षष्ठ सोपान — भाग 3

लंकाकाण्ड

सेतु बंधन, राम-रावण युद्ध एवं विजय की कथा।

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सेतु बंधन, राम-रावण युद्ध एवं विजय की कथा।

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दोहा

उत पचार दसकंधर इत अंगद हनुमान।लरत निसाचर भालु कपि करि निज निज प्रभु आन॥८०(ग)

उधरसे रावण ललकार रहा है और इधरसे अंगद-हनुमान। राक्षस और रीछ-वानर अपने-अपने स्वामीकी दुहाई देते हुए लड़ रहे हैं।

सुर ब्रह्मादि सिद्ध मुनि नाना। देखत रन नभ चढ़े बिमाना॥हमहू उमा रहे तेहि संगा। देखत राम चरित रन रंगा॥

सूर्य-चंद्र, ब्रह्मा आदि देवता और अनगिनत सिद्ध-मुनि विमानों पर सवार होकर आकाशसे यह युद्ध निहार रहे हैं। शिवजी कहते हैं—हे उमा! मैं भी उसी देव-समूहमें खड़ा श्रीरामके रणकौशलकी यह लीला देख रहा था।

सुभट समर रस दुहु दिसि माते। कपि जयसील राम बल ताते॥एक एक सन भिरहिं पचारहिं। एकन्ह एक मर्दि महि पारहिं॥

दोनों दलोंके योद्धा युद्धके नशेमें चूर हैं, पर श्रीरामके बलसे वानर सेना ही विजयी होती जा रही है। योद्धा एक-दूसरेको ललकारते हुए भिड़ते हैं और परस्पर एक-दूसरेको रौंदकर धरतीपर पटक देते हैं।

मारहिं काटहिं धरहिं पछारहिं। सीस तोरि सीसन्ह सन मारहिं॥उदर बिदारहिं भुजा उपारहिं। गहि पद अवनि पटकि भट डारहिं॥

कोई मारता है, कोई काटता है, कोई पकड़कर पछाड़ देता है; कटे सिरोंसे ही दूसरोंके सिर फोड़े जा रहे हैं। किसीका पेट चीरा जा रहा है, किसीकी भुजा उखाड़ी जा रही है, तो किसीको पैर पकड़कर धरतीपर दे मारा जा रहा है।

निसिचर भट महि गाड़हि भालू। ऊपर ढारि देहिं बहु बालू॥बीर बलिमुख जुद्ध बिरुद्धे। देखिअत बिपुल काल जनु क्रुद्धे॥

भालू राक्षस योद्धाओंको धरतीमें गाड़कर ऊपरसे ढेरों बालू लाद देते हैं। युद्धमें शत्रुओंसे भिड़े वीर वानर मानो असंख्य क्रुद्ध कालके रूप धरकर उतर आये हों।

छंद

क्रुद्धे कृतांत समान कपि तन स्त्रवत सोनित राजहीं।मर्दहिं निसाचर कटक भट बलवंत घन जिमि गाजहीं॥मारहिं चपेटन्हि डाटि दातन्ह काटि लातन्ह मीजहीं।चिक्करहिं मर्कट भालु छल बल करहिं जेहिं खल छीजहीं॥

क्रोधसे भरे काल-सरीखे वे वानर लहू-लुहान शरीरोंसे भी शोभा पा रहे हैं। बलवान वानर-वीर राक्षस-सेनाको मसल डालते हैं और मेघकी भाँति गरज उठते हैं। कभी चाँटोंसे धमकाकर मारते हैं, कभी दाँतोंसे काटकर लातोंसे रौंद डालते हैं। वानर-भालू चीत्कार करते और ऐसी युक्ति-बल भिड़ाते हैं कि दुष्ट राक्षस नष्ट हो जायँ।

छंद

धरि गाल फारहिं उर बिदारहिं गल अँतावरि मेलहीं।प्रहलादपति जनु बिबिध तनु धरि समर अंगन खेलहीं॥धरु मारु काटु पछारु घोर गिरा गगन महि भरि रही।जय राम जो तृन ते कुलिस कर कुलिस ते कर तृन सही॥

वे राक्षसोंके गाल पकड़कर चीर डालते हैं, छाती फाड़ देते हैं और अँतड़ियाँ निकालकर उन्हींके गलेमें डाल देते हैं—मानो नृसिंह भगवान ही अनेक रूप धरकर रणभूमिमें क्रीड़ा कर रहे हों। 'पकड़ो, मारो, काटो, पछाड़ो'—इन घोर पुकारोंसे आकाश और धरती गूँज उठे हैं। जय हो श्रीरामकी, जो तिनकेको वज्र और वज्रको तिनका बना देते हैं!

दोहा

निज दल बिचलत देखेसि बीस भुजाँ दस चाप।रथ चढ़ि चलेउ दसानन फिरहु फिरहु करि दाप॥८१

अपनी सेनाको यों बिखरते देख रावण बीस भुजाओंमें दस धनुष सँभालकर रथपर सवार हो गया और 'लौटो, लौटो' की गर्जना करता हुआ मैदानमें आ डटा।

धायउ परम क्रुद्ध दसकंधर। सन्मुख चले हूह दै बंदर॥गहि कर पादप उपल पहारा। डारेन्हि ता पर एकहिं बारा॥

परम क्रुद्ध रावण दौड़ पड़ा। वानर भी हुंकार भरते हुए उसके सामने आ डटे और उन्होंने वृक्ष, पत्थर और पहाड़ एक साथ उठाकर उसपर बरसा दिये।

लागहिं सैल बज्र तन तासू। खंड खंड होइ फूटहिं आसू॥चला न अचल रहा रथ रोपी। रन दुर्मद रावन अति कोपी॥

वे पहाड़ रावणके वज्र-सरीखे शरीरसे टकराते ही चूर-चूर होकर बिखर जाते हैं। रणके नशेमें चूर अत्यन्त क्रोधी रावण रथ थामे वहीं अडिग खड़ा रहा, टस-से-मस न हुआ।

इत उत झपटि दपटि कपि जोधा। मर्दै लाग भयउ अति क्रोधा॥चले पराइ भालु कपि नाना। त्राहि त्राहि अंगद हनुमाना॥

क्रोधसे जलता रावण इधर-उधर झपटकर वानर योद्धाओंको रौंदने लगा। यह देख अनेक वानर-भालू 'बचाओ, बचाओ, हे अंगद! हे हनुमान!' पुकारते हुए भाग खड़े हुए।

पाहि पाहि रघुबीर गोसाई। यह खल खाइ काल की नाई॥तेहि देखे कपि सकल पराने। दसहुँ चाप सायक संधाने॥

'बचाओ, हे रघुवीर! हे स्वामी! यह दुष्ट काल बनकर हमें निगले जा रहा है'—यह हाहाकार मच गया। सब वानरोंको भागते देख रावणने दसों धनुषोंपर बाण चढ़ा लिये।

छंद

संधानि धनु सर निकर छाड़ेसि उरग जिमि उड़ि लागहीं।रहे पूरि सर धरनी गगन दिसि बिदसि कहँ कपि भागहीं॥भयो अति कोलाहल बिकल कपि दल भालु बोलहिं आतुरे।रघुबीर करुना सिंधु आरत बंधु जन रच्छक हरे॥

उसने धनुषोंपर बाणोंकी झड़ी छोड़ी, जो सर्पकी भाँति उड़ते हुए जा लगते हैं। धरती, आकाश और दिशाएँ बाणोंसे भर गयीं—वानर भागें भी तो किधर? भारी कोलाहल मच गया और व्याकुल वानर-भालू सेना गिड़गिड़ाकर पुकार उठी—हे रघुवीर! हे करुणासागर! हे आर्तोंके बन्धु और सेवकोंके दुःख हरनेवाले हरि, अब रक्षा करो।

दोहा

निज दल बिकल देखि कटि कसि निषंग धनु हाथ।लछिमन चले क्रुद्ध होइ नाइ राम पद माथ॥८२

अपनी सेनाको यों व्याकुल देख लक्ष्मणजी कमरमें तरकस कस लिया, हाथमें धनुष उठाया और श्रीरामके चरणोंमें मस्तक नवाकर क्रोधसे भरे हुए युद्धके लिये चल पड़े।

रे खल का मारसि कपि भालू। मोहि बिलोकु तोर मैं कालू॥खोजत रहेउँ तोहि सुतघाती। आजु निपाति जुड़ावउँ छाती॥

लक्ष्मणजीने पास जाकर ललकारा—'रे दुष्ट! वानर-भालुओंको क्या मार रहा है, मुझे देख, मैं तेरा काल हूँ।' रावण बोला—'अरे मेरे पुत्रके घातक! तुझे ही ढूँढ़ रहा था, आज तुझे मारकर छाती ठंडी करूँगा।'

अस कहि छाड़ेसि बान प्रचंडा। लछिमन किए सकल सत खंडा॥कोटिन्ह आयुध रावन डारे। तिल प्रवान करि काटि निवारे॥

यों कहकर रावणने प्रचंड बाण छोड़े, पर लक्ष्मणजीने उन सबके सैकड़ों टुकड़े कर डाले। रावणने करोड़ों अस्त्र-शस्त्र चलाये, लक्ष्मणजीने उन्हें भी काट-काटकर तिल-तिल कर डाला।

पुनि निज बानन्ह कीन्ह प्रहारा। स्यंदनु भंजि सारथी मारा॥सत सत सर मारे दस भाला। गिरि सृंगन्ह जनु प्रबिसहिं ब्याला॥

फिर लक्ष्मणजीने अपने बाणोंसे रावणके रथको तोड़ डाला और सारथिको मार गिराया। रावणके दसों सिरोंमें सौ-सौ बाण ऐसे धँस गये मानो पर्वत-शिखरोंमें सर्प घुस रहे हों।

पुनि सत सर मारा उर माहीं। परेउ धरनि तल सुधि कछु नाहीं॥उठा प्रबल पुनि मुरुछा जागी। छाड़िसि ब्रह्म दीन्हि जो साँगी॥

फिर सौ बाण रावणकी छातीमें मारे, जिससे वह धरतीपर गिर पड़ा और उसे कुछ सुध न रही। मूर्च्छा टूटते ही वह उठा और उसने वह प्रचंड शक्ति चला दी जो ब्रह्माजीने उसे दी थी।

छंद

सो ब्रह्म दत्त प्रचंड सक्ति अनंत उर लागी सही।परेउ बीर बिकल उठाव दसमुख अतुल बल महिमा रही॥ब्रह्मांड भवन बिराज जाकें एक सिर जिमि रज कनी।तेहि चह उठावन मूढ़ रावन जान नहिं त्रिभुअन धनी॥

ब्रह्माकी दी वह प्रचंड शक्ति सीधे लक्ष्मणजीकी छातीमें आ लगी और वे व्याकुल होकर गिर पड़े। रावण उन्हें उठाने लगा, पर उसका सारा बल व्यर्थ रह गया—भला जिनके एक सिरपर ब्रह्मांडरूपी भवन धूलके कणके समान टिका है, उन्हें यह मूर्ख रावण उठाना चाहता है, वह तीनों लोकके स्वामीको पहचानता ही नहीं।

दोहा

देखि पवनसुत धायउ बोलत बचन कठोर।आवत कपिहि हन्यो तेहिं मुष्टि प्रहार प्रघोर॥८३

यह देखकर पवनपुत्र हनुमान कठोर वचन बोलते हुए दौड़ पड़े। उनके पास आते ही रावणने एक भयंकर मुक्का जड़ दिया।

जानु टेकि कपि भूमि न गिरा। उठा सँभारि बहुत रिस भरा॥मुठिका एक ताहि कपि मारा। परेउ सैल जनु बज्र प्रहारा॥

हनुमानजी घुटनोंके बल झुके, गिरे नहीं, और क्रोधसे भरकर तुरंत सँभलकर उठ खड़े हुए। फिर उन्होंने रावणको ऐसा घूँसा जड़ा कि वह वज्रकी चोटसे टूटते पर्वतकी भाँति गिर पड़ा।

मुरुछा गै बहोरि सो जागा। कपि बल बिपुल सराहन लागा॥धिग धिग मम पौरुष धिग मोही। जौं तें जिअत रहेसि सुरद्रोही॥

मूर्च्छा टूटते ही रावण जागा और हनुमानजीके अपार बलकी सराहना करने लगा—'धिक्कार है मेरे पौरुषको, धिक्कार है मुझको, हे देवद्रोही! कि तू अब भी जीवित बच गया।'

अस कहि लछिमन कहुँ कपि ल्यायो। देखि दसानन बिसमय पायो॥कह रघुबीर समुझु जियँ भ्राता। तुम्ह कृतांत भच्छक सुर त्राता॥

यों कहकर हनुमानजी लक्ष्मणजीको उठा लाये और श्रीरामके पास ले आये। यह देख रावण चकित रह गया। श्रीरघुवीरने कहा—'भाई! धीरज धरो, तुम तो काल तकके भक्षक और देवताओंके रक्षक हो।'

सुनत बचन उठि बैठ कृपाला। गई गगन सो सकति कराला॥पुनि कोदंड बान गहि धाए। रिपु सन्मुख अति आतुर आए॥

यह सुनते ही कृपालु लक्ष्मणजी उठ बैठे और वह भयंकर शक्ति आकाशको लौट गयी। फिर वे धनुष-बाण सँभालकर दौड़े और बड़ी फुर्तीसे शत्रुके सामने जा डटे।

छंद

आतुर बहोरि बिभंजि स्यंदन सूत हति ब्याकुल कियो।गिरयो धरनि दसकंधर बिकलतर बान सत बेध्यो हियो॥सारथी दूसर घालि रथ तेहि तुरत लंका लै गयो।रघुबीर बंधु प्रताप पुंज बहोरि प्रभु चरनन्हि नयो॥

लक्ष्मणजीने बड़ी फुर्तीसे रावणका रथ तोड़ डाला और सारथिको मारकर उसे व्याकुल कर दिया। सौ बाणोंसे उसका हृदय बेध डाला, जिससे रावण अत्यन्त व्याकुल होकर धरतीपर गिर पड़ा। दूसरा सारथि उसे रथमें डालकर तुरंत लंका ले गया, और प्रताप-पुंज लक्ष्मणजी लौटकर प्रभुके चरणोंमें झुक गये।

दोहा

उहाँ दसानन जागि करि करै लाग कछु जग्य।राम बिरोध बिजय चह सठ हठ बस अति अग्य॥८४

उधर लंकामें रावण मूर्च्छासे जागकर कोई यज्ञ करने बैठ गया। वह मूर्ख और अत्यन्त अज्ञानी हठपूर्वक श्रीरामसे विरोध करके भी विजय पानेकी आस लगाये है।

इहाँ बिभीषन सब सुधि पाई। सपदि जाइ रघुपतिहि सुनाई॥नाथ करइ रावन एक जागा। सिद्ध भएँ नहिं मरिहि अभागा॥

'यहाँ विभीषणजीको इसकी खबर लगी और उन्होंने तुरंत जाकर श्रीरामको बता दिया—नाथ! रावण एक यज्ञ कर रहा है, वह सिद्ध हो गया तो यह अभागा सहज ही नहीं मरेगा।'

पठवहु नाथ बेगि भट बंदर। करहिं बिधंस आव दसकंधर॥प्रात होत प्रभु सुभट पठाए। हनुमदादि अंगद सब धाए॥

'हे नाथ! शीघ्र ही वानर योद्धाओंको भेजिये कि वे यज्ञ भंग कर दें, जिससे रावण स्वयं युद्धमें उतरे।' सवेरा होते ही प्रभुने वीर योद्धाओंको भेज दिया और हनुमान-अंगद आदि सब दौड़ पड़े।

कौतुक कूदि चढ़े कपि लंका। पैठे रावन भवन असंका॥जग्य करत जबहीं सो देखा। सकल कपिन्ह भा क्रोध बिसेषा॥

वानर खेल-खेलमें कूदकर लंकापर जा चढ़े और निर्भय होकर रावणके महलमें घुस गये। उसे यज्ञ करते देखते ही सब वानरोंको बड़ा क्रोध आ गया।

रन ते निलज भाजि गृह आवा। इहाँ आइ बक ध्यान लगावा॥अस कहि अंगद मारा लाता। चितव न सठ स्वारथ मन राता॥

'अरे निर्लज! युद्धसे भागकर घर आ बैठा और यहाँ बगुलेकी तरह ध्यान लगाये बैठा है!' यों कहकर अंगदने लात जड़ी, पर स्वार्थमें डूबे उस दुष्टने पलटकर देखा तक नहीं।

छंद

नहिं चितव जब करि कोप कपि गहि दसन लातन्ह मारहीं।धरि केस नारि निकारि बाहेर तेऽतिदीन पुकारहीं॥तब उठेउ क्रुद्ध कृतांत सम गहि चरन बानर डारई।एहि बीच कपिन्ह बिधंस कृत मख देखि मन महुँ हारई॥

जब उसने ध्यान न दिया तो वानर क्रोधित होकर उसे दाँतोंसे काटने और लातोंसे मारने लगे। स्त्रियोंके बाल पकड़कर उन्हें घरसे घसीट बाहर निकाल लाये, वे बेचारी बड़ी दीनतासे चीख उठीं। तब रावण काल-सा क्रोधित होकर उठा और वानरोंको पैर पकड़कर पटकने लगा, पर तब तक वानर यज्ञ नष्ट कर चुके थे—यह देख वह भीतर-ही-भीतर हार मान बैठा।

दोहा

जग्य बिधंसि कुसल कपि आए रघुपति पास।चलेउ निसाचर क्रुद्ध होइ त्यागि जिवन के आस॥८५

यज्ञ नष्ट करके सब चतुर वानर श्रीरामके पास लौट आये। रावण अब जीनेकी आस छोड़कर क्रोधसे भरा हुआ रणके लिये चल पड़ा।

चलत होहिं अति असुभ भयंकर। बैठहिं गीध उड़ाइ सिरन्ह पर॥भयउ कालबस काहु न माना। कहेसि बजावहु जुद्ध निसाना॥

चलते ही चारों ओर भयंकर अपशकुन होने लगे, गिद्ध उड़-उड़कर उसके सिरोंपर आ बैठे। पर काल-वश वह किसी अपशकुनको मानता ही न था—बस इतना ही कहा, 'युद्धका डंका बजाओ।'

चली तमीचर अनी अपारा। बहु गज रथ पदाति असवारा॥प्रभु सन्मुख धाए खल कैंसें। सलभ समूह अनल कहँ जैंसें॥

निशाचरोंकी अपार सेना चल पड़ी, जिसमें अनगिनत हाथी, रथ, घुड़सवार और पैदल सैनिक थे। वे दुष्ट प्रभुके सामने कुछ यों दौड़े जैसे पतंगे जल मरनेके लिये आगकी ओर दौड़ पड़ते हैं।

इहाँ देवतन्ह अस्तुति कीन्ही। दारुन बिपति हमहि एहिं दीन्ही॥अब जनि राम खेलावहु एही। अतिसय दुखित होति बैदेही॥

उधर देवताओंने स्तुति करते हुए कहा—'हे राम! इसने हमें बड़े दारुण कष्ट दिये हैं, अब इसे और मत खिलाइये, जानकीजी भी इससे अत्यन्त दुखी हो रही हैं।'

देव बचन सुनि प्रभु मुसकाना। उठि रघुबीर सुधारे बाना॥जटा जूट दृढ़ बाँधै माथे। सोहहिं सुमन बीच बिच गाथे॥

देवताओंकी यह विनती सुनकर प्रभु मुसकरा दिये और उठकर अपने बाण सँवारने लगे। उनके मस्तकपर जटाओंका जूड़ा कसकर बँधा है, जिसमें बीच-बीचमें गुँथे फूल शोभा दे रहे हैं।

अरुन नयन बारिद तनु स्यामा। अखिल लोक लोचनाभिरामा॥कटितट परिकर कस्यो निषंगा। कर कोदंड कठिन सारंगा॥

लाल नेत्र और मेघ-से श्याम शरीरवाले प्रभु सम्पूर्ण लोकोंके नेत्रोंको आनंद देनेवाले हैं। उन्होंने कमरमें फेंट और तरकस कसकर हाथमें कठोर शार्ङ्ग धनुष उठा लिया।

छंद

सारंग कर सुंदर निषंग सिलीमुखाकर कटि कस्यो।भुजदंड पीन मनोहरायत उर धरासुर पद लस्यो॥कह दास तुलसी जबहिं प्रभु सर चाप कर फेरन लगे।ब्रह्मांड दिग्गज कमठ अहि महि सिंधु भूधर डगमगे॥

प्रभुने हाथमें शार्ङ्ग धनुष लेकर कमरमें अक्षय बाणोंसे भरा सुंदर तरकस कस लिया। उनकी पुष्ट भुजाएँ और चौड़ी छाती परम मनोहर है, जिसपर भृगुजीके चरणका चिह्न सुशोभित है। तुलसीदासजी कहते हैं, प्रभु ज्यों ही धनुष-बाण हाथमें लेकर घुमाने लगे, त्यों ही ब्रह्मांड, दिशाओंके गज, कच्छप, शेषनाग, धरती, समुद्र और पर्वत—सब डगमगा उठे।

दोहा

सोभा देखि हरषि सुर बरषहिं सुमन अपार।जय जय जय करुनानिधि छबि बल गुन आगार॥८६

प्रभुकी यह शोभा देखकर देवता हर्षसे फूलोंकी अपार वर्षा करने लगे और 'जय हो, जय हो, जय हो, शोभा-बल-गुणके धाम करुणानिधानकी जय हो' पुकार उठे।

एहीं बीच निसाचर अनी। कसमसात आई अति घनी॥देखि चले सन्मुख कपि भट्टा। प्रलयकाल के जनु घन घट्टा॥

इसी बीच निशाचरोंकी घनघोर सेना आपसमें ठेलमठेल करती हुई आ पहुँची। उसे देख वानर योद्धा भी इस तरह आगे बढ़े मानो प्रलयकालके बादलोंके झुंड उमड़ आये हों।

बहु कृपान तरवारि चमंकहिं। जनु दहँ दिसि दामिनीं दमंकहिं॥गज रथ तुरग चिकार कठोरा। गर्जहिं मनहुँ बलाहक घोरा॥

कृपाण और तलवारें ऐसी चमक रही हैं मानो दसों दिशाओंमें बिजलियाँ कौंध रही हों। हाथी, रथ और घोड़ोंकी कर्कश गर्जना ऐसी लग रही है मानो घोर मेघ गरज रहे हों।

कपि लंगूर बिपुल नभ छाए। मनहुँ इंद्रधनु उए सुहाए॥उठइ धूरि मानहुँ जलधारा। बान बुंद भै बृष्टि अपारा॥

वानरोंकी अनगिनत पूँछें आकाशमें यों फैली हैं मानो सुंदर इंद्रधनुष उग आये हों। चारों ओर उठती धूल जलकी धाराके समान दीख रही है और बाणोंकी बूँदोंसे मानो वर्षा हो रही हो।

दुहुँ दिसि पर्बत करहिं प्रहारा। बज्रपात जनु बारहिं बारा॥रघुपति कोपि बान झरि लाई। घायल भै निसिचर समुदाई॥

दोनों ओरसे योद्धा पर्वतोंके प्रहार करते हैं, मानो बारंबार वज्रपात हो रहा हो। श्रीरामने क्रोधित होकर बाणोंकी झड़ी लगा दी, जिससे राक्षस-सेना घायल होकर तड़पने लगी।

लागत बान बीर चिक्करहीं। घुर्मि घुर्मि जहँ तहँ महि परहीं॥स्त्रवहिं सैल जनु निर्झर भारी। सोनित सरि कादर भयकारी॥

बाण लगते ही वीर चीत्कार कर उठते हैं और चक्कर खाते हुए यहाँ-वहाँ धरतीपर गिर पड़ते हैं। उनके लहूसे मानो पर्वतोंके भारी झरने बह चले हों—यह खूनकी नदी कायरोंके मनमें भय भर रही है।

छंद

कादर भयंकर रुधिर सरिता चली परम अपावनी।दोउ कूल दल रथ रेत चक्र अबर्त बहति भयावनी॥जल जंतुगज पदचर तुरग खर बिबिध बाहन को गने।सर सक्ति तोमर सर्प चाप तरंग चर्म कमठ घने॥

कायरोंको भयभीत करती वह अत्यन्त अपवित्र रक्तकी नदी बह चली, जिसके दोनों किनारे दोनों सेनाएँ ही हैं। रथ उसकी रेत हैं और पहिये उसमें बनते भँवर—यह नदी बड़ी भयावनी बहती है। हाथी, पैदल, घोड़े, गदहे आदि अनगिनत सवारियाँ ही उसके जलजंतु हैं; बाण, शक्ति और तोमर उसके सर्प हैं, धनुष उसकी लहरें हैं और ढालें उसके अनगिनत कछुए हैं।

दोहा

बीर परहिं जनु तीर तरु मज्जा बहु बह फेन।कादर देखि डरहिं तहँ सुभटन्ह के मन चेन॥८७

वीर इस तरह गिर रहे हैं मानो नदी-तटके वृक्ष ढह रहे हों, और बहती मज्जा ही मानो उसका फेन है। कायर इसे देखकर काँप उठते हैं, पर श्रेष्ठ योद्धाओंके मनको यह देखकर संतोष होता है।

मज्जहि भूत पिसाच बेताला। प्रमथ महा झोटिंग कराला॥काक कंक लै भुजा उड़ाहीं। एक ते छीनि एक लै खाहीं॥

उस नदीमें भूत, पिशाच, बेताल और बड़े-बड़े झोंटोंवाले भयंकर झोटिंग तथा प्रमथगण स्नान कर रहे हैं। कौए और गिद्ध कटी भुजाएँ लेकर उड़ते हैं और एक-दूसरेसे छीनकर खा जाते हैं।

एक कहहिं ऐसिउ सौंघाई। सठहु तुम्हार दरिद्र न जाई॥कहँरत भट घायल तट गिरे। जहँ तहँ मनहुँ अर्धजल परे॥

'कोई कहता है—अरे मूर्खो! इतनी बहुतायत होते हुए भी तुम्हारी दरिद्रता नहीं मिटती!' घायल योद्धा तटपर पड़े कराह रहे हैं, मानो जहाँ-तहाँ अधमरे पड़े हों।

खैंचहिं गीध आँत तट भए। जनु बंसी खेलत चित दए॥बहु भट बहहिं चढ़े खग जाहीं। जनु नावरि खेलहिं सरि माहीं॥

गिद्ध आँतें खींच रहे हैं, मानो मछुआरे मन लगाकर बंसी डाल रहे हों। बहते हुए योद्धाओंपर पक्षी सवार होकर बहे जा रहे हैं, मानो नदीमें नौका-विहार कर रहे हों।

जोगिनि भरि भरि खप्पर संचहिं। भूत पिसाच बधू नभ नंचहिं॥भट कपाल करताल बजावहिं। चामुंडा नाना बिधि गावहिं॥

योगिनियाँ खप्परोंमें रक्त भर-भरकर बटोर रही हैं और भूत-पिशाचोंकी स्त्रियाँ आकाशमें नाच रही हैं। योद्धाओंकी खोपड़ियोंको करताल बनाकर चामुंडाएँ बजाती और तरह-तरहसे गा रही हैं।

जंबुक निकर कटक्कट कट्टहिं। खाहिं हुआहिं अघाहिं दपट्टहिं॥कोटिन्ह रुंड मुंड बिनु डोल्लहिं। सीस परे महि जय जय बोल्लहिं॥

गीदड़ोंके झुंड कट-कट शब्द करते हुए शवोंको काट-खा रहे हैं, हुआँ-हुआँ करते और पेट भर जानेपर आपसमें डाँट-डपट रहे हैं। करोड़ों धड़ बिना सिरके ही घूम रहे हैं और कटे सिर धरतीपर पड़े 'जय-जय' पुकार रहे हैं।

छंद

बोल्लहिं जो जय जय मुंड रुंड प्रचंड सिर बिनु धावहीं।खप्परिन्ह खग्ग अलुज्झि जुज्झहिं सुभट भटन्ह ढहावहीं॥बानर निसाचर निकर मर्दहिं राम बल दर्पित भए।संग्राम अंगन सुभट सोवहिं राम सर निकरन्हि हए॥

करोड़ों कटे सिर 'जय-जय' पुकार रहे हैं और सिर-रहित धड़ प्रचंड वेगसे दौड़ रहे हैं। पक्षी खोपड़ियोंमें उलझकर आपसमें लड़-मरते हैं और श्रेष्ठ योद्धा एक-दूसरेको ढहा रहे हैं। श्रीरामके बलसे उन्मत्त वानर राक्षस-सेनाको रौंद रहे हैं और उन्हींके बाणोंसे मारे गये योद्धा रणभूमिमें मानो सो रहे हैं।

दोहा

रावन हृदयँ बिचारा भा निसिचर संघार।मैं अकेल कपि भालु बहु माया करौं अपार॥८८

रावणने मन-ही-मन सोचा—मेरी राक्षस-सेना तो नष्ट हो गयी; मैं अकेला हूँ और वानर-भालू अनगिनत, इसलिये अब मैं भारी माया रचूँगा।

देवन्ह प्रभुहि पयादें देखा। उपजा उर अति छोभ बिसेषा॥सुरपति निज रथ तुरत पठावा। हरष सहित मातलि लै आवा॥

प्रभुको पैदल युद्ध करते देख देवताओंके हृदयमें बड़ा क्षोभ हुआ। इंद्रने तुरंत अपना रथ भेजा, जिसे सारथि मातलि हर्षपूर्वक ले आया।

तेज पुंज रथ दिब्य अनूपा। हरषि चढ़े कोसलपुर भूपा॥चंचल तुरग मनोहर चारी। अजर अमर मन सम गतिकारी॥

उस दिव्य, अनुपम और तेजोमय रथपर कोसलपति श्रीराम प्रसन्न होकर सवार हुए। रथमें चार चंचल, मनोहर, अजर-अमर और मनकी गतिके समान वेगवान घोड़े जुते थे।

रथारूढ़ रघुनाथहि देखी। धाए कपि बलु पाइ बिसेषी॥सही न जाइ कपिन्ह के मारी। तब रावन माया बिस्तारी॥

श्रीरामको रथपर आरूढ़ देख वानर विशेष बल पाकर दौड़ पड़े। उनकी मार सही न जाने पर रावणने तब माया फैलायी।

सो माया रघुबीरहि बाँची। लछिमन कपिन्ह सो मानी साँची॥देखी कपिन्ह निसाचर अनी। अनुज सहित बहु कोसलधनी॥

वह माया अकेले श्रीरामपर न चली, पर लक्ष्मणजी और वानरोंने उसे सच मान लिया—उन्हें राक्षस-सेनामें लक्ष्मणसहित अनेक रामोंके रूप दिखने लगे।

छंद

बहु राम लछिमन देखि मर्कट भालु मन अति अपडरे।जनु चित्र लिखित समेत लछिमन जहँ सो तहँ चितवहिं खरे॥निज सेन चकित बिलोकि हँसि सर चाप सजि कोसल धनी।माया हरी हरि निमिष महुँ हरषी सकल मर्कट अनी॥

अनेक राम-लक्ष्मण देखकर वानर-भालू भ्रमवश डर गये और चित्रलिखितसे जहाँ-के-तहाँ ठिठककर देखते रह गये। अपनी सेनाको यों चकित देख कोसलपति हँसे और धनुष-बाण उठाकर पल भरमें सारी माया हर ली, जिससे वानर-सेना फिर हर्षसे भर उठी।

दोहा

बहुरि राम सब तन चितइ बोले बचन गँभीर।द्वंदजुद्ध देखहु सकल श्रमित भए अति बीर॥८९

फिर श्रीरामने सबकी ओर देखकर गंभीर वाणीमें कहा—हे वीरो! तुम सब बहुत थक गये हो, अब यह द्वंद्वयुद्ध देखो।

अस कहि रथ रघुनाथ चलावा। बिप्र चरन पंकज सिरु नावा॥तब लंकेस क्रोध उर छावा। गर्जत तर्जत सन्मुख धावा॥

यों कहकर श्रीरामने ब्राह्मणोंके चरणकमलोंमें मस्तक नवाया और रथ आगे बढ़ाया। यह देख रावणके हृदयमें क्रोध उमड़ आया और वह गरजता-ललकारता हुआ सामने दौड़ पड़ा।

जीतेहु जे भट संजुग माहीं। सुनु तापस मैं तिन्ह सम नाहीं॥रावन नाम जगत जस जाना। लोकप जाकें बंदीखाना॥

रावण बोला—अरे तपस्वी! तूने जिन योद्धाओंको जीता है, मैं उनके समान नहीं। मेरा नाम रावण है, जिसका यश सारा संसार जानता है और जिसके बंदीगृहमें लोकपाल तक बंद हैं।

खर दूषन बिराध तुम्ह मारा। बधेहु ब्याध इव बालि बिचारा॥निसिचर निकर सुभट संघारेहु। कुंभकरन घननादहि मारेहु॥

तूने खर, दूषण और विराधको मारा, बेचारे बालिको व्याधकी तरह छिपकर वध किया, बड़े-बड़े राक्षस योद्धाओंका संहार किया और कुम्भकर्ण-मेघनादको भी मार डाला।

आजु बयरु सबु लेउँ निबाही। जौं रन भूप भाजि नहिं जाहीं॥आजु करउँ खलु काल हवाले। परेहु कठिन रावन के पाले॥

पर आज अगर तू युद्धसे भागा नहीं तो मैं सारा वैर चुका दूँगा। आज तुझे निश्चय ही काल के हवाले करूँगा, याद रख तू कठोर रावणके पाले पड़ा है।

सुनि दुर्बचन कालबस जाना। बिहँसि बचन कह कृपानिधाना॥सत्य सत्य सब तव प्रभुताई। जल्पसि जनि देखाउ मनुसाई॥

रावणके ये दुर्वचन सुनकर और उसे काल-ग्रस्त जानकर कृपानिधान श्रीरामने हँसकर कहा—तेरी सारी प्रभुता सच है, जैसा तू कहता है, पर व्यर्थ बकवास छोड़, अपना पौरुष दिखा।

छंद

जनि जल्पना करि सुजसु नासहि नीति सुनहि करहि छमा।संसार महँ पूरुष त्रिबिध पाटल रसाल पनस समा॥एक सुमनप्रद एक सुमन फल एक फलइ केवल लागहीं।एक कहहिं कहहिं करहिं अपर एक करहिं कहत न बागहीं॥

व्यर्थकी डींग हाँककर अपना सुयश मत नष्ट कर; क्षमा करना, पर मैं तुझे एक नीतिकी बात बताता हूँ। संसारमें तीन प्रकारके पुरुष होते हैं—पाटल, आम और कटहलके वृक्षकी भाँति। एक केवल फूल देता है, दूसरा फूल-फल दोनों देता है और तीसरेमें केवल फल ही लगते हैं। ऐसे ही मनुष्योंमें भी कोई केवल कहता है, कोई कहकर करता भी है, और कोई केवल करता है, कहता कुछ नहीं।

दोहा

राम बचन सुनि बिहँसा मोहि सिखावत ग्यान।बयरु करत नहिं तब डरे अब लागे प्रिय प्रान॥९०

यह सुनकर रावण खिलखिलाकर हँसा—मुझे ज्ञानकी बात सिखाता है! जब वैर ठाना था तब तो डरा नहीं, अब प्राण प्यारे लगने लगे क्या?

कहि दुर्बचन क्रुद्ध दसकंधर। कुलिस समान लाग छाँड़े सर॥नानाकार सिलीमुख धाए। दिसि अरु बिदिस गगन महि छाए॥

दुर्वचन कहकर क्रुद्ध रावणने वज्रके समान बाण छोड़े। नाना आकारके वे बाण दिशा-विदिशा, आकाश और पृथ्वी सब जगह छा गये।

पावक सर छाँड़ेउ रघुबीरा। छन महुँ जरे निसाचर तीरा॥छाड़िसि तीब्र सक्ति खिसिआई। बान संग प्रभु फेरि चलाई॥

श्रीरामने अग्निबाण छोड़ा, जिससे रावणके सारे बाण क्षणभरमें जलकर भस्म हो गये। तब खिसियाकर उसने तीव्र शक्ति चलायी, पर प्रभुने उसे भी बाणके साथ वापस लौटा दिया।

कोटिक चक्र त्रिसूल पबारै। बिनु प्रयास प्रभु काटि निवारै॥निफल होहिं रावन सर कैसें। खल के सकल मनोरथ जैसें॥

वह करोड़ों चक्र और त्रिशूल फेंकता है, पर प्रभु उन्हें बिना किसी परिश्रमके काटकर हटा देते हैं। रावणके बाण वैसे ही निष्फल होते हैं जैसे दुष्टके सारे मनोरथ निष्फल होते हैं।

तब सत बान सारथी मारेसि। परेउ भूमि जय राम पुकारेसि॥राम कृपा करि सूत उठावा। तब प्रभु परम क्रोध कहुँ पावा॥

तब उसने श्रीरामके सारथिको सौ बाण मारे, जो 'राम' की जय पुकारते हुए भूमिपर गिर पड़ा। श्रीरामने कृपा करके उसे उठाया, और तब प्रभुको अत्यंत क्रोध चढ़ आया।

छंद

भए क्रुद्ध जुद्ध बिरुद्ध रघुपति त्रोन सायक कसमसे।कोदंड धुनि अति चंड सुनि मनुजाद सब मारुत ग्रसे॥मंदोदरी उर कंप कंपति कमठ भू भूधर त्रसे।चिक्करहिं दिग्गज दसन गहि महि देखि कौतुक सुर हँसे॥

युद्धमें शत्रुके विरुद्ध क्रुद्ध हुए श्रीरामके तरकसमें बाण कसमसाने लगे। उनके धनुषकी प्रचंड टंकार सुनकर सब मनुष्यभक्षी राक्षस भयसे व्याकुल हो उठे। मंदोदरीका हृदय काँप उठा, समुद्र-कच्छप-पृथ्वी-पर्वत तक डर गये, दिशाओंके गज दाँतोंसे धरती पकड़कर चिग्घाड़ने लगे—यह कौतुक देख देवता हँस पड़े।

दोहा

तानेउ चाप श्रवन लगि छाँड़े बिसिख कराल।राम मारगन गन चले लहलहात जनु ब्याल॥९१

धनुषको कानतक खींचकर श्रीरामने भयानक बाण छोड़े, जो सर्पोंकी भाँति लहराते हुए चल पड़े।

चले बान सपच्छ जनु उरगा। प्रथमहिं हतेउ सारथी तुरगा॥रथ बिभंजि हति केतु पताका। गर्जा अति अंतर बल थाका॥

बाण ऐसे चले मानो पंखवाले सर्प उड़ रहे हों; पहले ही वार में सारथि और घोड़े मारे गये। रथ चूर होकर ध्वजा-पताका गिर गयी, रावण जोरसे गरजा तो सही पर भीतर उसका बल थक चुका था।

तुरत आन रथ चढ़ि खिसिआना। अस्त्र सस्त्र छाँड़ेसि बिधि नाना॥बिफल होहिं सब उद्यम ताके। जिमि परद्रोह निरत मनसा के॥

तुरंत दूसरा रथ लेकर खिसियाया रावण नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र चलाने लगा, पर उसके सारे प्रयत्न वैसे ही निष्फल हो रहे हैं जैसे दूसरोंका अहित सोचनेवालेके होते हैं।

तब रावन दस सूल चलावा। बाजि चारि महि मारि गिरावा॥तुरग उठाइ कोपि रघुनायक। खैंचि सरासन छाँड़े सायक॥

तब रावणने दस त्रिशूल चलाकर श्रीरामके चारों घोड़ोंको धराशायी कर दिया। श्रीरामने क्रोधसे घोड़ोंको उठाकर धनुष खींचा और बाण छोड़े।

रावन सिर सरोज बनचारी। चलि रघुबीर सिलीमुख धारी॥दस दस बान भाल दस मारे। निसरि गए चले रुधिर पनारे॥

रावणके सिररूपी कमलवनमें विचरते श्रीरामके बाणरूपी भ्रमरोंकी पंक्ति चल पड़ी। उन्होंने उसके दसों सिरोंमें दस-दस बाण ऐसे मारे कि वे आर-पार निकल गये और सिरोंसे रक्तकी धाराएँ बह चलीं।

स्त्रवत रुधिर धायउ बलवाना। प्रभु पुनि कृत धनु सर संधाना॥तीस तीर रघुबीर पबारे। भुजन्हि समेत सीस महि पारे॥

लहूसे लथपथ बलवान रावण फिर भी दौड़ पड़ा। प्रभुने फिर धनुषपर बाण चढ़ाये और तीस बाणोंसे उसकी बीसों भुजाओंसहित दसों सिर काटकर पृथ्वीपर गिरा दिये।

काटतहीं पुनि भए नबीने। राम बहोरि भुजा सिर छीने॥प्रभु बहु बार बाहु सिर हए। कटत झटिति पुनि नूतन भए॥

पर कटते ही वे फिर नये उग आये। श्रीरामने फिर उन्हें काटा, और वे बार-बार काटे जाने पर भी उतनी ही जल्दी नये हो जाते।

पुनि पुनि प्रभु काटत भुज सीसा। अति कौतुकी कोसलाधीसा॥रहे छाइ नभ सिर अरु बाहू। मानहुँ अमित केतु अरु राहू॥

प्रभु बार-बार उसकी भुजाएँ और सिर काटते रहे, क्योंकि कोसलपति स्वभावसे ही बड़े लीला-प्रिय हैं। आकाश सिरों और भुजाओंसे यों भर गया मानो असंख्य केतु-राहु उमड़ आये हों।

छंद

जनु राहु केतु अनेक नभ पथ स्त्रवत सोनित धावहीं।रघुबीर तीर प्रचंड लागहिं भूमि गिरन न पावहीं॥एक एक सर सिर निकर छेदे नभ उड़त इमि सोहहीं।जनु कोपि दिनकर कर निकर जहँ तहँ बिधुंतुद पोहहीं॥

मानो अनेक राहु-केतु रक्त बहाते हुए आकाशमार्गमें दौड़ रहे हों—श्रीरामके प्रचंड बाणोंकी मारसे वे धरतीपर गिरने ही नहीं पाते। एक-एक बाणसे बिंधे सिरोंके समूह आकाशमें ऐसे उड़ते शोभा दे रहे हैं मानो क्रोधित सूर्यकी किरणें जहाँ-तहाँ राहुओंको बेध रही हों।

दोहा

जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर तिमि तिमि होहिं अपार।सेवत बिषय बिबर्ध जिमि नित नित नूतन मार॥९२

ज्यों-ज्यों प्रभु उसके सिर काटते हैं त्यों-त्यों वे और भी बढ़ते जाते हैं—ठीक वैसे ही जैसे विषय-भोगमें रत मनुष्यकी वासना भोगते-भोगते दिन-प्रतिदिन नयी-नयी बढ़ती जाती है।

दसमुख देखि सिरन्ह कै बाढ़ी। बिसरा मरन भई रिस गाढ़ी॥गर्जेउ मूढ़ महा अभिमानी। धायउ दसहु सरासन तानी॥

सिरोंकी यह अनंत बाढ़ देखकर रावण अपना मरण भूल गया और उसे और भी गहरा क्रोध चढ़ आया। वह महा अभिमानी मूर्ख गरजता हुआ दसों धनुष ताने दौड़ पड़ा।

समर भूमि दसकंधर कोप्यो। बरषि बान रघुपति रथ तोप्यो॥दंड एक रथ देखि न परेऊ। जनु निहार महुँ दिनकर दुरेऊ॥

रणभूमिमें क्रोधित रावणने बाणोंकी वर्षा करके श्रीरामके रथको ढक दिया—इतना कि एक घड़ीतक रथ दिखायी न दिया, मानो कुहासेमें सूर्य छिप गया हो।

हाहाकार सुरन्ह जब कीन्हा। तब प्रभु कोपि कारमुक लीन्हा॥सर निवारि रिपु के सिर काटे। ते दिसि बिदिस गगन महि पाटे॥

यह देख देवताओंने हाहाकार मचाया, तब प्रभुने क्रोधसे धनुष उठाया और शत्रुके बाणोंको काटते हुए उसके सिर काट डाले, जिनसे दिशा-विदिशा, आकाश-पृथ्वी सब पट गये।

काटे सिर नभ मारग धावहिं। जय जय धुनि करि भय उपजावहिं॥कहँ लछिमन सुग्रीव कपीसा। कहँ रघुबीर कोसलाधीसा॥

कटे हुए सिर आकाशमार्गमें दौड़ते हुए 'जय-जय' की ध्वनिसे भय फैलाने लगे और पुकारने लगे—लक्ष्मण, वानरराज सुग्रीव कहाँ हैं? कोसलपति रघुवीर कहाँ हैं?

छंद

कहँ रामु कहि सिर निकर धाए देखि मर्कट भजि चले।संधानि धनु रघुबंसमनि हँसि सरन्हि सिर बेधे भले॥सिर मालिका कर कालिका गहि बृंद बृंदन्हि बहु मिलीं।करि रुधिर सरि मज्जनु मनहुँ संग्राम बट पूजन चलीं॥

'राम कहाँ हैं' कहते हुए वे सिरोंके समूह दौड़े, पर वानरोंको भागते देखकर वापस दौड़ पड़े। रघुकुलमणि श्रीरामने धनुषपर बाण सन्धानकर हँसते हुए उन सिरोंको भलीभाँति बेध डाला। हाथोंमें मुंडमालाएँ लिये कालिकाएँ झुंड-की-झुंड जुट आयीं और रक्तकी नदीमें स्नान करके यों चल पड़ीं मानो संग्राम-रूपी वटवृक्षकी पूजा करने जा रही हों।

दोहा

पुनि दसकंठ क्रुद्ध होइ छाँड़ी सक्ति प्रचंड।चली बिभीषन सन्मुख मनहुँ काल कर दंड॥९३

फिर रावण क्रोधित होकर एक प्रचंड शक्ति छोड़ बैठा, जो विभीषणकी ओर मानो साक्षात कालका दंड बनकर चली।

आवत देखि सक्ति अति घोरा। प्रनतारति भंजन पन मोरा॥तुरत बिभीषन पाछें मेला। सन्मुख राम सहेउ सोइ सेला॥

उस अत्यंत भयानक शक्तिको आती देख और यह सोचकर कि शरणागतका दुःख हरना ही मेरा व्रत है, श्रीरामने तुरंत विभीषणको पीछे कर लिया और स्वयं सामने होकर वह शक्ति सह ली।

लागि सक्ति मुरुछा कछु भई। प्रभु कृत खेल सुरन्ह बिकलई॥देखि बिभीषन प्रभु श्रम पायो। गहि कर गदा क्रुद्ध होइ धायो॥

शक्ति लगते ही उन्हें कुछ मूर्च्छा-सी हो आयी—यह तो प्रभुकी लीला थी, पर देवता व्याकुल हो उठे। प्रभुको श्रम होते देख विभीषण हाथमें गदा लेकर क्रोधसे दौड़ पड़े।

रे कुभाग्य सठ मंद कुबुद्धे। तें सुर नर मुनि नाग बिरुद्धे॥सादर सिव कहुँ सीस चढ़ाए। एक एक के कोटिन्ह पाए॥

विभीषणने कहा—रे अभागे मूर्ख दुर्बुद्धि! तूने देवता, मनुष्य, मुनि, नाग—सबसे बैर मोल लिया। पर तूने शिवजीको आदरपूर्वक सिर चढ़ाया था, इसीलिये एक-एकके बदले करोड़ों वरदान पाये।

तेहि कारन खल अब लगि बाँच्यो। अब तव कालु सीस पर नाच्यो॥राम बिमुख सठ चहसि संपदा। अस कहि हनेसि माझ उर गदा॥

उसी पुण्यके बलपर अब तक बच रहा है, पर अब काल तेरे सिरपर नाच रहा है। रामसे विमुख होकर भी वैभव चाहता है क्या!—यों कहकर विभीषणने उसकी छातीके ठीक बीचमें गदा दे मारी।

छंद

उर माझ गदा प्रहार घोर कठोर लागत महि पर्यो।दस बदन सोनित स्त्रवत पुनि संभारि धायो रिस भर्तो॥द्वौ भिरे अतिबल मल्लजुद्ध बिरुद्ध एकु एकहि हनै।रघुबीर बल दर्पित बिभीषनु घालि नहिं ता कहुँ गनै॥

छातीके बीचमें गदाकी घोर, कठोर चोट लगते ही रावण धरतीपर गिर पड़ा। उसके दसों मुखोंसे रक्त बहने लगा, पर वह फिर सँभलकर क्रोधमें भरा हुआ उठ दौड़ा। दोनों महाबली मल्लयुद्धमें भिड़ गये और एक-दूसरेपर वार करने लगे—श्रीरामके बलसे गर्वित विभीषण तो उसे तिनकेके बराबर भी नहीं गिनते थे।

दोहा

उमा बिभीषनु रावनहि सन्मुख चितव कि काउ।सो अब भिरत काल ज्यों श्रीरघुबीर प्रभाउ॥९४

शिवजी कहते हैं—हे उमा! विभीषण कभी रावणकी आँखमें आँख डालकर भी नहीं देख पाता था, पर आज वही उससे काल-सा भिड़ रहा है—यह सब श्रीरामके ही प्रताप का प्रभाव है।

देखा श्रमित बिभीषनु भारी। धायउ हनूमान गिरि धारी॥रथ तुरंग सारथी निपाता। हृदय माझ तेहि मारेसि लाता॥

विभीषणको बुरी तरह थका देख हनुमानजी एक पर्वत उठाये दौड़ पड़े। उन्होंने उसी पर्वतसे रावणके रथ, घोड़े और सारथिको ढेर कर दिया और उसकी छातीमें लात जमायी।

ठाढ़ रहा अति कंपित गाता। गयउ बिभीषनु जहँ जनत्राता॥पुनि रावन कपि हतेउ पचारी। चलेउ गगन कपि पूँछ पसारी॥

रावण काँपता हुआ खड़ा रह गया, और विभीषण जाकर उस स्वामीके पास पहुँचे जो सेवकोंके रक्षक हैं। फिर रावणने ललकारकर हनुमानजीपर वार किया, पर वे पूँछ फैलाकर आकाशमें उड़ गये।

गहिसि पूँछ कपि सहित उड़ाना। पुनि फिरि भिरेउ प्रबल हनुमाना॥लरत अकास जुगल सम जोधा। एकहि एकु हनत करि क्रोधा॥

रावणने उनकी पूँछ पकड़ ली और हनुमानजी उसे लिये हुए ऊपर उड़ते चले गये। फिर लौटकर महाबली हनुमान उससे भिड़ गये, और दोनों समान बलके योद्धा आकाशमें क्रोधपूर्वक एक-दूसरेको मारने लगे।

सोहहिं नभ छल बल बहु करहीं। कज्जल गिरि सुमेरु जनु लरहीं॥बुधि बल निसिचर परइ न पारयो। तब मारुतसुत प्रभु संभार्यो॥

दोनों नाना छल-बल दिखाते हुए आकाशमें ऐसे शोभित हो रहे हैं मानो अंजनगिरि और सुमेरु पर्वत आपसमें लड़ रहे हों। जब बुद्धि-बलसे भी रावण पराजित न हो सका, तब हनुमानजीने अपने प्रभुका स्मरण किया।

छंद

संभारि श्रीरघुबीर धीर पचारि कपि रावनु हन्यो।महि परत पुनि उठि लरत देवन्ह जुगल कहुँ जय जय भन्यो॥हनुमंत संकट देखि मर्कट भालु क्रोधातुर चले।रन मत्त रावन सकल सुभट प्रचंड भुज बल दलमले॥

श्रीरामका स्मरण करते ही धीर हनुमानजीने ललकारकर रावणपर प्रहार किया। दोनों धरतीपर गिरते और फिर उठकर लड़ते रहे—देवताओंने दोनोंकी 'जय-जय' पुकारी। हनुमानजीपर संकट देख वानर-भालू क्रोधसे भरकर दौड़ पड़े, पर रणमद-मत्त रावणने उन सब योद्धाओंको अपनी प्रचंड भुजाओंसे रौंद डाला।

दोहा

तब रघुबीर पचारे धाए कीस प्रचंड।कपि बल प्रबल देखि तेहिं कीन्ह प्रगट पाषंड॥९५

तब श्रीरामके ललकारनेपर प्रचंड वानर-वीर दौड़ पड़े। उनके प्रबल बलको देखकर रावणने फिर एक माया रच डाली।

अंतरधान भयउ छन एका। पुनि प्रगटे खल रूप अनेका॥रघुपति कटक भालु कपि जेते। जहँ तहँ प्रगट दसानन तेते॥

वह क्षणभरमें अदृश्य हो गया और फिर अनेक रूपोंमें प्रकट हो उठा। श्रीरामकी सेनामें जितने भालू-वानर थे, चारों ओर उतने ही रावण दीखने लगे।

देखे कपिन्ह अमित दससीसा। जहँ तहँ भजे भालु अरु कीसा॥भागे बानर धरहिं न धीरा। त्राहि त्राहि लछिमन रघुबीरा॥

असंख्य रावणोंको देखकर भालू-वानर जहाँ-तहाँ भाग खड़े हुए। वानरोंका धीरज टूट गया और वे 'हे लक्ष्मण! हे रघुवीर! बचाओ, बचाओ!' पुकारते हुए भागने लगे।

दहँ दिसि धावहिं कोटिन्ह रावन। गर्जहिं घोर कठोर भयावन॥डरे सकल सुर चले पराई। जय के आस तजहु अब भाई॥

दसों दिशाओंमें करोड़ों रावण दौड़ते और घोर, कर्कश गर्जन करते हैं। यह देख सब देवता डर गये और भागते हुए कहने लगे—हे भाई! अब जीतकी आशा छोड़ दो।

सब सुर जिते एक दसकंधर। अब बहु भए तकहु गिरि कंदर॥रहे बिरंचि संभु मुनि ग्यानी। जिन्ह जिन्ह प्रभु महिमा कछु जानी॥

एक ही रावणने सब देवताओंको जीत लिया था, अब तो अनगिनत हो गये हैं—अब तो पहाड़ोंकी गुफाओंमें ही छिप जाओ। वहाँ केवल ब्रह्मा, शिव और वे ज्ञानी मुनि ही डटे रहे, जिन्होंने प्रभुकी महिमाको कुछ पहचाना था।

छंद

जाना प्रताप ते रहे निर्भय कपिन्ह रिपु माने फुरे।चले बिचलि मर्कट भालु सकल कृपाल पाहि भयातुरे॥हनुमंत अंगद नील नल अतिबल लरत रन बाँकुरे।मर्दहिं दसानन कोटि कोटिन्ह कपट भू भट अंकुरे॥

जो प्रभुका प्रताप जानते थे, वे निर्भय डटे रहे, पर वानरोंने इन अनेक रावणोंको सच मान लिया। इससे सब वानर-भालू विचलित होकर 'हे कृपालु! रक्षा करो' पुकारते हुए भयसे भाग चले। पर हनुमान, अंगद, नील और नल-जैसे प्रबल रणबाँकुरे डटे रहे और कपटसे उपजे इन करोड़ों मायावी योद्धाओंको रौंदते रहे।

दोहा

सुर बानर देखे बिकल हँस्यो कोसलाधीस।सजि सारंग एक सर हते सकल दससीस॥९६

देवताओं और वानरोंको यों व्याकुल देख कोसलपति श्रीराम मुसकराये और शार्ङ्ग धनुषपर एक ही बाण चढ़ाकर सारे मायावी रावणोंको मार गिराया।

प्रभु छन महुँ माया सब काटी। जिमि रबि उएँ जाहिं तम फाटी॥रावनु एकु देखि सुर हरषे। फिरे सुमन बहु प्रभु पर बरषे॥

प्रभुने क्षणभरमें सारी माया काट डाली, जैसे सूर्यके उदय होते ही अंधकार छिन्न-भिन्न हो जाता है। एक ही रावणको सामने देख देवता हर्षित हो उठे और लौटकर प्रभुपर फूलोंकी वर्षा करने लगे।

भुज उठाइ रघुपति कपि फेरे। फिरे एक एकन्ह तब टेरे॥प्रभु बलु पाइ भालु कपि धाए। तरल तमकि संजुग महि आए॥

श्रीरामने भुजा उठाकर भागे हुए वानरोंको वापस बुलाया। वे एक-दूसरेको पुकारते हुए लौट आये और प्रभुका बल पाकर उछलते-कूदते फिर रणभूमिमें आ डटे।

अस्तुति करत देवतन्हि देखें। भयऊँ एक मैं इन्ह के लेखें॥सठहु सदा तुम्ह मोर मरायल। अस कहि कोपि गगन पर धायल॥

देवताओंको प्रभुकी स्तुति करते देख रावणने सोचा—इन्होंने मुझे अब एक ही समझ लिया है। उसने कहा—अरे मूर्खो! तुम तो सदाके लिये मेरी मार खानेवाले ही हो, यों कहकर वह क्रोधसे आकाशकी ओर दौड़ पड़ा।

हाहाकार करत सुर भागे। खलहु जाहु कहँ मोरें आगे॥देखि बिकल सुर अंगद धायो। कूदि चरन गहि भूमि गिरायो॥

देवता हाहाकार करते हुए भाग खड़े हुए, रावण बोला—अरे दुष्टो! मेरे आगेसे कहाँ भागोगे! देवताओंको यों व्याकुल देख अंगद दौड़े और उछलकर रावणका पैर पकड़ उसे धरतीपर पटक दिया।

छंद

गहि भूमि पार्यो लात मार्यो बालिसुत प्रभु पहिं गयो।संभारि उठि दसकंठ घोर कठोर रव गर्जत भयो॥करि दाप चाप चढ़ाइ दस संधानि सर बहु बरषई।किए सकल भट घायल भयाकुल देखि निज बल हरषई॥

अंगदने उसे पकड़कर धरतीपर पटका, लात मारी और फिर प्रभुके पास लौट गये। रावण सँभलकर उठा और अत्यंत भयंकर, कर्कश स्वरमें गरजने लगा। दर्पसे भरकर उसने दसों धनुष चढ़ाकर उनपर बाणोंकी झड़ी लगा दी, जिससे सब योद्धा घायल और भयभीत हो गये—अपना बल देखकर वह हर्षित होने लगा।

दोहा

तब रघुपति रावन के सीस भुजा सर चाप।काटे बहुत बढ़े पुनि जिमि तीरथ कर पाप॥९७

तब श्रीरामने रावणके सिर, भुजाएँ, बाण और धनुष काट डाले, पर वे फिर उसी तरह बहुगुने होकर बढ़ गये जैसे तीर्थमें किया पाप उलटे और बढ़ जाता है।

सिर भुज बाढ़ि देखि रिपु केरी। भालु कपिन्ह रिस भई घनेरी॥मरत न मूढ़ कटेउ भुज सीसा। धाए कोपि भालु भट कीसा॥

शत्रुके सिर-भुजाओंकी यह बाढ़ देख रीछ-वानरोंको बड़ा क्रोध आया—यह मूर्ख भुजा-सिर कटनेपर भी मरता ही नहीं, यह सोचकर भालू-वानर योद्धा क्रोधसे भरकर दौड़ पड़े।

बालितनय मारुति नल नीला। बानरराज दुबिद बलसीला॥बिटप महीधर करहिं प्रहारा। सोइ गिरि तरु गहि कपिन्ह सो मारा॥

अंगद, हनुमान, नल, नील, सुग्रीव और द्विविद-जैसे बलशाली वीर वृक्ष-पर्वतोंसे उसपर प्रहार करते हैं, और वह उन्हीं वृक्ष-पर्वतोंको छीनकर वानरोंको मारने लगता है।

एक नखन्हि रिपु बपुष बिदारी। भागि चलहिं एक लातन्ह मारी॥तब नल नील सिरन्हि चढ़ि गयऊ। नखन्हि लिलार बिदारत भयऊ॥

कोई वानर नखोंसे उसका शरीर चीरकर भाग जाता है, तो कोई लातें मारकर। नल और नील तो उसके सिरोंपर ही चढ़ बैठे और नखोंसे उसका ललाट फाड़ने लगे।

रुधिर देखि बिषाद उर भारी। तिन्हहि धरन कहुँ भुजा पसारी॥गहे न जाहिं करन्हि पर फिरहीं। जनु जुग मधुप कमल बन चरहीं॥

खून बहता देख उसे बड़ा दुःख हुआ, उसने उन्हें पकड़नेको हाथ फैलाये, पर वे पकड़में ही नहीं आते, हाथोंपर ही मँडराते रहते हैं मानो दो भौंरे कमल-वनमें विचर रहे हों।

कोपि कूदि द्वौ धरेसि बहोरी। महि पटकत भजे भुजा मरोरी॥पुनि सकोप दस धनु कर लीन्हे। सरन्हि मारि घायल कपि कीन्हे॥

क्रोधित होकर उछलकर उसने दोनोंको पकड़ लिया, पर पटकते-पटकते वे उसकी भुजा मरोड़कर भाग निकले। तब उसने क्रोधसे दसों धनुष उठाये और बाणोंसे वानरोंको घायल कर डाला।

हनुमदादि मुरुछित करि बंदर। पाइ प्रदोष हरष दसकंधर॥मुरुछित देखि सकल कपि बीरा। जामवंत धायउ रनधीरा॥

हनुमान आदि वानरोंको मूर्च्छित करके और सांझ ढलते देख रावण प्रसन्न हुआ। सब वानर-वीरोंको मूर्च्छित देख रणधीर जाम्बवान दौड़ पड़े।

संग भालु भूधर तरु धारी। मारन लगे पचारि पचारी॥भयउ क्रुद्ध रावन बलवाना। गहि पद महि पटकइ भट नाना॥

उनके साथ भालू भी वृक्ष-पर्वत उठाये ललकारते हुए रावणपर टूट पड़े। बलवान रावण क्रोधित होकर पैर पकड़-पकड़कर अनेक योद्धाओंको धरतीपर पटकने लगा।

देखि भालुपति निज दल घाता। कोपि माझ उर मारेसि लाता॥

अपनी सेनाकी यह दुर्दशा देख जाम्बवानने क्रोधित होकर रावणकी छातीके बीचोंबीच लात जमायी।

छंद

उर लात घात प्रचंड लागत बिकल रथ ते महि परा।गहि भालु बीसहुँ कर मनहुँ कमलन्हि बसे निसि मधुकरा॥मुरुछित बिलोकि बहोरि पद हति भालुपति प्रभु पहिं गयौ।निसि जानि स्यंदन घालि तेहि तब सूत जतनु करत भयो॥

छातीपर वह प्रचंड लात लगते ही रावण व्याकुल होकर रथसे धरतीपर गिर पड़ा। उसने बीसों हाथोंमें भालुओंको यों जकड़ रखा था मानो रातमें भौंरे कमलोंमें बसे हों। उसे मूर्छित देखकर एक लात और जमाकर जाम्बवान प्रभुके पास लौट गये। रात्रि होते देख सारथि रावणको रथमें डालकर होशमें लानेका उपाय करने लगा।

दोहा

मुरुछा बिगत भालु कपि सब आए प्रभु पास।निसिचर सकल रावनहि घेरि रहे अति त्रास९८

मूर्च्छा टूटनेपर सब रीछ-वानर प्रभुके पास लौट आये, उधर सब राक्षस भयसे थर्राते हुए रावणको घेरे खड़े रहे।

तेही निसि सीता पहिं जाई। त्रिजटा कहि सब कथा सुनाई॥सिर भुज बाढ़ि सुनत रिपु केरी। सीता उर भइ त्रास घनेरी॥

उसी रात त्रिजटाने सीताजीके पास जाकर सारी बात कह सुनायी। शत्रुके सिर-भुजाओंकी बढ़तीकी बात सुनते ही सीताजीके हृदयमें बड़ा भय समा गया।

मुख मलीन उपजी मन चिंता। त्रिजटा सन बोली तब सीता॥होइहि कहा कहसि किन माता। केहि बिधि मरिहि बिस्व दुखदाता॥

उनका मुख उदास हो गया, मनमें चिंता उठी। सीताजीने त्रिजटासे कहा—हे माता! बताती क्यों नहीं, क्या होगा? यह विश्वको दुःख देनेवाला किस तरह मरेगा?

रघुपति सर सिर कटेहुँ न मरई। बिधि बिपरीत चरित सब करई॥मोर अभाग्य जिआवत ओही। जेहिं हौ हरि पद कमल बिछोही॥

श्रीरामके बाणोंसे सिर कटनेपर भी यह मरता नहीं, विधाता तो सब उलटा ही कर रहा है। सचमुच मेरा ही दुर्भाग्य इसे जिला रहा है, जिसने मुझे प्रभुके चरणोंसे बिछोड़ा है।

जेहिं कृत कपट कनक मृग झूठा। अजहुँ सो देव मोहि पर रूठा॥जेहिं बिधि मोहि दुख दुसह सहाए। लछिमन कहुँ कटु बचन कहाए॥

जिसने कपटसे स्वर्णमृगका झूठा रूप रचा था, वही दैव अब भी मुझपर रूठा है। जिस विधाताने मुझे यह असह्य दुःख सहवाया और लक्ष्मणको कटु वचन कहलवाये,

रघुपति बिरह सबिष सर भारी। तकि तकि मार बार बहु मारी॥ऐसेहुँ दुख जो राख मम प्राना। सोइ बिधि ताहि जिआव न आना॥

और जो श्रीरामके विरहरूपी विषैले बाणोंसे बार-बार बींध रहा है, फिर भी जो मेरे प्राणोंको बचाये रखता है—वही विधाता उसे भी जिला रहा है, कोई और नहीं।

बहु बिधि कर बिलाप जानकी। करि करि सुरति कृपानिधान की॥कह त्रिजटा सुनु राजकुमारी। उर सर लागत मरइ सुरारी॥

कृपानिधान श्रीरामका बार-बार स्मरण करते हुए जानकीजी बहुत प्रकारसे विलाप करने लगीं। त्रिजटाने कहा—हे राजकुमारी! सुनो, हृदयमें बाण लगते ही यह देवशत्रु रावण मर जायगा।

प्रभु ताते उर हतइ न तेही। एहि के हृदयँ बसति बैदेही॥

पर प्रभु उसके हृदयमें बाण इसलिये नहीं मारते, क्योंकि उसीके हृदयमें आप जानकी बसती हैं।

छंद

एहि के हृदयँ बस जानकी जानकी उर मम बास है।मम उदर भुअन अनेक लागत बान सब कर नास है॥सुनि बचन हरष बिषाद मन अति देखि पुनि त्रिजटाँ कहा।अब मरिहि रिपु एहि बिधि सुनहि सुंदरि तजहि संसय महा॥

इसके हृदयमें जानकी बसती है, जानकीके हृदयमें मेरा वास है और मेरे उदरमें अनेकों भुवन हैं—सो हृदयमें बाण लगते ही सब भुवनोंका नाश हो जायगा। यह सुनकर सीताजीके मनमें हर्ष और विषाद दोनों उमड़ आये, यह देखकर त्रिजटाने फिर कहा—हे सुंदरी! अपना यह बड़ा संशय त्याग दो, अब सुनो, शत्रु इस तरह मरेगा—

दोहा

काटत सिर होइहि बिकल छुटि जाइहि तव ध्यान।तब रावनहि हृदय महुँ मरिहहिं रामु सुजान९९

सिर बार-बार कटनेसे जब वह व्याकुल हो उठेगा और उसके हृदयसे तुम्हारा ध्यान छूट जायगा, तभी सुजान श्रीराम उसके हृदयमें बाण मारेंगे।

अस कहि बहुत भाँति समुझाई। पुनि त्रिजटा निज भवन सिधाई॥राम सुभाउ सुमिरि बैदेही। उपजी बिरह बिथा अति तेही॥

यों कहकर और सीताजीको भाँति-भाँतिसे समझाकर त्रिजटा अपने घर चली गयी। श्रीरामके स्वभावका स्मरण करते ही जानकीजीको फिर गहरी विरह-व्यथा उठ आयी।

निसिहि ससिहि निंदति बहु भाँती। जुग सम भई सिराति न राती॥करति बिलाप मनहिं मन भारी। राम बिरहँ जानकी दुखारी॥

वे रात और चंद्रमाकी बार-बार निंदा करती हैं—रात युगके समान लंबी हो गयी, बीतती ही नहीं। श्रीरामके विरहमें दुःखी जानकी मन-ही-मन भारी विलाप कर रही हैं।

जब अति भयउ बिरह उर दाहू। फरकेउ बाम नयन अरु बाहू॥सगुन बिचारि धरी मन धीरा। अब मिलिहहिं कृपाल रघुबीरा॥

जब विरहका दाह हृदयमें असह्य हो उठा, तब उनका बायाँ नेत्र और बाहु फड़क उठे। शुभ शकुन समझकर उन्होंने धैर्य धरा—अब कृपालु रघुवीर अवश्य मिलेंगे।

इहाँ अर्धनिसि रावनु जागा। निज सारथि सन खीझन लागा॥सठ रनभूमि छड़ाइसि मोही। धिग धिग अधम मंदमति तोही॥

इधर आधी रातको रावण जागा और अपने सारथिपर बिगड़ने लगा—रे मूर्ख! तूने मुझे रणभूमिसे हटा दिया, धिक्कार है तुझ अधम, मंदबुद्धिको!

तेहिं पद गहि बहु बिधि समुझावा। भौरु भएँ रथ चढ़ि पुनि धावा॥सुनि आगवनु दसानन केरा। कपि दल खरभर भयउ घनेरा॥

सारथिने चरण पकड़कर उसे बहुत समझाया-बुझाया। सबेरा होते ही रावण फिर रथपर चढ़कर दौड़ पड़ा। उसका आना सुनते ही वानर-सेनामें बड़ी खलबली मच गयी।

जहँ तहँ भूधर बिटप उपारी। धाए कटकटाइ भट भारी॥

वे बड़े-बड़े योद्धा जहाँ-तहाँसे पर्वत-वृक्ष उखाड़कर दाँत पीसते हुए दौड़ पड़े।

छंद

धाए जो मर्कट बिकट भालु कराल कर भूधर धरा।अति कोप करहिं प्रहार मारत भजि चले रजनीचरा॥बिचलाइ दल बलवंत कीसन्ह घेरि पुनि रावनु लियो।चहुँ दिसि चपेटन्हि मारि नखन्हि बिदारि तनु ब्याकुल कियो॥

विकराल वानर-भालू हाथोंमें पर्वत लिये दौड़े और भारी क्रोधसे प्रहार करने लगे, जिससे राक्षस भाग खड़े हुए। बलवान वानरोंने राक्षस-सेनाको तितर-बितर करके फिर रावणको घेर लिया और चारों ओरसे चपत मार-मारकर तथा नखोंसे उसका शरीर नोंचकर उसे व्याकुल कर दिया।

दोहा

देखि महा मर्कट प्रबल रावन कीन्ह बिचार।अंतरहित होइ निमिष महुँ कृत माया बिस्तार॥१००

वानरोंको इतना प्रबल देखकर रावणने विचार किया और क्षणभरमें अदृश्य होकर उसने फिर माया फैला दी।

छंद

जब कीन्ह तेहिं पाषंड। भए प्रगट जंतु प्रचंड॥बेताल भूत पिसाच। कर धरें धनु नाराच॥

जब उसने वह पाखंड रचा, तब भयानक जीव प्रकट हो उठे—बेताल, भूत और पिशाच हाथोंमें धनुष-बाण लिये प्रकट हुए।

छंद

जोगिनि गहें करबाल। एक हाथ मनुज कपाल॥करि सद्य सोनित पान। नाचहिं करहिं बहु गान॥

योगिनियाँ एक हाथमें तलवार और दूसरेमें मनुष्यकी खोपड़ी लिये ताजा खून पीकर नाचने और तरह-तरहके गीत गाने लगीं।

छंद

धरु मारु बोलहिं घोर। रहि पूरि धुनि चहुँ ओर॥मुख बाइ धावहिं खान। तब लगे कीस परान॥

वे 'पकड़ो, मारो' का घोर शब्द बोलती हैं, जो चारों ओर गूँज उठा। वे मुँह फैलाकर खानेको दौड़ती हैं, तब वानरोंके प्राण सूखने लगे।

छंद

जहँ जाहिं मर्कट भागि। तहँ बरत देखहिं आगि॥भए बिकल बानर भालु। पुनि लाग बरषै बालु॥

वानर भागकर जहाँ भी जाते, वहीं आग जलती देखते। वानर-भालू व्याकुल हो उठे, फिर रावण उनपर बालू बरसाने लगा।

छंद

जहँ तहँ थकित करि कीस। गर्जेउ बहुरि दससीस॥लछिमन कपीस समेत। भए सकल बीर अचेत॥

वानरोंको जहाँ-तहाँ थकाकर रावण फिर गरजा—लक्ष्मण और सुग्रीवसहित सब वीर मूर्च्छित हो गये।

छंद

हा राम हा रघुनाथ। कहि सुभट मीजहिं हाथ॥एहि बिधि सकल बल तोरि। तेहिं कीन्ह कपट बहोरि॥

'हा राम! हा रघुनाथ!' पुकारते हुए योद्धा हाथ मलने लगे। इस तरह सबका बल तोड़कर रावणने फिर एक और माया रच डाली।

छंद

प्रगटेसि बिपुल हनुमान। धाए गहे पाषान॥तिन्ह रामु घेरे जाइ। चहुँ दिसि बरूथ बनाइ॥

उसने अनेकों हनुमान प्रकट कर दिये, जो पत्थर लिये दौड़े और चारों ओरसे घेरा बनाकर श्रीरामको जा घेरा।

छंद

मारहु धरहु जनि जाइ। कटकटहिं पूँछ उठाइ॥दहँ दिसि लँगूर बिराज। तेहिं मध्य कोसलराज॥

पूँछ उठाये कटकटाते हुए वे पुकारने लगे—'मारो, पकड़ो, जाने न पाये'; दसों दिशाओंमें उनकी पूँछें शोभा दे रही हैं और उनके बीचोंबीच कोसलराज श्रीराम खड़े हैं।

छंद

तेहिं मध्य कोसलराज सुंदर स्याम तन सोभा लही।जनु इंद्रधनुष अनेक की बर बारि तुंग तमालही॥प्रभु देखि हरष बिषाद उर सुर बदत जय जय जय करी।रघुबीर एकहि तीर कोपि निमेष महुँ माया हरी॥

उन सबके बीच कोसलराजका सुंदर श्याम शरीर ऐसे शोभित है मानो ऊँचे तमाल-वृक्षके चारों ओर अनेक इंद्रधनुषोंकी सुंदर बाड़ बनी हो। प्रभुको देख देवता हर्ष-विषादमिश्रित हृदयसे 'जय, जय, जय' पुकारने लगे, तभी श्रीरामने क्रोध करके एक ही बाणसे पल भरमें सारी माया हर ली।

छंद

माया बिगत कपि भालु हरषे बिटप गिरि गहि सब फिरे।सर निकर छाड़े राम रावन बाहु सिर पुनि महि गिरे॥श्रीराम रावन समर चरित अनेक कल्प जो गावहीं।सत सेष सारद निगम कबि तेउ तदपि पार न पावहीं॥

माया दूर होते ही वानर-भालू हर्षित हो उठे और वृक्ष-पर्वत उठाकर सब लौट पड़े। श्रीरामने फिर बाणोंकी झड़ी लगायी, जिससे रावणकी भुजाएँ और सिर कट-कटकर धरतीपर गिरने लगे। श्रीराम-रावणके इस युद्धका वर्णन यदि सैकड़ों शेषनाग, सरस्वती, वेद और कवि भी अनेक कल्पोंतक गाते रहें, तो भी उसका पार नहीं पा सकते।

दोहा

ताके गुन गन कछु कहे जड़मति तुलसीदास।जिमि निज बल अनुरूप ते माछी उड़इ अकास॥१०१ क

उसी चरित्रके कुछ गुण मंदबुद्धि तुलसीदासने कहे हैं—ठीक वैसे ही जैसे मक्खी भी अपनी शक्तिभर आकाशमें उड़ान भरती है।

दोहा

काटे सिर भुज बार बहु मरत न भट लंकेस।प्रभु क्रीड़त सुर सिद्ध मुनि ब्याकुल देखि कलेस॥१०१ ख

सिर और भुजाएँ बार-बार काटी गयीं, फिर भी वीर रावण मरता नहीं। प्रभु तो यह लीला खेल रहे हैं, पर देवता, सिद्ध और मुनि उसकी यह पीड़ा देखकर व्याकुल हुए जा रहे हैं।

काटत बढ़हिं सीस समुदाई। जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई॥मरइ न रिपु श्रम भयउ बिसेषा। राम बिभीषन तन तब देखा॥

काटते ही सिरोंका समूह वैसे ही बढ़ जाता है जैसे हर लाभके साथ लोभ बढ़ता है। शत्रु मरता नहीं, थकान बहुत बढ़ गयी—तब श्रीरामने विभीषणकी ओर देखा।

उमा काल मर जाकीं ईछा। सो प्रभु जन कर प्रीति परीछा॥सुनु सरबग्य चराचर नायक। प्रनतपाल सुर मुनि सुखदायक॥

शिवजी कहते हैं—हे उमा! जिनकी इच्छामात्रसे काल भी मर जाता है, वे प्रभु ही अपने सेवककी प्रीतिकी परीक्षा ले रहे हैं। विभीषणने कहा—हे सर्वज्ञ! हे चराचरके स्वामी! हे शरणागतके रक्षक! हे देव-मुनियोंको सुख देनेवाले! सुनिये—

नाभिकुंड पियूष बस याकें। नाथ जिअत रावनु बल ताकें॥सुनत बिभीषन बचन कृपाला। हरषि गहे कर बान कराला॥

इसकी नाभिमें अमृतका कुंड है, हे नाथ! रावण उसी अमृतके बलपर जीवित है। विभीषणके ये वचन सुनते ही कृपालु श्रीराम हर्षित होकर हाथमें भयंकर बाण ले उठे।

असुभ होन लागे तब नाना। रोवहिं खर सृकाल बहु स्वाना॥बोलहिं खग जग आरति हेतू। प्रगट भए नभ जहँ तहँ केतू॥

उसी क्षण नाना अपशकुन होने लगे—गदहे, सियार और कुत्ते बहुत रोने लगे, पक्षी संसारके संकटकी सूचना देते हुए बोलने लगे और आकाशमें जहाँ-तहाँ पुच्छल तारे प्रकट हो उठे।

दस दिसि दाह होन अति लागा। भयउ परब बिनु रबि उपरागा॥मंदोदरि उर कंपति भारी। प्रतिमा स्त्रवहिं नयन मग बारी॥

दसों दिशाओंमें भारी दाह होने लगा, बिना किसी पर्वके ही सूर्यग्रहण हो गया। मंदोदरीका हृदय जोरसे काँप उठा और मूर्तियोंकी आँखोंसे आँसू बहने लगे।

छंद

प्रतिमा रुदहिं पबिपात नभ अति बात बह डोलति मही।बरषहिं बलाहक रुधिर कच रज असुभ अति सक को कही॥उतपात अमित बिलोकि नभ सुर बिकल बोलहि जय जय।सुर सभय जानि कृपाल रघुपति चाप सर जोरत भए॥

मूर्तियाँ रोने लगीं, आकाशसे वज्रपात होने लगा, प्रचंड आँधी चलने लगी और पृथ्वी काँप उठी। बादल रक्त, बाल और धूलकी वर्षा करने लगे—इतने अशुभ हुए कि कहते नहीं बनता। इतने भारी उत्पात देखकर आकाशमें व्याकुल देवता 'जय-जय' पुकार उठे। देवताओंको भयभीत जानकर कृपालु श्रीराम धनुषपर बाण चढ़ाने लगे।

दोहा

खैचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस।रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस॥१०२

कानोंतक धनुष खींचकर श्रीरामने इकतीस बाण छोड़े, जो ऐसे चले मानो साक्षात कालसर्प ही दौड़ रहे हों।

सायक एक नाभि सर सोषा। अपर लगे भुज सिर करि रोषा॥लै सिर बाहु चले नाराचा। सिर भुज हीन रुंड महि नाचा॥

एक बाणने नाभिके अमृतकुंडको सोख लिया, बाकी बाण क्रोधसे उसकी भुजाओं और सिरोंमें जा लगे। सिर और भुजाएँ बाणोंके साथ उड़ चलीं, और शेष रह गया सिर-भुजा-विहीन धड़, जो धरतीपर नाचने लगा।

धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब सर हति प्रभु कृत दुइ खंडा॥गर्जेउ मरत घोर रव भारी। कहाँ रामु रन हतौं पचारी॥

वह धड़ प्रचंड वेगसे दौड़ने लगा, जिससे धरती धँसने लगी—तभी श्रीरामने एक बाणसे उसके दो टुकड़े कर दिये। मरते-मरते रावण घोर गर्जनके साथ चिल्लाया—राम कहाँ हैं, मैं उन्हें ललकारकर युद्धमें मार डालूँ!

डोली भूमि गिरत दसकंधर। छुभित सिंधु सरि दिग्गज भूधर॥धरनि परेउ द्वौ खंड बढ़ाई। चापि भालु मर्कट समुदाई॥

रावणके गिरते ही धरती डोल उठी, समुद्र-नदियाँ, दिग्गज और पर्वत सब क्षुब्ध हो गये। धड़के दोनों टुकड़े फैलकर भालू-वानरोंकी भीड़को दबाते हुए धरतीपर आ गिरे।

मंदोदरि आगें भुज सीसा। धरि सर चले जहाँ जगदीसा॥प्रबिसे सब निषंग महु जाई। देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई॥

रावणके सिर और भुजाएँ मंदोदरीके सामने रखकर श्रीरामके बाण वापस उसी दिशामें चले जहाँ स्वयं जगदीश्वर खड़े थे। सब बाण जाकर तरकसमें समा गये, यह देखकर देवताओंने नगाड़े बजाये।

तासु तेज समान प्रभु आनन। हरषे देखि संभु चतुरानन॥जय जय धुनि पूरी ब्रह्मंडा। जय रघुबीर प्रबल भुजदंडा॥

रावणका सारा तेज प्रभुके मुखमें समा गया—यह देखकर शिव और ब्रह्मा हर्षित हुए। ब्रह्मांडभर 'जय-जय' की ध्वनिसे गूँज उठा—प्रबल भुजदंडोंवाले श्रीरघुवीरकी जय हो!

बरषहिं सुमन देव मुनि बृंदा। जय कृपाल जय जयति मुकुंदा॥

देवता और मुनियोंके समूह फूल बरसाते हुए बोल उठे—कृपालुकी जय हो, मुकुंदकी जय हो, जय हो!

छंद

जय कृपा कंद मुकंद द्वंद हरन सरन सुखप्रद प्रभो।खल दल बिदारन परम कारन कारुनीक सदा बिभो॥सुर सुमन बरषहिं हरष संकुल बाज दुंदुभि गहगही।संग्राम अंगन राम अंग अनंग बहु सोभा लही॥

हे कृपाके कंद, हे मुकुंद, हे द्वंद्वोंके हरनेवाले, शरणागतको सुख देनेवाले प्रभो! हे दुष्ट-दलके विनाशक, हे परम कारण, हे सदा करुणामय विभु! आपकी जय हो। देवता हर्षमें भरकर पुष्प बरसा रहे हैं, नगाड़े घमघमा रहे हैं, और रणभूमिमें श्रीरामके अंग अनेक कामदेवोंकी-सी शोभा पा रहे हैं।

छंद

सिर जटा मुकुट प्रसून बिच बिच अति मनोहर राजहीं।जनु नीलगिरि पर तड़ित पटल समेत उड़ुगन भ्राजहीं॥भुजदंड सर कोदंड फेरत रुधिर कन तन अति बने।जनु रायमुनीं तमाल पर बैठीं बिपुल सुख आपने॥

सिरपर जटाओंका मुकुट है, जिसके बीच-बीच अत्यंत मनोहर फूल शोभित हैं—मानो नीले पर्वतपर बिजलियोंसमेत तारे चमक रहे हों। भुजदंडोंसे धनुष-बाण फिराते हुए शरीरपर रक्तके कण ऐसे शोभा दे रहे हैं मानो तमालके वृक्षपर बहुत-सी ललमुनियाँ अपने सुखमें निश्चल बैठी हों।

दोहा

कृपादृष्टि करि बृष्टि प्रभु अभय किए सुर बृंद।भालु कीस सब हरषे जय सुख धाम मुकंद॥१०३

प्रभुने कृपादृष्टिकी वर्षा करके देवसमूहको निर्भय कर दिया। वानर-भालू सब हर्षित होकर 'सुखधाम मुकुंदकी जय हो' पुकारने लगे।

पति सिर देखत मंदोदरी। मुरुछित बिकल धरनि खसि परी॥जुबति बृंद रोवत उठि धाईं। तेहि उठाइ रावन पहिं आई॥

पतिका सिर देखते ही मंदोदरी व्याकुल होकर मूर्च्छित हो धरतीपर गिर पड़ी। स्त्रियाँ रोती हुई दौड़ीं और उसे उठाकर रावणके पास ले आयीं।

पति गति देखि ते करहिं पुकारा। छूटे कच नहिं बपुष सँभारा॥उर ताड़ना करहिं बिधि नाना। रोवत करहिं प्रताप बखाना॥

पतिकी यह दशा देखकर वे पुकार-पुकारकर रोने लगीं, बाल बिखर गये, देहकी सुधि न रही। वे छाती पीटती और रोते हुए रावणके प्रताप की महिमा गाती हैं।

तव बल नाथ डोल नित धरनी। तेज हीन पावक ससि तरनी॥सेष कमठ सहि सकहिं न भारा। सो तनु भूमि परेउ भरि छारा॥

तुम्हारे बलसे धरती सदा काँपती थी, अग्नि-चंद्र-सूर्य तक तुम्हारे आगे फीके पड़ जाते थे। शेषनाग और कच्छप तक जिस भारको न सह सकते थे, वही तुम्हारा शरीर आज धूलमें लथपथ पड़ा है!

बरुन कुबेर सुरेस समीरा। रन सन्मुख धरि काहुँ न धीरा॥भुजबल जितेहु काल जम साईं। आजु परेहु अनाथ की नाईं॥

वरुण, कुबेर, इंद्र और वायु—इनमें कोई भी रणमें तुम्हारे सामने टिक न सका। हे स्वामी! तुमने काल और यमराजको भी अपने भुजबलसे जीत लिया था, वही तुम आज अनाथकी भाँति पड़े हो।

जगत बिदित तुम्हारी प्रभुताई। सुत परिजन बल बरनि न जाई॥राम बिमुख अस हाल तुम्हारा। रहा न कोउ कुल रोवनिहारा॥

तुम्हारी प्रभुता जगत्भरमें विख्यात थी, पुत्रों-कुटुंबियोंके बलका वर्णन ही नहीं हो सकता। श्रीरामसे विमुख होनेके कारण ही तुम्हारी यह दशा हुई कि आज कुलमें कोई रोनेवाला भी नहीं बचा।

तव बस बिधि प्रपंच सब नाथा। सभय दिसिप नित नावहिं माथा॥अब तव सिर भुज जंबुक खाहीं। राम बिमुख यह अनुचित नाहीं॥

हे नाथ! विधाताकी सारी सृष्टि तुम्हारे वश में थी, लोकपाल भयभीत होकर सदा तुम्हें मस्तक नवाते थे। पर आज तुम्हारे सिर-भुजाओंको गीदड़ खा रहे हैं—रामविमुखके लिये यह अनुचित भी नहीं है।

काल बिबस पति कहा न माना। अग जग नाथु मनुज करि जाना॥

हे पति! काल के पूर्ण वशमें होनेके कारण तुमने किसीका कहा नहीं माना और चराचरके स्वामी परमात्माको साधारण मनुष्य समझ बैठे।

छंद

जान्यो मनुज करि दनुज कानन दहन पावक हरि स्वयं।जेहि नमत सिव ब्रह्मादि सुर पिय भजेहु नहिं करुनामयं॥आजन्म ते परद्रोह रत पापौघमय तव तनु अयं।तुम्हहू दियो निज धाम राम नमामि ब्रह्म निरामयं॥

दैत्यरूपी वनको भस्म करनेवाले साक्षात् अग्निस्वरूप हरिको तुमने मनुष्य समझा। शिव-ब्रह्मा जैसे देवता जिन्हें नमस्कार करते हैं, उन करुणामय प्रभुको, हे प्रियतम! तुमने कभी नहीं भजा। तुम्हारा यह शरीर जन्मसे ही परद्रोहमें रत और पापसे भरा रहा, फिर भी जिन निर्विकार ब्रह्म श्रीरामने तुम्हें अपना धाम दे दिया, उन्हें मैं नमस्कार करती हूँ।

दोहा

अहह नाथ रघुनाथ सम कृपासिंधु नहिं आन।जोगि बृंद दुर्लभ गति तोहि दीन्हि भगवान॥१०४

हाय नाथ! श्रीरघुनाथजीके समान करुणासागर दूसरा कोई नहीं, जिन भगवानने तुम्हें वह गति दी जो योगियोंको भी दुर्लभ है।

मंदोदरी बचन सुनि काना। सुर मुनि सिद्ध सबन्हि सुख माना॥अज महेस नारद सनकादी। जे मुनिबर परमारथबादी॥

मंदोदरीके ये वचन सुनकर देवता, मुनि और सिद्ध सभीको संतोष हुआ। ब्रह्मा, महादेव, नारद, सनकादि और अन्य जो भी परमार्थवादी श्रेष्ठ मुनि थे,

भरि लोचन रघुपतिहि निहारी। प्रेम मगन सब भए सुखारी॥रुदन करत देखीं सब नारी। गयउ बिभीषनु मन दुख भारी॥

वे सब श्रीरामको नेत्र भरकर निहारते हुए प्रेममग्न और परम सुखी हो उठे। अपने घरकी स्त्रियोंको रोता देखकर विभीषणके मनमें भारी दुःख हुआ और वे उनके पास गये।

बंधु दसा बिलोकि दुख कीन्हा। तब प्रभु अनुजहि आयसु दीन्हा॥लछिमन तेहि बहु बिधि समुझायो। बहुरि बिभीषन प्रभु पहिं आयो॥

भाईकी यह दशा देखकर उन्हें दुःख हुआ, तब प्रभुने अपने छोटे भाईको आज्ञा दी। लक्ष्मणने उन्हें बहुत प्रकारसे समझाया, फिर विभीषण प्रभुके पास लौट आये।

कृपादृष्टि प्रभु ताहि बिलोका। करहु क्रिया परिहरि सब सोका॥कीन्हि क्रिया प्रभु आयसु मानी। बिधिवत देस काल जियँ जानी॥

प्रभुने उन्हें कृपादृष्टिसे देखकर कहा—सब शोक त्यागकर अंत्येष्टि-क्रिया करो। प्रभुकी आज्ञा मानकर विभीषणने देश-कालका विचार करके विधिपूर्वक सारी क्रिया सम्पन्न की।

दोहा

मंदोदरी आदि सब देइ तिलांजलि ताहि।भवन गई रघुपति गुन गन बरनत मन माहि॥१०५

मंदोदरी आदि सब स्त्रियाँ रावणको तिलांजलि देकर, मनमें श्रीरामके गुणोंका बखान करती हुई महलको लौट गयीं।

आइ बिभीषन पुनि सिरु नायो। कृपासिंधु तब अनुज बोलायो॥तुम्ह कपीस अंगद नल नीला। जामवंत मारुति नयसीला॥

सब क्रिया-कर्म सम्पन्न करके विभीषण फिर आकर सिर नवाकर खड़े हुए। तब कृपासिंधु श्रीराम ने अनुज लक्ष्मण को बुलाया—साथ ही सुग्रीव, अंगद, नल, नील, जाम्बवान और नीतिनिपुण हनुमान को भी।

सब मिलि जाहु बिभीषन साथा। सारेहु तिलक कहेउ रघुनाथा॥पिता बचन मैं नगर न आवउँ। आपु सरिस कपि अनुज पठावउँ॥

श्रीराम ने कहा—तुम सब मिलकर विभीषण के साथ जाओ और उन्हें राजतिलक कर दो। पिताजी के वचन के कारण मैं स्वयं नगर में नहीं जा सकता, पर अपने ही समान वानर और अपने भाई को भेज रहा हूँ।

तुरत चले कपि सुनि प्रभु बचना। कीन्ही जाइ तिलक की रचना॥सादर सिंहासन बैठारी। तिलक सारि अस्तुति अनुसारी॥

प्रभु के ये वचन सुनते ही वानर तुरंत चल पड़े और जाकर राजतिलक का सारा विधान किया — आदरपूर्वक विभीषण को सिंहासन पर बैठाकर तिलक किया और उनकी स्तुति की।

जोरि पानि सबहीं सिर नाए। सहित बिभीषन प्रभु पहिं आए॥तब रघुबीर बोलि कपि लीन्हे। कहि प्रिय बचन सुखी सब कीन्हे॥

सबने हाथ जोड़कर उन्हें सिर नवाया, फिर विभीषणसहित सब प्रभुके पास लौट आये। तब श्रीरामने वानरोंको बुलाकर प्रिय वचन कहे और सबको प्रसन्न कर दिया।

छंद

किए सुखी कहि बानी सुधा सम बल तुम्हारें रिपु हयो।पायो बिभीषन राज तिहुँ पुर जसु तुम्हारो नित नयो॥मोहि सहित सुभ कीरति तुम्हारी परम प्रीति जो गाइहैं।संसार सिंधु अपार पार प्रयास बिनु नर पाइहैं॥

अमृतके समान वाणीसे उन्हें सुखी करते हुए प्रभुने कहा—तुम्हारे ही बलसे यह प्रबल शत्रु मारा गया और विभीषणने राज्य पाया, इससे तुम्हारा यश तीनों लोकोंमें सदा नया बना रहेगा। जो कोई मेरे साथ तुम्हारी इस शुभ कीर्तिको परम प्रेमसे गायेगा, वह बिना किसी परिश्रमके इस अपार संसार-सागरका पार पा जायगा।

दोहा

प्रभु के बचन श्रवन सुनि नहिं अघाहिं कपि पुंज।बार बार सिर नावहिं गहहिं सकल पद कंज॥१०६

प्रभुके ये वचन कानोंसे सुनकर वानर-समूह तृप्त ही नहीं होते—वे बार-बार सिर नवाते और उनके चरण-कमल पकड़ लेते हैं।

पुनि प्रभु बोलि लियउ हनुमाना। लंका जाहु कहेउ भगवाना॥समाचार जानकिहि सुनावहु। तासु कुसल लै तुम्ह चलि आवहु॥

फिर प्रभुने हनुमानको बुलाया और कहा—लंका जाओ, जानकीको सारा समाचार सुनाओ और उनका कुशल-समाचार लेकर लौट आओ।

तब हनुमंत नगर महुँ आए। सुनि निसिचरी निसाचर धाए॥बहु प्रकार तिन्ह पूजा कीन्ही। जनकसुता देखाइ पुनि दीन्ही॥

हनुमान नगरमें पहुँचे, यह सुनकर राक्षस-राक्षसियाँ उनके स्वागतको दौड़ पड़े। उन्होंने बहुत प्रकारसे हनुमानकी पूजा की और फिर उन्हें जानकीजीके दर्शन कराये।

दूरहि ते प्रनाम कपि कीन्हा। रघुपति दूत जानकी चीन्हा॥कहहु तात प्रभु कृपानिकेता। कुसल अनुज कपि सेन समेता॥

हनुमानने दूरसे ही प्रणाम किया। जानकीजीने पहचान लिया कि यह श्रीरामका ही दूत है—और पूछा, हे तात! बताओ, कृपानिधान प्रभु, छोटे भाई और वानर-सेनासहित कुशलसे तो हैं?

सब बिधि कुसल कोसलाधीसा। मातु समर जीत्यो दससीसा॥अबिचल राजु बिभीषन पायो। सुनि कपि बचन हरष उर छायो॥

हनुमानने कहा—हे माता! कोसलपति सब प्रकारसे कुशल हैं। उन्होंने युद्धमें दस सिरवाले रावणको जीत लिया है और विभीषणने अटल राज्य पाया है। यह सुनते ही सीताजीके हृदयमें हर्ष छा गया।

छंद

अति हरष मन तन पुलक लोचन सजल कह पुनि पुनि रमा।का देउँ तोहि त्रेलोक महुँ कपि किमपि नहिं बानी समा॥सुनु मातु मैं पायो अखिल जग राजु आजु न संसयं।रन जीति रिपुदल बंधु जुत पस्यामि राममनामयं॥

सीताजीके मनमें अपार हर्ष हुआ, शरीर पुलकित हो उठा और नेत्रोंमें आनंदाश्रु भर आये। वे बार-बार कहती हैं—हे हनुमान! मैं तुझे क्या दूँ, इस समाचारके समान तीनों लोकोंमें और कुछ भी नहीं! हनुमानने कहा—हे माता! सुनिये, आज मैंने निःसंदेह सारे जगतका राज्य पा लिया, क्योंकि मैं रणमें शत्रु-सेनाको जीतकर भाईसहित निर्विकार श्रीरामको देख रहा हूँ।

दोहा

सुनु सुत सदगुन सकल तव हृदयँ बसहुँ हनुमंत।सानुकूल कोसलपति रहहुँ समेत अनंत॥१०७

सीताजीने कहा—हे पुत्र! सब सद्गुण सदा तेरे हृदयमें बसें, और शेष लक्ष्मणसहित कोसलपति प्रभु सदा तुझपर प्रसन्न रहें।

अब सोइ जतन करहु तुम्ह ताता। देखौं नयन स्याम मृदु गाता॥तब हनुमान राम पहिं जाई। जनकसुता कै कुसल सुनाई॥

हे तात! अब तुम वही उपाय करो जिससे मैं अपनी आँखोंसे प्रभुके कोमल श्याम शरीरके दर्शन कर सकूँ। तब हनुमानने श्रीरामके पास जाकर जानकीजीका कुशल-समाचार सुनाया।

सुनि संदेसु भानुकुलभूषन। बोलि लिए जुबराज बिभीषन॥मारुतसुत के संग सिधावहु। सादर जनकसुतहि लै आवहु॥

यह संदेश सुनकर सूर्यकुलभूषण श्रीरामने युवराज अंगद और विभीषणको बुलाकर कहा—हनुमानके साथ जाओ और आदरपूर्वक जानकीको ले आओ।

तुरतहिं सकल गए जहँ सीता। सेवहिं सब निसिचरीं बिनीता॥बेगि बिभीषन तिन्हहि सिखायो। तिन्ह बहु बिधि मज्जन करवायो॥

वे सब तुरंत वहाँ गये जहाँ सीताजी थीं, जहाँ राक्षसियाँ विनम्रतापूर्वक उनकी सेवा कर रही थीं। विभीषणने शीघ्र ही उन्हें समझाया और उन लोगोंने सीताजीको भाँति-भाँतिसे स्नान कराया।

बहु प्रकार भूषन पहिराए। सिबिका रुचिर साजि पुनि ल्याए॥ता पर हरषि चढ़ी बैदेही। सुमिरि राम सुखधाम सनेही॥

फिर उन्हें तरह-तरहके आभूषण पहनाये और एक सुंदर पालकी सजाकर लायीं। सीताजी सुखधाम प्रियतम श्रीरामका स्मरण करते हुए हर्षपूर्वक उसपर सवार हुईं।

बेतपानि रच्छक चहुँ पासा। चले सकल मन परम हुलासा॥देखन भालु कीस सब आए। रच्छक कोपि निवारन धाए॥

चारों ओर हाथोंमें छड़ी लिये रक्षक चले, सबके मनमें परम उल्लास है। दर्शनके लिये सब रीछ-वानर उमड़ पड़े, तब रक्षक क्रोधित होकर उन्हें रोकने दौड़े।

कह रघुबीर कहा मम मानहु। सीतहि सखा पयादें आनहु॥देखहुँ कपि जननी की नाईं। बिहसि कहा रघुनाथ गोसाई॥

श्रीरामने कहा—हे मित्र! मेरा कहना मानो, सीताको पैदल ही ले आओ, जिससे वानर उन्हें माताके समान देख सकें। गोसाईं श्रीरामने हँसते हुए यह बात कही।

सुनि प्रभु बचन भालु कपि हरषे। नभ ते सुरन्ह सुमन बहु बरषे॥सीता प्रथम अनल महुँ राखी। प्रगट कीन्हि चह अंतर साखी॥

प्रभुके ये वचन सुनकर रीछ-वानर हर्षित हो उठे, आकाशसे देवताओंने फूलोंकी वर्षा की। सीताजीके असली स्वरूपको पहले अग्निमें सुरक्षित रखा गया था, अब अंतर्यामी प्रभु उसे सबके सामने प्रकट करना चाहते हैं।

दोहा

तेहि कारन करुनानिधि कहे कछुक दुर्बाद।सुनत जातुधानीं सब लागीं करै बिषाद१०८

इसी कारण करुणानिधान श्रीरामने लीलावश कुछ कठोर वचन कहे, जिन्हें सुनकर सब राक्षसियाँ विषाद करने लगीं।

प्रभु के बचन सीस धरि सीता। बोली मन क्रम बचन पुनीता॥लछिमन होहु धरम के नेगी। पावक प्रगट करहु तुम्ह बेगी॥

प्रभुके वचनोंको सिर-माथे लेकर मन-वचन-कर्मसे पवित्र सीताजी बोलीं—हे लक्ष्मण! तुम मेरे धर्मकार्यमें सहायक बनो और शीघ्र अग्नि प्रज्वलित करो।

सुनि लछिमन सीता कै बानी। बिरह बिबेक धरम निति सानी॥लोचन सजल जोरि कर दोऊ। प्रभु सन कछु कहि सकत न ओऊ॥

सीताजीकी विरह, विवेक, धर्म और नीतिसे भरी वाणी सुनकर लक्ष्मणके नेत्र भर आये। वे दोनों हाथ जोड़े खड़े रह गये, प्रभुसे कुछ भी कह न सके।

देखि राम रुख लछिमन धाए। पावक प्रगटि काठ बहु लाए॥पावक प्रबल देखि बैदेही। हृदयँ हरष नहिं भय कछु तेही॥

श्रीरामका रुख देखकर लक्ष्मण दौड़े और अग्नि प्रज्वलित करके बहुत-सी लकड़ियाँ ले आये। अग्निको प्रचंड होते देखकर भी जानकीजीके हृदयमें हर्ष रहा, तनिक भी भय नहीं हुआ।

जौं मन बच क्रम मम उर माहीं। तजि रघुबीर आन गति नाहीं॥तौ कृसानु सब कै गति जाना। मो कहुँ होउ श्रीखंड समाना॥

[सीताजीने लीलासे कहा—] यदि मन, वचन और कर्मसे मेरे हृदयमें श्रीरघुवीरको छोड़कर दूसरा कोई आश्रय नहीं है, तो सबके मनकी बात जाननेवाले अग्निदेव मेरे लिये भी चंदनके समान शीतल हो जायँ।

छंद

श्रीखंड सम पावक प्रबेस कियो सुमिरि प्रभु मैथिली।जय कोसलेस महेस बंदित चरन रति अति निर्मली॥प्रतिबिंब अरु लौकिक कलंक प्रचंड पावक महुँ जरे।प्रभु चरित काहुँ न लखे नभ सुर सिद्ध मुनि देखहिं खरे॥

प्रभुका स्मरण करके, और जिनके चरण महादेवजीसे वंदित हैं तथा जिनमें अपनी अत्यंत निर्मल प्रीति है, उन कोसलपतिकी जय बोलकर जानकीजीने चंदनके समान शीतल हुई अग्निमें प्रवेश किया। उनकी छायामूर्ति और लौकिक कलंक दोनों उस प्रचंड अग्निमें जलकर भस्म हो गये। प्रभुके इस चरित्रको कोई न जान सका—देवता, सिद्ध और मुनि सब आकाशमें खड़े यह देखते ही रह गये।

छंद

धरि रूप पावक पानि गहि श्री सत्य श्रुति जग बिदित जो।जिमि छीरसागर इंदिरा रामहि समर्पी आनि सो॥सो राम बाम बिभाग राजति रुचिर अति सोभा भली।नव नील नीरज निकट मानहुँ कनक पंकज की कली॥

तब अग्निदेवने स्वयं शरीर धारण करके, वेद और जगत्में विख्यात असली सीताजीका हाथ पकड़कर उन्हें श्रीरामको वैसे ही सौंप दिया जैसे क्षीरसागरने लक्ष्मीजीको विष्णुभगवान्को सौंपा था। वे श्रीरामके वामभागमें विराजमान हुईं, उनकी वह शोभा ऐसी सुंदर लगती है मानो नये खिले नीले कमलके पास सोनेके कमलकी कली सुशोभित हो।

दोहा

बरषहिं सुमन हरषि सुर बाजहिं गगन निसान।गावहिं किंनर सुरबधू नाचहिं चढ़ीं बिमान१०९(क)

देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे, आकाशमें नगाड़े बज उठे। किन्नर गाने लगे और विमानोंपर सवार अप्सराएँ नाचने लगीं।

दोहा

जनकसुता समेत प्रभु सोभा अमित अपार।देखि भालु कपि हरषे जय रघुपति सुख सार१०९(ख)

जानकीजीसहित प्रभुकी अपार, अपरिमित शोभा देखकर रीछ-वानर हर्षसे भर उठे और सुखके सार श्रीरघुनाथजीकी जय-जयकार करने लगे।

तब रघुपति अनुसासन पाई। मातलि चलेउ चरन सिरु नाई॥आए देव सदा स्वारथी। बचन कहहिं जनु परमारथी॥

श्रीरामकी आज्ञा पाकर इंद्रका सारथि मातलि चरणोंमें सिर नवाकर रथ लेकर लौट गया। इसके बाद सदाके स्वार्थी देवता ऐसी बातें करने आये मानो वे बड़े परमार्थी हों।

दीन बंधु दयाल रघुराया। देव कीन्हि देवन्ह पर दाया॥बिस्व द्रोह रत यह खल कामी। निज अघ गयउ कुमारगगामी॥

हे दीनबंधु, हे दयालु रघुराज! आपने देवताओंपर बड़ी कृपा की। विश्वद्रोहमें रत यह कामी, कुमार्गगामी दुष्ट अपने ही पापके बोझसे नष्ट हो गया।

तुम्ह समरूप ब्रह्म अबिनासी। सदा एकरस सहज उदासी॥अकल अगुन अज अनघ अनामय। अजित अमोघसक्ति करुनामय॥

आप ही ब्रह्म, अविनाशी, सदा एकरस, स्वभावसे उदासीन, अखंड, निर्गुण, अजन्मा, निष्पाप, निर्विकार, अजेय, अमोघशक्ति और करुणामय हैं।

मीन कमठ सूकर नरहरी। बामन परसुराम बपु धरी॥जब जब नाथ सुरन्ह दुखु पायो। नाना तनु धरि तुम्हईँ नसायो॥

आपने ही मत्स्य, कच्छप, वराह, नृसिंह, वामन और परशुरामका शरीर धारण किया। हे नाथ! जब-जब देवताओंने दुःख पाया, तब-तब आपने ही अनेक रूप धरकर उनका दुःख दूर किया।

यह खल मलिन सदा सुरद्रोही। काम लोभ मद रत अति कोही॥अधम सिरोमनि तव पद पावा। यह हमरें मन बिसमय आवा॥

यह मलिनहृदय दुष्ट सदा देवताओंका शत्रु, काम-लोभ-मदमें डूबा और अत्यंत क्रोधी था। ऐसे अधमोंके शिरोमणिने भी आपका परमपद पा लिया—इसीका हमें आश्चर्य हो रहा है।

हम देवता परम अधिकारी। स्वारथ रत प्रभु भगति बिसारी॥भव प्रबाहँ संतत हम परे। अब प्रभु पाहि सरन अनुसरे॥

हम देवता श्रेष्ठ पद पाकर भी स्वार्थमें डूबे रहे और आपकी भक्तिको भुला बैठे, इसीसे सदा जन्म-मृत्युके चक्रमें भटकते रहे। अब हे प्रभो! हम आपकी शरणमें आये हैं, हमारी रक्षा कीजिये।

दोहा

करि बिनती सुर सिद्ध सब रहे जहँ तहँ कर जोरि।अति सप्रेम तन पुलकि बिधि अस्तुति करत बहोरि॥११०

यों विनती करके देवता और सिद्ध सब जहाँ-के-तहाँ हाथ जोड़े खड़े रह गये। तब अत्यंत प्रेमसे पुलकित होकर ब्रह्माजी स्तुति करने लगे—

छंद

जय राम सदा सुखधाम हरे। रघुनायक सायक चाप धरे॥भव बारन दारन सिंह प्रभो। गुन सागर नागर नाथ बिभो॥

हे सदा सुखके धाम, हे दुःखहारी हरि! धनुष-बाण धारण करनेवाले रघुनाथकी जय हो। हे प्रभो! आप जन्म-मृत्युरूपी हाथीको चीरनेके लिये सिंहके समान हैं, हे नाथ, हे सर्वव्यापक विभो! आप गुणोंके सागर और परम चतुर हैं।

छंद

तन काम अनेक अनूप छबी। गुन गावत सिद्ध मुनींद्र कबी॥जसु पावन रावन नाग महा। खगनाथ जथा करि कोप गहा॥

आपके शरीरकी छवि अनेक कामदेवोंसे भी अनुपम है, सिद्ध, मुनींद्र और कवि सब आपके गुण गाते हैं। आपका पवित्र यश यह है कि आपने महासर्प-सरीखे रावणको गरुड़की भाँति क्रोध करके पकड़ लिया।

छंद

जन रंजन भंजन सोक भयं। गतक्रोध सदा प्रभु बोधमयं॥अवतार उदार अपार गुनं। महि भार बिभंजन ग्यानघनं॥

आप सेवकोंको आनंद देनेवाले, शोकका नाश करनेवाले, सदा क्रोधरहित और ज्ञानस्वरूप हैं। आप उदार अवतार और अपार गुणोंवाले हैं, जो पृथ्वीका भार उतारनेवाले और ज्ञानकी घनीभूत राशि हैं।

छंद

अज ब्यापकमेकमनादि सदा। करुनाकर राम नमामि मुदा॥रघुबंस बिभूषन दूषन हा। कृत भूप बिभीषन दीन रहा॥

आप नित्य, सर्वव्यापक, अद्वितीय और अनादि हैं, हे करुणाके धाम राम! मैं हर्षपूर्वक आपको नमस्कार करता हूँ। हे रघुकुलके भूषण, दूषणको मारनेवाले! विभीषण दीन था, उसे आपने राजा बना दिया।

छंद

अज ब्यापकमेकमनादि सदा। करुनाकर राम नमामि मुदा॥रघुबंस बिभूषन दूषन हा। कृत भूप बिभीषन दीन रहा॥

यही तो आपकी करुणाकी अपार महिमा है—नित्य, अजन्मा, सर्वव्यापी और अनादि होते हुए भी आपने विभीषण-जैसे दीनको अपनाकर उसे राजपद दे दिया।

छंद

गुन ध्यान निधान अमान अजं। नित राम नमामि बिभुं बिरजं॥भुजदंड प्रचंड प्रताप बलं। खल बृंद निकंद महा कुसलं॥

हे गुण और ध्यानके निधान, अभिमानरहित, अजन्मा राम! मैं आपको सदा नमस्कार करता हूँ। आपके भुजदंडोंका प्रताप और बल प्रचंड है, दुष्टोंके समूहका नाश करनेमें आप परम कुशल हैं।

छंद

बिनु कारन दीन दयाल हितं। छबि धाम नमामि रमा सहितं॥भव तारन कारन काज परं। मन संभव दारुन दोष हरं॥

आप बिना किसी कारणके ही दीनोंपर दया करनेवाले और हितकारी हैं, हे शोभाके धाम! लक्ष्मीजीसहित मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आप संसार-सागरसे पार करानेके परम कारण हैं और मनसे उपजे दारुण दोषोंको हरनेवाले हैं।

छंद

सर चाप मनोहर त्रोन धरं। जरजारुन लोचन भूपबरं॥सुख मंदिर सुंदर श्रीरमनं। मद मार मुधा ममता समनं॥

आपके सुंदर हाथोंमें मनोहर धनुष-बाण-तरकस सुशोभित हैं, आपके नेत्र लाल कमलके समान हैं, हे श्रेष्ठ भूप! आप सुखके मंदिर और सुंदर श्रीरमण हैं, जो कामदेवके मदको व्यर्थ करनेवाले और ममताको शांत करनेवाले हैं।

छंद

अनवद्य अखंड न गोचर गो। सबरूप सदा सब होइ न गो॥इति बेद बदंति न दंतकथा। रबि आतप भिन्नमभिन्न जथा॥

आप निर्दोष, अखंड और इंद्रियोंसे परे हैं, सब रूप धारण करते हुए भी सदा उनसे अतीत रहते हैं। वेद भी यही कहते हैं, यह कोरी कल्पित कथा नहीं—जैसे सूर्य और उसका आतप एक साथ रहकर भी भिन्न-अभिन्न दोनों हैं, वैसे ही आप हैं।

छंद

कृतकृत्य बिभो सब बानर ए। निरखंति तवानन सादर ए॥धिग जीवन देव सरीर हरे। तव भक्ति बिना भव भूलि परे॥

हे व्यापक प्रभो! ये सब वानर धन्य हैं, जो आदरपूर्वक आपके मुखका दर्शन कर रहे हैं। हे हरि! हमारे इस अमर जीवन और दिव्य शरीरको धिक्कार है, जो आपकी भक्तिके बिना संसारमें भूले भटक रहे हैं।

छंद

अब दीन दयाल दया करिऐ। मति मोरि बिभेदकरी हरिऐ॥जेहि ते बिपरीत क्रिया करिऐ। दुख सो सुख मानि सुखी चरिऐ॥१०

अब, हे दीनदयाल! दया कीजिये और मेरी वह बुद्धि हर लीजिये जो भेद उत्पन्न करती है, जिसके कारण मैं उलटे कर्म करता हूँ और दुःखको सुख मानकर सुखी होनेका भ्रम पालता हूँ।

छंद

खल खंडन मंडन रम्य छमा। पद पंकज सेवित संभु उमा॥नृप नायक दे बरदानमिदं। चरनांबुज प्रेम सदा सुभदं॥११

आप दुष्टोंका नाश करनेवाले और क्षमाके रम्य आभूषण हैं, शिव-पार्वती भी जिनके चरणकमलोंकी सेवा करते हैं। हे राजाओंके राजा! मुझे यही वरदान दीजिये कि आपके चरणकमलोंमें मेरा प्रेम सदा शुभ बना रहे।

दोहा

बिनय कीन्हि चतुरानन प्रेम पुलक अति गात।सोभासिंधु बिलोकत लोचन नहीं अघात॥१११

इस प्रकार ब्रह्माजीने अत्यंत प्रेमसे पुलकित होकर विनती की। शोभाके समुद्र श्रीरामके दर्शन करते-करते उनके नेत्र तृप्त ही नहीं होते थे।

तेहि अवसर दसरथ तहँ आए। तनय बिलोकि नयन जल छाए॥अनुज सहित प्रभु बंदन कीन्हा। आसिरबाद पिताँ तब दीन्हा॥

उसी समय दशरथजी वहाँ आये। पुत्रको देखते ही उनके नेत्रोंमें प्रेमाश्रु भर आये। लक्ष्मणसहित प्रभुने उनकी वंदना की, तब पिताने उन्हें आशीर्वाद दिया।

तात सकल तव पुन्य प्रभाऊ। जीत्यों अजय निसाचर राऊ॥सुनि सुत बचन प्रीति अति बाढ़ी। नयन सलिल रोमावलि ठाढ़ी॥

श्रीरामने कहा—हे तात! यह सब आपके पुण्योंका ही प्रभाव है कि मैंने अजेय राक्षसराजको जीत लिया। पुत्रके ये वचन सुनकर उनकी प्रीति और बढ़ गयी, नेत्रोंमें जल भर आया और रोमांच हो आया।

रघुपति प्रथम प्रेम अनुमाना। चितइ पितहि दीन्हेउ दृढ़ ग्याना॥ताते उमा मोच्छ नहिं पायो। दसरथ भेद भगति मन लायो॥

श्रीरामने पिताके पूर्व-प्रेमको समझकर, उनकी ओर देखकर ही उन्हें अपने स्वरूपका दृढ़ ज्ञान करा दिया। शिवजी कहते हैं—हे उमा! दशरथजीने सगुण भक्तिमें ही मन लगाया था, इसीसे उन्हें कैवल्य मोक्ष नहीं मिला।

सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं। तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं॥बार बार करि प्रभुहि प्रनामा। दसरथ हरषि गए सुरधामा॥

सगुणकी उपासना करनेवाले भक्त ऐसा (कैवल्य) मोक्ष लेते भी नहीं, श्रीराम उन्हें अपनी भक्ति ही देते हैं। प्रभुको बार-बार प्रणाम करके दशरथजी हर्षित होकर देवलोकको चले गये।

दोहा

अनुज जानकी सहित प्रभु कुसल कोसलाधीस।सोभा देखि हरषि मन अस्तुति कर सुर ईस११२

छोटे भाई लक्ष्मण और जानकीजीसहित परम कुशल कोसलाधीशकी शोभा देखकर देवराज इंद्र मनमें हर्षित होकर स्तुति करने लगे—

छंद

जय राम सोभा धाम। दायक प्रनत बिश्राम॥धृत त्रोन बर सर चाप। भुजदंड प्रबल प्रताप॥

श्रीरामकी जय हो, जो शोभाके धाम और शरणागतको विश्राम देनेवाले हैं, जिन्होंने श्रेष्ठ तरकस, धनुष-बाण धारण किये हैं और जिनके भुजदंड प्रबल प्रतापी हैं।

छंद

जय दूषनारि खरारि। मर्दन निसाचर धारि॥यह दुष्ट मारेउ नाथ। भए देव सकल सनाथ॥

हे दूषणके शत्रु, हे खरारि! आपने निशाचरोंकी सेनाका मर्दन किया। इस दुष्टको आपने मार डाला, हे नाथ! जिससे सब देवता फिर सुरक्षित हो गये।

छंद

जय हरन धरनी भार। महिमा उदार अपार॥जय रावनारि कृपाल। किए जातुधान बिहाल॥

आप पृथ्वीका भार हरनेवाले हैं, आपकी महिमा उदार और अपार है। हे रावणके शत्रु, हे कृपालु! आपने राक्षसोंको तहस-नहस कर डाला।

छंद

लंकेस अति बल गर्ब। किए बस्य सुर गंधर्ब॥मुनि सिद्ध नर खग नाग। हठि पंथ सब कें लाग॥

लंकापति रावणको अपने बलका अत्यंत गर्व था, उसने देवताओं और गंधर्वोंतकको वश में कर लिया था। मुनि, सिद्ध, मनुष्य, पक्षी और नाग—सभी हठपूर्वक उसीके मार्गपर चलनेको बाध्य थे।

छंद

परद्रोह रत अति दुष्ट। पायो सो फलु पापिष्ट॥अब सुनहु दीन दयाल। राजीव नयन बिसाल॥

वह परद्रोहमें रत अत्यंत दुष्ट था, अंततः उसने वही पापका फल पाया। अब, हे दीनदयाल! सुनिये, हे कमल-सरीखे विशाल नेत्रोंवाले प्रभु!

छंद

मोहि रहा अति अभिमान। नहिं कोउ मोहि समान॥अब देखि प्रभु पद कंज। गत मान प्रद दुख पुंज॥

मुझे भी अपने बलका अत्यंत अभिमान था, मैं सोचता था कि मेरे समान कोई नहीं। पर अब प्रभुके चरणकमलोंको देखकर मेरा वह मान और दुःखोंका ढेर दोनों मिट गये।

छंद

कोउ ब्रह्म निर्गुन ध्याव। अब्यक्त जेहि श्रुति गाव॥मोहि भाव कोसल भूप। श्रीराम सगुन सरूप॥

कोई निर्गुण ब्रह्मका ध्यान करता है, जिसे वेद भी अव्यक्त कहकर गाते हैं; पर मुझे तो कोसलपतिका यह सगुण स्वरूप ही प्रिय है।

छंद

बैदेहि अनुज समेत। मम हृदयँ करहु निकेत॥मोहि जानिए निज दास। दे भक्ति रमानिवास॥

हे प्रभु! जानकी और अपने छोटे भाईसहित आप मेरे हृदयमें सदा निवास कीजिये। मुझे अपना सेवक जानकर अपनी भक्ति प्रदान कीजिये।

छंद

दे भक्ति रमानिवास त्रास हरन सरन सुखदायकं।सुख धाम राम नमामि काम अनेक छबि रघुनायकं॥सुर बृंद रंजन द्वंद भंजन मनुज तनु अतुलितबलं।ब्रह्मादि संकर सेब्य राम नमामि करुना कोमलं॥

हे लक्ष्मीपति! हे भयहारी, शरणागतको सुख देनेवाले! हे सुखधाम, अनेकों कामदेवोंकी शोभावाले रघुनाथ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे देवसमूहको आनंद देनेवाले, द्वंद्वोंका नाश करनेवाले, मनुष्यरूपमें अतुलित बलशाली, ब्रह्मा-शिव आदिसे सेवित, करुणासे कोमल श्रीराम! मैं आपको नमस्कार करता हूँ।

दोहा

अब करि कृपा बिलोकि मोहि आयसु देहु कृपाल।काह करौं सुनि प्रिय बचन बोले दीनदयाल११३

हे कृपालु! अब मेरी ओर कृपादृष्टिसे देखकर आज्ञा दीजिये कि मैं क्या करूँ। इंद्रके ये प्रिय वचन सुनकर दीनदयालु श्रीराम बोले—

सुनु सुरपति कपि भालु हमारे। परे भूमि निसचरन्हि जे मारे॥मम हित लागि तजे इन्ह प्राना। सकल जिआउ सुरेस सुजाना॥

हे देवराज! सुनो, हमारे जो वानर-भालू निशाचरोंके हाथों मारे जाकर भूमिपर पड़े हैं, उन्होंने मेरे ही हितके लिये प्राण त्यागे हैं। हे सुजान देवराज! इन सबको जिला दो।

सुनु खगेस प्रभु के यह बानी। अति अगाध जानहिं मुनि ग्यानी॥प्रभु सक त्रिभुअन मारि जिआई। केवल सक्रहि दीन्हि बड़ाई॥

काकभुशुंडिजी कहते हैं—हे गरुड़! प्रभुके ये वचन अत्यंत गहन हैं, ज्ञानी मुनि ही इन्हें समझ सकते हैं। प्रभु तो तीनों लोकको मारकर भी जिला सकते हैं, पर यहाँ उन्होंने केवल इंद्रको बड़ाई दे दी।

सुधा बरषि कपि भालु जिआए। हरषि उठे सब प्रभु पहिं आए॥सुधाबृष्टि भै दुहु दल ऊपर। जिए भालु कपि नहिं रजनीचर॥

इंद्रने अमृत बरसाकर वानर-भालुओंको जिला दिया। वे सब हर्षित होकर उठे और प्रभुके पास आ गये। अमृतकी वर्षा दोनों ही सेनाओंपर हुई, पर उससे रीछ-वानर ही जीवित हुए, राक्षस नहीं।

रामाकार भए तिन्ह के मन। मुक्त भए छूटे भव बंधन॥सुर अंसिक सब कपि अरु रीछा। जिए सकल रघुपति कीं ईछा॥

क्योंकि राक्षसोंके मन तो मरते समय ही रामाकार हो गये थे, इसलिये वे मुक्त हो गये और उनके भव-बंधन छूट गये। वानर-भालू तो सब देवांश थे, इसलिये वे श्रीरामकी ही इच्छासे जीवित हो उठे।

राम सरिस को दीन हितकारी। कीन्हे मुकुत निसाचर झारी॥खल मल धाम काम रत रावन। गति पाई जो मुनिबर पाव न॥

श्रीरामके समान दीनोंका हित करनेवाला और कौन है, जिन्होंने सारे राक्षसोंको भी मुक्त कर दिया! दुष्ट, पापोंके घर, कामी रावणने भी वह गति पायी जो श्रेष्ठ मुनियोंको भी दुर्लभ है।

दोहा

सुमन बरषि सब सुर चले चढ़ि चढ़ि रुचिर बिमान।देखि सुअवसरु प्रभु पहिं आयउ संभु सुजान११४(क)

फूलोंकी वर्षा करके सब देवता सुंदर विमानोंपर चढ़कर लौट चले। तभी अवसर पाकर सुजान शिवजी प्रभुके पास आये—

दोहा

परम प्रीति कर जोरि जुग नलिन नयन भरि बारि।पुलकित तन गदगद गिराँ बिनय करत त्रिपुरारि११४(ख)

परम प्रेमसे दोनों हाथ जोड़कर, कमल-सरीखे नेत्रोंमें आँसू भरकर, पुलकित शरीर और गद्गद वाणीमें त्रिपुरारि शिवजी विनती करने लगे—