द्वितीय सोपान — भाग 7

अयोध्याकाण्ड

राज्याभिषेक की तैयारी, वनगमन एवं भरत मिलाप की कथा।

अयोध्याकाण्ड — सुनें

अयोध्याकाण्ड — पढ़ें भी, सुनें भी

राज्याभिषेक की तैयारी, वनगमन एवं भरत मिलाप की कथा।

यह कथा शीघ्र ही यहाँ सुनने हेतु भी उपलब्ध होगी

दोहा

निरखि बिबेक बिलोचनन्हि सिथिल सनेहँ समाजु।करि प्रनामु बोले भरतु सुमिरि सीय रघुराजु२९७

विवेककी आँखोंसे सारे समाजको प्रेमसे शिथिल देखकर, सबको प्रणाम करके, सीता-रामका स्मरण करते हुए भरत बोले -

प्रभु पितु मातु सुह्रद गुर स्वामी। पूज्य परम हित अंतरजामी॥सरल सुसाहिबु सील निधानू। प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू॥

प्रभु, आप पिता, माता, मित्र, गुरु, स्वामी, पूज्य, परम हितैषी और अंतर्यामी हैं। सरलहृदय, श्रेष्ठ स्वामी, शीलके भंडार, शरणागतवत्सल, सर्वज्ञ, सुजान,

समरथ सरनागत हितकारी। गुनगाहकु अवगुन अघ हारी॥स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाई। मोहि समान मैं साइँ दोहाई॥

समर्थ, शरणागतके हितैषी, गुणग्राहक और अवगुण-पाप हरनेवाले हैं। गोसाईं, आप-जैसा स्वामी आप ही हैं, और स्वामीसे द्रोह करनेमें मेरे जैसा मैं ही हूँ।

प्रभु पितु बचन मोह बस पेली। आयउँ इहाँ समाजु सकेली॥जग भल पोच ऊँच अरु नीचू। अमिअ अमरपद माहुरु मीचू॥

मैं मोहवश प्रभु और पिताके वचनोंको टालकर समाज जुटाकर यहाँ आया हूँ। संसारमें भला-बुरा, ऊँच-नीच, अमृत-अमरपद, विष-मृत्यु आदि -

राम रजाइ मेट मन माहीं। देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं॥सो मैं सब बिधि कीन्हि ढिठाई। प्रभु मानी सनेह सेवकाई॥

कहीं देखा-सुना नहीं कि कोई मनसे भी राम की आज्ञा टाल दे, पर मैंने हर तरहसे यही ढिठाई की, फिर भी प्रभुने इसे स्नेह और सेवा मानकर स्वीकार कर लिया।

दोहा

कृपाँ भलाई आपनी नाथ कीन्ह भल मोर।दूषन भे भूषन सरिस सुजसु चारु चहु ओर२९८

नाथ, आपने अपनी कृपा और भलाईसे मेरा भला किया, जिससे मेरे दोष भी गुण-जैसे बन गए और चारों ओर मेरा सुयश फैल गया।

राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगत बिदित निगमागम गाई॥कूर कुटिल खल कुमति कलंकी। नीच निसील निरीस निसंकी॥

आपकी रीति और सुंदर स्वभावकी बड़ाई संसारमें प्रसिद्ध है, वेद-शास्त्रोंने भी गाई है। जो क्रूर, कुटिल, दुष्ट, कुबुद्धि, कलंकी, नीच, शीलहीन, नास्तिक और निडर हैं,

ते सुनि सरन सामुहें आए। सकृत प्रनामु किहें अपनाए॥देखि दोष कबहुँ न उर आने। सुनि गुन साधु समाज बखाने॥

उन्हें भी आपने शरणमें आया देखकर एक ही प्रणामपर अपना लिया। उनके दोष देखकर भी कभी मनमें नहीं रखा, बल्कि उनके गुण सुनकर साधु-समाजमें उनकी तारीफ की।

को साहिब सेवकहि नेवाजी। आपु समाज साज सब साजी॥निज करतूति न समुझिअ सपनें। सेवक सकुच सोचु उर अपनें॥

ऐसा सेवकपर मेहरबान स्वामी और कौन होगा, जो खुद ही सेवककी सारी जरूरतें पूरी कर दे, और सपनेमें भी अपनी करनी न मानते हुए सेवककी झिझक और चिंताको अपने दिलमें रखे!

सो गोसाइँ नहि दूसर कोपी। भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी॥पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना। गुन गति नट पाठक आधीना॥

मैं हाथ उठाकर, प्रण करके कहता हूँ - आपके सिवा ऐसा दूसरा स्वामी कोई नहीं। पशु नाच सकते हैं, तोते पाठ रट सकते हैं, पर यह सब सिखानेवाले और नचानेवालेके ही अधीन होता है।

दोहा

यों सुधारि सनमानि जन किए साधु सिरमोर।को कृपाल बिनु पालिहै बिरिदावलि बरजोर२९९

इस तरह अपने सेवकोंकी बात सुधारकर, सम्मान देकर आपने उन्हें साधुओंका शिरोमणि बना दिया - आपके सिवा कौन इस तरह अपनी विरदावली जिद करके निभाएगा?

सोक सनेहँ कि बाल सुभाएँ। आयउँ लाइ रजायसु बाएँ॥तबहुँ कृपाल हेरि निज ओरा। सबहि भाँति भल मानेउ मोरा॥

मैं शोक, स्नेह या बचपने के कारण आज्ञा टालकर चला आया, फिर भी कृपालु स्वामीने अपनी ओरसे इसे हर तरहसे अच्छा ही माना।

देखेउँ पाय सुमंगल मूला। जाने स्वामि सहज अनुकूला॥बड़ें समाज बिलोकेउँ भागू। बड़ीं चूक साहिब अनुरागू॥

मैंने सब मंगलोंकी जड़ आपके चरणोंका दर्शन पाया और जाना कि स्वामी स्वभावसे ही मुझपर अनुकूल हैं। इस बड़े समाजमें अपना भाग्य देखा - इतनी बड़ी भूल होनेपर भी स्वामीका मुझपर इतना प्रेम है!

कृपा अनुग्रह अंगु अघाई। कीन्हि कृपानिधि सब अधिकाई॥राखा मोर दुलार गोसाईं। अपनें सील सुभायँ भलाईं॥

कृपानिधानने मुझपर बहुत ज्यादा ही कृपा और अनुग्रह किया - हे गोसाईं, आपने अपने शील और भलेपनसे मेरा दुलार बनाए रखा।

नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई। स्वामि समाज सकोच बिहाई॥अबिनय बिनय जथारुचि बानी। छमिहि देउ अति आरति जानी॥

नाथ, मैंने स्वामी और समाजका संकोच भुलाकर, अविनय या विनयभरी जैसी भी बात मन आई कही - यह पूरी ढिठाई है। देव, मेरी बेचैनी समझकर क्षमा करेंगे।

दोहा

सुह्रद सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बड़ि खोरि।आयसु देइअ देव अब सब सुधारी मोरि३००

सुहृद, बुद्धिमान और श्रेष्ठ स्वामीसे इतना ज्यादा कहना बड़ा अपराध है। देव, अब आज्ञा दीजिए, आपने मेरी सारी बात सुधार दी।

प्रभु पद पदुम पराग दोहाई। सत्य सुकृत सुख सी सुहाई॥सो करि कहउँ हिए अपने की। रुचि जागत सोवत सपने की॥

प्रभुके चरणकमलोंकी धूलकी सौगंध, जो सत्य, पुण्य और सुखकी पराकाष्ठा है - उसकी दुहाई देकर मैं अपने मनकी जागते-सोते-सपनेमें बनी रहनेवाली इच्छा कहता हूँ।

सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई। स्वारथ छल फल चारि बिहाई॥अग्या सम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसादु जन पावै देवा॥

वह इच्छा है - छल, स्वार्थ और चारों फलोंको छोड़कर स्वाभाविक प्रेमसे स्वामीकी सेवा करना। आज्ञापालनसे बढ़कर श्रेष्ठ स्वामीकी कोई सेवा नहीं - देव, अब सेवकको वही आज्ञारूपी वरदान मिले।

अस कहि प्रेम बिबस भए भारी। पुलक सरीर बिलोचन बारी॥प्रभु पद कमल गहे अकुलाई। समउ सनेहु न सो कहि जाई॥

यह कहकर भरत प्रेमसे अभिभूत हो गए, शरीर रोमांचित हुआ, आँखें भर आईं। व्याकुल होकर उन्होंने प्रभुके चरण पकड़ लिए - उस पलका स्नेह बयान नहीं हो सकता।

कृपासिंधु सनमानि सुबानी। बैठाए समीप गहि पानी॥भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ। सिथिल सनेहँ सभा रघुराऊ॥

कृपासागर राम ने मीठी वाणीसे सम्मान करके उनका हाथ थामकर पास बिठाया। भरतकी विनती सुनकर और उनका स्वभाव देखकर सारी सभा और रघुनाथ स्वयं स्नेहसे भर उठे।

छंद

रघुराउ सिथिल सनेहँ साधु समाज मुनि मिथिला धनी।मन महुँ सराहत भरत भायप भगति की महिमा घनी॥भरतहि प्रसंसत बिबुध बरषत सुमन मानस मलिन से।तुलसी बिकल सब लोग सुनि सकुचे निसागम नलिन से॥

रघुनाथ, साधु-समाज, मुनि वसिष्ठ और जनक सब स्नेहसे भर गए, सब मन-ही-मन भरतके भाईपन और भक्तिकी गहरी महिमा सराह रहे थे। देवता प्रशंसा करते हुए फूल बरसाने लगे। तुलसीदास कहते हैं - सब लोग भरतकी बात सुनकर इतने व्याकुल हुए जैसे रातके आगमनसे कमल सिकुड़ जाते हैं।

सोरठा

देखि दुखारी दीन दुहु समाज नर नारि सब।मघवा महा मलीन मुए मारि मंगल चहत३०१

दोनों समाजोंके सब नर-नारीको दीन-दुखी देखकर मलिन मनका इंद्र मरे हुओंको मारकर भी अपना उल्लू सीधा करना चाहता है।

कपट कुचालि सी सुरराजू। पर अकाज प्रिय आपन काजू॥काक समान पाकरिपु रीती। छली मलीन कतहुँ न प्रतीती॥

देवराज इंद्र कपट और कुचालकी हद है, उसे दूसरोंका नुकसान और अपना फायदा ही प्यारा है। उसकी चाल कौए-जैसी है, वह छली और मलिन मनका है, किसीपर उसे भरोसा नहीं।

प्रथम कुमत करि कपटु सँकेला। सो उचाटु सब कें सिर मेला॥सुरमायाँ सब लोग बिमोहे। राम प्रेम अतिसय न बिछोहे॥

पहले उसने बुरी सोचसे कपट बटोरा, फिर वह उचाट सबके सिरपर डाल दिया। फिर देवमायासे सबको मोहित कर दिया, पर राम के प्रति उनका प्रेम पूरी तरह नहीं टूटा।

भय उचाट बस मन थिर नाहीं। छन बन रुचि छन सदन सोहाहीं॥दुबिध मनोगति प्रजा दुखारी। सरित सिंधु संगम जनु बारी॥

भय और उचाटके कारण किसीका मन स्थिर नहीं रहा - कभी वनमें रहनेकी इच्छा होती, कभी घर अच्छा लगने लगता। मनकी इस दुविधासे प्रजा दुखी हो रही थी, मानो नदी-सागरके संगमका पानी अशांत हो।

दुचित कतहुँ परितोषु न लहहीं। एक एक सन मरमु न कहहीं॥लखि हियँ हँसि कह कृपानिधानू। सरिस स्वान मघवान जुबानू॥

मन बँटा होनेसे उन्हें कहीं संतोष नहीं मिलता, वे एक-दूसरेसे अपनी उलझन भी नहीं कह पाते। यह देखकर कृपानिधान राम मनमें हँसकर बोले - कुत्ता, इंद्र और युवक तीनों एक जैसे ही होते हैं।

दोहा

भरतु जनकु मुनिजन सचिव साधु सचेत बिहाइ।लागि देवमाया सबहि जथाजोगु जनु पाइ३०२

भरत, जनक, मुनिजन, मंत्री और सचेत साधु-संतोंको छोड़कर बाकी सबपर, जिसकी जैसी प्रकृति थी उसी अनुसार देवमाया असर कर गई।

कृपासिंधु लखि लोग दुखारे। निज सनेहँ सुरपति छल भारे॥सभा राउ गुर महिसुर मंत्री। भरत भगति सब कै मति जंत्री॥

कृपासागर राम ने लोगोंको अपने स्नेह और इंद्रके भारी छलसे दुखी देखा। सभा, राजा जनक, गुरु, ब्राह्मण और मंत्री - सबकी बुद्धिको भरतकी भक्तिने थाम रखा था।

रामहि चितवत चित्र लिखे से। सकुचत बोलत बचन सिखे से॥भरत प्रीति नति बिनय बड़ाई। सुनत सुखद बरनत कठिनाई॥

सब लोग तस्वीरकी तरह स्थिर होकर राम को देख रहे हैं, सकुचाते हुए रटे-रटाए वचन बोल रहे हैं। भरतका प्रेम, विनम्रता, नम्रता और बड़प्पन सुननेमें तो सुखद है, पर बयान करना कठिन है।

जासु बिलोकि भगति लवलेसू। प्रेम मगन मुनिगन मिथिलेसू॥महिमा तासु कहै किमि तुलसी। भगति सुभायँ सुमति हियँ हुलसी॥

जिनकी भक्तिकी एक झलक देखकर मुनिगण और मिथिलेश जनक तक प्रेममें डूब गए, उन भरतकी महिमा तुलसीदास कैसे बयान करे? उनकी भक्ति और सुंदर भावसे मन में सुबुद्धि उमड़ रही है।

आपु छोटि महिमा बड़ि जानी। कबिकुल कानि मानि सकुचानी॥कहि न सकति गुन रुचि अधिकाई। मति गति बाल बचन की नाई॥

पर वह बुद्धि खुदको छोटा और भरतकी महिमाको बड़ा जानकर, कविपरंपराकी मर्यादा माननकर सकुचा गई। गुण कहनेकी चाह तो बहुत है, पर कह नहीं पाती - बुद्धिकी गति बच्चेकी बोलीजैसी हो गई।

दोहा

भरत बिमल जसु बिमल बिधु सुमति चकोरकुमारि।उदित बिमल जन हृदय नभ एकटक रही निहारि३०३

भरतका निर्मल यश निर्मल चाँद है और सुबुद्धि चकोरी, जो भक्तोंके हृदयरूपी आकाशमें उस चाँदको उदय होते देखकर टकटकी लगाए निहारती ही रह गई।

भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ। लघु मति चापलता कबि छमहूँ॥कहत सुनत सति भाउ भरत को। सीय राम पद होइ न रत को॥

भरतका स्वभाव तो वेदोंके लिए भी सुगम नहीं, मेरी छोटी बुद्धिकी यह चंचलता कवि क्षमा करें - भरतके सद्भावको सुन-कहकर कौन सीता-रामके चरणोंमें अनुरक्त न होगा।

सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को। जेहि न सुलभ तेहि सरिस बाम को॥देखि दयाल दसा सबही की। राम सुजान जानि जन जी की॥

भरतको याद करनेसे जिसे राम का प्रेम न मिला, उससे बड़ा अभागा और कौन होगा? दयालु सुजान राम ने सबकी दशा और भक्तके मनकी हालत जानकर,

धरम धुरीन धीर नय नागर। सत्य सनेह सील सुख सागर॥देसु काल लखि समउ समाजू। नीति प्रीति पालक रघुराजू॥

धर्मधुरंधर, धीर, नीतिनिपुण, सत्य-स्नेह-शील-सुखके सागर, नीति-प्रीतिके रक्षक रघुनाथने देश-काल-अवसर और समाज देखकर,

बोले बचन बानि सरबसु से। हित परिनाम सुनत ससि रसु से॥तात भरत तुम्ह धरम धुरीना। लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना॥

ऐसे वचन बोले जो मानो वाणीका सर्वस्व थे, परिणाममें हितकारी और सुननेमें चाँदनीके अमृतजैसे मीठे थे - तात भरत, तुम धर्मधुरंधर, लोक-वेद दोनोंके ज्ञाता और प्रेममें निपुण हो।

दोहा

करम बचन मानस बिमल तुम्ह समान तुम्ह तात।गुर समाज लघु बंधु गुन कुसमयँ किमि कहि जात३०४

तात, कर्म-वचन-मनसे निर्मल तुम्हारे समान बस तुम ही हो। गुरुजनोंकी इस सभामें और ऐसे कठिन समयमें छोटे भाईके गुण कैसे बयान किए जाएँ?

जानहु तात तरनि कुल रीती। सत्यसंध पितु कीरति प्रीती॥समउ समाजु लाज गुरुजन की। उदासीन हित अनहित मन की॥

तात, तुम सूर्यकुलकी रीति, सत्यप्रतिज्ञ पिताकी कीर्ति और प्रीति, समय-समाज और गुरुजनकी मर्यादा, तथा उदासीन-मित्र-शत्रु सबके मनकी बात जानते हो।

तुम्हहि बिदित सबही कर करमू। आपन मोर परम हित धरमू।मोहि सब भाँति भरोस तुम्हारा। तदपि कहउँ अवसर अनुसारा॥

तुम्हें सबके कर्तव्यका और अपने-मेरे परम हितकारी धर्मका पता है। यद्यपि मुझे तुमपर पूरा भरोसा है, फिर भी समयके अनुसार कुछ कहता हूँ।

तात तात बिनु बात हमारी। केवल गुरुकुल कृपाँ सँभारी॥नतरु प्रजा परिजन परिवारू। हमहि सहित सबु होत खुआरू॥

तात, पिताके बिना हमारी बात अबतक बस गुरुकुलकी कृपासे ही सँभली है, नहीं तो हमारे साथ प्रजा, कुटुंब, परिवार सब बर्बाद हो जाते।

जौं बिनु अवसर अथवँ दिनेसू। जग केहि कहहु न होइ कलेसू॥तस उतपातु तात बिधि कीन्हा। मुनि मिथिलेस राखि सबु लीन्हा॥

यदि समयसे पहले ही सूरज डूब जाए तो जगतमें किसे दुख न होगा? तात, विधाताने ठीक वैसा ही उत्पात किया, पर मुनि और मिथिलेशने सबको सँभाल लिया।

दोहा

राज काज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम।गुर प्रभाउ पालिहि सबहि भल होइहि परिनाम३०५

राज्यका सारा काम, लाज, प्रतिष्ठा, धर्म, धरती, धन, घर - इन सबकी रक्षा गुरुका प्रभाव करेगा, और परिणाम शुभ ही होगा।

सहित समाज तुम्हार हमारा। घर बन गुर प्रसाद रखवारा॥मातु पिता गुर स्वामि निदेसू। सकल धरम धरनीधर सेसू॥

समाजसहित घर और वनमें तुम्हारी और मेरी रक्षा गुरुकी कृपा ही करेगी। माता-पिता-गुरु-स्वामीकी आज्ञा माननी ही सारे धर्मको धारण करनेवाले शेषनागके समान है।

सो तुम्ह करहु करावहु मोहू। तात तरनिकुल पालक होहू॥साधक एक सकल सिधि देनी। कीरति सुगति भूतिमय बेनी॥

तात, तुम वही करो और मुझसे भी करवाओ, सूर्यकुलके रक्षक बनो। यह आज्ञापालन ही एक ऐसी साधना है जो सारी सिद्धियाँ, कीर्ति, सद्गति और ऐश्वर्य एक साथ देती है।

सो बिचारि सहि संकटु भारी। करहु प्रजा परिवारु सुखारी॥बाँटी बिपति सबहिं मोहि भाई। तुम्हहि अवधि भरि बड़ि कठिनाई॥

यह सोचकर भारी संकट सहकर भी प्रजा-परिवारको सुखी रखो। भाई, मेरी विपत्ति सबने बाँट ली, पर तुम्हें चौदह वर्षतक सबसे बड़ी कठिनाई झेलनी होगी।

जानि तुम्हहि मृदु कहउँ कठोरा। कुसमयँ तात न अनुचित मोरा॥होहिं कुठायँ सुबंधु सुहाए। ओड़िअहिं हाथ असनिहु के घाए॥

तुम्हें कोमल जानते हुए भी मैं कठोर बात कह रहा हूँ, तात, बुरे समयमें यह अनुचित नहीं। मुसीबतके वक्त अच्छे भाई ही सहारा बनते हैं, वज्रका वार भी हाथसे ही रोका जाता है।

दोहा

सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ।तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ३०६

सेवक हाथ-पैर-आँखोंकी तरह और स्वामी मुखकी तरह होना चाहिए। तुलसीदास कहते हैं - ऐसी सेवक-स्वामी प्रीति सुनकर अच्छे कवि उसकी सराहना करते हैं।

सभा सकल सुनि रघुबर बानी। प्रेम पयोधि अमिअ जनु सानी॥सिथिल समाज सनेह समाधी। देखि दसा चुप सारद साधी॥

राम की यह वाणी, जो मानो प्रेमसागरसे निकले अमृतमें सनी थी, सुनकर सारा समाज स्नेहसे शिथिल हो गया, सबको मानो समाधि लग गई - यह दशा देखकर सरस्वती भी चुप हो गईं।

भरतहि भयउ परम संतोषू। सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू॥मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू। भा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू॥

भरतको बड़ा संतोष हुआ, स्वामीके अनुकूल होते ही उनके दुख-दोष जैसे भाग खड़े हुए। मुख प्रसन्न हो गया, मनका विषाद मिट गया - मानो किसी गूँगेपर सरस्वतीकी कृपा हो गई हो।

कीन्ह सप्रेम प्रनामु बहोरी। बोले पानि पंकरुह जोरी॥नाथ भयउ सुखु साथ गए को। लहेउँ लाहु जग जनमु भए को॥

उन्होंने फिर प्रेमसे प्रणाम किया, हाथ जोड़कर बोले - नाथ, आपके साथ जानेका सुख मिल गया, मैंने जन्म लेनेका असली लाभ पा लिया।

अब कृपाल जस आयसु होई। करौं सीस धरि सादर सोई॥सो अवलंब देव मोहि देई। अवधि पारु पावौं जेहि सेई॥

कृपालु, अब जो आज्ञा हो, मैं उसे सिर चढ़ाकर आदरसे निभाऊँगा, पर देव, मुझे कोई ऐसा सहारा दें जिसकी सेवा करते हुए मैं यह अवधि पार कर सकूँ।

दोहा

देव देव अभिषेक हित गुर अनुसासनु पाइ।आनेउँ सब तीरथ सलिलु तेहि कहँ काह रजाइ३०७

देव, आपके अभिषेकके लिए गुरुकी आज्ञा पाकर मैं सब तीर्थोंका जल लेकर आया हूँ - इसके लिए क्या आज्ञा है?

एकु मनोरथु बड़ मन माहीं। सभय सकोच जात कहि नाहीं॥कहहु तात प्रभु आयसु पाई। बोले बानि सनेह सुहाई॥

मेरे मनमें एक और बड़ी इच्छा है, जो भय-संकोचके कारण कह नहीं पा रहा। राम ने कहा - भाई, कहो। तब प्रभुकी आज्ञा पाकर भरत स्नेहभरी मीठी वाणीमें बोले -

चित्रकूट सुचि थल तीरथ बन। खग मृग सर सरि निर्झर गिरिगन॥प्रभु पद अंकित अवनि बिसेषी। आयसु होइ त आवौं देखी॥

आज्ञा हो तो चित्रकूटके पवित्र स्थान, तीर्थ, वन, पक्षी-पशु, तालाब-नदी, झरने, पर्वत-समूह और खासकर आपके चरणचिह्नोंसे अंकित भूमिको देख आऊँ।

अवसि अत्रि आयसु सिर धरहू। तात बिगतभय कानन चरहू॥मुनि प्रसाद बनु मंगल दाता। पावन परम सुहावन भ्राता॥

अत्रि ऋषिकी आज्ञा जरूर सिर चढ़ाओ और निर्भय होकर वनमें विचरो। भाई, अत्रि मुनिकी कृपासे यह वन मंगलदायी, परम पवित्र और अत्यंत सुंदर है -

रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं। राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं॥सुनि प्रभु बचन भरत सुख पावा। मुनि पद कमल मुदित सिरु नावा॥

और ऋषिश्रेष्ठ अत्रि जहाँ कहें, वहीं तीर्थोंका जल रख देना। प्रभुके यह वचन सुनकर भरतको सुख मिला और आनंदित होकर मुनि अत्रिके चरणोंमें सिर नवाया।

दोहा

भरत राम संबादु सुनि सकल सुमंगल मूल।सुर स्वारथी सराहि कुल बरषत सुरतरु फूल३०८

सब मंगलोंकी जड़ यह भरत-राम संवाद सुनकर स्वार्थी देवता भी रघुकुलकी सराहना करते हुए कल्पवृक्षके फूल बरसाने लगे।

धन्य भरत जय राम गोसाईं। कहत देव हरषत बरिआई॥मुनि मिथिलेस सभाँ सब काहू। भरत बचन सुनि भयउ उछाहू॥

'भरत धन्य हैं, स्वामी राम की जय हो' कहते हुए देवता बहुत हर्षित हुए। भरतकी बात सुनकर मुनि वसिष्ठ, जनक और सारी सभाको बड़ा उत्साह हुआ।

भरत राम गुन ग्राम सनेहू। पुलकि प्रसंसत राउ बिदेहू॥सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन। नेमु पेमु अति पावन पावन॥

भरत और राम के गुण और प्रेमकी जनक रोमांचित होकर प्रशंसा कर रहे हैं - सेवक और स्वामी दोनोंका स्वभाव कितना सुंदर है, इनका नियम और प्रेम पवित्रताको भी और पवित्र कर देता है।

मति अनुसार सराहन लागे। सचिव सभासद सब अनुरागे॥सुनि सुनि राम भरत संबादू। दुहु समाज हियँ हरषु बिषादू॥

मंत्री और सभासद सब प्रेममुग्ध होकर अपनी-अपनी समझसे सराहना करने लगे। राम-भरतका यह संवाद सुन-सुनकर दोनों समाजोंके मनमें हर्ष और विषाद दोनों उमड़ आए।

राम मातु दुखु सुखु सम जानी। कहि गुन राम प्रबोधीं रानी॥एक कहहिं रघुबीर बड़ाई। एक सराहत भरत भलाई॥

राम की माता कौसल्याने दुख-सुखको बराबर मानते हुए राम के गुण बताकर बाकी रानियोंको धीरज बँधाया। कोई राम की महानताकी चर्चा करता है, कोई भरतकी अच्छाईकी सराहना करता है।

दोहा

अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप।राखिअ तीरथ तोय तहँ पावन अमिअ अनूप३०९

तब अत्रिने भरतसे कहा - इस पर्वतके पास ही एक सुंदर कुआँ है, इस पवित्र, अनोखे, अमृतजैसे तीर्थजलको वहीं रख दीजिए।

भरत अत्रि अनुसासन पाई। जल भाजन सब दिए चलाई॥सानुज आपु अत्रि मुनि साधू। सहित गए जहँ कूप अगाधू॥

भरतने अत्रिकी आज्ञा पाकर जलके सब पात्र भिजवा दिए, और छोटे भाई शत्रुघ्न तथा अत्रि मुनि व साधु-संतोंके साथ खुद उस अथाह कुएँपर गए।

पावन पाथ पुन्यथल राखा। प्रमुदित प्रेम अत्रि अस भाषा॥तात अनादि सिद्ध थल एहू। लोपेउ काल बिदित नहिं केहू॥

और वह पवित्र जल उस पुण्यस्थानमें रख दिया। तब अत्रिने प्रसन्न होकर कहा - तात, यह अनादि सिद्धस्थान है, कालक्रममें लुप्त हो गया था, इसीलिए किसीको इसका पता नहीं था।

तब सेवकन्ह सरस थलु देखा। कीन्ह सुजल हित कूप बिसेषा॥बिधि बस भयउ बिस्व उपकारू। सुगम अगम अति धरम बिचारू॥

तब सेवकोंने इस उपजाऊ जगहको देखकर उस जलके लिए एक खास कुआँ बना दिया। दैवयोगसे यह सारे संसारके भले का काम बन गया, और जो धर्मविचार अगम था वह सुगम हो गया।

भरतकूप अब कहिहहिं लोगा। अति पावन तीरथ जल जोगा॥प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी। होइहहिं बिमल करम मन बानी॥

अब लोग इसे भरतकूप कहेंगे, तीर्थजलके मिलनेसे यह अत्यंत पवित्र हो गया है - इसमें नियमपूर्वक प्रेमसे स्नान करनेवाला मन-वचन-कर्मसे निर्मल हो जाएगा।

दोहा

कहत कूप महिमा सकल गए जहाँ रघुराउ।अत्रि सुनायउ रघुबरहि तीरथ पुन्य प्रभाउ३१०

कुएँकी महिमा कहते हुए सब लोग वहाँ गए जहाँ रघुनाथ थे, और अत्रिने रघुनाथको उस तीर्थके पुण्य-प्रभावकी कथा सुनाई।

कहत धरम इतिहास सप्रीती। भयउ भोरु निसि सो सुख बीती॥नित्य निबाहि भरत दोउ भाई। राम अत्रि गुर आयसु पाई॥

प्रेमसे धर्मकी कथाएँ कहते-सुनते वह रात सुखसे बीत गई और सुबह हो गई। भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई नित्यक्रिया पूरी करके राम, अत्रि और गुरुकी आज्ञा लेकर,

सहित समाज साज सब सादें। चले राम बन अटन पयादें॥कोमल चरन चलत बिनु पनहीं। भइ मृदु भूमि सकुचि मन मनहीं॥

समाजसहित सादे वेषमें राम के वनमें भ्रमण करने पैदल चल पड़े। कोमल पैर बिना जूतोंके चलते देखकर धरती मानो सकुचाकर खुद कोमल हो गई।

कुस कंटक काँकरीं कुराईं। कटुक कठोर कुबस्तु दुराईं॥महि मंजुल मृदु मारग कीन्हे। बहत समीर त्रिबिध सुख लीन्हे॥

कुश, काँटे, कंकड़, दरारें - सब कड़वी-कठोर चीज़ें छिपाकर धरतीने सुंदर, कोमल रास्ता बना दिया। सुखद शीतल-मंद-सुगंधित हवा बहने लगी।

सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं। बिटप फूलि फलि तृन मृदुताहीं॥मृग बिलोकि खग बोलि सुबानी। सेवहिं सकल राम प्रिय जानी॥

देवता फूल बरसाकर, बादल छाया करके, वृक्ष फूल-फलकर, घास अपनी कोमलतासे, हिरण देखकर और पक्षी मीठा बोलकर - सब भरतको राम का प्रिय जानकर उनकी सेवा करने लगे।

दोहा

सुलभ सिद्धि सब प्राकृतहु राम कहत जमुहात।राम प्रान प्रिय भरत कहुँ यह न होइ बड़ि बात३११

जब एक साधारण मनुष्य भी जँभाई लेते हुए 'राम' कहनेसे सारी सिद्धियाँ पा लेता है, तो राम के प्राणप्रिय भरतके लिए यह कोई बड़ी बात नहीं।

एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं। नेमु प्रेमु लखि मुनि सकुचाहीं॥पुन्य जलाश्रय भूमि बिभागा। खग मृग तरु तृन गिरि बन बागा॥

इस तरह भरत वनमें घूम रहे हैं, उनका नियम और प्रेम देखकर मुनि भी सकुचा जाते हैं। पवित्र जलाशय, धरतीके अलग-अलग भाग, पक्षी, पशु, वृक्ष, घास, पर्वत, वन, बाग -

चारु बिचित्र पबित्र बिसेषी। बूझत भरतु दिब्य सब देखी॥सुनि मन मुदित कहत रिषिराऊ। हेतु नाम गुन पुन्य प्रभाऊ॥

सब खास सुंदर, विचित्र, पवित्र और दिव्य देखकर भरत पूछते हैं, और उनका प्रश्न सुनकर ऋषिराज अत्रि प्रसन्न मनसे हर एकका कारण, नाम, गुण और पुण्य-प्रभाव बताते हैं।

कतहुँ निमज्जन कतहुँ प्रनामा। कतहुँ बिलोकत मन अभिरामा॥कतहुँ बैठि मुनि आयसु पाई। सुमिरत सीय सहित दोउ भाई॥

भरत कहीं स्नान करते हैं, कहीं प्रणाम करते हैं, कहीं मनोहर स्थान निहारते हैं, और कहीं मुनिकी आज्ञा पाकर बैठकर सीतासहित राम-लक्ष्मणका स्मरण करते हैं।

देखि सुभाउ सनेहु सुसेवा। देहिं असीस मुदित बनदेवा॥फिरहिं गए दिनु पहर अढ़ाई। प्रभु पद कमल बिलोकहिं आई॥

भरतका स्वभाव, प्रेम और सुंदर सेवा देखकर वनदेवता आनंदित होकर आशीर्वाद देते हैं। इस तरह घूमते-फिरते ढाई पहर दिन बीतनेपर वे लौटकर प्रभुके चरणकमलोंका दर्शन करते हैं।

दोहा

देखे थल तीरथ सकल भरत पाँच दिन माझ।कहत सुनत हरि हर सुजसु गयउ दिवसु भइ साँझ३१२

भरतने पाँच दिनोंमें सब तीर्थस्थान देख लिए। विष्णु और शिवका सुयश कहते-सुनते वह दिन भी बीत गया, शाम हो गई।

भोर नहाइ सबु जुरा समाजू। भरत भूमिसुर तेरहुति राजू॥भल दिन आजु जानि मन माहीं। रामु कृपाल कहत सकुचाहीं॥

अगली सुबह स्नान करके भरत, ब्राह्मण, राजा जनक और सारा समाज इकट्ठा हुआ। आज विदाईका शुभ दिन जानकर भी कृपालु राम कहनेमें सकुचा रहे हैं।

गुर नृप भरत सभा अवलोकी। सकुचि राम फिरि अवनि बिलोकी॥सील सराहि सभा सब सोची। कहुँ न राम सम स्वामि सँकोची॥

राम ने गुरु, राजा जनक, भरत और सारी सभाकी ओर देखा, पर सकुचाकर नजर फेरकर धरतीकी ओर देखने लगे। सभा उनके शीलकी सराहना करके सोचती है - राम-जैसा संकोची स्वामी कहीं और नहीं।

भरत सुजान राम रुख देखी। उठि सप्रेम धरि धीर बिसेषी॥करि दंडवत कहत कर जोरी। राखीं नाथ सकल रुचि मोरी॥

सुजान भरतने राम का रुख देखकर प्रेमसे उठकर, बड़ा धीरज धरकर दंडवत करके हाथ जोड़कर कहा - नाथ, आपने मेरी हर इच्छा पूरी रखी।

मोहि लगि सहेउ सबहिं संतापू। बहुत भाँति दुखु पावा आपू॥अब गोसाइँ मोहि देउ रजाई। सेवौं अवध अवधि भरि जाई॥

मेरे लिए सबने संताप सहा और आपने भी बहुत तरहका दुख झेला। अब स्वामी मुझे आज्ञा दें, मैं जाकर चौदह वर्षतक अवधकी सेवा करूँ।

दोहा

जेहिं उपाय पुनि पाय जनु देखे दीनदयाल।सो सिख देइअ अवधि लगि कोसलपाल कृपाल३१३

दीनदयालु, जिस उपायसे यह सेवक फिर आपके चरणोंका दर्शन पाए - कोसलपति, कृपालु, अवधिभरके लिए मुझे वही शिक्षा दीजिए।

पुरजन परिजन प्रजा गोसाई। सब सुचि सरस सनेहँ सगाई॥राउर बदि भल भव दुख दाहू। प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू॥

गोसाईं, आपके प्रेम और नातेसे नगरवासी, कुटुंबी और प्रजा सब पवित्र और आनंदमय हैं। आपके लिए तो जन्म-मरणके दुखमें जलना भी अच्छा है, प्रभुके बिना मोक्षका सुख भी व्यर्थ है।

स्वामि सुजानु जानि सब ही की। रुचि लालसा रहनि जन जी की॥प्रनतपालु पालिहि सब काहू। देउ दुहू दिसि ओर निबाहू॥

स्वामी, आप सुजान हैं, सबके मनकी और मुझ सेवकके दिलकी इच्छा-लालसा जानते हैं। शरणागतवत्सल, आप सबका पालन करेंगे और देव, दोनों तरफकी बात अंततक निभाएँगे।

अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो। किए बिचारु न सोचु खरो सो॥आरति मोर नाथ कर छोहू। दुहुँ मिलि कीन्ह ढीठु हठि मोहू॥

मुझे हर तरहसे इतना गहरा भरोसा है कि विचार करनेपर तिनकेभर भी चिंता नहीं रहती। मेरी दीनता और स्वामीका स्नेह दोनों मिलकर मुझे जबरन इतना ढीठ बना गए हैं।

यह बड़ दोषु दूरि करि स्वामी। तजि सकोच सिखइअ अनुगामी॥भरत बिनय सुनि सबहिं प्रसंसी। खीर नीर बिबरन गति हंसी॥

स्वामी, इस बड़े दोषको माफ करके, संकोच छोड़कर अपने अनुगामी सेवकको शिक्षा दीजिए। भरतकी इस विनतीको दूध-पानी अलग करनेवाली हंसिनीकी चालकी तरह सबने सराहा।

दोहा

दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दीन छलहीन।देस काल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन३१४

दीनबंधु, चतुर राम भाई भरतके यह दीन, निष्कपट वचन सुनकर देश-काल-अवसरके अनुकूल वचन बोले -

तात तुम्हारि मोरि परिजन की। चिंता गुरहि नृपहि घर बन की॥माथे पर गुर मुनि मिथिलेसू। हमहि तुम्हहि सपनेहुँ न कलेसू॥

तात, तुम्हारी, मेरी, परिवारकी, घर-वनकी सारी चिंता गुरु वसिष्ठ और राजा जनकको है। जब हमारे सिरपर गुरु, मुनि और मिथिलेश हैं, तो हमें-तुम्हें सपनेमें भी कोई कष्ट नहीं।

मोर तुम्हार परम पुरुषारथु। स्वारथु सुजसु धरमु परमारथु॥पितु आयसु पालिहिं दुहु भाई। लोक बेद भल भूप भलाई॥

मेरा और तुम्हारा सबसे बड़ा पुरुषार्थ, स्वार्थ, सुयश, धर्म और परमार्थ इसीमें है कि हम दोनों भाई पिताकी आज्ञा मानें - राजाकी बात निभाना ही लोक और वेद दोनोंमें भला है।

गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें। चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें॥अस बिचारि सब सोच बिहाई। पालहु अवध अवधि भरि जाई॥

गुरु-पिता-माता-स्वामीकी सीख माननेसे कुमार्गपर चलकर भी पैर गड्ढेमें नहीं पड़ता। यह सोचकर सारा सोच छोड़कर अवध जाकर चौदह वर्षतक उसका पालन करो।

देसु कोसु परिजन परिवारू। गुर पद रजहिं लाग छरुभारू॥तुम्ह मुनि मातु सचिव सिख मानी। पालेहु पुहुमि प्रजा रजधानी॥

देश, खजाना, कुटुंब-परिवार सबकी जिम्मेदारी गुरुके चरणोंकी धूलपर है। तुम बस मुनि, माताओं और मंत्रियोंकी सीख मानते हुए प्रजा और राजधानीका पालन करते रहना।

दोहा

मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक।पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित बिबेक३१५

तुलसीदास कहते हैं - राम ने कहा, मुखिया मुखकी तरह होना चाहिए, जो खुद खाता तो एक अकेला है, पर विवेकसे शरीरके सारे अंगोंका पालन-पोषण करता है।

राजधरम सरबसु एतनोई। जिमि मन माहँ मनोरथ गोई॥बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती। बिनु अधार मन तोषु न साँती॥

राजधर्मका पूरा सार बस इतना ही है, जैसे मनके भीतर इच्छा छिपी रहती है। रघुनाथने भाई भरतको बहुत तरहसे समझाया, पर बिना किसी सहारेके उनके मनको न संतोष मिला न शांति।

भरत सील गुर सचिव समाजू। सकुच सनेह बिबस रघुराजू॥प्रभु करि कृपा पाँवरीं दीन्हीं। सादर भरत सीस धरि लीन्हीं॥

एक तरफ भरतका प्रेम, दूसरी तरफ गुरुजन-मंत्री-समाजकी उपस्थिति - यह देखकर रघुनाथ संकोच और स्नेह दोनोंके वश हो गए। आखिर प्रभुने कृपा करके खड़ाऊँ दे दीं और भरतने आदरसे उन्हें सिरपर धारण कर लिया।

चरनपीठ करुनानिधान के। जनु जुग जामिक प्रजा प्रान के॥संपुट भरत सनेह रतन के। आखर जुग जनु जीव जतन के॥

करुणानिधानकी वे दोनों खड़ाऊँ मानो प्रजाके प्राणोंकी रक्षा करनेवाले दो पहरेदार हैं, भरतके प्रेमरूपी रत्नके लिए मानो डिब्बा और जीवके उद्धारके लिए मानो राम-नामके दो अक्षर हैं।

कुल कपाट कर कुसल करम के। बिमल नयन सेवा सुधरम के॥भरत मुदित अवलंब लहे तें। अस सुख जस सिय रामु रहे तें॥

रघुकुलकी रक्षाके लिए दो किवाड़, अच्छे कर्म करनेके लिए दो हाथ, और सेवारूपी धर्मको सुझानेके लिए निर्मल आँखें - इस सहारेको पाकर भरत इतने आनंदित हुए जितना सीता-रामके साथ रहनेसे होता।

दोहा

मागेउ बिदा प्रनामु करि राम लिए उर लाइ।लोग उचाटे अमरपति कुटिल कुअवसरु पाइ३१६

भरतने प्रणाम करके विदा माँगी, राम ने उन्हें गले लगा लिया। इधर कुटिल इंद्रने बुरा मौका पाकर लोगोंमें उथल-पुथल मचा दी।

सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी। अवधि आस सम जीवनि जी की॥नतरु लखन सिय राम बियोगा। हहरि मरत सब लोग कुरोगा॥

वह कुचाल भी अंततः सबके भले के लिए हो गई, मानो अवधिकी आशाके समान जीवनके लिए संजीवनी बन गई। नहीं तो लक्ष्मण-सीता-रामके वियोगसे सब लोग घबराकर मर ही जाते।

रामकृपाँ . अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी॥भेंटत भुज भरि भाइ भरत सो। राम प्रेम रसु कहि न परत सो॥

राम की कृपाने सारी गड़बड़ सुधार दी, लूटने आई देवसेना ही रक्षक बन गई। राम भाई भरतको बाँहोंमें भरकर मिल रहे हैं - उस प्रेमके आनंदका वर्णन नहीं हो सकता।

तन मन बचन उमग अनुरागा। धीर धुरंधर धीरजु त्यागा॥बारिज लोचन मोचत बारी। देखि दसा सुर सभा दुखारी॥

तन-मन-वचन तीनोंमें प्रेम उमड़ पड़ा, धीरजके धनी रघुनाथने भी धैर्य खो दिया - कमल-जैसे नेत्रोंसे आँसू बहने लगे। यह दशा देखकर देवताओंकी सभा भी दुखी हो गई।

मुनिगन गुर धुर धीर जनक से। ग्यान अनल मन कसें कनक से॥जे बिरंचि निरलेप उपाए। पदुम पत्र जिमि जग जल जाए॥

मुनिगण, गुरु वसिष्ठ और जनक-जैसे धीरधुरंधर, जिन्होंने अपने मनको ज्ञानकी आगमें सोनेकी तरह तपाया था, जिन्हें ब्रह्माने निर्लेप रचा और जो संसाररूपी जलमें कमलके पत्तेकी तरह अनासक्त पैदा हुए,

दोहा

तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार।भए मगन मन तन बचन सहित बिराग बिचार३१७

वे भी राम-भरतके इस अनुपम, अपार प्रेमको देखकर तन-मन-वचनसे, वैराग्य-विवेकसहित उसी प्रेममें डूब गए।

जहाँ जनक गुर गति मति भोरी। प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी॥बरनत रघुबर भरत बियोगू। सुनि कठोर कबि जानिहि लोगू॥

जहाँ जनक और गुरु वसिष्ठकी बुद्धि भी कुंठित हो गई, उस दिव्य प्रेमको सांसारिक कहना बड़ा अपराध होगा। राम-भरतके वियोगका वर्णन सुनकर लोग कविको निष्ठुर ही समझेंगे।

सो सकोच रसु अकथ सुबानी। समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी॥भेंटि भरत रघुबर समुझाए। पुनि रिपुदवनु हरषि हियँ लाए॥

वह संकोचभरा रस बयान से परे है, इसीलिए कविकी वाणी भी उस पलके प्रेमको याद करके सकुचा गई। भरतसे मिलकर रघुनाथने उन्हें समझाया, फिर हर्षित होकर शत्रुघ्नको भी गले लगाया।

सेवक सचिव भरत रुख पाई। निज निज काज लगे सब जाई॥सुनि दारुन दुखु दुहूँ समाजा। लगे चलन के साजन साजा॥

सेवक और मंत्री भरतका रुख पाकर सब अपने-अपने काममें लग गए। यह सुनकर दोनों समाजोंमें भारी दुख छा गया, वे चलनेकी तैयारी करने लगे।

प्रभु पद पदुम बंदि दोउ भाई। चले सीस धरि राम रजाई॥मुनि तापस बनदेव निहोरी। सब सनमानि बहोरि बहोरी॥

प्रभुके चरणकमल वंदन करके और राम की आज्ञा शिरोधार्य करके भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई चले। मुनि, तपस्वी और वनदेवता सबका बार-बार सम्मान करके उन्होंने विनती की।

दोहा

लखनहि भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि।चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि३१८

फिर लक्ष्मणसे मिलकर, प्रणाम करके, सीताके चरणोंकी धूल सिरपर धारण करके और सब मंगलोंकी जड़ आशीर्वाद सुनकर वे प्रेमसहित चल पड़े।

सानुज राम नृपहि सिर नाई। कीन्हि बहुत बिधि बिनय बड़ाई॥देव दया बस बड़ दुखु पायउ। सहित समाज काननहिं आयउ॥

छोटे भाई लक्ष्मणसहित राम ने राजा जनकको सिर नवाकर बहुत तरहसे विनती और उनकी बड़ाई की - देव, आपने दयावश बड़ा कष्ट सहा, समाजसहित वनमें आए।

पुर पगु धारिअ देइ असीसा। कीन्ह धीर धरि गवनु महीसा॥मुनि महिदेव साधु सनमाने। बिदा किए हरि हर सम जाने॥

अब आशीर्वाद देकर नगर लौट जाइए। यह सुनकर राजा जनकने धीरज धरकर प्रस्थान किया। फिर राम ने मुनि, ब्राह्मण और साधुओंको विष्णु-शिवके समान मानकर सम्मानपूर्वक विदा किया।

सासु समीप गए दोउ भाई। फिरे बंदि पग आसिष पाई॥कौसिक बामदेव जाबाली। पुरजन परिजन सचिव सुचाली॥

तब राम-लक्ष्मण दोनों भाई सास सुनयनाके पास गए, चरण वंदन करके आशीर्वाद पाकर लौट आए। फिर विश्वामित्र, वामदेव, जाबालि और सदाचारी कुटुंबी, नगरवासी, मंत्री -

जथा जोगु करि बिनय प्रनामा। बिदा किए सब सानुज रामा॥नारि पुरुष लघु मध्य बड़ेरे। सब सनमानि कृपानिधि फेरे॥

सबको यथायोग्य विनय और प्रणाम करके लक्ष्मणसहित राम ने विदा किया। कृपानिधान राम ने छोटे-मझले-बड़े सभी स्त्री-पुरुषोंका सम्मान करके उन्हें लौटाया।

दोहा

भरत मातु पद बंदि प्रभु सुचि सनेहँ मिलि भेंटि।बिदा कीन्ह सजि पालकी सकुच सोच सब मेटि३१९

भरतकी माता कैकेयीके चरण वंदन करके प्रभु राम ने निश्छल प्रेमसे उनसे भेंट की और उनका सारा संकोच-सोच मिटाकर पालकी सजाकर उन्हें विदा किया।

परिजन मातु पितहि मिलि सीता। फिरी प्रानप्रिय प्रेम पुनीता॥करि प्रनामु भेंटी सब सासू। प्रीति कहत कबि हियँ न हुलासू॥

प्राणप्रिय पति राम के साथ निष्ठावान सीता नैहरके कुटुंबियों और माता-पितासे मिलकर लौट आईं। फिर प्रणाम करके सब सासुओंसे गले मिलीं - उस प्रेमका वर्णन करते कविका मन भी हुलसित नहीं होता।

सुनि सिख अभिमत आसिष पाई। रही सीय दुहु प्रीति समाई॥रघुपति पटु पालकीं मगाईं। करि प्रबोधु सब मातु चढ़ाई॥

उनकी सीख सुनकर और मनचाहा आशीर्वाद पाकर सीता दोनों ओरके प्रेममें डूबी रहीं। फिर रघुनाथने सुंदर पालकियाँ मँगवाईं और सांत्वना देकर सब माताओंको उनपर बिठाया।

बार बार हिलि मिलि दुहु भाई। सम सनेहँ जननी पहुँचाई॥साजि बाजि गज बाहन नाना। भरत भूप दल कीन्ह पयाना॥

दोनों भाइयोंने बार-बार गले मिलकर बराबर स्नेहसे माताओंको विदा किया। भरत और राजा जनककी सेनाओंने घोड़े-हाथी-सवारियाँ सजाकर प्रस्थान किया।

हृदयँ रामु सिय लखन समेता। चले जाहिं सब लोग अचेता॥बसह बाजि गज पसु हियँ हारें। चले जाहिं परबस मन मारें॥

सीता-लक्ष्मणसहित राम को हृदयमें बसाए सब लोग बेसुध होकर चले जा रहे हैं। बैल, घोड़े, हाथी तक हारे हुए मनसे परवश चले जा रहे हैं।

दोहा

गुर गुरतिय पद बंदि प्रभु सीता लखन समेत।फिरे हरष बिसमय सहित आए परन निकेत३२०

गुरु और गुरुपत्नी अरुंधतीके चरण वंदन करके सीता-लक्ष्मणसहित प्रभु राम हर्ष और विषाद दोनों लिए लौटकर पर्णकुटीमें आए।

बिदा कीन्ह सनमानि निषादू। चलेउ हृदयँ बड़ बिरह बिषादू॥कोल किरात भिल्ल बनचारी। फेरे फिरे जोहारि जोहारी॥

फिर सम्मान करके निषादराजको विदा किया, वह गया तो सही पर हृदयमें विरहका भारी दुख लिए। फिर कोल-किरात-भील वनवासियोंको भी लौटाया, वे जोहार करते हुए विदा हुए।

प्रभु सिय लखन बैठि बट छाहीं। प्रिय परिजन बियोग बिलखाहीं॥भरत सनेह सुभाउ सुबानी। प्रिया अनुज सन कहत बखानी॥

प्रभु, सीता और लक्ष्मण बरगदकी छायामें बैठकर प्रियजनों और परिवारके वियोगसे दुखी हो रहे हैं। भरतके स्नेह, स्वभाव और सुंदर वाणीको याद करते हुए वे सीता और लक्ष्मणसे बातें कर रहे हैं।

प्रीति प्रतीति बचन मन करनी। श्रीमुख राम प्रेम बस बरनी॥तेहि अवसर खग मृग जल मीना। चित्रकूट चर अचर मलीना॥

राम ने प्रेमवश अपने मुखसे भरतके प्रेम, विश्वास और आचरणका वर्णन किया। उस समय पक्षी, पशु, मछलियाँ - चित्रकूटके सभी जड़-चेतन जीव उदास हो गए।

बिबुध बिलोकि दसा रघुबर की। बरषि सुमन कहि गति घर घर की॥प्रभु प्रनामु करि दीन्ह भरोसो। चले मुदित मन डर न खरो सो॥

रघुनाथकी यह दशा देखकर देवताओंने फूल बरसाकर अपनी-अपनी व्यथा सुनाई। प्रभुने प्रणाम करके उन्हें आश्वासन दिया, तब वे प्रसन्न मनसे चले, मनमें तनिक भी डर नहीं रहा।

दोहा

सानुज सीय समेत प्रभु राजत परन कुटीर।भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर३२१

लक्ष्मण और सीतासहित प्रभु राम पर्णकुटीमें ऐसे शोभित हो रहे हैं मानो भक्ति, ज्ञान और वैराग्य स्वयं शरीर धारण करके विराजमान हों।

मुनि महिसुर गुर भरत भुआलू। राम बिरहँ सबु साजु बिहालू॥प्रभु गुन ग्राम गनत मन माहीं। सब चुपचाप चले मग जाहीं॥

मुनि, ब्राह्मण, गुरु, भरत और राजा जनक - सारा समाज राम के विरहमें व्याकुल है। प्रभुके गुणोंको मनमें दोहराते हुए सब चुपचाप रास्ता तय कर रहे हैं।

जमुना उतरि पार सबु भयऊ। सो बासरु बिनु भोजन गयऊ॥उतरि देवसरि दूसर बासू। रामसखाँ सब कीन्ह सुपासू॥

सब यमुना पार करके उस दिन बिना भोजनके ही रह गए। फिर गंगा पार करके दूसरा मुकाम किया, जहाँ रामसखा निषादराजने सारी व्यवस्था कर दी।

सई उतरि गोमतीं नहाए। चौथें दिवस अवधपुर आए॥जनकु रहे पुर बासर चारी। राज काज सब साज सँभारी॥

फिर सई नदी पार करके गोमतीमें स्नान किया और चौथे दिन अयोध्या पहुँच गए। जनक चार दिन अयोध्यामें रहे और सारा राजकाज सँभालकर,

सौंपि सचिव गुर भरतहि राजू। तेरहुति चले साजि सबु साजू॥नगर नारि नर गुर सिख मानी। बसे सुखेन राम रजधानी॥

मंत्री, गुरु और भरतको राज्य सौंपकर सारी तैयारी करके मिथिलाको चल पड़े। नगरके स्त्री-पुरुष गुरुकी सीख मानकर राम की राजधानी अयोध्यामें सुखपूर्वक रहने लगे।

दोहा

राम दरस लगि लोग सब करत नेम उपबास।तजि तजि भूषन भोग सुख जिअत अवधि कीं आस३२२

सब लोग राम के दर्शनकी आस लिए नियम-उपवास करने लगे, गहने-भोग-सुख त्यागकर बस उस अवधिकी प्रतीक्षामें जी रहे हैं।

सचिव सुसेवक भरत प्रबोधे। निज निज काज पाइ पाइ सिख ओधे॥पुनि सिख दीन्ह बोलि लघु भाई। सौंपी सकल मातु सेवकाई॥

भरतने मंत्रियों और विश्वस्त सेवकोंको समझाया, वे सीख पाकर अपने-अपने काममें जुट गए। फिर छोटे भाई शत्रुघ्नको बुलाकर सीख दी और सब माताओंकी सेवा उन्हें सौंपी।

भूसुर बोलि भरत कर जोरे। करि प्रनाम बय बिनय निहोरे॥ऊँच नीच कारजु भल पोचू। आयसु देब न करब सँकोचू॥

ब्राह्मणोंको बुलाकर भरतने हाथ जोड़कर, उम्रके अनुसार आदरसे विनती की - कोई भी छोटा-बड़ा, अच्छा-बुरा काम हो, बिना संकोचके आज्ञा दीजिएगा।

परिजन पुरजन प्रजा बोलाए। समाधानु करि सुबस बसाए॥सानुज गे गुर गेहँ बहोरी। करि दंडवत कहत कर जोरी॥

फिर परिवार, नगरवासी और प्रजाको बुलाकर उन्हें समझाकर सुखपूर्वक बसाया। फिर शत्रुघ्नसहित गुरुके घर जाकर दंडवत करते हुए हाथ जोड़कर बोले -

आयसु होइ त रहौं सनेमा। बोले मुनि तन पुलकि सपेमा॥समुझव कहब करब तुम्ह जोई। धरम सारु जग होइहि सोई॥

आज्ञा हो तो मैं नियमपूर्वक यहीं रहूँ। मुनि वसिष्ठ रोमांचित होकर प्रेमसे बोले - भरत, तुम जो भी समझोगे, कहोगे, करोगे, वही जगतमें धर्मका सार होगा।

दोहा

सुनि सिख पाइ असीस बड़ि गनक बोलि दिनु साधि।सिंघासन प्रभु पादुका बैठारे निरुपाधि३२३

यह सुनकर और बड़ा आशीर्वाद पाकर भरतने ज्योतिषियोंको बुलाया, शुभ मुहूर्त देखकर प्रभुकी चरण-पादुकाओंको निर्विघ्न सिंहासनपर विराजमान किया।

राम मातु गुर पद सिरु नाई। प्रभु पद पीठ रजायसु पाई॥नंदिगावँ करि परन कुटीरा। कीन्ह निवासु धरम धुर धीरा॥

फिर राम की माता कौसल्या और गुरुके चरणोंमें सिर नवाकर, चरण-पादुकाओंकी आज्ञा पाकर धर्मधुरंधर भरतने नंदिग्राममें पर्णकुटी बनाकर वहीं निवास किया।

जटाजूट सिर मुनिपट धारी। महि खनि कुस साँथरी सँवारी॥असन बसन बासन ब्रत नेमा। करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा॥

सिरपर जटा और मुनि-वस्त्र धारण करके, धरती खोदकर उसमें कुशकी शय्या बिछाई। भोजन, वस्त्र, बर्तन, व्रत-नियम - सबमें वे ऋषियोंका कठिन धर्म प्रेमपूर्वक निभाने लगे।

भूषन बसन भोग सुख भूरी। मन तन बचन तजे तिन तूरी॥अवध राजु सुर राजु सिहाई। दसरथ धनु सुनि धनदु लजाई॥

गहने, वस्त्र और तमाम भोग-सुख मन-वचन-कर्मसे पूरी तरह त्याग दिए। जिस अयोध्याके राज्यको इंद्र तक तरसते थे और जिसकी संपत्ति सुनकर कुबेर भी लजाते थे,

तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा। चंचरीक जिमि चंपक बागा॥रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी॥

उसी अयोध्यामें भरत ऐसे निर्लिप्त होकर रहते हैं जैसे चंपाके बागमें भौंरा। राम के सच्चे प्रेमी भाग्यशाली लोग वैभव-विलासको वैसे ही त्याग देते हैं जैसे उल्टी की हुई चीज़को कोई दोबारा नहीं छूता।

दोहा

राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति।चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति३२४

भरत तो वैसे भी राम के प्रेमके पात्र हैं, इस त्यागसे वे बड़े नहीं हुए - यह तो उनके लिए स्वाभाविक ही है। जैसे पानी न पीनेकी टेकसे चातककी और नीर-क्षीर विवेकसे हंसकी सराहना होती है, वैसे ही भरतकी।

देह दिनहुँ दिन दूबरि होई। घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई॥नित नव राम प्रेम पनु पीना। बढ़त धरम दलु मनु न मलीना॥

भरतका शरीर दिनोंदिन दुबला होता जाता है, तेज घट रहा है, पर बल और मुखकी कांति वैसी ही बनी है। राम प्रेमका यह व्रत रोज नया और सशक्त होता है, धर्म बढ़ता है और मन उदास नहीं, प्रसन्न रहता है।

जिमि जलु निघटत सरद प्रकासे। बिलसत बेतस बनज बिकासे॥सम दम संजम नियम उपासा। नखत भरत हिय बिमल अकासा॥

जैसे शरद ऋतुके उजालेसे पानी घटता है, पर बेंत शोभा पाते हैं और कमल खिल उठते हैं - वैसे ही शम, दम, संयम, नियम और उपवास भरतके हृदयरूपी निर्मल आकाशके नक्षत्र बन गए हैं।

ध्रुव बिस्वास अवधि राका सी। स्वामि सुरति सुरबीथि बिकासी॥राम पेम बिधु अचल अदोषा। सहित समाज सोह नित चोखा॥

विश्वास ही उस आकाशका ध्रुवतारा है, चौदह वर्षकी अवधि पूर्णिमाके समान है, और स्वामी राम की याद आकाशगंगाकी तरह चमकती है। राम प्रेम ही वह अचल, निष्कलंक चाँद है जो अपने नक्षत्र-समाजसहित सदा सुंदर शोभित रहता है।

भरत रहनि समुझनि करतूती। भगति बिरति गुन बिमल बिभूती॥बरनत सकल सुकचि सकुचाहीं। सेस गनेस गिरा गमु नाहीं॥

भरतकी रहनी, समझ, करनी, भक्ति, वैराग्य और निर्मल गुण-वैभवका वर्णन करते सभी अच्छे कवि सकुचा जाते हैं - वहाँ तो शेष, गणेश और सरस्वतीकी भी पहुँच नहीं है।

दोहा

नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति।मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति३२५

वे नित्य प्रभुकी पादुकाओंकी पूजा करते हैं, हृदयमें प्रेम समाता नहीं। पादुकाओंसे आज्ञा माँग-माँगकर वे हर तरहसे राजकाज चलाते हैं।

पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू। जीह नामु जप लोचन नीरू॥लखन राम सिय कानन बसहीं। भरतु भवन बसि तप तनु कसहीं॥

शरीर रोमांचित है, हृदयमें सीता-राम बसे हैं, जीभ राम-नाम जप रही है, आँखोंमें प्रेमके आँसू हैं। लक्ष्मण-राम-सीता वनमें रहते हैं, और भरत घरमें रहते हुए भी तपसे अपना शरीर कस रहे हैं।

दोउ दिसि समुझि कहत सबु लोगू। सब बिधि भरत सराहन जोगू॥सुनि ब्रत नेम साधु सकुचाहीं। देखि दसा मुनिराज लजाहीं॥

दोनों ओरकी स्थिति समझकर सब कहते हैं कि भरत हर तरहसे सराहनीय हैं। उनके व्रत-नियम सुनकर साधु-संत भी सकुचा जाते हैं, उनकी दशा देखकर मुनिराज भी लजा जाते हैं।

परम पुनीत भरत आचरनू। मधुर मंजु मुद मंगल करनू॥हरन कठिन कलि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू॥

भरतका परम पवित्र आचरण मधुर, सुंदर और मंगलकारी है। यह कलियुगके कठिन पाप-क्लेशोंको हरनेवाला और महामोहरूपी रातको मिटानेके लिए सूर्यके समान है।

पाप पुंज कुंजर मृगराजू। समन सकल संताप समाजू॥जन रंजन भंजन भव भारू। राम सनेह सुधाकर सारू॥

यह पापरूपी हाथीके लिए सिंह है, सारे संतापोंका नाश करनेवाला है, भक्तोंको आनंद देनेवाला, संसारका बोझ हरनेवाला और राम प्रेमरूपी चंद्रमाका सार अमृत है।

छंद

सिय राम प्रेम पियूष पूरन होत जनमु न भरत को।मुनि मन अगम जम नियम सम दम बिषम ब्रत आचरत को॥दुख दाह दारिद दंभ दूषन सुजस मिस अपहरत को।कलिकाल तुलसी से सठन्हि हठि राम सनमुख करत को॥

यदि सीता-रामके प्रेमरूपी अमृतसे भरा भरतका जन्म न होता, तो मुनियोंको भी दुर्लभ यम-नियम-शम-दमके कठिन व्रत कौन निभाता? दुख, संताप, दरिद्रता, दंभ जैसे दोषोंको अपने सुयशके बहाने कौन हरता? और कलियुगमें तुलसीदास-जैसे मूर्खोंको हठपूर्वक राम के सम्मुख कौन करता?

सोरठा

भरत चरित करि नेमु तुलसी जो सादर सुनहिं।सीय राम पद पेमु अवसि होइ भव रस बिरति३२६

तुलसीदास कहते हैं - जो कोई भरतके चरित्रको नियमपूर्वक आदरसे सुनेगा, उसे अवश्य ही सीता-रामके चरणोंमें प्रेम होगा और सांसारिक विषय-भोगसे वैराग्य होगा।

सोरठा

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने द्वितीय: सोपानः समाप्तः।

कलियुगके सम्पूर्ण पापोंको विध्वंस करनेवाले श्रीरामचरितमानसका यह दूसरा सोपान (अयोध्याकाण्ड) समाप्त हुआ।

करि पूजा कहि बचन सुहाए। दिए मूल फल प्रभु मन भाए॥

पूजा करके और मीठे वचन कहकर, उन्होंने प्रभुको भानेवाले फल-मूल भेंट किए।