प्रथम सोपान — भाग 2
बालकाण्ड
शिव-पार्वती संवाद, श्रीराम जन्म, बाल-लीला एवं श्रीसीता स्वयंवर की कथा।
बालकाण्ड — सुनें
बालकाण्ड — पढ़ें भी, सुनें भी
शिव-पार्वती संवाद, श्रीराम जन्म, बाल-लीला एवं श्रीसीता स्वयंवर की कथा।
यह कथा शीघ्र ही यहाँ सुनने हेतु भी उपलब्ध होगी
छंद सोरठा सुंदर दोहा। सोइ बहुरंग कमल कुल सोहा॥अरथ अनूप सुभाव सुभासा। सोइ पराग मकरंद सुबासा॥॥३॥
छंद, सोरठा और सुंदर दोहे मानो विविध रंगों के कमल-समूह हैं। अनुपम अर्थ, सुंदर भाव और मधुर भाषा ही इनकी पराग, मकरंद और सुगंध है।
सुकृत पुंज मंजुल अलि माला। ग्यान बिराग बिचार मराला॥धुनि अवरेब कबित गुन जाती। मीन मनोहर ते बहुभाँती॥॥४॥
पुण्य-समूह मानो सुंदर भ्रमरों की माला है, ज्ञान-वैराग्य और विचार हंस के समान हैं। काव्य की ध्वनि, अलंकार, गुण और छंद-जाति ही इसमें अनेक प्रकार की मनोहर मछलियाँ हैं।
अरथ धरम कामादिक चारी। कहब ग्यान बिग्यान बिचारी॥नव रस जप तप जोग बिरागा। ते सब जलचर चारु तड़ागा॥॥५॥
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — ये चारों पुरुषार्थ, तथा ज्ञान-विज्ञान का विचारपूर्वक कथन, और नवरस, जप, तप, योग और वैराग्य — ये सब इस सुंदर सरोवर के विविध जलचर जीव हैं।
सुकृती साधु नाम गुन गाना। ते बिचित्र जल बिहग समाना॥संतसभा चहुँ दिसि अवँराई। श्रद्धा रितु बसंत सम गाई॥॥६॥
पुण्यात्मा साधुजन जो नाम-गुण गाते हैं, वे मानो इस सरोवर के विचित्र जलपक्षी हैं। संत-समाज चारों दिशाओं में फैला बाग है, और श्रद्धा को वसंत ऋतु के समान बताया गया है।
भगति निरुपन बिबिध बिधाना। छमा दया दम लता बिताना॥सम जम नियम फूल फल ग्याना। हरि पद रति रस बेद बखाना॥॥७॥
भक्ति का विविध प्रकार से निरूपण, तथा क्षमा-दया-संयम — ये सब लताओं की छतरी हैं। शम, यम, नियम — फूल हैं, ज्ञान — फल है, और हरि-चरणों में प्रीति ही उसका रस है, ऐसा वेदों ने बखान किया है।
औरउ कथा अनेक प्रसंगा। तेइ सुक पिक बहुबरन बिहंगा॥॥८॥
इसके अतिरिक्त और भी अनेक कथा-प्रसंग हैं, वे सब मानो शुक-पिक जैसे नाना रंगों के पक्षी हैं।
पुलक बाटिका बाग बन सुख सुबिहंग बिहारु।माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारु॥३७॥
पुलकावली ही इस बाग-वाटिका का सुख है, जिसमें सुंदर पक्षी विहार करते हैं — भक्तों के सुंदर नेत्र ही माली हैं, जो स्नेह रूपी जल से इसे सींचते हैं।
जे गावहिं यह चरित सँभारे। ते एहि ताल चतुर रखवारे॥सदा सुनहिं सादर नर नारी। ते सुरबर मानस अधिकारी॥॥१॥
जो लोग इस चरित्र को सावधानी से गाते हैं, वे इस सरोवर के चतुर रखवाले हैं। जो नर-नारी सदा आदरपूर्वक इसे सुनते हैं, वे श्रेष्ठ देवताओं के समान इस मानस-सरोवर के अधिकारी हैं।
अति खल जे बिषई बग कागा। एहि सर निकट न जाहिं अभागा॥संबुक भेक सेवार समाना। इहाँ न बिषय कथा रस नाना॥॥२॥
जो अत्यंत दुष्ट, विषयी हैं, वे बगुले और कौवे के समान अभागे इस सरोवर के पास भी नहीं जाते। यहाँ सीप, मेंढक और शैवाल के समान नाना विषय-कथाओं का रस भी नहीं है।
तेहि कारन आवत हियँ हारे। कामी काक बलाक बिचारे॥आवत एहिं सर अति कठिनाई। राम कृपा बिनु आइ न जाई॥॥३॥
इसी कारण कौवे और बगुले जैसे बेचारे विषयी-कामी लोग, मन में हारकर, यहाँ आने से कतराते हैं। इस सरोवर तक आना अत्यंत कठिन है — श्रीराम की कृपा के बिना यहाँ आया ही नहीं जा सकता।
कठिन कुसंग कुपंथ कराला। तिन्ह के बचन बाघ हरि ब्याला॥गृह कारज नाना जंजाला। ते अति दुर्गम सैल बिसाला॥॥४॥
कठिन कुसंगति ही भयंकर कुमार्ग है, और दुष्टों के वचन मानो बाघ, सिंह और सर्प हैं। घर-गृहस्थी के नाना जंजाल ही मार्ग में विशाल दुर्गम पर्वत हैं।
बन बहु बिषम मोह मद माना। नदीं कुतर्क भयंकर नाना॥॥५॥
मोह, मद और अभिमान अनेक विषम वन हैं, और कुतर्क अनेक भयंकर नदियाँ हैं।
जे श्रद्धा संबल रहित नहिं संतन्ह कर साथ।तिन्ह कहुँ मानस अगम अति जिन्हहि न प्रिय रघुनाथ॥३८॥
जो श्रद्धा रूपी संबल से रहित हैं और जिन्हें संतों का साथ नहीं मिला — जिन्हें श्रीरघुनाथ प्रिय नहीं, उनके लिए यह मानस-सरोवर अत्यंत दुर्गम है।
जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोई। जातहिं नीद जुड़ाई होई॥जड़ता जाड़ बिषम उर लागा। गएहुँ न मज्जन पाव अभागा॥॥१॥
यदि कोई कष्ट सहकर वहाँ पहुँच भी जाए, तो जाते ही उसे शीतलता की जगह नींद जैसा आलस्य घेर लेता है। जड़ता और भयंकर जाड़ा हृदय में समा जाते हैं, और वह अभागा वहाँ पहुँचकर भी स्नान नहीं कर पाता।
करि न जाइ सर मज्जन पाना। फिरि आवइ समेत अभिमाना॥जौं बहोरि कोउ पूछन आवा। सर निंदा करि ताहि बुझावा॥॥२॥
वह न तो स्नान कर पाता है, न जल पी पाता है, और अभिमान सहित वापस लौट आता है। यदि फिर कोई उससे उस सरोवर के बारे में पूछे, तो वह सरोवर की निंदा करके ही उसे समझा देता है।
सकल बिघ्न ब्यापहि नहिं तेही। राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही॥सोइ सादर सर मज्जनु करई। महा घोर त्रयताप न जरई॥॥३॥
जिसे श्रीराम अपनी कृपा-दृष्टि से देखते हैं, उसे कोई विघ्न नहीं सताता — वही आदरपूर्वक इस सरोवर में स्नान कर पाता है, और फिर महाघोर त्रिविध ताप उसे नहीं जलाता।
ते नर यह सर तजहिं न काऊ। जिन्ह के राम चरन भल भाऊ॥जो नहाइ चह एहिं सर भाई। सो सतसंग करउ मन लाई॥॥४॥
जिनका श्रीराम के चरणों में सच्चा प्रेम है, वे इस सरोवर को कभी नहीं छोड़ते। हे भाई, जो इस सरोवर में स्नान करना चाहे, उसे मन लगाकर सत्संग करना चाहिए।
अस मानस मानस चख चाही। भइ कबि बुद्धि बिमल अवगाही॥भयउ हृदयँ आनंद उछाहू। उमगेउ प्रेम प्रमोद प्रबाहू॥॥५॥
इस प्रकार मन की आँखों से इस मानस-सरोवर को निहारकर, कवि की बुद्धि निर्मल होकर उसमें डूब गई। हृदय में आनंद और उत्साह भर आया, और प्रेम व आनंद का प्रवाह उमड़ पड़ा।
चली सुभग कबिता सरिता सो। राम बिमल जस जल भरिता सो॥सरजू नाम सुमंगल मूला। लोक बेद मत मंजुल कूला॥॥६॥
उसी से यह सुंदर काव्य रूपी नदी बह चली, जो श्रीराम के निर्मल यश रूपी जल से भरी है। इसका नाम सरयू है — जो सुमंगल का मूल है, और लोक-वेद के मत ही इसके सुंदर तट हैं।
नदी पुनीत सुमानस नंदिनि। कलिमल तृन तरु मूल निकंदिनि॥॥७॥
यह पवित्र नदी मानस-सरोवर की पुत्री है, जो कलियुग के पापरूपी घास-वृक्षों को जड़ से उखाड़ फेंकने वाली है।
श्रोता त्रिबिध समाज पुर ग्राम नगर दुहुँ कूल।संतसभा अनुपम अवध सकल सुमंगल मूल।॥३९॥
तीन प्रकार के श्रोता-समाज ही गाँव-नगर हैं, दोनों किनारे हैं, और अनुपम संत-सभा ही अयोध्या नगरी है — यह सब सुमंगल का मूल है।
रामभगति सुरसरितहि जाई। मिली सुकीरति सरजु सुहाई॥॥१॥
यह सुंदर कीर्ति रूपी सरयू नदी बहते-बहते जाकर राम-भक्ति रूपी गंगा में मिल गई।
सानुज राम समर जसु पावन। मिलेउ महानदु सोन सुहावन॥
छोटे भाई लक्ष्मण सहित श्रीराम का युद्ध-यश पावन है, मानो सोन नामक विशाल और सुंदर नदी में जा मिला हो।
जुग बिच भगति देवधुनि धारा। सोहति सहित सुबिरति बिचारा॥त्रिबिध ताप त्रासक तिमुहानी। राम सरुप सिंधु समुहानी॥॥२॥
दोनों धाराओं के बीच भक्ति रूपी गंगा-धारा वैराग्य और सद्विचार सहित शोभा पाती है। यह त्रिविध ताप को डराने वाला त्रिवेणी-संगम है, जो श्रीराम-स्वरूप रूपी समुद्र की ओर बढ़ता है।
मानस मूल मिली सुरसरिही। सुनत सुजन मन पावन करिही॥बिच बिच कथा बिचित्र बिभागा। जनु सरि तीर तीर बन बागा॥॥३॥
मानस-सरोवर से निकली यह नदी गंगा में जाकर मिल गई, इसे सुनकर सज्जनों का मन पावन हो जाएगा। बीच-बीच में जो विचित्र उप-कथाएँ आती हैं, वे मानो नदी तट पर बने वन-बाग हैं।
उमा महेस बिबाह बराती। ते जलचर अगनित बहुभाँती॥रघुबर जनम अनंद बधाई। भवँर तरंग मनोहरताई॥॥४॥
पार्वती-शिव विवाह की बारात ही मानो नदी में असंख्य प्रकार के जलचर जीव हैं। श्रीरघुनाथजी के जन्म का आनंद और बधाई ही नदी की मनोहर लहरें हैं।
बालचरित चहु बंधु के बनज बिपुल बहुरंग।नृप रानी परिजन सुकृत मधुकर बारिबिहंग॥४०॥
चारों भाइयों के बालचरित्र ही नदी में खिले अनेक रंगों के प्रचुर कमल हैं, और राजा-रानी तथा परिजनों के पुण्य ही इस जल पर मँडराते भ्रमर और जलपक्षी हैं।
सीय स्वयंबर कथा सुहाई। सरित सुहावनि सो छबि छाई॥नदी नाव पटु प्रस्न अनेका। केवट कुसल उतर सबिबेका॥॥१॥
सीता-स्वयंवर की सुहावनी कथा ही इस सुंदर नदी की छटा है। नदी में नाव के समान अनेक कुशल प्रश्न हैं, और उनके विवेकपूर्ण उत्तर मानो कुशल केवट हैं।
सुनि अनुकथन परस्पर होई। पथिक समाज सोह सरि सोई॥घोर धार भृगुनाथ रिसानी। घाट सुबद्ध राम बर बानी॥॥२॥
इसे सुनकर लोगों में परस्पर चर्चा होती है, जिससे यह नदी पथिक-समाज से सुशोभित होती है। परशुरामजी का क्रोध ही इसकी भयंकर धारा है, और श्रीराम की सुंदर वाणी इसके सुदृढ़ घाट हैं।
सानुज राम बिबाह उछाहू। सो सुभ उमग सुखद सब काहू॥कहत सुनत हरषहिं पुलकाहीं। ते सुकृती मन मुदित नहाहीं॥॥३॥
लक्ष्मण सहित श्रीराम के विवाह का उत्साह ही इस नदी की शुभ बाढ़ है, जो सबको सुख देती है। इसे कहते-सुनते जो हर्षित और पुलकित होते हैं, वे पुण्यात्मा ही प्रसन्न मन से इसमें स्नान करते हैं।
राम तिलक हित मंगल साजा। परब जोग जनु जुरे समाजा॥काई कुमति केकई केरी। परी जासु फल बिपति घनेरी॥॥४॥
श्रीराम के राजतिलक के मंगल-आयोजन ही मानो पर्व के अवसर पर जुटा हुआ समाज है। कैकेयी की कुबुद्धि ही इस नदी की काई है, जिसके फलस्वरूप भारी विपत्ति आ पड़ी।
समन अमित उतपात सब भरतचरित जपजाग।कलि अघ खल अवगुन कथन ते जलमल बग काग॥४१॥
भरतजी का चरित्र और उनका जप-यज्ञ असंख्य उत्पातों को शांत करने वाला है। कलियुग के पाप और दुष्टों के अवगुणों का वर्णन ही इस जल की गंदगी और बगुले-कौवे हैं।
कीरति सरित छहूँ रितु रूरी। समय सुहावनि पावनि भूरी॥हिम हिमसैलसुता सिव ब्याहू। सिसिर सुखद प्रभु जनम उछाहू।॥॥१॥
यह कीर्ति-नदी छहों ऋतुओं में सुंदर है, समय-समय पर सुहावनी और अत्यंत पावन है। हेमंत ऋतु पार्वती-शिव विवाह के समान है, और शिशिर ऋतु प्रभु के जन्मोत्सव के समान सुखद है।
बरनब राम बिबाह समाजू। सो मुद मंगलमय रितुराजू॥ग्रीषम दुसह राम बनगवनू। पंथकथा खर आतप पवनू॥॥२॥
श्रीराम-विवाह के समाज का वर्णन ही आनंद-मंगलमय वसंत ऋतु है। श्रीराम का दुःसह वनगमन ग्रीष्म ऋतु के समान है, और वन-मार्ग की कथा उसकी तीखी धूप और गर्म हवा के समान है।
बरषा घोर निसाचर रारी। सुरकुल सालि सुमंगलकारी॥राम राज सुख बिनय बड़ाई। बिसद सुखद सोइ सरद सुहाई॥॥३॥
राक्षसों से घोर युद्ध वर्षा ऋतु के समान है, जो देवकुल रूपी धान की फसल के लिए मंगलकारी है। राम-राज्य का सुख, विनय और महिमा ही निर्मल, सुखद शरद ऋतु के समान सुहावनी है।
सती सिरोमनि सिय गुनगाथा। सोइ गुन अमल अनूपम पाथा॥भरत सुभाउ सुसीतलताई। सदा एकरस बरनि न जाई॥॥४॥
सतियों में शिरोमणि सीताजी के गुणों की गाथा ही इस जल की निर्मल, अनुपम गुणवत्ता है। भरतजी का स्वभाव इसकी शीतलता है, जो सदा एकरस है और जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
अवलोकनि बोलनि मिलनि प्रीति परसपर हास।भायप भलि चहु बंधु की जल माधुरी सुबास॥४२॥
आपस में देखना, बोलना, मिलना, प्रेम और हँसी-मजाक — चारों भाइयों का यह सुंदर भाईचारा ही इस जल की मिठास और सुगंध है।
आरति बिनय दीनता मोरी। लघुता ललित सुबारि न थोरी॥अदभुत सलिल सुनत गुनकारी। आस पिआस मनोमल हारी॥॥१॥
मेरी व्याकुलता, विनती और दीनता ही इस सुंदर जल की सरलता है, जो कुछ कम नहीं। यह अद्भुत जल सुनने मात्र से गुणकारी है, जो आशा रूपी प्यास और मन के मैल को हर लेता है।
राम सुप्रेमहि पोषत पानी। हरत सकल कलि कलुष गलानी॥भव श्रम सोषक तोषक तोषा। समन दुरित दुख दारिद दोषा॥॥२॥
यह जल श्रीराम के प्रति सुंदर प्रेम को पोषित करता है, और कलियुग के समस्त पाप-ग्लानि को हर लेता है। यह संसार के श्रम को सोखने वाला और संतोष को तृप्त करने वाला है, तथा पाप, दुख, दरिद्रता और दोषों को शांत करने वाला है।
काम कोह मद मोह नसावन। बिमल बिबेक बिराग बढ़ावन॥सादर मज्जन पान किए तें। मिटहिं पाप परिताप हिए तें॥॥३॥
यह काम, क्रोध, मद और मोह का नाश करने वाला है, और निर्मल विवेक तथा वैराग्य को बढ़ाने वाला है। इसमें आदरपूर्वक स्नान और पान करने से हृदय के पाप और संताप मिट जाते हैं।
जिन्ह एहि बारि न मानस धोए। ते कायर कलिकाल बिगोए॥तृषित निरखि रबि कर भव बारी। फिरिहहि मृग जिमि जीव दुखारी॥॥४॥
जिन्होंने इस जल से अपना मन नहीं धोया, वे कायर कलिकाल के हाथों नष्ट हो गए। जैसे प्यासा हिरण मृगतृष्णा के जल की ओर भटकता है, वैसे ही वे दुखी जीव इधर-उधर भटकते रहेंगे।
मति अनुहारि सुबारि गुन गन गनि मन अन्हवाइ।सुमिरि भवानी संकरहि कह कबि कथा सुहाइ॥४३(क)॥
अपनी बुद्धि के अनुसार इस सुंदर जल के गुण-समूह गिनकर और मन को उसमें स्नान कराकर, पार्वती-शिवजी का स्मरण कर, कवि अब यह सुहावनी कथा कहता है।
अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि पाइ प्रसाद।कहउँ जुगल मुनिबर्ज कर मिलन सुभग संबाद॥४३(ख)॥
अब श्रीरघुनाथजी के चरण-कमलों को हृदय में धारण कर, उनका प्रसाद पाकर, मैं दोनों श्रेष्ठ मुनियों के मिलन का सुंदर संवाद कहता हूँ।
भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा। तिन्हहि राम पद अति अनुरागा॥तापस सम दम दया निधाना। परमारथ पथ परम सुजाना॥॥१॥
भरद्वाज मुनि प्रयाग में निवास करते हैं, जिन्हें श्रीराम के चरणों में अत्यंत प्रेम है। वे तपस्वी, शम-दम और दया के भंडार तथा परमार्थ के मार्ग में परम सुज्ञ हैं।
माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई॥देव दनुज किंनर नर श्रेनी। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं॥॥२॥
जब माघ मास में सूर्य मकर राशि में आता है, तब सभी लोग तीर्थराज प्रयाग आते हैं। देवता, दानव, किन्नर और मनुष्यों की पंक्तियाँ आदरपूर्वक त्रिवेणी में स्नान करती हैं।
पूजहि माधव पद जलजाता। परसि अखय बटु हरषहिं गाता॥भरद्वाज आश्रम अति पावन। परम रम्य मुनिबर मन भावन॥॥३॥
वे माधव के चरण-कमलों की पूजा करते हैं, अक्षयवट का स्पर्श कर उनका शरीर पुलकित हो उठता है। भरद्वाज मुनि का आश्रम अत्यंत पावन, परम रमणीय और श्रेष्ठ मुनियों के मन को भाने वाला है।
तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा। जाहिं जे मज्जन तीरथराजा॥मज्जहिं प्रात समेत उछाहा। कहहिं परसपर हरि गुन गाहा॥॥४॥
जो लोग तीर्थराज प्रयाग में स्नान करने जाते हैं, वहाँ मुनियों-ऋषियों का समागम होता है। वे प्रातःकाल उत्साहपूर्वक स्नान करते हैं और आपस में हरि की गुण-गाथाएँ कहते हैं।
ब्रह्म निरूपम धरम बिधि बरनहिं तत्त्व बिभाग।कहहिं भगति भगवंत कै संजुत ग्यान बिराग॥४४॥
वे ब्रह्म का निरूपण करते हैं, धर्म-विधि और तत्त्वों के भेद का वर्णन करते हैं, तथा ज्ञान-वैराग्य सहित भगवान की भक्ति का वर्णन करते हैं।
एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं। पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं॥प्रति संबत अति होइ अनंदा। मकर मज्जि गवनहिं मुनिबृंदा॥॥१॥
इस प्रकार पूरे माघ मास स्नान करके, फिर सब अपने-अपने आश्रमों को लौट जाते हैं। प्रत्येक वर्ष यह अत्यंत आनंददायी होता है — मकर स्नान करके मुनि-समूह अपने स्थान को चले जाते हैं।
एक बार भरि मकर नहाए। सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए॥जगबालिक मुनि परम बिबेकी। भरद्वाज राखे पद टेकी॥॥२॥
एक बार मकर-स्नान पूरा करके सभी मुनीश्वर अपने आश्रमों को चले गए। परम विवेकी याज्ञवल्क्य मुनि को भरद्वाज मुनि ने चरण पकड़कर रोक लिया।
सादर चरन सरोज पखारे। अति पुनीत आसन बैठारे॥करि पूजा मुनि सुजस बखानी। बोले अति पुनीत मृदु बानी॥॥३॥
उन्होंने आदरपूर्वक याज्ञवल्क्य मुनि के चरण-कमल धोए और अत्यंत पवित्र आसन पर बैठाया। पूजा करके और मुनि के सुयश का बखान करके, वे अत्यंत पवित्र और कोमल वाणी में बोले।
नाथ एक संसउ बड़ मोरें। करगत बेदतत्व सबु तोरें॥कहत सो मोहि लागत भय लाजा। जौं न कहउँ बड़ होइ अकाजा॥॥४॥
हे नाथ, मेरे मन में एक बड़ा संशय है, यद्यपि वेद का सारा तत्त्व आपकी मुट्ठी में है। उसे कहने में मुझे भय और लज्जा लगती है, पर यदि न कहूँ तो बड़ी हानि होगी।
संत कहहिं असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव।होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किए दुराव॥४५७॥
संतजन ऐसी नीति कहते हैं, और वेद-पुराण तथा मुनि भी यही गाते हैं कि गुरु से कुछ छिपाने पर हृदय में निर्मल विवेक नहीं होता।
अस बिचारि प्रगटउँ निज मोहू। हरहु नाथ करि जन पर छोहू॥राम नाम कर अमित प्रभावा। संत पुरान उपनिषद गावा॥॥१॥
ऐसा विचारकर मैं अपना मोह प्रकट करता हूँ — हे नाथ, अपने सेवक पर स्नेह करके इसे दूर कीजिए। राम-नाम का अमित प्रभाव है, जिसे संत, पुराण और उपनिषद सभी गाते हैं।
संतत जपत संभु अबिनासी। सिव भगवान ग्यान गुन रासी॥आकर चारि जीव जग अहहीं। कासीं मरत परम पद लहहीं॥॥२॥
अविनाशी शिवजी निरंतर इसी नाम को जपते हैं — शिवजी भगवान ज्ञान और गुणों की राशि हैं। संसार में चारों योनियों के जीव, काशी में मरकर परम पद प्राप्त कर लेते हैं।
सुनि राम महिमा मुनिराया। सिव उपदेसु करत करि दाया॥रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही। कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही॥॥३॥
श्रीराम की महिमा सुनकर, हे मुनिराज, शिवजी दया करके उपदेश करते हैं। हे कृपानिधि, मैं आपसे पूछता हूँ — यह राम कौन प्रभु हैं, मुझे समझाकर कहिए।
एक राम अवधेस कुमारा। तिन्ह कर चरित बिदित संसारा॥नारि बिरहँ दुखु लहेउ अपारा। भयउ रोषु रन रावनु मारा॥॥४॥
एक राम तो अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र हैं, जिनका चरित्र संसार में विख्यात है। उन्होंने पत्नी के वियोग में अपार दुख सहा, फिर क्रोधित होकर युद्ध में रावण को मारा।
प्रभु सोइ राम कि अपर कोउ जाहि जपत त्रिपुरारि।सत्यधाम सर्बग्य तुम्ह कहहु बिबेकु बिचारि॥४६॥
क्या वही राम प्रभु हैं जिन्हें शिवजी जपते हैं, या कोई और? आप सत्यधाम और सर्वज्ञ हैं, विवेकपूर्वक विचारकर मुझे बताइए।
जैसे मिटै मोर भ्रम भारी। कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी॥जागबलिक बोले मुसुकाई। तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई॥॥१॥
जैसे मेरा यह भारी भ्रम मिट जाए, हे नाथ, वह कथा विस्तार से कहिए। याज्ञवल्क्य मुनि मुस्कुराकर बोले — तुम्हें तो श्रीरघुनाथजी की प्रभुता पहले से ही ज्ञात है।
राममगत तुम्ह मन क्रम बानी। चतुराई तुम्हारी मैं जानी॥चाहहु सुने राम गुन गूढ़ा। कीन्हिहु प्रस्न मनहुँ अति मूढ़ा॥॥२॥
तुम मन-वचन-कर्म से राम-भक्त हो, तुम्हारी चतुराई मैं जानता हूँ। तुम श्रीराम के गूढ़ गुण सुनना चाहते हो, इसीलिए मानो अनजान बनकर यह प्रश्न किया है।
तात सुनहु सादर मनु लाई। कहउँ राम के कथा सुहाई॥महामोहु महिषेसु बिसाला। रामकथा कालिका कराला॥॥३॥
हे तात, आदरपूर्वक मन लगाकर सुनो, मैं श्रीराम की सुहावनी कथा कहता हूँ। महामोह मानो विशाल यम है, और राम-कथा उसके लिए भयंकर काली देवी के समान है।
रामकथा ससि किरन समाना। संत चकोर करहिं जेहि पाना॥ऐसेइ संसय कीन्ह भवानी। महादेव तब कहा बखानी॥॥४॥
राम-कथा चन्द्रमा की किरणों के समान है, जिसे संत रूपी चकोर पीते हैं। ऐसा ही संशय पार्वतीजी ने भी किया था, तब महादेव ने उन्हें विस्तार से बताया था।
कहउँ सो मति अनुहारि अब उमा संभु संबाद।भयउ समय जेहि हेतु जेहि सुनु मुनि मिटिहि बिषाद॥४७॥
अब मैं अपनी बुद्धि के अनुसार वही पार्वती-शिव संवाद कहता हूँ — यह जिस समय और जिस कारण हुआ, हे मुनि, उसे सुनने से तुम्हारा विषाद मिट जाएगा।
एक बार त्रेता जुग माहीं। संभु गए कुंभज रिषि पाहीं॥संग सती जगजननि भवानी। पूजे रिषि अखिलेस्वर जानी॥॥१॥
एक बार त्रेता युग में शिवजी अगस्त्य मुनि के पास गए। साथ में जगत-जननी सती पार्वती भी थीं। ऋषि ने उन्हें संपूर्ण जगत का स्वामी जानकर पूजा की।
रामकथा मुनीबर्ज बखानी। सुनी महेस परम सुखु मानी॥रिषि पूछी हरिभगति सुहाई। कही संभु अधिकारी पाई॥॥२॥
श्रेष्ठ मुनि अगस्त्य ने राम-कथा का बखान किया, जिसे महादेव ने परम सुख मानकर सुना। फिर ऋषि ने सुंदर हरि-भक्ति के विषय में पूछा, और शिवजी ने उन्हें अधिकारी जानकर बताया।
कहत सुनत रघुपति गुन गाथा। कछु दिन तहाँ रहे गिरिनाथा॥मुनि सन बिदा मागि त्रिपुरारी। चले भवन सँग दच्छकुमारी॥॥३॥
श्रीरघुनाथजी की गुण-गाथा कहते-सुनते शिवजी वहाँ कुछ दिन रहे। फिर मुनि से विदा माँगकर, दक्ष-पुत्री सती के साथ शिवजी अपने धाम को चले।
तेहि अवसर भंजन महिभारा। हरि रघुबंस लीन्ह अवतारा॥पिता बचन तजि राजु उदासी। दंडक बन बिचरत अबिनासी॥॥४॥
उसी समय पृथ्वी का भार हरने के लिए विष्णु ने रघुवंश में अवतार लिया था। पिता के वचन का पालन करने के लिए राज्य त्यागकर, अविनाशी प्रभु उदासीन होकर दण्डक वन में विचरण कर रहे थे।
हृदय बिचारत जात हर केहि बिधि दरसनु होइ।गुप्त रूप अवतरेउ प्रभु गए जान सब कोइ॥४८(क)॥
जाते हुए शिवजी अपने हृदय में विचार कर रहे थे कि किस प्रकार दर्शन हो — क्योंकि प्रभु ने गुप्त रूप से अवतार लिया था, यह बात सब कोई नहीं जानते थे।
संकर उर अति छोभु सती न जानहिं मरमु सोइ।तुलसी दरसन लोभु मन डरु लोचन लालची॥४८(ख)॥
शिवजी के हृदय में अत्यंत हलचल थी, पर सती इस रहस्य को नहीं जानती थीं। तुलसीदास कहते हैं — मन में दर्शन का लोभ था, पर साथ ही डर भी था, फिर भी नेत्र लालची हो रहे थे।
रावन मरन मनुज कर जाचा। प्रभु बिधि बचनु कीन्ह चह साचा॥जौं नहिं जाउँ रहइ पछितावा। करत बिचारु न बनत बनावा॥॥१॥
रावण का वध मनुष्य के हाथों होना विधाता का वरदान था, प्रभु उस वचन को सत्य करना चाहते थे। यदि मैं दर्शन के लिए न जाऊँ तो पछतावा रहेगा — ऐसा विचार करते हुए भी कोई उपाय नहीं बन रहा था।
एहि बिधि भए सोचबस ईसा। तेहि समय जाइ दससीसा॥लीन्ह नीच मारीचहि संगा। भयउ तुरत सोइ कपट कुरंगा॥॥२॥
इस प्रकार शिवजी सोच में पड़े हुए थे, कि उसी समय रावण जाकर नीच मारीच को साथ ले गया, और वह तुरंत कपट-मृग बन गया।
करि छलु मूढ़ हरी बैदेही। प्रभु प्रभाउ तस बिदित न तेही॥मृग बधि बंधु सहित हरि आए। आश्रमु देखि नयन जल छाए॥॥३॥
उस मूर्ख रावण ने छल करके सीताजी का हरण कर लिया — उसे प्रभु के प्रभाव का ज्ञान नहीं था। मृग का वध करके श्रीराम भाई सहित आश्रम लौटे, तो आश्रम को सूना देखकर उनके नेत्रों में जल भर आया।
बिरह बिकल नर इव रघुराई। खोजत बिपिन फिरत दोउ भाई॥कबहूँ जोग बियोग न जाकें। देखा प्रगट बिरह दुख ताकें॥॥४॥
श्रीरघुनाथजी विरह से विकल होकर साधारण मनुष्य की भाँति दोनों भाई वन में सीता को खोजते फिरे। जिनका कभी संयोग-वियोग होता ही नहीं, उन्हीं में प्रत्यक्ष विरह का दुख देखा गया।
अति बिचित्र रघुपति चरित जानहिं परम सुजान।जे मतिमंद बिमोह बस हृदयँ धरहिं कछु आन॥४९॥
श्रीरघुनाथजी का यह अत्यंत विचित्र चरित्र परम सुज्ञ पुरुष ही जानते हैं — जो मंदबुद्धि मोहवश हृदय में कुछ और ही मान बैठते हैं, वे नहीं समझ पाते।
संभु समय तेहि रामहि देखा। उपजा हियँ अति हरषु बिसेषा॥भरि लोचन छबिसिंधु निहारी। कुसमय जानिन कीन्हि चिन्हारी॥॥१॥
उसी समय शिवजी ने श्रीराम को देखा, जिससे उनके हृदय में विशेष हर्ष उत्पन्न हुआ। नेत्र भरकर सौंदर्य-सागर को निहारा, पर असमय जानकर उन्होंने परिचय प्रकट नहीं किया।
जय सच्चिदानंद जग पावन। अस कहि चलेउ मनोज नसावन॥चले जात सिव सती समेता। पुनि पुनि पुलकत कृपानिकेता॥॥२॥
'हे सच्चिदानंद, जगत को पावन करने वाले, आपकी जय हो' — ऐसा कहकर कामदेव का नाश करने वाले शिवजी आगे बढ़ गए। सती सहित शिवजी चलते गए, और कृपानिधान शिवजी बार-बार पुलकित हो रहे थे।
सतीं सो दसा संभु के देखी। उर उपजा संदेहु बिसेषी॥संकरु जगतबंद्य जगदीसा। सुर नर मुनि सब नावत सीसा॥॥३॥
सतीजी ने शिवजी की यह दशा देखी, जिससे उनके हृदय में विशेष संदेह उत्पन्न हुआ — शिवजी तो जगत के वंदनीय, जगदीश्वर हैं, जिन्हें देवता, मनुष्य और मुनि सभी मस्तक झुकाते हैं।
तिन्ह नृपसुतहि कीन्ह परनामा। कहि सच्चिदानंद परधमा॥भए मगन छबि तासु बिलोकी। अजहुँ प्रीति उर रहति न रोकी॥॥४॥
उन्हीं शिवजी ने राजपुत्र राम को सच्चिदानंद परधाम कहकर प्रणाम किया, और उनकी छवि निहारकर मग्न हो गए — आज भी सतीजी को वह प्रीति हृदय में रोकी नहीं रह पाई।
ब्रह्म जो ब्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद।सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत बेद॥५०॥
जो ब्रह्म व्यापक, निर्मल, अजन्मा, अखंड, इच्छारहित और अभेद है, क्या वह देह धारण करके साधारण मनुष्य बन सकता है, जिसे वेद भी नहीं जान पाते?
बिष्नु जो सुर हित नरतनु धारी। सोउ सर्बग्य जथा त्रिपुरारी॥खोजइ सो कि अग्य इव नारी। ग्यानधाम श्रीपति असुरारी॥॥१॥
जो विष्णु देवताओं के हित के लिए मनुष्य-शरीर धारण किए हैं, वे शिवजी के समान ही सर्वज्ञ हैं। तो क्या वे ज्ञान के धाम, असुरों के शत्रु श्रीपति, अज्ञानी स्त्री की भाँति सीता को खोजेंगे?
संभुगिरा पुनि मृषा न होई। सिव सर्बग्य जान सबु कोई॥अस संसय मन भयउ अपारा। होई न हृदयँ प्रबोध प्रचारा॥॥२॥
फिर शिवजी के वचन भी झूठे नहीं हो सकते — शिवजी सर्वज्ञ हैं, यह सभी जानते हैं। इस प्रकार सतीजी के मन में अपार संशय उत्पन्न हो गया, और हृदय में कोई समाधान नहीं मिल रहा था।
जद्यपि प्रगट न कहेउ भवानी। हर अंतरजामी सब जानी॥सुनहि सती तव नारि सुभाऊ। संसय अस न धरिअ उर काऊ॥॥३॥
यद्यपि पार्वतीजी ने यह संशय प्रकट रूप से नहीं कहा, फिर भी अंतर्यामी शिवजी ने सब जान लिया। शिवजी बोले — हे सती, सुनो, यह तुम्हारा स्त्री-स्वभाव है, ऐसा संशय हृदय में कभी नहीं रखना चाहिए।
जासु कथा कुभंज रिषि गाई। भगति जासु मैं मुनिहि सुनाई॥सोइ मम इष्टदेव रघुबीरा। सेवत जाहि सदा मुनि धीरा॥॥४॥
जिनकी कथा अगस्त्य मुनि ने गाई थी, और जिनकी भक्ति मैंने मुनि को सुनाई थी — वही श्रीरघुवीर मेरे इष्टदेव हैं, जिनकी सेवा सदा धीर मुनि करते हैं।
मुनि धीर जोगी सिद्ध संतत बिमल मन जेहि ध्यावहीं।कहि नेति निगम पुरान आगम जासु कीरति गावहीं॥सोइ रामु ब्यापक ब्रह्म भुवन निकाय पति माया धनी।अवतरेउ अपने भगत हित निजतंत्र नित रघुकुलमनि॥
धीर मुनि, योगी और सिद्धजन निरंतर निर्मल मन से जिनका ध्यान करते हैं, और वेद-पुराण-आगम जिनकी कीर्ति 'नेति नेति' कहकर गाते हैं — वे ही राम व्यापक ब्रह्म, समस्त लोकों के स्वामी और माया के अधिपति हैं। रघुकुल के मणि उन्होंने अपने भक्तों के हित के लिए अपनी ही इच्छा से नित्य अवतार लिया है।
लाग न उर उपदेसु जदपि कहेउ सिव बार बहु।बोले बिहसि महेसु हरिमाया बलु जानि जियँ॥५१॥
यद्यपि शिवजी ने बार-बार समझाया, फिर भी सतीजी के हृदय में यह उपदेश नहीं बैठा। शिवजी हरि की माया का बल जानकर मन-ही-मन हँसकर बोले।
जौं तुम्हरें मन अति संदेहू। तौ किन जाइ परीछा लेहू॥तब लगि बैठ अहउँ बटछाहिं। जब लगि तुम्ह ऐहहु मोहि पाही॥॥१॥
यदि तुम्हारे मन में इतना अधिक संदेह है, तो जाकर परीक्षा क्यों नहीं ले लेतीं? तब तक मैं यहाँ बरगद की छाया में बैठा रहूँगा, जब तक तुम मेरे पास लौट न आओ।
जैसें जाइ मोह भ्रम भारी। करेहु सो जतनु बिबेक बिचारी॥चलीं सती सिव आयसु पाई। करहिं बिचारु करौं का भाई॥॥२॥
जिस प्रकार यह भारी मोह-भ्रम दूर हो, वैसा ही उपाय विवेकपूर्वक विचारकर करो। शिवजी की आज्ञा पाकर सती चल पड़ीं, और विचार करने लगीं कि अब क्या करूँ।
इहाँ संभु अस मन अनुमाना। दच्छसुता कहुँ नहिं कल्याना॥मोरेहु कहें न संसय जाहीं। बिधि बिपरीत भलाई नाहीं॥॥३॥
इधर शिवजी ने मन में अनुमान लगाया कि इसमें दक्षपुत्री सती का कल्याण नहीं है। मेरे कहने से भी संशय दूर नहीं हुआ — जब विधाता प्रतिकूल हों तो भलाई नहीं होती।
होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥अस कहि लगे जपन हरिनामा। गई सती जहँ प्रभु सुखधामा॥॥४॥
जो श्रीराम ने रचकर पहले ही निश्चित कर रखा है, वही होगा — तर्क करके शाखाएँ बढ़ाने से क्या लाभ? ऐसा कहकर शिवजी हरिनाम जपने लगे, और सती वहाँ गईं जहाँ सुखधाम प्रभु श्रीराम थे।
पुनि पुनि हृदयँ विचारु करि धरि सीता कर रुप।आगें होइ चलि पंथ तेहि जेहिं आवत नरभूप॥५२॥
बार-बार हृदय में विचार करके, सीताजी का रूप धारण कर, वे उसी मार्ग पर आगे जा खड़ी हुईं, जिस मार्ग से राजा श्रीराम आ रहे थे।
लछिमन दीख उमाकृत बेषा। चकित भए भ्रम हृदयँ बिसेषा॥कहि न सकत कछु अति गंभीरा। प्रभु प्रभाउ जानत मतिधीरा॥॥१॥
लक्ष्मणजी ने पार्वतीजी द्वारा धारण किया गया यह वेष देखा, तो हृदय में विशेष भ्रम के कारण चकित हो गए। पर वे अत्यंत गंभीर होने के कारण कुछ कह न सके, क्योंकि धीर बुद्धि वाले लक्ष्मणजी प्रभु का प्रभाव जानते थे।
सती कपटु जानेउ सुरस्वामी। सबदरसी सब अंतरजामी॥सुमिरत जाहि मिटइ अग्याना। सोइ सरबग्य रामु भगवाना॥॥२॥
देवताओं के स्वामी श्रीराम ने सती का यह कपट तुरंत पहचान लिया, क्योंकि वे सबके द्रष्टा और सबके अंतर्यामी हैं। जिनका स्मरण करते ही अज्ञान मिट जाता है, वे ही सर्वज्ञ भगवान राम हैं।
सती कीन्ह चह तहँ दुराऊ। देखहु नारि सुभाव प्रभाऊ॥निज माया बलु हृदयँ बखानी। बोले बिहसि रामु मृदु बानी॥॥३॥
सती अपने मन का भेद वहाँ छिपाना चाहती हैं—देखिए, यह है नारी-स्वभाव का प्रभाव। अपनी माया की शक्ति हृदय में विचारकर श्रीरामजी मुस्कराकर कोमल वाणी बोले।
जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामू। पिता समेत लीन्ह निज नामू॥कहेउ बहोरि कहाँ बृषकेतू। बिपिन अकेलि फिरहु केहि हेतू॥॥४॥
प्रभु ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और पिता समेत अपना नाम बताया। फिर पूछा—भगवान शिव कहाँ हैं? आप वन में अकेली किस कारण घूम रही हैं?
राम बचन मृदु गूढ़ सुनि उपजा अति संकोचु।सती सभीत महेस पहिं चलीं हृदयँ बड़ सोचु॥५३॥
श्रीराम के कोमल किन्तु गूढ़ वचन सुनकर सती को बड़ा संकोच हुआ। भयभीत मन से वे शिवजी के पास चलीं, हृदय में गहरी चिंता लिए।
मैं संकर कर कहा न माना। निज अग्यानु राम पर आना॥जाइ उतरु अब देह काहा। उर उपजा अति दारुन दाहा॥॥१॥
मैंने शिवजी की बात नहीं मानी और अपने अज्ञान का दोष श्रीराम पर मढ़ दिया। अब जाकर मैं क्या उत्तर दूँगी? हृदय में भारी संताप उठा।
जाना राम सतीं दुखु पावा। निज प्रभाउ कछु प्रगटि जनावा॥सतीं दीख कौतुकु मग जाता। आगें रामु सहित श्री भ्राता॥॥२॥
श्रीराम ने जान लिया कि सती को दुख हुआ है, तब उन्होंने अपना कुछ प्रभाव प्रकट कर दिखाया। मार्ग में जाते हुए सती ने एक अद्भुत दृश्य देखा—आगे श्रीराम, सीताजी और लक्ष्मणजी सहित।
फिरि चितवा पाछें प्रभु देखा। सहित बंधु सिय सुंदर वेषा॥जहँ चितवहिं तहँ प्रभु आसीना। सेवहिं सिद्ध मुनीस प्रबीना॥॥३॥
मुड़कर पीछे देखा तो वहाँ भी प्रभु को सुंदर वेष में सीता और भाई सहित देखा। जिधर भी दृष्टि डालें, वहीं प्रभु विराजमान थे, सिद्ध और श्रेष्ठ मुनिजन उनकी सेवा कर रहे थे।
देखे सिव बिधि बिष्नु अनेका। अमित प्रभाउ एक तें एका॥बंदत चरन करत प्रभु सेवा। बिबिध बेष देखे सब देवा॥॥४॥
सती ने अनेक शिव, ब्रह्मा और विष्णु देखे, जिनका प्रभाव एक-दूसरे से बढ़कर था। सब देवता विविध रूपों में प्रभु के चरण वंदन करते और सेवा करते दिखे।
सती बिधात्री इंदिरा देखीं अमित अनूप।जेहिं जेहिं बेष अजादि सुर तेहि तेहि तन अनुरूप॥५४॥
सती ने अनगिनत अनुपम सरस्वती और लक्ष्मी को भी देखा। ब्रह्मा आदि देवता जिस-जिस रूप में थे, उनकी शक्तियाँ भी उसी रूप के अनुरूप वहाँ विद्यमान थीं।
देखे जहँ तहँ रघुपति जेते। सक्तिन्ह सहित सकल सुर तेते॥जीव चराचर जो संसारा। देखे सकल अनेक प्रकारा॥॥१॥
जहाँ-जहाँ जितने श्रीराम दिखे, वहाँ-वहाँ उतने ही देवता अपनी शक्तियों सहित भी दिखाई दिए। संसार के जड़-चेतन सभी प्राणी उन्होंने अनेक रूपों में देखे।
पूजहिं प्रभुहि देव बहु बेषा। राम रूप दूसर नहिं देखा॥अवलोके रघुपति बहुतेरे। सीता सहित न बेष घनेरे॥॥२॥
देवता अनेक रूपों में प्रभु की पूजा कर रहे थे, पर श्रीराम के रूप के समान दूसरा कोई रूप नहीं दिखा। श्रीराम अनेक जगह दिखे, किंतु सीताजी सहित वैसा दूसरा रूप कहीं नहीं था।
सोइ रघुबर सोइ लछिमनु सीता। देखि सती अति भई सभीता॥हृदय कंप तन सुधि कछु नाहीं। नयन मूदि बैठीं मग माहीं॥॥३॥
वही श्रीराम, वही लक्ष्मण और वही सीता—हर जगह यही देखकर सती अत्यंत भयभीत हो गईं। हृदय काँपने लगा, देह की सुध-बुध जाती रही, वे आँखें मूँदकर मार्ग में ही बैठ गईं।
बहुरि बिलोकेउ नयन उघारी। कछु न दीख तहँ दच्छकुमारी॥पुनि पुनि नाइ राम पद सीसा। चलीं तहाँ जहँ रहे गिरीसा॥॥४॥
फिर आँखें खोलकर देखा तो दक्षकुमारी को वहाँ कुछ भी दिखाई न दिया। बार-बार श्रीराम के चरणों में सिर नवाकर वे वहाँ चलीं जहाँ शिवजी विराजमान थे।
गई समीप महेस तब हँसि पूछी कुसलात।लीन्ही परीछा कवन बिधि कहहु सत्य सब बात॥५५॥
सती शिवजी के पास पहुँचीं, तब शिवजी हँसकर कुशल पूछने लगे—बताओ, तुमने किस प्रकार परीक्षा ली, सारी बात सच-सच कहो।
सतीं समुझि रघुबीर प्रभाऊ। भय बस सिव सन कीन्ह दुराऊ॥कछु न परीछा लीन्हि गोसाई। कीन्ह प्रनामु तुम्हारिहि नाई॥॥१॥
श्रीराम के प्रभाव को समझकर सती भय के कारण शिवजी से बात छिपा गईं। बोलीं—स्वामी, मैंने कोई परीक्षा नहीं ली, आपकी ही भाँति उन्हें प्रणाम किया।
जो तुम्ह कहा सो मृषा न होई। मोरें मन प्रतीति अति सोई॥तब संकर देखेउ धरि ध्याना। सतीं जो कीन्ह चरित सब जाना॥॥२॥
आपने जो कहा वह असत्य नहीं हो सकता, मेरे मन में यह पूर्ण विश्वास है। तब शिवजी ने ध्यान लगाकर देखा और सती ने जो कुछ किया था, सब जान लिया।
बहुरि राममायहि सिरु नावा। प्रेरि सतिहि जेहिं झूँठ कहावा॥हरि इच्छा भावी बलवाना। हृदयँ बिचारत संभु सुजाना॥॥३॥
शिवजी ने फिर श्रीराम की माया को सिर नवाया, जिसने सती को प्रेरित कर असत्य कहलवाया। भगवान की इच्छा और होनी बड़ी बलवान है—यह सोचते हुए बुद्धिमान शिवजी हृदय में विचार करने लगे।
सतीं कीन्ह सीता कर बेषा। सिव उर भयउ बिषाद बिसेषा॥जौं अब करउँ सती सन प्रीती। मिटइ भगति पथु होइ अनीती॥॥४॥
सती ने सीताजी का रूप धरा था, यह जानकर शिवजी के हृदय में विशेष विषाद हुआ। सोचा—यदि अब मैं सती से पहले जैसा प्रेम रखूँ तो भक्ति का मार्ग मिट जाएगा और अनीति होगी।
परम पुनीत न जाइ तजि किए प्रेम बड़ पापु।प्रगटि न कहत महेसु कछु हृदयँ अधिक संतापु॥५६॥
सती परम पवित्र हैं, उन्हें त्यागा नहीं जा सकता, पर स्नेह बनाए रखना भी बड़ा दोष होगा। यह सोचकर शिवजी कुछ प्रकट नहीं कहते, किंतु उनके हृदय में अत्यंत संताप है।
तब संकर प्रभु पद सिरु नावा। सुमिरत रामु हृदयँ अस आवा॥एहिं तन सतिहि भेट मोहि नाहीं। सिव संकल्पु कीन्ह मन माहीं॥॥१॥
तब शिवजी ने प्रभु के चरणों में सिर नवाया, श्रीराम का स्मरण करते हुए हृदय में यह विचार आया—इस देह में अब सती का मिलन मेरे लिए उचित नहीं। शिवजी ने मन में यह संकल्प कर लिया।
अस बिचारि संकरु मतिधीरा। चले भवन सुमिरत रघुबीरा॥चलत गगन भै गिरा सुहाई। जय महेस भलि भगति दृढ़ाई॥॥२॥
यह विचारकर स्थिरबुद्धि शिवजी श्रीराम का स्मरण करते हुए अपने भवन को चले। चलते समय आकाश से मधुर वाणी हुई—हे महेश, जय हो, आपने भक्ति का मार्ग दृढ़ रखा।
अस पन तुम्ह बिनु करइ को आना। रामभगत समरथ भगवाना॥सुनि नभगिरा सती उर सोचा। पूछा सिवहि समेत सकोचा॥॥३॥
ऐसा दृढ़ प्रण आपके सिवा और कौन कर सकता है? आप ही श्रीराम के समर्थ भक्त और स्वयं भगवान हैं। यह आकाशवाणी सुनकर सती के मन में चिंता उठी, संकोच सहित उन्होंने शिवजी से पूछा।
कीन्ह कवन पन कहहु कृपाला। सत्यधाम प्रभु दीनदयाला॥जदपि सतीं पूछा बहु भाँती। तदपि न कहेउ त्रिपुर आराती॥॥४॥
हे कृपालु, हे सत्यस्वरूप दीनदयालु प्रभु, बताइए आपने कौन-सा प्रण किया? सती ने अनेक प्रकार से पूछा, फिर भी त्रिपुरारि शिवजी ने कुछ नहीं बताया।
सतीं हृदय अनुमान किय सबु जानेउ सर्बग्य।कीन्ह कपटु मैं संभु सन नारि सहज जड़ अग्य।। 57क॥५७(क)॥
सती ने हृदय में अनुमान कर लिया कि सर्वज्ञ शिवजी सब जान गए हैं। उन्हें ग्लानि हुई—मैंने शिवजी से कपट किया, नारी स्वभाव से ही सहज मूढ़ और अज्ञानी होती है।
जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि।बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि॥५७(ख)॥
जल और दूध जैसे मिलकर एक भाव से बिकते हैं—देखिए प्रेम की यही सुंदर रीति है। पर जहाँ कपट की खटास पड़ जाती है, वहाँ रस अलग होकर बिगड़ जाता है।
हृदयँ सोचु समुझत निज करनी। चिंता अमित जाइ नहिं बरनी॥कृपासिंधु सिव परम अगाधा। प्रगट न कहेउ मोर अपराधा॥॥१॥
अपनी करनी को समझकर सती के हृदय में ऐसी चिंता हुई जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। कृपा के अथाह सागर शिवजी ने फिर भी मेरा अपराध प्रकट नहीं किया, यह सोचकर वे और लज्जित हुईं।
संकर रुख अवलोकि भवानी। प्रभु मोहि तजेउ हृदयँ अकुलानी॥निज अघ समुझि न कछु कहि जाई। तपइ अवाँ इव उर अधिकाई॥॥२॥
शिवजी का उदासीन भाव देखकर भवानी का मन व्याकुल हो उठा—लगा कि प्रभु ने मुझे त्याग दिया है। अपने ही अपराध को समझकर कुछ कहते न बना, हृदय में संताप बहुत बढ़ गया।
सतिहि ससोच जानि बृषकेतू। कहीं कथा सुंदर सुख हेतू॥बरनत पंथ बिबिध इतिहासा। बिस्वनाथ पहुँचे कैलासा॥॥३॥
सती को दुखी जानकर शिवजी ने सुख देने के लिए सुंदर कथाएँ सुनाईं। मार्ग में अनेक प्रसंग कहते-कहते विश्वनाथ शिवजी कैलास पहुँच गए।
तहँ पुनि संभु समुझि पन आपन। बैठे बट तर करि कमलासन॥संकर सहज सरुप सम्हारा। लागि समाधि अखंड अपारा॥॥४॥
वहाँ पहुँचकर शिवजी ने अपना प्रण फिर याद किया और वट वृक्ष के नीचे कमलासन लगाकर बैठ गए। अपने सहज स्वरूप को सँभालकर वे अखंड अपार समाधि में लीन हो गए।
सती बसहिं कैलास तब अधिक सोचु मन माहिं।मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं॥५८॥
सती तब कैलास पर रहने लगीं, मन में उन्हें अत्यंत चिंता रहती। भेद कोई नहीं जानता था, और एक-एक दिन उनके लिए युग समान बीतने लगा।
नित नव सोचु सतीं उर भारा। कब जैहउँ दुख सागर पारा॥मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना। पुनिपति बचनु मृषा करि जाना॥॥१॥
सती के हृदय में प्रतिदिन नई-नई चिंता भारी होती—मैं इस दुख-सागर से कब पार जाऊँगी? मैंने श्रीराम का अपमान किया और फिर पति के वचन को असत्य समझा।
सो फलु मोहि बिधाताँ दीन्हा। जो कछु उचित रहा सोइ कीन्हा॥अब बिधि अस बूझिअ नहिं तोही। संकर बिमुख जिआवसि मोही॥॥२॥
विधाता ने मुझे उसी का फल दिया है, जो उचित था वही किया। हे विधाता, अब यह तो पूछा नहीं जाता कि शिवजी से विमुख होकर तुम मुझे क्यों जीवित रखे हो।
कहि न जाई कछु हृदय गलानी। मन महुँ रामहि सुमिर सयानी॥जौं प्रभु दीनदयालु कहावा। आरती हरन बेद जसु गावा॥॥३॥
हृदय की ग्लानि कही नहीं जाती। बुद्धिमती सती मन-ही-मन श्रीराम का स्मरण करने लगीं—यदि प्रभु सचमुच दीनदयालु कहलाते हैं, यदि वेद उन्हें दुख हरने वाला गाते हैं।
तौ मैं बिनय करउँ कर जोरी। छूटउ बेगि देह यह मोरी॥जौं मोरें सिव चरन सनेहू। मन क्रम बचन सत्य ब्रतु एहू॥॥४॥
तो मैं हाथ जोड़कर विनती करती हूँ—मेरी यह देह शीघ्र छूट जाए। यदि शिवजी के चरणों में मेरा सच्चा स्नेह है, यदि मन-वचन-कर्म से मेरा यह व्रत सत्य है।
तौ सबदरसी सुनिअ प्रभु करहु सो बेगि उपाइ।होइ मरनु जेहिं बिनहिं श्रम दुसह बिपत्ति बिहाइ॥५९॥
तो हे सर्वदर्शी प्रभु, सुनिए और शीघ्र वह उपाय कीजिए, जिससे बिना कष्ट के मेरा मरण हो जाए और यह असह्य विपत्ति समाप्त हो।
एहि बिधि दुखित प्रजेसकुमारी। अकथनीय दारुन दुखु भारी॥बीतें संबत सहस सतासी। तजी समाधि संभु अबिनासी॥॥१॥
इस प्रकार प्रजापति-पुत्री सती अकथनीय भारी दुख सहती रहीं। सत्तासी हजार वर्ष बीत जाने पर अविनाशी शिवजी ने समाधि त्यागी।
राम नाम सिव सुमिरन लागे। जानी सतीं जगतपति जागे॥जाइ संभु पद बंदनु कीन्ही। सनमुख संकर आसनु दीन्हा॥॥२॥
शिवजी श्रीराम-नाम का स्मरण करने लगे, सती ने जान लिया कि जगत्पति जाग गए हैं। जाकर उन्होंने शिवजी के चरणों की वंदना की, शिवजी ने सम्मुख आसन दिया।
लगे कहन हरिकथा रसाला। दच्छ प्रजेस भए तेहि काला॥देखा बिधि बिचारि सब लायक। दच्छहि कीन्ह प्रजापति नायक॥॥३॥
शिवजी हरिकथा का रसपान कराने लगे, उसी समय दक्ष प्रजापति बने। ब्रह्माजी ने सबको योग्यता से परखकर दक्ष को प्रजापतियों का प्रमुख बनाया।
बड़ अधिकार दच्छ जब पावा। अति अभिमानु हृदयँ तब आवा॥नहिं कोऊ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं॥॥४॥
दक्ष को जब बड़ा अधिकार मिला, तब उनके हृदय में अत्यंत अभिमान आ गया। संसार में ऐसा कोई जन्मा नहीं, जिसे बड़प्पन पाकर मद न चढ़े।
दच्छ लिए मुनि बोलि सब करन लगे बड़ जाग।नेवते सादर सकल सुर जे पावत मख भाग॥६०॥
दक्ष ने सब मुनियों को बुलाकर एक बड़ा यज्ञ आरंभ किया, और उन सब देवताओं को आदरपूर्वक निमंत्रण भेजा जिन्हें यज्ञ का भाग मिलता है।
किंनर नाग सिद्ध गंधर्बा। बधुन्ह समेत चले सुर सर्बा॥बिष्नु बिरंचि महेसु बिहाई। चले सकल सुर जान बनाई॥॥१॥
किन्नर, नाग, सिद्ध, गंधर्व और सभी देवता अपनी पत्नियों सहित यज्ञ में चले। विष्णु, ब्रह्मा और शिव को छोड़कर शेष सब देवता विमान सजाकर चले।
सतीं बिलोके ब्योम बिमाना। जात चले सुंदर बिधि नाना॥सुर सुंदरी करहिं कल गाना। सुनत श्रवन छूटहिं मुनि ध्याना॥॥२॥
सती ने आकाश में अनेक सुंदर विमानों को जाते देखा। देव-सुंदरियाँ मधुर गान कर रही थीं, जिसे सुनकर मुनियों का ध्यान भी भंग हो जाता।
पूछेउ तब सिवँ कहेउ बखानी। पिता जग्य सुनि कछु हरषानी॥जौं महेसु मोहि आयसु देहीं। कछु दिन जाइ रहौं मिस एहीं॥॥३॥
सती ने पूछा तो शिवजी ने सब बता दिया। पिता के यज्ञ की बात सुनकर सती कुछ हर्षित हुईं—यदि शिवजी आज्ञा दें तो इसी बहाने कुछ दिन जाकर वहाँ रह आऊँ।
पति परित्याग हृदय दुखु भारी। कह न निज अपराध बिचारी॥बोली सती मनोहर बानी। भय संकोच प्रेम रस सानी॥॥४॥
पति का साथ छोड़ने के विचार से हृदय में भारी दुख था, पर अपना अपराध सोचकर कह न सकीं। फिर सती भय, संकोच और प्रेम में सनी मनोहर वाणी बोलीं।
पिता भवन उत्सव परम जौं प्रभु आयसु होइ।तौ मै जाउँ कृपायतन सादर देखन सोइ॥६१॥
हे कृपानिधान, पिता के भवन में बड़ा उत्सव हो रहा है, यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं जाकर आदरपूर्वक वह उत्सव देख आऊँ।
कहेहु नीक मोरेहुँ मन भावा। यह अनुचित नहिं नेवत पठावा॥दच्छ सकल निज सुता बोलाई। हमरें बयर तुम्हउ बिसराई॥॥१॥
शिवजी बोले—तुमने अच्छा कहा, मेरे मन को भी यह भाया, पर यह अनुचित है कि दक्ष ने निमंत्रण नहीं भेजा। दक्ष ने अपनी सब पुत्रियों को बुलाया है, पर हमारे प्रति बैर के कारण तुम्हें भुला दिया।
ब्रह्मसभाँ हम सन दुखु माना। तेहि तें अजहुँ करहिं अपमाना॥जौं बिनु बोलें जाहु भवानी। रहइ न सीलु सनेहु न कानी॥॥२॥
ब्रह्मसभा में उन्हें हमसे दुख पहुँचा था, इसी कारण अब भी वे अपमान करते हैं। हे भवानी, यदि तुम बिना बुलाए वहाँ जाओगी तो न शील रहेगा, न स्नेह, न मर्यादा।
जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा। जाइअ बिनु बोलेहुँ न सँदेहा॥तदपि बिरोध मान जहँ कोई। तहाँ गएँ कल्यानु न होई॥॥३॥
यद्यपि मित्र, स्वामी, पिता और गुरु के घर बिना बुलाए भी जाने में कोई संदेह नहीं है, फिर भी जहाँ कोई विरोध और अभिमान रखता हो, वहाँ जाने से कल्याण नहीं होता।
भाँति अनेक संभु समुझावा। भावी बस न ग्यानु उर आवा॥कह प्रभु जाहु जो बिनहिं बोलाएँ। नहिं भलि बात हमारे भाएँ॥॥४॥
शिवजी ने अनेक प्रकार से समझाया, पर होनी के वश ज्ञान सती के हृदय में न बैठा। अंत में प्रभु ने कहा—यदि तुम बिना बुलाए जाओगी तो यह बात हमें अच्छी नहीं लगती।
कहि देखा हर जतन बहु रहई न दच्छकुमारि।दिए मुख्य गन संग तब बिदा कीन्ह त्रिपुरारि॥६२॥
शिवजी ने अनेक प्रकार से समझाकर देख लिया, पर दक्षकुमारी किसी तरह न रुकीं। तब त्रिपुरारि शिवजी ने अपने प्रमुख गणों को साथ देकर उन्हें विदा किया।
पिता भवन जब गई भवानी। दच्छ त्रास काहुँ न सनमानी॥सादर भलेहिं मिली एक माता। भगिनीं मिलीं बहुत मुसुकाता॥॥१॥
जब भवानी पिता के घर पहुँचीं, तो दक्ष के भय से किसी ने उनका सम्मान नहीं किया। केवल माता ही आदरपूर्वक भलीभाँति मिलीं, बहनें भी बहुत मुसकराकर मिलीं।
दच्छ न कछु पूछी कुसलाता। सतिहि बिलोकि जरे सब गाता॥सतीं जाइ देखेउ तब जागा। कतहुँ न दीख संभु कर भागा॥॥२॥
दक्ष ने सतीजी की कुशल-क्षेम तक नहीं पूछी, यह देखकर सती का सारा शरीर क्रोध और पीड़ा से जल उठा। सती ने जाकर यज्ञ में देखा तो कहीं भी शिवजी का भाग नहीं दिखा।
तब चित चढ़ेउ जो संकर कहेऊ। प्रभु अपमानु समुझि उर दहेऊ॥पाछिल दुखु न हृदयँ अस ब्यापा। जस यह भयउ महा परितापा॥॥३॥
तब उन्हें शिवजी की पहले कही बात याद आ गई; स्वामी के अपमान का बोध होते ही हृदय जल उठा। पति-त्याग का पूर्व दुःख भी उतना गहरा नहीं था, जितना यह नया संताप उन्हें अब हुआ।
जद्यपि जग दारुन दुख नाना। सब तें कठिन जाति अवमाना॥समुझि सो सतिहि भयउ अति क्रोधा। बहु बिधि जननीं कीन्ह प्रबोधा॥॥४॥
यद्यपि संसार में अनेक प्रकार के भयंकर दुःख हैं, तथापि कुल-अपमान से बढ़कर कठिन दुःख कोई नहीं। यह समझकर सती को अत्यंत क्रोध आया; माता ने उन्हें बहुत प्रकार से समझाया।
सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ न होइ प्रबोध।सकल सभहि हठि हटकि तब बोलीं बचन सक्रोध॥६३॥
शिवजी का अपमान सती से सहा नहीं गया, हृदय को कोई शांति नहीं मिली। तब उन्होंने सारी सभा को हठपूर्वक रोककर क्रोध भरे वचन कहे।
सुनहु सभासद सकल मुनिंदा। कही सुनी जिन्ह संकर निंदा॥सो फलु तुरत लहब सब काहूँ। भली भाँति पछिताब पिताहूँ॥॥१॥
हे सभासदो, हे समस्त मुनीश्वरो, सुनो! जिस-जिसने यहाँ शिवजी की निंदा कही या सुनी है, उसे उसका फल तुरंत मिलेगा, और मेरे पिता को भी भलीभाँति पछताना पड़ेगा।
संत संभु श्रीपति अपबादा। सुनिअ जहाँ तहँ असि मरजादा॥काटिअ तासु जीभ जो बसाई। श्रवन मूदि न त चलिअ पराई॥॥२॥
जहाँ कहीं संत, शिवजी अथवा श्रीहरि की निंदा सुनाई पड़े, वहाँ यही मर्यादा है — या तो निंदा करने वाले की जीभ काट दी जाए, अन्यथा कान बंद करके वहाँ से दूर चला जाए।
जगदातमा महेसु पुरारी। जगत जनक सब के हितकारी॥पिता मंदमति निंदत तेही। दच्छ सुक्र संभव यह देही॥॥३॥
महेश तो जगत की आत्मा, त्रिपुरासुर के संहारक, संसार के पिता और सबके हितकारी हैं; मेरे मंदबुद्धि पिता उन्हीं की निंदा करते हैं, यह भूलकर कि यह मेरा शरीर भी दक्ष के ही वंश से उत्पन्न है।
तजिहउँ तुरत देह तेहि हेतू। उर धरि चंद्रमौलि बृषकेतू॥अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। भयउ सकल मख हाहाकारा॥॥४॥
इसी कारण मैं अभी यह देह त्याग दूँगी — यह विचारकर, हृदय में चंद्रमौलि वृषकेतु (शिवजी) को धारण किए, उन्होंने योगाग्नि से अपने शरीर को भस्म कर लिया। सारे यज्ञ में हाहाकार मच गया।
सती मरनु सुनि संभु गन लगे करन मख खीस।जग्य बिधंस बिलोकि भृगु रच्छा कीन्हि मुनीस॥६४॥
सती की मृत्यु सुनकर शिवजी के गण यज्ञ को नष्ट करने चल पड़े। यज्ञ का विध्वंस होते देख मुनि भृगु ने उसकी रक्षा का उपाय किया।
समाचार सब संकर पाए। बीरभद्रु करि कोप पठाए॥जग्य बिधंस जाइ तिन्ह कीन्हा। सकल सुरन्ह बिधिवत फलु दीन्हा॥॥१॥
जब शिवजी को यह सारा समाचार मिला, तो उन्होंने क्रोधित होकर वीरभद्र को भेजा। वीरभद्र ने जाकर यज्ञ का विध्वंस कर दिया और सभी देवताओं को विधिवत उनका फल दिया।
भे जगबिदित दच्छ गति सोई। जसि कछु संभु बिमुख के होई॥यह इतिहास सकल जग जानी। ताते मैं संछेप बखानी॥॥२॥
शंभु से विमुख होने पर जैसी दुर्गति होती है, वैसी ही दक्ष की गति संसार भर में विख्यात हुई। यह कथा सारे जगत को ज्ञात है, इसीलिए मैंने इसे संक्षेप में कह दिया।
सतीं मरत हरि सन बरु मागा। जनम जनम सिव पद अनुरागा॥तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई। जनमीं पारबती तनु पाई॥॥३॥
मरते समय सती ने हरि से यही वर माँगा था कि जन्म-जन्म शिवजी के चरणों में उनका अनुराग बना रहे। इसी कारण उन्होंने हिमालय के घर जन्म लिया और पार्वती के रूप में देह पाई।
जब तें उमा सैल गृह जाईं। सकल सिद्धि संपति तहँ छाई॥जहँ तहँ मुनिन्ह सुआश्रम कीन्हे। उचित बास हिम भूधर दीन्हे॥॥४॥
जब से उमा हिमालय के घर जन्मीं, तभी से वहाँ सभी सिद्धियाँ और संपदाएँ आ बसीं। जहाँ-तहाँ मुनियों ने सुंदर आश्रम बनाए, और पर्वत ने उन्हें उचित निवास-स्थान दिए।
सदा सुमन फल सहित सब द्रुम नव नाना जाति।प्रगटीं सुंदर सैल पर मनि आकर बहु भाँति॥६५॥
वहाँ सदा फूल-फल से लदे नाना जाति के नए वृक्ष शोभा पाते, और पर्वत पर अनेक प्रकार की मणियों की खानें सुंदर रूप से प्रकट हुईं।
सरिता सब पुनीत जलु बहहीं। खग मृग मधुप सुखी सब रहहीं॥सहज बयरु सब जीवन्ह त्यागा। गिरि पर सकल करहिं अनुरागा॥॥१॥
सारी नदियाँ पवित्र जल लेकर बहतीं, पक्षी, मृग और भँवरे सब सुखपूर्वक वहाँ रहते। सभी प्राणियों ने अपना सहज वैर त्यागकर उस पर्वत पर आपस में प्रेम कर लिया था।
सोह सैल गिरिजा गृह आएँ। जिमि जनु रामभगति के पाएँ॥नित नूतन मंगल गृह तासू। ब्रह्मादिक गावहिं जसु जासू॥॥२॥
गिरिजा (पार्वती) के घर आने से पर्वत ऐसा शोभित हुआ मानो उसे रामभक्ति ही प्राप्त हो गई हो। उस घर में नित नए मंगल होते, जिसका यश ब्रह्मा आदि देवता भी गाते थे।
नारद समाचार सब पाए। कौतुकहीं गिरि गेह सिधाए॥सैलराज बड़ आदर कीन्हा। पद पखारि बर आसनु दीन्हा॥॥३॥
नारदजी ने जब यह सब समाचार पाया, तो कौतुकवश तुरंत पर्वत के घर जा पहुँचे। पर्वतराज ने उनका बड़ा आदर किया, चरण धोकर उन्हें सुंदर आसन दिया।
नारि सहित मुनि पद सिरु नावा। चरन सलिल सबु भवनु सिंचावा॥निज सौभाग्य बहुत गिरि बरना। सुता बोलि मेली मुनि चरना॥॥४॥
पत्नी सहित पर्वतराज ने मुनि के चरणों में सिर नवाया, और चरणामृत से सारा भवन सिंचवाया। अपने सौभाग्य का बहुत बखान करते हुए उन्होंने पुत्री को बुलाकर मुनि के चरणों में डाल दिया।
त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र तुम्हारि।कहहु सुता के दोष गुन मुनिबर हृदयँ बिचारि॥६६॥
हे मुनिवर, आप त्रिकालज्ञ और सर्वज्ञ हैं, आपकी गति सर्वत्र है; कृपया हृदय में विचारकर मेरी पुत्री के गुण-दोष बताइए।
कह मुनि बिहसि गूढ़ मृदु बानी। सुता तुम्हारि सकल गुन खानी॥सुंदर सहज सुसील सयानी। नाम उमा अंबिका भवानी॥॥१॥
मुनि मुस्कराकर गूढ़ और मधुर वाणी में बोले — तुम्हारी पुत्री समस्त गुणों की खान है। यह सहज सुंदर, सुशील और बुद्धिमती है, इसका नाम उमा, अंबिका और भवानी है।
सब लच्छन संपन्न कुमारी। होइहि संतत पियहि पिआरी॥सदा अचल एहि कर अहिवाता। एहि तें जसु पैहहिं पितु माता॥॥२॥
यह कन्या सब शुभ लक्षणों से संपन्न है, अपने पति को सदा प्रिय ही रहेगी। इसका सुहाग सदा अटल रहेगा, और इसके कारण माता-पिता को भी बड़ा यश मिलेगा।
होइहि पूज्य सकल जग माहीं। एहि सेवत कछु दुर्लभ नाहीं॥एहि कर नामु सुमिरि संसारा। त्रिय चढ़हहिं पतिब्रत असिधारा॥॥३॥
यह सारे संसार में पूज्य होगी, इसकी सेवा करने वाले के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं रहेगा। इसका नाम स्मरण करके ही संसार की स्त्रियाँ पतिव्रत की तलवार की धार पर चलने योग्य हो सकेंगी।
सैल सुलच्छन सुता तुम्हारी। सुनहु जे अब अवगुन दुइ चारी॥अगुन अमान मातु पितु हीना। उदासीन सब संसय छीना॥॥४॥
हे पर्वतराज, तुम्हारी पुत्री सुलक्षणा है, अब इसके दो-चार अवगुण भी सुन लो। यह गुणहीन (सांसारिक अर्थ में), मानरहित, माता-पिता से हीन, उदासीन और संशय-रहित है।
जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष।अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख॥६७॥
ऐसा योगी, जटाधारी, निष्काम मन वाला, नग्न और अमंगल वेष वाला पति ही इसे मिलेगा — हाथ की यही रेखा इसके भाग्य में लिखी है।
सुनि मुनि गिरा सत्य जियँ जानी। दुख दंपतिहि उमा हरषानी॥नारदहुँ यह भेदु न जाना। दसा एक समुझब बिलगाना॥॥१॥
मुनि की वाणी को सत्य जानकर हिमालय को अपने हृदय में दुःख हुआ, पर उमा यह सुनकर प्रसन्न हो गईं। नारदजी भी यह भेद न जान सके कि एक ही बात से दोनों की दशा इतनी अलग क्यों हुई।
सकल सखीं गिरिजा गिरि मैना। पुलक सरीर भरे जल नैना॥होइ न मृषा देवरिषि भाषा। उमा सो बचनु हृदयँ धरि राखा॥॥२॥
गिरिजा की सभी सखियाँ, पर्वत और मैना — सबका शरीर रोमांचित हो उठा और आँखें आँसुओं से भर गईं। देवर्षि की वाणी झूठी नहीं हो सकती, यह जानकर सब चिंतित हुए, पर उमा ने वह बात हृदय में सँजोकर रख ली।
उपजेउ सिव पद कमल सनेहू। मिलन कठिन मन भा संदेहू॥जानि कुअवसरु प्रीति दुराई। सखी उछँग बैठी पुनि जाई॥॥३॥
उनके मन में पहले से ही शिवजी के चरणों में प्रेम उत्पन्न हो चुका था, अब मिलन कठिन जानकर मन में संदेह उठा। असमय जानकर उन्होंने अपना प्रेम छिपा लिया और सखी की गोद में जाकर बैठ गईं।
झूठि न होइ देवरिषि बानी। सोचहिं दंपति सखीं सयानी॥उर धरि धीर कहइ गिरिराऊ। कहहु नाथ का करिअ उपाऊ॥॥४॥
देवर्षि की वाणी असत्य नहीं हो सकती, यह सोचकर बुद्धिमान दंपति और सखियाँ चिंतित हुईं। तब धैर्य धरकर पर्वतराज ने पूछा — हे नाथ, अब बताइए क्या उपाय किया जाए?
कह मुनीस हिमवंत सुनु जो बिधि लिखा लिलार।देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनिहार॥६८॥
मुनीश्वर बोले — हे हिमवंत, सुनो, विधाता ने जो ललाट पर लिख दिया है, उसे देव, दानव, मनुष्य, नाग अथवा मुनि — कोई भी नहीं मिटा सकता।
तदपि एक मैं कहउँ उपाई। होइ करै जौं दैउ सहाई॥जस बरु मैं बरनेउँ तुम्ह पाहीं। मिलहि उमहि तस संसय नाहीं॥॥१॥
फिर भी मैं तुम्हें एक उपाय बताता हूँ, जो दैव सहायक हो तो अवश्य सफल होगा। मैंने तुम्हें जिस वर का वर्णन किया, उसी से उमा का मिलन होगा, इसमें कोई संशय नहीं।
जे जे बर के दोष बखाने। ते सब सिव पहिं मैं अनुमाने॥जौं बिबाहु संकर सन होई। दोषु गुन सम कह सबु कोई॥॥२॥
वर में जो-जो दोष बताए गए थे, वे सब मैंने शिवजी में ही पाए हैं। यदि विवाह शंकरजी से हो, तो गुण-दोष दोनों बराबर मानकर सब कोई इसे उचित ही कहेंगे।
जौं अहि सेज सयन हरि करहीं। बुध कछु तिन्ह कर दोषु न धरहीं॥भानु कृसानु सर्ब रस खाहीं। तिन्ह कहँ मंद कहत कोउ नाहीं॥॥३॥
यदि विष्णु सर्प की शय्या पर सोते हैं, तो बुद्धिमान उसमें कोई दोष नहीं मानते। सूर्य और अग्नि सब कुछ ग्रहण कर लेते हैं, फिर भी उन्हें कोई नीच नहीं कहता।
सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई। सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई॥समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाई। रबि पावक सुरसरि की नाई॥॥४॥
नदी शुभ और अशुभ दोनों प्रकार का जल बहाती है, फिर भी गंगा को कोई अपवित्र नहीं कहता। समर्थ के लिए दोष नहीं होता, हे स्वामी, यह बात सूर्य, अग्नि और गंगा के समान ही सत्य है।
जौं अस हिसिषा करहिं नर जड़ बिबेक अभिमान।परहिं कलप भरि नरक महुँ जीव कि ईस समान॥६९॥
यदि कोई मूर्ख, अविवेकी और अभिमानी मनुष्य ऐसी ही तुलना करने लगे, तो वह एक कल्प भर नरक में पड़ा रहता है — भला जीव कहीं ईश्वर के समान हो सकता है?
सुरसरि जल कृत बारुनि जाना। कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना॥सुरसरि मिलें सो पावन जैसें। ईस अनीसहि अंतरु तैसें॥॥१॥
गंगा के ही जल से बनी मदिरा को भी संत कभी ग्रहण नहीं करते, फिर भी गंगा में मिलना पवित्र माना जाता है — ईश्वर और सामान्य जीव में भी ठीक यही अंतर है।
संभु सहज समरथ भगवाना। एहि बिबाहँ सब बिधि कल्याना॥दुराराध्य पै अहहिं महेसू। आसुतोष पुनि किए कलेसू॥॥२॥
शंभु स्वभाव से ही सर्वसमर्थ और स्वयं भगवान हैं, इस विवाह में हर प्रकार से कल्याण ही है। महेश भले ही प्रसन्न करने में कठिन हों, पर वे आशुतोष भी हैं, बस उन्हें ठीक विधि से आराधना चाहिए।
जौं तपु करै कुमारि तुम्हारी। भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी॥जद्यपि बर अनेक जग माहीं। एहि कहँ सिव तजि दूसर नाहीं॥॥३॥
यदि तुम्हारी कन्या तपस्या करे, तो त्रिपुरारि भाग्य को भी बदल सकते हैं। संसार में यद्यपि अनेक वर हैं, तथापि इसके लिए शिव के सिवा कोई दूसरा उपयुक्त नहीं।
बर दायक प्रनतारति भंजन। कृपासिंधु सेवक मन रंजन॥इच्छित फल बिनु सिव अवराधे। लहिअ न कोटि जोग जप साधें॥॥४॥
वे वरदाता, शरणागत की पीड़ा हरने वाले, कृपा के सागर और सेवक के मन को प्रसन्न करने वाले हैं। शिवजी की आराधना के बिना करोड़ों योग-जप से भी इच्छित फल नहीं मिलता।
अस कहि नारद सुमिरि हरि गिरिजहि दीन्हि असीस।होइहि यह कल्यान अब संसय तजहु गिरीस॥७०॥
ऐसा कहकर नारदजी ने हरि का स्मरण किया और गिरिजा को आशीर्वाद दिया — यह विवाह अवश्य कल्याणकारी होगा, अब हे गिरीश, सारा संशय त्याग दो।
कहि अस ब्रह्मभवन मुनि गयऊ। आगिल चरित सुनहु जस भयऊ॥पतिहि एकांत पाइ कह मैना। नाथ न मैं समुझे मुनि बैना॥॥१॥
यह कहकर मुनि ब्रह्मलोक चले गए। अब आगे का चरित्र सुनो — पति को अकेला पाकर मैना ने कहा — नाथ, मुनि की बात मुझे पूरी तरह समझ नहीं आई।
जौं घरु बरु कुलु होइ अनूपा। करिअ बिबाहु सुता अनुरुपा॥न त कन्या बरु रहउ कुआरी। कंत उमा मम प्रानपिआरी॥॥२॥
यदि सुयोग्य घर, वर और कुल मिले, तभी हमें अपनी बेटी के योग्य विवाह करना चाहिए, अन्यथा कन्या भले ही कुँआरी रह जाए — उमा मुझे अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय है।
जौं न मिलहि बरु गिरिजहि जोगू। गिरि जड़ सहज कहिहि सबु लोगू॥सोइ बिचारि पति करेहु बिबाहू। जेहिं न बहोरि होइ उर दाहू॥॥३॥
यदि गिरिजा के योग्य वर न मिला, तो सारा संसार पर्वत को मूर्ख कहेगा। यह सोचकर, हे स्वामी, विवाह इस प्रकार कीजिए कि हृदय में फिर कभी पछतावा न हो।
अस कहि परि चरन धरि सीसा। बोले सहित सनेह गिरीसा॥बरु पावक प्रगटे ससि माहीं। नारद बचनु अन्यथा नाहीं॥॥४॥
ऐसा कहकर वे पति के चरणों में गिर पड़ीं, गिरीश ने स्नेहपूर्वक कहा — जैसे चंद्रमा में अग्नि प्रकट होती है, वैसे ही वर मिलना निश्चित है; नारदजी के वचन कभी असत्य नहीं होते।
प्रिया सोचु परिहरहु सबु सुमिरहु श्रीभगवान।पारबतिहि निरमयउ जेहिं सोइ करिहि कल्यान॥७१॥
प्रिये, सारी चिंता त्याग दो, और केवल श्रीभगवान का ही स्मरण करो — जिन्होंने पार्वती को रचा है, वही उनका कल्याण भी करेंगे।
अब जौं तुम्हहि सुता पर नेहू। तौ अस जाइ सिखावन देहू॥करै सो तपु जेहिं मिलहिं महेसू। आन उपाय न मिटिहि कलेसू॥॥१॥
यदि तुम्हें पुत्री से इतना ही स्नेह है, तो जाकर उसे यही शिक्षा दो — वह ऐसी तपस्या करे जिससे उसे महेश ही प्राप्त हों, इसके सिवा और कोई उपाय इस दुःख को मिटाने का नहीं।
नारद बचन सगर्भ सहेतू। सुंदर सब गुन निधि बृषकेतू॥अस बिचारि तुम्ह तजहु असंका। सबहि भाँति संकरु अकलंका॥॥२॥
नारदजी के वचन गूढ़ अर्थ और शुभ प्रयोजन से भरे हैं, वृषकेतु (शिवजी) समस्त गुणों के भंडार हैं। यह विचारकर तुम सारी शंका त्याग दो, शंकरजी हर प्रकार से निष्कलंक हैं।
सुनि पति बचन हरषि मन माहीं। गई तुरत उठि गिरिजा पाहीं॥उमहि बिलोकि नयन भरे बारी। सहित सनेह गोद बैठारी॥॥३॥
पति के वचन सुनकर मैना का मन हर्ष से भर गया, वे तुरंत उठकर गिरिजा के पास गईं। उमा को देखते ही उनकी आँखें प्रेमाश्रुओं से भर गईं, और उन्होंने स्नेहपूर्वक उसे गोद में बिठा लिया।
बारहिं बार लेति उर लाई। गदगद कंठ न कछु कहि जाई॥जगत मातु सर्बग्य भवानी। मातु सुखद बोलीं मृदु बानी॥॥४॥
वे बार-बार उमा को हृदय से लगातीं, गद्गद कंठ से कुछ कहा न जाता। तब जगत की माता, सर्वज्ञ भवानी ने अपनी माता को सुख देने वाली मृदु वाणी में कहा —
सुनहि मातु मैं दीख अस सपन सुनावउँ तोहि।सुंदर गौर सुबिप्रबर अस उपदेसेउ मोहि॥७२॥
हे माता, सुनिए, मैंने एक स्वप्न देखा है, वही आपको सुनाती हूँ — एक सुंदर, गौरवर्ण, श्रेष्ठ वर ने आकर मुझे यह उपदेश दिया।
करहि जाइ तपु सैलकुमारी। नारद कहा सो सत्य बिचारी॥मातु पितहि पुनि यह मत भावा। तपु सुखप्रद दुख दोष नसावा॥॥१॥
हे पर्वतकुमारी, जाकर तपस्या करो — नारदजी की बात को सत्य मानकर विचार किया गया। माता-पिता को भी यह विचार भला लगा, क्योंकि तपस्या सुख देने वाली और दुःख-दोष का नाश करने वाली होती है।
तपबल रचइ प्रपंच बिधाता। तपबल बिष्नु सकल जग त्राता॥तपबल संभु करहिं संघारा। तपबल सेषु धरइ महिभारा॥॥२॥
तपोबल से ही ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते हैं, तपोबल से ही विष्णु सारे संसार की रक्षा करते हैं। तपोबल से ही शिवजी संहार करते हैं, और तपोबल से ही शेषनाग पृथ्वी का भार धारण करते हैं।
तप अधार सब सृष्टि भवानी। करहि जाइ तपु अस जियँ जानी॥सुनत बचन बिसमित महतारी। सपन सुनायउ गिरिहि हँकारी॥॥३॥
हे भवानी, सारी सृष्टि तप के ही आधार पर टिकी है — यह जानकर पार्वती के मन में यह विचार दृढ़ हुआ कि जाकर तपस्या करूँ। यह वचन सुनकर माता चकित रह गई, और उसने पर्वत को बुलाकर वह स्वप्न सुनाया।
मातु पितहि बहुबिधि समुझाई। चलीं उमा तप हित हरषाई॥प्रिय परिवार पिता अरु माता। भए बिकल मुख आव न बाता॥॥४॥
माता-पिता को बहुत प्रकार से समझाकर उमा हर्षित मन से तप के लिए चल दीं। प्रिय परिवार, पिता और माता व्याकुल हो उठे, मुख से कोई बात न निकली।
बेदसिरा मुनि आइ तब सबहि कहा समुझाइ।पारबती महिमा सुनत रहे प्रबोधहि पाइ॥७३॥
तब वेदशिरा मुनि ने आकर सबको समझाया; पार्वती की महिमा सुनकर सब को सांत्वना मिली और वे शांत हो गए।
उर धरि उमा प्रानपति चरना। जाइ बिपिन लागीं तपु करना॥अति सुकुमार न तनु तप जोगू। पति पद सुमिरि तजेउ सबु भोगू॥॥१॥
उमा ने प्राणपति (शिव) के चरणों को हृदय में धारण किया और वन में जाकर तपस्या करने लगीं। शरीर अत्यंत सुकुमार था, तप के योग्य नहीं था, फिर भी पति के चरणों का स्मरण कर उन्होंने सारे भोग त्याग दिए।
नित नव चरन उपज अनुरागा। बिसरी देह तपहिं मनु लागा॥संबत सहस मूल फल खाए। सागु खाइ सत बरष गवाँए॥॥२॥
प्रतिदिन उनके चरणों में नया अनुराग उपजता, देह की सुध बिसर गई और मन तपस्या में ही लग गया। एक हजार वर्ष उन्होंने केवल कंद-मूल-फल खाकर बिताए, फिर सौ वर्ष तक केवल साग खाकर काटे।
कछु दिन भोजनु बारि बतासा। किए कठिन कछु दिन उपबासा॥बेल पाती महि परइ सुखाई। तीनि सहस संबत सोइ खाई॥॥३॥
कुछ दिन उन्होंने केवल जल और वायु पर कठिन उपवास किया। बेल के पत्ते भी पृथ्वी पर सूखकर गिरते, उन्हें ही खाते हुए तीन हजार वर्ष बिताए।
पुनि परिहरे सुखानेउ परना। उमहि नाम तब भयउ अपरना॥देखि उमहि तप खीन सरीरा। ब्रह्मगिरा भै गगन गभीरा॥॥४॥
फिर वे सूखे पत्ते भी छोड़ दिए, तभी से उमा का नाम अपर्णा पड़ा। तप से क्षीण हुए उनके शरीर को देखकर देवताओं के मन गंभीर चिंता से भर उठे।
भयउ मनोरथ सुफल तव सुनु गिरिजाकुमारि।परिहरु दुसह कलेस सब अब मिलिहहिं त्रिपुरारि॥७४॥
हे गिरिराज-कुमारी, सुनो, तुम्हारा मनोरथ सफल हुआ; अब सारे असह्य क्लेश त्याग दो, त्रिपुरारि शीघ्र तुम्हें मिलेंगे।
अस तपु काहुँ न कीन्ह भवानी। भए अनेक धीर मुनि ग्यानी॥अब उर धरहु ब्रह्म बर बानी। सत्य सदा संतत सुचि जानी॥॥१॥
हे भवानी, ऐसा तप किसी और ने नहीं किया, इसी कारण अनेक धीर और ज्ञानी मुनि हुए। अब यह ब्रह्मा की श्रेष्ठ वाणी हृदय में धारण करो, इसे सदा सत्य और पवित्र जानो।
आवै पिता बोलावन जबहीं। हठ परिहरि घर जाएहु तबहीं॥मिलहिं तुम्हहि जब सप्त रिषीसा। जानेहु तब प्रमान बागीसा॥॥२॥
जब भी पिता तुम्हें बुलाने आएँ, तब हठ छोड़कर घर चली जाना। जब सप्तर्षि तुमसे मिलें, तब तुम इसे इसी वाणी की प्रामाणिकता समझ लेना।
सुनत गिरा बिधि गगन बखानी। पुलक गात गिरिजा हरषानी॥उमा चरित सुंदर मैं गावा। सुनहु संभु कर चरित सुहावा॥॥३॥
आकाशवाणी से ब्रह्मा की यह वाणी सुनकर गिरिजा का शरीर रोमांचित हो उठा और वे हर्षित हुईं। मैंने उमा का सुंदर चरित्र गाया, अब सुनो शिवजी का सुहावना चरित्र।
जब तें सती जाइ तनु त्यागा। तब तें सिव मन भयउ बिरागा॥जपहिं सदा रघुनायक नामा। जहँ तहँ सुनहिं राम गुन ग्रामा॥॥४॥
जब से सती ने जाकर देह त्यागी थी, तब से शिवजी के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया था। वे सदा रघुनाथ के नाम का जप करते और जहाँ-तहाँ राम के गुणों की चर्चा सुनते।
चिदानन्द सुखधाम सिव बिगत मोह मद काम।बिचरहिं महि धरि हृदयँ हरि सकल लोक अभिराम॥७५॥
चिदानंद, सुख के धाम शिवजी, मोह-मद-काम से रहित होकर, हृदय में हरि को धारण किए हुए, सब लोकों को सुंदर बनाते हुए पृथ्वी पर विचरण करने लगे।
कतहुँ मुनिन्ह उपदेसहिं ग्याना। कतहुँ राम गुन करहिं बखाना॥जदपि अकाम तदपि भगवाना। भगत बिरह दुख दुखित सुजाना॥॥१॥
कहीं वे मुनियों को ज्ञान का उपदेश देते, कहीं राम के गुणों का बखान करते। यद्यपि वे स्वयं निष्काम भगवान हैं, तथापि सुजान शिवजी भक्तों के विरह-दुःख से स्वयं दुखी हो जाते।
एहि बिधि गयउ कालु बहु बीती। नित नै होइ राम पद प्रीती॥नैमु प्रेमु संकर कर देखा। अबिचल हृदयँ भगति कै रेखा॥॥२॥
इस प्रकार बहुत समय बीत गया, पर राम के चरणों में उनकी प्रीति नित नई ही बनी रही। शंकरजी का यह नियम और प्रेम देखकर लगा कि उनके हृदय में भक्ति की रेखा अटल है।
प्रगटे रामु कृतग्य कृपाला। रूप सील निधि तेज बिसाला॥बहु प्रकार संकरहि सराहा। तुम्ह बिनु अस ब्रतु को निरबाहा॥॥३॥
तब कृतज्ञ और कृपालु राम, जो रूप, शील और तेज के अपार भंडार हैं, प्रकट हुए। उन्होंने शंकरजी की बहुत प्रकार से सराहना की — तुम्हारे सिवा ऐसा व्रत और कौन निभा सकता था!
बहुबिधि राम सिवहि समुझावा। पारबती कर जन्मु सुनावा॥अति पुनीत गिरिजा के करनी। बिस्तर सहित कृपानिधि बरनी॥॥४॥
राम ने शिवजी को बहुत प्रकार से समझाया और पार्वती के जन्म की कथा सुनाई। कृपानिधि ने विस्तार से गिरिजा की अत्यंत पवित्र करनी का वर्णन किया।
अब बिनती मम सुनहु सिव जौं मो पर निज नेहु।जाइ बिबाहहु सैलजहि यह मोहि मागें देहु॥७६॥
हे शिव, अब मेरी एक विनती सुनिए — यदि मुझ पर आपका स्नेह है, तो जाकर पर्वत-पुत्री से विवाह कर लीजिए, यही मेरी इच्छा मुझे माँगकर पूरी कीजिए।
कह सिव जदपि उचित अस नाहीं। नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं॥॥१॥
शिवजी बोले — यद्यपि ऐसा करना उचित तो नहीं, फिर भी हे नाथ, आपके वचन कभी टाले नहीं जा सकते।
सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरमु यह नाथ हमारा॥
आपकी आज्ञा सिर-माथे स्वीकार करना ही उचित है — हे नाथ, यही हमारा परम धर्म है।
मातु पिता गुर प्रभु कै बानी। बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी॥तुम्ह सब भाँति परम हितकारी। अग्या सिर पर नाथ तुम्हारी॥॥२॥
माता, पिता, गुरु और स्वामी के वचन बिना विचार किए ही शुभ मानकर स्वीकार करने चाहिए। आप हर प्रकार से मेरे परम हितकारी हैं, हे नाथ, आपकी आज्ञा मुझे सिर-माथे स्वीकार है।
प्रभु तोषेउ सुनि संकर बचना। भक्ति बिबेक धर्म जुत रचना॥कह प्रभु हर तुम्हार पन रहेऊ। अब उर राखेहु जो हम कहेऊ॥॥३॥
शिवजी के भक्ति, विवेक और धर्म से युक्त वचन सुनकर प्रभु प्रसन्न हुए। प्रभु ने कहा — हे हर, आपका व्रत बना रहा, अब जो मैंने कहा है उसे सदा हृदय में रखना।
अंतरधान भए अस भाषी। संकर सोइ मूरति उर राखी॥तबहिं सप्तरिषि सिव पहिं आए। बोले प्रभु अति बचन सुहाए॥॥४॥
ऐसा कहकर प्रभु अंतर्धान हो गए, शंकरजी ने उसी मूर्ति को अपने हृदय में बसा लिया। तभी सप्तर्षि शिवजी के पास आए, और प्रभु ने उनसे अत्यंत मधुर वचन कहे।
पारबती पहिं जाइ तुम्ह प्रेम परिच्छा लेहु।गिरिहि प्रेरि पठएहु भवन दूरि करेहु संदेहु॥७७॥
तुम पार्वती के पास जाकर उनके प्रेम की परीक्षा लो; फिर पर्वत को प्रेरित कर उन्हें घर भिजवा देना और उनका सारा संदेह दूर कर देना।
रिषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी। मूरतिमंत तपस्या जैसी॥बोले मुनि सुनु सैलकुमारी। करहु कवन कारन तपु भारी॥॥१॥
ऋषियों ने वहाँ गौरी को मूर्तिमान तपस्या के समान देखा। मुनियों ने कहा — हे शैलकुमारी, सुनो, तुम किस कारण इतना भारी तप कर रही हो?
केहि अवराधहु का तुम्ह चहहू। हम सन सत्य मरमु किन कहहू॥कहत बचन मनु अति सकुचाई। हँसिहहु सुनि हमारि जड़ताई॥॥२॥
किसकी आराधना कर रही हो, क्या चाहती हो, हमें सच्चा भेद क्यों नहीं बताती? यह वचन कहते हुए उनका मन बहुत सकुचाया — कहीं हमारी मूर्खता सुनकर तुम हँस न पड़ो।
मनु हठ परा न सुनइ सिखावा। चहत बारि पर भीति उठावा॥नारद कहा सत्य सोइ जाना। बिनु पंखन्ह हम चहहिं उड़ाना॥॥३॥
मन हठ पर अड़ा है, कोई सीख नहीं सुनता, मानो जल पर दीवार खड़ी करना चाहते हों। नारद का कथन सत्य समझकर मैंने माना, अब बिना पंखों के भी हम उड़ना चाहते हैं।
देखहु मुनि अबिबेकु हमारा। चाहिअ सदा सिवहि भरतारा॥॥४॥
हे मुनि, हमारे इस अविवेक को देखिए — हमें सदा शिवजी को ही पति के रूप में चाहिए।
सुनत बचन बिहसे रिषय गिरिसंभव तब देह।नारद कर उपदेसु सुनि कहहु बसेउ किसु गेह॥७८॥
यह वचन सुनकर ऋषि हँस पड़े — हे गिरिजा, यह देह तुम्हारी है, पर नारद के उपदेश का पहले क्या परिणाम हुआ, यह भी तो बताओ।
दच्छसुतन्ह उपदेसेन्हि जाई। तिन्ह फिरि भवनु न देखा आई॥चित्रकेतु कर घरु उन घाला। कनककसिपु कर पुनि अस हाला॥॥१॥
दक्ष के पुत्रों को भी नारदजी ने ऐसा ही उपदेश दिया था, और वे फिर कभी घर लौटकर नहीं देख सके। चित्रकेतु का घर भी उन्होंने ऐसे ही उजाड़ा, और हिरण्यकशिपु का भी वैसा ही हाल किया।
नारद सिख जे सुनहिं नर नारी। अवसि होहिं तजि भवनु भिखारी॥मन कपटी तन सज्जन चीन्हा। आपु सरिस सबही चह कीन्हा॥॥२॥
जो नर-नारी नारद की सीख सुनते हैं, वे अवश्य घर त्यागकर भिखारी हो जाते हैं। वे मन के कपटी और तन से साधु दिखते हैं, और सबको अपने ही समान बनाना चाहते हैं।
तेहि कें बचन मानि बिस्वासा। तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा॥निर्गुन निलज कुबेष कपाली। अकुल अगेह दिगंबर ब्याली॥॥३॥
उन्हीं के वचनों पर विश्वास कर तुम एक ऐसे पति की कामना करती हो जो स्वभाव से ही उदासीन, निर्गुण, निर्लज्ज, कुवेषधारी, कपाली, कुलहीन, गृहहीन, दिगंबर और साँपों से युक्त है।
कहहु कवन सुखु अस बरु पाएँ। भल भूलिहु ठग के बौराएँ॥पंच कहें सिव सती बिबाही। पुनि अवडेरि मराएन्हि ताही॥॥४॥
बताओ ऐसा वर पाकर कौन-सा सुख मिलेगा — तुम भला भूलकर ठग की बातों में बहक गई हो। पहले भी पंचों के कहने पर शिव से सती का विवाह हुआ था, पर अंततः उसी उपेक्षा में उन्हें मरना पड़ा।
अब सुख सोवत सोचु नहिं भीख मागि भव खाहिं।सहज एकाकिन्ह के भवन कबहुँ कि नारि खटाहिं॥७९॥
अब वे निश्चिंत सोते हैं, भीख माँगकर खाते हैं, कोई चिंता नहीं करते। ऐसे स्वभाव से एकाकी रहने वालों के घर में भला कभी स्त्री टिक सकती है?
अजहूँ मानहु कहा हमारा। हम तुम्ह कहुँ बरु नीक बिचारा॥अति सुंदर सुचि सुखद सुसीला। गावहिं बेद जासु जस लीला॥॥१॥
अब भी हमारी बात मान लो, हमने तुम्हारे लिए एक अच्छा वर सोच रखा है — अत्यंत सुंदर, पवित्र, सुखदायी और सुशील, जिसकी लीला का यश वेद भी गाते हैं।
दूषन रहित सकल गुन रासी। श्रीपति पुर बैकुंठ निवासी॥अस बरु तुम्हहि मिलाउब आनी। सुनत बिहसि कह बचन भवानी॥॥२॥
दोष रहित, सब गुणों की राशि, लक्ष्मीपति और वैकुंठ में निवास करने वाला — ऐसा वर हम लाकर तुम्हें दिलाएँगे। यह सुनकर भवानी मुस्कराकर बोलीं —
सत्य कहेहु गिरिभव तनु एहा। हठ न छूट छूटै बरु देहा॥कनकउ पुनि पषान तें होई। जारेहुँ सहजु न परिहर सोई॥॥३॥
हे मुनिवर, आपने सच कहा, यह शरीर पर्वत की संतान है, हठ कभी नहीं छूटेगा, चाहे शरीर ही क्यों न छूट जाए। सोना भी पत्थर में मिला होता है, पर उसे आग में तपाने पर भी उसका स्वाभाविक गुण नहीं छूटता।
नारद बचन न मैं परिहरउँ। बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ॥गुर कें बचन प्रतीति न जेही। सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही॥॥४॥
मैं नारद के वचन कभी नहीं त्यागूँगी, चाहे घर बसे या उजड़ जाए, मुझे कोई भय नहीं। जिसे गुरु के वचनों पर विश्वास नहीं, उसे स्वप्न में भी सुख और सिद्धि सुलभ नहीं होती।
महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम।जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥८०॥
महादेव अवगुणों के घर हैं और विष्णु सब गुणों के धाम — पर जिसका मन जिसमें रम जाए, उसका प्रेम-कार्य उसी से बनता है।
जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा। सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा॥अब मैं जन्मु संभु हित हारा। को गुन दूषन करै बिचारा॥॥१॥
यदि तुम मुनिवरो, मुझसे पहले ही मिले होते, तो शायद मैं तुम्हारी सीख भी सिर झुकाकर सुन लेती। पर अब मेरा यह जन्म शिवजी के लिए ही समर्पित हो चुका है, अब गुण-दोष का विचार कौन करे?
जौं तुम्हरे हठ हृदयँ बिसेषी। रहि न जाइ बिनु किए बरेषी॥तौ कौतुकिअन्ह आलसु नाहीं। बर कन्या अनेक जग माहीं॥॥२॥
यदि तुम्हारे हृदय में हठ इतनी गहरी बैठ गई है कि बिना विवाह के रहा ही नहीं जाता, तो हे कौतुक-प्रिय मुनियो, इसमें आलस्य की क्या बात — संसार में और भी अनेक कन्याएँ हैं।
जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिं सत बार महेसू॥॥३॥
करोड़ों जन्मों तक भी मेरा यह हठ बना रहेगा — मैं शंकर को ही वरूँगी, नहीं तो कुँआरी ही रहूँगी। मैं नारद का उपदेश कभी नहीं त्यागूँगी, चाहे महेश स्वयं सौ बार भी ऐसा कहें।
मैं पा परउँ कहइ जगदंबा। तुम्ह गृह गवनहु भयउ बिलंबा॥देखि प्रेमु बोले मुनि ग्यानी। जय जय जगदंबिके भवानी॥॥४॥
जगदंबा ने कहा — मैं तुम्हारे चरणों में प्रणाम करती हूँ, अब तुम अपने घर लौट जाओ, बहुत विलंब हो चुका है। उनका प्रेम देखकर ज्ञानी मुनि बोले — जय हो, जय हो, हे जगदंबिके भवानी!
तुम्ह माया भगवान सिव सकल जगत पितु मातु।नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गातु॥८१॥
तुम माया हो, शिवजी भगवान हैं, तुम दोनों समस्त जगत के माता-पिता हो — यह कहकर मुनि उनके चरणों में सिर नवाकर बार-बार हर्षित होते हुए वहाँ से चल दिए।
जाइ मुनिन्ह हिमवंतु पठाए। करि बिनती गिरजहिं गृह ल्याए॥बहुरि सप्तरिषि सिव पहिं जाई। कथा उमा के सकल सुनाई॥॥१॥
मुनियों ने जाकर हिमवान को भेजा, और विनती करके गिरिजा को घर ले आए। फिर सप्तर्षि शिवजी के पास जाकर उमा की सारी कथा सुनाई।
भए मगन सिव सुनत सनेहा। हरषि सप्तरिषि गवने गेहा॥मनु थिर करि तब संभु सुजाना। लगे करन रघुनायक ध्याना॥॥२॥
यह स्नेहभरी कथा सुनते ही शिवजी भाव-विभोर हो गए; सप्तर्षि हर्षित होकर अपने-अपने घर लौट गए। मन को स्थिर कर सुजान शंकर तब रघुनाथ का ध्यान करने लगे।
तारकु असुर भयउ तेहि काला। भुज प्रताप बल तेज बिसाला॥तेहिं सब लोक लोकपति जीते। भए देव सुख संपति रीते॥॥३॥
उसी समय तारकासुर नामक असुर उत्पन्न हुआ, जिसकी भुजाओं का प्रताप, बल और तेज अत्यंत विशाल था। उसने सभी लोकों के लोकपालों को जीत लिया, और देवता सुख-संपत्ति से रहित हो गए।
अजर अमर सो जीति न जाई। हारे सुर करि बिबिध लराई॥तब बिरंचि सन जाइ पुकारे। देखे बिधि सब देव दुखारे॥॥४॥
वह अजर-अमर था, कोई उसे जीत नहीं सकता था; देवता अनेक प्रकार से युद्ध करके भी हार गए। तब वे ब्रह्माजी के पास जाकर पुकार करने लगे; ब्रह्माजी ने सब देवताओं को दुखी देखा।
सब सन कहा बुझाइ बिधि दनुज निधन तब होइ।संभु सुक्र संभूत सुत एहि जीतइ रन सोइ॥८२॥
ब्रह्माजी ने सबको समझाकर कहा — इस दैत्य की मृत्यु तभी होगी जब शिवजी और उमा से उत्पन्न पुत्र युद्ध में इसे जीतेगा।
मोर कहा सुनि करहु उपाई। होइहि ईस्वर करिहि सहाई॥सतीं जो तजी दच्छ मख देहा। जनमी जाइ हिमाचल गेहा॥॥१॥
मेरी यह बात सुनकर उपाय करो, ईश्वर स्वयं सहायक होंगे — जो सती ने दक्ष के यज्ञ में देह त्यागी थी, वही जाकर हिमाचल के घर जन्मीं।
तेहिं तपु कीन्ह संभु पति लागी। सिव समाधि बैठे सबु त्यागी॥जदपि अहइ असमंजस भारी। तदपि बात एक सुनहु हमारी॥॥२॥
उस तपस्या के प्रभाव से शिवजी की समाधि दृढ़ हो गई, वे सब कुछ त्यागकर समाधि में बैठ गए। यद्यपि यह बड़ा असमंजस भरा कार्य है, तथापि हमारी एक बात सुनो।
पठवहु कामु जाइ सिव पाहीं। करै छोभु संकर मन माहीं॥तब हम जाइ सिवहि सिर नाई। करवाउब बिबाहु बरिआई॥॥३॥
कामदेव को भेजो, वे जाकर शिवजी के मन में क्षोभ उत्पन्न करेंगे। तब हम जाकर शिवजी के चरणों में सिर नवाकर बलपूर्वक उनका विवाह करा देंगे।
एहि बिधि भलेहि देवहित होई। मत अति नीक कहइ सबु कोई॥अस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति हेतू। प्रगटेउ बिषमबान झषकेतू॥॥४॥
इस प्रकार देवताओं का हित भली-भाँति सिद्ध होगा — सबने इस विचार को अत्यंत उत्तम बताया। देवताओं ने बड़े प्रेम से स्तुति की, तब विषम बाणों वाले कामदेव प्रकट हुए।
सुरन्ह कही निज बिपति सब सुनि मन कीन्ह बिचार।संभु बिरोध न कुसल मोहि बिहसि कहेउ अस मार॥८३॥
देवताओं ने अपनी सारी विपत्ति कामदेव को सुनाई; यह सुनकर उन्होंने मन में विचार किया और मुस्कराकर कहा — शिवजी से बैर करना मेरे लिए कुशलकारी नहीं है।
तदपि करब मैं काजु तुम्हारा। श्रुति कह परम धरम उपकारा॥पर हित लागि तजइ जो देही। संतत संत प्रसंसहिं तेही॥॥१॥
फिर भी मैं तुम्हारा कार्य अवश्य करूँगा, क्योंकि वेद परोपकार को ही परम धर्म कहते हैं। जो दूसरों के हित के लिए अपना शरीर तक त्याग दे, संत सदा उसी की प्रशंसा करते हैं।
अस कहि चलेउ सबहि सिरु नाई। सुमन धनुष कर सहित सहाई॥चलत मार अस हृदयँ बिचारा। सिव बिरोध ध्रुव मरनु हमारा॥॥२॥
ऐसा कहकर, सबको सिर नवाकर, फूलों का धनुष हाथ में लिए, अपने सहायकों सहित कामदेव चल पड़े। चलते हुए मन में यह विचार आया — शिवजी से बैर करना मानो निश्चित मृत्यु मोल लेना है।
तब आपन प्रभाउ बिस्तारा। निज बस कीन्ह सकल संसारा॥कोपेउ जबहिं बारिचरकेतू। छन महुँ मिटे सकल श्रुति सेतू॥॥३॥
तब भी उसने अपना प्रभाव फैलाया और सारे संसार को अपने वश में कर लिया। जैसे ही जलचरकेतु (कामदेव) क्रोधित हुआ, क्षणभर में सारे वैदिक मर्यादा के बाँध टूट गए।
