द्वितीय सोपान — भाग 5
अयोध्याकाण्ड
राज्याभिषेक की तैयारी, वनगमन एवं भरत मिलाप की कथा।
अयोध्याकाण्ड — सुनें
अयोध्याकाण्ड — पढ़ें भी, सुनें भी
राज्याभिषेक की तैयारी, वनगमन एवं भरत मिलाप की कथा।
यह कथा शीघ्र ही यहाँ सुनने हेतु भी उपलब्ध होगी
जहँ सिंसुपा पुनीत तर रघुबर किय बिश्रामु।अति सनेहँ सादर भरत कीन्हेउ दंड प्रनामु॥१९८॥
जहाँ पवित्र अशोक वृक्षके नीचे राम ने विश्राम किया था, वहाँ भरतने अत्यंत प्रेमसे आदरपूर्वक दंडवत प्रणाम किया।
कुस साँथरीनिहारि सुहाई। कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई॥चरन रेख रज आँखिन्ह लाई। बनइ न कहत प्रीति अधिकाई॥॥१॥
कुशकी सुंदर बिछी शय्या देखकर उसकी परिक्रमा करके प्रणाम किया, राम के चरण-चिह्नोंकी धूल आँखोंमें लगाई - उस समयका प्रेम कहते नहीं बनता।
कनक बिंदु दुइ चारिक देखे। राखे सीस सीय सम लेखे॥सजल बिलोचन हृदयँ गलानी। कहत सखा सन बचन सुबानी॥॥२॥
दो-चार सोनेके कण देखकर भरतने उन्हें सीता समझकर सिरपर रख लिया। आँखें आँसुओंसे भरी, हृदयमें ग्लानि लिए वे सखासे कहने लगे -
श्रीहत सीय बिरहँ दुतिहीना। जथा अवध नर नारि बिलीना॥पिता जनक देउँ पटतर केही। करतल भोगु जोगु जग जेही॥॥३॥
यह सोनेके कण भी सीताके विरहमें ऐसे फीके पड़ गए हैं जैसे रामके वियोगमें अयोध्याके नर-नारी क्षीण हो रहे हैं। जिनके पिता स्वयं राजा जनक हैं, भोग और योग दोनों जिनकी मुट्ठीमें हैं - उन जनकको मैं किससे उपमा दूँ?
ससुर भानुकुल भानु भुआलू। जेहि सिहात अमरावतिपालू॥प्राननाथु रघुनाथ गोसाई। जो बड़ होत सो राम बड़ाई॥॥४॥
जिनके ससुर सूर्यकुलके सूर्य राजा दशरथ हैं, जिन्हें इंद्र भी ईर्ष्यासे देखते थे, और जिनके प्राणनाथ स्वयं रघुनाथ हैं - जो इतने महान हैं कि जो कोई भी बड़ा बनता है, राम की ही कृपासे बनता है।
पति देवता सुतीय मनि सीय साँथरी देखि।बिहरत हृदय न हहरि हर पबि तें कठिन बिसेषि॥१९९॥
उन पतिव्रताओंकी शिरोमणि सीताकी यह कुशशय्या देखकर भी मेरा हृदय फट नहीं जाता - यह वज्रसे भी कठोर है।
लालन जोगु लखन लघु लोने। भे न भाइ अस अहहिं न होने॥पुरजन प्रिय पितु मातु दुलारे। सिय रघुबरहि प्रानपिआरे॥॥१॥
मेरे छोटे भाई लक्ष्मण इतने सुंदर और प्यारे हैं कि ऐसा भाई न कभी हुआ, न है, न होगा। जो अवधवासियोंके प्रिय, माता-पिताके दुलारे और सीता-रामके प्राणप्रिय हैं,
मृदु मूरति सुकुमार सुभाऊ। तात बाउ तन लाग न काऊ॥ते बन सहहिं बिपति सब भाँती। निदरे कोटि कुलिस एहिं छाती॥॥२॥
जिनकी देह कोमल और स्वभाव सुकुमार है, जिन्हें कभी गरम हवा तक नहीं लगी, वे आज वनमें हर तरहकी विपत्ति झेल रहे हैं - मेरी यह छाती करोड़ों वज्रोंसे भी कठोर निकली कि अब तक फटी नहीं।
राम जनमि जगु कीन्ह उजागर। रूप सील सुख सब गुन सागर॥पुरजन परिजन गुर पितु माता। राम सुभाउ सबहि सुखदाता॥॥३॥
राम ने जन्म लेकर संसारको उजागर कर दिया, वे रूप, शील, सुख और सारे गुणोंके सागर हैं। नगरवासी, कुटुंबी, गुरु, माता-पिता - सबके लिए उनका स्वभाव सुखदायी है।
बैरिउ राम बड़ाई करहीं। बोलनि मिलनि बिनय मन हरहीं॥सारद कोटि कोटि सत सेषा। करि न सकहिं प्रभु गुन गन लेखा॥॥४॥
शत्रु भी राम की बड़ाई करते हैं, उनकी बोलचाल और विनय मन मोह लेती है। करोड़ों सरस्वती और अरबों शेष मिलकर भी प्रभुके गुणोंकी गिनती नहीं कर सकते।
सुखस्वरुप रघुबंसमनि मंगल मोद निधान।ते सोवत कुस डासि महि बिधि गति अति बलवान॥२००॥
सुखस्वरूप, रघुवंशशिरोमणि, मंगल और आनंदके भंडार राम धरतीपर कुशा बिछाकर सोते हैं - विधाताकी गति सचमुच बड़ी बलवान है।
राम सुना दुखु कान न काऊ। जीवनतरु जिमि जोगवइ राऊ॥पलक नयन फनि मनि जेहि भाँती। जोगवहिं जननि सकल दिन राती॥॥१॥
राम ने कभी कानोंसे भी दुखका नाम नहीं सुना था, राजा स्वयं जीवन-वृक्षकी तरह उनकी देखभाल करते थे, और सब माताएँ रात-दिन ऐसे सँभालती थीं जैसे पलक आँखोंकी और साँप अपनी मणिकी रखवाली करता है।
ते अब फिरत बिपिन पदचारी। कंद मूल फल फूल अहारी॥धिग कैकेई अमंगल मूला। भइसि प्रान प्रियतम प्रतिकूला॥॥२॥
वही राम अब जंगलोंमें पैदल भटक रहे हैं, कंद-मूल-फल खाकर गुजारा कर रहे हैं। अमंगलकी जड़ कैकेयीको धिक्कार है, जो अपने प्राणप्रिय पतिके ही विरुद्ध हो गई।
मैं धिग धिग अघ उदधि अभागी। सबु उतपातु भयउ जेहि लागी॥कुल कलंकु करि सृजेउ बिधाताँ। साइँदोह मोहि कीन्ह कुमाताँ॥॥३॥
मुझ पापी अभागेको धिक्कार है, धिक्कार है, जिसके कारण यह सब उत्पात हुआ। विधाताने मुझे कुलका कलंक बनाकर सृजा और कुमाताने मुझे स्वामिद्रोही बना दिया।
सुनि सप्रेम समुझाव निषादू। नाथ करिअ कत बादि बिषादू॥राम तुम्हहि प्रिय तुम्ह प्रिय रामहि। यह निरजोसु दोसु बिधि बामहि॥॥४॥
यह सुनकर निषादराज प्रेमसे समझाने लगा - नाथ, व्यर्थ विषाद क्यों करते हैं? राम आपको प्रिय हैं और आप राम को प्रिय हैं, यही सच है - दोष तो प्रतिकूल विधाताका है।
बिधि बाम की करनी कठिन जेहिं मातु कीन्ही बावरी।तेहि राति पुनि पुनि करहिं प्रभु सादर सरहना रावरी॥तुलसी न तुम्ह सो राम प्रीतमु कहतु हौं सौहें किएँ।परिनाम मंगल जानि अपने आनिए धीरजु हिएँ॥
प्रतिकूल विधाताकी करनी कठोर है, जिसने माताको बावली बना दिया। उस रात प्रभु बार-बार आदरपूर्वक आपकी सराहना करते रहे। तुलसीदास कहते हैं - राम को आपसे बढ़कर प्रिय कोई नहीं, यह मैं सौगंध खाकर कहता हूँ। अंत भला होगा, यह जानकर हृदयमें धीरज रखिए।
अंतरजामी रामु सकुच सप्रेम कृपायतन।चलिअ करिअ बिश्रामु यह बिचारि दृढ़ आनि मन॥२०१॥
राम अंतर्यामी हैं और संकोच, प्रेम व कृपाके धाम हैं - यह सोचकर, मनमें दृढ़ता लाकर चलिए और विश्राम कीजिए।
सखा बचन सुनि उर धरि धीरा। बास चले सुमिरत रघुबीरा॥यह सुधि पाइ नगर नर नारी। चले बिलोकन आरत भारी॥॥१॥
सखाके वचन सुनकर, हृदयमें धीरज धरकर राम को स्मरण करते हुए भरत डेरेकी ओर चले। यह खबर पाकर नगरके स्त्री-पुरुष भी बड़ी व्याकुलतासे उस स्थानको देखने चल पड़े।
परदखिना करि करहिं प्रनामा। देहिं कैकइहि खोरि निकामा॥भरि भरि बारि बिलोचन लेंहीं। बाम बिधाताहि दूषन देहीं॥॥२॥
वे उस जगहकी परिक्रमा करके प्रणाम करते हैं और कैकेयीको खूब कोसते हैं। आँखोंमें आँसू भर-भरकर प्रतिकूल विधाताको दोष देते हैं।
एक सराहहिं भरत सनेहू। कोउ कह नृपति निबाहेउ नेहू॥निंदहिं आपु सराहि निषादहि। को कहि सकइ बिमोह बिषादहि॥॥३॥
कोई भरतके स्नेहकी सराहना करता है, कोई कहता है राजाने प्रेम खूब निभाया। सब खुदकी निंदा करके निषादकी प्रशंसा करते हैं - उस पलके विमोह और विषादको कोई बयान नहीं कर सकता।
एहि बिधि राति लोगु सबु जागा। भा भिनुसार गुदारा लागा॥गुरहि सुनावँ चढ़ाइ सुहाईं। नईं नाव सब मातु चढ़ाईं॥॥४॥
इस तरह सारी रात सब जागते रहे, सुबह होते ही नाव चलनी शुरू हुई। पहले सुंदर नावपर गुरुको चढ़ाया, फिर नई नावपर सब माताओंको चढ़ाया।
दंड चारि महँ भा सबु पारा। उतरि भरत तब सबहि सँभारा॥॥५॥
चार घड़ीमें सब गंगापार हो गए, तब भरतने उतरकर सबको सँभाला।
प्रातक्रिया करि मातु पद बंदि गुरहि सिरु नाइ।आगें किए निषाद गन दीन्हेउ कटकु चलाइ॥२०२॥
प्रातःक्रिया करके, माताके चरण छूकर और गुरुको सिर नवाकर भरतने निषादगणोंको आगे कर लिया और सेनाको चला दिया।
कियउ निषादनाथु अगुआईं। मातु पालकीं सकल चलाईं॥साथ बोलाइ भाइ लघु दीन्हा। बिप्रन्ह सहित गवनु गुर कीन्हा॥॥१॥
निषादराजको आगे करके सब माताओंकी पालकियाँ चलाईं। छोटे भाई शत्रुघ्नको बुलाकर साथ ले लिया, फिर ब्राह्मणोंसहित गुरुने प्रस्थान किया।
आपु सुरसरिहि कीन्ह प्रनामू। सुमिरि लखन सहित सिय रामू॥गवने भरत पयोदेहिं पाए। कोतल संग जाहिं डोरिआए॥॥२॥
भरतने खुद गंगाको प्रणाम किया और लक्ष्मणसहित सीता-रामका स्मरण किया। वे खुद पैदल चले, साथमें बिना सवारीके घोड़े बागडोरसे बँधे चल रहे थे।
कहहिं सुसेवक बारहिं बारा। होइअ नाथ अस्व असवारा॥रामु पयोदेहि पायँ सिधाए। हम कहँ रथ गज बाजि बनाए॥॥३॥
अच्छे सेवक बार-बार कहते हैं - नाथ, घोड़ेपर सवार हो जाइए। भरत कहते हैं - राम तो पैदल गए और हमारे लिए रथ-हाथी-घोड़े सजाए गए हैं!
सिर भर जाउँ उचित अस मोरा। सब तें सेवक धरमु कठोरा॥देखि भरत गति सुनि मृदु बानी। सब सेवक गन गरहिं गलानी॥॥४॥
मुझे तो उचित यह है कि सिरके बल चलूँ, सेवकका धर्म सबसे कठिन होता है। भरतकी यह दशा देखकर और कोमल वाणी सुनकर सब सेवक ग्लानिसे गड़े जा रहे हैं।
भरत तीसरे पहर कहँ कीन्ह प्रबेसु प्रयाग।कहत राम सिय राम सिय उमगि उमगि अनुराग॥२०३॥
प्रेममें उमड़ते हुए बार-बार 'सीताराम-सीताराम' कहते हुए भरतने तीसरे पहर प्रयागमें प्रवेश किया।
झलका झलकत पायन्ह कैंसें। पंकज कोस ओस कन जैसें॥भरत पयादेहिं आए आजू। भयउ दुखित सुनि सकल समाजू॥॥१॥
उनके पैरोंमें छाले ऐसे चमक रहे हैं जैसे कमलकी कलीपर ओसकी बूँदें। भरत आज पैदल ही चलकर आए हैं, यह सुनकर सारा समाज दुखी हो गया।
खबरि लीन्ह सब लोग नहाए। कीन्ह प्रनामु त्रिबेनिहिं आए॥सबिधि सितासित नीर नहाने। दिए दान महिसुर सनमाने॥॥२॥
जब पता चला कि सब लोग स्नान कर चुके हैं, तब त्रिवेणीपर आकर प्रणाम किया, फिर विधिपूर्वक गंगा-यमुनाके संगमजलमें स्नान करके दान देकर ब्राह्मणोंका सम्मान किया।
देखत स्यामल धवल हलोरे। पुलकि सरीर भरत कर जोरे॥सकल काम प्रद तीरथराऊ। बेद बिदित जग प्रगट प्रभाऊ॥॥३॥
श्याम और सफेद लहरोंको देखकर भरतका शरीर रोमांचित हो उठा, हाथ जोड़कर बोले - हे तीर्थराज, आप सब कामनाएँ पूर्ण करनेवाले हैं, आपका प्रभाव वेदोंमें और संसारमें प्रसिद्ध है।
मागउँ भीख त्यागि निज धरमू। आरत काह न करइ कुकरमू॥अस जियँ जानि सुजान सुदानी। सफल करहिं जग जाचक बानी॥॥४॥
मैं अपना क्षत्रिय-धर्म त्यागकर आपसे भीख माँगता हूँ - दुखी मनुष्य कौन-सा कुकर्म नहीं करता? यह जानकर सुजान दानी संसारमें माँगनेवालेकी बात हमेशा पूरी कर देते हैं।
अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान।जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन॥२०४॥
मुझे न अर्थकी चाह है, न धर्मकी, न कामकी, न मोक्षकी - बस जन्म-जन्ममें राम के चरणोंमें मेरा प्रेम बना रहे, यही वरदान माँगता हूँ, और कुछ नहीं।
जानहुँ रामु कुटिल करि मोही। लोग कहउ गुर साहिब द्रोही॥सीता राम चरन रति मोरें। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें॥॥१॥
राम भले मुझे कुटिल समझें और लोग भले गुरुद्रोही-स्वामिद्रोही कहें, पर सीता-रामके चरणोंमें मेरा प्रेम आपकी कृपासे दिन-प्रतिदिन बढ़ता रहे।
जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ। जाचत जलु पति पाहन डारउ॥चातकु रटनि घटें घटि जाई। बढ़े प्रेमु सब भाँति भलाई॥॥२॥
बादल चाहे जन्मभर चातकको भुला दे और पानी माँगनेपर पत्थर बरसाए, पर चातकका रटना कम हो जाए तो उसकी अपनी ही प्रतिष्ठा घट जाएगी - उसके लिए तो प्रेम बढ़ाते जाना ही सब तरहसे भला है।
कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें। तिमि प्रियतम पद नेम निबाहें॥भरत बचन सुनि माझ त्रिबेनी। भइ मृदु बानि सुमंगल देनी॥॥३॥
जैसे तपानेसे सोनेमें चमक आती है, वैसे ही प्रियतमके चरणोंमें नेम निभानेसे सेवककी शोभा बढ़ती है। भरतके यह वचन सुनकर त्रिवेणीके बीचसे एक कोमल, मंगलमय वाणी गूँजी -
तात भरत तुम्ह सब बिधि साधू। राम चरन अनुराग अगाधू॥बादि गलानि करहु मन माहीं। तुम्ह सम रामहि कोउ प्रिय नाहीं॥॥४॥
तात भरत, तुम हर तरहसे साधु हो, राम के चरणोंमें तुम्हारा प्रेम अथाह है। मनमें व्यर्थ ग्लानि मत करो, राम को तुम्हारे समान प्रिय कोई और नहीं।
तनु पुलकेउ हियँ हरषु सुनि बेनि बचन अनुकूल।भरत धन्य कहि धन्य सुर हरषित बरषहिं फूल॥२०५॥
त्रिवेणीके यह अनुकूल वचन सुनकर भरतका शरीर रोमांचित हो उठा, हृदयमें हर्ष छा गया। देवता 'भरत धन्य हैं, धन्य हैं' कहकर हर्षसे फूल बरसाने लगे।
प्रमुदित तीरथराज निवासी। बैखानस बटु गृही उदासी॥कहहिं परसपर मिलि दस पाँचा। भरत सनेह सीलु सुचि साँचा॥॥१॥
तीर्थराज प्रयागमें रहनेवाले वानप्रस्थी, ब्रह्मचारी, गृहस्थ और संन्यासी सब बहुत आनंदित हैं, दस-पाँच मिलकर आपसमें कहते हैं - भरतका प्रेम और शील सच्चा और पवित्र है।
सुनत राम गुन ग्राम सुहाए। भरद्वाज मुनिबर पहिं आए॥दंड प्रनामु करत मुनि देखे। मूरतिमंत भाग्य निज लेखे॥॥२॥
राम के सुंदर गुणोंकी चर्चा सुनते-सुनते वे मुनिश्रेष्ठ भरद्वाजके पास आए। मुनिने भरतको दंडवत करते देखा और उसे अपना साक्षात सौभाग्य समझा।
धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे। दीन्हि असीस कृतारथ कीन्हे॥आसनु दीन्ह नाइ सिरु बैठे। चहत सकुच गृहँ जनु भजि पैठे॥॥३॥
उन्होंने दौड़कर भरतको उठाया, गले लगाया और आशीर्वाद देकर कृतार्थ किया। आसन दिया, भरत सिर नवाकर ऐसे बैठे मानो संकोचकी ओटमें छिप जाना चाहते हों।
मुनि पूँछब कछु यह बड़ सोचू। बोले रिषि लखि सीलु सँकोचू॥सुनहु भरत हम सब सुधि पाई। बिधि करतब पर किछु न बसाई॥॥४॥
उनके मनमें बड़ी चिंता है कि मुनि क्या पूछेंगे। भरतका शील-संकोच देखकर ऋषि बोले - सुनो भरत, हमें सब खबर मिल चुकी है, विधाताके किए पर किसीका वश नहीं चलता।
तुम्ह गलानि जियँ जनि करहु समुझि मातु करतूति।तात कैकइहि दोसु नहिं गई गिरा मति धूति॥२०६॥
मनमें ग्लानि मत करो, माताकी करनी याद करके। तात, कैकेयीका दोष नहीं, उसकी बुद्धि ही बिगड़ गई थी।
यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ। लोकु बेद बुध संमत दोऊ॥तात तुम्हार बिमल जसु गाई। पाइहि लोकउ बेदु बड़ाई॥॥१॥
यह कहते भी कोई बुरा नहीं मानेगा, क्योंकि लोक और वेद दोनों ही इसे मानते हैं। पर तात, तुम्हारा निर्मल यश गाकर लोक और वेद दोनोंको ही बड़ाई मिलेगी।
लोक बेद संमत सबु कहई। जेहि पितु देइ राजु सो लहई॥राउ सत्यब्रत तुम्हहि बोलाई। देत राजु सुखु धरमु बड़ाई॥॥२॥
लोक और वेद दोनों यही मानते और कहते हैं कि पिता जिसे राज्य दे वही उसे पाता है। राजा सत्यव्रती थे, तुम्हें बुलाकर राज्य देते तो सुख मिलता, धर्म बचता और बड़ाई होती।
राम गवनु बन अनरथ मूला। जो सुनि सकल बिस्व भइ सूला॥सो भावी बस रानि अयानी। करि कुचालि अंतहुँ पछितानी॥॥३॥
सारे अनर्थकी जड़ तो राम का वनगमन है, जिसे सुनकर पूरा संसार व्यथित हो उठा। वह भी भावीवश ही हुआ, नादान रानीने कुचाल करके अंततः पछताया ही।
तहँउँ तुम्हार अलप अपराधू। कहै सो अधम अयान असाधू॥करतेहु राजु त तुम्हहि न दोषू। रामहि होत सुनत संतोषू॥॥४॥
उसमें भी तुम्हारा तनिक अपराध कहे तो वह मूर्ख और नीच है। तुम राज्य करते तो भी तुम्हें दोष न लगता, सुनकर राम को भी संतोष ही होता।
अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु।सकल सुमंगल मूल जग रघुबर चरन सनेहु॥२०७॥
भरत, अब तो तुमने बहुत अच्छा किया, यही तुम्हारे लिए उचित था। राम के चरणोंमें प्रेम होना ही संसारके सब मंगलोंकी जड़ है।
सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना। भूरिभाग को तुम्हहि समाना॥यह तुम्हार आचरजु न ताता। दसरथ सुअन राम प्रिय भ्राता॥॥१॥
वह प्रेम ही तुम्हारा धन, जीवन और प्राण है, तुम्हारे समान भाग्यशाली कौन होगा? तात, यह आश्चर्यकी बात नहीं - तुम दशरथके पुत्र और राम के प्रिय भाई हो।
सुनहु भरत रघुबर मन माहीं। पेम पात्रु तुम्ह सम कोउ नाहीं॥लखन राम सीतहि अति प्रीती। निसि सब तुम्हहि सराहत बीती॥॥२॥
सुनो भरत, राम के मनमें तुम्हारे समान प्रेमपात्र कोई और नहीं। लक्ष्मण, राम और सीता तीनोंकी वह सारी रात तुम्हारी सराहना करते ही बीती।
जाना मरमु नहात प्रयागा। मगन होहिं तुम्हरें अनुरागा॥तुम्ह पर अस सनेहु रघुबर कें। सुख जीवन जग जस जड़ नर कें॥॥३॥
प्रयागमें स्नान करते समय ही मैंने यह भेद जान लिया कि वे तुम्हारे प्रेममें ही डूबे रहते हैं। तुमपर रघुनाथका ऐसा गहरा स्नेह है जैसा किसी मूर्ख मनुष्यका संसारके सुखभरे जीवनपर होता है।
यह न अधिक रघुबीर बड़ाई। प्रनत कुटुंब पाल रघुराई॥तुम्ह तौ भरत मोर मत एहू। धरें देह जनु राम सनेहू॥॥४॥
यह रघुनाथकी कोई बड़ी बात नहीं, वे तो शरणागतके पूरे कुटुंबको पालनेवाले हैं। भरत, मेरा तो यही मत है कि तुम स्वयं शरीरधारी रामप्रेम ही हो।
तुम्ह कहँ भरत कलंक यह हम सब कहँ उपदेसु।राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु॥२०८॥
भरत, तुम्हारी नजरमें यह भले कलंक हो, पर हम सबके लिए तो यह उपदेश है। रामभक्तिकी सिद्धिके लिए यह घड़ी बड़ी शुभ साबित हुई है।
नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा॥उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना। घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना॥॥१॥
तात, तुम्हारा यश निर्मल नए चाँदकी तरह है, राम के सेवक उसके कुमुद और चकोर हैं। यह चाँद कभी अस्त नहीं होगा, हमेशा उदय ही रहेगा, संसाररूपी आकाशमें घटेगा नहीं, दिन-दिन दूना ही बढ़ेगा।
कोक तिलोक प्रीति अति करिही। प्रभु प्रताप रबि छबिहि न हरिही॥निसि दिन सुखद सदा सब काहू। ग्रसिहि न कैकइ करतबु राहू॥॥२॥
तीनों लोकरूपी चकवा इस चाँदपर खूब प्रेम करेगा, और प्रभुके प्रतापरूपी सूरज इसकी चमक कभी नहीं छीनेगा। यह रात-दिन सबको सुख देगा, कैकेयीके कुकर्मरूपी राहु इसे कभी नहीं ग्रसेगा।
पूरन राम सुपेम पियूषा। गुर अवमान दोष नहिं दूषा॥राम भगत अब अमिअ अघाहूँ। कीन्हेहु सुलभ सुधा बसुधाहूँ॥॥३॥
यह चाँद राम के सुंदर प्रेमरूपी अमृतसे भरा है, गुरु-अपमानके दोषसे बिल्कुल दूषित नहीं। तुमने इसे रचकर धरतीपर भी अमृत सुलभ कर दिया - अब राम-भक्त इससे तृप्त हों।
भूप भगीरथ सुरसरि आनी। सुमिरत सकल सुमंगल खानी॥दसरथ गुन गन बरनि न जाहीं। अधिकु कहा जेहि सम जग नाहीं॥॥४॥
राजा भगीरथ गंगाको लाए, जिनका स्मरण ही सब मंगलोंकी खान है। दशरथके गुणोंका तो वर्णन ही नहीं हो सकता, इससे बढ़कर क्या कहें, जिनकी बराबरी करनेवाला संसारमें कोई नहीं।
जासु सनेह सकोच बस राम प्रगट भए आइ।जे हर हिय नयननि कबहुँ निरखे नहीं अघाइ॥२०९॥
जिनके प्रेम और संकोचके वश होकर स्वयं भगवान राम प्रकट होकर आए, जिन्हें शिव भी अपने हृदयकी आँखोंसे देखते-देखते कभी तृप्त नहीं हुए,
कीरति बिधु तुम्ह कीन्ह अनूपा। जहँ बस राम पेम मृगरूपा॥तात गलानि करहु जियँ जाएँ। डरहु दरिद्रहि पारसु पाएँ॥॥१॥
उनसे भी बढ़कर तुमने कीर्तिरूपी अनुपम चाँद उत्पन्न किया, जिसमें रामप्रेम ही मृगचिह्नके रूपमें बसता है। तात, तुम व्यर्थ ही मनमें ग्लानि पाल रहे हो, पारस पाकर भी दरिद्रतासे डर रहे हो।
सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं। उदासीन तापस बन रहहीं॥सब साधन कर सुफल सुहावा। लखन राम सिय दरसनु पावा॥॥२॥
सुनो भरत, हम झूठ नहीं कहते - हम उदासीन हैं, तपस्वी हैं और वनवासी हैं, हमें किसी पक्षका मोह नहीं। हमारे सारे साधनोंका सबसे सुंदर फल तो लक्ष्मण, राम और सीताका यह दर्शन ही है।
तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा। सहित पयाग सुभाग हमारा॥भरत धन्य तुम्ह जसु जगु जयऊ। कहि अस पेम मगन पुनि भयऊ॥॥३॥
उस फलका भी परम फल है यह तुम्हारा दर्शन - प्रयागसहित हमारा यह बड़ा सौभाग्य है। भरत, तुम धन्य हो, तुमने अपने यशसे जगत जीत लिया है। ऐसा कहते-कहते मुनि प्रेममें डूब गए।
सुनि मुनि बचन सभासद हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे॥धन्य धन्य धुनि गगन पयागा। सुनि सुनि भरतु मगन अनुरागा॥॥४॥
मुनिके यह वचन सुनकर सभासद हर्षित हो उठे, साधु-साधु कहकर सराहना करते हुए देवताओंने फूल बरसाए। आकाश और प्रयागमें गूँजती 'धन्य-धन्य' की ध्वनि सुन-सुनकर भरत प्रेममें डूबे जा रहे हैं।
पुलक गात हियँ रामु सिय सजल सरोरुह नैन।करि प्रनामु मुनि मंडलिहि बोले गदगद बैन॥२१०॥
भरतका शरीर पुलकित है, हृदयमें सीता-राम बसे हैं, कमल-जैसे नेत्र आँसुओंसे भरे हैं। मुनियोंकी मंडलीको प्रणाम करके वे गदगद वाणीमें बोले -
मुनि समाजु अरु तीरथराजू। साँचिहुँ सपथ अघाइ अकाजू॥एहिं थल जौं किछु कहिअ बनाई। एहि सम अधिक न अघ अधमाई॥॥१॥
यह मुनियोंका समाज है और तीर्थराज प्रयाग है, यहाँ झूठी सौगंध तो दूर, सच्ची सौगंधसे भी बड़ा नुकसान होता है। इस पवित्र स्थानपर यदि कुछ बनावटी कहूँ तो इससे बड़ा पाप और कुछ नहीं होगा।
तुम्ह सर्बग्य कहउँ सतिभाऊ। उर अंतरजामी रघुराऊ॥मोहि न मातु करतब कर सोचू। नहिं दुखु जियँ जगु जानिहि पोचू॥॥२॥
मैं सच्चे मनसे कहता हूँ - आप सर्वज्ञ हैं और रघुनाथ स्वयं हृदयकी बात जाननेवाले हैं। मुझे माताकी करनीका कोई सोच नहीं, न इस बातका दुख कि संसार मुझे बुरा समझेगा।
नाहिन डरु बिगरिहि परलोकू। पितहु मरन कर मोहि न सोकू॥सुकृत सुजस भरि भुअन सुहाए। लछिमन राम सरिस सुत पाए॥॥३॥
न मुझे परलोक बिगड़नेका डर है, न पिताके मरनेका शोक - क्योंकि उनका पुण्य और सुयश तीनों लोकोंमें सुशोभित है, उन्होंने राम-लक्ष्मण-जैसे पुत्र पाए।
राम बिरहँ तजि तनु छनभंगू। भूप सोच कर कवन प्रसंगू॥राम लखन सिय बिनु पग पनहीं। करि मुनि बेष फिरहिं बन बनही॥॥४॥
फिर जिन्होंने राम के विरहमें अपना क्षणभंगुर शरीर त्याग दिया, उस राजाके लिए सोच कैसा? सोच तो इस बातका है कि राम, लक्ष्मण और सीता बिना जूतोंके, मुनि-वेष धारण किए वन-वनमें भटक रहे हैं।
अजिन बसन फल असन महि सयन डासि कुस पात।बसि तरु तर नित सहत हिम आतप बरषा बात॥२११॥
वे वल्कल वस्त्र पहनते हैं, फल खाते हैं, धरतीपर कुश-पत्ते बिछाकर सोते हैं, पेड़ोंके नीचे रहते हुए नित्य सर्दी-गर्मी-बरसात-हवा सहते हैं।
एहि दुख दाहँ दहइ दिन छाती। भूख न बासर नीद न राती॥एहि कुरोग कर औषधु नाहीं। सोधेउँ सकल बिस्व मन माहीं॥॥१॥
इसी दुखकी आगमें मेरी छाती दिन-रात जलती रहती है, न दिनमें भूख लगती है न रातको नींद आती है। मैंने मन-ही-मन पूरा संसार खोज डाला, पर इस बीमारीकी दवा कहीं नहीं मिली।
मातु कुमत बढ़ई अघ मूला। तेहिं हमार हित कीन्ह बँसूला॥कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजंत्रू। गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्रु॥॥२॥
माताका कुविचार ही सबसे बड़ा बढ़ई है, जिसने हमारे हित नामका बसूला बनाया, फिर उससे कलहरूपी कुयंत्र बनाकर चौदह वर्षकी कठिन अवधिरूपी मंत्र पढ़कर उसे गाड़ दिया।
मोहि लगि यहु कुठाटु तेहिं ठाटा। घालेसि सब जगु बारहबाटा॥मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ। बसइ अवध नहिं आन उपाएँ॥॥३॥
मेरे लिए ही उसने यह सारा कुचक्र रचा और पूरे संसारको छिन्न-भिन्न करके तबाह कर दिया। यह कुयोग राम के लौटनेपर ही मिट सकता है, तभी अयोध्या फिर बस सकती है, और किसी उपायसे नहीं।
भरत बचन सुनि मुनि सुखु पाई। सबहिं कीन्ह बहु भाँति बड़ाई॥तात करहु जनि सोचु बिसेषी। सब दुखु मिटिहि राम पग देखी॥॥४॥
भरतके यह वचन सुनकर मुनिने सुख पाया और सबने उनकी खूब सराहना की। तात, बहुत ज्यादा सोच मत करो, राम के चरणोंका दर्शन होते ही सारा दुख मिट जाएगा।
करि प्रबोध मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु।कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु॥२१२॥
इस तरह मुनिश्रेष्ठने समझाकर कहा - अब आप हमारे प्रेमप्रिय अतिथि बनें और कृपा करके जो कंद-मूल-फल हम दें, स्वीकार करें।
सुनि मुनि बचन भरत हिये सोचू। भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू॥जानि गरुइ गुर गिरा बहोरी। चरन बंदि बोले कर जोरी॥॥१॥
मुनिकी यह बात सुनकर भरतके मनमें सोच हुआ कि यह कैसा बेमौका संकोच आ पड़ा। फिर गुरुजनकी बातको महत्त्व देकर, चरण वंदन करके हाथ जोड़े बोले -
सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरम यहु नाथ हमारा॥भरत बचन मुनिबर मन भाए। सुचि सेवक सिष निकट बोलाए॥॥२॥
नाथ, आपकी आज्ञा शिरोधार्य करना ही हमारा परम धर्म है। भरतकी यह बात मुनिको बहुत भाई, उन्होंने अपने विश्वस्त सेवकों और शिष्योंको पास बुलाया।
चाहिए कीन्ह भरत पहुनाई। कंद मूल फल आनहु जाई॥भलेहिं नाथ कहि तिन्ह सिर नाए। प्रमुदित निज निज काज सिधाए॥॥३॥
कहा - भरतकी आवभगत करनी चाहिए, जाकर कंद-मूल-फल ले आओ। सबने 'बहुत अच्छा नाथ' कहकर सिर नवाया और खुशी-खुशी अपने-अपने काममें जुट गए।
मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता। तसि पूजा चाहिअ जस देवता॥सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आई। आयसु होइ सो करहिं गोसाईं॥॥४॥
मुनिको चिंता हुई कि मेहमान तो बहुत बड़ा है, उसकी पूजा भी वैसी ही होनी चाहिए। यह सुनते ही ऋद्धियाँ और अणिमा-जैसी सिद्धियाँ आ पहुँचीं और बोलीं - गोसाईं, जो आज्ञा हो सो हम करें।
राम बिरह ब्याकुल भरतु सानुज सहित समाज।पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज॥२१३॥
मुनिराज प्रसन्न होकर बोले - शत्रुघ्न और समाजसहित भरत राम के विरहमें व्याकुल हैं, इनकी आवभगत करके इनकी थकान दूर करो।
रिधि सिधि सिर धरि मुनिबर बानी। बड़भागिनि आपुहि अनुमानी॥कहहिं परसपर सिधि समुदाई। अतुलित अतिथि राम लघु भाई॥॥१॥
ऋद्धि-सिद्धियोंने मुनिकी आज्ञा शिरोधार्य करके खुदको बड़भागी माना। सब सिद्धियाँ आपसमें कहने लगीं - राम के छोटे भाई भरत ऐसे अतिथि हैं जिनकी तुलना ही नहीं हो सकती।
मुनि पद बंदि करिअ सोइ आजू। होइ सुखी सब राज समाजू॥अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना। जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना॥॥२॥
मुनिके चरण वंदन करके आज वही करना चाहिए जिससे सारा राजसमाज सुखी हो। ऐसा कहकर उन्होंने ऐसे सुंदर भवन रच दिए कि देखकर विमान भी लजा जाएँ।
भोग बिभूति भूरि भरि राखे। देखत जिन्हहि अमर अभिलाषे॥दासीं दास साजु सब लीन्हें। जोगवत रहहिं मनहि मनु दीन्हें॥॥३॥
उनमें इतने भोग-वैभव भरकर रखे कि देवता भी देखकर ललचा उठें। दासी-दास सारा साज-सामान लिए हुए मन लगाकर उनकी हर इच्छा भाँप लेते रहे।
सब समाजु सजि सिधि पल माहीं। जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीं॥प्रथमहिं बास दिए सब केही। सुंदर सुखद जथा रुचि जेही॥॥४॥
स्वर्गमें भी सपनेमें न मिलनेवाला ऐसा सुख-साज सिद्धियोंने पलभरमें सजा दिया। पहले सबको उनकी रुचिके अनुसार सुंदर, सुखद निवास दिए।
बहुरि सपरिजन भरत कहुँ रिषि अस आयसु दीन्ह।बिधि बिसमय दायकु बिभव मुनिबर तपबल कीन्ह॥२१४॥
फिर परिवारसहित भरतको भी वैसा ही स्थान दिया, क्योंकि ऋषिने पहले ही ऐसी आज्ञा दे रखी थी। मुनिश्रेष्ठने अपने तपोबलसे ब्रह्माको भी चकित कर देनेवाला वैभव रच डाला।
मुनि प्रभाउ जब भरत बिलोका। सब लघु लगे लोकपति लोका॥सुख समाजु नहिं जाइ बखानी। देखत बिरति बिसारहीं ग्यानी॥॥१॥
जब भरतने मुनिका यह प्रभाव देखा तो उनके आगे सारे लोकपालोंके लोक भी तुच्छ जान पड़े। सुख-सामग्रीका वर्णन ही नहीं हो सकता, जिसे देखकर बड़े-बड़े ज्ञानी भी वैराग्य भूल जाएँ।
आसन सयन सुबसन बिताना। बन बाटिका बिहग मृग नाना॥सुरभि फूल फल अमिअ समाना। बिमल जलासय बिबिध बिधाना॥॥२॥
आसन, शय्या, सुंदर वस्त्र, चँदोवे, वन-बगीचे, तरह-तरहके पक्षी-पशु, सुगंधित फूल, अमृत-जैसे मीठे फल, अनेक निर्मल जलाशय -
असन पान सुचि अमिअ अमी से। देखि लोग सकुचात जमी से॥सुर सुरभी सुरतरु सबही कें। लखि अभिलाषु सुरेस सची कें॥॥३॥
अमृतसे भी बढ़कर पवित्र खान-पानकी वस्तुएँ, जिन्हें देखकर लोग संयमी साधुओंकी तरह सकुचा रहे हैं। हर डेरेमें कामधेनु और कल्पवृक्ष जैसी वस्तुएँ हैं, जिन्हें देखकर इंद्र और उनकी पत्नी तक ललचा जाएँ।
रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी। सब कहँ सुलभ पदारथ चारी॥स्त्रक चंदन बनितादिक भोगा। देखि हरष बिसमय बस लोगा॥॥४॥
वसंत ऋतु है, शीतल-मंद-सुगंधित हवा बह रही है, सबको धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चारों सुलभ हैं। माला, चंदन, स्त्री-जैसे भोग देखकर लोग हर्ष और विषाद दोनोंके वशमें हैं।
संपति चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार।तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार॥२१५॥
संपत्ति चकवी है और भरत चकवा, मुनिकी आज्ञा मानो खेल है जिसने उस रात दोनोंको आश्रमरूपी पिंजरेमें बंद रखा और यूँ ही सुबह हो गई।
कीन्ह निमज्जनु तीरथराजा। नाइ मुनिहि सिरु सहित समाजा॥रिषि आयसु असीस सिर राखी। करि दंडवत बिनय बहु भाषी॥॥१॥
सुबह भरतने तीर्थराजमें स्नान किया, समाजसहित मुनिको सिर नवाया, ऋषिकी आज्ञा और आशीर्वाद शिरोधार्य करके दंडवत करते हुए बहुत विनती की।
पथ गति कुसल साथ सब लीन्हे। चले चित्रकूटहिं चितु दीन्हें॥रामसखा कर दीन्हें लागू। चलत देह धरि जनु अनुरागू॥॥२॥
फिर रास्ता जाननेवाले साथियोंको लेकर सब चित्रकूटकी ओर चित्त लगाए चल पड़े। भरत रामसखा गुहका हाथ थामे ऐसे चल रहे हैं मानो प्रेम स्वयं शरीर धारण किए हो।
नहिं पद त्रान सीस नहिं छाया। पेमु नेमु ब्रतु धरमु अमाया॥लखन राम सिय पंथ कहानी। पूँछत सखहि कहत मृदु बानी॥॥३॥
न पैरोंमें जूते हैं, न सिरपर छाया - उनका प्रेम, नियम, व्रत और धर्म पूरी तरह निष्कपट है। वे सखासे लक्ष्मण, राम और सीताके रास्तेकी बातें पूछते हैं, और वह कोमल वाणीमें बताता जाता है।
राम बास थल बिटप बिलोकें। उर अनुराग रहत नहिं रोकैं॥देखि दसा सुर बरिसहिं फूला। भइ मृदु महि मगु मंगल मूला॥॥४॥
राम के ठहरनेकी जगहों और पेड़ोंको देखकर उनके हृदयका प्रेम रोके नहीं रुकता। यह देखकर देवता फूल बरसाते हैं, धरती कोमल हो जाती है और रास्ता मानो मंगलकी जड़ बन जाता है।
किए जाहिं छाया जलद सुखद बहइ बर बात।तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहि जात॥२१६॥
बादल छाया कर रहे हैं, सुखद हवा बह रही है - भरतके जाते समय रास्ता जितना सुखद बना, उतना राम के लिए भी नहीं बना था।
जड़ चेतन मग जीव घनेरे। जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे॥ते सब भए परम पद जोगू। भरत दरस मेटा भव रोगू॥॥१॥
रास्तेमें अनगिनत जड़-चेतन जीव थे। जिन्हें प्रभुने देखा या जिन्होंने प्रभुको देखा, वे सब परमपदके अधिकारी बन गए। पर भरतके दर्शनने तो उनका जन्म-मरणका रोग ही मिटा दिया।
यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं। सुमिरत जिनहि रामु मन माहीं॥बारक राम कहत जग जेऊ। होत तरन तारन नर तेऊ॥॥२॥
भरतके लिए यह कोई बड़ी बात नहीं, जिन्हें राम खुद अपने मनमें स्मरण करते हैं। संसारमें जो एक बार भी राम कह ले, वह भी तरने-तारनेवाला बन जाता है।
भरतु राम प्रिय पुनि लघु भ्राता। कस न होइ मगु मंगलदाता॥सिद्ध साधु मुनिबर अस कहहीं। भरतहि निरखि हरषु हियँ लहहीं॥॥३॥
फिर भरत तो राम के प्रिय और छोटे भाई हैं, तब उनके लिए रास्ता मंगलदायी क्यों न हो? सिद्ध, साधु और श्रेष्ठ मुनि ऐसा कहते हैं और भरतको देखकर मनमें हर्षित होते हैं।
देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू। जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू॥गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई। रामहि भरतहि भेंट न होई॥॥४॥
भरतका यह प्रभाव देखकर इंद्रको चिंता हुई। संसार जैसा खुद होता है वैसा ही दूसरोंको देखता है। उसने गुरु बृहस्पतिसे कहा - प्रभु, ऐसा उपाय करें कि राम और भरतकी भेंट ही न हो।
रामु सँकोची प्रेम बस भरत सपेम पयोधि।बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि॥२१७॥
राम संकोची और प्रेमके वश हैं, भरत प्रेमके सागर हैं - बनी-बनाई बात बिगड़नेको है, इसलिए कोई छल ढूँढ़कर उपाय करें।
बचन सुनत सुरगुरु मुसकाने। सहसनयन बिनु लोचन जाने॥मायापति सेवक सन माया। करइ त उलटि परइ सुरराया॥॥१॥
यह सुनते ही देवगुरु बृहस्पति मुस्कुराए, उन्होंने हजार आँखोंवाले इंद्रको समझका अंधा जाना और कहा - देवराज, माया के स्वामी राम के सेवकके साथ जो माया करता है, वह पलटकर खुद उसीपर आ पड़ती है।
तब किछु कीन्ह राम रुख जानी। अब कुचालि करि होइहि हानी॥सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ। निज अपराध रिसाहिं न काऊ॥॥२॥
पहले तो राम का रुख देखकर कुछ किया था, अब कुचाल करनेसे नुकसान ही होगा। सुनो देवराज, रघुनाथका स्वभाव यह है कि वे अपने खिलाफ किए अपराधसे कभी क्रोधित नहीं होते।
जो अपराधु भगत कर करई। राम रोष पावक सो जरई॥लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा। यह महिमा जानहिं दुरबासा॥॥३॥
पर जो कोई राम के भक्तका अपराध करता है, वह राम के क्रोधरूपी आगमें जल जाता है। लोक और वेद दोनोंमें यह कथा प्रसिद्ध है, इस महिमाको दुर्वासा जानते हैं।
भरत सरिस को राम सनेही। जगु जप राम रामु जप जेही॥॥४॥
सारा जगत राम को जपता है, और राम जिन्हें जपते हैं, उन भरतके समान राम का प्रेमी और कौन होगा?
मनहुँ न आनिअ अमरपति रघुबर भगत अकाजु।अजसु लोक परलोक दुख दिन दिन सोक समाजु॥२१८॥
देवराज, रघुकुलश्रेष्ठ राम के भक्तका काम बिगाड़नेकी बात मनमें भी मत लाओ - इससे लोकमें अपयश, परलोकमें दुख और दिन-ब-दिन शोक ही बढ़ेगा।
सुनु सुरेस उपदेसु हमारा। रामहि सेवकु परम पिआरा॥मानत सुखु सेवक सेवकाई। सेवक बैर बैरु अधिकाई॥॥१॥
सुनो देवराज, हमारा यह उपदेश सुनो - राम को अपना सेवक सबसे प्रिय है। वे सेवककी सेवासे सुख पाते हैं और सेवकसे वैर करनेको सबसे बड़ा वैर मानते हैं।
जद्यपि सम नहिं राग न रोषू। गहहिं न पाप पूनु गुन दोषू॥करम प्रधान बिस्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फलु चाखा॥॥२॥
यद्यपि वे समभाव हैं - न राग, न रोष, न किसीका पाप-पुण्य या गुण-दोष पकड़ते हैं। उन्होंने संसारमें कर्मको ही प्रधान बना रखा है, जो जैसा करता है वैसा ही फल पाता है।
तदपि करहिं सम बिषम बिहारा। भगत अभगत हृदय अनुसारा॥अगुन अलेप अमान एकरस। रामु सगुन भए भगत पेम बस॥॥३॥
फिर भी वे भक्त और अभक्तके हृदयके अनुसार अलग-अलग व्यवहार करते हैं। गुणरहित, निर्लेप, मानरहित और सदा एकरस राम भक्तके प्रेमवश ही सगुण बने हैं।
राम सदा सेवक रुचि राखी। बेद पुरान साधु सुर साखी॥अस जियँ जानि तजहु कुटिलाई। करहु भरत पद प्रीति सुहाई॥॥४॥
राम सदा अपने सेवककी इच्छा पूरी करते आए हैं, वेद-पुराण, साधु और देवता इसके साक्षी हैं। यह जानकर कुटिलता छोड़ो और भरतके चरणोंमें सुंदर प्रेम रखो।
राम भगत परहित निरत पर दुख दुखी दयाल।भगत सिरोमनि भरत तें जनि डरपहु सुरपाल॥२१९॥
राम के भक्त सदा दूसरोंके हितमें लगे रहते हैं, दूसरोंके दुखसे दुखी होते हैं और दयालु होते हैं। भक्तोंमें शिरोमणि भरतसे तो बिल्कुल मत डरो, देवराज।
सत्यसंध प्रभु सुर हितकारी। भरत राम आयस अनुसारी॥स्वारथ बिबस बिकल तुम्ह होहू। भरत दोसु नहिं राउर मोहू॥॥१॥
प्रभु राम सत्यप्रतिज्ञ और देवताओंके हितैषी हैं, भरत भी राम की आज्ञाके अनुसार ही चलते हैं। तुम व्यर्थ ही स्वार्थवश व्याकुल हो रहे हो, इसमें भरतका कोई दोष नहीं, यह तुम्हारा ही मोह है।
सुनि सुरबर सुरगुर बर बानी। भा प्रमोदु मन मिटी गलानी॥बरषि प्रसून हरषि सुरराऊ। लगे सराहन भरत सुभाऊ॥॥२॥
देवगुरु बृहस्पतिकी यह उत्तम वाणी सुनकर इंद्रके मनमें आनंद हुआ और चिंता मिट गई। हर्षित होकर देवराजने फूल बरसाए और भरतके स्वभावकी सराहना करने लगे।
एहि बिधि भरत चले मग जाहीं। दसा देखि मुनि सिद्ध सिहाहीं॥जबहिं रामु कहि लेहिं उसासा। उमगत पेमु मनहुँ चहु पासा॥॥३॥
इस तरह भरत रास्तेमें चले जा रहे हैं, उनकी यह दशा देखकर मुनि और सिद्ध भी ईर्ष्यासे मुग्ध होते हैं। भरत जब भी राम कहकर लंबी साँस लेते हैं, चारों ओर मानो प्रेम उमड़ पड़ता है।
द्रवहिं बचन सुनि कुलिस पषाना। पुरजन पेमु न जाइ बखाना॥बीच बास करि जमुनहिं आए। निरखि नीरु लोचन जल छाए॥॥४॥
उनके वचन सुनकर वज्र और पत्थर भी पिघल जाते हैं, अयोध्यावासियोंका प्रेम कहते नहीं बनता। बीचमें ठहरकर वे यमुनाके तटपर पहुँचे, यमुनाका जल देखकर उनकी आँखें भर आईं।
रघुबर बरन बिलोकि बर बारि समेत समाज।होत मगन बारिधि बिरह चढ़े बिबेक जहाज॥२२०॥
राम के रंग-जैसा सुंदर जल देखकर सारा समाज विरहके सागरमें डूबते-डूबते विवेकरूपी जहाजपर चढ़ गया।
जमुन तीर तेहि दिन करि बासू। भयउ समय सम सबहि सुपासू॥रातहिं घाट घाट की तरनी। आईं अगनित जाहिं न बरनी॥॥१॥
उस दिन यमुनातटपर ठहरे, समयके अनुसार सबके लिए अच्छी व्यवस्था हो गई। रातों-रात घाट-घाटकी अनगिनत नावें वहाँ आ गईं, जिनका वर्णन नहीं हो सकता।
प्रात पार भए एकहि खेंवाँ। तोषे रामसखा की सेवाँ॥चले नहाइ नदिहि सिर नाई। साथ निषादनाथ दोउ भाई॥॥२॥
सुबह एक ही खेवमें सब पार हो गए, रामसखा निषादराजकी इस सेवासे सब संतुष्ट हुए। फिर स्नान करके, नदीको सिर नवाकर निषादराजके साथ दोनों भाई चल पड़े।
आगें मुनिबर बाहन आछें। राजसमाज जाइ सबु पाछें॥तेहिं पाछें दोउ बंधु पयादें। भूषन बसन बेष सुठि सादें॥॥३॥
आगे बढ़िया सवारियोंपर मुनिश्रेष्ठ हैं, पीछे सारा राजसमाज चल रहा है, उसके पीछे दोनों भाई बिल्कुल सादे वस्त्र-आभूषणोंमें पैदल चल रहे हैं।
सेवक सुह्रद सचिवसुत साथा। सुमिरत लखनु सीय रघुनाथा॥जहँ जहँ राम बास बिश्रामा। तहँ तहँ करहिं सप्रेम प्रनामा॥॥४॥
सेवक, मित्र और मंत्रीपुत्र साथ हैं, लक्ष्मण-सीता-रघुनाथका स्मरण करते चल रहे हैं। जहाँ-जहाँ राम ने विश्राम किया था, वहाँ-वहाँ प्रेमपूर्वक प्रणाम करते हैं।
मगबासी नर नारि सुनि धाम काम तजि धाइ।देखि सरूप सनेह सब मुदित जनम फलु पाइ॥२२१॥
रास्तेमें रहनेवाले स्त्री-पुरुष यह सुनकर घर-बार छोड़कर दौड़ पड़ते हैं, और उनका रूप-प्रेम देखकर जन्म सफल हुआ मानकर आनंदित होते हैं।
कहहिं सपेम एक एक पाहीं। रामु लखनु सखि होहिं कि नाहीं॥बय बपु बरन रूप सोइ आली। सीलु सनेहु सरिस सम चाली॥॥१॥
गाँवकी स्त्रियाँ आपसमें प्रेमसे कहती हैं - सखी, ये राम-लक्ष्मण हैं या नहीं? इनकी उम्र, देह, रंग-रूप, शील-स्नेह और चाल सब वैसे ही हैं।
बेषु न सो सखि सीय न संगा। आगें अनी चली चतुरंगा॥नहिं प्रसन्न मुख मानस खेदा। सखि संदेहु होइ एहिं भेदा॥॥२॥
पर सखी, न वह वेष है, न सीता साथ हैं, और आगे तो पूरी सेना चल रही है, न मुख प्रसन्न है, मनमें कोई खेद जान पड़ता है - इसी भेदसे संदेह होता है।
तासु तरक तियगन मन मानी। कहहिं सकल तेहि सम न सयानी॥तेहि सराहि बानी फुरि पूजी। बोली मधुर बचन तिय दूजी॥॥३॥
उसकी यह बात सबको जँच गई, सब कहने लगीं कि इससे चतुर कोई नहीं। उसकी सराहना करके, 'तेरी बात सच है' कहकर दूसरी स्त्री मीठे वचन बोली -
कहि सपेम सब कथाप्रसंगू। जेहि बिधि राम राज रस भंगू॥भरतहि बहुरि सराहन लागी। सील सनेह सुभाय सुभागी॥॥४॥
प्रेमपूर्वक वह सारी कथा सुनाई कि कैसे राम का राजतिलक भंग हुआ, फिर भरतके शील, स्नेह और स्वभावकी सराहना करने लगी।
चलत पयादें खात फल पिता दीन्ह तजि राजु।जात मनावन रघुबरहि भरत सरिस को आजु॥२२२॥
देखो, यह भरत पिताका दिया राज्य त्यागकर पैदल फल खाते हुए राम को मनाने जा रहे हैं - इनके समान आज कौन है!
भायप भगति भरत आचरनू। कहत सुनत दुख दूषन हरनू॥जो कछु कहब थोर सखि सोई। राम बंधु अस काहे न होई॥॥१॥
भरतका भाईपन, भक्ति और आचरण सुनने-कहनेसे ही दुख और दोष दूर हो जाते हैं। इनके बारेमें जो कुछ कहा जाए वह कम है - राम का भाई ऐसा ही तो होना चाहिए।
हम सब सानुज भरतहि देखें। भइन्ह धन्य जुबती जन लेखें॥सुनि गुन देखि दसा पछिताहीं। कैकइ जननि जोगु सुतु नाहीं॥॥२॥
शत्रुघ्नसहित भरतको देखकर हम भी आज धन्य स्त्रियोंमें गिनी जाने लगीं। इनके गुण सुनकर और दशा देखकर स्त्रियाँ पछताती हैं - यह पुत्र कैकेयी-जैसी माँके लायक नहीं।
कोउ कह दूषनु रानिहि नाहिन। बिधि सबु कीन्ह हमहि जो दाहिन॥कहँ हम लोक बेद बिधि हीनी। लघु तिय कुल करतूति मलीनी॥॥३॥
कोई कहती है - रानीका भी दोष नहीं, यह सब विधाताने ही किया जो हमारे भाग्यमें था। कहाँ हम लोक-वेद दोनोंसे हीन, कुल और करनीसे मलिन तुच्छ स्त्रियाँ,
बसहिं कुदेस कुगाँव कुबामा। कहँ यह दरसु पुन्य परिनामा॥अस अनंदु अचिरिजु प्रति ग्रामा। जनु मरुभूमि कलपतरु जामा॥॥४॥
जो बुरे देश-गाँवमें रहती हैं, और कहाँ पुण्योंके फलस्वरूप यह दर्शन! हर गाँवमें ऐसा आनंद-अचरज छाया है मानो मरुभूमिमें कल्पवृक्ष उग आया हो।
भरत दरसु देखत खुलेउ मग लोगन्ह कर भागु।जनु सिंघलबासिन्ह भयउ बिधि बस सुलभ प्रयागु॥२२३॥
भरतका रूप देखते ही रास्तेके लोगोंका भाग्य खुल गया, मानो दैवयोगसे सिंहलद्वीपवासियोंको प्रयाग सुलभ हो गया हो।
निज गुन सहित राम गुन गाथा। सुनत जाहिं सुमिरत रघुनाथा॥तीरथ मुनि आश्रम सुरधामा। निरखि निमज्जहिं करहिं प्रनामा॥॥१॥
अपने गुणोंसहित राम के गुणोंकी कथा सुनते और रघुनाथको स्मरण करते हुए भरत चले जा रहे हैं, तीर्थ-मुनि आश्रम-मंदिर देखकर स्नान और प्रणाम करते हैं,
मनहीं मन मागहिं बरु एहू। सीय राम पद पदुम सनेहू॥मिलहिं किरात कोल बनबासी। बैखानस बटु जती उदासी॥॥२॥
और मन-ही-मन यही वरदान माँगते हैं कि सीता-रामके चरणोंमें प्रेम बना रहे। रास्तेमें भील, कोल-जैसे वनवासी और वानप्रस्थी, ब्रह्मचारी, संन्यासी मिलते हैं,
करि प्रनामु पूँछहिं जेहिं तेही। केहि बन लखनु रामु बैदेही॥ते प्रभु समाचार सब कहहीं। भरतहि देखि जनम फलु लहहीं॥॥३॥
जिससे भी मिलते हैं प्रणाम करके पूछते हैं - लक्ष्मण, राम और जानकी किस वनमें हैं? वे सब समाचार बताते हैं और भरतको देखकर जन्म सफल मानते हैं।
जे जन कहहिं कुसल हम देखे। ते प्रिय राम लखन सम लेखे॥एहि बिधि बूझत सबहि सुबानी। सुनत राम बनबास कहानी॥॥४॥
जो कहते हैं कि हमने उन्हें कुशलपूर्वक देखा है, उन्हें राम-लक्ष्मणके समान ही प्रिय मानते हैं। इस तरह सबसे मीठी वाणीमें पूछते और राम के वनवासकी कहानी सुनते जाते हैं।
तेहि बासर बसि प्रातहीं चले सुमिरि रघुनाथ।राम दरस की लालसा भरत सरिस सब साथ॥२२४॥
उस दिन वहीं ठहरकर सुबह ही रघुनाथको स्मरण करके चल पड़े। साथके सब लोगोंको भी भरतकी तरह ही राम के दर्शनकी लालसा है।
मंगल सगुन होहिं सब काहू। फरकहिं सुखद बिलोचन बाहू॥भरतहि सहित समाज उछाहू। मिलिहहिं रामु मिटिहि दुख दाहू॥॥१॥
सबको शुभ शकुन हो रहे हैं, सुखदायी नेत्र-भुजाएँ फड़क रही हैं। भरतसहित सारे समाजको उत्साह है कि राम मिलेंगे और दुखकी जलन मिट जाएगी।
करत मनोरथ जस जियँ जाके। जाहिं सनेह सुराँ सब छाके॥सिथिल अंग पग मग डगि डोलहिं। बिहबल बचन पेम बस बोलहिं॥॥२॥
जिसके मनमें जैसा भाव है वह वैसा ही मनोरथ करता है, सब स्नेहके नशेमें डूबे चले जा रहे हैं। शरीर शिथिल है, पैर डगमगा रहे हैं, प्रेमवश विह्वल वचन बोल रहे हैं।
रामसखाँ तेहि समय देखावा। सैल सिरोमनि सहज सुहावा॥जासु समीप सरित पय तीरा। सीय समेत बसहिं दोउ बीरा॥॥३॥
उसी समय रामसखाने वह सुंदर पर्वत दिखाया, जिसके पास पयस्विनी नदीके तटपर सीतासहित दोनों भाई रहते हैं।
देखि करहिं सब दंड प्रनामा। कहि जय जानकि जीवन रामा॥प्रेम मगन अस राज समाजू। जनु फिरि अवध चले रघुराजू॥॥४॥
उसे देखकर सब 'जानकी-जीवन राम की जय' कहते हुए दंडवत प्रणाम करते हैं, राजसमाज प्रेममें ऐसा डूबा है मानो रघुनाथ स्वयं अयोध्या लौट रहे हों।
भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकइ न सेषु।कबिहिं अगम जिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु॥२२५॥
उस समय भरतका जो प्रेम था, वैसा शेष भी बयान नहीं कर सकते - कविके लिए वह उतना ही अगम है जितना अहंकारी मनके लिए ब्रह्मानंद।
सकल सनेह सिथिल रघुबर कें। गए कोस दुइ दिनकर ढरकें॥जलु थलु देखि बसे निसि बीतें। कीन्ह गवन रघुनाथ पिरीतें॥॥१॥
राम के प्रेममें सब इतने शिथिल हो गए कि सूर्यास्ततक बस दो कोस ही चल पाए, फिर सुविधाजनक जगह देखकर रातभर रुके रहे। रात बीतनेपर रघुनाथके प्रेमी भरतने आगे प्रस्थान किया।
उहाँ रामु रजनी अवसेषा। जागे सीय सपन अस देखा॥सहित समाज भरत जनु आए। नाथ बियोग ताप तन ताए॥॥२॥
उधर राम रात शेष रहते ही जाग गए, सीताने ऐसा स्वप्न देखा कि मानो समाजसहित भरत आए हैं, प्रभुके वियोगकी पीड़ासे उनकी देह जल रही थी।
सकल मलिन मन दीन दुखारी। देखीं सासु आन अनुहारी॥सुनि सिय सपन भरे जल लोचन। भए सोचबस सोच बिमोचन॥॥३॥
सब मनमें उदास, दीन और दुखी दिखे, सासुएँ बिल्कुल दूसरी सूरतमें दिखीं। सीताका स्वप्न सुनकर राम की आँखें भर आईं, सबको सांत्वना देनेवाले प्रभु खुद चिंतित हो उठे।
लखन सपन यह नीक न होई। कठिन कुचाह सुनाइहि कोई॥अस कहि बंधु समेत नहाने। पूजि पुरारि साधु सनमाने॥॥४॥
बोले - लक्ष्मण, यह स्वप्न शुभ नहीं, कोई कठोर खबर आनेवाली है। ऐसा कहकर भाईसहित स्नान किया, शिवजीका पूजन करके साधुओंका सम्मान किया।
सनमानि सुर मुनि बंदि बैठे उत्तर दिसि देखत भए।नभ धूरि खग मृग भूरि भागे बिकल प्रभु आश्रम गए॥तुलसी उठे अवलोकि कारनु काह चित सचकित रहे।सब समाचार किरात कोलन्हि आइ तेहि अवसर कहे॥।
देवताओंका पूजन और मुनियोंका वंदन करके राम बैठ गए और उत्तर दिशाकी ओर देखने लगे। आकाशमें धूल छाई है, बहुत-से पक्षी-पशु व्याकुल होकर भागते हुए आश्रमकी ओर आ रहे हैं। यह देखकर राम उठे और सोचमें पड़ गए कि यह क्या है। उसी समय कोल-भीलोंने आकर सब समाचार सुनाए।
सुनत सुमंगल बैन मन प्रमोद तन पुलक भर।सरद सरोरुह नैन तुलसी भरे सनेह जल॥२२६॥
यह शुभ समाचार सुनते ही राम के मनमें आनंद छा गया, शरीर रोमांचित हो उठा और शरद-ऋतुके कमल-जैसे नेत्र प्रेमाश्रुओंसे भर आए।
बहुरि सोचबस भे सियरवनू। कारन कवन भरत आगवनू॥एक आइ अस कहा बहोरी। सेन संग चतुरंग न थोरी॥॥१॥
सीतापति राम फिर चिंतित हो उठे कि भरतके आनेका क्या कारण होगा। तभी किसीने आकर बताया कि उनके साथ बड़ी भारी सेना भी है।
सो सुनि रामहि भा अति सोचू। इत पितु बच इत बंधु सकोचू॥भरत सुभाउ समुझि मन माहीं। प्रभु चित हित थिति पावत नाहीं॥॥२॥
यह सुनकर राम को बड़ी चिंता हुई - इधर पिताका वचन, उधर भाई भरतका संकोच। भरतका स्वभाव याद करके भी प्रभुका मन किसी स्थिर निष्कर्षपर नहीं पहुँच पा रहा था।
समाधान तब भा यह जाने। भरतु कहे महुँ साधु सयाने॥लखन लखेउ प्रभु हृदयँ खभारू। कहत समय सम नीति बिचारू॥॥३॥
तब यह सोचकर समाधान हुआ कि भरत साधु और समझदार हैं, मेरी बात माननेवाले हैं। लक्ष्मणने देखा कि प्रभुके मनमें उलझन है, तो वे समयानुसार अपनी नीतिभरी बात कहने लगे -
बिनु पूँछ कछु कहउँ गोसाईं। सेवकु समय न ढीठ ढिठाई॥तुम्ह सर्बग्य सिरोमनि स्वामी। आपनि समुझि कहउँ अनुगामी॥॥४॥
स्वामी, बिना पूछे ही कुछ कह रहा हूँ, पर सेवक समयपर बोले तो ढिठाई नहीं मानी जाती। आप सर्वज्ञोंमें शिरोमणि हैं, मैं तो सेवक होकर अपनी समझकी बात कह रहा हूँ।
नाथ सुह्रद सुठि सरल चित सील सनेह निधान।सब पर प्रीति प्रतीति जियँ जानिअ आपु समान॥२२७॥
नाथ, आप परम सुहृद, सरलहृदय और शील-स्नेहके भंडार हैं, सबपर आपका प्रेम और विश्वास है, और अपने मनमें सबको अपने ही समान मानते हैं।
बिषई जीव पाइ प्रभुताई। मूढ़ मोह बस होहिं जनाई॥भरतु नीति रत साधु सुजाना। प्रभु पद प्रेम सकल जगु जाना॥॥१॥
पर मूढ़ विषयी जीव सत्ता पाकर मोहवश अपना असली रूप दिखा देते हैं। भरत तो नीतिपरायण, साधु और चतुर हैं, और आपके चरणोंमें उनका प्रेम है, यह सारा जगत जानता है।
तेऊ आजु राम पदु पाई। चले धरम मरजाद मेटाई॥कुटिल कुबंध कुअवसरु ताकी। जानि राम बनवास एकाकी॥॥२॥
वे भरत भी आज आपका सिंहासन पाकर धर्मकी मर्यादा मिटाकर चले हैं। यह कुटिल भाई कुसमय देखकर और आपको वनमें अकेला-असहाय जानकर,
करि कुमंत्रु मन साजि समाजू। आए करै अकंटक राजू॥कोटि प्रकार कलपि कुटलाई। आए दल बटोरि दोउ भाई॥॥३॥
मनमें बुरी चाल सोचकर, सारा समाज जोड़कर, राज्यको निष्कंटक बनाने आए हैं - अनगिनत कुटिलताएँ रचकर सेना बटोरकर दोनों भाई आ पहुँचे हैं।
जौं जियँ होति न कपट कुचाली। केहि सोहाति रथ बाजि गजाली॥भरतहि दोसु देइ को जाएँ। जग बौराइ राज पदु पाएँ॥॥४॥
यदि इनके मनमें कपट न होता तो रथ-घोड़े-हाथियोंकी यह कतार किसे भाती? पर भरतको ही व्यर्थ दोष क्यों दें - राजपद पाकर तो सारी दुनिया ही पगला जाती है।
ससि गुर तिय गामी नघुषु चढ़ेउ भूमिसुर जान।लोक बेद तें बिमुख भा अधम न बेन समान॥२२८॥
चंद्रमा गुरुपत्नीगामी हुआ, राजा नहुष ब्राह्मणोंकी पालकीपर चढ़ा - पर राजा वेनके समान नीच कोई नहीं, जो लोक-वेद दोनोंसे विमुख हो गया।
सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू। केहि न राजमद दीन्ह कलंकू॥भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ। रिपु रिन रंच न राखब काऊ॥॥१॥
सहस्रबाहु, इंद्र, त्रिशंकु - किसे राजमदने कलंकित नहीं किया? भरतने यह उपाय ठीक ही किया है, शत्रु और ऋणको कभी जरा भी शेष नहीं छोड़ना चाहिए।
एक कीन्हि नहिं भरत भलाई। निदरे रामु जानि असहाई॥समुझि परिहि सोउ आजु बिसेषी। समर सरोष राम मुखु पेखी॥॥२॥
हाँ, भरतने एक बात गलत की - आपको असहाय जानकर निरादर किया। पर आज संग्राममें आपका क्रोधित मुख देखकर उसे भी यह बात अच्छी तरह समझ आ जाएगी।
एतना कहत नीति रस भूला। रन रस बिटपु पुलक मिस फूला॥प्रभु पद बंदि सीस रज राखी। बोले सत्य सहज बलु भाषी॥॥३॥
इतना कहते ही लक्ष्मण नीतिकी बात भूल गए और युद्धरसका उत्साह मानो रोमांचके बहाने फूट पड़ा। प्रभुके चरण वंदन करके, चरण-धूल सिरपर रखकर वे सच्चे स्वाभाविक बलसे बोले -
अनुचित नाथ न मानब मोरा। भरत हमहि उपचार न थोरा॥कहँ लगि सहिअ रहिअ मनु मारें। नाथ साथ धनु हाथ हमारें॥॥४॥
नाथ, मेरी बात अनुचित मत मानिए, भरतने हमारे साथ कम बुरा बर्ताव नहीं किया। कहाँतक सहा जाए, कहाँतक मन मारकर रहा जाए, जब स्वामी साथ हों और धनुष हाथमें हो!
छत्रि जाति रघुकुल जनमु राम अनुग जगु जान।लातहुँ मारें चढ़ति सिर नीच को धूरि समान॥२२९॥
क्षत्रिय जाति, रघुकुलमें जन्म और आपका अनुगामी होना - यह सब जगत जानता है। धूलके समान नीच भी लात पड़नेपर सिरपर चढ़ ही जाती है।
उठि कर जोरि रजायसु मागा। मनहुँ बीर रस सोवत जागा॥बाँधि जटा सिर कसि कटि भाथा। साजि सरासनु सायकु हाथा॥॥१॥
यों कहकर लक्ष्मण खड़े हो गए, हाथ जोड़कर आज्ञा माँगी, मानो सोया हुआ वीररस जाग उठा हो। जटा बाँधकर, कमरमें तरकस कसकर, धनुष-बाण हाथमें लेकर बोले -
आजु राम सेवक जसु लेऊँ। भरतहि समर सिखावन देऊँ॥राम निरादर कर फलु पाई। सोवहुँ समर सेज दोउ भाई॥॥२॥
आज मैं राम के सेवकका यश लूँगा और भरतको युद्धमें सबक सिखाऊँगा। राम के निरादरका फल पाकर दोनों भाई रणभूमिकी शय्यापर सो जाएँ।
आइ बना भल सकल समाजू। प्रगट करउँ रिस पाछिल आजू॥जिमि करि निकर दलइ मृगराजू। लेइ लपेटि लवा जिमि बाजू॥॥३॥
अच्छा हुआ कि सारा समाज एक जगह आ जमा - आज मैं पुराना सारा क्रोध निकालूँगा, जैसे सिंह हाथियोंके झुंडको कुचलता है, जैसे बाज लवेको लपेटमें ले लेता है,
तैसेहिं भरतहि सेन समेता। सानुज निदरि निपातउँ खेता॥जौं सहाय कर संकरु आई। तौ मार रन राम दोहाई॥॥४॥
वैसे ही भरतको सेनासहित, छोटे भाईसहित, तिरस्कृत करके मैदानमें पटक दूँगा। शिव भी सहायताको आएँ तो भी राम की सौगंध, मैं उन्हें रणमें मार डालूँगा।
अति सरोष माखे लखनु लखि सुनि सपथ प्रवान।सभय लोक सब लोकपति चाहत भभरि भगान॥२३०॥
लक्ष्मणका क्रोध और उनकी सच्ची सौगंध सुनकर सब भयभीत हो उठे, लोकपाल भी घबराकर भागना चाहने लगे।
जगु भय मगन गगन भइ बानी। लखन बाहुबलु बिपुल बखानी॥तात प्रताप प्रभाउ तुम्हारा। को कहि सकइ को जाननिहारा॥॥१॥
सारा जगत भयसे डूब गया, तभी आकाशसे लक्ष्मणके अपार बाहुबलकी प्रशंसा करती वाणी गूँजी - तात, तुम्हारे प्रताप और प्रभावको कौन बयान कर सकता है, कौन जान सकता है?
अनुचित उचित काजु किछु होऊ। समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ॥सहसा करि पाछें पछिताहीं। कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं॥॥२॥
पर कोई भी काम हो, उचित-अनुचित समझ-बूझकर करें तो सब सराहते हैं। वेद और विद्वान कहते हैं जो जल्दबाजीमें काम करके बादमें पछताए, वह बुद्धिमान नहीं।
सुनि सुर बचन लखन सकुचाने। राम सीय सादर सनमाने॥कही तात तुम्ह नीति सुहाई। सब तें कठिन राजमदु भाई॥॥३॥
देववाणी सुनकर लक्ष्मण सकुचा गए, राम और सीताने उन्हें आदरसे सम्मानित किया - तात, तुमने बड़ी सुंदर नीति कही, राजमद ही सबसे कठिन मद है।
जो अचवँत नृप मातहिं तेई। नाहिन साधुसभा जेहिं सेई॥सुनहु लखन भल भरत सरीसा। बिधि प्रपंच महँ सुना न दीसा॥॥४॥
जिन्होंने सत्संगका सुख नहीं जाना, वे ही राजमदरूपी शराब पीते ही मदहोश हो जाते हैं। सुनो लक्ष्मण, भरत-जैसा उत्तम पुरुष ब्रह्माकी इस सृष्टिमें न कभी सुना गया, न देखा गया।
भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ।कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ॥२३१॥
ब्रह्मा-विष्णु-शिवका पद पाकर भी भरतको राजमद नहीं हो सकता - क्या कभी काँजीकी बूँदोंसे क्षीरसागर नष्ट हो सकता है?
तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई। गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई॥गोपद जल बूड़हिं घटजोनी। सहज छमा बरु छाड़ै छोनी॥॥१॥
अंधेरा चाहे दोपहरके सूरजको निगल जाए, आकाश चाहे बादलोंमें विलीन हो जाए, गोपदभर पानीमें अगस्त्य डूब जाएँ, धरती चाहे अपना स्वाभाविक धैर्य त्याग दे,
मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई। होइ न नृपमदु भरतहि भाई॥लखन तुम्हार सपथ पितु आना। सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना॥॥२॥
मच्छरकी फूँकसे चाहे सुमेरु उड़ जाए, पर भाई, भरतको राजमद कभी नहीं हो सकता। लक्ष्मण, मैं तुम्हारी और पिताकी सौगंध खाकर कहता हूँ - भरत-जैसा पवित्र भाई संसारमें कोई नहीं।
सगुन खीरु अवगुन जलु ताता। मिलइ रचइ परपंचु बिधाता॥भरतु हंस रबिबंस तड़ागा। जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा॥॥३॥
गुणरूपी दूध और अवगुणरूपी पानीको मिलाकर विधाता यह संसार रचता है, पर भरतने सूर्यवंशरूपी तालाबमें हंस बनकर जन्म लेकर गुण और दोषको अलग-अलग कर दिखाया।
गहि गुन पय तजि अवगुन बारी। निज जस जगत कीन्हि उजिआरी॥कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ। पेम पयोधि मगन रघुराऊ॥॥४॥
गुणरूपी दूध ग्रहण करके और अवगुणरूपी पानी त्यागकर भरतने अपने यशसे संसारमें उजाला कर दिया। भरतके गुण, शील और स्वभावकी चर्चा करते-करते रघुनाथ प्रेमसागरमें डूब गए।
सुनि रघुबर बानी बिबुध देखि भरत पर हेतु।सकल सराहत राम सो प्रभु को कृपानिकेतु॥२३२॥
राम की यह वाणी सुनकर और भरतपर उनका प्रेम देखकर सब देवता सराहने लगे - राम-जैसा कृपाका धाम प्रभु और कौन होगा।
जौं न होत जग जनम भरत को। सकल धरम धुर धरनि धरत को॥कबि कुल अगम भरत गुन गाथा। को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा॥॥१॥
यदि भरतका जन्म ही न होता तो धरतीपर सारे धर्मोंकी धुरी कौन थामता? रघुनाथ, कविकुलके लिए भी अगम भरतके गुणोंकी कथा आपके सिवा और कौन जान सकता है?
लखन राम सियँ सुनि सुर बानी। अति सुखु लहेउ न जाइ बखानी॥इहाँ भरतु सब सहित सहाए। मंदाकिनीं पुनीत नहाए॥॥२॥
लक्ष्मण, राम और सीताने देवताओंकी यह वाणी सुनकर अपार सुख पाया, जो बयान नहीं हो सकता। इधर भरतने सारे समाजके साथ पवित्र मंदाकिनीमें स्नान किया।
सरित समीप राखि सब लोगा। मागि मातु गुर सचिव नियोगा॥चले भरतु जहँ सिय रघुराई। साथ निषादनाथु लघु भाई॥॥३॥
फिर सबको नदीके किनारे ठहराकर, माता-गुरु-मंत्रीकी आज्ञा लेकर निषादराज और शत्रुघ्नको साथ लेकर भरत वहाँ चल पड़े जहाँ सीता-राम थे।
समुझि मातु करतब सकुचाहीं। करत कुतरक कोटि मन माहीं॥रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ। उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ॥॥४॥
माताकी करनी याद करके वे सकुचाते हैं और मनमें तरह-तरहकी शंका करते हैं - कहीं राम, लक्ष्मण, सीता मेरा नाम सुनकर यह जगह छोड़कर कहीं और न चले जाएँ।
मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं सो थोर।अघ अवगुन छमि आदरहिं समुझि आपनी ओर॥२३३॥
मुझे माताके पक्षका मानकर वे जो भी करेंगे वह कम ही होगा, पर अपना नाता याद करके मेरे पाप-अवगुण क्षमा करके मेरा आदर ही करेंगे।
जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी। जौ सनमानहिं सेवकु मानी॥मोरें सरन रामहि की पनही। राम सुस्वामि दोसु सब जनही॥॥१॥
चाहे मलिन मन जानकर त्याग दें, चाहे सेवक मानकर सम्मान दें - मेरे लिए तो राम की खड़ाऊँ ही शरण है, राम अच्छे स्वामी हैं, दोष तो सेवकका ही होता है।
जग जस भाजन चातक मीना। नेम पेम निज निपुन नबीना॥अस मन गुनत चले मग जाता। सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता॥॥२॥
संसारमें यशके असली हकदार तो चातक और मछली हैं, जो अपने नियम और प्रेमको हमेशा ताज़ा रखनेमें माहिर हैं। ऐसा सोचते हुए भरत रास्तेमें चलते जाते हैं, संकोच और स्नेहसे उनका पूरा शरीर शिथिल हो रहा है।
फेरत मनहुँ मातु कृत खोरी। चलत भगति बल धीरज धोरी॥जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ। तब पथ परत उताइल पाऊ॥॥३॥
माताकी करनी मानो उन्हें वापस खींचती है, पर धीरजकी धुरी थामे भरत भक्तिके बलपर आगे बढ़ते जाते हैं। जब रघुनाथका स्वभाव याद आता है तो पैर तेज़ी से पड़ने लगते हैं।
भरत दसा तेहि अवसर कैसी। जल प्रबाहँ जल अलि गति जैसी॥देखि भरत कर सोचु सनेहू। भा निषाद तेहि समय बिदेहू॥॥४॥
उस समय भरतकी दशा वैसी ही है जैसी जलके बहावमें भँवरेकी होती है। भरतका यह सोच और प्रेम देखकर निषाद भी उस पल देहकी सुध भूल गया।
लगे होन मंगल सगुन सुनि गुनि कहत निषादु।मिटिहि सोचु होइहि हरषु पुनि परिनाम बिषादु॥२३४॥
मंगल शकुन होने लगे, उन्हें देख-विचारकर निषाद कहने लगा - सोच मिटेगा, हर्ष होगा, पर अंतमें फिर विषाद भी आएगा।
सेवक बचन सत्य सब जाने। आश्रम निकट जाइ निअराने॥भरत दीख बन सैल समाजू। मुदित छुधित जनु पाइ सुनाजू॥॥१॥
भरतने सेवकके सब वचन सच्चे जाने और आश्रमके निकट जा पहुँचे। वहाँका वन-पर्वत देखकर वे ऐसे आनंदित हुए मानो भूखेको अच्छा भोजन मिल गया हो।
ईति भीति जनु प्रजा दुखारी। त्रिबिध ताप पीड़ित ग्रह मारी॥जाइ सुराज सुदेस सुखारी। होहिं भरत गति तेहि अनुहारी॥॥२॥
जैसे संकटोंसे त्रस्त, तीन तापों और ग्रह-पीड़ासे दुखी प्रजा किसी सुशासित देशमें जाकर सुखी हो जाए, भरतकी दशा ठीक वैसी ही हो रही है।
राम बास बन संपति भ्राजा। सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा॥सचिव बिरागु बिबेकु नरेसू। बिपिन सुहावन पावन देसू॥॥३॥
राम के निवाससे वनकी संपदा ऐसी शोभित है मानो अच्छा राजा पाकर प्रजा सुखी हो। यह सुहावना वन ही पवित्र देश है, विवेक इसका राजा है और वैराग्य मंत्री।
भट जम नियम सैल रजधानी। सांति सुमति सुचि सुंदर रानी॥सकल अंग संपन्न सुराऊ। राम चरन आश्रित चित चाऊ॥॥४॥
यम-नियम इसके योद्धा हैं, पर्वत राजधानी है, शांति और सुबुद्धि दो सुंदर रानियाँ हैं। यह राजा हर तरहसे संपन्न है और राम के चरणोंका आश्रय पाकर इसका मन प्रसन्न है।
जीति मोह महिपालु दल सहित बिबेक भुआलु।करत अकंटक राजु पुर सुख संपदा सुकालु॥२३५॥
मोहरूपी राजाको सेनासहित जीतकर विवेकरूपी राजा निष्कंटक राज्य कर रहा है, उसके नगरमें सुख, संपदा और सुकाल है।
बन प्रदेस मुनि बास घनेरे। जनु पुर नगर गाउँ गन खेरे॥बिपुल बिचित्र बिहग मृग नाना। प्रजा समाजु न जाइ बखाना॥॥१॥
वनप्रांतोंमें मुनियोंके बहुत-से निवास मानो शहर-गाँव-खेड़ोंका समूह हैं, अनगिनत विचित्र पक्षी-पशु ही मानो इसकी प्रजा हैं, जिसका वर्णन नहीं हो सकता।
खगहा करि हरि बाघ बराहा। देखि महिष बृष साजु सराहा॥बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा। जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा॥॥२॥
गैंडा, हाथी, सिंह, बाघ, सूअर, भैंसे, बैल देखकर इस राज्यके ठाटकी सराहना किए बिना नहीं रहा जाता। ये सब बैर भुलाकर साथ विचरते हैं, मानो यही चतुरंगिणी सेना हो।
झरना झरहिं मत्त गज गाजहिं। मनहुँ निसान बिबिधि बिधि बाजहिं॥चक चकोर चातक सुक पिक गन। कूजत मंजु मराल मुदित मन॥॥३॥
झरने झर रहे हैं, मतवाले हाथी चिंघाड़ रहे हैं - मानो कई तरहके नगाड़े बज रहे हों। चकवा, चकोर, पपीहा, तोता, कोयल और सुंदर हंस प्रसन्न मनसे कूज रहे हैं।
अलिगन गावत नाचत मोरा। जनु सुराज मंगल चहु ओरा॥बेलि बिटप तृन सफल सफूला। सब समाजु मुद मंगल मूला॥॥४॥
भौंरे गुंजार रहे हैं, मोर नाच रहे हैं, मानो इस सुशासित राज्यमें चारों ओर मंगल छाया है। बेल, वृक्ष, घास सब फल-फूलसे लदे हैं, सारा वातावरण आनंद और मंगलका मूल बना है।
राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पेमु।तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिरानें नेमु॥२३६॥
राम के इस पर्वतकी शोभा देखकर भरतके हृदयमें अपार प्रेम उमड़ा, जैसे तपस्वी नियम पूरा होनेपर तपस्याका फल पाकर सुखी होता है।
तब केवट ऊँचें चढ़ि धाई। कहेउ भरत सन भुजा उठाई॥नाथ देखिअहिं बिटप बिसाला। पाकरि जंबु रसाल तमाला॥॥१॥
तब केवट दौड़कर ऊँचाईपर चढ़ गया और भुजा उठाकर भरतसे बोला - नाथ, ये जो पाकर, जामुन, आम और तमालके विशाल वृक्ष दिख रहे हैं,
जिन्ह तरुबरन्ह मध्य बटु सोहा। मंजु बिसाल देखि मनु मोहा॥नील सघन पल्लव फल लाला। अबिरल छाहँ सुखद सब काला॥॥२॥
इन श्रेष्ठ वृक्षोंके बीच एक सुंदर विशाल बरगद सुशोभित है, जिसे देखते ही मन मोहित हो जाता है - उसके पत्ते गहरे नीले और घने हैं, फल लाल हैं, उसकी घनी छाया हर मौसममें सुख देती है।
मानहुँ तिमिर अरुनमय रासी। बिरची बिधि सँकेलि सुषमा सी॥ए तरु सरित समीप गोसाँई। रघुबर परनकुटी जहँ छाई॥॥३॥
मानो ब्रह्माने अंधकार और लालीको समेटकर एक अनोखी शोभा रच दी हो। गोसाईं, ये वृक्ष नदीके पास हैं, जहाँ राम की पर्णकुटी बनी है।
तुलसी तरुबर बिबिध सुहाए। कहूँ कहुँ कहुँ सियँ कहुँ लखन लगाए॥बट छायाँ बेदिका बनाई। सिय निज पानि सरोज सुहाई॥॥४॥
वहाँ तुलसीके कई सुंदर पौधे शोभित हैं, कहीं सीताने तो कहीं लक्ष्मणने लगाए हैं। इसी बरगदकी छायामें सीताने अपने हाथों एक सुंदर वेदी बनाई है।
जहाँ बैठि मुनिगन सहित नित सिय रामु सुजान।सुनहिं कथा इतिहास सब आगम निगम पुरान॥२३७॥
जहाँ सुजान सीता-राम मुनियोंके साथ बैठकर नित्य शास्त्र, वेद-पुराणकी कथाएँ सुनते हैं।
सखा बचन सुनि बिटप निहारी। उमगे भरत बिलोचन बारी॥करत प्रनाम चले दोउ भाई। कहत प्रीति सारद सकुचाई॥॥१॥
सखाकी बात सुनकर और वृक्षोंको देखकर भरतकी आँखोंमें आँसू उमड़ आए। दोनों भाई प्रणाम करते हुए आगे बढ़े - उनके इस प्रेमका वर्णन करते सरस्वती भी सकुचा जाएँ।
हरषहिं निरखि राम पद अंका। मानहुँ पारसु पायउ रंका॥रज सिर धरि हियँ नयनन्हि लावहिं। रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं॥॥२॥
राम के चरण-चिह्न देखकर दोनों भाई ऐसे हर्षित होते हैं मानो किसी दरिद्रको पारस मिल गया हो। वहाँकी धूल सिरपर, हृदयपर और आँखोंपर लगाते हैं, मानो रघुनाथसे मिलनेका ही सुख पा रहे हों।
देखि भरत गति अकथ अतीवा। प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा॥सखहि सनेह बिबस मग भूला। कहि सुपंथ सुर बरषहिं फूला॥॥३॥
भरतकी यह अवर्णनीय दशा देखकर वनके पशु-पक्षी और पेड़-पौधे तक प्रेममें डूब गए। प्रेमके अतिरेकमें सखा निषादराज भी रास्ता भूल गया, तब देवताओंने सही राह दिखाकर फूल बरसाए।
निरखि सिद्ध साधक अनुरागे। सहज सनेहु सराहन लागे॥होत न भूतल भाउ भरत को। अचर सचर चर अचर करत को॥॥४॥
भरतका यह प्रेम देखकर सिद्ध और साधक भी भाव-विभोर हो उठे और उनके स्वाभाविक स्नेहकी सराहना करने लगे - अगर धरतीपर भरत न होते तो जड़को चेतन और चेतनको जड़ कौन बना पाता?
पेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गँभीर।मथि प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर॥२३८॥
प्रेम अमृत है, विरह मंदराचल है, भरत गहरा सागर हैं - कृपासागर राम ने देवता और साधुओंके भले के लिए स्वयं यह प्रेमरूपी अमृत मथकर निकाला है।
सखा समेत मनोहर जोटा। लखेउ न लखन सघन बन ओटा॥भरत दीख प्रभु आश्रमु पावन। सकल सुमंगल सदनु सुहावन॥॥१॥
सखा निषादराजसहित इस मनोहर जोड़ीको घने वनकी आड़में लक्ष्मण नहीं देख पाए। भरतने देखा प्रभुका पवित्र आश्रम, जो सब मंगलोंका सुंदर घर है।
करत प्रबेस मिटे दुख दावा। जनु जोगीं परमारथु पावा॥देखे भरत लखन प्रभु आगे। पूँछे बचन कहत अनुरागे॥॥२॥
आश्रममें कदम रखते ही भरतका सारा दुख-दाह मिट गया, मानो किसी योगीको परमतत्त्वकी प्राप्ति हो गई हो। भरतने देखा लक्ष्मण प्रभुके आगे खड़े प्रेमपूर्वक कुछ कह रहे हैं।
सीस जटा कटि मुनि पट बाँधें। तून कसें कर सरु धनु काँधें॥बेदी पर मुनि साधु समाजू। सीय सहित राजत रघुराजू॥॥३॥
सिरपर जटा, कमरमें मुनि-वस्त्र बाँधे, तरकस कसे, हाथमें बाण और कंधेपर धनुष - वेदीपर मुनि-साधुओंका समूह बैठा है और सीतासहित रघुनाथ विराजमान हैं।
बलकल बसन जटिल तनु स्यामा। जनु मुनि बेष कीन्ह रति कामा॥कर कमलनि धनु सायकु फेरत। जिय की जरनि हरत हँसि हेरत॥॥४॥
वल्कल वस्त्र, जटाधारी, श्याम शरीर - मानो रति और कामदेवने मुनि-वेष धर लिया हो। राम अपने हाथोंसे धनुष-बाण फेर रहे हैं और हँसकर देखते ही मनकी हर जलन हर लेते हैं।
लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु।ग्यान सभाँ जनु तनु धरे भगति सच्चिदानंदु॥२३९॥
सुंदर मुनि-मंडलीके बीच सीता और रघुकुलचंद्र राम ऐसे शोभित हैं मानो ज्ञानकी सभामें साक्षात भक्ति और सच्चिदानंद स्वयं शरीर धारण करके बैठे हों।
सानुज सखा समेत मगन मन। बिसरे हरष सोक सुख दुख गन॥पाहि नाथ कहि पाहि गोसाई। भूतल परे लकुट की नाई॥॥१॥
शत्रुघ्न और सखा निषादसहित भरतका मन प्रेममें डूब गया, हर्ष-शोक सब भूल गए। 'नाथ रक्षा करो, गोसाईं रक्षा करो' कहते हुए वे धरतीपर दंडकी तरह गिर पड़े।
बचन सपेम लखन पहिचाने। करत प्रनामु भरत जियँ जाने॥बंधु सनेह सरस एहि ओरा। उत साहिब सेवा बस जोरा॥॥२॥
प्रेमभरे वचनोंसे लक्ष्मणने पहचान लिया और समझ गए कि भरत प्रणाम कर रहे हैं। एक ओर भाईका सरस स्नेह, दूसरी ओर स्वामीकी सेवाका बंधन,
मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई। सुकबि लखन मन की गति भनई॥रहे राखि सेवा पर भारू। चढ़ी चंग जनु खैंच खेलारू॥॥३॥
न मिले बिना रहा जाए, न सेवा छोड़ी जाए - लक्ष्मणके मनकी यह उलझन कोई श्रेष्ठ कवि ही बयान कर सकता है। वे सेवाको ही सर्वोपरि मानकर रुके रहे, मानो पतंग खींचता खिलाड़ी डोर थामे हो।
कहत सप्रेम नाइ महि माथा। भरत प्रनाम करत रघुनाथा॥उठे रामु सुनि पेम अधीरा। कहुँ पट कहुँ निषंग धनु तीरा॥॥४॥
लक्ष्मणने प्रेमसे धरतीपर माथा टेककर कहा - रघुनाथ, भरत प्रणाम कर रहे हैं। यह सुनते ही राम प्रेमसे अधीर होकर उठ खड़े हुए, कहीं वस्त्र गिरा, कहीं तरकस, कहीं धनुष-बाण।
बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान।भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान॥२४०॥
कृपानिधान राम ने उन्हें जबरन उठाकर छातीसे लगा लिया - भरत और राम के इस मिलनको देखकर सबको अपनी सुध-बुध भूल गई।
मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी। कबिकुल अगम करम मन बानी॥परम पेम पूरन दोउ भाई। मन बुधि चित अहमिति बिसराई॥॥१॥
इस मिलनका प्रेम बयान कैसे हो, यह तो कविकुलके लिए कर्म, मन, वाणी तीनोंसे परे है। दोनों भाई मन-बुद्धि-अहंकार सब भुलाकर परम प्रेममें डूब गए।
कहहु सुपेम प्रगट को करई। केहि छाया कबि मति अनुसरई॥कबिहि अरथ आखर बलु साँचा। अनुहरि ताल गतिहि नटु नाचा॥॥२॥
इस उत्कृष्ट प्रेमको भला कौन बयान करे, कविकी बुद्धि किसकी छायाका अनुसरण करे? कविके पास तो बस शब्द और अर्थका ही सहारा है - नट भी तो ताल देखकर ही नाचता है।
अगम सनेह भरत रघुबर को। जहँ न जाइ मनु बिधि हरि हर को॥सो मैं कुमति कहौं केहि भाँती। बाज सुराग कि गाँडर ताँती॥॥३॥
भरत और रघुनाथका यह प्रेम इतना अगम है कि ब्रह्मा-विष्णु-शिव तक वहाँ नहीं पहुँच सकते। मैं मंदबुद्धि उसे कैसे बयान करूँ - क्या घास-फूसकी डोरीसे भी कोई मधुर राग बज सकता है?
मिलनि बिलोकि भरत रघुबर की। सुरगन सभय धकधकी धरकी॥समुझाए सुरगुरु जड़ जागे। बरषि प्रसून प्रसंसन लागे॥॥४॥
भरत और राम का यह मिलन देखकर देवता भी भयसे काँप उठे, उनका दिल धड़कने लगा। देवगुरु बृहस्पतिने समझाया, तब वे सचेत होकर फूल बरसाते हुए प्रशंसा करने लगे।
मिलि सपेम रिपुसूदनहि केवटु भेंटेउ राम।भूरि भायँ भेंटे भरत लछिमन करत प्रनाम॥२४१॥
फिर राम प्रेमसे शत्रुघ्नसे मिले, फिर केवटसे भेंट की। प्रणाम करते लक्ष्मणसे भरत बड़े प्रेमसे मिले।
भेंटेउ लखन ललकि लघु भाई। बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई॥पुनि मुनिगन दुहुँ भाइन्ह बंदे। अभिमत आसिष पाइ अनंदे॥॥१॥
लक्ष्मण उत्साहसे छोटे भाई शत्रुघ्नसे मिले, फिर निषादराजको गले लगाया। फिर दोनों भाइयोंने मुनियोंको प्रणाम किया और मनचाहा आशीर्वाद पाकर आनंदित हुए।
सानुज भरत उमगि अनुरागा। धरि सिर सिय पद पदुम परागा॥पुनि पुनि करत प्रनाम उठाए। सिर कर कमल परसि बैठाए॥॥२॥
शत्रुघ्नसहित भरत प्रेमसे उमड़कर सीताके चरणोंकी धूल सिरपर धरकर बार-बार प्रणाम करने लगे। सीताने उन्हें उठाकर अपने हाथसे उनके सिरपर स्नेहसे हाथ फेरा और बिठाया।
सीय असीस दीन्हि मन माहीं। मगन सनेहँ देह सुधि नाहीं॥सब बिधि सानुकूल लखि सीता। भे निसोच उर अपडर बीता॥॥३॥
सीताने मन-ही-मन आशीर्वाद दिया, प्रेममें ऐसी डूबी थीं कि देहकी सुध ही न थी। सीताको इतना अनुकूल पाकर भरत निश्चिंत हो गए, मनका सारा भय जाता रहा।
कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूँछा। प्रेम भरा मन निज गति छूँछा॥तेहि अवसर केवटु धीरजु धरि। जोरि पानि बिनवत प्रनामु करि॥॥४॥
उस पल न कोई कुछ कहता है, न कोई कुछ पूछता है - मन प्रेमसे इतना भरा है कि खुद कुछ सोचनेकी गुंजाइश ही नहीं। तभी केवट धीरज धरकर हाथ जोड़े प्रणाम करके विनती करने लगा -
नाथ साथ मुनिनाथ के मातु सकल पुर लोग।सेवक सेनप सचिव सब आए बिकल बियोग॥२४२॥
नाथ, मुनिनाथ वसिष्ठके साथ सब माताएँ, नगरवासी, सेवक, सेनापति, मंत्री - सब आपके वियोगमें व्याकुल होकर आए हैं।
सीलसिंधु सुनि गुर आगवनू। सिय समीप राखे रिपुदवनू॥चले सबेग रामु तेहि काला। धीर धरम धुर दीनदयाला॥॥१॥
गुरुका आगमन सुनते ही शीलसागर राम ने शत्रुघ्नको सीताके पास छोड़ दिया और वे धीर, धर्मधुरंधर, दीनदयालु तुरंत वेगसे चल पड़े।
गुरहि देखि सानुज अनुरागे। दंड प्रनाम करन प्रभु लागे॥मुनिबर धाइ लिए उर लाई। प्रेम उमगि भेंटे दोउ भाई॥॥२॥
गुरुको देखते ही लक्ष्मणसहित प्रभु प्रेमसे भर उठे और दंडवत प्रणाम करने लगे। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ दौड़कर उन्हें गले लगा बैठे और प्रेमसे दोनों भाइयोंसे मिले।
प्रेम पुलकि केवट कहि नामू। कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू॥रामसखा रिषि बरबस भेंटा। जनु महि लुठत सनेह समेटा॥॥३॥
प्रेमसे रोमांचित होकर केवटने अपना नाम बताकर दूरसे ही दंडवत प्रणाम किया। ऋषिने उसे रामसखा जानकर जबरन गले लगा लिया, मानो धरतीपर बिखरे प्रेमको समेट लिया हो।
रघुपति भगति सुमंगल मूला। नभ सराहि सुर बरिसहिं फूला॥एहि सम निपट नीच कोउ नाहीं। बड़ बसिष्ठ सम को जग माहीं॥॥४॥
राम की भक्ति ही सब मंगलोंका मूल है, ऐसा कहकर सराहते हुए देवता आकाशसे फूल बरसाने लगे और बोले - इसके समान नीच कोई नहीं और वसिष्ठके समान महान कोई नहीं।
जेहि लखि लखनहु तें अधिक मिले मुदित मुनिराउ।सो सीतापति भजन को प्रगट प्रताप प्रभाउ॥२४३॥
जिसे देखकर मुनिराज लक्ष्मणसे भी बढ़कर प्रसन्नतासे मिले, यह सब सीतापति राम की भक्तिका ही प्रत्यक्ष प्रभाव है।
आरत लोग राम सबु जाना। करुनाकर सुजान भगवाना॥जो जेहि भायँ रहा अभिलाषी। तेहि तेहि कै तसि तसि रुख राखी॥॥१॥
आर्त लोगोंको राम ने पहचान लिया, दयालु सुजान भगवानने जो जिस भावसे मिलनेको आतुर था, उसे उसी भावसे अपनाया,
सानुज मिलि पल महुँ सब काहू। कीन्ह दूरि दुखु दारुन दाहू॥यह बड़ि बात राम के नाहीं। जिमि घट कोटि एक रबि छाहीं॥॥२॥
लक्ष्मणसहित पलभरमें सबसे मिलकर उनका कठिन दुख-संताप दूर कर दिया। राम के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं, जैसे करोड़ों घड़ोंमें एक सूरज एक साथ झलक जाता है।
मिलि केवटिहि उमगि अनुरागा। पुरजन सकल सराहहिं भागा॥देखीं राम दुखित महतारीं। जनु सुबेलि अवलीं हिम मारीं॥॥३॥
सारे नगरवासी प्रेमसे उमड़कर केवटसे मिलकर उसके भाग्यकी सराहना करते हैं। राम ने अपनी सब माताओंको दुखी देखा, मानो सुंदर लताओंकी कतारोंपर पाला पड़ गया हो।
प्रथम राम भेंटी कैकेई। सरल सुभायँ भगति मति भेई॥पग परि कीन्ह प्रबोधु बहोरी। काल करम बिधि सिर धरि खोरी॥॥४॥
सबसे पहले राम कैकेयीसे मिले और अपने सरल स्वभाव और भक्तिसे उसका मन शांत कर दिया। फिर चरणोंमें गिरकर काल-कर्म-विधाताको दोष देकर उन्होंने उसे सांत्वना दी।
भेटीं रघुबर मातु सब करि प्रबोधु परितोषु।अंब ईस आधीन जगु काहु न देइअ दोषु॥२४४॥
फिर रघुनाथ सब माताओंसे मिले और समझा-बुझाकर संतोष दिलाया - माता, यह संसार ईश्वरके अधीन है, किसीको दोष मत दो।
गुरतिय पद बंदे दुहु भाई। सहित बिप्रतिय जे सँग आई॥गंग गौरि सम सब सनमानीं।। देहिं असीस मुदित मृदु बानी॥॥१॥
दोनों भाइयोंने गुरुपत्नी अरुंधतीके साथ आई ब्राह्मण-स्त्रियोंके चरण वंदन किए, गंगा-गौरीके समान सबका सम्मान किया, और सब प्रसन्न होकर कोमल आशीर्वाद देने लगीं।
गहि पद लगे सुमित्रा अंका। जनु भेटीं संपति अति रंका॥पुनि जननि चरननि दोउ भ्राता। परे पेम ब्याकुल सब गाता॥॥२॥
फिर दोनों भाई पैर छूकर सुमित्राकी गोदमें जा लिपटे, मानो किसी दरिद्रको अपार धन मिल गया हो। फिर कौसल्याके चरणोंमें गिर पड़े, प्रेमसे सारा शरीर शिथिल हो उठा।
अति अनुराग अंब उर लाए। नयन सनेह सलिल अन्हवाए॥तेहि अवसर कर हरष बिषादू। किमि कबि कहै मूक जिमि स्वादू॥॥३॥
माताने अपार स्नेहसे उन्हें गले लगाया और आँसुओंसे नहला दिया। उस समयका हर्ष-विषाद कवि कैसे बयान करे, जैसे गूँगा स्वादको कैसे बताए।
मिलि जननहि सानुज रघुराऊ। गुर सन कहेउ कि धारिअ पाऊ॥पुरजन पाइ मुनीस नियोगू। जल थल तकि तकि उतरेउ लोगू॥॥४॥
लक्ष्मणसहित रघुनाथ माँसे मिलकर गुरुसे बोले - आश्रमपर पधारिए। फिर मुनिकी आज्ञा पाकर नगरवासी जल-थलकी सुविधा देखकर वहीं ठहर गए।
महिसुर मंत्री मातु गुर गने लोग लिए साथ।पावन आश्रम गवनु किय भरत लखन रघुनाथ।॥२४५॥
ब्राह्मण, मंत्री, माताएँ और गुरु समेत चुने हुए लोगोंको साथ लेकर भरत, लक्ष्मण और रघुनाथ पवित्र आश्रमकी ओर चले।
सीय आइ मुनिबर पग लागी। उचित असीस लही मन मागी॥गुरपतिनिहि मुनितियन्ह समेता। मिली पेमु कहि जाइ न जेता॥॥१॥
सीता आकर मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठके चरणों लगीं और मनचाहा आशीर्वाद पाया। फिर मुनि-पत्नियोंसहित गुरुपत्नी अरुंधतीसे मिलीं - वह प्रेम बयान नहीं हो सकता।
बंदि बंदि पग सिय सबही के। आसिरबचन लहे प्रिय जी के॥सासु सकल जब सीयँ निहारीं। मूदे नयन सहमि सुकुमारीं॥॥२॥
सबके चरण छू-छूकर सीताने मनचाहे आशीर्वाद पाए। जब सुकुमारी सीताने सब सासुओंको देखा तो सहमकर आँखें मूँद लीं।
परीं बधिक बस मनहुँ मरालीं। काह कीन्ह करतार कुचालीं॥तिन्ह सिय निरखि निपट दुखु पावा। सो सबु सहिअ जो देउ सहावा॥॥३॥
मानो राजहंसिनियाँ शिकारीके जालमें फँस गई हों - ऐसी दशा देखकर मनमें सोचा, विधाताने यह क्या कर डाला! सासुओंने भी सीताको देखकर बड़ा दुख पाया, पर जो दैव सहलाए वह सहना ही पड़ता है।
जनकसुता तब उर धरि धीरा। नील नलिन लोयन भरि नीरा॥मिली सकल सासुन्ह सिय जाई। तेहि अवसर करुना महि छाई॥॥४॥
तब जानकीने हृदयमें धीरज धरकर, नीले कमल-जैसे नेत्रोंमें आँसू भरकर सब सासुओंसे जाकर भेंट की - उस पल धरतीपर मानो करुणा ही करुणा छा गई।
लागि लागि पग सबनि सिय भेंटति अति अनुराग।हृदयँ असीसहिं पेम बस रहिअहु भरी सोहाग॥२४६॥
सीता सबके चरण छू-छूकर बड़े प्रेमसे मिल रही हैं, और सब सासुएँ स्नेहसे हृदयसे आशीर्वाद दे रही हैं - सदा सुहागिन रहो।
बिकल सनेहँ सीय सब रानीं। बैठन सबहि कहेउ गुर ग्यानीं॥कहि जग गति मायिक मुनिनाथा। कहे कछुक परमारथ गाथा॥॥१॥
सीता और सब रानियाँ स्नेहके मारे व्याकुल हैं, तब ज्ञानी गुरुने सबको बैठ जानेको कहा। फिर मुनिनाथने संसारकी मायिक गति समझाते हुए कुछ परमार्थकी बातें कहीं।
नृप कर सुरपुर गवनु सुनावा। सुनि रघुनाथ दुसह दुखु पावा॥मरन हेतु निज नेहु बिचारी। भे अति बिकल धीर धुर धारी॥॥२॥
फिर वसिष्ठने राजाके स्वर्गगमनकी बात सुनाई, यह सुनकर रघुनाथको गहरा दुख हुआ। अपने प्रति पिताका स्नेह ही उनकी मृत्युका कारण समझकर धीरधुरंधर राम बेहद व्याकुल हो उठे।
कुलिस कठोर सुनत कटु बानी। बिलपत लखन सीय सब रानी॥सोक बिकल अति सकल समाजू। मानहुँ राजु अकाजेउ आजू॥॥३॥
वज्रजैसी कठोर, कड़वी बात सुनकर लक्ष्मण, सीता और सब रानियाँ विलाप करने लगीं। सारा समाज शोकसे इतना व्याकुल हुआ मानो राजा आज ही स्वर्गवासी हुए हों।
मुनिबर बहुरि राम समुझाए। सहित समाज सुसरित नहाए॥ब्रतु निरंबु तेहि दिन प्रभु कीन्हा। मुनिहु कहें जलु काहुँ न लीन्हा॥॥४॥
फिर मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठने राम को समझाया, तब सबने मिलकर मंदाकिनीमें स्नान किया। उस दिन प्रभुने निर्जल व्रत रखा, मुनिके कहनेपर भी किसीने जल ग्रहण नहीं किया।
भोरु भएँ रघुनंदनहि जो मुनि आयसु दीन्ह।श्रद्धा भगति समेत प्रभु सो सबु सादरु कीन्ह॥२४७॥
अगले दिन सुबह मुनिने रघुनाथको जो-जो आज्ञा दी, प्रभुने वह सब श्रद्धा-भक्तिसहित आदरपूर्वक पूरी की।
करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी। भे पुनीत पातक तम तरनी॥जासु नाम पावक अघ तूला। सुमिरत सकल सुमंगल मूला॥॥१॥
वेदविधिके अनुसार पिताकी क्रिया करके, पापरूपी अंधकारके नाशक सूर्य राम शुद्ध हुए - जिनका नाम पापरूपी रूईके लिए आग है, जिनका स्मरणमात्र सब मंगलोंकी जड़ है,
