीति रुख राखें॥तिभुवन तीनि काल जग माहीं। भूरि भाग दसरथ सम नाहीं॥॥२॥

सभी राजा उनकी कृपा चाहते हैं, और लोकपाल भी उनका अनुकूल भाव रखते हुए प्रीति करते हैं। तीनों लोकों और तीनों कालों में दशरथ के समान सौभाग्यशाली और कोई नहीं है।

मंगलमूल रामु सुत जासू। जो कछु कहिअ थोर सब तासू॥रायँ सुभायँ मुकुरु कर लीन्हा। बदनु बिलोकि मुकुट सम कीन्हा॥॥३॥

मंगल के मूल राम जिनके पुत्र हैं, उनके विषय में जो कुछ भी कहा जाए वह थोड़ा ही है। राजा ने स्वाभाविक ही हाथ में दर्पण ले लिया और अपना मुख देखकर मुकुट सीधा किया।

श्रवन समीप भए सित केसा। मनहुँ जरठपनु अस उपदेसा॥नृप जुबराज राम कहुँ देहू। जीवन जनम लाहु किन लेहू॥॥४॥

कानों के पास बाल सफेद हो गए, मानो बुढ़ापा यह उपदेश दे रहा हो - हे राजन, राम को युवराज पद दो, अपने जीवन और जन्म का लाभ क्यों न उठा लो।

दोहा

यह बिचारु उर आनि नृप सुदिनु सुअवसरु पाइ।प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरहि सुनायउ जाइ॥२॥

हृदय में यह विचार लाकर राजा ने शुभ दिन और उत्तम अवसर पाकर, प्रेम से पुलकित शरीर और आनंदित मन से जाकर अपने गुरु को यह बात सुनाई।

कहइ भुआलु सुनिअ मुनिनायक। भए राम सब बिधि सब लायक॥सेवक सचिव सकल पुरबासी। जे हमारे अरि मित्र उदासी॥॥१॥

राजा ने कहा - हे मुनिराज, सुनिए, राम हर प्रकार से पूर्ण योग्य हो गए हैं। सेवक, मंत्री, समस्त नगरवासी, चाहे वे हमारे शत्रु हों, मित्र हों या उदासीन,

सबहि रामु प्रिय जेहि बिधि मोही। प्रभु असीस जनु तनु धरि सोही॥बिप्र सहित परिवार गोसाईं। करहिं छोहु सब रौरिहि नाई॥॥२॥

राम सबको उतने ही प्रिय हैं जितने मुझे हैं, मानो आपका आशीर्वाद ही देह धारण करके शोभित हो रहा हो। ब्राह्मणों सहित समस्त परिवार, हे स्वामी, सब आप ही की तरह उन पर स्नेह करते हैं।

जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं। ते जनु सकल बिभव बस करहीं॥मोहि सम यहु अनुभयउ न दूजें। सबु पायउँ रज पावनि पूजें॥॥३॥

जो गुरु के चरणों की रज को सिर पर धारण करते हैं, वे मानो समस्त वैभव को वश में कर लेते हैं। यह अनुभव मुझ जैसा और किसी को नहीं हुआ - इस पावन रज की पूजा करके ही मैंने सब कुछ पा लिया है।

अब अभिलाषु एकु मन मोरें। पूजहि नाथ अनुग्रह तोरें॥मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू। कहेउ नरेस रजायसु देहू॥॥४॥

अब मेरे मन में एक ही अभिलाषा है - हे नाथ, आपकी कृपा से वह पूर्ण हो। राजा के स्वाभाविक स्नेह को देखकर मुनि प्रसन्न हुए, राजा ने कहा - आप आज्ञा दीजिए।

दोहा

राजन राउर नामु जसु सब अभिमत दातार।फल अनुगामी महिप मनि मन अभिलाषु तुम्हार॥३॥

हे राजन, आपका नाम और यश सबको मनचाहा फल देने वाला है। हे राजाओं में श्रेष्ठ, आपके मन की अभिलाषा अवश्य फलीभूत होगी।

सब बिधि गुरु प्रसन्न जियँ जानी। बोलेउ राउ रहँसि मृदु बानी॥नाथ रामु करिअहिं जुबराजू। कहिअ कृपा करि करिअ समाजू॥॥१॥

गुरु को हर प्रकार से प्रसन्न जानकर राजा हर्षित होकर मृदु वाणी में बोले - हे नाथ, राम को युवराज बनाइए, कृपा करके आज्ञा दीजिए और सारी तैयारी की जाए।

मोहि अछत यहु होइ उछाहू। लहहिं लोग सब लोचन लाहू॥प्रभु प्रसाद सिव सबइ निबाहीं। यह लालसा एक मन माहीं॥॥२॥

मेरे जीते-जी ही यह उत्सव हो जाए, जिससे सभी लोग अपने नेत्रों का लाभ पा सकें। प्रभु की कृपा और शिवजी की सहायता से यह सब पूर्ण हो - मेरे मन में बस यही एक लालसा है।

पुनि न सोच तनु रहउ कि जाऊ। जेहिं न होइ पाछें पछिताऊ॥सुनि मुनि दसरथ बचन सुहाए। मंगल मोद मूल मन भाए॥॥३॥

फिर मुझे कोई चिंता नहीं कि शरीर रहे या जाए, बस पीछे कोई पछतावा न रह जाए। दशरथ के ये सुंदर वचन सुनकर मुनि वशिष्ठ के मन में मंगलमय आनंद उमड़ आया।

सुनु नृप जासु बिमुख पछिताहीं। जासु भजन बिनु जरनि न जाहीं॥भयउ तुम्हार तनय सोइ स्वामी। रामु पुनीत प्रेम अनुगामी॥॥४॥

सुनिए राजन, जिनसे विमुख होकर लोग पछताते हैं और जिनके भजन के बिना संताप नहीं मिटता - वे ही स्वामी आपके पुत्र रूप में अवतरित हुए हैं, पवित्र प्रेम के अनुगामी राम।

दोहा

बेगि बिलंबु न करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु।सुदिन सुमंगलु तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु॥४॥

हे राजन, विलंब न कीजिए, शीघ्र ही सारी तैयारी कीजिए। शुभ दिन और सुमंगल तभी होगा जब राम युवराज पद पर अभिषिक्त होंगे।

मुदित महिपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत्रु बोलाए॥कहि जयजीव सीस तिन्ह नाए। भूप सुमंगल बचन सुनाए॥॥१॥

प्रसन्न राजा महल में लौट आए और सेवकों, मंत्रियों तथा सुमंत्र को बुलवाया। सबने सिर झुकाकर जय-जयकार की, और राजा ने उन्हें मंगलमय वचन सुनाए।

जौं पाँचहि मत लागे नीका। करहु हरषि हियँ रामहि टीका॥॥२॥

यदि यह बात आप सबको उचित लगे, तो हर्षित हृदय से राम का राजतिलक कीजिए।

मंत्री मुदित सुनत प्रिय बानी। अभिमत बिरवँ परेउ जनु पानी॥बिनती सचिव करहिं कर जोरी। जिअहु जगतपति बरिस करोरी॥॥३॥

प्रिय वचन सुनकर मंत्री आनंदित हो उठे, मानो उनकी मनचाही बेल पर जल पड़ गया हो। मंत्री हाथ जोड़कर विनती करते हैं - हे जगत के स्वामी, आप करोड़ों वर्ष जीवित रहें।

जग मंगल भल काजु बिचारा। बेगिअ नाथ न लाइअ बारा॥नृपहि मोदु सुनि सचिव सुभाषा। बढ़त बौंड़ जनु लही सुसाखा॥॥४॥

आपने संसार के कल्याण के लिए यह उत्तम कार्य सोचा है, हे नाथ, इसमें विलंब न कीजिए। मंत्रियों की मधुर वाणी सुनकर राजा को ऐसा आनंद हुआ मानो बढ़ती हुई बेल को सहारे के लिए अच्छी शाखा मिल गई हो।

दोहा

कहेउ भूप मुनिराज कर जोइ जोइ आयसु होइ।राम राज अभिषेक हित बेगि करहु सोइ सोइ॥५॥

राजा ने हाथ जोड़कर मुनिराज से कहा - जो भी आपकी आज्ञा हो, राम के राज्याभिषेक के लिए वह सब शीघ्र कीजिए।

हरषि मुनीस कहेउ मृदु बानी। आनहु सकल सुतीरथ पानी॥औषध मूल फूल फल पाना। कहे नाम गनि मंगल नाना॥॥१॥

मुनिराज वशिष्ठ प्रसन्न होकर मृदु वाणी में बोले - सभी पवित्र तीर्थों का जल लाओ। औषधि, मूल, फूल, फल और पत्ते - उन्होंने अनेक मंगल वस्तुओं के नाम गिनाए।

चामर चरम बसन बहु भाँती। रोम पाट पट अगनित जाती॥मनिगन मंगल बस्तु अनेका। जो जग जोगु भूप अभिषेका॥॥२॥

चँवर, मृगचर्म, अनेक प्रकार के वस्त्र, ऊनी और रेशमी कपड़े अनगिनत जातियों के। मणियाँ और अनेक मंगल वस्तुएँ - जो कुछ भी संसार में राजा के अभिषेक के योग्य हो, वह सब मँगवाया गया।

बेद बिदित कहि सकल बिधाना। कहेउ रचहु पुर बिबिध बिताना॥सफल रसाल पूगफल केरा। रोपहु बीथिन्ह पुर चहुँ फेरा॥॥३॥

वेदविहित समस्त विधान बताकर उन्होंने कहा - नगर में विविध प्रकार के मंडप सजाओ। फलों से लदे आम, सुपारी और केले के वृक्ष नगर की गलियों में चारों ओर रोपो।

रचहु मंजु मनि चौकें चारू। कहहु बनावन बेगि बजारू॥पूजहु गनपति गुर कुलदेवा। सब बिधि करहु भूमिसुर सेवा॥॥४॥

सुंदर मणियों से मंजुल चौक सजाओ, और बाज़ार को शीघ्र सजाने का आदेश दो। गणपति, गुरु और कुलदेवता का पूजन करो, और ब्राह्मणों की हर प्रकार से सेवा करो।

दोहा

ध्वज पताक तोरन कलस सजहु तुरग रथ नाग।सिर धरि मुनिबर बचन सबु निज निज काजहिं लाग॥६॥

ध्वजा, पताका, बंदनवार, कलश, घोड़े, रथ और हाथी सजाओ। मुनिवर वशिष्ठ के वचनों को शिरोधार्य करके सब अपने-अपने कार्य में जुट गए।

जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा। सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा॥बिप्र साधु सुर पूजत राजा। करत राम हित मंगल काजा॥॥१॥

मुनिराज ने जिसे जो कार्य सौंपा, उसने उस कार्य को सर्वोपरि मानकर तुरंत पूरा किया। राजा ब्राह्मणों, साधुओं और देवताओं का पूजन करते हुए राम के हित में मंगल कार्य करने लगे।

दोहा

सुनत राम अभिषेक सुहावा। बाज गहागह अवध बधावा॥।राम सीय तन सगुन जनाए। फरकहिं मंगल अंग सुहाए॥॥२॥

राम के सुंदर अभिषेक की बात सुनते ही अयोध्या में हर्ष के बधावे बजने लगे। राम और सीता के शरीर पर शुभ शकुन प्रकट होने लगे - उनके मंगलमय अंग फड़कने लगे।

पुलकि सप्रेम परसपर कहहीं। भरत आगमनु सूचक अहहीं॥भए बहुत दिन अति अवसेरी। सगुन प्रतीति भेंट प्रिय केरी॥॥३॥

प्रेम से पुलकित होकर वे आपस में कहने लगे - ये शकुन तो भरत के आगमन के सूचक हैं। बहुत दिन बीत चुके हैं और प्रतीक्षा भी बढ़ गई है, ये शुभ संकेत प्रिय भरत से मिलन का ही संकेत दे रहे हैं।

भरत सरिस प्रिय को जग माहीं। इहइ सगुन फलु दूसर नाहीं॥रामहि बंधु सोच दिन राती। अंडन्हि कमठ ह्रदउ जेहि भाँती॥॥४॥

संसार में भरत के समान प्रिय और कौन है - इस शकुन का दूसरा कोई फल नहीं हो सकता। राम को अपने भाई की चिंता दिन-रात वैसे ही बनी रहती है, जैसे कछुई का हृदय अपने अंडों में लगा रहता है।

दोहा

एहि अवसर मंगलु परम सुनि रहँसेउ रनिवासु।सोभत लखि बिधु बढ़त जनु बारिधि बीचि बिलासु॥७॥

इस अवसर पर परम मंगल समाचार सुनकर रनिवास आनंद से भर उठा। उसकी शोभा ऐसी लगती थी मानो बढ़ते चंद्रमा को देखकर समुद्र में लहरें उठने लगी हों।

प्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाए। भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए॥प्रेम पुलकि तन मन अनुरागीं। मंगल कलस सजन सब लागीं॥॥१॥

जो सबसे पहले जाकर यह समाचार सुनाने गईं, उन्हें प्रचुर आभूषण और वस्त्र भेंट में मिले। प्रेम से पुलकित शरीर और अनुराग से भरे मन से सभी स्त्रियाँ मंगल कलश सजाने में जुट गईं।

चौकें चारु सुमित्राँ पुरी। मनिमय बिबिध भाँति अति रुरी॥आनंद मगन राम महतारी। दिए दान बहु बिप्र हँकारी॥॥२॥

सुमित्रा जी ने सुंदर चौक मणियों से विविध प्रकार से अत्यंत मनोहर ढंग से सजाए। आनंदमग्न राम की माता कौशल्या ने ब्राह्मणों को बुलाकर उन्हें भरपूर दान दिया।

पूजीं ग्रामदेबि सुर नागा। कहेउ बहोरि देन बलिभागा॥जेहि बिधि होइ राम कल्यानू। देहु दया करि सो बरदानू॥॥३॥

उन्होंने ग्राम देवी, देवताओं और नागों का पूजन किया और उन्हें बलि-भाग अर्पित करने का आदेश दिया। वे प्रार्थना करती हैं - जिस भी विधि से राम का कल्याण हो, कृपा करके वही वरदान दीजिए।

गावहिं मंगल कोकिलबयनीं। बिधुबदनीं मृगसावकनयनीं॥॥४॥

कोयल के समान मधुर स्वर वाली, चंद्रमुखी और मृगशावक जैसे नयनों वाली स्त्रियाँ मंगलगान गाने लगीं।

दोहा

राम राज अभिषेकु सुनि हियँ हरषे नर नारि।लगे सुमंगल सजन सब बिधि अनुकूल बिचारि॥८॥

राम के राज्याभिषेक की बात सुनकर नगर के स्त्री-पुरुष हृदय से हर्षित हो उठे। सब कुछ अनुकूल जानकर वे सुमंगल की तैयारी में जुट गए।

तब नरनाहँ बसिष्ठु बोलाए। रामधाम सिख देन पठाए॥गुर आगमनु सुनत रघुनाथा। द्वार आइ पद नायउ माथा॥॥१॥

तब राजा दशरथ ने वशिष्ठ जी को बुलाकर उन्हें राम के महल में शिक्षा देने भेजा। गुरु के आगमन की बात सुनते ही रघुनाथ द्वार पर आए और उनके चरणों में मस्तक झुकाया।

सादर अरघ देइ घर आने। सोरह भाँति पूजि सनमाने॥गहे चरन सिय सहित बहोरी। बोले रामु कमल कर जोरी॥॥३॥

आदरपूर्वक अर्घ्य देकर उन्हें घर के भीतर लाया गया और सोलह प्रकार से उनकी पूजा करके सम्मानित किया गया। फिर सीता सहित राम ने उनके चरण पकड़े और हाथ जोड़कर कमल जैसे स्वर में बोले।

प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू। भयउ पुनीत आजु यहु गेहू॥आयसु होइ सो करौं गोसाई। सेवक लहइ स्वामि सेवकाई॥॥४॥

हे स्वामी, अपनी प्रभुता को त्यागकर आपने यह स्नेह दिखाया है - आज यह घर पवित्र हो गया। जो भी आज्ञा हो, मैं वही करूँगा, हे गोसाईं; सेवक तो स्वामी की सेवा में ही अपनी सार्थकता पाता है।

दोहा

सुनि सनेह साने बचन मुनि रघुबरहि प्रसंस।राम कस न तुम्ह कहहु अस हंस बंस अवतंस॥९॥

स्नेह में सने ऐसे वचन सुनकर मुनि वशिष्ठ ने राम की प्रशंसा की - हे राम, तुम ऐसा क्यों न कहो, तुम तो हंस-कुल के भूषण हो।

बरनि राम गुन सीलु सुभाऊ। बोले प्रेम पुलकि मुनिराऊ॥भूप सजेउ अभिषेक समाजू। चाहत देन तुम्हहि जुबराजू॥॥१॥

राम के गुण, शील और स्वभाव का वर्णन करते हुए मुनिराज वशिष्ठ प्रेम से पुलकित होकर बोले - राजा ने अभिषेक की सारी तैयारी कर ली है, वे तुम्हें युवराज बनाना चाहते हैं।

राम करहु सब संजम आजू। जौं बिधि कुसल निबाहै काजू॥गुरु सिख देइ राय पहिं गयउ। राम हृदयँ अस बिसमउ भयऊ॥॥२॥

हे राम, आज संयम और व्रत का पालन करो, जिससे विधाता की कृपा से यह कार्य भलीभाँति संपन्न हो। यह शिक्षा देकर गुरु राजा के पास चले गए, और राम के हृदय में यह सुनकर विस्मय उत्पन्न हुआ।

जनमे एक संग सब भाई। भोजन सयन केलि लरिकाई॥करनबेध उपबीत बिआहा। संग संग सब भए उछाहा॥॥३॥

सभी भाई साथ-साथ जन्मे, बचपन में साथ-साथ भोजन, शयन और खेल-कूद करते रहे। कर्णवेध, यज्ञोपवीत और विवाह - सभी संस्कार और उत्सव भी सबके साथ-साथ ही संपन्न हुए।

बिमल बंस यहु अनुचित एकू। बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू॥प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई। हरउ भगत मन के कुटिलाई॥॥४॥

इस निर्मल वंश में एक बात अनुचित-सी लगती है - अन्य भाइयों को छोड़कर केवल बड़े का ही अभिषेक होना। प्रभु राम का यह प्रेमपूर्ण संकोच इतना सुंदर है कि वह भक्तों के मन की कुटिलता तक हर लेता है।

दोहा

तेहि अवसर आए लखन मगन प्रेम आनंद।सनमाने प्रिय बचन कहि रघुकुल कैरव चंद॥१०॥

उसी अवसर पर प्रेम और आनंद में मग्न लक्ष्मण वहाँ आए। रघुकुल के कुमुद-चंद्र राम ने प्रिय वचन कहकर उनका सम्मान किया।

बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना। पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना॥भरत आगमनु सकल मनावहिं। आवहुँ बेगि नयन फलु पावहिं॥॥१॥

नाना प्रकार के वाद्य बज रहे थे, नगर के आनंद का वर्णन नहीं किया जा सकता। सब लोग भरत के शीघ्र आगमन की कामना करते हैं, जिससे उनके नेत्रों को दर्शन का फल मिल सके।

हाट बाट घर गलीं अथाई। कहहिं परसपर लोग लोगाई॥कालि लगन भलि केतिक बारा। पूजिहि बिधि अभिलाषु हमारा॥॥२॥

बाज़ार, गली, घर और चौपालों में स्त्री-पुरुष आपस में कहते हैं - कल की शुभ लगन में अब कितना समय शेष है, विधाता हमारी यह अभिलाषा अवश्य पूर्ण करें।

कनक सिंघासन सीय समेता। बैठहिं रामु होइ चित चेता॥सकल कहहिं कब होइहि काली। बिघन मनावहिं देव कुचाली॥॥३॥

स्वर्ण सिंहासन पर सीता सहित राम बैठेंगे - यह सोचकर सब सचेत मन से प्रतीक्षा कर रहे हैं। सब पूछते हैं कि यह शुभ घड़ी कब आएगी, जबकि कुटिल स्वभाव के दुष्ट लोग विघ्न की कामना कर रहे हैं।

तिन्हहि सोहाइ न अवध बधावा। चोरहि चंदिनि राति न भावा॥सारद बोलि बिनय सुर करहीं। बारहिं बार पाय लै परहीं॥॥४॥

जैसे चोर को चाँदनी रात नहीं भाती, वैसे ही उन दुष्टों को अयोध्या का यह उत्सव नहीं सुहाता। देवता सरस्वती जी का आवाहन करके बार-बार उनके चरणों में गिरकर विनती करने लगे।

दोहा

बिपति हमारि बिलोकि बड़ि मातु करिअ सोइ आजु।रामु जाहिं बन राजु तजि होइ सकल सुरकाजु॥११॥

हे माता सरस्वती, हमारी इस बड़ी विपत्ति को देखकर आज ऐसा कीजिए कि राम राज्य त्यागकर वन चले जाएँ, जिससे देवताओं का सारा प्रयोजन सिद्ध हो जाए।

सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती। भइउँ सरोज बिपिन हिमराती॥देखि देव पुनि कहहिं निहोरी। मातु तोहि नहिं थोरिउ खोरी॥॥१॥

देवताओं की यह विनती सुनकर सरस्वती जी खड़ी-खड़ी पछताने लगीं, मानो कमल-वन के लिए हिम-रात्रि बनने जैसी विवशता उन्हें अनुभव हुई। यह देखकर देवता फिर विनती करने लगे - हे माता, इसमें आपको तनिक भी दोष नहीं लगेगा।

बिसमय हरष रहित रघुराऊ। तुम्ह जानहु सब राम प्रभाऊ॥जीव करम बस सुख दुख भागी। जाइअ अवध देव हित लागी॥॥२॥

राघव राम तो हर्ष और विषाद दोनों से परे हैं, आप तो राम का सारा प्रभाव जानती ही हैं। जीव तो अपने कर्मों के अधीन सुख-दुख भोगता है - अतः देवताओं के हित के लिए आप अयोध्या पधारिए।

बार बार गहि चरन सँकोचौ। चली बिचारि बिबुध मति पोची॥ऊँच निवासु नीचि करतूती। देखि न सकहिं पराइ बिभूती॥॥३॥

बार-बार उनके चरण पकड़कर संकोचवश सरस्वती जी यह विचार करती हुई चल पड़ीं कि देवताओं का निवास तो ऊँचा है, पर यह कार्य नीच है - वे दूसरों का वैभव देख ही नहीं सकते।

आगिल काजु बिचारि बहोरी। करिहहिं चाह कुसल कबि मोरी॥हरषि हृदयँ दसरथ पुर आई। जनु ग्रह दसा दुसह दुखदाई॥॥४॥

फिर भविष्य के परिणाम पर विचार करते हुए वे सोचने लगीं कि कवि भी मेरा गुणगान करेंगे। इस प्रकार वे हर्षित मन से राजा दशरथ की नगरी में आ पहुँचीं, मानो कोई असह्य दुखदायी ग्रहदशा उतर आई हो।

दोहा

नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकेइ केरि।अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि॥१२॥

कैकेयी की मंथरा नामक मंदबुद्धि दासी को अपयश की पिटारी बनाकर, वाणी की देवी सरस्वती उसकी बुद्धि पलटकर लौट गईं।

दीख मंथरा नगरु बनावा। मंजुल मंगल बाज बधावा॥पूछेसि लोगन्ह काह उछाहू। राम तिलकु सुनि भा उर दाहू॥॥१॥

मंथरा ने देखा कि नगर सजाया जा रहा है, सुंदर मंगल बाजे बज रहे हैं। उसने लोगों से पूछा कि यह उल्लास किस बात का है, और राम-तिलक की बात सुनते ही उसका हृदय जल उठा।

करइ बिचारु कुबुद्धि कुजाती। होइ अकाजु कवनि बिधि राती॥देखि लागि मधु कुटिल किराती। जिमि गवँ तकइ लेउँ केहि भाँती॥॥२॥

कुबुद्धि और कुजाति मंथरा विचार करने लगी कि किसी भी तरह आज रात यह कार्य बिगड़ जाए। मीठी बातों में छिपकर वह कुटिल किरातिन ऐसे अवसर ताकने लगी, जैसे कोई चोर गाय चुराने का अवसर ताकता है।

भरत मातु पहिं गई बिलखानी। का अनमनि हसि कह हँसि रानी॥ऊतरु देइ न लेइ उसासू। नारि चरित करि ढारइ आँसू॥॥३॥

वह उदास मुख बनाकर भरत की माता कैकेयी के पास गई। रानी ने हँसकर पूछा - क्यों उदास है? पर वह कोई उत्तर न देकर केवल लंबी साँस लेती रही, और स्त्री-सुलभ चातुर्य से आँसू बहाने लगी।

हँसि कह रानि गालु बड़ तोरें। दीन्ह लखन सिख अस मन मोरें॥तबहुँ न बोल चेरि बड़ि पापिनि। छाड़इ स्वास कारि जनु साँपिनि॥॥४॥

रानी हँसकर बोलीं - तेरी तो बड़ी बातें बनाने की आदत है, लगता है लक्ष्मण ने तुझे कोई सीख दे दी है। तब भी वह महापापिनी दासी कुछ न बोली, बस काली नागिन की तरह लंबी साँसें छोड़ती रही।

दोहा

सभय रानि कह कहसि किन कुसल रामु महिपालु।लखनु भरतु रिपुदमनु सुनि भा कुबरी उर सालु॥१३॥

भयभीत होकर रानी बोलीं - बोलती क्यों नहीं, राम, राजा, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न सब कुशल तो हैं? यह सुनकर मंथरा के हृदय में और भी जलन उठी।

कत सिख देइ हमहि कोउ माई। गालु करब केहि कर बलु पाई॥रामहि छाड़ि कुसल केहि आजू। जेहि जनेसु देइ जुबराजू॥॥१॥

मुझे भला कौन सीख देगा, हे रानी? किसके बल पर मैं बड़ी-बड़ी बातें बनाऊँगी? राम को छोड़कर आज किसकी कुशलता है, जिसे राजा युवराज बनाने जा रहे हैं?

भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन। देखत गरब रहत उर नाहिन॥देखहु कस न जाइ सब सोभा। जो अवलोकि मोर मनु छोभा॥॥२॥

कौशल्या पर विधाता अत्यंत अनुकूल हो गए हैं, यह देखकर उनके हृदय में गर्व समाता नहीं है। आप स्वयं जाकर वह सारी शोभा क्यों नहीं देख लेतीं, जिसे देखकर मेरा तो मन ही व्याकुल हो उठा है।

पूतु बिदेस न सोचु तुम्हारें। जानति हहु बस नाहु हमारें॥नीद बहुत प्रिय सेज तुराई। लखहु न भूप कपट चतुराई॥॥३॥

तुम्हारा पुत्र विदेश में है, तुम्हें कोई चिंता नहीं, तुम समझती हो कि हमारे स्वामी तुम्हारे ही वश में हैं। तुम्हें तो बस नींद और मुलायम सेज ही प्रिय है, राजा की चतुर चालाकी तुम पहचान ही नहीं पातीं।

सुनि प्रिय बचन मलिन मनु जानी। झुकी रानि अब रहु अरगानी॥पुनि अस कबहुँ कहसि घरफोरी। तब धरि जीभ कढ़ावउँ तोरी॥॥४॥

ये मीठी परंतु विषभरी बातें सुनकर रानी ने उसका मलिन मन भाँप लिया और डाँटकर बोलीं - अब चुप रह, घर फोड़नेवाली! फिर कभी ऐसी बात कही तो तेरी जीभ पकड़कर खिंचवा डालूँगी।

दोहा

काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि।तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरतमातु मुसुकानि॥१४॥

एक आँख वाली, लँगड़ी, कुबड़ी, कुटिल और कुचाली जानकर - ऊपर से स्त्री और फिर दासी भी - भरत की माता कैकेयी ने यह बात सुनकर बस मुसकरा भर दिया।

प्रियबादिनि सिख दीन्हिउँ तोही। सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही॥सुदिनु सुमंगल दायकु सोई। तोर कहा फुर जेहि दिन होई॥॥१॥

हे प्रिय, मैंने तुझे बस सिखाने के लिए डाँटा था, स्वप्न में भी मुझे तुझ पर कोई क्रोध नहीं है। जिस दिन तेरी यह बात सच हो जाएगी, वही दिन मेरे लिए सबसे शुभ और मंगलमय दिन होगा।

जेठ स्वामि सेवक लघु भाई। यह दिनकर कुल रीति सुहाई॥राम तिलकु जौं साँचेहुँ काली। देउँ मागु मन भावत आली॥॥२॥

बड़ा भाई स्वामी और छोटे भाई सेवक होते हैं - यही सूर्यवंश की सुंदर परंपरा है। यदि सचमुच कल राम का तिलक होने वाला है, तो हे सखी, तू जो चाहे माँग ले, मैं अवश्य दूँगी।

कौसल्या सम सब महतारी। रामहि सहज सुभायँ पिआरी॥मो पर करहिं सनेहु बिसेषी। मैं करि प्रीति परीछा देखी॥॥३॥

कौशल्या के समान ही सब माताएँ हैं, राम को तो सहज स्वभाव से ही सब प्रिय हैं। वे सब मुझ पर विशेष स्नेह रखती हैं - यह प्रेम मैंने स्वयं परखकर देखा है।

जौं बिधि जनमु देइ करि छोहू। होहुँ राम सिय पूत पुतोहू॥प्रान तें अधिक रामु प्रिय मोरें। तिन्ह कें तिलक छोभु कस तोरें॥॥४॥

यदि विधाता कृपा करके मुझे फिर जन्म दें, तो राम और सीता ही मेरे पुत्र-पुत्रवधू बनें। मुझे तो राम प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं - फिर उनके तिलक से तुझे इतनी व्याकुलता क्यों है?

दोहा

भरत सपथ तोहि सत्य कहु परिहरि कपट दुराउ।हरष समय बिसमउ करसि कारन मोहि सुनाउ॥१५॥

भरत की सौगंध खाकर सच-सच बता, छल-कपट छोड़कर। हर्ष के इस अवसर पर तू विषाद क्यों प्रकट कर रही है - मुझे इसका कारण बता।

एकहिं बार आस सब पूजी। अब कछु कहब जीभ करि दूजी॥फोरै जोगु कपारु अभागा। भलेउ कहत दुख रउरेहि लागा॥॥१॥

अब तो एक ही बार में मेरी सारी आशा पूर्ण हो गई। अब मैं दूसरी ही जीभ से खुलकर कहूँगी। मेरा अभागा माथा तो फोड़े जाने योग्य है, क्योंकि भली बात कहने पर भी आपको दुख हो गया।

कहहिं झूठि फुरि बात बनाई। ते प्रिय तुम्हहि करुइ मैं माई॥हमहुँ कहबि अब ठकुरसोहाती। नाहिं त मौन रहब दिनु राती॥॥२॥

जो झूठी बातें सच बनाकर कहते हैं, वे आपको प्रिय लगते हैं, और मैं आपको कड़वी लगने लगी हूँ, हे स्वामिनी। अब मैं भी बस चापलूसी की बातें ही किया करूँगी, नहीं तो दिन-रात मौन ही रहूँगी।

करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा। बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा॥कोउ नृप होइ हमहि का हानी। चेरि छाड़ि अब होब कि रानी॥॥३॥

मुझे कुरूप बनाकर विधाता ने मुझे सर्वथा पराधीन कर दिया - जो बोया जाता है वही काटा जाता है। कोई भी राजा बने, इसमें मेरी क्या हानि है? दासीपन छोड़कर क्या अब मैं रानी बन जाऊँगी?

जारै जोगु सुभाउ हमारा। अनभल देखि न जाइ तुम्हारा॥तातें कछुक बात अनुसारी। छमिअ देबि बड़ि चूक हमारी॥॥४॥

मेरा स्वभाव तो जलाने योग्य है - बस आपका अहित होते देखा नहीं जाता, इसी कारण कुछ कह बैठी। हे देवी, मुझे क्षमा कर दीजिए, यह मेरी बड़ी भूल थी।

दोहा

गूढ़ कपट प्रिय बचन सुनि तीय अधरबुधि रानि।सुरमाया बस बैरिनिहि सुह्द जानि पतिआनि॥१६॥

गूढ़ छल से भरे इन मीठे वचनों को सुनकर अल्पबुद्धि रानी कैकेयी, देवमाया के वश होकर, इस शत्रु को हितैषी मानकर उस पर विश्वास कर बैठीं।

सादर पुनि पुनि पूँछति ओही। सबरी गान मृगी जनु मोही॥तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी। रहसी चेरि घात जनु फाबी॥॥१॥

रानी बार-बार आदरपूर्वक उससे पूछने लगीं, मानो शिकारी के गीत से मोहित हिरणी हो। उनकी बुद्धि जैसी विधि को अभीष्ट थी वैसी ही पलट गई। मंथरा प्रसन्न हो उठी, मानो उसका जाल सफल हो गया हो।

तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराऊँ। धरेउ मोर घरफोरी नाऊँ॥सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली। अवध साढ़साती तब बोली॥॥२॥

आप तो पूछती हैं, पर मुझे कहते हुए डर लगता है - आप मुझे फिर घर फोड़नेवाली कह देंगी। इस प्रकार अनेक ढंग से विश्वास जमाकर मंथरा ने अयोध्या पर मंडरा रही साढ़े-साती-सी विपत्ति की बात कहनी शुरू की।

प्रिय सिय रामु कहा तुम्ह रानी। रामहि तुम्ह प्रिय सो फुरि बानी॥रहा प्रथम अब ते दिन बीते। समउ फिरें रिपु होहिं पिंरीते॥॥३॥

आपने कहा कि सीता-राम आपको प्रिय हैं और राम को भी आप प्रिय हैं - यह बात पहले सच थी, पर वे दिन अब बीत चुके। समय बदलते ही शत्रु भी प्रिय जैसा दिखने लगता है।

भानु कमल कुल पोषनिहारा। बिनु जल जारि करइ सोइ छारा॥जरि तुम्हारि चह सवति उखारी। रूँधहु करि उपाउ बर बारी॥॥४॥

जो सूर्य कमल-कुल का पोषण करता है, वही जल के अभाव में उसे जलाकर राख कर देता है। आपकी सौत आपको जड़ से उखाड़ फेंकना चाहती है - अभी समय रहते किसी अच्छे उपाय से इसे रोक लीजिए।

दोहा

तुम्हहि न सोचु सोहाग बल निज बस जानहु राउ।मन मलीन मुह मीठ नृप राउर सरल सुभाउ॥१७॥

आपको तो अपने सुहाग के बल पर कोई चिंता नहीं, आप राजा को अपने वश में समझती हैं। पर राजा तो मन के मैले और मुख के मीठे हैं, जबकि आपका स्वभाव सीधा-सरल है।

चतुर गँभीर राम महतारी। बीचु पाइ निज बात सँवारी॥पठए भरतु भूप ननिअउरें। राम मातु मत जानव रउरें॥॥१॥

राम की माता कौशल्या बड़ी चतुर और गंभीर हैं - अवसर पाकर उन्होंने अपनी बात सँवार ली है। राजा ने भरत को ननिहाल भेज दिया - समझ लीजिए, यह भी कौशल्या माता की ही चाल थी।

सेवहिं सकल सवति मोहि नीकें। गरबित भरत मातु बल पी कें॥सालु तुम्हार कौसिलहि माई। कपट चतुर नहिं होइ जनाई॥॥२॥

मानो कौशल्या यह मानती हैं कि सब सौतें उनकी अच्छी सेवा करती हैं, और भरत की माता अपने पति के बल पर गर्वित हैं। हे स्वामिनी, कौशल्या तो आपको कष्ट में डालना ही चाहती हैं, पर वे इतनी चतुर हैं कि उनका छल प्रकट ही नहीं होता।

राजहि तुम्ह पर प्रेमु बिसेषी। सवति सुभाउ सकइ नहिं देखी॥रची प्रंपचु भूपहि अपनाई। राम तिलक हित लगन धराई॥॥३॥

राजा का आप पर विशेष प्रेम है - एक सौत का स्वभाव यह देख ही नहीं सकता। इसीलिए उन्होंने षड्यंत्र रचकर राजा को अपने वश में करके राम-तिलक का मुहूर्त निकलवा लिया है।

यह कुल उचित राम कहुँ टीका। सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका॥आगिलि बात समुझि डरु मोही। देउ दैउ फिरि सो फलु ओही॥॥४॥

कुल-परंपरा के अनुसार राम का तिलक होना उचित ही है, और यह सबको भाता है, मुझे भी बहुत अच्छा लगता है। पर आगे जो होने वाला है उसे सोचकर मुझे डर लगता है - विधाता वह फल कौशल्या को ही लौटा दें।

दोहा

रचि पचि कोटिक कुटिलपन कीन्हेसि कपट प्रबोधु।कहिसि कथा सत सवति के जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु॥१८॥

अनेक प्रकार की कुटिलताएँ रच-रचकर मंथरा ने यह छलभरी सलाह दी, और सौत के विरुद्ध सैकड़ों बातें गढ़ीं, जिससे किसी भी तरह वैमनस्य बढ़ जाए।

भावी बस प्रतीति उर आई। पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई॥का पूछहुँ तुम्ह अबहुँ न जाना। निज हित अनहित पसु पहिचाना॥॥१॥

नियति के वश होकर रानी के मन में यह बात सच लगने लगी। उन्होंने फिर सौगंध दिलाकर पूछा। मंथरा बोली - अब और क्या पूछती हैं, अभी तक नहीं समझीं? अपना हित-अहित तो पशु भी पहचान लेता है।

भयउ पाखु दिन सजत समाजू। तुम्ह पाई सुधि मोहि सन आजू॥खाइअ पहिरिअ राज तुम्हारें। सत्य कहें नहिं दोषु हमारें॥॥२॥

पंद्रह दिन तो यह सारी तैयारी होते बीत गए, और आपको आज मुझसे पता चला है। मैं आपके ही राज्य में खाती-पहनती हूँ - सच कहने में मेरा कोई दोष नहीं होना चाहिए।

जौं असत्य कछु कहब बनाई। तौ बिधि देइहि हमहि सजाई॥रामहि तिलक कालि जौं भयऊ। तुम्ह कहुँ बिपति बीजु बिधि बयऊ॥॥३॥

यदि मैं कुछ भी झूठ या बनावटी बात कहूँ, तो विधाता मुझे दंड दे। यदि कल राम का तिलक हो गया, तो समझ लीजिए विधाता ने आपके लिए विपत्ति का बीज बो दिया।

रेख खँचाइ कहउँ बलु भाषी। भामिनि भइहु दूध की माखी॥जौं सुत सहित करहु सेवकाई। तौ घर रहहु न आन उपाई॥॥४॥

जोर देकर, दृढ़तापूर्वक मंथरा बोली - हे रानी, अब तो आप दूध में गिरी मक्खी के समान असहाय हो गई हैं। यदि पुत्र सहित सेवा करना स्वीकार हो तो ही इस घर में रह सकेंगी, अन्यथा कोई और उपाय नहीं है।

दोहा

कहउँ बिनतहि दीन्ह दुखु तुम्हहि कौसिलाँ देब।भरतु बंदिगृह सेइहहिं लखनु राम के नेब॥१९॥

मैं तो विनयपूर्वक ही कह रही हूँ - कौशल्या आपको दुख देंगी, भरत को बंदीगृह में रहना पड़ेगा, और लक्ष्मण राम के प्रधान सेवक बन जाएँगे।

कैकयसुता सुनत कटु बानी। कहि न सकइ कछु सहमि सुखानी॥तन पसेउ कदली जिमि काँपी। कुबरीं दसन जीभ तब चाँपी॥॥१॥

यह कटु वचन सुनकर कैकेयी सहम गईं और भय से सूख-सी गईं, कुछ कह न सकीं। उनका शरीर पसीने से भीग गया और वे केले के पौधे-सी काँपने लगीं; यह देख मंथरा ने दाँतों तले जीभ दबाई।

कहि कहि कोटिक कपट कहानी। धीरजु धरहु प्रबोधिसि रानी॥फिरा करमु प्रिय लागि कुचाली। बकिहि सराहइ मानि मराली॥॥२॥

अनेक छलभरी कहानियाँ बार-बार सुनाकर मंथरा रानी को धीरज बँधाने लगी। कैकेयी के कर्मों ने ऐसा पलटा खाया कि वह कुटिल दासी अब उन्हें प्रिय लगने लगी, मानो कोई बगुला हंस मानकर सराहा जा रहा हो।

सुनु मंथरा बात फुरि तोरी। दहिनि आँखि नित फरकइ मोरी॥दिन प्रति देखउँ राति कुसपने। कहउँ न तोहि मोह बस अपने॥॥३॥

सुनो मंथरा, तेरी बात सच है - मेरी दाहिनी आँख नित्य फड़कती रहती है। मैं प्रतिदिन रात को बुरे स्वप्न देखती हूँ, पर मोहवश तुझे यह बात नहीं बताई।

काह करौ सखि सूध सुभाऊ। दाहिन बाम न जानउँ काऊ॥॥४॥

क्या करूँ सखी, मेरा स्वभाव तो सीधा-सरल है - मैं दाएँ-बाएँ शकुन-अपशकुन कभी समझ ही नहीं पाई।

दोहा

अपने चलत न आजु लगि अनभल काहुक कीन्ह।केहिं अघ एकहि बार मोहि दैअँ दुसह दुखु दीन्ह॥२०॥

आज तक मैंने अपने आचरण से कभी किसी का अहित नहीं किया। फिर न जाने किस पाप के कारण विधाता ने मुझे यह असह्य दुख एक साथ दे दिया।

नैहर जनमु भरब बरु जाइ। जिअत न करबि सवति सेवकाई॥अरि बस दैउ जिआवत जाही। मरनु नीक तेहि जीवन चाही॥॥१॥

चाहे मैं अपना सारा जीवन मायके में बिताकर पूरा कर लूँ, पर जीते-जी सौत की सेवा नहीं करूँगी। जब विधाता किसी को शत्रु के अधीन जिलाए रखे, तो ऐसे जीवन से मृत्यु ही भली होती है।

दीन बचन कह बहुबिधि रानी। सुनि कुबरीं तियमाया ठानी॥अस कस कहहु मानि मन ऊना। सुखु सोहागु तुम्ह कहुँ दिन दूना॥॥२॥

रानी ने अनेक प्रकार से दीन वचन कहे। यह सुनकर मंथरा ने और भी स्त्री-सुलभ छल दिखाया - ऐसा हीन मन बनाकर क्यों कहती हैं, आपका सुख और सौभाग्य तो दिन-प्रतिदिन दूना ही होता जा रहा है।

जेहिं राउर अति अनभल ताका। सोइ पाइहि यहु फलु परिपाका॥जब तें कुमत सुना मैं स्वामिनि। भूख न बासर नींद न जामिनि॥॥३॥

जिसने भी आपका इतना बड़ा अहित सोचा है, वही इसका पका हुआ फल पाएगा। हे स्वामिनी, जब से मैंने यह कुमंत्र सुना है, तब से न मुझे दिन में भूख लगती है और न रात को नींद आती है।

पूँछेउ गुनिन्ह रेख तिन्ह खाँची। भरत भुआल होहिं यह साँची॥भामिनि करहु त कहौं उपाऊ। है तुम्हरीं सेवा बस राऊ॥॥४॥

मैंने ज्योतिषियों से पूछा, उन्होंने गणना करके यही निश्चित बताया कि भरत ही राजा बनेंगे, यह सत्य है। हे स्वामिनी, यदि आप कुछ करना चाहें तो उपाय बता सकती हूँ - राजा तो पूरी तरह आपकी सेवा के वश में हैं।

दोहा

परउँ कूप तुअ बचन पर सकउँ पूत पति त्यागि।कहसि मोर दुखु देखि बड़ कस न करब हित लागि॥२१॥

आपके कहने पर तो मैं कुएँ में भी गिर सकती हूँ, फिर पुत्र और पति को त्यागना कौन बड़ी बात है? मेरा इतना बड़ा दुख देखकर तुम कहती हो, तो अपने हित के लिए मैं यह क्यों न करूँ?

कुबरीं करि कबुली कैकेई। कपट छुरी उर पाहन टेई॥लखइ न रानि निकट दुखु कैंसे। चरइ हरित तिन बलिपसु जैसें॥॥१॥

मंथरा ने कैकेयी को अपने वश में कर लिया और छल की छुरी को हृदय-रूपी पत्थर पर तेज़ किया। रानी को अपने निकट आ रहे दुख का आभास ही नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे बलि का पशु हरी घास चरते हुए अनजान रहता है।

सुनत बात मृदु अंत कठोरी। देति मनहुँ मधु माहुर घोरी॥कहइ चेरि सुधि अहइ कि नाही। स्वामिनि कहिहु कथा मोहि पाहीं॥॥२॥

रानी की बात सुनने में मीठी पर अंत में कठोर लगती है, मानो मधु में विष घोलकर दिया जा रहा हो। दासी बोली - स्वामिनी, याद है या नहीं, वह बात जो आपने मुझसे कही थी?

दुइ बरदान भूप सन थाती। मागहु आजु जुड़ावहु छाती॥सुतहि राजु रामहि बनवासू। देहु लेहु सब सवति हुलासु॥॥३॥

राजा के पास आपकी दो वर वाली अमानत रखी है - आज वही माँगकर अपने हृदय को शांत कीजिए। पुत्र को राज्य और राम को वनवास - यह दोनों माँग लीजिए और सौत का सारा उल्लास मिटा दीजिए।

भूपति राम सपथ जब करई। तब मागेहु जेहिं बचनु न टरई॥होइ अकाजु आजु निसि बीतें। बचनु मोर प्रिय मानेहु जी तें॥॥४॥

जब राजा राम की सौगंध खाकर वचन दें, तभी माँगिएगा, जिससे उनका वचन टल न सके। यदि आज की रात बीत गई तो सारा काम बिगड़ जाएगा - मेरी यह बात हृदय से प्रिय मानिए।

दोहा

बड़ कुघातु करि पातकिनि कहेसि कोपगृहँ जाहु।काजु सँवारेहु सजग सबु सहसा जनि पतिआहु॥२२॥

बड़ा भारी कुघात रचकर उस पापिनी ने कहा - जाओ, कोपभवन में जा बैठो। सजग रहकर सारा काम संवारना, जल्दबाजी में किसी भी बात पर विश्वास मत कर लेना।

कुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी। बार बार बड़ि बुद्धि बखानी॥तोहि सम हित न मोर संसारा। बहे जात कइ भइसि अधारा॥॥१॥

रानी ने मंथरा को अपने प्राणों से भी प्रिय मान लिया और बार-बार उसकी बुद्धिमानी की प्रशंसा की - संसार में तेरे समान मेरा हितैषी कोई नहीं, बहती धारा में तू ही मेरा सहारा बनी है।

जौं बिधि पुरब मनोरथु काली। करौं तोहि चख पूतरि आली॥बहुबिधि चेरिहि आदरु देई। कोपभवन गवनि कैकेई॥॥२॥

यदि कल विधाता मेरा मनोरथ पूर्ण कर दें, तो हे सखी, मैं तुझे अपनी आँख की पुतली के समान बना लूँगी। इस प्रकार दासी को भाँति-भाँति से आदर देकर कैकेयी कोपभवन की ओर चली गईं।

बिपति बीजु बरषा रितु चेरी। भुइँ भइ कुमति कैकेई केरी॥पाइ कपट जलु अंकुर जामा। बर दोउ दल दुख फल परिनामा॥॥३॥

कैकेयी की कुबुद्धि मानो विपत्ति का बीज बन गई, और मंथरा वर्षा ऋतु बनकर उसे सींचने वाली बनी। छल-रूपी जल पाकर वह अंकुरित हो उठा - दोनों वर उसके दो पत्ते बने, और दुख उसका परिणामी फल हुआ।

कोप समाजु साजि सबु सोई। राजु करत निज कुमति बिगोई॥राउर नगर कोलाहलु होई। यह कुचालि कछु जान न कोई॥॥४॥

क्रोध की सारी तैयारी सजाकर वह लेट गई, अपनी ही कुबुद्धि से राजकाज को बिगाड़ते हुए। राजमहल और नगर में उत्सव का कोलाहल होता रहा, पर इस कुचाल की किसी को भनक तक न लगी।

दोहा

प्रमुदित पुर नर नारि सब सजहिं सुमंगलचार।एक प्रबिसहिं एक निर्गमहिं भीर भूप दरबार॥२३॥

नगर के स्त्री-पुरुष सब आनंदित होकर मंगल-सामग्री सजाने में लगे हैं। राजा के दरबार में इतनी भीड़ है कि कोई भीतर जा रहा है तो कोई बाहर निकल रहा है।

बाल सखा सुन हियँ हरषाहीं। मिलि दस पाँच राम पहिं जाहीं॥प्रभु आदरहिं प्रेमु पहिचानी। पूँछहिं कुसल खेम मृदु बानी॥॥१॥

राम के बाल-सखा यह समाचार सुनकर हृदय से हर्षित हो उठे, दस-पाँच मिलकर राम के पास जाने लगे। प्रभु उनके प्रेम को पहचानकर उनका आदर करते हैं और मृदु वाणी में उनका कुशल-क्षेम पूछते हैं।

फिरहिं भवन प्रिय आयसु पाई। करत परसपर राम बड़ाई॥को रघुबीर सरिस संसारा। सीलु सनेह निबाहनिहारा॥॥२॥

प्रिय आज्ञा पाकर वे घर लौटते हैं, और आपस में राम की प्रशंसा करते चलते हैं - संसार में रघुवीर के समान शील और स्नेह निभाने वाला और कौन है?

जेंहि जेंहि जोनि करम बस भ्रमहीं। तहँ तहँ ईसु देउ यह हमहीं॥सेवक हम स्वामी सियनाहू। होउ नात यह ओर निबाहू॥॥३॥

जिस-जिस योनि में हम कर्मवश भटकते रहें, हे ईश्वर, हमें बस यही वरदान दीजिए - हम सेवक बने रहें और सीतानाथ राम हमारे स्वामी रहें, यह संबंध अंत तक ऐसे ही निभता रहे।

अस अभिलाषु नगर सब काहू। कैकयसुता हृदय अति दाहू॥को न कुसंगति पाइ नसाई। रहइ न नीच मतें चतुराई॥॥४॥

नगर में सभी की यही अभिलाषा है, पर कैकेयी के हृदय में तीव्र जलन है। बुरी संगति पाकर कौन नष्ट नहीं होता? नीच की सलाह मान लेने पर बुद्धिमानी भी टिक नहीं पाती।

दोहा

साँस समय सानंद नृपु गयउ कैकेई गेहँ।गवनु निठुरता निकट किय जनु धरि देह सनेहँ॥२४॥

संध्या के समय आनंदित मन से राजा दशरथ कैकेयी के महल गए - उनका यह जाना मानो निष्ठुरता ही स्नेह का रूप धारण करके निकट आ गई हो।

कोपभवन सुनि सकुचेउ राउ। भय बस अगहुड़ परइ न पाऊ॥सुरपति बसइ बाहँबल जाके। नरपति सकल रहहिं रुख ताकें॥॥१॥

कोपभवन की बात सुनते ही राजा सकुचा गए, भयवश उनके पैर आगे बढ़ ही न पाए। जिनके बाहुबल से इंद्र भी सुरक्षित रहते हैं और समस्त राजा जिनकी ओर देखकर चलते हैं,

सो सुनि तिय रिस गयउ सुखाई। देखहु काम प्रताप बड़ाई॥सूल कुलिस असि अँगवनिहारे। ते रतिनाथ सुमन सर मारे॥॥२॥

वही राजा अपनी पत्नी का क्रोध सुनकर भय से सूख गए - देखिए, कामदेव के प्रताप की महिमा! त्रिशूल, वज्र और तलवार धारण करने वाले भी रतिनाथ कामदेव के फूलों के बाणों से घायल हो जाते हैं।

सभय नरेसु प्रिया पहिं गयऊ। देखि दसा दुखु दारुन भयऊ॥भूमि सयन पटु मोट पुराना। दिए डारि तन भूषन नाना॥॥३॥

भयभीत राजा अपनी प्रिया के पास गए - उनकी दशा देखकर राजा को अत्यंत दारुण दुख हुआ। कैकेयी भूमि पर पुराने मोटे वस्त्र बिछाकर लेटी थीं, और अपने सारे आभूषण उतार फेंके थे।

कुमतिहि कसि कुबेषता फाबी। अन अहिवातु सूच जनु भाबी॥जाइ निकट नृपु कह मृदु बानी। प्रानप्रिया केहि हेतु रिसानी॥॥४॥

उस कुबुद्धि कैकेयी पर यह कुरूप वेश खूब फब रहा था, मानो विधाता ने ही उन्हें अनिष्ट का सूचक बना दिया हो। राजा निकट जाकर मृदु वाणी में बोले - हे प्राणप्रिया, तुम किस कारण रुष्ट हो?

छंद

केहि हेतु रानि रिसानि परसत पानि पतिहि नेवारई।मानहुँ सरोष भुअंग भामिनि बिषम भाँति निहारई॥दोउ बासना रसना दसन बर मरम ठाहरु देखई।तुलसी नृपति भवतब्यता बस काम कौतुक लेखई॥

रानी किस कारण इतनी रुष्ट हैं कि राजा जब उनका हाथ छूते हैं तो वे झिड़ककर हटा देती हैं, मानो कोई क्रोधित नागिन उन्हें भयंकर दृष्टि से देख रही हो। उनकी दोनों वरों की लालसा मानो जीभ और दाँत बनकर उनके मर्मस्थल को खोज रही है। तुलसीदास कहते हैं कि होनहार के वश में पड़े राजा इसे कामदेव का कौतुक-भर समझ रहे हैं।

सोरठा

बार बार कह राउ सुमुखि सुलोचिनि पिकबचनि।कारन मोहि सुनाउ गजगामिनि निज कोप कर॥२५॥

राजा बार-बार कहते हैं - हे सुमुखि, सुलोचनि, कोकिल-वाणी वाली, हे गजगामिनी, अपने क्रोध का कारण मुझे बताओ।

अनहित तोर प्रिया केइँ कीन्हा। केहि दुइ सिर केहि जमु चह लीन्हा॥कहु केहि रंकहि करौं नरेसू। कहु केहि नृपहि निकासौं देसू॥॥१॥

हे प्रिये, तुम्हारा अहित किसने किया है? किसके सिर पर विपत्ति आ गई है, किसे यमराज लेने को उतारू हैं? बताओ किस दरिद्र को मैं राजा बना दूँ, बताओ किस राजा को देश-निकाला दे दूँ।

सकउँ तोर अरि अमरउ मारी। काह कीट बपुरे नर नारी॥जानसि मोर सुभाउ बरोरू। मनु तव आनन चंद चकोरू॥॥२॥

तुम्हारे शत्रु को मैं देवता होते हुए भी मार सकता हूँ, फिर बेचारे मनुष्य और स्त्रियाँ तो कीट-पतंगे मात्र हैं। हे सुंदरी, तुम मेरा स्वभाव जानती ही हो - मेरा मन तो तुम्हारे चंद्रमुख पर मंडराता चकोर पक्षी है।

प्रिया प्रान सुत सरबसु मोरें। परिजन प्रजा सकल बस तोरें॥जौं कछु कहौ कपटु करि तोही। भामिनि राम सपथ सत मोही॥॥३॥

हे प्रिये, मेरे प्राण, पुत्र, सर्वस्व, परिजन और समस्त प्रजा - सब तुम्हारे वश में हैं। यदि मैं तुमसे कुछ भी छल करके कहूँ, तो हे भामिनी, मुझे राम की सौगंध है।

बिहसि मागु मनभावति बाता। भूषन सजहि मनोहर गाता॥घरी कुघरी समुझि जियँ देखू। बेगि प्रिया परिहरहि कुबेषू॥॥४॥

हँसकर जो भी मन भाए वह माँग लो, अपने सुंदर शरीर को आभूषणों से सजा लो। शुभ-अशुभ घड़ी का विचार मन में मत करो, हे प्रिये, शीघ्र ही यह कुवेश त्याग दो।

दोहा

यह सुनि मन गुनि सपथ बड़ि बिहसि उठी मतिमंदभूषन सजति बिलोकि मृगु मनहुँ किरातिनि फंद॥२६॥

यह सुनकर और राजा की बड़ी सौगंध को मन में तौलकर वह मतिमंद कैकेयी मुसकराती हुई उठ बैठी। वह आभूषण सजाने लगी, पर राजा को ऐसे ताक रही थी मानो कोई किरातिन अपने जाल में फँसे हिरण को देख रही हो।

पुनि कह राउ सुह्रद जियँ जानी। प्रेम पुलकि मृदु मंजुल बानी॥भामिनि भयउ तोर मनभावा। घर घर नगर अनंद बधावा॥॥१॥

राजा ने उसे फिर हितैषी मानकर, प्रेम से पुलकित होकर मृदु मधुर वाणी में कहा - हे प्रिये, तुम्हारी मनचाही बात हो गई है, नगर के घर-घर में आनंद के बधावे बज रहे हैं।

रामहि देउँ कालि जुबराजू। सजहि सुलोचनि मंगल साजू॥दलकि उठेउ सुनि ह्रदउ कठोरू। जनु छुइ गयउ पाक बरतोरू॥॥२॥

कल राम को युवराज पद दूँगा - हे सुलोचनि, तुम मंगल का श्रृंगार करो। यह सुनते ही उसका कठोर हृदय ऐसे धड़क उठा मानो किसी पके हुए फोड़े को छू दिया गया हो।

ऐसिउ पीर बिहसि तेहि गोई। चोर नारि जिमि प्रगटि न रोई॥लखहिं न भूप कपट चतुराई। कोटि कुटिल मनि गुरू पढ़ाई॥॥३॥

ऐसी पीड़ा को भी उसने हँसकर छिपा लिया, जैसे चोर की स्त्री खुलकर रोती नहीं। राजा उसकी छलभरी चतुराई को पहचान ही न सके - आखिर करोड़ों कुटिलताओं की गुरु मंथरा ने ही उसे यह सब सिखाया था।

जद्यपि नीति निपुन नरनाहू। नारिचरित जलनिधि अवगाहू॥कपट सनेहु बढ़ाइ बहोरी। बोली बिहसि नयन मुहु मोरी॥॥४॥

राजा भले ही नीति में निपुण थे, पर स्त्री का चरित्र तो अथाह समुद्र के समान है। अपने कपट-भरे स्नेह को और बढ़ाकर वह मुसकराई और नेत्र व मुख फेरकर बोली।

दोहा

मागु मागु पै कहहु पिय कबहुँ न देहु न लेहु।देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु॥२७॥

आप तो कहते हैं माँगो-माँगो, पर न कभी देते हैं न लेते हैं। आपने दो वरदान देने को कहा था, अब उन्हीं पर भी संदेह होने लगा है।

जाने मरमु राउ हँसि कहई। तुम्हहि कोहाब परम प्रिय अहई॥थाति राखि न मागिहु काऊ। बिसरि गयउ मोहि भोर सुभाऊ॥॥१॥

राजा उसका मर्म समझकर हँसते हुए बोले - लगता है तुम्हें रूठना ही सबसे प्रिय है! तुमने वे वर अमानत में रखे रहने दिए, कभी माँगे ही नहीं, और मेरे भुलक्कड़ स्वभाव के कारण मुझे भी वे भूल गए थे।

झूठेहुँ हमहि दोषु जनि देहू। दुइ कै चारि मागि मकु लेहू॥रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई॥॥२॥

मुझे झूठा दोष मत दो - दो के बदले चार भी माँग लो। रघुकुल की यह परंपरा सदा से चली आई है - प्राण भले चले जाएँ, पर दिया हुआ वचन कभी नहीं टूटता।

नहिं असत्य सम पातक पुंजा। गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा॥सत्यमूल सब सुकृत सुहाए। बेद पुरान बिदित मनु गाए॥॥३॥

असत्य के समान कोई पाप नहीं, चाहे करोड़ों छोटी-छोटी गुंजाएँ मिलकर पर्वत के समान भी क्यों न बन जाएँ। सारे सुंदर पुण्य-कर्मों की जड़ सत्य ही है - यह बात वेद, पुराण और मनु ने भी विदित की है।

तेहि पर राम सपथ करि आई। सुकृत सनेह अवधि रघुराई॥बात दृढ़ाइ कुमति हँसि बोली। कुमत कुबिहग कुलह जनु खोली॥॥४॥

उस पर मैंने राम की सौगंध भी खा ली है, जो सत्कर्म और स्नेह की चरम सीमा हैं, रघुकुल के शिरोमणि। इस प्रकार वचन को दृढ़ करा लेने पर कुबुद्धि कैकेयी हँसकर बोली, मानो अपने कुत्सित विचार-रूपी पक्षी का पिंजरा खोल रही हो।

दोहा

भूप मनोरथ सुभग बनु सुख सुबिहंग समाजु।भिल्लनि जिमि छाड़न चहति बचनु भयंकरु बाजु॥२८॥

राजा के मनोरथ मानो सुंदर वन में बसे सुखी पक्षियों का समूह थे, और कैकेयी किसी भीलनी के समान अपने भयंकर वचन-रूपी बाज़ को उस पर छोड़ने ही वाली थी।

सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका॥मागउँ दूसर बर कर जोरी। पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी॥॥१॥

सुनिए प्राणप्रिय, मेरे मन को जो भाता है वह कहती हूँ - पहला वर यह दीजिए कि भरत का राजतिलक हो। हाथ जोड़कर मैं दूसरा वर माँगती हूँ - हे नाथ, मेरी यह अभिलाषा भी पूर्ण कीजिए।

तापस बेष बिसेषि उदासी। चौदह बरिस रामु बनबासी॥सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू। ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू॥॥२॥

दूसरा वर - राम तापस वेष धारण करके चौदह वर्ष तक वनवासी बनकर रहें। ये मृदु वचन सुनते ही राजा के हृदय में ऐसा शोक उमड़ा, जैसे चंद्रमा की किरण छूते ही चकवा पक्षी व्याकुल हो उठता है।

गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा। जनु सचान बन झपटेउ लावा॥बिबरन भयउ निपट नरपालू। दामिनि हनेउ मनहुँ तरु तालू॥॥३॥

राजा सहम गए, मुँह से कुछ कहते न बना, मानो वन में किसी बटेर पर बाज़ झपट पड़ा हो। राजा का मुख पूरी तरह विवर्ण हो गया, मानो बिजली ने किसी ताड़ के वृक्ष पर वज्राघात कर दिया हो।

माथे हाथ मूदि दोउ लोचन। तनु धरि सोचु लाग जनु सोचन॥मोर मनोरथु सुरतरु फूला। फरत करिनि जिमि हतेउ समूला॥॥४॥

राजा ने माथे पर हाथ रखकर दोनों आँखें मूँद लीं और ऐसे बैठ गए मानो चिंता ही देह धारण करके बैठी हो। मेरा मनोरथ मानो कल्पवृक्ष के समान फूला था, और फल लगते ही किसी हाथी ने उसे जड़ से उखाड़ दिया।

अवध उजारि कीन्हि कैकेईं। दीन्हसि अचल बिपति कै नेईं॥॥५॥

कैकेयी ने अयोध्या को उजाड़ डाला - उसने विपत्ति की अटल नींव रख दी।

दोहा

कवनें अवसर का भयउ गयउ नारि बिस्वास।जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अबिद्या नास॥२९॥

कैसे अवसर पर क्या हो गया! स्त्री पर किया गया विश्वास कैसे नष्ट हो गया - ठीक वैसे ही जैसे योग-सिद्धि का फल मिलने के समय भी किसी यति का अज्ञान उसे नष्ट कर सकता है।

एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा। देखि कुभाँति कुमति मन माखा॥भरतु कि राउर पूत न होहीं। आनेहु मोल बेसाहि कि मोही॥॥१॥

इस प्रकार राजा मन-ही-मन विलाप करने लगे, और कैकेयी का यह कुभाँति रूप देखकर उनका मन जल उठा - क्या भरत तुम्हारे अपने पुत्र नहीं हैं? या तुमने मुझे बाज़ार से मोल खरीदा है?

जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें। काहे न बोलहु बचनु सँभारे॥देहु उतरु अनु करहु कि नाहीं। सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं॥॥२॥

यदि मेरी यह सौगंध तुम्हें ऐसे बाण-सी चुभी है, तो सोच-समझकर उत्तर क्यों नहीं देतीं? बताओ, यह वर स्वीकार करती हो या नहीं - रघुकुल में तो सभी सत्यप्रतिज्ञ ही होते हैं।

देन कहेहु अब जनि बरु देहू। तजहु सत्य जग अपजसु लेहू॥सत्य सराहि कहेहु बरु देना। जानेहु लेइहि मागि चबेना॥॥३॥

तुमने वर देने को कहा था, अब मत दो - सत्य छोड़ दो और संसार में अपयश ले लो। सत्य की इतनी प्रशंसा करके तुमने वर देने का वचन दिया था - क्या तुमने सोचा था कि यह कोई मामूली चीज़ माँगेगी?

सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा। तनु धनु तजेउ बचन पनु राखा॥अति कटु बचन कहति कैकेई। मानहुँ लोन जरे पर देई॥॥४॥

राजा शिबि, दधीचि मुनि और राजा बलि ने जो भी प्रण किया, उसके लिए शरीर और धन तक त्याग दिया पर वचन नहीं तोड़ा। कैकेयी अत्यंत कटु वचन कह रही है, मानो जले पर नमक छिड़क रही हो।

दोहा

धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे राय।सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायँ॥३०॥

धर्म के धुरंधर राजा दशरथ ने धैर्य धारण करके अपने नेत्र खोले। सिर धुनकर लंबी साँस लेते हुए वे सोचने लगे - इसने मुझे बड़े ही कुसमय पर घायल कर दिया।

आगें दीखि जरत रिस भारी। मनहुँ रोष तरवारि उघारी॥मूठि कुबुद्धि धार निठुराई। धरी कूबरीं सान बनाई॥॥१॥

राजा के सामने वह क्रोध से जलती हुई दिखी, मानो क्रोध की तलवार म्यान से बाहर निकल आई हो - जिसकी मूठ कुबुद्धि और धार निष्ठुरता थी, और जिसे मंथरा ने अपनी सान पर तेज़ किया था।

लखी महीप कराल कठोरा। सत्य कि जीवनु लेइहि मोरा॥बोले राउ कठिन करि छाती। बानी सबिनय तासु सोहाती॥॥२॥

राजा ने उसका भयंकर और कठोर रूप देखा, और सोचा - क्या यह सचमुच मेरे प्राण ही ले लेगी? राजा ने हृदय कठोर करके उसे प्रिय लगने वाली विनम्र वाणी में कहा।

प्रिया बचन कस कहसि कुभाँती। भीर प्रतीति प्रीति करि हाँती॥मोरें भरतु रामु दुइ आँखी। सत्य कहउँ करि संकरू साखी॥॥३॥

हे प्रिये, इस संकट के समय ऐसी अनुचित बातें कहकर विश्वास और प्रेम क्यों नष्ट करती हो? मेरे लिए भरत और राम दोनों आँखों के समान हैं - मैं शिवजी को साक्षी मानकर सत्य कहता हूँ।

अवसि दूतु मैं पठइब प्राता। ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भ्राता॥सुदिन सोधि सबु साजु सजाई। देउँ भरत कहुँ राजु बजाई॥॥४॥

मैं अवश्य ही प्रातःकाल दूत भेजूँगा - सुनते ही दोनों भाई शीघ्र आ जाएँगे। शुभ दिन निकालकर सारी तैयारी सजाकर मैं धूमधाम से भरत को राज्य दे दूँगा।

दोहा

लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति।मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति॥३१॥

राम को राज्य का कोई लोभ नहीं है, और भरत पर भी मेरा उतना ही प्रेम है। बड़े-छोटे का विचार मन में रखकर मैं तो बस राजनीति की मर्यादा निभा रहा था।

राम सपथ सत कहुउँ सुभाऊ। राममातु कछु कहेउ न काऊ॥मैं सबु कीन्ह तोहि बिनु पूँछें। तेहि तें परेउ मनोरथु छूछें॥॥१॥

मैंने अपने स्वाभाविक स्नेहवश राम की सैकड़ों सौगंध खाई है; राम की माता कौशल्या ने तो कभी कुछ नहीं कहा। मैंने तुमसे बिना पूछे यह सब किया, इसी कारण मेरा मनोरथ खाली हाथ रह गया।

रिस परिहरू अब मंगल साजू। कछु दिन गए भरत जुबराजू॥एकहि बात मोहि दुखु लागा। बर दूसर असमंजस मागा॥॥२॥

अब क्रोध छोड़ो, मंगल की तैयारी करो - कुछ दिनों बाद भरत युवराज बन जाएँगे। बस एक बात से मुझे दुख हुआ है - तुमने दूसरा वर माँगकर मुझे असमंजस में डाल दिया है।

अजहुँ हृदय जरत तेहि आँचा। रिस परिहास कि साँचेहुँ साँचा॥कहु तजि रोषु राम अपराधू। सबु कोउ कहइ रामु सुठि साधू॥॥३॥

अभी तक उस बात की आँच से मेरा हृदय जल रहा है - क्या वह क्रोध या परिहास में कही गई थी, या सचमुच सच है? क्रोध छोड़कर बताओ तो, राम का क्या अपराध है - सभी तो कहते हैं कि राम अत्यंत सज्जन हैं।

तुहूँ सराहसि करसि सनेहू। अब सुनि मोहि भयउ संदेहू॥जासु सुभाउ अरिहि अनुकूला। सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला॥॥४॥

तुम भी तो उसकी प्रशंसा करती थीं और उस पर स्नेह रखती थीं - अब यह सुनकर मुझे संदेह हो रहा है। जिसका स्वभाव शत्रु के प्रति भी अनुकूल है, वह भला अपनी माता के प्रतिकूल कैसे हो सकता है?

दोहा

प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु।जेहिं देखाँ अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु॥३२॥

हे प्रिये, यह हास्य ही था न? क्रोध छोड़ो और विवेकपूर्वक कुछ और माँग लो - जिससे मैं अपने नेत्रों से भरपूर भरत का राज्याभिषेक देख सकूँ।

जिऐ मीन बरु बारि बिहीना। मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना॥कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं। जीवनु मोर राम बिनु नाहीं॥॥१॥

मछली भले जल के बिना जी ले, साँप भले मणि के बिना दुखी होकर जी ले - मैं तो अपना सच्चा स्वभाव कह रही हूँ, मन में कोई छल नहीं है: मेरा जीवन राम के बिना नहीं है।

समुझि देखु जियँ प्रिया प्रबीना। जीवनु राम दरस आधीना॥सुनि मृदु बचन कुमति अति जरई। मनहुँ अनल आहुति घृत परई॥॥२॥

हे चतुर प्रिये, मन में सोचकर देखो - क्या सचमुच तुम्हारा जीवन राम के दर्शन पर ही निर्भर है? यह मृदु वचन सुनकर कुबुद्धि कैकेयी और भी जल उठी, मानो अग्नि में घी की आहुति पड़ गई हो।

कहइ करहु किन कोटि उपाया। इहाँ न लागिहि राउरि माया॥देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं। मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं॥॥३॥

वह बोली - चाहे करोड़ों उपाय कर लो, यहाँ तुम्हारी माया नहीं चलेगी। या तो वर दो या इनकार करो और अपयश ले लो - मुझे इतने प्रपंच अच्छे नहीं लगते।

रामु साधु तुम्ह साधु सयाने। राममातु भलि सब पहिचाने॥जस कौसिलाँ मोर भल ताका। तस फलु उन्हहि देउँ करि साका॥॥४॥

राम साधु हैं, तुम भी साधु और सयाने हो, राम की माता भली हैं - यह सब पहचान लिया गया है। जैसा भला कौशल्या ने मेरे लिए सोचा है, वैसा ही फल मैं भी उन्हें अवश्य दूँगी।

दोहा

होत प्रात मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं।मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं॥३३॥

यदि सुबह होते ही राम मुनि का वेश धारण करके वन न चले जाएँ, तो हे राजन, अपने मन में यह समझ लीजिए कि वह मेरी मृत्यु और आपका अपयश होगा।

अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी॥पाप पहार प्रगट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई॥॥१॥

यह कहकर वह कुटिल कैकेयी उठकर खड़ी हो गई, मानो क्रोध की नदी में बाढ़ आ गई हो। वह स्वयं पाप का साक्षात पर्वत बन गई, क्रोध के जल से इतनी भरी कि उसकी ओर देखा भी न जा सके।

दोउ बर कूल कठिन हठ धारा। भवँर कूबरी बचन प्रचारा॥ढाहत भूपरूप तरु मूला। चली बिपति बारिधि अनुकूला॥॥२॥

दोनों वर उसके दो किनारे थे, कठोर हठ उसकी धारा थी, और मंथरा के वचन उसके भँवर थे - राजा-रूपी वृक्ष की जड़ को ढहाती हुई यह विपत्ति-नदी अपने समुद्र की ओर बह चली।

लखी नरेस बात फुरि साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाची॥गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी। जनि दिनकर कुल होसि कुठारी॥॥३॥

राजा ने समझ लिया कि यह बात सचमुच सच है - मानो स्त्री के बहाने मृत्यु ही उनके सिर पर नाच रही हो। उन्होंने उसके पैर पकड़कर विनती की और उसे बिठाया - सूर्यवंश के लिए कुल्हाड़ी मत बनो।

मागु माथ अबहीं देउँ तोही। राम बिरहँ जनि मारसि मोही॥राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती। नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती॥॥४॥

अभी माँग लो, मैं तुम्हें वही दे दूँगा - मुझे राम के वियोग से मत मारो। किसी भी तरह राम को यहीं रख लो, नहीं तो मेरी छाती जीवन भर जलती रहेगी।

दोहा

देखी ब्याधि असाध नृपु परेउ धरनि धुनि माथ।कहत परम आरत बचन राम राम रघुनाथ॥३४॥

अपनी इस असाध्य व्याधि को देखकर राजा भूमि पर गिर पड़े, माथा पीटते हुए अत्यंत व्याकुल वाणी में पुकारने लगे - राम, राम, रघुनाथ।

ब्याकुल राउ सिथिल सब गाता। करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता॥कंठु सूख मुख आव न बानी। जनु पाठीनु दीन बिनु पानी॥॥१॥

व्याकुल राजा का सारा शरीर शिथिल पड़ गया, मानो किसी हाथी ने कल्पवृक्ष को गिरा दिया हो। उनका कंठ सूख गया, मुख से वाणी न निकली, मानो जल के बिना कोई दीन मछली तड़प रही हो।

पुनि कह कटु कठोर कैकेई। मनहुँ घाय महुँ माहुर देई॥जौं अंतहुँ अस करतबु रहेऊ। मागु मागु तुम्ह केहिं बल कहेऊ॥॥२॥

कैकेयी फिर कठोर और कटु वचन बोली, मानो घाव में विष उँडेल रही हो - यदि आखिर में यही करना था, तो तुमने माँगो-माँगो क्यों कहा, किस बल पर कहा?

दुइ कि होइ एक समय भुआला। हँसब ठठाइ फुलाउब गाला॥दानि कहाउब अरु कृपनाई। होइ कि खेम कुसल रौताई॥॥३॥

हे राजन, क्या ये दोनों बातें एक साथ हो सकती हैं - खुलकर हँसना और साथ ही गाल फुलाना? दानी कहलाना और साथ ही कंजूसी करना - क्या इस तरह कुशल-क्षेम और राजपाट दोनों निभ सकते हैं?

छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू। जनि अबला जिमि करुना करहू॥तनु तिय तनय धामु धनु धरनी। सत्यसंध कहुँ तृन सम बरनी॥॥४॥

या तो वचन तोड़ दो या धैर्य धारण करो - अबला स्त्री की भाँति विलाप मत करो। सत्यप्रतिज्ञ पुरुष के लिए तो शरीर, स्त्री, पुत्र, घर, धन और पृथ्वी सब तिनके के समान बताए गए हैं।

दोहा

मरम बचन सुनि राउ कह कहु कछु दोषु न तोर।लागेउ तोहि पिसाच जिमि कालु कहावत मोर॥३५॥

यह मर्मभेदी वचन सुनकर राजा बोले - अब कुछ मत कहो, इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं। लगता है तुम पर कोई पिशाच सवार हो गया है, जो स्वयं को मेरा काल बताता है।

चहत न भरत भूपतहि भोरें। बिधि बस कुमति बसी जिय तोरें॥सो सबु मोर पाप परिनामू। भयउ कुठाहर जेहिं बिधि बामू॥॥१॥

भरत तो भूलकर भी राजा का यह अहित नहीं चाहेंगे, यह तो विधि के वश तुम्हारे मन में कुबुद्धि बस गई है। यह सब तो मेरे ही पापों का परिणाम है, जिसके कारण विधाता इतने कुसमय पर प्रतिकूल हो गए।

सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई। सब गुन धाम राम प्रभुताई॥करिहहिं भाइ सकल सेवकाई। होइहि तिहुँ पुर राम बड़ाई॥॥२॥

सुंदर अयोध्या फिर से सुखपूर्वक बस जाएगी, राम की प्रभुता में जो सद्गुणों का धाम है। सभी भाई उनकी सेवा करेंगे, और तीनों लोकों में राम की महिमा फैलेगी।

तोर कलंकु मोर पछिताऊ। मुएहुँ न मिटिहि न जाइहि काऊ॥अब तोहि नीक लाग करु सोई। लोचन ओट बैठ मुहु गोई॥॥३॥

तुम्हारा कलंक और मेरा पछतावा - मरने पर भी न मिटेगा, कभी नहीं जाएगा। अब जो तुम्हें उचित लगे वही करो, मैं तो आँखों की ओट में मुख छिपाकर बैठा रहूँगा।

जब लगि जिऔं कहउँ कर जोरी। तब लगि जनि कछु कहसि बहोरी॥फिरि पछितैहसि अंत अभागी। मारसि गाइ नहारु लागी॥॥४॥

जब तक मैं जीवित हूँ, हाथ जोड़कर कहता हूँ, आगे और कुछ मत कहना। अंत में तुम्हें पछताना पड़ेगा, हे अभागिन - यह तो गाय को केवल उसकी नस के लिए मार डालने जैसा होगा।

दोहा

परेउ राउ कहि कोटि बिधि काहे करसि निदानु।कपट सयानि न कहति कछु जागति मनहुँ मसानु॥३६॥

राजा गिर पड़े और अनेक प्रकार से कहते रहे - आखिर तुम यह इतना बड़ा कदम क्यों उठा रही हो? पर वह चतुर छलिनी कुछ न बोली, मानो श्मशान में जागती हुई कोई भयंकर आत्मा बैठी हो।

राम राम रट बिकल भुआलू। जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू॥हृदयँ मनाव भोरु जनि होई। रामहि जाइ कहै जनि कोई॥॥१॥

व्याकुल राजा 'राम-राम' रटते रहे, मानो पंख कटा कोई असहाय पक्षी हों। हृदय में वे यही मनाते रहे कि सुबह न हो, और कोई भी जाकर राम को यह बात न बताए।

उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर। अवध बिलोकि सूल होइहि उर॥भूप प्रीति कैकइ कठिनाई। उभय अवधि बिधि रची बनाई॥॥२॥

हे सूर्यदेव, रघुकुल के आराध्य, आज उदय मत होना - अयोध्या की यह दशा देखकर हृदय में शूल उठेगा। राजा का प्रेम और कैकेयी की कठोरता - विधाता ने दोनों को ही चरम सीमा तक रच डाला है।

बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा। बीना बेनु संख धुनि द्वारा॥पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक। सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक॥॥३॥

राजा के विलाप करते-करते ही सुबह हो गई, द्वार पर वीणा, बाँसुरी और शंख की ध्वनि गूँजने लगी। भाट गुणगान पढ़ने लगे, गायक गीत गाने लगे - पर यह सब सुनकर राजा को मानो बाण चुभ रहे हों।

मंगल सकल सोहाहिं न कैसें। सहगामिनिहि बिभूषन जैसें॥तेहिं निसि नीद परी नहिं काहू। राम दरस लालसा उछाहू॥॥४॥

सब मंगल-सामग्री राजा को कुछ ऐसी लगी जैसे सती होने जा रही स्त्री पर आभूषण सुहाते नहीं। उस रात किसी को भी नींद नहीं आई - सबके मन में राम-दर्शन की उत्सुकता और उल्लास भरा था।

दोहा

द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि।जागेउ अजहुँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि॥३७॥

द्वार पर सेवकों और मंत्रियों की भीड़ जमा है, सूर्य को उदित देखकर वे कहते हैं - अभी तक अयोध्यापति जागे नहीं हैं, आखिर इसका क्या विशेष कारण होगा?

पछिले पहर भूपु नित जागा। आजु हमहि बड़ अचरजु लागा॥जाहु सुमंत्र जगावहु जाई। कीजिअ काजु रजायसु पाई॥॥१॥

राजा तो सदा रात के अंतिम पहर में ही जाग जाते हैं - आज हमें बड़ा आश्चर्य हो रहा है। हे सुमंत्र, तुम जाओ और उन्हें जगाओ - उनकी आज्ञा पाकर ही आगे का कार्य किया जाए।

गए सुमंत्रु तब राउर माही। देखि भयावन जात डेराहीं॥धाइ खाइ जनु जाइ न हेरा। मानहुँ बिपति बिषाद बसेरा॥॥२॥

तब सुमंत्र राजमहल के भीतर गए - वहाँ का भयावह दृश्य देखकर उन्हें जाते हुए भी डर लगने लगा। मानो कोई झपटकर निगल लेगा, वे ठीक से देख भी नहीं पा रहे थे - मानो वहाँ विपत्ति और विषाद ने ही अपना डेरा डाल दिया हो।

पूछें कोउ न ऊतरु देई। गए जेहिं भवन भूप कैकैई॥कहि जयजीव बैठ सिरु नाई। देखि भूप गति गयउ सुखाई॥॥३॥

पूछने पर भी किसी ने उत्तर न दिया; वे उसी महल में गए जहाँ राजा कैकेयी के साथ थे। 'जय हो' कहकर सिर झुकाकर वे बैठ गए - पर राजा की यह दशा देखकर वे भी भय से सूख गए।

सोच बिकल बिबरन महि परेऊ। मानहुँ कमल मूलु परिहरेऊ॥सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछी। बोली असुभ भरी सुभ छूछी॥॥४॥

राजा चिंता से व्याकुल, विवर्ण मुख लिए भूमि पर पड़े थे, मानो कमल अपनी जड़ से उखड़ गया हो। भयभीत मंत्री कुछ पूछ भी न सके - तभी कैकेयी बोल पड़ी, वाणी अशुभ से भरी और शुभता से रहित।

दोहा

परी न राजहि नीद निसि हेतु जान जगदीसु।रामु रामु रटि भोरु किय कहइ न मरमु महीसु॥३८॥

राजा को उस रात नींद नहीं आई - इसका कारण तो बस भगवान ही जानते हैं। 'राम-राम' रटते हुए ही उन्होंने रात बिता दी, पर राजा ने किसी से भी अपने मन का भेद नहीं खोला।

आनहु रामहि बेगि बोलाई। समाचार तब पूँछेहु आई॥चलेउ सुमंत्र राय रुख जानी। लखी कुचालि कीन्हि कछु रानी॥॥१॥

कैकेयी बोली - जाओ, शीघ्र राम को बुलाकर लाओ, फिर लौटकर समाचार पूछना। सुमंत्र राजा का रुख भाँपकर चल पड़े, उन्हें आभास हो गया कि रानी ने कोई कुचाल की है।

सोच बिकल मग परइ न पाऊ। रामहि बोलि कहिहि का राऊ॥उर धरि धीरजु गयउ दुआरें। पूछँहिं सकल देखि मनु मारें॥॥२॥

चिंता से व्याकुल सुमंत्र के पैर मार्ग में उठ ही न रहे थे - राम को बुलाकर राजा क्या कहेंगे? हृदय में धैर्य धारण करके वे द्वार पर पहुँचे - सबने उनका उदास मन देखकर उनसे पूछा।

समाधानु करि सो सबही का। गयउ जहाँ दिनकर कुल टीका॥राम सुमंत्रहि आवत देखा। आदरु कीन्ह पिता सम लेखा॥॥३॥

सबकी जिज्ञासा को शांत करके वे वहाँ पहुँचे जहाँ सूर्यवंश-शिरोमणि राम विराजमान थे। राम ने सुमंत्र को आते देखकर उनका आदर किया, उन्हें पिता के समान मानते हुए।

निरखि बदनु कहि भूप रजाई। रघुकुलदीपहि चलेउ लेवाई॥रामु कुभाँति सचिव सँग जाहीं। देखि लोग जहँ तहँ बिलखाहीं॥॥४॥

सुमंत्र ने उनका मुख देखकर राजा की आज्ञा सुनाई, और रघुकुल के दीपक राम को साथ लेकर चल पड़े। राम मंत्री के साथ कुछ असामान्य ढंग से जाते हुए दिखे, यह देखकर जहाँ-तहाँ लोग व्याकुल हो उठे।

दोहा

जाइ दीख रघुबंसमनि नरपति निपट कुसाजु।सहमि परेउ लखि सिंघिनिहि मनहुँ बृद्ध गजराजु॥३९॥

वहाँ जाकर रघुकुलमणि राम ने राजा की अत्यंत दयनीय दशा देखी - वे ऐसे सहम गए मानो कोई वृद्ध गजराज सिंहिनी को देखकर चौंक उठा हो।

सूखहिं अधर जरइ सबु अंगू। मनहुँ दीन मनिहीन भुअंगू॥सरुष समीप दीखि कैकेई। मानहुँ मीचु घरी गनि लेई॥॥१॥

राजा के होंठ सूख रहे थे, सारा शरीर जल रहा था, मानो मणिहीन दीन सर्प हो। पास ही क्रोध से भरी कैकेयी खड़ी दिखीं, मानो मृत्यु ही घड़ियाँ गिन रही हो।

करुनामय मृदु राम सुभाऊ। प्रथम दीख दुखु सुना न काऊ॥तदपि धीर धरि समउ बिचारी। पूँछी मधुर बचन महतारी॥॥२॥

राम का स्वभाव तो करुणामय और कोमल है; ऐसा दुख उन्होंने पहले कभी न देखा न सुना था। फिर भी धैर्य धारण करके, समय का विचार करते हुए उन्होंने माता से मधुर वचनों में पूछा।

मोहि कहु मातु तात दुख कारन। करिअ जतन जेहिं होइ निवारन॥॥३॥

हे माता, मुझे पिताजी के दुख का कारण बताइए, जिससे इसे दूर करने का कोई उपाय किया जा सके।

देन कहेन्हि मोहि दुइ बरदाना। मागेउँ जो कछु मोहि सोहाना॥सो सुनि भयउ भूप उर सोचू। छाड़ि न सकहिं तुम्हार सँकोचू॥॥४॥

मुझे राजा ने दो वरदान देने को कहा था, मैंने जो कुछ मुझे उचित लगा वह माँग लिया। यह सुनकर राजा के हृदय में चिंता हो गई है - वे तुम्हारे प्रति संकोच नहीं छोड़ पा रहे।

दोहा

सुत सनेह इत बचनु उत संकट परेउ नरेसु।सकहु न आयसु धरहु सिर मेटहु कठिन कलेसु॥४०॥

एक ओर पुत्र-स्नेह है और दूसरी ओर अपना वचन - राजा इसी संकट में फँस गए हैं। यदि तुमसे हो सके तो आज्ञा शिरोधार्य करके इस कठिन क्लेश को मिटा दो।

निधरक बैठि कहइ कटु बानी। सुनत कठिनता अति अकुलानी॥जीभ कमान बचन सर नाना। मनहुँ महिप मृदु लच्छ समाना॥॥१॥

निधड़क बैठी कैकेयी कटु वाणी बोल रही थी - उसे सुनकर कठोरता भी व्याकुल हो उठे। उसकी जीभ मानो धनुष थी और वचन अनेक बाण, मानो कोमल राजा ही उनका सुलभ लक्ष्य बने हों।

जनु कठोरपनु धरें सरीरू। सिखइ धनुषबिद्या बर बीरू॥सब प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई। बैठि मनहुँ तनु धरि निठुराई॥॥२॥

मानो कठोरता ही देह धारण करके किसी वीर योद्धा को धनुर्विद्या सिखा रही हो। उसने राम को सारा प्रसंग सुना दिया, ऐसे बैठी मानो निष्ठुरता ही शरीर धारण करके बैठी हो।

मन मुसकाइ भानुकुल भानु। रामु सहज आनंद निधानू॥बोले बचन बिगत सब दूषन। मृदु मंजुल जनु बाग बिभूषन॥॥३॥

मन-ही-मन मुसकराकर सूर्यकुल के सूर्य, सहज आनंद के भंडार राम, सभी दोषों से रहित मृदु और मनोहर वचन बोले, मानो वाणी के आभूषण हों।

सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी॥तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुर्लभ जननि सकल संसारा॥॥४॥

सुनिए माता, वही पुत्र सौभाग्यशाली है जो माता-पिता के वचन का अनुरागी हो। हे माता, माता-पिता दोनों को संतुष्ट करने वाला पुत्र इस समस्त संसार में दुर्लभ है।

दोहा

मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर।तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर॥४१॥

मुनियों का सत्संग और विशेषकर वन-निवास - दोनों ही हर प्रकार से मेरे हित में हैं। उस पर पिता की आज्ञा और फिर हे माता, आपका साथ भी मिल रहा है।

भरत प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजु॥जौं न जाउँ बन ऐसेहु काजा। प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा॥॥१॥

मेरे प्राणप्रिय भरत को राज्य मिल रहा है - आज तो विधाता हर प्रकार से मेरे अनुकूल हैं। यदि इतने अच्छे कारण के लिए भी मैं वन न जाऊँ, तो मुझे सबसे पहले मूर्खों में गिना जाना चाहिए।

सेवहिं अरँडु कलपतरु त्यागी। परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी॥तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं। देखु बिचारि मातु मन माहीं॥॥२॥

जो लोग कल्पवृक्ष त्यागकर अरंड के पौधे की सेवा करते हैं, या अमृत छोड़कर विष माँग लेते हैं - वे भी ऐसा सुअवसर पाकर चूकते नहीं। हे माता, अपने मन में इसे भलीभाँति विचार कर देखिए।

अंब एक दुखु मोहि बिसेषी। निपट बिकल नरनायकु देखी॥थोरिहिं बात पितहि दुख भारी। होति प्रतीति न मोहि महतारी॥॥३॥

हे माता, मुझे केवल एक ही दुख विशेष है - राजा को इतना अत्यंत व्याकुल देखकर। इतनी छोटी-सी बात पर पिताजी को इतना भारी दुख हो, इस पर मुझे विश्वास नहीं होता, हे माता।

राउ धीर गुन उदधि अगाधू। भा मोहि ते कछु बड़ अपराधू॥जातें मोहि न कहत कछु राऊ। मोरि सपथ तोहि कहु सतिभाऊ॥॥४॥

राजा तो धैर्यवान और गुणों के अथाह सागर हैं - जरूर मुझसे ही कोई बड़ा अपराध हो गया है। इसीलिए राजा मुझसे स्वयं कुछ नहीं कह रहे - मेरी सौगंध है, हे माता, आप सच-सच बता दीजिए।

दोहा

सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान।चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान॥४२॥

राघव के सहज-सरल वचनों को कुटिल बुद्धि कैकेयी ने टेढ़ा ही समझा - ठीक वैसे ही जैसे जोंक साधारण जल में भी टेढ़ी चाल से चलती है।

रहसी रानि राम रुख पाई। बोली कपट सनेहु जनाई॥सपथ तुम्हार भरत के आना। हेतु न दूसर मै कछु जाना॥॥१॥

राम का यह रुख पाकर रानी प्रसन्न हो गई, और कपट भरा स्नेह दिखाकर बोली - तुम्हारी और भरत की सौगंध, मैं इसका कोई और कारण नहीं जानती।

दोहा

तुम्ह अपराध जोगु नहिं ताता। जननी जनक बंधु सुखदाता॥।राम सत्य सब जो कछु कहहू। तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू॥॥२॥

हे पुत्र, तुम अपराध के योग्य कभी हो ही नहीं सकते - तुम तो माता, पिता और भाइयों को सुख देने वाले हो। हे राम, तुमने जो कुछ कहा वह सर्वथा सत्य है - तुम सचमुच माता-पिता के वचन में रत रहते हो।

पितहि बुझाइ कहहु बलि सोई। चौथेंपन जेहिं अजसु न होई॥तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे। उचित न तासु निरादरु कीन्हे॥॥३॥

जाकर पिता को समझाकर वही कहो, जिससे वृद्धावस्था में उन्हें अपयश न हो। जिसे तुम्हारे समान पुत्र का पुण्य-फल मिला है, उसका अनादर करना उचित नहीं है।

लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे। मगहँ गयादिक तीरथ जैसे॥रामहि मातु बचन सब भाए। जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए॥॥४॥

दुष्ट मुख से निकले शुभ वचन भी वैसे ही शोभा पाते हैं जैसे मगध में गया आदि तीर्थ। कैकेयी माता के सभी वचन राम को भा गए, ठीक वैसे ही जैसे गंगा में मिल जाने पर कोई भी जल पवित्र और सुंदर हो जाता है।

दोहा

गइ मुरुछा रामहि सुमिरि नृप फिरि करवट लीन्ह।सचिव राम आगमन कहि बिनय समय सम कीन्ह।॥४३॥

राम का स्मरण करते ही राजा की मूर्च्छा टूट गई और उन्होंने करवट बदली। मंत्री सुमंत्र ने राम के आगमन की सूचना देकर समयानुकूल विनम्र वचन कहे।

अवनिप अकनि रामु पगु धारे। धरि धीरजु तब नयन उघारे॥सचिव सँभारि राउ बैठारे। चरन परत नृप रामु निहारे॥॥१॥

राम के पधारने की बात सुनकर राजा ने धैर्य धारण करके अपने नेत्र खोले। मंत्री ने सहारा देकर राजा को बिठाया; राम को चरणों में गिरते देख राजा उन्हें एकटक निहारने लगे।

लिए सनेह बिकल उर लाई। गै मनि मनहुँ फनिक फिरि पाई॥रामहि चितइ रहेउ नरनाहू। चला बिलोचन बारि प्रबाहू॥॥२॥

स्नेह से विह्वल होकर राजा ने राम को हृदय से लगा लिया, मानो किसी सर्प को उसकी खोई हुई मणि फिर मिल गई हो। राजा राम को अपलक निहारते रहे, और उनकी आँखों से अश्रुधारा बह चली।

सोक बिबस कछु कहै न पारा। हृदयँ लगावत बारहिं बारा॥बिधिहि मनाव राउ मन माहीं। जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं॥॥३॥

शोक से विवश राजा कुछ कह ही न पाए, बस बार-बार राम को हृदय से लगाते रहे। मन-ही-मन राजा विधाता को मनाने लगे कि किसी तरह रघुनाथ को वन न जाना पड़े।

सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी। बिनती सुनहु सदासिव मोरी॥आसुतोष तुम्ह अवढर दानी। आरति हरहु दीन जनु जानी॥॥४॥

शिवजी का स्मरण करके राजा विनती करते हैं - हे सदाशिव, मेरी यह प्रार्थना सुनिए। आप आशुतोष हैं, असीम दानी हैं - मुझे अपना दीन सेवक जानकर मेरी पीड़ा हर लीजिए।

दोहा

तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ सो मति रामहि देहु।बचनु मोर तजि रहहिं घर परिहरि सीलु सनेहु॥४४॥

आप ही सबके हृदय के प्रेरक हैं - राम को भी वही बुद्धि दीजिए कि वे मेरा वचन त्यागकर, अपने शील और स्नेह को परे रखकर, घर पर ही रुक जाएँ।

अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ। नरक परौ बरु सुरपुरु जाऊ॥सब दुख दुसह सहावहु मोही। लोचन ओट रामु जनि होंही॥॥१॥

संसार में मेरा अपयश हो जाए, मेरा सुयश नष्ट हो जाए; मैं भले स्वर्ग के बजाय नरक में गिर जाऊँ - मुझे चाहे जितने असह्य दुख भोगने पड़ें, पर राम कभी मेरी आँखों से ओझल न हों।

अस मन गुनइ राउ नहिं बोला। पीपर पात सरिस मनु डोला॥रघुपति पितहि प्रेमबस जानी। पुनि कछु कहिहि मातु अनुमानी॥॥२॥

राजा मन-ही-मन ऐसा सोचते रहे पर मुँह से कुछ न बोले; उनका मन पीपल के पत्ते-सा काँपने लगा। रघुनाथ ने पिता को प्रेमवश समझकर, माता का भाव अनुमान लगाकर फिर कुछ कहना शुरू किया।

देस काल अवसर अनुसारी। बोले बचन बिनीत बिचारी॥तात कहउँ कछु करउँ ढिठाई। अनुचितु छमब जानि लरिकाई॥॥३॥

देश-काल और अवसर के अनुसार राम ने विनम्र, विचारपूर्ण वचन कहे - हे तात, मुझे कुछ कहने की धृष्टता करने दीजिए, अनुचित लगे तो बालसुलभ जानकर क्षमा कीजिएगा।

अति लघु बात लागि दुखु पावा। काहुँ न मोहि कहि प्रथम जनावा॥देखि गोसाइँहि पूँछिउँ माता। सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता॥॥४॥

इतनी छोटी-सी बात के लिए आपने इतना दुख उठाया, मुझे पहले किसी ने बताया ही नहीं। आपकी यह दशा देखकर मैंने माता से पूछा, और सारा प्रसंग सुनकर तो मेरे शरीर को शांति मिल गई है।

दोहा

मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात।आयसु देइअ हरषि हियँ कहि पुलके प्रभु गात॥४५॥

हे तात, इस मंगल अवसर पर केवल स्नेहवश यह चिंता त्याग दीजिए। हर्षित हृदय से मुझे आज्ञा दीजिए - यह कहते हुए प्रभु का शरीर पुलकित हो उठा।

धन्य जनमु जगतीतल तासू। पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू॥चारि पदारथ करतल ताकें। प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें॥॥१॥

धन्य है उसका जन्म इस पृथ्वी पर, जिसका आचरण सुनकर पिता को आनंद मिले। जिसके लिए माता-पिता प्राणों के समान प्रिय हों, उसकी हथेली में तो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष - चारों फल स्वयं आ जाते हैं।

आयसु पालि जनम फलु पाई। ऐहउँ बेगिहिं होउ रजाई॥बिदा मातु सन आवउँ मागी। चलिहउँ बनहि बहुरि पग लागी॥॥२॥

आपकी आज्ञा का पालन करके जन्म का फल पाकर मैं शीघ्र ही लौट आऊँगा, बस आपकी आज्ञा चाहिए। मैं माता से विदा माँग आता हूँ, फिर उनके चरण छूकर वन को चल पड़ूँगा।

अस कहि राम गवनु तब कीन्हा। भूप सोक बस उतरु न दीन्हा॥नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी। छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी॥॥३॥

यह कहकर राम वहाँ से चल पड़े; राजा शोक से इतने विवश थे कि कोई उत्तर न दे सके। यह तीखी बात सारे नगर में फैल गई, मानो छूते ही किसी बिच्छू ने हर शरीर को डंक मार दिया हो।

सुनि भए बिकल सकल नर नारी। बेलि बिटप जिमि देखि दवारी॥जो जहँ सुनइ धुनइ सिरु सोई। बड़ बिषादु नहिं धीरजु होई॥॥४॥

यह सुनते ही नगर के सभी स्त्री-पुरुष व्याकुल हो उठे, जैसे दावानल देखकर लता और वृक्ष मुरझा जाते हैं। जहाँ भी किसी ने यह सुना, वहीं सिर धुनने लगा - इतना गहरा विषाद कि किसी को धैर्य ही न रहा।

दोहा

मुख सुखाहिं लोचन स्त्रवहिं सोकु न हृदयँ समाइ।मनहुँ करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ।॥४६॥

सबके मुख सूख गए, नेत्रों से आँसू बहने लगे, हृदय में शोक समाता न था - मानो करुण रस की सेना ही धावा बोलकर अयोध्या पर उतर आई हो।

मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी। जहँ तहँ देहिं कैकेइहि गारी॥एहि पापिनिहि बूझि का परेऊ। छाइ भवन पर पावकु धरेऊ॥॥१॥

सब कुछ ठीक चलते-चलते विधाता ने यह बात बिगाड़ दी - जहाँ-तहाँ लोग कैकेयी को कोसने लगे। इस पापिन को न जाने क्या सूझा कि उसने अपने ही छाए हुए घर पर आग लगा दी।

निज कर नयन काढ़ि चह दीखा। डारि सुधा बिषु चाहत चीखा॥कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी। भइ रघुबंस बेनु बन आगी॥॥२॥

वह मानो अपने ही हाथ से अपनी आँखें निकालकर भी देखना चाहती हो, अमृत फेंककर विष चखना चाहती हो। यह कुटिल, कठोर, कुबुद्धि अभागिन तो रघुकुल-रूपी बाँस के वन के लिए साक्षात आग बन गई है।

पालव बैठि पेड़ु एहिं काटा। सुख महुँ सोक ठाटु धरि ठाटा॥सदा रामु एहि प्रान समाना। कारन कवन कुटिलपनु ठाना॥॥३॥

जैसे कोई डाल पर बैठकर उसी वृक्ष को काट डाले, वैसे ही सुख के बीच उसने शोक का साम्राज्य खड़ा कर दिया। राम तो सदा इसे अपने प्राणों के समान प्रिय थे - न जाने किस कारण इसने यह कुटिलता ठान ली।

सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ। सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ॥निज प्रतिबिंबु बरुकु गहि जाई। जानि न जाइ नारि गति भाई॥॥४॥

कवियों ने स्त्री-स्वभाव के विषय में सच ही कहा है - वह हर प्रकार से अगम्य और अथाह रहस्य है। अपनी परछाईं को तो शायद कोई पकड़ भी ले, पर हे भाई, स्त्री की गति समझी नहीं जा सकती।

दोहा

काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ।का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ।॥४७॥

अग्नि क्या नहीं जला सकती? समुद्र में क्या नहीं समा सकता? कोई प्रबल स्त्री क्या नहीं कर सकती? इस संसार में मृत्यु किसे नहीं निगल जाती?

का सुनाइ बिधि काह सुनावा। का देखाइ चह काह देखावा॥एक कहहिं भल भूप न कीन्हा। बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा॥॥१॥

विधाता क्या सुनाना चाहता था और क्या सुना दिया! क्या दिखाना चाहता था और क्या दिखा रहा है! कोई कहते हैं कि राजा ने अच्छा नहीं किया - बिना सोचे-विचारे उस कुबुद्धि को वरदान दे दिया।

जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु। अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु॥एक धरम परमिति पहिचाने। नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने॥॥२॥

जो हठपूर्वक समस्त दुखों का भाजन बन गए, मानो एक अबला के वश होकर उनका ज्ञान और गुण ही खो गया हो। पर कुछ लोग धर्म की सही मर्यादा पहचानते हैं, और वे बुद्धिमान राजा को दोष नहीं देते।

सिबि दधीचि हरिचंद कहानी। एक एक सन कहहिं बखानी॥एक भरत कर संमत कहहीं। एक उदास भायँ सुनि रहहीं॥॥३॥

कोई एक-दूसरे को राजा शिबि, दधीचि और हरिश्चंद्र की कथाएँ सुनाने लगे। कोई कहते हैं यह भरत की सहमति से ही हुआ होगा, तो कोई उदासीन भाव से बस सुनते रह जाते हैं।

कान मूदि कर रद गहि जीहा। एक कहहिं यह बात अलीहा॥सुकृत जाहिं अस कहत तुम्हारे। रामु भरत कहुँ प्रानपिआरे॥॥४॥

कान बंद करके, दाँतों तले जीभ दबाकर कुछ लोग कहते हैं - यह बात तो झूठी लगती है। ऐसा कहने से तुम्हारे पुण्य ही नष्ट होंगे - राम तो भरत को प्राणों के समान प्रिय हैं।

दोहा

चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल।सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल॥४८॥

चंद्रमा भले अग्नि की चिंगारियाँ बरसाने लगे, अमृत भले विष का ढेर बन जाए - फिर भी भरत और राम स्वप्न में भी कभी एक-दूसरे के प्रतिकूल कुछ नहीं करेंगे।

एक बिधातहिं दूषनु देंहीं। सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं॥खरभरु नगर सोचु सब काहू। दुसह दाहु उर मिटा उछाहू॥॥१॥

कोई विधाता को ही दोष देते हैं, जिन्होंने अमृत दिखाकर विष दे दिया। नगर में हलचल मच गई, सबको चिंता सताने लगी - सबके हृदय का उल्लास मिटकर असह्य जलन में बदल गया।

बिप्रबधू कुलमान्य जठेरी। जे प्रिय परम कैकेई केरी॥लगीं देन सिख सीलु सराही। बचन बानसम लागहिं ताही॥॥२॥

कुल की सम्मानित ब्राह्मण स्त्रियाँ और वृद्धजन, जो कैकेयी को अत्यंत प्रिय थे, उसे शील की प्रशंसा करते हुए सीख देने लगे - पर उनके वचन कैकेयी को बाणों के समान चुभने लगे।

भरतु न मोहि प्रिय राम समाना। सदा कहहु यहु सबु जगु जाना॥करहु राम पर सहज सनेहू। केहिं अपराध आजु बनु देहू॥॥३॥

तुम तो सदा कहती थीं कि भरत मुझे राम जितना प्रिय नहीं है - यह बात सारा जगत जानता है। राम पर तुम्हारा सहज स्नेह रहा है - फिर आज किस अपराध पर उन्हें वनवास दे रही हो?

कबहुँ न कियहु सवति आरेसू। प्रीति प्रतीति जान सबु देसू॥कौसल्याँ अब काह बिगारा। तुम्ह जेहि लागि बज्र पुर पारा॥॥४॥

तुमने कभी सौत के प्रति ईर्ष्या नहीं दिखाई - तुम्हारी प्रीति और विश्वास सारा देश जानता है। अब कौशल्या ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है, जिसके लिए तुमने मानो वज्र ही गिरा दिया?

दोहा

सीय कि पिय सँगु परिहरिहि लखनु कि रहिहहिं धाम।राजु कि भूँजब भरत पुर नृपु कि जिइहि बिनु राम॥४९॥

क्या सीता कभी अपने प्रियतम का साथ छोड़ेंगी? क्या लक्ष्मण कभी घर पर रुक जाएँगे? क्या भरत कभी नगर में राज्य भोगेंगे? और क्या राजा राम के बिना जीवित रह पाएँगे?

अस बिचारि उर छाड़हु कोहू। सोक कलंक कोठि जनि होहू॥भरतहि अवसि देहु जुबराजू। कानन काह राम कर काजू॥॥१॥

ऐसा विचार करके हृदय से क्रोध त्याग दो, शोक और कलंक की पिटारी मत बनो। भरत को अवश्य युवराज पद दो, पर वन से राम का क्या प्रयोजन?

नाहिन रामु राज के भूखे। धरम धुरीन बिषय रस रूखे॥गुर गृह बसहुँ रामु तजि गेहू। नृप सन अस बरु दूसर लेहू॥॥२॥

राम को राज्य की कोई भूख नहीं है, वे तो धर्म के धुरंधर और विषय-भोग से विरक्त हैं। राम घर छोड़कर गुरु के घर ही रह जाएँ - राजा से यही दूसरा वर माँग लो।

जौं नहिं लगिहहु कहें हमारे। नहिं लागिहि कछु हाथ तुम्हारे॥जौं परिहास कीन्हि कछु होई। तौ कहि प्रगट जनावहु सोई॥॥३॥

यदि तुम हमारी बात नहीं मानोगी, तो तुम्हारे हाथ कुछ भी नहीं आने वाला। यदि यह सब हँसी-मज़ाक में कहा गया था, तो खुलकर कह दो और सबको बता दो।

राम सरिस सुत कानन जोगू। काह कहिहि सुनि तुम्ह कहुँ लोगू॥उठहु बेगि सोइ करहु उपाई। जेहि बिधि सोकु कलंकु नसाई॥॥४॥

क्या राम जैसा पुत्र वन जाने योग्य है? यह सुनकर लोग तुम्हारे विषय में क्या कहेंगे? शीघ्र उठो और वही उपाय करो जिससे यह शोक और कलंक मिट जाए।

छंद

जेहि भाँति सोकु कलंकु जाइ उपाय करि कुल पालही।हठि फेरु रामहि जात बन जनि बात दूसरि चालही॥जिमि भानु बिनु दिनु प्रान बिनु तनु चंद बिनु जिमि जामिनी।तिमि अवध तुलसीदास प्रभु बिनु समुझि धौं जियँ भामिनी॥

जिस भी उपाय से शोक और कलंक मिट सके, वही उपाय करके कुल की रक्षा करो; हठपूर्वक राम को वन जाने से रोक दो, कोई दूसरी बात न चलने दो। जैसे सूर्य के बिना दिन नहीं, प्राण के बिना शरीर नहीं, और चंद्रमा के बिना रात्रि नहीं होती - वैसे ही, तुलसीदास कहते हैं, हे रानी, अपने मन में समझ लो कि प्रभु के बिना अयोध्या भी कुछ नहीं है।

सोरठा

सखिन्ह सिखावनु दीन्ह सुनत मधुर परिनाम हित।तेइँ कछु कान न कीन्ह कुटिल प्रबोधी कूबरी॥५०॥

सखियों ने ऐसी सीख दी जो सुनने में मधुर और परिणाम में हितकर थी - पर मंथरा की सिखाई हुई उस कुटिल कैकेयी ने उस पर तनिक भी ध्यान न दिया।

उतरु न देइ दुसह रिस रूखी। मृगिन्ह चितव जनु बाघिनि भूखी॥ब्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी। चलीं कहत मतिमंद अभागी॥॥१॥

असह्य क्रोध से रूखी कैकेयी ने कोई उत्तर न दिया, बस हिरणियों को देखती भूखी बाघिन-सी घूरती रही। उसकी व्याधि को असाध्य जानकर वे स्त्रियाँ उसे छोड़कर चल दीं, कहती हुईं - मंदबुद्धि अभागिन!

राजु करत यह दैअँ बिगोई। कीन्हेसि अस जस करइ न कोई॥एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारीं। देहिं कुचालिहि कोटिक गारीं॥॥२॥

राज्य करते हुए विधाता ने इसे इस तरह बिगाड़ दिया - इसने वह कर डाला जो कोई और कभी नहीं करता। इस प्रकार नगर के स्त्री-पुरुष विलाप करते हैं और उस कुचाली को करोड़ों गालियाँ देते हैं।

जरहिं बिषम जर लेहिं उसासा। कवनि राम बिनु जीवन आसा॥बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी। जनु जलचर गन सूखत पानी॥॥३॥

प्रजा भयंकर ज्वर से जलती हुई लंबी साँसें ले रही है - राम के बिना जीवन की क्या आशा? इस विशाल वियोग से व्याकुल प्रजा ऐसी तड़प रही है मानो सूखते जल में जलचर प्राणी।

अति बिषाद बस लोग लोगाई। गए मातु पहिं रामु गोसाईं॥मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ। मिटा सोचु जनि राखे राऊ॥॥४॥

नगर के स्त्री-पुरुष गहरे विषाद में डूबे थे, जब स्वामी राम अपनी माता के पास पहुँचे। उनका मुख प्रसन्न था और मन में चौगुना उत्साह था, मानो सारी चिंता मिट गई हो और राजा बच गए हों।

दोहा

नव गयंदु रघुबीर मनु राजु अलान समान।छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान॥५१॥

रघुवीर का मन मानो नवबंधित हाथी था और राज्य उसकी बेड़ी के समान। स्वयं को मुक्त जानकर, वन जाने की बात सुनकर उनके हृदय में और भी अधिक आनंद बढ़ गया।

रघुकुलतिलक जोरि दोउ हाथा। मुदित मातु पद नायउ माथा॥दीन्हि असीस लाइ उर लीन्हे। भूषन बसन निछावरि कीन्हे॥॥१॥

रघुकुल के तिलक राम ने दोनों हाथ जोड़कर आनंदपूर्वक माता के चरणों में मस्तक झुकाया। माता ने आशीर्वाद देकर उन्हें हृदय से लगा लिया और आभूषण-वस्त्र न्योछावर किए।

बार बार मुख चुंबति माता। नयन नेह जलु पुलकित गाता॥गोद राखि पुनि हृदयँ लगाए। स्त्रवत प्रेनरस पयद सुहाए॥॥२॥

माता बार-बार राम का मुख चूमती रहीं, उनके नेत्रों में स्नेह के आँसू और शरीर पुलकित था। कभी गोद में बिठाकर तो कभी हृदय से लगाकर, उनका प्रेम-रस सुंदर बूँदों के समान बह रहा था।

प्रेमु प्रमोदु न कछु कहि जाई। रंक धनद पदबी जनु पाई॥सादर सुंदर बदनु निहारी। बोली मधुर बचन महतारी॥॥३॥

उनका प्रेम और आनंद वर्णन से परे था, मानो किसी दरिद्र को कुबेर का पद मिल गया हो। राम का सुंदर मुख आदरपूर्वक निहारते हुए माता मधुर वचन बोलीं।

कहहु तात जननी बलिहारी। कबहिं लगन मुद मंगलकारी॥सुकृत सील सुख सी सुहाई। जनम लाभ कइ अवधि अघाई॥॥४॥

हे पुत्र, बताओ, तुम्हारी माता तुम पर वारी जाती है - वह आनंदमय शुभ लगन कब है? जिससे पुण्य, शील और सुख से भरा यह सुंदर समय मेरे जीवन के सच्चे लाभ की चरम सीमा बन जाए।

दोहा

जेहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति।जिमि चातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति॥५२॥

जिसे नगर के सभी स्त्री-पुरुष इस तरह व्याकुल होकर चाहते हैं, जैसे प्यासे चातक और चातकी शरद ऋतु की स्वाति बूँद के लिए तरसते हैं।

तात जाउँ बलि बेगि नहाहू। जो मन भाव मधुर कछु खाहू॥पितु समीप तब जाएहु भैआ। भइ बड़ि बार जाइ बलि मैआ॥॥१॥

हे पुत्र, मैं तुम पर वारी जाती हूँ, जाओ शीघ्र स्नान करो, जो मन भाए वह कुछ मीठा खा लो। फिर पिताजी के पास जाना, हे भैया - बहुत देर हो चुकी है, जाओ, मैं तुम पर वारी जाती हूँ।

मातु बचन सुनि अति अनुकूला। जनु सनेह सुरतरु के फूला॥सुख मकरंद भरे श्रियमूला। निरखि राम मनु भवरुँ न भूला॥॥२॥

माता के ये अत्यंत अनुकूल वचन सुनकर, मानो स्नेह के कल्पवृक्ष के फूल हों, सुख-रूपी मकरंद से भरे और सौभाग्य में जड़े हुए - फिर भी राम का मन भँवरे की तरह इनमें भूला नहीं।

धरम धुरीन धरम गति जानी। कहेउ मातु सन अति मृदु बानी॥पिताँ दीन्ह मोहि कानन राजू। जहँ सब भाँति मोर बड़ काजू॥॥३॥

धर्म के धुरंधर राम ने धर्म की गति समझकर माता से अत्यंत मृदु वाणी में कहा - पिताजी ने मुझे वन का राज्य दिया है, जहाँ हर प्रकार से मेरा बड़ा प्रयोजन सिद्ध होगा।

आयसु देहि मुदित मन माता। जेहिं मुद मंगल कानन जाता॥जनि सनेह बस डरपसि भोरें। आनँदु अंब अनुग्रह तोरें॥॥४॥

हे माता, प्रसन्न मन से मुझे आज्ञा दीजिए, जिससे मैं आनंद और मंगल के साथ वन को जाऊँ। स्नेहवश व्यर्थ भय मत कीजिए - हे माता, मेरा आनंद तो आपके आशीर्वाद में ही है।

दोहा

बरष चारिदस बिपिन बसि करि पितु बचन प्रमान।आइ पाय पुनि देखिहउँ मनु जनि करसि मलान॥५३॥

पिता के वचन को प्रमाण मानकर चौदह वर्ष वन में बिताकर मैं फिर लौटकर आपके चरणों के दर्शन करूँगा - मन को मलिन मत कीजिए।

बचन बिनीत मधुर रघुबर के। सर सम लगे मातु उर करके॥सहमि सूखि सुनि सीतलि बानी। जिमि जवास परें पावस पानी॥॥१॥

राघव के ये विनम्र, मधुर वचन माता के हृदय में बाणों की तरह चुभे। यह शीतल वाणी सुनकर वे सहमकर सूख गईं, जैसे जवासा का पौधा वर्षा का जल पड़ते ही मुरझा जाता है।

कहि न जाइ कछु हृदय बिषादू। मनहुँ मृगी सुनि केहरि नादू॥नयन सजल तन थर थर काँपी। माजहि खाइ मीन जनु मापी॥॥२॥

उनके हृदय का विषाद वर्णन से परे था, मानो किसी हिरणी ने सिंह की गर्जना सुन ली हो। उनके नेत्र भर आए, शरीर थर-थर काँपने लगा, मानो काँटा निगल गई कोई मछली तड़प रही हो।

धरि धीरजु सुत बदनु निहारी। गदगद बचन कहति महतारी॥तात पितहि तुम्ह प्रानपिआरे। देखि मुदित नित चरित तुम्हारे॥॥३॥

धैर्य धारण करके पुत्र का मुख निहारते हुए माता गद्गद वाणी में बोलीं - हे तात, तुम पिता को प्राणों के समान प्रिय हो, वे सदा तुम्हारा आचरण देखकर आनंदित रहते हैं।

राजु देन कहुँ सुभ दिन साधा। कहेउ जान बन केहिं अपराधा॥तात सुनावहु मोहि निदानू। को दिनकर कुल भयउ कृसानू॥॥४॥

राजतिलक के लिए उन्होंने शुभ दिन साध लिया था - अब वन जाने को कह रहे हैं, किस अपराध पर? हे तात, मुझे पूरा सच बताओ - सूर्यवंश के लिए यह आग किसने लगाई है?

दोहा

निरखि राम रुख सचिवसुत कारनु कहेउ बुझाइ।सुनि प्रसंगु रहि मूक जिमि दसा बरनि नहिं जाइ॥५४॥

राम का भाव देखकर सुमंत्र ने समझाकर सारा कारण बता दिया। यह प्रसंग सुनकर कौशल्या मानो मूक हो गईं - उनकी दशा वर्णन से परे थी।

राखि न सकइ न कहि सक जाहू। दुहूँ भाँति उर दारुन दाहू॥लिखत सुधाकर गा लिखि राहू। बिधि गति बाम सदा सब काहू॥॥१॥

वे न राम को रोक सकीं और न जाने को कह सकीं - दोनों ही ओर से हृदय में भयंकर जलन थी। मानो चंद्रमा लिखते-लिखते विधाता के हाथ से राहु लिखा गया हो - विधि की गति सदा सबके लिए किसी न किसी रूप में विपरीत ही होती है।

धरम सनेह उभयँ मति घेरी। भइ गति साँप छुछुंदरि केरी॥राखउँ सुतहि करउँ अनुरोधू। धरमु जाइ अरु बंधु बिरोधू॥॥२॥

धर्म और स्नेह दोनों ने उनकी बुद्धि को घेर लिया - उनकी दशा साँप और छछूंदर की-सी हो गई। यदि मैं पुत्र को रोकूँ और आग्रह करूँ, तो धर्म भी नष्ट होगा और परिवार में विरोध भी उत्पन्न होगा।

कहउँ जान बन तौ बड़ि हानी। संकट सोच बिबस भइ रानी॥बहुरि समुझि तिय धरमु सयानी। रामु भरतु दोउ सुत सम जानी॥॥३॥

यदि मैं वन जाने को कहूँ तो भी बड़ी हानि है - इस संकट में रानी चिंता से विवश हो गईं। फिर स्त्री-धर्म का विचार करके बुद्धिमती कौशल्या ने राम और भरत दोनों को समान पुत्र मानकर विचार किया।

सरल सुभाउ राम महतारी। बोली बचन धीर धरि भारी॥तात जाउँ बलि कीन्हेहु नीका। पितु आयसु सब धरमक टीका॥॥४॥

सीधे-सरल स्वभाव वाली राम की माता ने बड़े धैर्य से यह वचन कहा - हे पुत्र, मैं तुम पर वारी जाती हूँ, तुमने अच्छा किया; पिता की आज्ञा तो सभी धर्मों का शिखर है।

दोहा

राजु देन कहि दीन्ह बनु मोहि न सो दुख लेसु।तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि प्रजहि प्रचंड कलेसु॥५५॥

राज्य देने की बात कहकर वन दे दिया गया - इसमें मुझे तनिक भी दुख नहीं। पर तुम्हारे बिना भरत को, राजा को और प्रजा को अत्यंत तीव्र कष्ट होगा।

जौं केवल पितु आयसु ताता। तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता॥जौं पितु मातु कहेउ बन जाना। तौ कानन सत अवध समाना॥॥१॥

हे तात, यदि यह केवल पिता की आज्ञा हो, तो माता को बड़ा मानकर मत जाओ। पर यदि माता-पिता दोनों वन जाने को कहें, तो वन भी अयोध्या के समान सौ गुना हो जाता है।

पितु बनदेव मातु बनदेवी। खग मृग चरन सरोरुह सेवी॥अंतहुँ उचित नृपहि बनबासू। बय बिलोकि हियँ होइ हराँसू॥॥२॥

वन के देवता को पिता और वनदेवी को माता मानना, पक्षी और मृग तुम्हारे चरण-कमलों की सेवा करेंगे। अंततः राजा के लिए भी वनवास उचित ही है - पर उनकी अवस्था देखकर हृदय में विषाद होता है।

बड़भागी बनु अवध अभागी। जो रघुबंसतिलक तुम्ह त्यागी॥जौं सुत कहौं संग मोहि लेहू। तुम्हरे हृदयँ होइ संदेहू॥॥३॥

वन बड़ा भाग्यशाली है और अयोध्या अभागी है, क्योंकि रघुकुल-तिलक तुमने उसे त्याग दिया। हे पुत्र, यदि मैं कहूँ कि मुझे भी साथ ले चलो, तो तुम्हारे हृदय में संदेह हो सकता है।

पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के। प्रान प्रान के जीवन जी के॥ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊँ। मैं सुनि बचन बैठि पछिताऊँ॥॥४॥

हे पुत्र, तुम सबके परम प्रिय हो - प्राणों के भी प्राण, जीवन के भी जीवन। यदि तुम कहो कि माता, मैं वन जा रहा हूँ, तो यह वचन सुनकर मैं बैठी पछताती रहूँगी।

दोहा

यह बिचारि नहिं करउँ हठ झूठ सनेहु बढ़ाइ।मानि मातु कर नात बलि सुरति बिसरि जनि जाइ॥५६॥

यह सोचकर मैं झूठा स्नेह बढ़ाकर हठ नहीं करूँगी। माता-पुत्र के नाते को मानते हुए, मैं तुम पर वारी जाती हूँ - बस मुझे याद करना मत भूलना।

देव पितर सब तुन्हहि गोसाई। राखहुँ पलक नयन की नाई॥अवधि अंबु प्रिय परिजन मीना। तुम्ह करुनाकर धरम धुरीना॥॥१॥

हे स्वामी, देवता और पितर सब तुम ही हो, पलक जैसे नेत्र की रक्षा करती है वैसे मेरी रक्षा करना। समयावधि जल है और प्रिय परिजन मछलियाँ - तुम करुणा के सागर और धर्म के धुरंधर हो।

अस बिचारि सोइ करहु उपाई। सबहि जिअत जेहिं भेंटेहु आई॥जाहु सुखेन बनहि बलि जाऊँ। करि अनाथ जन परिजन गाऊँ॥॥२॥

यह सोचकर वही उपाय करना जिससे लौटकर सबसे जीते-जी मिल सको। सुख से वन जाओ, मैं तुम पर वारी जाती हूँ - अपनी प्रजा, परिजन और नगर को अनाथ-सा छोड़कर जाओ।

सब कर आजु सुकृत फल बीता। भयउ कराल कालु बिपरीता॥बहुबिधि बिलपि चरन लपटानी। परम अभागिनि आपुहि जानी॥॥३॥

आज सबके पुण्यों का फल मानो समाप्त हो गया - यह भयंकर विपरीत समय आ गया है। अनेक प्रकार से विलाप करते हुए वे राम के चरणों से लिपट गईं, स्वयं को परम अभागिन मानते हुए।

दारुन दुसह दाहु उर ब्यापा। बरनि न जाहिं बिलाप कलापा॥राम उठाइ मातु उर लाई। कहि मृदु बचन बहुरि समुझाई॥॥४॥

हृदय में भयंकर असह्य जलन फैल गई - उनके अनेक विलाप वर्णन से परे थे। राम ने माता को उठाकर हृदय से लगाया और फिर मृदु वचनों से समझाया।

दोहा

समाचार तेहि समय सुनि सीय उठी अकुलाइ।जाइ सासु पद कमल जुग बंदि बैठि सिरु नाइ॥५७॥

उस समय यह समाचार सुनकर सीता व्याकुल होकर उठ खड़ी हुईं। जाकर उन्होंने सास के चरण-कमलों की वंदना की और सिर झुकाकर बैठ गईं।

दीन्हि असीस सासु मृदु बानी। अति सुकुमारि देखि अकुलानी॥बैठि नमितमुख सोचति सीता। रूप रासि पति प्रेम पुनीता॥॥१॥

सास ने मृदु वाणी में आशीर्वाद दिया, सीता की अत्यंत कोमलता देखकर वे व्याकुल हो उठीं। सीता सिर झुकाए बैठी चिंतित थीं - सौंदर्य की राशि, पति के प्रति पवित्र प्रेम से भरी।

चलन चहत बन जीवननाथू। केहि सुकृती सन होइहि साथू॥की तनु प्रान कि केवल प्राना। बिधि करतबु कछु जाइ न जाना॥॥२॥

मेरे जीवन के स्वामी वन जाना चाहते हैं - किस भाग्यशाली को उनका साथ मिलेगा? क्या शरीर सहित प्राण साथ जाएँगे, या केवल प्राण ही रह जाएँगे? विधाता की चाल कुछ समझ में नहीं आती।

चारु चरन नख लेखति धरनी। नूपुर मुखर मधुर कबि बरनी॥मनहुँ प्रेम बस बिनती करहीं। हमहि सीय पद जनि परिहरहीं॥॥३॥

सीता अपने सुंदर चरणों के नाखूनों से धरती कुरेदती रहीं, पायल की मधुर रुनझुन गूँजती रही, जैसा कवियों ने वर्णित किया है। मानो वे पायल भी प्रेमवश विनती कर रही हों - सीता के चरण हमें कभी न त्यागें।

मंजु बिलोचन मोचति बारी। बोली देखि राम महतारी॥तात सुनहु सिय अति सुकुमारी। सासु ससुर परिजनहि पिआरी॥॥४॥

सीता के सुंदर नेत्रों से आँसू बह रहे थे; यह देखकर राम की माता बोलीं - हे पुत्र, सुनो, सीता अत्यंत सुकुमार हैं, सास-ससुर और परिजनों को अत्यंत प्रिय हैं।

दोहा

पिता जनक भूपाल मनि ससुर भानुकुल भानु।पति रबिकुल कैरव बिपिन बिधु गुन रूप निधानु॥५८॥

सीता के पिता राजाओं में शिरोमणि जनक हैं, ससुर सूर्यवंश के सूर्य हैं, और पति सूर्यकुल-रूपी कुमुद-वन के लिए चंद्रमा हैं - गुण और रूप के भंडार।

मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई। रूप रासि गुन सील सुहाई॥नयन पुतरि करि प्रीति बढ़ाई। राखेउँ प्रान जानिकिहिं लाई॥॥१॥

और मैंने भी उसे प्रिय पुत्रवधू के रूप में पाया है - रूप, गुण और शील की सुंदर राशि। उसे अपनी आँख की पुतली बनाकर, प्रेम बढ़ाकर, मैंने अपने प्राण जानकी से बाँध लिए हैं।

कलपबेलि जिमि बहुबिधि लाली। सींचि सनेह सलिल प्रतिपाली॥फूलत फलत भयउ बिधि बामा। जानि न जाइ काह परिनामा॥॥२॥

मानो कल्पलता हो, मैंने उसे अनेक प्रकार से दुलार से पाला-पोसा, स्नेह-जल से सींचकर बड़ा किया। फूलने-फलने ही वाली थी कि विधाता प्रतिकूल हो गए - अब क्या परिणाम होगा, यह कहा नहीं जा सकता।

पलँग पीठ तजि गोद हिंड़ोरा। सियँ न दीन्ह पगु अवनि कठोरा॥जिअनमूरि जिमि जोगवत रहऊँ। दीप बाति नहिं टारन कहऊँ॥॥३॥

पलंग और गोद की हिंडोली के अतिरिक्त सीता ने कभी कठोर धरती पर पैर नहीं रखा। मैं उसे संजीवनी बूटी की तरह सहेजती रही हूँ, दीये की बाती हटाने तक को कभी नहीं कहा।

सोइ सिय चलन चहति बन साथा। आयसु काह होइ रघुनाथा॥चंद किरन रस रसिक चकोरी। रबि रुख नयन सकइ किमि जोरी॥॥४॥

वही सीता अब तुम्हारे साथ वन जाना चाहती है - हे रघुनाथ, अब तुम्हारी क्या आज्ञा है? चंद्रमा की किरणों की रसिक चकोरी भला सूर्य की प्रखर आँखों से नेत्र कैसे मिला सकेगी?

दोहा

करि केहरि निसिचर चरहिं दुष्ट जंतु बन भूरि।बिष बाटिकाँ कि सोह सुत सुभग सजीवनि मूरि॥५९॥

वन में हाथी, सिंह, राक्षस और अनेक दुष्ट जीव विचरते हैं - हे पुत्र, क्या विष की बगिया में कहीं सुंदर संजीवनी बूटी शोभा पाती है?

बन हित कोल किरात किसोरी। रचीं बिरंचि बिषय सुख भोरी॥पाइन कृमि जिमि कठिन सुभाऊ। तिन्हहि कलेसु न कानन काऊ॥॥१॥

वन के लिए विधाता ने भील और किरात जाति की किशोरियाँ ही रची हैं, जो भोग-विलास से अनजान हैं। उनका स्वभाव पत्थर में रहने वाले कीड़े-सा कठोर है - वन उन्हें कभी कष्ट नहीं देता।

के तापस तिय कानन जोगू। जिन्ह तप हेतु तजा सब भोगू॥सिय बन बसिहि तात केहि भाँती। चित्रलिखित कपि देखि डेराती॥॥२॥

या फिर तपस्विनी स्त्रियाँ वन के योग्य हैं, जिन्होंने तप के लिए सारे भोग त्याग दिए हों। पर हे पुत्र, सीता वन में कैसे रहेगी - जो चित्र में बने बंदर को देखकर भी डर जाती है!

सुरसर सुभग बनज बन चारी। डाबर जोगु कि हंसकुमारी॥अस बिचारि जस आयसु होई। मैं सिख देउँ जानकिहि सोई॥॥३॥

गंगा में उगने वाला सुंदर कमल - क्या राजहंस की कुमारी किसी छोटे कीचड़ भरे गड्ढे के योग्य है? यह विचार करके, जो भी तुम्हारी आज्ञा हो, वही सलाह मैं जानकी को दूँगी।

जौं सिय भवन रहै कह अंबा। मोहि कहँ होइ बहुत अवलंबा॥सुनि रघुबीर मातु प्रिय बानी। सील सनेह सुधाँ जनु सानी॥॥४॥

माता ने कहा - यदि सीता घर पर ही रहे, तो मुझे बहुत सहारा मिलेगा। माता के इन प्रिय वचनों को सुनकर रघुवीर को लगा मानो वे शील और स्नेह के अमृत में सने हों।

दोहा

कहि प्रिय बचन बिबेकमय कीन्हि मातु परितोष।लगे प्रबोधन जानकिहि प्रगटि बिपिन गुन दोष॥६०॥

प्रिय और विवेकपूर्ण वचन कहकर राम ने माता को संतुष्ट किया, फिर वन के गुण-दोष प्रकट करते हुए जानकी को समझाने लगे।

मातु समीप कहत सकुचाहीं। बोले समउ समुझि मन माहीं॥राजकुमारि सिखावन सुनहू। आन भाँति जियँ जनि कछु गुनहू॥॥१॥

माता के समीप कहने में राम को संकोच हुआ, पर समय को समझते हुए वे बोले - हे राजकुमारी, मेरी सीख सुनो, इसे मन में किसी और भाव से मत लो।

आपन मोर नीक जौं चहहू। बचनु हमार मानि गृह रहहू॥आयसु मोर सासु सेवकाई। सब बिधि भामिनि भवन भलाई॥॥२॥

यदि तुम अपना और मेरा दोनों का भला चाहती हो, तो मेरा वचन मानकर घर पर ही रहो। मेरी आज्ञा और सास की सेवा - हे प्रिये, हर प्रकार से घर में रहना ही उचित है।

एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा। सादर सासु ससुर पद पूजा॥जब जब मातु करिहि सुधि मोरी। होइहि प्रेम बिकल मति भोरी॥॥३॥

इससे बढ़कर कोई दूसरा धर्म नहीं कि तुम आदरपूर्वक सास-ससुर के चरणों की सेवा करो। जब-जब माता मेरा स्मरण करेंगी, तब-तब उनका सीधा-सरल मन प्रेमवश व्याकुल होगा,

तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी। सुंदरि समुझाएहु मृदु बानी॥कहउँ सुभायँ सपथ सत मोही। सुमुखि मातु हित राखउँ तोही॥॥४॥

तब-तब, हे सुंदरी, पुरानी कथाएँ सुनाकर उन्हें मृदु वाणी से समझाना। मैं स्वाभाविक भाव से सौगंध खाकर कहता हूँ - हे सुमुखि, माता के हित के लिए ही मैं तुम्हें यहाँ रोक रहा हूँ।

दोहा

गुर श्रुति संमत धरम फलु पाइअ बिनहिं कलेस।हठ बस सब संकट सहे गालव नहुष नरेस॥६१॥

गुरु और श्रुति के अनुकूल धर्म का फल तो बिना कष्ट के ही प्राप्त हो जाता है - मुनि गालव और राजा नहुष ने तो हठ के वश ही वे सारे संकट सहे थे।

मैं पुनि करि प्रवान पितु बानी। बेगि फिरब सुनु सुमुखि सयानी॥दिवस जात नहिं लागिहि बारा। सुंदरि सिखवनु सुनहु हमारा॥॥१॥

और मैं पिता के वचन को प्रमाण मानकर शीघ्र ही लौट आऊँगा - सुनो, हे सुमुखि सयानी। दिन बीतने में देर न लगेगी - हे सुंदरी, मेरी यह सीख सुनो।

जौं हठ करहु प्रेम बस बामा। तौ तुम्ह दुखु पाउब परिनामा॥काननु कठिन भयंकरु भारी। घोर घामु हिम बारि बयारी॥॥२॥

हे प्रिये, यदि तुम प्रेमवश हठ करोगी, तो अंततः तुम्हें दुख ही मिलेगा। वन अत्यंत कठिन और भयंकर है - वहाँ घोर धूप, हिम, वर्षा और आँधी है।

कुस कंटक मग काँकर नाना। चलब पयादेहिं बिनु पदत्राना॥चरन कमल मृदु मंजु तुम्हारे। मारग अगम भूमिधर भारे॥॥३॥

मार्ग में कुश, काँटे और अनेक कंकड़-पत्थर बिछे हैं - बिना जूतों के पैदल चलना पड़ता है। तुम्हारे चरण-कमल तो कोमल और सुंदर हैं, और मार्ग विशाल पर्वतों से दुर्गम है।

कंदर खोह नदीं नद नारे। अगम अगाध न जाहिं निहारे॥भालु बाघ बृक केहरि नागा। करहिं नाद सुनि धीरजु भागा॥॥४॥

वहाँ कंदराएँ, गुफाएँ, नदी-नाले हैं - इतने दुर्गम और अथाह कि देखे भी नहीं जाते। भालू, बाघ, भेड़िया, सिंह और हाथी ऐसी दहाड़ते हैं कि सुनते ही धैर्य भी भाग जाए।

दोहा

भूमि सयन बलकल बसन असनु कंद फल मूल।ते कि सदा सब दिन मिलिहिं सबुइ समय अनुकूल॥६२॥

भूमि पर शयन, वल्कल के वस्त्र, और कंद-मूल-फल का आहार - क्या ये सदा प्रतिदिन हर अनुकूल समय पर सहज ही मिल जाते हैं?

नर अहार रजनीचर चरहीं। कपट बेष बिधि कोटिक करहीं॥लागइ अति पहार कर पानी। बिपिन बिपति नहिं जाइ बखानी॥॥१॥

राक्षस मनुष्यों का भक्षण करते हुए विचरते हैं, वे अनेक प्रकार के कपटी वेष धारण कर लेते हैं। पहाड़ी जल भी अत्यंत कड़वा लगता है - वन की विपत्तियों का वर्णन नहीं किया जा सकता।

ब्याल कराल बिहग बन घोरा। निसिचर निकर नारि नर चोरा॥डरपहिं धीर गहन सुधि आएँ। मृगलोचनि तुम्ह भीरु सुभाएँ॥॥२॥

भयंकर सर्प, डरावने पक्षी, घोर वन, और स्त्री-पुरुषों को चुरा ले जाने वाले राक्षसों के झुंड। धीर पुरुष भी घने वन की याद आते ही डर जाते हैं - और तुम तो, हे मृगनयनी, स्वभाव से ही भीरु हो।

हंसगवनि तुम्ह नहिं बन जोगू। सुनि अपजसु मोहि देइहि लोगू॥मानस सलिल सुधाँ प्रतिपाली। जिअइ कि लवन पयोधि मराली॥॥३॥

हे हंसगामिनी, तुम वन के योग्य नहीं हो - यह सुनकर लोग मुझे अपयश देंगे। मानसरोवर के अमृत-सम जल से पली हंसिनी भला लवण-समुद्र में कैसे जी सकेगी?

नव रसाल बन बिहरनसीला। सोह कि कोकिल बिपिन करीला॥रहहु भवन अस हृदयँ बिचारी। चंदबदनि दुखु कानन भारी॥॥४॥

नए आम्रकुंज में विहार करने वाली कोयल भला कँटीले करील के वन में कैसे शोभा पाएगी? हे चंद्रमुखी, हृदय में यह विचार करके घर पर ही रहो - वन में बहुत भारी दुख है।

दोहा

सहज सुह्द गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि।सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि॥६३॥

जो सहज हितैषी, गुरु या स्वामी की सीख को सिर झुकाकर स्वीकार नहीं करता, वह अवश्य ही हृदय में भरपूर पछताता है - उसका अपना हित अवश्य नष्ट होता है।

सुनि मृदु बचन मनोहर पिय के। लोचन ललित भरे जल सिय के॥सीतल सिख दाहक भइ कैंसें। चकइहि सरद चंद निसि जैसें॥॥१॥

अपने प्रियतम के मृदु और मनोहर वचन सुनकर सीता के सुंदर नेत्र आँसुओं से भर आए। यह शीतल सीख कैसे दाहक बन गई - जैसे शरद ऋतु की चाँदनी रात चकवी के लिए बन जाती है।

उतरु न आव बिकल बैदेही। तजन चहत सुचि स्वामि सनेही॥बरबस रोकि बिलोचन बारी। धरि धीरजु उर अवनिकुमारी॥॥२॥

व्याकुल वैदेही से कोई उत्तर न बन पड़ा - उनके पवित्र, स्नेही स्वामी उन्हें छोड़ना चाहते थे। बलपूर्वक आँसू रोककर पृथ्वी-कुमारी सीता ने हृदय में धैर्य धारण किया।

लागि सासु पग कह कर जोरी। छमबि देबि बड़ि अबिनय मोरी॥दीन्हि प्रानपति मोहि सिख सोई। जेहि बिधि मोर परम हित होई॥॥३॥

सास के चरण छूकर हाथ जोड़कर उन्होंने कहा - हे देवी, मेरी यह बड़ी धृष्टता क्षमा कीजिए। मेरे प्राणनाथ ने मुझे वही सीख दी है, जिससे मेरा परम हित हो।

मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं। पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं॥॥४॥

पर मैं अपने दुखी मन में यह भी समझती हूँ कि प्रियतम के वियोग के समान संसार में कोई दुख नहीं है।

दोहा

प्राननाथ करुनायतन सुंदर सुखद सुजान।तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु सुरपुर नरक समान॥६४॥

हे प्राणनाथ, हे करुणा के आगार, सुंदर, सुखदायक और सुजान - हे रघुकुल-कुमुद के चंद्रमा, आपके बिना तो स्वर्ग भी मेरे लिए नरक के समान है।

मातु पिता भगिनी प्रिय भाई। प्रिय परिवारु सुह्रद समुदाई॥सासु ससुर गुर सजन सहाई। सुत सुंदर सुसील सुखदाई॥॥१॥

माता, पिता, प्रिय बहन, प्रिय भाई, प्रिय परिवार और हितैषियों का समुदाय, सास, ससुर, गुरु, सज्जन सहायक, सुंदर और सुशील सुखदायी पुत्र -

जहँ लगि नाथ नेह अरु नाते। पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते॥तनु धनु धामु धरनि पुर राजू। पति बिहीन सबु सोक समाजू॥॥२॥

हे नाथ, जितने भी स्नेह और नाते हों, पति के बिना स्त्री के लिए वे सूर्य से भी अधिक तपते हैं। शरीर, धन, घर, भूमि, नगर, राज्य - पति के बिना ये सब शोक का समूह मात्र बन जाते हैं।

भोग रोगसम भूषन भारू। जम जातना सरिस संसारू॥प्राननाथ तुम्ह बिनु जग माहीं। मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं॥॥३॥

भोग रोग के समान, आभूषण मात्र भार, और संसार यमयातना के समान हो जाता है। हे प्राणनाथ, आपके बिना इस संसार में मेरे लिए कहीं कुछ भी सुखदायी नहीं है।

जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी॥नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें। सरद बिमल बिधु बदनु निहारें॥॥४॥

जैसे शरीर बिना प्राण के और नदी बिना जल के, वैसे ही, हे नाथ, स्त्री पुरुष के बिना निष्प्राण है। हे नाथ, सारा सुख तो आपके साथ रहने में है, आपके शरद-चंद्र-सम निर्मल मुख को निहारने में है।

दोहा

खग मृग परिजन नगरु बनु बलकल बिमल दुकूल।नाथ साथ सुरसदन सम परनसाल सुख मूल॥६५॥

हे नाथ, आपके साथ पक्षी और मृग ही मेरे परिजन होंगे, वन ही नगर और वल्कल ही निर्मल रेशमी वस्त्र। आपके साथ रहने पर पर्णकुटी भी स्वर्ग-भवन के समान सुख का मूल बन जाएगी।

बनदेवीं बनदेव उदारा। करिहहिं सासु ससुर सम सारा॥कुस किसलय साथरी सुहाई। प्रभु संग मंजु मनोज तुराई॥॥१॥

उदार वनदेवता और वनदेवियाँ सास-ससुर के समान ही मेरी देखभाल करेंगे। कुश और कोमल पत्तों की शैया भी सुंदर लगेगी - प्रभु के साथ वह कामदेव की मृदु सेज जैसी प्रतीत होगी।

कंद मूल फल अमिअ अहारू। अवध सौध सत सरिस पहारू॥छिनु छिनु प्रभु पद कमल बिलोकि। रहिहउँ मुदित दिवस जिमि कोकी॥॥२॥

कंद-मूल-फल ही अमृत-सम आहार होंगे, पहाड़ ही अयोध्या के सैकड़ों महलों के समान लगेंगे। पल-पल प्रभु के चरण-कमलों को निहारते हुए मैं दिन में चकवी की भाँति आनंदित रहूँगी।

बन दुख नाथ कहे बहुतेरे। भय बिषाद परिताप घनेरे॥प्रभु बियोग लवलेस समाना। सब मिलि होहिं न कृपानिधाना॥॥३॥

हे नाथ, आपने वन के अनेक दुख गिनाए - भय, विषाद और घनघोर संताप। पर हे कृपानिधान, ये सब मिलकर भी प्रभु-वियोग के लेशमात्र दुख के बराबर नहीं हो सकते।

अस जियँ जानि सुजान सिरोमनि। लेइअ संग मोहि छाड़िअ जनि॥बिनती बहुत करौं का स्वामी। करुनामय उर अंतरजामी॥॥४॥

हे सुजानों में शिरोमणि, यह हृदय में जानकर मुझे साथ ले चलिए, मत छोड़िए। हे स्वामी, मैं और क्या विनती करूँ - आप तो करुणामय और अंतर्यामी हैं।

दोहा

राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत न जनिअहिं प्रान।दीनबंधु सुंदर सुखद सील सनेह निधान॥६६॥

यदि मुझे अवधि-भर अयोध्या में ही छोड़ दिया गया, तो हे दीनबंधु, हे सुंदर सुखदायक शील-स्नेह-निधान, जान लीजिए कि मेरे प्राण नहीं रहेंगे।

मोहि मग चलत न होइहि हारी। छिनु छिनु चरन सरोज निहारी॥सबहि भाँति पिय सेवा करिहौं। मारग जनित सकल श्रम हरिहौं॥॥१॥

मुझे मार्ग में चलते हुए कोई थकान नहीं होगी, क्षण-क्षण आपके चरण-कमलों को निहारते हुए। मैं हर प्रकार से प्रियतम की सेवा करूँगी और मार्ग से उत्पन्न सारी थकान दूर करूँगी।

पाय पखारि बैठि तरु छाहीं। करिहउँ बाउ मुदित मन माहीं॥श्रम कन सहित स्याम तनु देखें। कहँ दुख समउ प्रानपति पेखें॥॥२॥

आपके चरण धोकर, वृक्ष की छाया में बैठकर, मैं प्रसन्न मन से पंखा झलूँगी। पसीने की बूँदों सहित आपके श्याम शरीर को देखते हुए, हे प्राणनाथ, फिर दुख का समय कहाँ रह जाता है?

सम महि तृन तरुपल्लव डासी। पाय पलोटिहि सब निसि दासी॥बारबार मृदु मूरति जोही। लागहि तात बयारि न मोही॥॥३॥

समतल भूमि पर तृण और कोमल पत्ते बिछाकर यह दासी रातभर आपके चरण दबाएगी। बार-बार आपकी कोमल मूर्ति निहारते हुए मुझे कोई आँधी भी नहीं छू सकेगी।

को प्रभु सँग मोहि चितवनिहारा। सिंघबधुहि जिमि ससक सिआरा॥मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू। तुम्हहि उचित तप मो कहुँ भोगू॥॥४॥

हे नाथ, आपके साथ रहते हुए मुझे कौन ताक भी सकेगा - जैसे सिंहनी की ओर खरगोश या सियार नहीं देखते? आप कहते हैं मैं सुकुमार हूँ, वन के योग्य नहीं - पर तप तो आपके लिए उचित हो और भोग मेरे लिए, यह कैसा न्याय?

दोहा

ऐसेउ बचन कठोर सुनि जौं न ह्रदउ बिलगान।तौ प्रभु बिषम बियोग दुख सहिहहिं पावर प्रान॥६७॥

ऐसे कठोर वचन सुनकर भी यदि आपका हृदय न पसीजे, तो हे प्रभु, यह तुच्छ प्राण भीषण वियोग का दुख सहने को विवश होंगे।

अस कहि सीय बिकल भइ भारी। बचन बियोगु न सकी सँभारी॥देखि दसा रघुपति जियँ जाना। हठि राखें नहिं राखिहि प्राना॥॥१॥

यह कहकर सीता अत्यंत व्याकुल हो गईं - वे 'वियोग' शब्द तक सहन न कर सकीं। यह दशा देखकर रघुनाथ के मन में समझ आ गया कि यदि हठपूर्वक रोका गया, तो सीता प्राण नहीं बचा पाएँगी।

कहेउ कृपाल भानुकुलनाथा। परिहरि सोचु चलहु बन साथा॥नहिं बिषाद कर अवसरु आजू। बेगि करहु बन गवन समाजू॥॥२॥

कृपालु सूर्यवंश-नाथ राम ने कहा - चिंता छोड़ो, वन में मेरे साथ चलो। आज विषाद का अवसर नहीं है - शीघ्र वन-गमन की तैयारी करो।

कहि प्रिय बचन प्रिया समुझाई। लगे मातु पद आसिष पाई॥बेगि प्रजा दुख मेटब आई। जननी निठुर बिसरि जनि जाई॥॥३॥

प्रिय वचन कहकर राम ने प्रिया को समझाया, फिर वे माता के चरणों में आशीर्वाद लेने गए। राम बोले - मैं शीघ्र लौटकर प्रजा का दुख मिटाऊँगा, माता मुझे निष्ठुर समझकर भुला न देना।

फिरहि दसा बिधि बहुरि कि मोरी। देखिहउँ नयन मनोहर जोरी॥सुदिन सुघरी तात कब होइहि। जननी जिअत बदन बिधु जोइहि॥॥४॥

क्या विधाता फिर कभी मेरी यह दशा पलटेंगे, कि मैं फिर यह मनोहर नेत्र-युगल देख सकूँ? हे तात, वह शुभ, सुंदर दिन कब आएगा, जब यह माता जीवित रहते हुए तुम्हारा चंद्रमुख निहार सके?

दोहा

बहुरि बच्छ कहि लालु कहि रघुपति रघुबर तात।कबहिं बोलाइ लगाइ हियँ हरषि निरखिहउँ गात॥६८॥

फिर 'वत्स', 'लाल', 'रघुपति', 'रघुबर', 'तात' कहकर - न जाने कब मैं तुम्हें बुलाकर, हृदय से लगाकर हर्षित होकर तुम्हारा रूप निहार सकूँगी?

लखि सनेह कातरि महतारी। बचनु न आव बिकल भइ भारी॥राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना। समउ सनेहु न जाइ बखाना॥॥१॥

माता को स्नेह से इतना कातर और व्याकुल देखकर मुँह से वचन ही न निकलते थे। राम ने अनेक प्रकार से उन्हें समझाया - उस समय के स्नेह का वर्णन नहीं किया जा सकता।

तब जानकी सासु पग लागी। सुनिअ माय मैं परम अभागी॥सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा। मोर मनोरथु सफल न कीन्हा॥॥२॥

तब जानकी ने सास के चरण छूकर कहा - सुनिए माता, मैं अत्यंत अभागिन हूँ। आपकी सेवा के समय ही विधाता ने मुझे वनवास दे दिया - मेरा मनोरथ पूर्ण न हो सका।

तजब छोभु जनि छाड़िअ छोहू। करमु कठिन कछु दोसु न मोहू॥सुनि सिय बचन सासु अकुलानी। दसा कवनि बिधि कहौं बखानी॥॥३॥

आप विषाद त्याग दीजिए, पर मुझ पर से अपना स्नेह मत हटाइए - यह तो कठिन कर्मगति है, इसमें मेरा कोई दोष नहीं। सीता के ये वचन सुनकर सास व्याकुल हो उठीं - उनकी दशा कैसे वर्णन करूँ?

बारहि बार लाइ उर लीन्ही। धरि धीरजु सिख आसिष दीन्ही॥अचल होउ अहिवातु तुम्हारा। जब लगि गंग जमुन जल धारा॥॥४॥

बार-बार सीता को हृदय से लगाकर, धैर्य धारण करके सास ने उन्हें सीख और आशीर्वाद दिया - जब तक गंगा-यमुना की जलधारा बहती रहे, तब तक तुम्हारा सुहाग अचल बना रहे।

दोहा

सीतहि सासु असीस सिख दीन्हि अनेक प्रकार।चली नाइ पद पदुम सिरु अति हित बारहिं बार॥६९॥

सास ने सीता को अनेक प्रकार से आशीर्वाद और सीख दी, और वे बड़े प्रेम से बार-बार उनके चरण-कमलों में सिर नवाकर वहाँ से चल पड़ीं।

समाचार जब लछिमन पाए। ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए॥कंप पुलक तन नयन सनीरा। गहे चरन अति प्रेम अधीरा॥॥१॥

जब लक्ष्मण ने यह समाचार सुना, तो व्याकुल होकर उदास मुख लिए दौड़ पड़े। शरीर काँप रहा था, रोमांच हो आया, आँखें आँसुओं से भर गईं - अत्यंत प्रेम में अधीर होकर उन्होंने राम के चरण पकड़ लिए।

कहि न सकत कछु चितवत ठाढ़े। मीनु दीन जनु जल तें काढ़े॥सोचु हृदयँ बिधि का होनिहारा। सबु सुखु सुकृत सिरान हमारा॥॥२॥

वे कुछ कह नहीं पा रहे, बस खड़े देखते रह गए - मानो जल से निकाली गई मछली हो। मन में यही सोच थी - हे विधाता, अब क्या होने वाला है? क्या हमारा सारा सुख और पुण्य यहीं समाप्त हो गया?

मो कहुँ काह कहब रघुनाथा। रखिहहिं भवन कि लेहहिं साथा॥राम बिलोकि बंधु कर जोरें। देह गेह सब सन तृनु तोरें॥॥३॥

मुझे रघुनाथ क्या कहेंगे - घर पर रहने देंगे या साथ ले चलेंगे? राम ने देखा कि भाई लक्ष्मण हाथ जोड़े खड़े हैं, शरीर और घर से मानो सारा नाता तोड़ चुके हैं।

बोले बचनु राम नय नागर। सील सनेह सरल सुख सागर॥तात प्रेम बस जनि कदराहू। समुझि हृदयँ परिनाम उछाहू॥॥४॥

नीति में निपुण, शील-स्नेह और सरलता के सागर राम बोले - हे तात, प्रेमवश अधीर मत हो; हृदय में यह समझ लो कि इसका परिणाम कल्याणकारी ही होगा।

दोहा

मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहि सुभायँ।लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ॥७०॥

जो लोग माता-पिता, गुरु और स्वामी की सीख को स्वाभाविक रूप से शिरोधार्य कर उसका पालन करते हैं, उन्होंने ही जन्म लेने का सच्चा लाभ पाया है - नहीं तो संसार में जन्म लेना व्यर्थ ही है।

अस जियँ जानि सुनहु सिख भाई। करहु मातु पितु पद सेवकाई॥भवन भरतु रिपुसूदन नाहीं। राउ बृद्ध मम दुखु मन माहीं॥॥१॥

हे भाई, हृदय में यह बात समझकर मेरी सीख सुनो - माता-पिता के चरणों की सेवा करो। भरत और शत्रुघ्न घर पर नहीं हैं, पिताजी वृद्ध हैं, और उनके मन में मेरे वियोग का दुख है।

मैं बन जाउँ तुम्हहि लेइ साथा। होइ सबहि बिधि अवध अनाथा॥गुरु पितु मातु प्रजा परिवारू। सब कहुँ परइ दुसह दुख भारू॥॥२॥

यदि मैं तुम्हें भी साथ लेकर वन चला जाऊँ, तो अयोध्या हर तरह से अनाथ हो जाएगी। गुरु, पिता, माता, प्रजा और परिवार - सभी पर असहनीय दुख का भार पड़ेगा।

रहहु करहु सब कर परितोषू। नतरु तात होइहि बड़ दोषू॥जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृपु अवसि नरक अधिकारी॥॥३॥

इसलिए तुम यहीं रहो और सबको संतोष दो, नहीं तो हे तात, बड़ा दोष लगेगा - जिस राजा के राज्य में प्रिय प्रजा दुखी रहती है, वह अवश्य ही नरक का भागी होता है।

रहहु तात असि नीति बिचारी। सुनत लखनु भए ब्याकुल भारी॥सिअरें बचन सूखि गए कैंसें। परसत तुहिन तामरसु जैसें॥॥४॥

हे तात, ऐसी नीति सोचकर तुम घर ही रह जाओ - यह सुनते ही लक्ष्मण बुरी तरह व्याकुल हो उठे, मानो पाले के स्पर्श से कमल मुरझा जाए, वैसे ही ये शीतल वचन सुनकर वे सूख से गए।

दोहा

उतरु न आवत प्रेम बस गहे चरन अकुलाइ।नाथ दासु मैं स्वामि तुम्ह तजहु त काह बसाइ।॥७१॥

प्रेमवश लक्ष्मण से कोई उत्तर देते नहीं बना - उन्होंने व्याकुल होकर राम के चरण पकड़ लिए और कहा - हे नाथ, मैं दास हूँ और आप स्वामी हैं; अब आप मुझे त्याग ही दें तो मेरा क्या वश चलेगा?

दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं। लागि अगम अपनी कदराईं॥नरबर धीर धरम धुर धारी। निगम नीति कहुँ ते अधिकारी॥॥१॥

हे स्वामी, आपने मुझे सीख तो बहुत अच्छी दी, पर मेरी कायरता के कारण वह मेरी पहुँच से बाहर लगती है। शास्त्र और नीति के वे ही अधिकारी हैं जो धीर हों और धर्म की धुरी थामे रहें।

मैं सिसु प्रभु सनेहँ प्रतिपाला। मंदरु मेरु कि लेहिं मराला॥गुर पितु मातु न जानउँ काहू। कहउँ सुभाउ नाथ पतिआहू॥॥२॥

मैं तो प्रभु के स्नेह में पला हुआ बालक हूँ - क्या कहीं हंस मंदराचल या सुमेरु पर्वत उठा सकते हैं? हे नाथ, सच कहता हूँ, विश्वास कीजिए - आपके सिवा मैं गुरु, पिता, माता किसी को नहीं जानता।

जहँ लगि जगत सनेह सगाई। प्रीति प्रतीति निगम निजु गाई॥मोरें सबइ एक तुम्ह स्वामी। दीनबंधु उर अंतरजामी॥॥३॥

संसार में जहाँ तक स्नेह का नाता, प्रेम और विश्वास है, जिसे वेदों ने स्वयं गाया है - हे स्वामी, हे दीनबंधु, हे अंतर्यामी, मेरे लिए तो बस आप ही सब कुछ हैं।

धरम नीति उपदेसिअ ताही। कीरति भूति सुगति प्रिय जाही॥मन क्रम बचन चरन रत होई। कृपासिंधु परिहरिअ कि सोई॥॥४॥

धर्म और नीति का उपदेश तो उसे देना चाहिए जिसे कीर्ति, वैभव या सद्गति प्रिय हो। पर जो मन-वचन-कर्म से केवल चरणों में अनुरक्त हो, हे कृपासिंधु, क्या उसे भी त्यागा जा सकता है?

दोहा

करुनासिंधु सुबंध के सुनि मृदु बचन बिनीत।समुझाए उर लाइ प्रभु जानि सनेहँ सभीत॥७२॥

करुणासिंधु राम ने भले भाई के ये कोमल, विनम्र वचन सुने, और उन्हें स्नेह के कारण भयभीत जानकर हृदय से लगाकर समझाया।

मागहु बिदा मातु सन जाई। आवहु बेगि चलहु बन भाई॥मुदित भए सुनि रघुबर बानी। भयउ लाभ बड़ गइ बड़ि हानी॥॥१॥

जाकर माता से विदा माँग आओ और जल्दी वन को चलो! रघुकुल-श्रेष्ठ राम की यह वाणी सुनकर लक्ष्मण आनंदित हो उठे - बड़ी हानि टल गई और बड़ा लाभ हो गया।

हरषित हृदय मातु पहिं आए। मनहुँ अंध फिरि लोचन पाए॥जाइ जननि पग नायउ माथा। मनु रघुनंदन जानकि साथा॥॥२॥

वे हर्षित हृदय से माता सुमित्रा के पास आए, मानो किसी अंधे को फिर से नेत्र मिल गए हों। जाकर माता के चरणों में मस्तक नवाया, पर मन तो राम और जानकी के साथ ही लगा था।

पूँछे मातु मलिन मन देखी। लखन कही सब कथा बिसेषी॥गई सहमि सुनि बचन कठोरा। मृगी देखि दव जनु चहु ओरा॥॥३॥

माता ने उनका उदास मन देखकर कारण पूछा, तो लक्ष्मण ने सारी बात विस्तार से कह सुनाई। कठोर वचन सुनते ही सुमित्रा ऐसे सहम गईं जैसे चारों ओर दावानल देखकर हिरनी सहम जाती है।

लखन लखेउ भा अनरथ आजू। एहिं सनेह बस करब अकाजू॥मागत बिदा सभय सकुचाहीं। जाइ संग बिधि कहिहि कि नाहीं॥॥४॥

लक्ष्मण को लगा कि अब बड़ा अनर्थ हो गया - माता स्नेहवश कहीं काम ही न बिगाड़ दें! इसलिए विदा माँगते हुए वे डर और संकोच से सिकुड़ रहे थे, मन में सोच रहे थे - माता साथ चलने को कहेंगी या नहीं।

दोहा

समुझि सुमित्राँ राम सिय रूप सुसीलु सुभाउ।नृप सनेहु लखि धुनेउ सिरु पापिनि दीन्ह कुदाउ॥७३॥

सुमित्रा ने राम-सीता के रूप, सुंदर शील और स्वभाव को समझकर, और राजा के उनके प्रति स्नेह को देखकर सिर पीट लिया - पापिन कैकेयी ने कैसा घात लगाया है।

धीरजु धरेउ कुअवसर जानी। सहज सुह्द बोली मृदु बानी॥तात तुम्हारि मातु बैदेही। पिता रामु सब भाँति सनेही॥॥१॥

पर असमय जानकर उन्होंने धैर्य धारण किया, और स्वभाव से ही हितैषी सुमित्रा कोमल वाणी में बोलीं - हे तात, जानकी तुम्हारी माता हैं और सब भाँति स्नेह करने वाले राम तुम्हारे पिता हैं।

अवध तहाँ जहँ राम निवासू। तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू॥जौं पै सीय रामु बन जाहीं। अवध तुम्हार काजु कछु नाहीं॥॥२॥

जहाँ राम का निवास हो, वहीं अयोध्या है; जहाँ सूर्य का प्रकाश हो, वहीं दिन है। यदि सच में सीता-राम वन जा रहे हैं, तो अयोध्या में तुम्हारा अब कोई काम नहीं रह गया।

गुर पितु मातु बंधु सुर साई। सेइअहिं सकल प्रान की नाईं॥रामु प्रानप्रिय जीवन जी के। स्वारथ रहित सखा सबही के॥॥३॥

गुरु, पिता, माता, भाई, देवता और स्वामी - इन सबकी सेवा प्राणों के समान करनी चाहिए। और राम तो प्राणों से भी प्रिय हैं, हृदय के जीवन हैं, सबके निःस्वार्थ सखा हैं।

पूजनीय प्रिय परम जहाँ तें। सब मानिअहिं राम के नातें॥अस जियँ जानि संग बन जाहू। लेहु तात जग जीवन लाहू॥॥४॥

संसार में जो भी पूजनीय और परम प्रिय हैं, वे सब राम के नाते ही ऐसे माने जाते हैं। हृदय में यह जानकर, हे तात, उनके साथ वन जाओ और जीवन का सच्चा लाभ उठाओ।

दोहा

भूरि भाग भाजनु भयहु मोहि समेत बलि जाउँ।जौम तुम्हरें मन छाड़ि छलु कीन्ह राम पद ठाउँ॥७४॥

मैं तुम पर बलिहारी जाती हूँ - मेरे साथ तुम भी बड़े भाग्यशाली हुए, कि तुम्हारे मन ने छल त्यागकर राम के चरणों में स्थान पा लिया है।

पुत्रवती जुबती जग सोई। रघुपति भगतु जासु सुतु होई॥नतरु बाँझ भलि बादि बिआनी। राम बिमुख सुत तें हित जानी॥॥१॥

संसार में वही स्त्री सच्ची माता है जिसका पुत्र राम का भक्त हो। नहीं तो जो पुत्र राम से विमुख हो, उसमें अपना हित माननेवाली स्त्री तो बाँझ रहना ही बेहतर - उसका जन्म देना पशु के प्रसव जैसा ही व्यर्थ है।

तुम्हरेहिं भाग रामु बन जाहीं। दूसर हेतु तात कछु नाहीं॥सकल सुकृत कर बड़ फलु एहू। राम सीय पद सहज सनेहू॥॥२॥

तुम्हारे ही भाग्य से राम वन जा रहे हैं, हे तात, दूसरा कोई कारण नहीं। सारे पुण्यों का सबसे बड़ा फल यही है कि सीता-राम के चरणों में स्वाभाविक प्रेम बना रहे।

राग रोषु इरिषा मदु मोहू। जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू॥सकल प्रकार बिकार बिहाई। मन क्रम बचन करेहु सेवकाई॥॥३॥

राग, द्वेष, ईर्ष्या, मद और मोह - इनके वश स्वप्न में भी मत होना। इन सब विकारों को त्यागकर मन, वचन और कर्म से सीता-राम की सेवा करना।

तुम्ह कहुँ बन सब भाँति सुपासू। सँग पितु मातु रामु सिय जासू॥जेहिं न रामु बन लहहिं कलेसू। सुत सोइ करेहु इहइ उपदेसू॥॥४॥

वन में तुम्हें हर तरह से सुख ही मिलेगा, क्योंकि साथ में राम और सीता रूपी माता-पिता हैं। पुत्र, बस यही करना जिससे राम को वन में कोई कष्ट न हो - यही मेरा उपदेश है।

छंद

उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं।पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं॥तुलसी प्रभुहि सिख देइ आयसु दीन्ह पुनि आसिष दई।रति होउ अबिरल अमल सिय रघुबीर पद नित नित नई॥

हे तात, मेरा यही उपदेश है कि तुम्हारे कारण राम और सीता को वन में सुख मिले, और वे पिता-माता, प्रिय परिवार तथा नगर के सुखों की याद भूल जाएँ। तुलसीदास कहते हैं कि सुमित्रा ने अपने प्रभु लक्ष्मण को यों सीख देकर वन जाने की आज्ञा दी, फिर आशीर्वाद दिया कि सीता-राम के चरणों में तुम्हारा निर्मल प्रेम नित नया बना रहे।

सोरठा

मातु चरन सिरु नाइ चले तुरत संकित हृदयँ।बागुर बिषम तोराइ मनहुँ भाग मृगु भाग बस।॥७५॥

माता के चरणों में सिर नवाकर, हृदय में सशंकित हुए लक्ष्मण तुरंत ऐसे चल पड़े जैसे भाग्यवश कोई हिरन कठिन फंदा तुड़ाकर भाग निकला हो।

गए लखनु जहँ जानकिनाथू। भे मन मुदित पाइ प्रिय साथू॥बंदि राम सिय चरन सुहाए। चले संग नृपमंदिर आए॥॥१॥

लक्ष्मण जहाँ जानकीनाथ थे वहाँ पहुँचे, प्रिय का साथ पाकर मन में बहुत प्रसन्न हुए। राम-सीता के सुंदर चरणों की वंदना करके वे उनके साथ राजभवन की ओर चल पड़े।

कहहिं परसपर पुर नर नारी। भलि बनाइ बिधि बात बिगारी॥तन कृस मन दुखु बदन मलीने। बिकल मनहुँ माखी मधु छीने॥॥२॥

नगर के स्त्री-पुरुष आपस में कहने लगे - विधाता ने खूब बनाकर भी बात बिगाड़ दी! उनके शरीर दुबले, मन दुखी और मुख उदास हो रहे थे - मानो शहद छिन जाने पर मधुमक्खियाँ व्याकुल हों।

कर मीजहिं सिरु धुनि पछिताहीं। जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं॥भइ बड़ि भीर भूप दरबारा। बरनि न जाइ बिषादु अपारा॥॥३॥

सब हाथ मल रहे थे, सिर पीट-पीटकर पछता रहे थे, मानो बिना पंख के पक्षी व्याकुल हों। राजद्वार पर भारी भीड़ जुट आई थी - वहाँ का अपार विषाद वर्णन से परे था।

सचिवँ उठाइ राउ बैठारे। कहि प्रिय बचन रामु पगु धारे॥सिय समेत दोउ तनय निहारी। ब्याकुल भयउ भूमिपति भारी॥॥४॥

मंत्री ने 'राम पधार रहे हैं' यह प्रिय समाचार सुनाकर राजा को उठाकर बैठाया। सीता सहित दोनों पुत्रों को वन-गमन के वेश में देखकर राजा बहुत व्याकुल हो उठे।

दोहा

सीय सहित सुत सुभग दोउ देखि देखि अकुलाइ।बारहिं बार सनेह बस राउ लेइ उर लाइ॥७६॥

सीता सहित दोनों सुंदर पुत्रों को देख-देखकर राजा अकुला उठते, और स्नेहवश बार-बार उन्हें हृदय से लगा लेते।

सकइ न बोलि बिकल नरनाहू। सोक जनित उर दारुन दाहू॥नाइ सीसु पद अति अनुरागा। उठि रघुबीर बिदा तब मागा॥॥१॥

राजा व्याकुल थे, बोल नहीं पा रहे थे - हृदय में शोक से उपजी भयंकर जलन थी। तब रघुवीर राम अत्यंत प्रेम से चरणों में सिर नवाकर उठे और विदा माँगी -

पितु असीस आयसु मोहि दीजै। हरष समय बिसमउ कत कीजै॥तात किए प्रिय प्रेम प्रमादू। जसु जग जाइ होइ अपबादू॥॥२॥

पिताजी, मुझे आशीर्वाद और आज्ञा दीजिए - हर्ष के इस समय आप विषाद क्यों कर रहे हैं? हे तात, प्रिय के प्रेमवश यदि कर्तव्य में चूक हो जाए, तो जगत में यश जाता रहेगा और निंदा होगी।

सुनि सनेह बस उठि नरनाहाँ। बैठारे रघुपति गहि बाहाँ॥सुनहु तात तुम्ह कहुँ मुनि कहहीं। रामु चराचर नायक अहहीं॥॥३॥

यह सुनकर राजा स्नेहवश उठे और राम की बाँह पकड़कर उन्हें बिठा लिया - बोले, सुनो तात, तुम्हारे विषय में मुनिजन कहते हैं कि तुम ही चराचर के स्वामी हो।

सुभ अरु असुभ करम अनुहारी। ईस देइ फलु हृदय बिचारी॥करइ जो करम पाव फल सोई। निगम नीति असि कह सबु कोई॥॥४॥

शुभ और अशुभ कर्मों के अनुसार ही ईश्वर हृदय में विचारकर फल देता है - जो जैसा कर्म करता है वैसा ही फल पाता है, वेद की यही नीति सब कहते हैं।

दोहा

औरु करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु।अति बिचित्र भगवंत गति को जग जाने जोगु॥७७॥

पर अपराध कोई और करे और उसका फल कोई और भोगे - भगवान की लीला बड़ी विचित्र है, इसे जानने योग्य इस जगत में कौन है?

राय राम राखन हित लागी। बहुत उपाय किए छलु त्यागी॥लखी राम रुख रहत न जाने। धरम धुरंधर धीर सयाने॥॥१॥

राजा ने राम को रोकने के लिए छल त्यागकर बहुत उपाय किए। पर जब उन्होंने धर्मधुरंधर, धीर और सयाने राम का दृढ़ रुख देख लिया और समझ गए कि वे रुकनेवाले नहीं,

तब नृप सीय लाइ उर लीन्ही। अति हित बहुत भाँति सिख दीन्ही॥कहि बन के दुख दुसह सुनाए। सासु ससुर पितु सुख समुझाए॥॥२॥

तब राजा ने सीता को हृदय से लगा लिया और बड़े प्रेम से बहुत तरह की सीख दी। वन के असहनीय दुखों का वर्णन किया, फिर सास-ससुर और पिता के यहाँ रहने के सुख समझाए।

सिय मनु राम चरन अनुरागा। घरु न सुगमु बनु बिषमु न लागा॥औरउ सबहिं सीय समुझाई। कहि कहि बिपिन बिपति अधिकाई॥॥३॥

पर सीता का मन तो राम के चरणों में ही रमा था, इसलिए न उन्हें घर सुगम लगा न वन कठिन। फिर सबने मिलकर वन की विपत्तियाँ बढ़ा-चढ़ाकर बताईं और सीता को समझाने का प्रयत्न किया।

सचिव नारि गुर नारि सयानी। सहित सनेह कहहिं मृदु बानी॥तुम्ह कहुँ तौ न दीन्ह बनबासू। करहु जो कहहिं ससुर गुर सासू॥॥४॥

मंत्री सुमंत्र की पत्नी, गुरु वसिष्ठ की पत्नी अरुंधती और अन्य सुजान स्त्रियाँ स्नेहपूर्वक कोमल वाणी में कहती हैं - तुम्हें तो वनवास मिला नहीं है, इसलिए ससुर, गुरु और सास जो कहें वही करो।

दोहा

सिख सीतलि हित मधुर मृदु सुनि सीतहि न सोहानि।सरद चंद चंदनि लगत जनु चकई अकुलानि॥७८॥

यह शीतल, हितकर, मधुर और कोमल सीख सुनकर भी सीता को अच्छी नहीं लगी - मानो शरद की चाँदनी पाकर चकवी व्याकुल हो उठे, वैसे ही वे व्याकुल हो उठीं।

सीय सकुच बस उतरु न देई। सो सुनि तमकि उठी कैकेई॥मुनि पट भूषन भाजन आनी। आगें धरि बोली मृदु बानी॥॥१॥

सीता संकोचवश कोई उत्तर नहीं दे पातीं। यह देखकर कैकेयी तमककर उठ खड़ी हुई - मुनियों के वस्त्र, आभूषण और पात्र लाकर राम के आगे रख दिए और कोमल वाणी में बोली -

नृपहि प्रान प्रिय तुम्ह रघुबीरा। सील सनेह न छाड़िहि भीरा॥सुकृत सुजसु परलोकु नसाऊ। तुम्हहि जान बन कहिहि न काऊ॥॥२॥

हे रघुवीर, राजा को तुम प्राणों के समान प्रिय हो - प्रेमवश दुर्बल हृदय के राजा शील और स्नेह नहीं छोड़ेंगे, चाहे पुण्य, यश और परलोक नष्ट हो जाए, पर वे तुम्हें वन जाने को कभी नहीं कहेंगे।

अस बिचारि सोइ करहु जो भावा। राम जननि सिख सुनि सुखु पावा॥भूपहि बचन बानसम लागे। करहिं न प्रान पयान अभागे॥॥३॥

ऐसा सोचकर जो तुम्हें अच्छा लगे वही करो। यह सीख सुनकर राम को सुख हुआ, पर राजा को ये वचन बाण जैसे लगे - वे मन में सोचने लगे, अभागे प्राण अब भी क्यों नहीं निकल जाते!

लोग बिकल मुरुछित नरनाहू। काह करिअ कछु सूझ न काहू॥रामु तुरत मुनि बेषु बनाई। चले जनक जननिहि सिरु नाई॥॥४॥

लोग व्याकुल और मूर्छित हो उठे, राजा को क्या करें कुछ सूझ ही नहीं रहा था। राम तुरंत मुनि का वेश धारण कर, माता-पिता को सिर नवाकर चल पड़े।

दोहा

सजि बन साजु समाजु सबु बनिता बंधु समेत।बंदि बिप्र गुर चरन प्रभु चले करि सबहि अचेत॥७९॥

वन की सारी सामग्री सजाकर, सीता और लक्ष्मण सहित राम ब्राह्मणों और गुरु के चरणों की वंदना करके, सबको अचेत छोड़कर चल दिए।

निकसि बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े। देखे लोग बिरह दव दाढ़े॥कहि प्रिय बचन सकल समुझाए। बिप्र बृंद रघुबीर बोलाए॥॥१॥

राजमहल से निकलकर राम वसिष्ठ के द्वार पर आ खड़े हुए और देखा कि सब लोग विरह की आग में जल रहे हैं। प्रिय वचन कहकर सबको समझाया, फिर ब्राह्मणों की मंडली बुलाई।

गुर सन कहि बरषासन दीन्हे। आदर दान बिनय बस कीन्हे॥जाचक दान मान संतोषे। मीत पुनीत प्रेम परितोषे॥॥२॥

गुरु से कहकर उन सबको वर्षभर का भोजन दिलवाया, और आदर, दान तथा विनय से उन्हें संतुष्ट किया। याचकों को दान-मान देकर तृप्त किया और मित्रों को पवित्र प्रेम से प्रसन्न किया।

दासीं दास बोलाइ बहोरी। गुरहि सौंपि बोले कर जोरी॥सब के सार सँभार गोसाईं। करबि जनक जननी की नाई॥॥३॥

फिर दास-दासियों को बुलाकर गुरु को सौंपते हुए हाथ जोड़कर बोले - हे गुरुदेव, इन सबकी देखभाल माता-पिता की तरह करते रहिएगा।

बारहिं बार जोरि जुग पानी। कहत रामु सब सन मृदु बानी॥सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जेहि तें रहे भुआल सुखारी॥॥४॥

बार-बार दोनों हाथ जोड़कर राम सबसे कोमल वाणी में कहते हैं कि मेरा सच्चा हितैषी वही होगा जिसके कारण महाराज सुखी रहें।

दोहा

मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न होहिं दुख दीन।सोइ उपाउ तुम्ह करेहु सब पुर जन परम प्रबीन॥८०॥

हे परम बुद्धिमान पुरवासियो, आप सब वही उपाय करना जिससे मेरी सब माताएँ मेरे विरह से दुखी न हों।

एहि बिधि राम सबहि समुझावा। गुर पद पदुम हरषि सिरु नावा॥गनपती गौरि गिरीसु मनाई। चले असीस पाइ रघुराई॥॥१॥

इस तरह राम ने सबको समझाया और हर्षित होकर गुरु के चरण-कमलों में सिर नवाया। फिर गणेश, पार्वती और शिव को मनाकर, आशीर्वाद पाकर आगे बढ़े।

राम चलत अति भयउ बिषादू। सुनि न जाइ पुर आरत नादू॥कुसगुन लंक अवध अति सोकू। हरष बिषाद बिबस सुरलोकू॥॥२॥

राम के चलते ही बड़ा भारी विषाद छा गया - नगर का करुण क्रंदन सुना नहीं जाता। लंका में अपशकुन होने लगे, अयोध्या में गहरा शोक छाया, और देवलोक हर्ष और विषाद दोनों में डूब गया।

गइ मुरुछा तब भूपति जागे। बोलि सुमंत्रु कहन अस लागे॥रामु चले बन प्रान न जाहीं। केहि सुख लागि रहत तन माहीं॥॥३॥

मूर्छा टूटी तो राजा जागे, और सुमंत्र को बुलाकर कहने लगे - राम वन चले गए, पर मेरे प्राण नहीं जा रहे, न जाने किस सुख के लिए यह शरीर अब भी टिका है।

एहि तें कवन ब्यथा बलवाना। जो दुखु पाइ तजहिं तनु प्राना॥पुनि धरि धीर कहइ नरनाहू। लै रथु संग सखा तुम्ह जाहू॥॥४॥

इससे बड़ी और कौन-सी व्यथा होगी जिसे पाकर भी प्राण देह नहीं छोड़ते? फिर धैर्य धरकर राजा ने कहा - हे सखा, रथ लेकर तुम भी राम के साथ जाओ।

दोहा

सुठि सुकुमार कुमार दोउ जनकसुता सुकुमारि।रथ चढ़ाइ देखराइ बनु फिरेहु गए दिन चारि॥८१॥

अत्यंत सुकुमार दोनों राजकुमारों और सुकुमारी जानकी को रथ पर चढ़ाकर, वन दिखलाकर चार दिन में लौट आना।

जौं नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई। सत्यसंध दृढ़ब्रत रघुराई॥तौ तुम्ह बिनय करेहु कर जोरी। फेरिअ प्रभु मिथिलेसकिसोरी॥॥१॥

यदि धैर्यवान दोनों भाई न लौटें - क्योंकि राम प्रण के सच्चे और दृढ़व्रती हैं - तो तुम हाथ जोड़कर विनती करना कि हे प्रभु, मिथिलेश-कुमारी सीता को ही लौटा दीजिए।

जब सिय कानन देखि डेराई। कहेहु मोरि सिख अवसरु पाई॥सासु ससुर अस कहेउ सँदेसू। पुत्रि फिरिअ बन बहुत कलेसू॥॥२॥

जब सीता वन देखकर डर जाएँ, तब मौका पाकर मेरी यह सीख उन्हें सुनाना कि सास-ससुर का संदेश है - बेटी, लौट चलो, वन में बहुत कष्ट है।

पितृगृह कबहुँ कबहुँ ससुरारी। रहेहु जहाँ रुचि होइ तुम्हारी॥एहि बिधि करेहु उपाय कदंबा। फिरइ त होइ प्रान अवलंबा॥॥३॥

कभी पिता के घर, कभी ससुराल, जहाँ तुम्हारी इच्छा हो वहीं रहना। इस तरह जो भी उपाय हो सके करना - सीता लौट आईं तो मेरे प्राणों को सहारा मिल जाएगा।

नाहिं त मोर मरनु परिनामा। कछु न बसाइ भए बिधि बामा॥अस कहि मुरुछि परा महि राऊ। रामु लखनु सिय आनि देखाऊ॥॥४॥

नहीं तो अंत में मेरी मृत्यु ही निश्चित है, विधाता के विपरीत होने पर किसी का कुछ वश नहीं चलता। ऐसा कहकर राजा मूर्छित होकर धरती पर गिर पड़े - राम, लक्ष्मण, सीता को लाकर दिखाओ।

दोहा

पाइ रजायसु नाइ सिरु रथु अति बेग बनाइ।गयउ जहाँ बाहेर नगर सीय सहित दोउ भाइ॥८२॥

सुमंत्र राजा की आज्ञा पाकर, सिर नवाकर, बड़ी फुर्ती से रथ जुड़वाकर वहाँ पहुँचे जहाँ नगर के बाहर सीता सहित दोनों भाई खड़े थे।

तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए। करि बिनती रथ रामु चढ़ाए॥चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई। चले हृदयँ अवधहि सिरु नाई॥॥१॥

सुमंत्र ने राजा के वचन राम को सुनाए और विनती करके उन्हें रथ पर चढ़ाया। सीता सहित दोनों भाई रथ पर सवार होकर, हृदय से अयोध्या को सिर नवाकर चल पड़े।

चलत रामु लखि अवध अनाथा। बिकल लोग सब लागे साथा॥कृपासिंधु बहुबिधि समुझावहिं। फिरहिं प्रेम बस पुनि फिरि आवहिं॥॥२॥

राम को जाते और अयोध्या को अनाथ होते देख सब लोग व्याकुल होकर साथ चल पड़े। करुणासिंधु राम उन्हें बहुत तरह समझाते हैं, तो वे लौट जाते हैं, पर प्रेमवश फिर पीछे आ जाते हैं।

लागति अवध भयावनि भारी। मानहुँ कालराति अँधिआरी॥घोर जंतु सम पुर नर नारी। डरपहिं एकहि एक निहारी॥॥३॥

अयोध्या बहुत भयावनी लगने लगी, मानो अंधकारमयी कालरात्रि हो। नगर के स्त्री-पुरुष भयानक जंतुओं की तरह एक-दूसरे को देखकर डर रहे थे।

घर मसान परिजन जनु भूता। सुत हित मीत मनहुँ जमदूता॥बागन्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं। सरित सरोवर देखि न जाहीं॥॥४॥

घर श्मशान जैसे लगते, परिजन भूत जैसे, पुत्र-हितैषी-मित्र मानो यमदूत। बगीचों में पेड़-बेलें मुरझा रही थीं, नदी-तालाब देखे नहीं जाते थे।

दोहा

हय गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक मोर।पिक रथांग सुक सारिका सारस हंस चकोर॥८३॥

करोड़ों घोड़े, हाथी, पाले हुए हिरन, नगर के पशु, पपीहे, मोर, कोयल, चकवे, तोते, मैना, सारस, हंस और चकोर -

राम बियोग बिकल सब ठाढ़े। जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े॥नगरु सफल बनु गहबर भारी। खग मृग बिपुल सकल नर नारी॥॥१॥

राम के वियोग में सब जहाँ-तहाँ चुपचाप खड़े रह गए, मानो चित्रों में खींचे गए हों। नगर मानो फलों से भरा घना वन था, और नगरवासी स्त्री-पुरुष उसमें बसे पशु-पक्षी।

बिधि कैकेई किरातिनि कीन्ही। जेहिं दव दुसह दसहुँ दिसि दीन्ही॥सहि न सके रघुबर बिरहागी। चले लोग सब ब्याकुल भागी॥॥२॥

विधाता ने कैकेयी को मानो भीलनी बना दिया, जिसने दसों दिशाओं में असह्य दावाग्नि लगा दी। राम के वियोग की इस आग को सहन न कर सब लोग व्याकुल होकर भाग चले।

सबहिं बिचार कीन्ह मन माहीं। राम लखन सिय बिनु सुखु नाहीं॥जहाँ रामु तहँ सबु समाजू। बिनु रघुबीर अवध नहिं काजू॥॥३॥

सबने मन में यही तय कर लिया - राम, लक्ष्मण, सीता के बिना कोई सुख नहीं। जहाँ राम वहीं सब कुछ, राम के बिना अयोध्या में हमारा कोई काम नहीं।

चले साथ अस मंत्रु दृढ़ाई। सुर दुर्लभ सुख सदन बिहाई॥राम चरन पंकज प्रिय जिन्हही। बिषय भोग बस करहिं कि तिन्हही॥॥४॥

यह विचार दृढ़ करके, देवताओं को भी दुर्लभ ऐसे सुखी घरों को छोड़कर सब राम के साथ चल पड़े। जिन्हें राम के चरण-कमल प्रिय हों, उन्हें भला विषय-भोग कभी बाँध सकते हैं?

दोहा

बालक बृद्ध बिहाइ गृह लगे लोग सब साथ।तमसा तीर निवासु किय प्रथम दिवस रघुनाथ॥८४॥

बच्चों और बूढ़ों को घर पर छोड़कर बाकी सब साथ हो लिए। पहले दिन राम ने तमसा नदी के तट पर विश्राम किया।

रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी। सदय हृदयँ दुखु भयउ बिसेषी॥करुनामय रघुनाथ गोसाँई। बेगि पाइअहिं पीर पराई॥॥१॥

प्रजा को प्रेमवश साथ आते देख राम के दयालु हृदय को गहरा दुख हुआ। करुणामय राम पराई पीड़ा को तुरंत अपना लेते हैं।

कहि सप्रेम मृदु बचन सुहाए। बहुबिधि राम लोग समुझाए॥किए धरम उपदेस घनेरे। लोग प्रेम बस फिरहिं न फेरे॥॥२॥

प्रेमभरे कोमल और मधुर वचन कहकर राम ने लोगों को कई तरह समझाया, बहुत धर्मोपदेश दिए - पर प्रेमवश लोग लौटाए नहीं लौटते।

सीलु सनेहु छाड़ि नहिं जाई। असमंजस बस भे रघुराई॥लोग सोग श्रम बस गए सोई। कछुक देवमायाँ मति मोई॥॥३॥

शील और स्नेह छोड़ा नहीं जा सकता - राम असमंजस में पड़ गए। शोक और थकान से लोग वहीं सो गए, और कुछ के मन देवमाया से भी मोहित हो गए।

जबहिं जाम जुग जामिनि बीती। राम सचिव सन कहेउ सप्रीती॥खोज मारि रथु हाँकहु ताता। आन उपाय बनिहि नहिं बाता॥॥४॥

जब दो पहर रात बीत गई, तो राम ने प्रेमपूर्वक मंत्री सुमंत्र से कहा - हे तात, रथ के पहियों के निशान छिपाकर हाँको, अब कोई और उपाय काम नहीं आएगा।

दोहा

राम लखन सिय जान चढ़ि संभु चरन सिरु नाइ।सचिव चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ॥८५॥

शिव के चरणों में सिर नवाकर राम, लक्ष्मण और सीता रथ पर सवार हुए। मंत्री ने तुरंत रथ को इधर-उधर पहिये के निशान छिपाते हुए हाँक दिया।

जागे सकल लोग भए भोरू। गे रघुनाथ भयउ अति सोरू॥रथ कर खोज कतहहुँ नहिं पावहिं। राम राम कहि चहु दिसि धावहिं॥॥१॥

सवेरा होते ही सब जाग उठे और बड़ा शोर मच गया कि राम चले गए। रथ का कहीं पता नहीं चलता, सब "राम राम" पुकारते हुए चारों दिशाओं में दौड़ते फिरते हैं।

मनहुँ बारिनिधि बूड़ जहाजू। भयउ बिकल बड़ बनिक समाजू॥एकहि एक देहिं उपदेसू। तजे राम हम जानि कलेसू॥॥२॥

मानो समुद्र में जहाज डूब गया हो और व्यापारियों का समूह व्याकुल हो उठा हो - वैसे ही सब एक-दूसरे को समझाते हैं कि राम ने हमें क्लेश होगा यह जानकर ही छोड़ दिया।

निंदहिं आपु सराहहिं मीना। धिग जीवनु रघुबीर बिहीना॥जौं पै प्रिय बियोगु बिधि कीन्हा। तौ कस मरनु न मागें दीन्हा॥॥३॥

वे अपनी निंदा करते और मछलियों की सराहना करते हैं - राम के बिना जीने को धिक्कार है! विधाता ने प्रिय का वियोग रचा तो माँगने पर मृत्यु क्यों न दी!

एहि बिधि करत प्रलाप कलापा। आए अवध भरे परितापा॥बिषम बियोगु न जाइ बखाना। अवधि आस सब राखहिं प्राना॥॥४॥

इस तरह विलाप करते हुए वे संताप से भरकर अयोध्या पहुँचे। उनके इस असह्य वियोग का वर्णन नहीं हो सकता - बस चौदह वर्ष की अवधि की आशा से ही प्राण थामे हुए हैं।

दोहा

राम दरस हित नेम ब्रत लगे करन नर नारि।मनहुँ कोक कोकी कमल दीन बिहीन तमारि॥८६॥

स्त्री-पुरुष राम के दर्शन के लिए नियम-व्रत करने लगे, और ऐसे व्याकुल हुए जैसे सूर्य के बिना चकवा-चकवी और कमल दुखी हो जाते हैं।

सीता सचिव सहित दोउ भाई। सृंगबेरपुर पहुँचे जाई॥उतरे राम देवसरि देखी। कीन्ह दंडवत हरषु बिसेषी॥॥१॥

सीता, सुमंत्र और दोनों भाई श्रृंगवेरपुर जा पहुँचे। वहाँ गंगा को देखकर राम रथ से उतरे और बड़े हर्ष से दंडवत प्रणाम किया।

लखन सचिवँ सियँ किए प्रनामा। सबहि सहित सुखु पायउ रामा॥गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला॥॥२॥

लक्ष्मण, सुमंत्र और सीता ने भी प्रणाम किया, सबके साथ राम को सुख मिला। गंगा समस्त आनंद-मंगल की जड़ हैं, सब सुख देनेवाली और सारी पीड़ा हरनेवाली हैं।

कहि कहि कोटिक कथा प्रसंगा। रामु बिलोकहिं गंग तरंगा॥सचिवहि अनुजहि प्रियहि सुनाई। बिबुध नदी महिमा अधिकाई॥॥३॥

कई कथा-प्रसंग सुनाते हुए राम गंगा की लहरों को निहारते रहे, और सुमंत्र, लक्ष्मण तथा सीता को देवनदी गंगा की महिमा सुनाई।

मज्जनु कीन्ह पंथ श्रम गयऊ। सुचि जलु पिअत मुदित मन भयऊ॥सुमिरत जाहि मिटइ श्रम भारू। तेहि श्रम यह लौकिक ब्यवहारू॥॥४॥

सबने स्नान किया, जिससे रास्ते की थकान मिट गई और शुद्ध जल पीते ही मन प्रसन्न हो उठा। जिनके स्मरण मात्र से बड़े-बड़े श्रम मिट जाते हैं, उन्हें स्वयं थकान लगना केवल लोक-व्यवहार है।

दोहा

सुध्द सचिदानंदमय कंद भानुकुल केतु।चरित करत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु॥८७॥

शुद्ध, सच्चिदानंदमय और सूर्यकुल के ध्वज राम मनुष्यों जैसे ही चरित्र करते हैं, जो संसार-सागर से पार उतरने के लिए पुल के समान हैं।

यह सुधि गुहँ निषाद जब पाई। मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई॥लिए फल मूल भेंट भरि भारा। मिलन चलेउ हियँ हरषु अपारा॥॥१॥

यह खबर पाकर निषादराज गुह ने आनंदित होकर अपने भाई-बंधुओं को बुलाया, फल-मूल की भेंट भरकर मिलने चल पड़ा - हृदय में हर्ष का कोई पार नहीं था।

करि दंडवत भेंट धरि आगें। प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागें॥सहज सनेह बिबस रघुराई। पूँछी कुसल निकट बैठाई॥॥२॥

दंडवत करके भेंट सामने रखकर वह अत्यंत प्रेम से प्रभु को निहारने लगा। स्वाभाविक स्नेह से भरे राम ने उसे पास बिठाकर कुशल पूछी।

नाथ कुसल पद पंकज देखें। भय भागभाजन जन लेखें॥देव धरनि धनु धामु तुम्हारा। मैं जनु नीचु सहित परिवारा॥॥३॥

निषादराज ने कहा - हे नाथ, आपके चरण-कमलों के दर्शन से ही कुशल है, आज मैं भाग्यवानों की गिनती में आ गया। हे देव, यह धरती, धन और घर सब आपका है, मैं तो परिवार सहित आपका ही सेवक हूँ।

कृपा करिअ पुर धारिअ पाऊ। थापिय जनु सबु लोगु सिहाऊ॥कहेहु सत्य सबु सखा सुजाना। मोहि दीन्ह पितु आयसु आना॥॥४॥

अब कृपा करके नगर में पधारिए और इस दास की प्रतिष्ठा बढ़ाइए, जिससे सब लोग मेरे भाग्य की सराहना करें। राम ने कहा - हे सुजान सखा, तुमने जो कहा सब सत्य है, पर पिता ने मुझे और ही आज्ञा दी है।

दोहा

बरष चारिदस बासु बन मुनि ब्रत बेषु अहारु।ग्राम बासु नहिं उचित सुनि गुहहि भयउ दुखु भारु॥८८॥

चौदह वर्ष वन में मुनियों का व्रत, वेश और आहार धारण करते हुए बिताने हैं - गाँव में रहना उचित नहीं है। यह सुनकर गुह को बड़ा दुख हुआ।

राम लखन सिय रूप निहारी। कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी॥ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे॥॥१॥

राम, लक्ष्मण और सीता का रूप देखकर गाँव के स्त्री-पुरुष प्रेम से आपस में कहते हैं - सखी, बताओ तो, कैसे होंगे वे माता-पिता जिन्होंने ऐसे सुंदर बालकों को वन भेज दिया!

एक कहहिं भल भूपति कीन्हा। लोयन लाहु हमहि बिधि दीन्हा॥तब निषादपति उर अनुमाना। तरु सिंसुपा मनोहर जाना॥॥२॥

कोई कहती है - राजा ने अच्छा ही किया, इसी बहाने विधाता ने हमें भी आँखों का लाभ दे दिया। तब निषादराज ने मन में सोचकर अशोक के मनोहर वृक्ष को उनके ठहरने योग्य समझा।

लै रघुनाथहि ठाउँ देखावा। कहेउ राम सब भाँति सुहावा॥पुरजन करि जोहारु घर आए। रघुबर संध्या करन सिधाए॥॥३॥

उसने राम को ले जाकर वह स्थान दिखाया, राम ने कहा - यह हर तरह से सुंदर है। पुरवासी जोहार करके अपने घर लौटे, और राम संध्या-वंदन करने चले गए।

गुहँ सँवारि साँथरी डसाई। कुस किसलयमय मृदुल सुहाई॥सुचि फल मूल मधुर मृदु जानी। दोना भरि भरि राखेसि पानी॥॥४॥

गुह ने कुश और कोमल पत्तों की सुंदर सेज बिछा दी, और पवित्र, मीठे फल-मूल छाँटकर दोनों में भर-भरकर पानी भी रख दिया।

दोहा

सिय सुमंत्र भ्राता सहित कंद मूल फल खाइ।सयन कीन्ह रघुबंसमनि पाय पलोटत भाइ॥८९॥

सीता, सुमंत्र और भाई लक्ष्मण सहित कंद-मूल-फल खाकर रघुकुलमणि राम लेट गए, और लक्ष्मण उनके पैर दबाने लगे।

उठे लखनु प्रभु सोवत जानी। कहि सचिवहि सोवन मृदु बानी॥कछुक दूरि सजि बान सरासन। जागन लगे बैठि बीरासन॥॥१॥

प्रभु को सोता जानकर लक्ष्मण उठे, मंत्री को कोमल वाणी में सोने को कहकर कुछ दूर धनुष-बाण सजाए वीरासन में बैठकर पहरा देने लगे।

गुँह बोलाइ पाहरू प्रतीती। ठावँ ठाँव राखे अति प्रीती॥आपु लखन पहिं बैठेउ जाई। कटि भाथी सर चाप चढ़ाई॥॥२॥

गुह ने विश्वासपात्र पहरेदारों को बुलाकर बड़े प्रेम से जगह-जगह नियुक्त किया, और स्वयं कमर में तरकस बाँधकर, धनुष पर बाण चढ़ाकर लक्ष्मण के पास जा बैठा।

सोवत प्रभुहि निहारि निषादू। भयउ प्रेम बस हृदय बिषादू॥तनु पुलकित जलु लोचन बहई। बचन सप्रेम लखन सन कहई॥॥३॥

प्रभु को धरती पर सोता देखकर निषादराज के हृदय में प्रेमवश विषाद उमड़ आया - शरीर पुलकित हो उठा, आँखों से जल बहने लगा, और वह प्रेम से भरकर लक्ष्मण से कहने लगा -

भूपति भवन सुभायँ सुहावा। सुरपति सदनु न पटतर पावा॥मनिमय रचित चारु चौबारे। जनु रतिपति निज हाथ सँवारे॥॥४॥

दशरथ का महल स्वभाव से ही इतना सुंदर है कि इंद्रलोक भी उसकी बराबरी नहीं कर सकता। उसमें मणियों से जड़े सुंदर चौबारे हैं, मानो कामदेव ने स्वयं अपने हाथों सजाए हों।

दोहा

सुचि सुबिचित्र सुभोगमय सुमन सुगंध सुबास।पलँग मंजु मनिदीप जहँ सब बिधि सकल सुपास॥९०॥

जो पवित्र, विलक्षण, सुख-सामग्री और फूलों की सुगंध से भरे हैं, जहाँ सुंदर पलंग और मणि-दीपक हैं और हर तरह का पूरा आराम है -

बिबिध बसन उपधान तुराई। छीर फेन मृदु बिसद सुहाई॥तहँ सिय रामु सयन निसि करहीं। निज छबि रति मनोज मदु हरहीं॥॥१॥

जहाँ अनेक वस्त्र, तकिए और गद्दे दूध के फेन जैसे कोमल, उज्ज्वल और सुंदर हैं - वहीं सीता-राम रात को सोया करते थे और अपनी शोभा से रति-कामदेव का गर्व हरते थे।

ते सिय रामु साथरीं सोए। श्रमित बसन बिनु जाहिं न जोए॥मातु पिता परिजन पुरबासी। सखा सुसील दास अरु दासी॥॥२॥

वही सीता-राम आज घास-फूस की सेज पर थके हुए, बिना वस्त्रों के सो रहे हैं - यह दृश्य देखा नहीं जाता। माता-पिता, परिजन, नगरवासी, मित्र, सुशील दास-दासियाँ -

जोगवहिं जिन्हहि प्रान की नाई। महि सोवत तेइ राम गोसाईं॥पिता जनक जग बिदित प्रभाऊ। ससुर सुरेस सखा रघुराऊ॥॥३॥

जिनकी सब प्राणों की तरह देखभाल करते थे, वही राम आज धरती पर सो रहे हैं - जिनके पिता जनक हैं, जिनका प्रभाव जगत में विख्यात है, जिनके ससुर इंद्र के मित्र दशरथ हैं,

रामचंदु पति सो बैदेही। सोवत महि बिधि बाम न केही॥सिय रघुबीर कि कानन जोगू। करम प्रधान सत्य कह लोगू॥॥४॥

और जिनके पति स्वयं राम हैं, वही सीता आज धरती पर सोई हैं - विधाता किसे प्रतिकूल नहीं होता! क्या सीता-राम सचमुच वन के योग्य थे? लोग ठीक ही कहते हैं कि कर्म ही प्रधान है।

दोहा

कैकयनंदिनि मंदमति कठिन कुटिलपनु कीन्ह।जेहिं रघुनंदन जानकिहि सुख अवसर दुखु दीन्ह॥९१॥

कैकेयी की बेटी नीच बुद्धि ने ऐसी कुटिलता की, जिसने राम और जानकी को सुख के समय ही दुख दे दिया।

भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी। कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी॥भयउ बिषादु निषादहि भारी। राम सीय महि सयन निहारी॥॥१॥

वह सूर्यवंश रूपी वृक्ष के लिए कुल्हाड़ी बन गई, उस कुबुद्धि ने सारे संसार को दुखी कर दिया। राम-सीता को धरती पर सोते देखकर निषाद को गहरा दुख हुआ।

बोले लखन मधुर मृदु बानी। ग्यान बिराग भगति रस सानी॥काहू न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत करम भोग सबु भ्राता॥॥२॥

तब लक्ष्मण ज्ञान, वैराग्य और भक्ति के रस में सने मीठे, कोमल वचन बोले - हे भाई, कोई किसी को सुख-दुख देने वाला नहीं है, सब अपने ही किए कर्मों का फल भोगते हैं।

जोग बियोग भोग भल मंदा। हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा॥जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू। संपति बिपति करमु अरु कालू॥॥३॥

संयोग-वियोग, अच्छे-बुरे भोग, मित्र-शत्रु-उदासीन - ये सब भ्रम के जाल हैं। जन्म-मृत्यु, संपत्ति-विपत्ति, कर्म और काल - जहाँ तक संसार का यह जंजाल फैला है,

धरनि धामु धनु पुर परिवारू। सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू॥देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं। मोह मूल परमारथु नाहीं॥॥४॥

धरती, घर, धन, नगर, परिवार, स्वर्ग-नरक - जो कुछ भी देखने-सुनने और मन में विचारने में आता है, इन सबकी जड़ में मोह ही है, परमार्थ से इनका कोई अस्तित्व नहीं।

दोहा

सपनें होइ भिखारि नृप रंकु नाकपति होइ।जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ॥९२॥

जैसे स्वप्न में भिखारी राजा बन जाए या कंगाल इंद्र बन जाए, तो जागने पर न कोई लाभ न हानि - वैसे ही इस संसार के दृश्य को समझना चाहिए।

अस बिचारि नहिं कीजिअ रोसू। काहुहि बादि न देइअ दोसू॥मोह निसाँ सबु सोवनिहारा। देखिअ सपन अनेक प्रकारा॥॥१॥

ऐसा समझकर क्रोध नहीं करना चाहिए, न किसी को व्यर्थ दोष देना चाहिए। सब मोह की रात में सोए हुए हैं, और सोते हुए उन्हें तरह-तरह के स्वप्न दिखते हैं।

एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच बियोगी॥जानिअ तबहिं जीव जग जागा। जब सब बिषय बिलास बिरागा॥॥२॥

इस संसार रूपी रात्रि में योगी ही जागते हैं, जो परमार्थी हैं और इस माया-जाल से मुक्त हैं। जीव तभी सच में जागा माना जाए जब उसे सारे भोग-विलासों से वैराग्य हो जाए।

होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा। तब रघुनाथ चरन अनुरागा॥सखा परम परमारथु एहू। मन क्रम बचन राम पद नेहू॥॥३॥

विवेक जागते ही मोह का यह भ्रम मिट जाता है, और तब राम के चरणों में सच्चा प्रेम उपजता है। हे सखा, मन-वचन-कर्म से राम के चरणों में यही प्रेम सबसे बड़ा परमार्थ है।

राम ब्रह्म परमारथ रूपा। अबिगत अलख अनादि अनूपा॥सकल बिकार रहित गतभेदा। कहि नित नेति निरूपहिं बेदा॥॥४॥

राम स्वयं परमार्थ-स्वरूप परब्रह्म हैं - अगोचर, अलक्ष्य, अनादि और अनुपम। वे सब विकारों से रहित और भेदरहित हैं, वेद जिन्हें सदा "नेति-नेति" कहकर ही निरूपित कर पाते हैं।

दोहा

भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल।करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहिं जग जाल॥९३॥

वही कृपालु राम भक्तों, भूमि, ब्राह्मणों, गौओं और देवताओं के हित के लिए मनुष्य-देह धारण कर लीलाएँ करते हैं, जिन्हें सुनने मात्र से संसार के बंधन कट जाते हैं।

सखा समुझि अस परिहरि मोहु। सिय रघुबीर चरन रत होहू॥कहत राम गुन भा भिनुसारा। जागे जग मंगल सुखदारा॥॥१॥

हे सखा, ऐसा समझकर मोह छोड़ो और सीता-राम के चरणों में अनुरक्त हो जाओ। इस तरह राम के गुण कहते-कहते सवेरा हो गया, और जगत का कल्याण करने वाले राम जाग उठे।

सकल सोच करि राम नहावा। सुचि सुजान बट छीर मगावा॥अनुज सहित सिर जटा बनाए। देखि सुमंत्र नयन जल छाए॥॥२॥

सारे नित्यकर्म पूरे करके राम ने स्नान किया, फिर बरगद का दूध मँगाकर लक्ष्मण सहित सिर पर जटाएँ बनाईं - यह देखकर सुमंत्र की आँखों में आँसू छलक आए।

हृदयँ दाहु अति बदन मलीना। कह कर जोरि बचन अति दीना॥नाथ कहेउ अस कोसलनाथा। लै रथु जाहु राम कें साथा॥॥३॥

उनका हृदय जलने लगा, मुख उदास हो गया, और हाथ जोड़कर वे बड़े दीन स्वर में बोले - हे नाथ, कोसलनाथ ने मुझे यही आज्ञा दी थी कि रथ लेकर राम के साथ जाऊँ,

बनु देखाइ सुरसरि अन्हवाई। आनेहु फेरि बेगि दोउ भाई॥लखनु रामु सिय आनेहु फेरी। संसय सकल सँकोच निबेरी॥॥४॥

वन दिखाकर, गंगा-स्नान कराकर दोनों भाइयों को जल्दी लौटा लाना, और लक्ष्मण, राम, सीता तीनों को सारी शंका-संकोच मिटाकर वापस ले आना।

दोहा

नृप अस कहेउ गोसाईं जस कहहु करौं बलि सोइ।करि बिनती पायन्ह परेउ दीन्ह बाल जिमि रोइ॥९४॥

महाराज ने ऐसा ही कहा था, अब प्रभु जैसा कहें मैं वही करूँगा, मैं आपकी बलिहारी हूँ - ऐसा कहकर सुमंत्र विनती करते हुए राम के चरणों में गिर पड़े और बालक की तरह रो पड़े।

तात कृपा करि कीजिअ सोई। जातें अवध अनाथ न होई॥मंत्रहि राम उठाइ प्रबोधा। तात धरम मतु तुम्ह सबु सोधा॥॥१॥

हे तात, कृपा करके वही कीजिए जिससे अयोध्या अनाथ न हो जाए। राम ने मंत्री को उठाकर धैर्य बँधाते हुए कहा - हे तात, आपने तो धर्म के सारे सिद्धांत छान डाले हैं।

सिबि दधीचि हरिचंद नरेसा। सहे धरम हित कोटि कलेसा॥रंतिदेव बलि भूप सुजाना। धरमु धरेउ सहि संकट नाना॥॥२॥

शिबि, दधीचि और राजा हरिश्चंद्र ने धर्म के लिए करोड़ों कष्ट सहे। बुद्धिमान रंतिदेव और बलि राजा ने भी अनेक संकट सहकर धर्म को कभी नहीं छोड़ा।

धरमु न दूसर सत्य समाना। आगम निगम पुरान बखाना॥मैं सोइ धरमु सुलभ करि पावा। तजें तिहूँ पुर अपजसु छावा॥॥३॥

वेद-शास्त्र-पुराण कहते हैं कि सत्य के समान कोई दूसरा धर्म नहीं। मैंने वह धर्म सहज ही पा लिया है - इसे त्यागने से तीनों लोकों में मेरा अपयश छा जाएगा।

संभावित कहुँ अपजस लाहू। मरन कोटि सम दारुन दाहू॥तुम्ह सन तात बहुत का कहऊँ। दिएँ उतरु फिरि पातकु लहऊँ॥॥४॥

प्रतिष्ठित पुरुष के लिए अपयश करोड़ों मृत्यु के समान भीषण संताप देने वाला है। हे तात, आपसे अधिक क्या कहूँ - लौटकर उत्तर देने में भी मैं पाप का भागी बनूँगा।

दोहा

पितु पद गहि कहि कोटि नति बिनय करब कर जोरि।चिंता कवनिहु बात के तात करिअ जनि मोरि॥९५॥

आप जाकर पिताजी के चरण पकड़कर करोड़ों बार नमन करते हुए, हाथ जोड़कर विनती करना कि हे तात, आप मेरी किसी बात की चिंता न करें।

तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरें। बिनती करउँ तात कर जोरें॥सब बिधि सोइ करतब्य तुम्हारें। दुख न पाव पितु सोच हमारें॥॥१॥

आप भी पिता के समान ही मेरे परम हितैषी हैं। हे तात, मैं हाथ जोड़कर विनती करता हूँ कि आपका भी यही कर्तव्य है कि पिताजी हमारे लिए सोच में दुखी न हों।

सुनि रघुनाथ सचिव संबादू। भयउ सपरिजन बिकल निषादू॥पुनि कछु लखन कही कटु बानी। प्रभु बरजे बड़ अनुचित जानी॥॥२॥

राम और सुमंत्र का यह संवाद सुनकर निषादराज कुटुंब सहित व्याकुल हो उठा। फिर लक्ष्मण ने कुछ कड़वी बात कही, पर प्रभु राम ने उसे अनुचित जानकर तुरंत रोक दिया।

सकुचि राम निज सपथ देवाई। लखन सँदेसु कहिअ जनि जाई॥कह सुमंत्रु पुनि भूप सँदेसू। सहि न सकिहि सिय बिपिन कलेसू॥॥३॥

राम ने संकोच से अपनी सौगंध दिलाकर सुमंत्र से कहा कि लक्ष्मण का यह संदेश आगे न कहना। सुमंत्र ने फिर राजा का संदेश सुनाया कि सीता वन का कष्ट सह नहीं सकेंगी।

जेहि बिधि अवध आव फिरि सीया। सोइ रघुबरहि तुम्हहि करनीया॥नतरु निपट अवलंब बिहीना। मैं न जिअब जिमि जल बिनु मीना॥॥४॥

इसलिए जिस तरह सीता अयोध्या लौट आएँ, तुम और राम वही उपाय करना। नहीं तो मैं बिल्कुल निराधार होकर वैसे ही मर जाऊँगा जैसे जल बिना मछली नहीं जीती।

दोहा

मइकें ससरें सकल सुख जबहिं जहाँ मनु मान।तँह तब रहिहि सुखेन सिय जब लगि बिपति बिहान॥९६॥

सीता के मायके और ससुराल दोनों जगह सब सुख हैं - जब तक यह विपत्ति नहीं टलती, तब तक वे जहाँ मन चाहे, सुख से रह सकती हैं।

बिनती भूप कीन्ह जेहि भाँती। आरति प्रीति न सो कहि जाती॥पितु सँदेसु सुनि कृपानिधाना। सियहि दीन्ह सिख कोटि बिधाना॥॥१॥

राजा ने जितनी दीनता और प्रेम से विनती की थी, वह वर्णन से परे है। कृपानिधान राम ने पिता का संदेश सुनकर सीता को अनेक प्रकार से सीख दी।

सासु ससुर गुर प्रिय परिवारू। फिरतु त सब कर मिटै खभारू॥सुनि पति बचन कहति बैदेही। सुनहु प्रानपति परम सनेही॥॥२॥

यदि तुम लौट जाओ तो सास-ससुर, गुरु और सब प्रियजनों की चिंता मिट जाए। पति के वचन सुनकर सीता कहती हैं - हे प्राणनाथ, हे परम स्नेही, सुनिए -

प्रभु करुनामय परम बिबेकी। तनु तजि रहति छाँह किमि छेंकी॥प्रभा जाइ कहँ भानु बिहाई। कहँ चंद्रिका चंदु तजि जाई॥॥३॥

हे प्रभु, आप करुणामय और परम विवेकी हैं - शरीर को छोड़कर छाया कहीं अलग रह सकती है भला? सूर्य को छोड़कर उसकी प्रभा, या चंद्रमा को छोड़कर चाँदनी कहीं जा सकती है?

पतिहि प्रेममय बिनय सुनाई। कहति सचिव सन गिरा सुहाई॥तुम्ह पितु ससुर सरिस हितकारी। उतरु देउँ फिरि अनुचित भारी॥॥४॥

पति को यह प्रेमभरी विनती सुनाकर सीता मंत्री से सुंदर वाणी में कहने लगीं - आप मेरे पिता और ससुर के समान ही हितैषी हैं, फिर भी आपको उत्तर देना मुझे बहुत अनुचित लग रहा है।

दोहा

आरति बस सनमुख भइउँ बिलगु न मानब तात।आरजसुत पद कमल बिनु बादि जहाँ लगि नात॥९७॥

पर हे तात, मैं व्याकुलतावश ही आपके सामने बोल पड़ी हूँ, बुरा मत मानिएगा - आर्यपुत्र के चरण-कमलों के बिना संसार का कोई भी नाता मेरे लिए व्यर्थ है।

पितु बैभव बिलास मैं डीठा। नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा॥सुखनिधान अस पितु गृह मोरें। पिय बिहीन मन भाव न भोरें॥॥१॥

मैंने पिता के ऐश्वर्य की शोभा देखी है, जिनके चरण रखने की चौकी पर बड़े-बड़े राजाओं के मुकुट झुकते हैं - ऐसा सुख-भंडार पिता का घर भी पति के बिना भूलकर भी मुझे नहीं भाता।

ससुर चक्कवइ कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ॥आगें होइ जेहि सुरपति लेई। अरध सिंघासन आसनु देई॥॥२॥

मेरे ससुर कोसल के चक्रवर्ती सम्राट हैं, जिनका प्रभाव चौदहों लोकों में प्रकट है - इंद्र स्वयं आगे बढ़कर उनका स्वागत करते हैं और अपने आधे सिंहासन पर बिठाते हैं।

ससुरु एतादृस अवध निवासू। प्रिय परिवारु मातु सम सासू॥बिनु रघुपति पद पदुम परागा। मोहि केउ सपनेहुँ सुखद न लागा॥॥३॥

ऐसे प्रतापी ससुर, अयोध्या का ऐसा वैभवशाली निवास, प्रिय परिजन और माता समान सासें - राम के चरण-कमलों की धूल के बिना इनमें से कुछ भी मुझे स्वप्न में भी सुखद नहीं लगता।

अगम पंथ बनभूमि पहारा। करि केहरि सर सरित अपारा॥कोल किरात कुरंग बिहंगा। मोहि सब सुखद प्रानपति संगा॥॥४॥

दुर्गम रास्ते, वन-भूमि, पहाड़, हाथी-सिंह, अथाह तालाब-नदियाँ, कोल-भील, हिरन-पक्षी - प्राणनाथ के साथ रहते हुए ये सब भी मुझे सुख ही देंगे।

दोहा

सासु ससुर सन मोरि हुँति बिनय करबि परि पायँ।मोर सोचु जनि करिअ कछु मैं बन सुखी सुभायँ॥९८॥

इसलिए सास-ससुर के चरणों में गिरकर मेरी ओर से विनती करना कि वे मेरी कोई चिंता न करें - मैं वन में स्वभाव से ही सुखी हूँ।

प्राननाथ प्रिय देवर साथा। बीर धुरीन धरें धनु भाथा॥नहिं मग श्रमु भ्रमु दुख मन मोरें। मोहि लगि सोचु करिअ जनि भोरें॥॥१॥

प्राणनाथ और प्रिय देवर दोनों वीर धनुष-तरकस लिए साथ हैं, इसलिए मुझे न रास्ते की थकान है, न कोई भ्रम, न मन में कोई दुख - आप मेरे लिए भूलकर भी चिंता न करें।

सुनि सुमंत्रु सिय सीतलि बानी। भयउ बिकल जनु फनि मनि हानी॥नयन सूझ नहिं सुनइ न काना। कहि न सकइ कछु अति अकुलाना॥॥२॥

सीता की यह शीतल वाणी सुनकर सुमंत्र ऐसे व्याकुल हो उठे जैसे साँप अपनी मणि खो बैठा हो - आँखों से कुछ सूझता नहीं, कानों से सुनाई नहीं देता, अत्यंत व्याकुल होकर वे कुछ कह ही नहीं पाते।

राम प्रबोधु कीन्ह बहु भाँति। तदपि होति नहिं सीतलि छाती॥जतन अनेक साथ हित कीन्हे। उचित उतर रघुनंदन दीन्हे॥॥३॥

राम ने उन्हें बहुत तरह समझाया, फिर भी उनकी छाती ठंडी न हुई। साथ चलने के लिए मंत्री ने कई उपाय सुझाए, पर रघुनंदन राम हर बार उचित उत्तर देते रहे।

मेटि जाइ नहिं राम रजाई। कठिन करम गति कछु न बसाई॥राम लखन सिय पद सिरु नाई। फिरेउ बनिक जिमि मूर गवाँई॥॥४॥

राम की आज्ञा टाली नहीं जा सकती, कर्म की गति बड़ी कठिन है, उस पर किसी का वश नहीं चलता। राम, लक्ष्मण और सीता के चरणों में सिर नवाकर सुमंत्र ऐसे लौटे जैसे कोई व्यापारी अपनी पूँजी गँवाकर लौटता है।

दोहा

रथु हाँकेउ हय राम तन हेरि हेरि हिहिनाहिं।देखि निषाद बिषादबस धुनहिं सीस पछिताहिं॥९९॥

सुमंत्र ने रथ हाँका, घोड़े राम की ओर देख-देखकर हिनहिनाने लगे। यह देखकर निषाद लोग विषाद से भरकर सिर पीट-पीटकर पछताने लगे।

जासु बियोग बिकल पसु ऐसे। प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें॥बरबस राम सुमंत्रु पठाए। सुरसरि तीर आपु तब आए॥॥१॥

जिनके वियोग में पशु तक इतने व्याकुल हैं, उनके वियोग में प्रजा और माता-पिता कैसे जी पाएँगे? राम ने बलपूर्वक सुमंत्र को लौटा दिया, फिर वे गंगा के तट पर आए।

मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना॥चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई॥॥२॥

राम ने केवट से नाव माँगी, पर वह नाव नहीं लाया - बोला, मैंने तुम्हारा भेद जान लिया है। तुम्हारे चरण-कमलों की धूल के बारे में सब कहते हैं कि वह मनुष्य बना देने वाली कोई जड़ी है,

छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई॥तरनिउ मुनि घरिनि होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई॥॥३॥

जिसके छूते ही पत्थर की शिला सुंदर स्त्री बन गई - काठ तो पत्थर से कठोर होता नहीं, मेरी नाव भी कहीं मुनि की पत्नी बन जाएगी और मेरी रोज़ी-रोटी की यही राह उजड़ जाएगी।

एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू। नहिं जानउँ कछु आन कबारू॥जौं प्रभु पार अवसि गा चहहू। मोहि पद पदुम पखारन कहहू॥॥४॥

मैं तो इसी नाव से अपना पूरा परिवार पालता हूँ, दूसरा कोई काम नहीं जानता। हे प्रभु, यदि आप अवश्य ही पार जाना चाहते हैं, तो पहले मुझे अपने चरण-कमल धोने दीजिए।

छंद

पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं।मोहि राम राउरि आन दसरथ सपथ सब साची कहौं॥बरु तीर मारहुँ लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं।तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं॥

हे नाथ, मैं चरण धोकर ही आपको नाव पर चढ़ाऊँगा, आपसे कोई उतराई नहीं चाहता। हे राम, मुझे आपकी और दशरथ की सौगंध है, मैं सच कहता हूँ। लक्ष्मण भले मुझे तीर मार दें, पर जब तक चरण धो न लूँ तब तक, हे तुलसीदास के स्वामी, हे कृपालु, आपको पार नहीं उतारूँगा।

सोरठा

सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे।बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन॥१००॥

केवट के प्रेम में लिपटे इन भोले-भाले वचनों को सुनकर करुणाधाम राम, जानकी और लक्ष्मण की ओर देखकर मुस्कुरा उठे।

कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोइ करु जेंहि तव नाव न जाई॥बेगि आनु जल पाय पखारू। होत बिलंबु उतारहि पारू॥॥१॥

कृपासिंधु राम मुस्कुराते हुए बोले - भाई, तू वही कर जिससे तेरी नाव सुरक्षित रहे। जल्दी पानी ला और मेरे पैर धो दे, देर हो रही है, अब पार उतार दे।

जासु नाम सुमिरत एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा॥सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा॥॥२॥

जिनका नाम एक बार स्मरण करते ही मनुष्य अपार भवसागर से पार हो जाते हैं, और जिन्होंने अपने ही तीन पगों में सारे जगत को नाप लिया था, वही कृपालु राम आज केवट से विनती कर रहे हैं!

पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी॥केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा॥॥३॥

प्रभु के इन वचनों से गंगा की बुद्धि मोहित हो गई, पर उनके चरणों के नखों को देखते ही वे पहचान गईं और हर्षित हो उठीं। केवट राम की आज्ञा पाकर कठौते में जल भरकर ले आया।

अति आनंद उमगि अनुरागा। चरन सरोज पखारन लागा॥बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं। एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं॥॥४॥

अपार आनंद और प्रेम में उमँगकर वह भगवान के चरण-कमल धोने लगा। सारे देवता फूल बरसाते हुए ईर्ष्या करने लगे कि इसके समान भाग्यशाली कोई नहीं।

दोहा

पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार।पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार॥१०१॥

चरण धोकर वह जल पीकर, अपने पूरे परिवार सहित पहले अपने पितरों को भवसागर से पार कर, फिर आनंदपूर्वक प्रभु को गंगा के पार ले गया।

उतरि ठाड़ भए सुरसरि रेता। सीयराम गुह लखन समेता॥केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा॥॥१॥

गुह और लक्ष्मण सहित सीता और राम नाव से उतरकर गंगा की रेत पर खड़े हो गए। केवट भी उतरकर दंडवत करने लगा, पर उसे कुछ न दे पाने के संकोच से प्रभु को झिझक हुई।

पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी॥कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई॥॥२॥

पति के हृदय की बात जाननेवाली सीता ने प्रसन्न मन से अपनी रत्नजड़ित अँगूठी उतार दी। कृपालु राम ने कहा - केवट, यह नाव की उतराई ले लो। केवट व्याकुल होकर उनके चरण पकड़ बैठा।

नाथ आजु मैं काह न पावा। मिटे दोष दुख दारिद दावा॥बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी। आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी॥॥३॥

बोला - हे नाथ, आज मैंने क्या नहीं पाया! मेरे दोष, दुख और दरिद्रता की आग आज बुझ गई। बरसों मजदूरी करता रहा, पर आज विधाता ने भरपूर मजदूरी दे दी।

अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीनदयाल अनुग्रह तोरें॥फिरती बार मोहि जे देबा। सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा॥॥४॥

अब मुझे कुछ और नहीं चाहिए, हे दीनदयाल, यह आपकी कृपा ही बहुत है। लौटते समय जो कुछ आप दें, वही प्रसाद मैं सिर चढ़ाकर लूँगा।

दोहा

बहुत कीन्ह प्रभु लखन सिय नहिं कछु केवटु लेइ।बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ॥१०२॥

प्रभु, लक्ष्मण और सीता ने बहुत आग्रह किया, पर केवट ने कुछ नहीं लिया। अंत में करुणा के धाम राम ने उसे निर्मल भक्ति का वरदान देकर विदा किया।

तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा। पूजि पारथिव नायउ माथा॥सिय सुरसरिहि कहेउ कर जोरी। मातु मनोरथ पुरउबि मोरी॥॥१॥

फिर रघुकुल के स्वामी राम ने स्नान करके पार्थिव-पूजा की और शिव को सिर नवाया। सीता ने हाथ जोड़कर गंगा से कहा - हे माता, मेरी यह मनोकामना पूरी कीजिए,

पति देवर संग कुसल बहोरी। आइ करौं जेहिं पूजा तोरी॥सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी। भइ तब बिमल बारि बर बानी॥॥२॥

कि पति और देवर के साथ कुशलपूर्वक लौटकर मैं तुम्हारी पूजा करूँ। सीता की प्रेमभरी विनती सुनकर तब गंगा के निर्मल जल से यह श्रेष्ठ वाणी गूँजी -

सुनु रघुबीर प्रिया बैदेही। तव प्रभाउ जग बिदित न केही॥लोकप होहिं बिलोकत तोरें। तोहि सेवहिं सब सिधि कर जोरें॥॥३॥

हे रघुवीर की प्रिया जानकी, सुनो, तुम्हारा प्रभाव किसे नहीं मालूम? तुम्हारी दृष्टि पड़ते ही लोग लोकपाल बन जाते हैं, सारी सिद्धियाँ हाथ जोड़े तुम्हारी सेवा करती हैं।

तुम्ह जो हमहि बड़ि बिनय सुनाई। कृपा कीन्हि मोहि दीन्हि बड़ाई॥तदपि देबि मैं देबि असीसा। सफल होन हित निज बागीसा॥॥४॥

तुमने मुझसे इतनी विनम्रता से विनती करके मुझ पर कृपा ही की है, मुझे बड़ाई दी है। फिर भी, हे देवी, मैं अपनी वाणी सफल करने के लिए तुम्हें आशीर्वाद देती हूँ -

दोहा

प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ।पूजहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ॥१०३॥

तुम अपने प्राणनाथ और देवर सहित कुशलपूर्वक अयोध्या लौटोगी, तुम्हारी सब मनोकामनाएँ पूरी होंगी और तुम्हारा सुयश जगत भर में फैलेगा।

गंग बचन सुनि मंगल मूला। मुदित सीय सुरसरि अनुकूला॥तब प्रभु गुहहि कहेउ घर जाहू। सुनत सूख मुखु भा उर दाहू॥॥१॥

गंगा के इन मंगलमय वचनों को सुनकर और उन्हें अनुकूल पाकर सीता प्रसन्न हो उठीं। तब राम ने गुह से कहा - अब तुम घर लौट जाओ। यह सुनते ही उसका मुँह सूख गया और हृदय में जलन उठी।

दीन बचन गुह कह कर जोरी। बिनय सुनहु रघुकुलमनि मोरी॥नाथ साथ रहि पंथु देखाई। करि दिन चारि चरन सेवकाई॥॥२॥

गुह हाथ जोड़कर दीन स्वर में बोला - हे रघुकुलमणि, मेरी विनती सुनिए। मुझे आपके साथ रहकर, रास्ता दिखाकर, कुछ दिन चरण-सेवा कर लेने दीजिए -

जेहिं बन जाइ रहब रघुराई। परनकुटी मैं करबि सुहाई॥तब मोहि कहँ जसि देब रजाई। सोइ करिहउँ रघुबीर दोहाई॥॥३॥

जिस वन में आप जाकर रहेंगे, वहाँ मैं सुंदर पर्णकुटी बना दूँगा। फिर आप जैसी आज्ञा देंगे, आपकी दुहाई, मैं वही करूँगा।

सहज सनेह राम लखि तासु। संग लीन्ह गुह हृदय हुलासू॥पुनि गुहँ ग्याति बोलि सब लीन्हे। करि परितोषु बिदा तब कीन्हे॥॥४॥

उसका यह सहज प्रेम देखकर राम ने उसे साथ ले लिया, जिससे गुह का हृदय आनंद से भर गया। फिर गुह ने अपने कुटुंबियों को बुलाकर, उन्हें संतुष्ट करके विदा किया।

दोहा

तब गनपति सिव सुमिरि प्रभु नाइ सुरसरिहि माथ।सखा अनुज सिय सहित बन गवनु कीन्ह रघुनाथ॥१०४॥

तब गणेश और शिव का स्मरण करके, गंगा को मस्तक नवाकर, सखा गुह, छोटे भाई लक्ष्मण और सीता सहित रघुनाथ वन की ओर चल पड़े।

तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू। लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू॥प्रात प्रातकृत करि रधुसाई। तीरथराजु दीख प्रभु जाई॥॥१॥

उस दिन एक पेड़ के नीचे विश्राम हुआ। लक्ष्मण और सखा गुह ने सारी व्यवस्था कर दी। सवेरे नित्यकर्म पूरे करके राम ने जाकर तीर्थराज प्रयाग के दर्शन किए।

सचिव सत्य श्रद्धा प्रिय नारी। माधव सरिस मीतु हितकारी॥चारि पदारथ भरा भँडारु। पुन्य प्रदेस देस अति चारु॥॥२॥

उस राजा (प्रयाग) का सत्य मंत्री है, श्रद्धा प्रिय पत्नी है, और वेणीमाधव जैसा हितैषी मित्र है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चारों फलों से उसका भंडार भरा है, और वह पुण्यभूमि ही उसका सुंदर देश है।

छेत्र अगम गढ़ गाढ़ सुहावा। सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा॥सेन सकल तीरथ बर बीरा। कलुष अनीक दलन रनधीरा॥॥३॥

प्रयाग क्षेत्र ही एक दुर्गम, मज़बूत और सुंदर किला है, जिसे पापरूपी शत्रु स्वप्न में भी नहीं पा सके। सभी तीर्थ ही उसके श्रेष्ठ रणधीर वीर सैनिक हैं, जो पाप की सेना को कुचल देते हैं।

संगमु सिंहासनु सुठि सोहा। छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा॥चवँर जमुन अरु गंग तरंगा। देखि होहिं दुख दारिद भंगा॥॥४॥

गंगा-यमुना-सरस्वती का संगम ही उसका शोभायमान सिंहासन है, अक्षयवट उसका छत्र है जो मुनियों तक का मन मोह लेता है। यमुना और गंगा की लहरें उसके चँवर हैं, जिन्हें देखते ही दुख-दरिद्रता मिट जाती है।

दोहा

सेवहिं सुकृती साधु सुचि पावहिं सब मनकाम।बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम॥१०५॥

पुण्यात्मा साधुजन उसकी सेवा करते हैं और सारी कामनाएँ पाते हैं। वेद और पुराण मानो भाट बनकर उसके निर्मल गुणों का बखान करते हैं।

को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ॥अस तीरथपति देखि सुहावा। सुख सागर रघुबर सुखु पावा॥॥१॥

प्रयाग का प्रभाव भला कौन बखान कर सके - वह पापरूपी हाथियों का संहार करने वाला सिंह है। ऐसे सुंदर तीर्थराज का दर्शन कर सुख के सागर राम ने भी सुख पाया।

कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई। श्रीमुख तीरथराज बड़ाई॥करि प्रनामु देखत बन बागा। कहत महातम अति अनुरागा॥॥२॥

उन्होंने अपने ही मुख से सीता, लक्ष्मण और सखा गुह को तीर्थराज की महिमा सुनाई। फिर प्रणाम करके, वन-बगीचे निहारते हुए और बड़े प्रेम से माहात्म्य कहते हुए -

एहि बिधि आइ बिलोकी बेनी। सुमिरत सकल सुमंगल देनी॥मुदित नहाइ कीन्हि सिव सेवा। पूजि जथाबिधि तीरथ देवा॥॥३॥

इस तरह आकर उन्होंने त्रिवेणी का दर्शन किया, जो स्मरण मात्र से ही सारे मंगल देती है। फिर आनंद से स्नान करके शिव की पूजा की और विधिपूर्वक तीर्थ-देवताओं का पूजन किया।

तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए। करत दंडवत मुनि उर लाए॥मुनि मन मोद न कछु कहि जाइ। ब्रह्मानंद रासि जनु पाई॥॥४॥

फिर प्रभु भरद्वाज मुनि के पास पहुँचे। मुनि ने दंडवत करते-करते ही उन्हें हृदय से लगा लिया - मुनि के मन का आनंद वर्णन से परे था, मानो उन्हें ब्रह्मानंद की राशि मिल गई हो।

दोहा

दीन्हि असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि।लोचन गोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि॥१०६॥

मुनिश्रेष्ठ भरद्वाज ने आशीर्वाद दिया, हृदय में यह जानकर अपार आनंद हुआ कि आज विधाता ने मानो उनके सारे पुण्यों का फल आँखों के सामने लाकर रख दिया हो।

कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे। पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे॥कंद मूल फल अंकुर नीके। दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के॥॥१॥

कुशल पूछकर मुनि ने उन्हें आसन दिए और प्रेमपूर्वक पूजा करके तृप्त किया। फिर मानो अमृत से बने हों, ऐसे सुंदर कंद-मूल-फल-अंकुर लाकर भेंट किए।

सीय लखन जन सहित सुहाए। अति रुचि राम मूल फल खाए॥भए बिगतश्रम रामु सुखारे। भरद्वाज मृदु बचन उचारे॥॥२॥

सीता, लक्ष्मण और सेवक गुह सहित राम ने बड़े चाव से वे मूल-फल खाए। थकान मिटने से राम प्रसन्न हो उठे, तब भरद्वाज कोमल वाणी में बोले -

दोहा

आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू। आजु सुफल जप जोग बिरागू।सफल सकल सुभ साधन साजू। राम तुम्हहि अवलोकत आजू॥॥३॥

हे राम, आज आपका दर्शन पाकर मेरा तप, तीर्थसेवन और त्याग सफल हो गया - आज मेरा जप, योग और वैराग्य सार्थक हुआ, और मेरे सारे शुभ साधनों का समूह भी आज सफल हो गया।

लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी। तुम्हारें दरस आस सब पूजी॥अब करि कृपा देहु बर एहू। निज पद सरसिज सहज सनेहू॥॥४॥

लाभ और सुख की सीमा आपके दर्शन के अलावा और कुछ नहीं - आपके दर्शन से मेरी सारी आशाएँ पूरी हो गईं। अब कृपा करके यह वरदान दे दीजिए कि आपके चरण-कमलों में मेरा सहज प्रेम बना रहे।

दोहा

करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार।तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार॥१०७॥

जब तक मन-वचन-कर्म से छल छोड़कर कोई सच में आपका न हो जाए, तब तक करोड़ों उपाय करने पर भी उसे स्वप्न में भी वह सुख नहीं मिलता।

सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने। भाव भगति आनंद अघाने॥तब रघुबर मुनि सुजसु सुहावा। कोटि भाँति कहि सबहि सुनावा॥॥१॥

मुनि के ये वचन सुनकर, भाव-भक्ति के आनंद से तृप्त राम संकोच से भर उठे। फिर उन्होंने भरद्वाज मुनि का सुंदर यश अनेक प्रकार से कहकर सबको सुनाया।

सो बड़ सो सब गुन गन गेहू। जेहि मुनीस तुम्ह आदर देहू॥मुनि रघुबीर परसपर नवहीं। बचन अगोचर सुखु अनुभवहीं॥॥२॥

वही बड़ा है, वही सब गुणों का घर है जिसे आप जैसा मुनि आदर दे। इस तरह राम और भरद्वाज दोनों परस्पर विनम्रता दिखाते हुए अनिर्वचनीय सुख का अनुभव करने लगे।

यह सुधि पाइ प्रयाग निवासी। बटु तापस मुनि सिद्ध उदासी॥भरद्वाज आश्रम सब आए। देखन दसरथ सुअन सुहाए॥॥३॥

यह खबर पाकर प्रयागवासी ब्रह्मचारी, तपस्वी, मुनि, सिद्ध और उदासी सब भरद्वाज के आश्रम में दशरथ के सुंदर पुत्रों को देखने आए।

राम प्रनाम कीन्ह सब काहू। मुदित भए लहि लोयन लाहू॥देहिं असीस परम सुखु पाई। फिरे सराहत सुंदरताई॥॥४॥

राम ने सबको प्रणाम किया, सब नेत्रों का लाभ पाकर आनंदित हुए और आशीर्वाद देने लगे। राम के सौंदर्य की सराहना करते हुए वे लौट गए।

दोहा

राम कीन्ह बिश्राम निसि प्रात प्रयाग नहाइ।चले सहित सिय लखन जन मुदित मुनिहि सिरु नाइ॥१०८॥

राम ने वहीं रात्रि विश्राम किया और सवेरे प्रयाग में स्नान करके, प्रसन्नतापूर्वक मुनि को सिर नवाकर सीता, लक्ष्मण और गुह सहित आगे बढ़ चले।

राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं॥मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं। सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं॥॥१॥

चलते हुए राम ने बड़े प्रेम से मुनि से पूछा - हे नाथ, बताइए हमें किस राह जाना है। मुनि मन में हँसकर बोले - आपके लिए तो सभी रास्ते सुगम हैं।

साथ लागि मुनि सिष्य बोलाए। सुनि मन मुदित पचासक आए॥सबन्हि राम पर प्रेम अपारा। सकल कहहिं मगु दीख हमारा॥॥२॥

फिर साथ भेजने के लिए मुनि ने अपने शिष्यों को बुलाया। यह सुनते ही मन में हर्षित होकर कोई पचास शिष्य आ गए - सबका राम पर अपार प्रेम था, सब कहने लगे कि रास्ता तो हमने देखा हुआ है।

मुनि बटु चारि संग तब दीन्हे। जिन्ह बहु जनम सुकृत सब कीन्हे॥करि प्रनामु रिषि आयसु पाई। प्रमुदित हृदयँ चले रघुराई॥॥३॥

तब मुनि ने चार ब्रह्मचारी भी उनके साथ कर दिए, जिन्होंने कई जन्मों तक पुण्य कर्म किए थे। ऋषि की आज्ञा पाकर, प्रणाम करके राम हृदय में आनंदित होकर आगे चले।

ग्राम निकट जब निकसहि जाई। देखहि दरसु नारि नर धाई॥होहिं सनाथ जनम फलु पाई। फिरहिं दुखित मनु संग पठाई॥॥४॥

जब वे किसी गाँव के पास से निकलते हैं, स्त्री-पुरुष दौड़कर उनका दर्शन करने आते हैं। जन्म सफल हुआ मानकर वे मन को साथ भेजकर, पर शरीर से पीछे रह जाने के दुख के साथ लौटते हैं।

दोहा

बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाइ मन काम।उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम॥१०९॥

फिर राम ने विनती करके चारों ब्रह्मचारियों को विदा किया, वे मनचाही वस्तु पाकर लौट गए। यमुना पार करके सबने उसके जल में स्नान किया, जो राम के शरीर जैसा ही श्याम था।

सुनत तीरवासी नर नारी। धाए निज निज काज बिसारी॥लखन राम सिय सुन्दरताई। देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई॥॥१॥

यमुना-तट पर बसने वाले स्त्री-पुरुष यह सुनकर अपना काम-काज भूलकर दौड़े, और राम, लक्ष्मण, सीता का सौंदर्य देखकर अपने भाग्य को सराहने लगे।

अति लालसा बसहिं मन माहीं। नाउँ गाउँ बूझत सकुचाहीं॥जे तिन्ह महुँ बयबिरिध सयाने। तिन्ह करि जुगुति रामु पहिचाने॥॥२॥

उनके मन में परिचय जानने की बड़ी उत्सुकता थी, पर नाम-गाँव पूछते हुए वे संकोच कर रहे थे। उनमें जो अनुभवी और चतुर बुज़ुर्ग थे, उन्होंने युक्ति से राम को पहचान लिया।

सकल कथा तिन्ह सबहि सुनाई। बनहि चले पितु आयसु पाई॥सुनि सबिषाद सकल पछिताहीं। रानी राय कीन्ह भल नाहीं॥॥३॥

उन्होंने सबको पूरी कथा सुनाई कि पिता की आज्ञा पाकर ये वन जा रहे हैं। यह सुनकर सब दुखी होकर पछताने लगे कि रानी और राजा ने अच्छा नहीं किया।

तेहि अवसर एक तापसु आवा। तेजपुंज लघुबयस सुहावा॥कबि अलखित गति बेषु बिरागी। मन क्रम बचन राम अनुरागी॥॥४॥

उसी समय वहाँ एक तेजस्वी, कम उम्र का सुंदर तपस्वी आया। उसकी गति कोई नहीं जानता था, वैरागी वेश में था और मन-वचन-कर्म से राम का अनन्य भक्त था।

दोहा

सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि।परेउ दंड जिमि धरनितल दसा न जाइ बखानि॥११०॥

अपने इष्टदेव को पहचानते ही उसकी आँखें भर आईं और शरीर पुलकित हो उठा - वह दंड की तरह धरती पर गिर पड़ा, उसकी उस दशा का वर्णन नहीं हो सकता।

राम सप्रेम पुलकि उर लावा। परम रंक जनु पारसु पावा॥मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ। मिलत धरे तन कह सबु कोऊ॥॥१॥

राम ने प्रेम से पुलकित होकर उसे हृदय से लगा लिया, मानो किसी दरिद्र को पारस मिल गया हो। देखने वाले कहने लगे मानो प्रेम और परमार्थ दोनों देह धरकर आज मिल रहे हों।

बहुरि लखन पायन्ह सोइ लागा। लीन्ह उठाइ उमगि अनुरागा॥पुनि सिय चरन धूरि धरि सीसा। जननि जानि सिसु दीन्हि असीसा॥॥२॥

फिर वह लक्ष्मण के चरणों में गिरा, लक्ष्मण ने प्रेम से उमँगकर उसे उठा लिया। फिर उसने सीता के चरणों की धूल सिर पर धारण की, और सीता ने माता जैसा स्नेह देकर उसे आशीर्वाद दिया।

कीन्ह निषाद दंडवत तेही। मिलेउ मुदित लखि राम सनेही॥पिअत नयन पुट रूपु पियूषा। मुदित सुअसनु पाइ जिमि भूखा॥॥३॥

निषादराज ने भी उसे दंडवत की, और राम का प्रेमी जानकर वह उससे प्रसन्नता से मिला। वह तपस्वी नेत्रों से राम के रूप-सुधा का पान करता रहा, ठीक वैसे ही जैसे भूखा व्यक्ति भोजन पाकर तृप्त होता है।

ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे॥राम लखन सिय रूपु निहारी। होहिं सनेह बिकल नर नारी॥॥४॥

गाँव की स्त्रियाँ कहती हैं - सखी, बताओ तो, कैसे होंगे वे माता-पिता जिन्होंने ऐसे बालकों को वन भेजा! राम, लक्ष्मण, सीता का रूप देखकर सब स्त्री-पुरुष स्नेह से व्याकुल हो उठते हैं।

दोहा

तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह।राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेई कीन्ह॥१११॥

तब राम ने सखा गुह को कई तरह से समझाया, और गुह ने राम की आज्ञा शिरोधार्य कर अपने घर की राह ली।

पुनि सियँ राम लखन कर जोरी। जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी॥चले ससीय मुदित दोउ भाई। रबितनुजा कइ करत बड़ाई॥॥१॥

फिर सीता, राम और लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर फिर से यमुना को प्रणाम किया। सूर्यकन्या यमुना की महिमा गाते हुए दोनों भाई सीता सहित प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़े।

पथिक अनेक मिलहिं मग जाता। कहहिं सप्रेम देखि दोउ भ्राता॥राज लखन सब अंग तुम्हारें। देखि सोचु अति हृदय हमारें॥॥२॥

रास्ते में कई यात्री मिलते हैं, दोनों भाइयों को देखकर प्रेम से कहते हैं - तुम्हारे हर अंग में राजचिह्न देखकर हमारे हृदय में बड़ी चिंता होती है।

मारग चलहु पयादेहि पाएँ। ज्योतिषु झूठ हमारें भाए॥अगमु पंथ गिरि कानन भारी। तेहि महँ साथ नारि सुकुमारी॥॥३॥

तुम पैदल ही रास्ता तय कर रहे हो, इससे लगता है ज्योतिष झूठा ही है। आगे दुर्गम जंगल और ऊँचे पहाड़ हैं, और साथ में यह सुकुमारी स्त्री भी है।

करि केहरि बन जाइ न जोई। हम सँग चलहिं जो आयसु होई॥जाब जहाँ लगि तहँ पहुँचाई। फिरब बहोरि तुम्हहि सिरु नाई॥॥४॥

हाथी-सिंहों से भरा यह भयानक वन देखा तक नहीं जाता। यदि आज्ञा हो तो हम साथ चलें, जहाँ तक आप जाएँगे वहाँ तक पहुँचाकर फिर प्रणाम करके लौट आएँगे।

दोहा

एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन।कृपासिंधु फेरहि तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन॥११२॥

इस तरह वे यात्री प्रेमवश पुलकित होकर, आँखों में आँसू भरकर पूछते हैं, पर कृपासिंधु राम विनम्र, कोमल वचन कहकर उन्हें लौटा देते हैं।

जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं। तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं॥केहि सुकृतीं केहि घरीं बसाए। धन्य पुन्यमय परम सुहाए॥॥१॥

रास्ते में बसे गाँव और पुरवासियों को देखकर नाग और देवता भी ईर्ष्या करते हैं - किस पुण्यात्मा ने किस शुभ घड़ी में इन्हें बसाया था, जो आज ये इतने धन्य और सुंदर हो रहे हैं!

जहँ जहँ राम चरन चलि जाहीं। तिन्ह समान अमरावति नाहीं॥पुन्यपुंज मग निकट निवासी। तिन्हहि सराहहिं सुरपुरबासी॥॥२॥

जहाँ-जहाँ राम के चरण पड़ते हैं, वहाँ की तुलना इंद्रपुरी अमरावती से भी नहीं की जा सकती। रास्ते के पास बसने वाले भी बड़े भाग्यशाली हैं - स्वर्गवासी देवता तक उनकी सराहना करते हैं -

जे भरि नयन बिलोकहिं रामहि। सीता लखन सहित घनस्यामहि॥जे सर सरित राम अवगाहहिं। तिन्हहि देव सर सरित सराहहिं॥॥३॥

जो आँखें भरकर घनश्याम राम को सीता-लक्ष्मण सहित निहारती हैं, और जिन तालाबों-नदियों में राम स्नान करते हैं, देवसरोवर और देवनदियाँ भी उनकी प्रशंसा करती हैं।

जेहि तरु तर प्रभु बैठहिं जाई। करहिं कलपतरु तासु बड़ाई॥परसि राम पद पदुम परागा। मानति भूमि भूरि निज भागा॥॥४॥

जिस वृक्ष के नीचे प्रभु बैठते हैं, कल्पवृक्ष भी उसकी बड़ाई करता है। राम के चरण-कमलों की धूल छूकर धरती अपने को परम सौभाग्यशाली मानती है।

दोहा

छाँह करहिं घन बिबुधगन बरषहिं सुमन सिहाहिं।देखत गिरि बन बिहग मृग रामु चले मग जाहिं॥११३॥

रास्ते में बादल छाया करते हैं, देवता फूल बरसाकर ईर्ष्या करते हैं। पहाड़, वन और पशु-पक्षियों को निहारते हुए राम आगे बढ़ते जाते हैं।

सीता लखन सहित रघुराई। गाँव निकट जब निकसहिं जाई॥सुनि सब बाल बृद्ध नर नारी। चलहिं तुरत गृहकाजु बिसारी॥॥१॥

सीता-लक्ष्मण सहित राम जब किसी गाँव के पास से निकलते हैं, तो यह सुनते ही बालक-बूढ़े, स्त्री-पुरुष सब घर-काम भूलकर तुरंत उन्हें देखने दौड़ पड़ते हैं।

राम लखन सिय रूप निहारी। पाइ नयनफलु होहिं सुखारी॥सजल बिलोचन पुलक सरीरा। सब भए मगन देखि दोउ बीरा॥॥२॥

राम, लक्ष्मण, सीता का रूप देखकर नेत्रों का फल पाकर वे सुखी होते हैं। दोनों भाइयों को देखकर सब प्रेमानंद में डूब जाते हैं, आँखें भर आतीं और शरीर पुलकित हो उठता।

बरनि न जाइ दसा तिन्ह केरी। लहि जनु रंकन्ह सुरमनि ढेरी॥एकन्ह एक बोलि सिख देहीं। लोचन लाहु लेहु छन एहीं॥॥३॥

उनकी उस दशा का वर्णन नहीं हो सकता, मानो किसी दरिद्र को रत्नों का ढेर मिल गया हो। वे एक-दूसरे को बुलाकर कहते हैं - इसी क्षण नेत्रों का लाभ ले लो।

रामहि देखि एक अनुरागे। चितवत चले जाहिं सँग लागे॥एक नयन मग छबि उर आनी। होहिं सिथिल तन मन बर बानी॥॥४॥

कोई राम को देखकर ऐसे अनुरक्त हो गए कि निहारते हुए उनके साथ चल पड़े। किसी की आँखों में उनकी छवि बस गई और वे शरीर, मन, वाणी सबसे शिथिल हो उठे।

दोहा

एक देखि बट छाँह भलि डासि मृदुल तृन पात।कहहिं गवाँइअ छिनुकु श्रमु गवनब अबहिं कि प्रात॥११४॥

कोई बरगद की सुंदर छाया देखकर वहाँ नरम घास-पत्ते बिछाकर कहते हैं - क्षणभर यहीं बैठकर थकान मिटा लीजिए, फिर चाहे अभी चलिए, चाहे सवेरे।

एक कलस भरि आनहिं पानी। अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी॥सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी। राम कृपाल सुसील बिसेषी॥॥१॥

कोई घड़ा भरकर पानी लाते हैं और कोमल स्वर में कहते हैं - नाथ, आचमन कर लीजिए। उनका यह प्रेमभरा वचन सुनकर, अत्यंत सुशील और दयालु राम ने -

जानी श्रमित सीय मन माहीं। घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं॥मुदित नारि नर देखहिं सोभा। रूप अनूप नयन मनु लोभा॥॥२॥

सीता को मन ही मन थकी हुई जानकर घड़ी भर बरगद की छाया में विश्राम किया। स्त्री-पुरुष आनंदित होकर उनकी शोभा निहारते हैं, अनुपम रूप ने सबके नेत्र और मन मोह लिए हैं।

एकटक सब सोहहिं चहुँ ओरा। रामचंद्र मुख चंद चकोरा॥तरुन तमाल बरन तनु सोहा। देखत कोटि मदन मनु मोहा॥॥३॥

सब लोग चारों ओर टकटकी लगाए, चकोर की तरह राम के मुखचंद्र को निहारते हुए शोभित हो रहे हैं। उनका तमाल जैसा साँवला शरीर देखते ही करोड़ों कामदेवों का मन मोहित हो जाता है।

दामिनि बरन लखन सुठि नीके। नख सिख सुभग भावते जी के॥मुनिपट कटिन्ह कसें तूनीरा। सोहहिं कर कमलिनि धनु तीरा॥॥४॥

बिजली जैसे रंग वाले लक्ष्मण भी बहुत ही सुंदर लगते हैं - नख से शिखा तक मनमोहक हैं। दोनों मुनियों जैसे वस्त्र पहने, कमर में तरकस बाँधे हैं, कमल-से हाथों में धनुष-बाण शोभित हो रहे हैं।

दोहा

जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल।सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल॥११५॥

उनके सिरों पर सुंदर जटा-मुकुट हैं, वक्ष-भुजाएँ-नेत्र विशाल हैं, और शरद-पूर्णिमा के चाँद जैसे सुंदर मुखों पर पसीने की बूँदें झिलमिला रही हैं।

बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी॥राम लखन सिय सुंदरताई। सब चितवहिं चित मन मति लाई॥॥१॥

उस मनोहर जोड़ी का वर्णन नहीं हो सकता, शोभा इतनी अधिक है और मेरी बुद्धि इतनी छोटी। राम, लक्ष्मण, सीता की सुंदरता को सब मन-चित्त-बुद्धि लगाकर निहारते रह जाते हैं।

थके नारि नर प्रेम पिआसे। मनहुँ मृगी मृग देखि दिआ से॥सीय समीप ग्रामतिय जाहीं। पूँछत अति सनेहँ सकुचाहीं॥॥२॥

प्रेम के प्यासे वे स्त्री-पुरुष ऐसे ठिठक गए जैसे दीपक देखकर हिरन-हिरनी स्तब्ध रह जाते हैं। गाँव की स्त्रियाँ सीता के पास जाती हैं, पर अत्यंत स्नेह के कारण कुछ पूछते हुए भी सकुचाती हैं।

बार बार सब लागहिं पाएँ। कहहिं बचन मृदु सरल सुभाएँ॥राजकुमारि बिनय हम करहीं। तिय सुभायँ कछु पूँछत डरहीं॥॥३॥

बार-बार सब उनके पैरों पड़ती हैं और सहज, सीधे-सादे कोमल वचन कहती हैं - राजकुमारी, हम कुछ पूछना चाहती हैं, पर स्त्री-स्वभाव के कारण डर रही हैं।

स्वामिनि अबिनय छमबि हमारी। बिलगु न मानब जानि गवाँरी॥राजकुअँर दोउ सहज सलोने। इन्ह तें लही दुति मरकत सोने॥॥४॥

स्वामिनी, हमारी ढिठाई क्षमा कीजिए, हमें गँवार जानकर बुरा न मानिएगा - ये दोनों राजकुमार स्वभाव से ही ऐसे सुंदर हैं कि मरकतमणि और सोने ने भी अपनी चमक इन्हीं से पाई है।

दोहा

स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन।सरद सर्बरीनाथ मुखु सरद सरोरुह नैन॥११६॥

एक साँवला, एक गौरवर्ण, दोनों किशोर अवस्था के परम सुंदर हैं - इनके मुख शरद-चंद्रमा जैसे और नेत्र शरद-कमल जैसे हैं।

कोटि मनोज लजावनिहारे। सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे॥सुनि सनेहमय मंजुल बानी। सकुची सिय मन महुँ मुसुकानी॥॥१॥

सुमुखि, बताओ तो, करोड़ों कामदेवों को लजाने वाले ये तुम्हारे कौन हैं? यह प्रेमभरी मधुर वाणी सुनकर सीता सकुचा गईं और मन ही मन मुस्कुरा उठीं।

तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी। दुहुँ सकोच सकुचित बरबरनी॥सकुचि सप्रेम बाल मृग नयनी। बोली मधुर बचन पिकबयनी॥॥२॥

उन्हें देखकर सीता संकोचवश धरती की ओर देखने लगीं - दोनों ओर के संकोच से वे सकुचा रही थीं। हिरनी जैसी आँखों और कोयल जैसी वाणी वाली सीता प्रेम से सकुचाकर मधुर वचन बोलीं -

सहज सुभाय सुभग तन गोरे। नामु लखनु लघु देवर मोरे॥बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी। पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी॥॥३॥

ये जो सहज स्वभाव के, सुंदर और गोरे शरीर वाले हैं, इनका नाम लक्ष्मण है, ये मेरे छोटे देवर हैं। फिर सीता ने चंद्रमुख को आँचल से ढककर, प्रियतम की ओर तिरछी नज़र से देखा,

खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहि सिय सयननि॥भइ मुदित सब ग्रामबधूटीं। रंकन्ह राय रासि जनु लूटीं॥॥४॥

और खंजन पक्षी जैसी सुंदर तिरछी आँखों से इशारा करके बता दिया कि ये उनके पति हैं। यह जानकर गाँव की सब युवतियाँ ऐसी आनंदित हुईं मानो निर्धनों ने धन की राशि लूट ली हो।

दोहा

अति सप्रेम सिय पायँ परि बहुबिधि देहिं असीस।सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस॥११७॥

वे अत्यंत प्रेम से सीता के पैरों पड़कर तरह-तरह से आशीर्वाद देती हैं - जब तक शेषनाग के सिर पर यह धरती टिकी है, तब तक तुम सदा सुहागिन बनी रहो,

पारबती सम पतिप्रिय होहू। देबि न हम पर छाड़ब छोहू॥पुनि पुनि बिनय करिअ कर जोरी। जौं एहि मारग फिरिअ बहोरी॥॥१॥

और पार्वती जैसी अपने पति की प्रिय बनो। हे देवी, हम पर अपनी कृपा बनाए रखना। हम बार-बार हाथ जोड़कर विनती करती हैं कि तुम फिर इसी रास्ते लौटना,

दरसनु देब जानि निज दासी। लखीं सीय सब प्रेम पिआसी॥मधुर बचन कहि कहि परितोषीं। जनु कुमुदिनीं कौमुदीं पोषीं॥॥२॥

और अपनी दासी जानकर हमें दर्शन देना। सीता ने उन सबको प्रेम की प्यासी देखकर मीठे वचनों से ऐसे संतुष्ट किया मानो चाँदनी ने कुमुदिनियों को खिला दिया हो।

तबहिं लखन रघुबर रुख जानी। पूँछेउ मगु लोगन्हि मृदु बानी॥सुनत नारि नर भए दुखारी। पुलकित गात बिलोचन बारी॥॥३॥

तभी राम का इशारा समझकर लक्ष्मण ने कोमल वाणी में लोगों से आगे का रास्ता पूछा। यह सुनते ही स्त्री-पुरुष दुखी हो उठे, शरीर पुलकित हुए और आँखों में आँसू भर आए।

मिटा मोदु मन भए मलीने। बिधि निधि दीन्ह लेत जनु छीने॥समुझि करम गति धीरजु कीन्हा। सोधि सुगम मगु तिन्ह कहि दीन्हा॥॥४॥

उनका आनंद मिट गया, मन उदास हो गए, मानो विधाता दी हुई संपत्ति वापस छीन रहा हो। पर कर्म की गति समझकर उन्होंने धैर्य धरा और अच्छी तरह सोचकर सुगम रास्ता बता दिया।

दोहा

लखन जानकी सहित तब गवनु कीन्ह रघुनाथ।फेरे सब प्रिय बचन कहि लिए लाइ मन साथ॥११८॥

तब लक्ष्मण और सीता सहित रघुनाथ आगे बढ़ चले, और सबको प्रिय वचन कहकर विदा किया, पर उनका मन तो अपने साथ ही बँधा रह गया।

फिरत नारि नर अति पछिताहीं। देअहि दोषु देहिं मन माहीं॥सहित बिषाद परसपर कहहीं। बिधि करतब उलटे सब अहहीं॥॥१॥

लौटते हुए वे स्त्री-पुरुष बहुत पछताते और मन ही मन विधाता को दोष देते हैं। विषाद के साथ आपस में कहते हैं कि विधाता के सारे काम उलटे ही हैं।

निपट निरंकुस निठुर निसंकू। जेहिं ससि कीन्ह सरुज सकलंकू॥रूख कलपतरु सागरु खारा। तेहिं पठए बन राजकुमारा॥॥२॥

वह विधाता बिल्कुल निरंकुश, निर्दय और निडर है, जिसने चाँद को रोगी और कलंकित बनाया, कल्पवृक्ष को साधारण पेड़ और समुद्र को खारा बनाया - उसी ने इन राजकुमारों को वन भेज दिया है।

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