पञ्चम सोपान — भाग 2

सुन्दरकाण्ड

हनुमानजी का लंका गमन, सीता माता से भेंट एवं लंका दहन की कथा।

सुन्दरकाण्ड — सुनें

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हनुमानजी का लंका गमन, सीता माता से भेंट एवं लंका दहन की कथा।

यह कथा शीघ्र ही यहाँ सुनने हेतु भी उपलब्ध होगी

पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥जौं पै दुष्टहदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई॥

पापीका स्वभाव ही ऐसा होता है कि उसे मेरा भजन कभी नहीं सुहाता। यदि यह सचमुच दुष्ट हृदयका होता, तो क्या यह मेरे सम्मुख आ भी सकता था?

निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा॥

जो निर्मल मनका होता है, वही मुझे पाता है—मुझे कपट और छल तनिक भी प्रिय नहीं। भले ही रावणने इसे भेद लेने भेजा हो, तो भी हे सुग्रीव! हमें कोई भय या हानि नहीं है।

जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते॥जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहउँ ताहि प्रान की नाई॥

क्योंकि हे मित्र! संसारमें जितने भी राक्षस हैं, लक्ष्मण पलभरमें उन सबका नाश कर सकते हैं। और यदि यह भयभीत होकर शरण आया है, तो मैं इसे अपने प्राणोंकी भाँति सुरक्षित रखूँगा।

दोहा

उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।जय कृपाल कहि कपि चले अंगद हनू समेत॥४४

कृपानिधान श्रीरामने हँसकर कहा—दोनों ही स्थितिमें उसे यहाँ ले आओ। तब सुग्रीव अंगद और हनुमानसहित 'कृपालु श्रीरामकी जय' कहते हुए चल पड़े।

सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर॥दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता॥

विभीषणको आदरपूर्वक आगे करके वानर वहाँ पहुँचे, जहाँ करुणाके सागर श्रीराम विराजमान थे। नेत्रोंको आनंद देनेवाले दोनों भाइयोंको विभीषणने दूरसे ही देख लिया।

बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी॥भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन॥

फिर शोभाके धाम श्रीरामको देखते ही वे पलक झपकाना भूलकर स्तब्ध निहारते रह गए—विशाल भुजाएँ, लाल कमल-जैसे नेत्र और शरणागतका भय मिटानेवाला श्यामल शरीर।

सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा॥नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता॥

सिंहके समान कंधे, चौड़ी और सुशोभित छाती, असंख्य कामदेवोंको भी मोहित कर देनेवाला मुख—यह रूप देखते ही विभीषणके नेत्र भर आए और शरीर रोमांचित हो उठा। फिर धैर्य धरकर उन्होंने कोमल वचन कहे—

नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता॥सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा॥

हे नाथ! मैं रावणका छोटा भाई हूँ, राक्षसकुलमें जन्म लिया है। हे देवरक्षक! मेरा शरीर तामसी है और स्वभावसे ही मुझे पाप प्रिय है, जैसे उल्लूको अंधकारसे सहज ही स्नेह होता है।

दोहा

श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥४५

मैं आपका सुयश कानोंसे सुनकर ही यहाँ आया हूँ कि आप जन्म-मरणके भयको मिटानेवाले हैं। हे दुःखियोंके दुःख हरनेवाले, शरणागतको सुख देनेवाले रघुवीर! मेरी रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए।

अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा॥दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा॥

यह कहते हुए उन्हें दंडवत करते देख प्रभु अत्यंत हर्षित होकर तुरंत उठ खड़े हुए। विभीषणके ये दीन वचन सुनकर प्रभुका मन द्रवित हो उठा और उन्होंने अपनी विशाल भुजाओंसे उन्हें उठाकर हृदयसे लगा लिया।

अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी॥कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा॥

लक्ष्मणसहित गले मिलकर उन्हें अपने पास बिठाकर भक्तोंका भय हरनेवाले श्रीराम बोले—हे लंकेश! परिवारसहित अपनी कुशल कहो, तुम्हारा निवास तो बड़ी बुरी जगहपर रहा है।

खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती॥मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती॥

दिन-रात दुष्टोंकी संगतिमें रहते हुए हे मित्र! तुम्हारा धर्म कैसे निभता होगा? मैं तुम्हारा सारा आचरण जानता हूँ—तुम अत्यंत नीतिनिपुण हो, अनीति तुम्हें कभी नहीं सुहाती।

बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया॥

हे तात! नरकमें रहना भी अच्छा, पर विधाता दुष्टका साथ कभी न दे। विभीषणने कहा—हे रघुनाथ! अब आपके चरणोंके दर्शन पाकर मैं सचमुच कुशल हूँ, आपने अपना सेवक जानकर मुझपर कृपा की।

दोहा

तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥४६

जबतक जीव शोकके घर काम-वासनाको त्यागकर श्रीरामको नहीं भजता, तबतक उसे न कुशल मिलती है, न स्वप्नमें भी मनको शांति।

तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना॥जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा॥

लोभ, मोह, ईर्ष्या, मद और अहंकार-जैसे अनेक दुर्गुण तभीतक हृदयमें बसते हैं, जबतक धनुष-बाण और कमरमें तरकस धारण किए श्रीरघुनाथ हृदयमें नहीं बस जाते।

ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी॥तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं॥

ममता एक घनी अंधेरी रात है, जो राग-द्वेषरूपी उल्लुओंको ही सुख देती है। यह रात तभीतक जीवके मनमें छाई रहती है, जबतक प्रभुके प्रतापका सूर्य उदय नहीं होता।

अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे॥तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला॥

हे श्रीराम! आपके चरणकमलोंके दर्शनसे अब मैं सचमुच कुशल हूँ, मेरे सारे भारी भय मिट गए। हे कृपालु! आप जिसपर प्रसन्न होते हैं, उसे तीनों प्रकारके सांसारिक ताप कभी नहीं छूते।

मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ॥जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा॥

मैं अत्यंत नीच स्वभावका राक्षस हूँ, मैंने कभी कोई शुभ कर्म नहीं किया। पर जिनका रूप मुनियोंके ध्यानमें भी नहीं समाता, उन्हीं प्रभुने प्रसन्न होकर मुझे अपने हृदयसे लगा लिया।

दोहा

-अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।देखेउँ नयन बिरंचि सिव सेब्य जुगल पद कंज॥४७

मेरा असीम सौभाग्य है, हे कृपा और सुखके सागर श्रीराम! कि मैंने अपनी आँखोंसे ब्रह्मा और शिवजीद्वारा भी सेवित आपके युगल चरणकमल देख लिए।

सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ॥जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही॥

श्रीरामने कहा—हे सखा! सुनो, मैं तुम्हें अपना स्वभाव बताता हूँ, जिसे काकभुशुंडि, शिव और पार्वती भी जानते हैं। कोई मनुष्य चाहे संपूर्ण चराचर जगत्का द्रोही ही क्यों न हो, यदि वह भयभीत होकर मेरी शरणमें आ जाए,

तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना॥जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा॥

और मद, मोह तथा नाना छल-कपट त्याग दे, तो मैं उसे तुरंत ही साधुके समान बना देता हूँ। माता, पिता, भाई, पुत्र, पत्नी, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार—

सब के ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥

इन सबके ममत्वके धागोंको बटोरकर, उन्हें एक डोरीमें पिरोकर जो अपने मनको मेरे चरणोंमें बाँध देता है, जो समदर्शी है, जिसे कोई इच्छा नहीं और जिसके मनमें हर्ष, शोक, भय कुछ भी नहीं—

अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरे देह नहिं आन निहोरें॥

ऐसा सज्जन मेरे हृदयमें वैसे ही बस जाता है जैसे लोभीके हृदयमें धन बसा रहता है। तुम्हारे-जैसे संत ही मुझे प्रिय हैं, मैं किसी और आग्रहवश देह धारण नहीं करता।

दोहा

सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥४८

जो सगुण भगवान्के उपासक हैं, दूसरोंके हितमें रत रहते हैं, नीति-नियमोंमें दृढ़ हैं और ब्राह्मणोंके चरणोंमें जिनका प्रेम है—वे मनुष्य मेरे प्राणोंके समान प्रिय हैं।

सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें॥राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा॥

हे लंकापति! सुनो, ये सब गुण तुममें हैं, इसीलिए तुम मुझे अत्यंत प्रिय हो। श्रीरामके ये वचन सुनकर वानरदल जय-जयकार करने लगा—कृपासागर श्रीरामकी जय हो!

सुनत बिभीषनु प्रभु के बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी॥पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा॥

प्रभुकी यह वाणी सुनते हुए विभीषण उसे कानोंके लिए अमृत मानकर तृप्त ही नहीं हो पा रहे थे। वे बार-बार श्रीरामके चरणकमल पकड़ लेते, उनका प्रेम इतना अपार था कि हृदयमें समाता नहीं था।

सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी॥उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥

विभीषणने कहा—हे देव! हे चराचर जगत्के स्वामी! हे शरणागतोंके रक्षक! हे अंतर्यामी! सुनिए, मेरे हृदयमें जो पहलेकी वासनाएँ थीं, वे सब आपके चरणप्रेमकी धारामें बह गईं।

अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी॥एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा॥

अब हे कृपालु! मुझे अपनी वह पवित्र भक्ति दीजिए, जो शिवजीके मनको भी सदा प्रिय है। 'एवमस्तु' कहकर रणधीर प्रभुने तुरंत समुद्रका जल मँगवाया।

जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं॥अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा॥

और कहा—हे सखा! यद्यपि तुम्हारी इच्छा नहीं थी, फिर भी मेरा दर्शन इस जगत्में कभी निष्फल नहीं जाता। यह कहकर श्रीरामने उन्हें राजतिलक कर दिया, आकाशसे फूलोंकी अपार वर्षा होने लगी।

दोहा

रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड॥४९(क)

श्रीरामने रावणके क्रोधरूपी अग्निमें, जो विभीषणकी ही साँसों-वचनोंसे प्रचंड हो उठी थी, जलते हुए विभीषणको बचा लिया और उन्हें अखंड राज्य प्रदान किया।

दोहा

जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिए दस माथ।सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ॥४९(ख)

शिवजीने जो संपत्ति रावणको उसके दसों सिर बलि चढ़ाने पर दी थी, वही संपत्ति श्रीरघुनाथने संकोचसे भरकर विभीषणको सौंप दी।

अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना॥निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा॥

ऐसे परम कृपालु प्रभुको छोड़कर जो दूसरोंको भजते हैं, वे बिना सींग-पूँछके पशु ही हैं। अपना सेवक जानकर श्रीरामने विभीषणको अपना लिया—प्रभुका यह स्वभाव सारे वानरकुलके मनको भा गया।

पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी॥बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक॥

फिर सर्वज्ञ, सबके हृदयमें बसनेवाले, सर्वरूप, सबसे परे, उदासीन और भक्तोंके लिए ही मनुष्यरूप धरनेवाले, राक्षसकुलका नाश करनेवाले श्रीराम नीतिकी रक्षा करते हुए बोले—

सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा॥संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती॥

हे वीर सुग्रीव और लंकापति विभीषण! सुनो, इस गहरे समुद्रको कैसे पार किया जाए? मगर, साँप और मछलियोंसे भरा यह अथाह समुद्र हर तरहसे दुर्गम है।

कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक॥जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई॥

विभीषणने कहा—हे रघुनाथ! सुनिए, यद्यपि आपका एक ही बाण करोड़ों समुद्रोंको सोख सकता है, फिर भी नीति यही कहती है कि पहले जाकर समुद्रसे विनतीपूर्वक अनुरोध किया जाए।

दोहा

प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि॥५०

हे प्रभु! समुद्र तो आपके ही कुलके पूर्वज हैं, वे विचारकर उपाय बता देंगे, जिससे सारी भालू-वानर सेना बिना किसी परिश्रमके समुद्र पार कर जाएगी।

सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ देव जौं होइ सहाई॥मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा॥

श्रीरामने कहा—हे सखा! तुमने अच्छा उपाय सुझाया है, यदि दैव सहायक हुआ तो यही किया जाएगा। यह सलाह लक्ष्मणको तनिक भी न भाई, श्रीरामके ये वचन सुनकर उन्हें बड़ा दुःख हुआ।

नाथ देव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा॥

लक्ष्मणने कहा—हे नाथ! भला दैवका क्या भरोसा! मनमें क्रोध लाकर समुद्रको सुखा ही डालिए। यह 'दैव' तो बस कायरके मनका सहारा है, आलसी लोग ही दैव-दैव पुकारते फिरते हैं।

सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा॥अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई॥

यह सुनकर रघुवीर हँसते हुए बोले—ऐसा ही करेंगे, तुम धैर्य रखो। यह कहकर प्रभुने छोटे भाईको समझाया और स्वयं समुद्रके निकट चले गए।

प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई॥जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए॥

उन्होंने पहले सिर नवाकर समुद्रको प्रणाम किया, फिर तटपर कुश बिछाकर बैठ गए। इधर ज्यों ही विभीषण प्रभुके पास पहुँचे थे, त्यों ही रावणने उनके पीछे गुप्तचर भेज दिए थे।

दोहा

सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह॥५१

वानरका कपटरूप धरकर उन गुप्तचरोंने यह सारी लीला अपनी आँखों देखी और मनहीमन प्रभुके गुणों तथा शरणागतपर उनके अपार स्नेहकी सराहना करने लगे।

प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ॥रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने॥

वे खुलेआम भी अत्यंत प्रेमसे श्रीरामके स्वभावकी प्रशंसा करने लगे, यहाँतक कि अपना छद्मवेश भी भूल बैठे। तभी वानरोंने पहचान लिया कि ये शत्रुके गुप्तचर हैं, और उन्हें बाँधकर सुग्रीवके पास ले आए।

कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर॥सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए॥

सुग्रीवने कहा—सुनो वानरो, इन राक्षसोंके अंग-भंग करके भेज दो। यह सुनते ही वानर दौड़ पड़े और दूतोंको बाँधकर पूरी सेनाके चारों ओर घुमाया।

बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे॥जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना॥

वानर उन्हें भाँति-भाँतिसे पीड़ा देने लगे, वे दीन होकर गिड़गिड़ाते रहे, फिर भी वानरोंने न छोड़ा। तब उन्होंने पुकारा—जो हमारे नाक-कान काटेगा, उसे कोसलाधीश श्रीरामकी शपथ है!

सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोडाए॥रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती॥

यह सुनकर लक्ष्मणने सबको अपने पास बुलवाया, उन्हें दया आ गई और हँसते हुए उन्हें तुरंत छोड़ दिया। कहा—रावणके हाथ यह संदेश देना, हे कुलघातक! लक्ष्मणका यह वचन ध्यानसे सुनो।

दोहा

कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार॥५२

मूर्खसे मुँहज़बानी मेरा यह उदार संदेश कह देना—सीताको लौटाकर श्रीरामसे मिल जाओ, नहीं तो समझ लो तुम्हारा अंत निकट आ गया है।

तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा॥कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए॥

लक्ष्मणके चरणोंमें मस्तक नवाकर, श्रीरामके गुणोंकी कथा कहते हुए दूत तुरंत चल पड़े। श्रीरामके यशका बखान करते हुए वे लंका पहुँचे और रावणके चरणोंमें सिर नवाया।

बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता॥पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी॥

रावणने हँसते हुए पूछा—अरे शुक! अपनी कुशल तो बता, फिर विभीषणका भी समाचार सुना, जिसकी मृत्यु अब बिलकुल निकट आ पहुँची है।

करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी॥पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई॥

मूर्खने राज्य करते हुए लंका त्याग दी, अब वह अभागा घुनकी तरह पिस जाएगा। फिर मुझे भालू-वानरोंकी सेनाका हाल बता, जो काल-प्रेरित यहाँ चली आई है।

जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा॥कहु तपसिन्ह के बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी॥

जिनके जीवनका सहारा बस यह बेचारा कोमलहृदय समुद्र ही बन गया है (वरना अबतक मारे जा चुके होते)। फिर उन तपस्वियोंका हाल बता, जिनके हृदयमें मेरा बड़ा भारी भय रहता है—

दोहा

की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर॥५३

उनसे तुम्हारी भेंट हुई, या वे मेरा सुयश सुनकर ही लौट गए? शत्रुसेनाके तेज-बलका वर्णन क्यों नहीं करता? तेरा चित्त तो बहुत ही चकित दिख रहा है।

नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें॥मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा॥

दूतने कहा—हे नाथ! जैसे आपने कृपापूर्वक पूछा है, वैसे ही क्रोध छोड़कर मेरी बात मान लीजिए—आपका छोटा भाई जैसे ही श्रीरामसे जा मिला, वहाँ पहुँचते ही उन्होंने उसे राजतिलक कर दिया।

रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना॥श्रवन नासिका काटे लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे॥

हम रावणके दूत हैं, यह सुनते ही वानरोंने हमें बाँधकर बहुत सताया, यहाँतक कि नाक-कान काटने लगे थे। श्रीरामकी शपथ दिलाकर ही किसी तरह हमें छुड़ाया गया।

पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई॥नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी॥

हे नाथ! आपने श्रीरामकी सेनाके विषयमें पूछा—पर उसे तो सौ करोड़ मुखोंसे भी वर्णन नहीं किया जा सकता। नाना रंगोंके भालू-वानरोंकी वह सेना विकराल मुख और विशाल शरीरवाली, अत्यंत भयंकर है।

जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा॥अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला॥

जिसने नगर जलाया और आपके पुत्र अक्षयकुमारको मारा, उसका बल तो उस सेनामें सबसे कम है। वहाँ असंख्य नामोंवाले भयंकर योद्धा हैं, जिनमें अनगिनत हाथियोंका बल भरा है।

दोहा

द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि॥५४

द्विविद, मयंद, नील, नल, अंगद, गद, विकटास्य, दधिमुख, केसरी, निशठ, शठ और जाम्बवान्—ये सब बलकी साक्षात् राशि हैं।

ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना॥राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीं॥

ये सब वानर सुग्रीवके समान बलशाली हैं, और इनके जैसे करोड़ों हैं—इतनी बड़ी संख्या गिने भी तो कौन! श्रीरामकी कृपासे उनमें अतुलनीय बल है, वे तीनों लोकोंको तिनकेके समान तुच्छ समझते हैं।

अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर॥नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं॥

हे दशग्रीव! मैंने तो यही सुना है कि अकेले अठारह पद्म वानर तो केवल सेनापति ही हैं। हे नाथ! उस सेनामें ऐसा कोई वानर नहीं जो युद्धमें आपको न जीत सके।

परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा॥सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला॥

वानर सब अत्यन्त क्रोधमें हाथ मलते हैं, पर श्रीरघुनाथजी उन्हें युद्धकी आज्ञा नहीं देते। वे कहते हैं—हम मछलियों-साँपोंसहित समुद्रको ही सोख डालेंगे, नहीं तो बड़े-बड़े पहाड़ भरकर इसे पाट देंगे।

मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा॥गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका॥

और रावणको मसलकर धूलमें मिला देंगे—सब वानर इसी तरहके वचन बोल रहे हैं। वे स्वभावसे ही निर्भय गरज-तर्ज रहे हैं, मानो लंकाको निगल ही जाना चाहते हों।

दोहा

सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम॥५५

वानर-भालू तो स्वभावसे ही शूरवीर हैं, ऊपरसे उनके सिरपर स्वयं प्रभु श्रीराम विराजमान हैं। हे रावण! ऐसेमें वे युद्धमें करोड़ों कालोंको भी जीत सकते हैं।

राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई॥सक सर एक सोधि सत सागर। तब भ्रातहि पूँछेउ नय नागर॥

श्रीरामके तेज, बल और बुद्धिकी अपार महिमाको सैकड़ों शेषनाग भी नहीं गा सकते। वे एक ही बाणसे सैकड़ों समुद्रोंको सोख सकते हैं, फिर भी नीतिनिपुण होनेके कारण तुम्हारे भाईसे राह पूछी है।

तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं॥सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा॥

तुम्हारे भाई विभीषणके वचन सुनकर वे कृपावश समुद्रसे मार्ग माँग रहे हैं। यह सुनते ही रावण हँस पड़ा और बोला—यदि ऐसी बुद्धि है तो वानरकी सहायतासे ही काम चलेगा!

सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई॥मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई॥

स्वभावसे डरपोक विभीषणकी बात मानकर उन्होंने समुद्रसे यह बालहठ ठानी है। अरे मूर्ख! झूठी बड़ाई क्यों करता है, मैंने तो शत्रुके बल-बुद्धिकी थाह पहले ही पा ली है।

सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें॥सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी॥

जिसका मन्त्री ही विभीषणकी तरह डरपोक हो, उसे संसारमें विजय और वैभव कहाँ मिल सकते हैं! दुष्ट रावणके ये वचन सुनकर दूतका क्रोध बढ़ गया, और अवसर देखकर उसने अपनी पत्रिका निकाली।

रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती॥बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन॥

और कहा—यह पत्रिका श्रीरामके छोटे भाई लक्ष्मणने भेजी है, हे नाथ! इसे पढ़कर अपना कलेजा ठंडा कीजिये। रावणने हँसकर उसे बायें हाथसे ले लिया और मन्त्रीको बुलाकर पढ़वाने लगा।

दोहा

बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस॥५६(क)

पत्रिकामें लिखा था—अरे मूर्ख! केवल मीठी बातोंसे मन बहलाकर अपने कुलका नाश मत कर। श्रीरामसे बैर करके तू विष्णु, ब्रह्मा और शिवकी शरणमें जाकर भी नहीं बच सकेगा।

दोहा

की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग॥५६(ख)

या तो अभिमान त्यागकर अपने छोटे भाई विभीषणकी भाँति प्रभुके चरण-कमलोंका भ्रमर बन जा, अन्यथा हे दुष्ट! अपने समूचे कुलसहित श्रीरामके बाणरूपी अग्निमें पतंगेकी तरह जलकर भस्म हो जायगा।

सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई॥भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा॥

पत्रिका सुनते ही रावण मनमें भयभीत हो उठा, परन्तु ऊपरसे मुसकराता हुआ सबको सुनाकर बोला—यह वैसे ही है जैसे कोई पृथ्वीपर पड़ा हुआ हाथसे आकाशको पकड़ना चाहे, या छोटा-सा तपस्वी अपनी गर्वीली शेखी बघारे।

कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी॥सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा॥

शुकने कहा—हे नाथ! अभिमान छोड़कर इस पत्रीमें लिखी सब बातोंको सत्य मान लीजिये। क्रोध त्यागकर मेरी बात सुनिये और श्रीरामसे यह बैर छोड़ दीजिये।

अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ॥मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही॥

श्रीरघुवीरका स्वभाव अत्यन्त कोमल है, यद्यपि वे समस्त लोकोंके स्वामी हैं। मिलते ही प्रभु आपपर कृपा करेंगे, आपका एक भी अपराध वे मनमें नहीं रखेंगे।

जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे॥जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही॥

बस इतना ही कीजिये कि जानकीजीको श्रीरघुनाथको लौटा दीजिये, प्रभु मेरी इतनी बात मान लें। ज्योंही उसने जानकीजीको लौटानेकी बात कही, त्योंही दुष्ट रावणने उसे लात मार दी।

नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ॥करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई॥

वह भी विभीषणकी ही तरह चरणोंमें सिर नवाकर वहीं चला गया जहाँ कृपासागर श्रीरघुनाथजी विराजते थे। प्रणाम करके उसने अपनी सारी कथा सुनायी और श्रीरामकी कृपासे अपनी सद्गति पायी।

रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी॥बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा॥

शिवजी कहते हैं—हे भवानी! वह ज्ञानी मुनि ही अगस्त्य ऋषिके शापसे राक्षस बना था। बार-बार श्रीरामके चरणोंकी वन्दना करके वह मुनि अपने आश्रमको लौट गया।

दोहा

बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥५७

इधर विनयको समुद्र तीन दिन बीतनेपर भी नहीं मानता। तब श्रीराम क्रोधसहित बोल उठे—बिना भय दिखाये प्रेम नहीं जागता!

लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू॥सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती॥

हे लक्ष्मण! धनुष-बाण ले आओ, मैं अग्निबाणसे इस समुद्रको सोख डालूँगा। मूर्खसे विनय करना, कुटिलसे प्रेम रखना और जन्मजात कंजूसको उदारताका उपदेश देना—

ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी॥क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा॥

ममतामें डूबे हुएको ज्ञानकी बात, अत्यन्त लोभीको वैराग्यकी शिक्षा और क्रोधीको शान्ति तथा कामीको भगवत्कथा सुनाना—इन सबका फल वैसा ही होता है जैसे ऊसर भूमिमें बीज बोनेका।

अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा॥संघानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥

ऐसा कहकर श्रीरघुनाथने धनुष चढ़ा लिया, यह निर्णय लक्ष्मणके मनको बहुत भाया। प्रभुने भयंकर बाणका संधान किया, जिससे समुद्रके हृदयमें आगकी लपटें उठ गयीं।

मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना॥

मगर, सर्प और मछलियोंके समूह व्याकुल हो उठे। जब समुद्रने अपने प्राणियोंको जलते देखा, तो वह सोनेके थालमें अनेक मणियाँ भरकर, अभिमान त्यागकर ब्राह्मणका रूप धरकर आ पहुँचा।

दोहा

काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच॥५८

काकभुशुण्डिजी कहते हैं—हे गरुड़! सुनो, केला तो चाहे कितने ही उपाय करके सींचो, काटनेपर ही फलता है; इसी तरह नीच विनयसे नहीं मानता, डाँटनेपर ही झुकता है।

सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥

समुद्रने भयभीत होकर प्रभुके चरण पकड़ लिये—हे नाथ! मेरे सब अपराध क्षमा कीजिये। आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—इन सबकी प्रकृति ही स्वभावसे जड़ है।

तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई॥

आपकी ही प्रेरणासे मायाने इन्हें सृष्टिके लिये रचा है, यही सब शास्त्रोंने गाया है। स्वामीकी जैसी आज्ञा जिसके लिये है, वह उसीमें रहकर सुख पाता है।

प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही॥ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥

प्रभुने मुझे दण्ड देकर भला ही किया, पर यह मर्यादा भी तो आपने ही बनायी है—कि ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और स्त्री, ये सब शिक्षाके ही अधिकारी हैं।

प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई॥प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई॥

प्रभुके प्रतापसे मैं सूख जाऊँगा और सेना पार उतर जायगी, इसमें मेरी कोई बड़ाई नहीं। फिर भी प्रभुकी आज्ञा तो वेदोंने भी अलंघ्य बतायी है, अतः जो आपको भाये वही शीघ्र कीजिये।

दोहा

सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।जेहि बिधि उतरे कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ॥५९

समुद्रके इतने विनम्र वचन सुनकर कृपालु श्रीरामने मुसकराकर कहा—हे तात! जिस विधिसे वानर-सेना पार उतर सके, वही उपाय बताओ।

नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई॥तिन्ह के परस किए गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥

समुद्रने कहा—हे नाथ! नील और नल नामके दो वानर भाई हैं, बचपनमें ही उन्हें एक ऋषिका आशीर्वाद मिला था। उनके छूते ही बड़े-बड़े पर्वत भी आपके प्रतापसे समुद्रपर तैरने लगेंगे।

मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई॥एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ॥

मैं भी प्रभुकी महिमाको हृदयमें धारणकर अपने बलभर सहायता करूँगा। हे नाथ! इस तरह समुद्रको बाँध दीजिये, जिससे यह सुयश तीनों लोकोंमें गाया जाय।

एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी॥सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा॥

इसी बाणसे मेरे उत्तर तटपर बसनेवाले पापी दुष्टोंका वध कर दीजिये। कृपालु और रणधीर श्रीरामने समुद्रकी यह पीड़ा सुनते ही तुरन्त उसे दूर कर दिया।

देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी॥सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा॥

श्रीरामका भारी बल-पौरुष देखकर समुद्र हर्षित और सुखी हो गया। उसने उन दुष्टोंका सारा चरित्र प्रभुको कह सुनाया, फिर चरणोंकी वन्दना करके वह अपने घर चला गया।

छंद

निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ॥सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥

समुद्र अपने घर लौट गया, श्रीरघुनाथको उसकी यह सलाह भा गयी। तुलसीदासने अपनी बुद्धिके अनुसार यह चरित्र गाया है, जो कलियुगके पापोंको हरनेवाला है। यह सुखका घर है, संशय मिटानेवाला और विषादका नाश करनेवाला श्रीरघुनाथका गुणगान है—इसे अपनी सब आशा-भरोसा छोड़कर मूर्ख मनवाले भी निरन्तर गायें और सुनें।

दोहा

सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥६०

श्रीरघुनाथका यह गुणगान समस्त शुभ मंगलोंको देनेवाला है। जो इसे आदरपूर्वक सुनेंगे, वे बिना किसी नौकाके ही भवसागरको पार कर जायँगे।

दोहा

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने पञ्चम: सोपान: समाप्तः।

कलियुगके सम्पूर्ण पापोंको विध्वंस करनेवाले श्रीरामचरितमानसका यह पाँचवाँ सोपान (सुन्दरकाण्ड) समाप्त हुआ।