प्रथम सोपान — भाग 6
बालकाण्ड
शिव-पार्वती संवाद, श्रीराम जन्म, बाल-लीला एवं श्रीसीता स्वयंवर की कथा।
बालकाण्ड — सुनें
बालकाण्ड — पढ़ें भी, सुनें भी
शिव-पार्वती संवाद, श्रीराम जन्म, बाल-लीला एवं श्रीसीता स्वयंवर की कथा।
यह कथा शीघ्र ही यहाँ सुनने हेतु भी उपलब्ध होगी
चापत चरन लखनु उर लाएँ। सभय सप्रेम परम सचु पाएँ॥पुनि पुनि प्रभु कह सोवहु ताता। पौढ़े धरि उर पद जलजाता॥॥४॥
लक्ष्मण ने हृदय से लगाकर, भय और प्रेम सहित परम सुख पाते हुए, प्रभु के चरण दबाए। प्रभु बार-बार कहते — सो जाओ तात, फिर लक्ष्मण उनके चरण-कमल हृदय में धारण करके लेट गए।
उठे लखन निसि बिगत सुनि अरुनसिखा धुनि कान।गुर तें पहिलेहिं जगतपति जागे रामु सुजान॥२२६॥
रात्रि समाप्त होने पर, अरुणशिखा की ध्वनि कानों में सुनकर लक्ष्मण उठे — पर गुरु से भी पहले जगत के स्वामी सुजान राम जाग चुके थे।
सकल सौच करि जाइ नहाए। नित्य निबाहि मुनिहि सिर नाए॥समय जानि गुर आयसु पाई। लेन प्रसून चले दोउ भाई॥॥१॥
सारे शौच-स्नान करके, नित्यकर्म पूरा करके मुनि को सिर नवाया। समय जानकर, गुरु की आज्ञा पाकर, दोनों भाई फूल लेने चल पड़े।
भूप बागु बर देखेउ जाई। जहँ बसंत रितु रही लोभाई॥लागे बिटप मनोहर नाना। बरन बरन बर बेलि बिताना॥॥२॥
राजा जनक का सुंदर बाग देखने गए, जहाँ वसंत ऋतु मोहित होकर ठहरी हुई थी। मनोहर अनेक वृक्ष लगे थे, रंग-बिरंगी सुंदर लताओं के मंडप बने थे।
नव पल्लव फल सुमन सुहाए। निज संपति सुर रूख लजाए॥चातक कोकिल कीर चकोरा। कूजत बिहग नटत कल मोरा॥॥३॥
नए पत्ते, फल और सुंदर फूल थे, जो अपनी संपदा से देवताओं के कल्पवृक्ष को भी लजाते थे। चातक, कोयल, तोता और चकोर पक्षी कूजते और सुंदर मोर नाचते।
मध्य बाग सरु सोह सुहावा। मनि सोपान बिचित्र बनावा॥बिमल सलिलु सरसिज बहुरंगा। जलखग कूजत गुंजत भृंगा॥॥४॥
बाग के बीच में एक सुंदर सरोवर शोभा पा रहा था, जिसकी मणि-सीढ़ियाँ विचित्र ढंग से बनी थीं। निर्मल जल में रंग-बिरंगे कमल थे, जलपक्षी बोलते और भँवरे गुंजार करते।
बागु तड़ागु बिलोकि प्रभु हरषे बंधु समेत।परम रम्य आरामु यहु जो रामहि सुख देत॥२२७॥
बाग और सरोवर को देखकर प्रभु भाई सहित हर्षित हुए — यह अत्यंत रमणीय उद्यान राम को बड़ा सुख देने वाला था।
चहुँ दिसि चितइ पूँछि मालिगन। लगे लेन दल फूल मुदित मन॥तेहि अवसर सीता तहँ आई। गिरिजा पूजन जननि पठाई॥॥१॥
चारों दिशाओं में देखकर, मालियों से पूछकर, वे प्रसन्न मन से फूल-पत्तियाँ लेने लगे। उसी अवसर पर सीता वहाँ आईं, माता ने उन्हें गौरी-पूजन के लिए भेजा था।
संग सखीं सब सुभग सयानी। गावहिं गीत मनोहर बानी॥सर समीप गिरिजा गृह सोहा। बरनि न जाइ देखि मनु मोहा॥॥२॥
सभी सुंदर और सुजान सखियाँ साथ थीं, मनोहर वाणी में गीत गा रही थीं। सरोवर के पास गौरी का मंदिर शोभा पा रहा था, जिसे देखकर मन मोहित हो जाता, उसका वर्णन नहीं हो सकता।
मज्जनु करि सर सखिन्ह समेता। गई मुदित मन गौरि निकेता॥पूजा कीन्हि अधिक अनुरागा। निज अनुरूप सुभग बरु मागा॥॥३॥
सखियों सहित सरोवर में स्नान करके, वे प्रसन्न मन से गौरी-मंदिर गईं। अत्यंत अनुराग से पूजा की, और अपने योग्य सुंदर वर माँगा।
एक सखी सिय संगु बिहाई। गई रही देखन फुलवाई॥तेहि दोउ बंधु बिलोके जाई। प्रेम बिबस सीता पहिं आई॥॥४॥
एक सखी सीता का साथ छोड़कर, फुलवारी देखने चली गई थी। उसने दोनों भाइयों को जाते हुए देखा, और प्रेमवश दौड़कर सीता के पास आई।
तासु दसा देखि सखिन्ह पुलक गात जलु नैन।कहु कारनु निज हरष कर पूछहि सब मृदु बैन॥२२८॥
उसकी यह दशा देखकर सखियों ने — शरीर रोमांचित, नेत्रों में जल — पूछा, अपने हर्ष का कारण बताओ, सब मृदु वचनों में पूछने लगीं।
देखन बागु कुअँर दुइ आए। बय किसोर सब भाँति सुहाए॥स्याम गौर किमि कहौं बखानी। गिरा अनयन नयन बिनु बानी॥॥१॥
बाग देखने दोनों राजकुमार आए हैं, किशोर अवस्था के, हर प्रकार से सुंदर। श्याम और गौर, कैसे कहूँ वर्णन करके, वाणी उनके लिए आँखों के बिना और नेत्र वाणी के बिना असमर्थ हैं।
सुनि हरषीं सब सखीं सयानी। सिय हियँ अति उतकंठा जानी॥एक कहइ नृपसुत तेइ आली। सुने जे मुनि संग आए काली॥॥२॥
यह सुनकर सारी सयानी सखियाँ हर्षित हुईं, सीता के हृदय में अत्यधिक उत्कंठा जान गईं। एक कहने लगी — सखी, यही वे राजकुमार हैं जिनके बारे में हमने कल मुनि के साथ आने की बात सुनी थी।
जिन्ह निज रूप मोहनी डारी। कीन्ह स्वबस नगर नर नारी॥बरनत छबि जहँ तहँ सब लोगू। अवसि देखिअहिं देखन जोगू॥॥३॥
जिन्होंने अपने रूप की मोहिनी शक्ति से नगर के नर-नारियों को अपने वश में कर लिया है। सब लोग जहाँ-तहाँ उनकी छवि का बखान कर रहे हैं, वे अवश्य ही देखने योग्य हैं।
तासु बचन अति सियहि सुहाने। दरस लागि लोचन अकुलाने॥चली अग्र करि प्रिय सखि सोई। प्रीति पुरातन लखइ न कोई॥॥४॥
उसकी यह बात सीता को अत्यंत भाई, दर्शन के लिए नेत्र व्याकुल हो उठे। वह प्रिय सखी आगे-आगे चली, कोई नहीं जानता कि यह पुरातन प्रेम था।
सुमिरि सीय नारद बचन उपजी प्रीति पुनीत।चकित बिलोकति सकल दिसि जनु सिसु मृगी सभीत॥२२९॥
नारद के वचनों का स्मरण करके सीता के हृदय में पवित्र प्रीति उमड़ पड़ी, वे चकित होकर सभी दिशाओं में देखने लगीं, मानो कोई भयभीत मृग-शावक हो।
कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन रामु हृदयँ गुनि॥मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्ही।। मनसा बिस्व बिजय कहँ कीन्ही॥॥१॥
कंकन, करधनी और पायल की ध्वनि सुनकर, राम ने हृदय में विचारकर लक्ष्मण से कहा — मानो कामदेव ने अपना नगाड़ा बजाया हो, मन-ही-मन विश्व-विजय की घोषणा कर दी हो।
अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा। सिय मुख ससि भए नयन चकोरा॥भए बिलोचन चारु अचंचल। मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल॥॥२॥
ऐसा कहकर उन्होंने फिर उसी दिशा में देखा, सीता का मुख चंद्रमा देखकर उनके नेत्र चकोर हो गए। नेत्र सुंदर और स्थिर हो गए, मानो निमि ऋषि ने संकोचवश दिशाएँ ही त्याग दी हों।
देखि सीय सोभा सुखु पावा। हृदयँ सराहत बचनु न आवा॥जनु बिरंचि सब निज निपुनाई। बिरचि बिस्व कहँ प्रगटि देखाई॥॥३॥
सीता की शोभा देखकर राम को सुख हुआ, हृदय में सराहते रहे पर मुख से वचन न निकला। मानो ब्रह्माजी ने अपनी सारी निपुणता रचकर संसार को दिखाने के लिए प्रकट कर दी हो।
सुंदरता कहुँ सुंदर करई। छबिगृहँ दीपसिखा जनु बरई॥सब उपमा कबि रहे जुठारी। केहिं पटतरौं बिदेहकुमारी॥॥४॥
सुंदरता को भी सुंदर बनाने वाली, मानो शोभा-गृह में दीपशिखा जल रही हो। सारी उपमाएँ कवियों की जूठी हो चुकी हैं, विदेहकुमारी की तुलना किससे करूँ।
सिय सोभा हियँ बरनि प्रभु आपनि दसा बिचारि।बोले सुचि मन अनुज सन बचन समय अनुहारि॥२३०॥
सीता की शोभा हृदय में सराहकर, अपनी दशा का विचार करते हुए, प्रभु ने पवित्र मन से समय के अनुरूप छोटे भाई से कहा —
तात जनकतनया यह सोई। धनुषजग्य जेहि कारन होई॥पूजन गौरि सखीं लै आई। करत प्रकासु फिरइ फुलवाई॥॥१॥
हे तात, यह वही जनकतनया है, जिसके लिए धनुष-यज्ञ हो रहा है। सखियाँ उसे गौरी-पूजन के लिए ले आई हैं, वह फुलवारी में प्रकाश फैलाती घूम रही है।
जासु बिलोकि अलोकिक सोभा। सहज पुनीत मोर मनु छोभा॥सो सबु कारन जान बिधाता। फरकहिं सुभद अंग सुनु भ्राता॥॥२॥
जिसकी अलौकिक शोभा देखकर मेरा स्वाभाविक पवित्र मन भी चंचल हो उठा है। यह सब कारण विधाता ही जानते हैं, सुनो भाई, मेरे शुभ अंग फड़क रहे हैं।
रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ। मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ॥मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी। जेहिं सपनेहुँ परनारि न हेरी॥॥३॥
रघुवंशियों का यह सहज स्वभाव है कि उनका मन कभी कुमार्ग पर पैर नहीं रखता। मुझे अपने मन पर अत्यंत विश्वास है, जिसने स्वप्न में भी दूसरी स्त्री की ओर नहीं देखा।
जिन्ह के लहहिं न रिपु रन पीठी। नहिं पावहिं परतिय मनु डीठी॥मंगन लहहिं न जिन्ह कै नाहीं। ते नरबर थोरे जग माहीं॥॥४॥
जो युद्ध में शत्रु को पीठ नहीं दिखाते, जो कभी परायी स्त्री पर दृष्टि नहीं डालते, जिनके यहाँ याचक नहीं शब्द नहीं सुनते — ऐसे श्रेष्ठ पुरुष संसार में बहुत थोड़े हैं।
करत बतकहि अनुज सन मन सिय रूप लोभान।मुख सरोज मकरंद छबि करइ मधुप इव पान॥२३१॥
अनुज से बातें करते हुए भी राम का मन सीता के रूप में लोभित हो गया था, मानो भ्रमर उनके मुख-कमल की मकरंद-छटा का पान कर रहा हो।
चितवहि चकित चहूँ दिसि सीता। कहँ गए नृपकिसोर मनु चिंता॥जहँ बिलोक मृग सावक नैनी। जनु तहँ बरिस कमल सित श्रेनी॥॥१॥
सीता चकित होकर चारों दिशाओं में देख रही थीं — राजकुमार कहाँ गए, इसी चिंता में मन डूबा था। जहाँ भी वे मृग-शावक जैसी आँखों से देखतीं, वहीं मानो श्वेत कमलों की पंक्ति बरस उठती।
लता ओट तब सखिन्ह लखाए। स्यामल गौर किसोर सुहाए॥देखि रूप लोचन ललचाने। हरषे जनु निज निधि पहिचाने॥॥२॥
तब सखियों ने उन्हें लता की ओट से दिखाया — श्यामल और गौर सुंदर किशोर। उनका रूप देखकर नेत्र ललचा उठे, हर्षित हुए मानो अपनी ही खोई निधि पहचान ली हो।
थके नयन रघुपति छबि देखें। पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें॥अधिक सनेहँ देह भै भोरी। सरद ससिहि जनु चितव चकोरी॥॥३॥
रघुपति की छवि देखते-देखते नेत्र थक गए, पलकें भी झपकना भूल गईं। अधिक स्नेह से देह भोली-सी हो उठी, मानो चकोरी शरद ऋतु के चंद्रमा को निहार रही हो।
लोचन मग रामहि उर आनी। दीन्हे पलक कपाट सयानी॥जब सिय सखिन्ह प्रेमबस जानी। कहि न सकहिं कछु मन सकुचानी॥॥४॥
नेत्रों के मार्ग से राम को हृदय में बसाकर, सयानी सीता ने पलकों के किवाड़ बंद कर दिए। जब सखियों ने सीता को प्रेम-विभोर जाना, तो संकोचवश मन में कुछ कह न सकीं।
लताभवन तें प्रगट भे तेहि अवसर दोउ भाइ।निकसे जनु जुग बिमल बिधु जलद पटल बिलगाइ॥२३२॥
उसी अवसर पर लता-कुंज से दोनों भाई प्रकट हुए, मानो बादलों के पर्दे को हटाकर दो निर्मल चंद्रमा निकल आए हों।
सोभा सीवँ सुभग दोउ बीरा। नील पीत जलजाभ सरीरा॥मोरपंख सिर सोहत नीके। गुच्छ बीच बिच कुसुम कली के॥॥१॥
शोभा की सीमा के समान सुंदर दोनों वीर, नीले और पीले कमल जैसे रंग के शरीर। सिर पर मोरपंख भली भाँति शोभा पा रहे थे, बीच-बीच में फूलों की कलियों के गुच्छे थे।
भाल तिलक श्रमबिंदु सुहाए। श्रवन सुभग भूषन छबि छाए॥बिकट भृकुटि कच घूघरवारे। नव सरोज लोचन रतनारे॥॥२॥
ललाट पर तिलक और पसीने की बूँदें सुहा रही थीं, कानों में सुंदर आभूषणों की छटा छाई थी। विकट भौंहें, घुँघराले बाल, नए खिले कमल जैसे लाल नेत्र।
चारु चिबुक नासिका कपोला। हास बिलास लेत मनु मोला॥मुखछबि कहि न जाइ मोहि पाहीं। जो बिलोकि बहु काम लजाहीं॥॥३॥
सुंदर ठोड़ी, नासिका और कपोल थे, मुस्कान का विलास मन को मोल ले लेता। मुख की छवि मुझसे कही नहीं जा सकती, जिसे देखकर करोड़ों कामदेव भी लजा जाएँ।
उर मनि माल कंबु कल गीवा। काम कलभ कर भुज बलसींवा॥सुमन समेत बाम कर दोना। सावँर कुअँर सखी सुठि लोना॥॥४॥
वक्षस्थल पर मणिमाला, शंख जैसी सुंदर गर्दन, हाथी के बच्चे की सूँड़ जैसी सुदृढ़ भुजाएँ। बाएँ हाथ में फूलों सहित दोना लिए, वह श्यामल कुँवर सखी को अत्यंत मनभावन लगे।
केहरि कटि पट पीत धर सुषमा सील निधान।देखि भानुकुलभूषनहि बिसरा सखिन्ह अपान॥२३३॥
सिंह जैसी कमर, पीला वस्त्र धारण किए, सौंदर्य और शील के भंडार — सूर्यवंश के आभूषण राम को देखकर सखियाँ अपनी सुध-बुध ही भूल गईं।
धरि धीरजु एक आलि सयानी। सीता सन बोली गहि पानी॥बहुरि गौरि कर ध्यान करेहू। भूपकिसोर देखि किन लेहू॥॥१॥
एक सयानी सखी ने धैर्य धारण करके, सीता का हाथ पकड़कर कहा — फिर से गौरी का ध्यान करो, राजकुमार को देख क्यों नहीं लेतीं?
सकुचि सीयँ तब नयन उघारे। सनमुख दोउ रघुसिंघ निहारे॥नख सिख देखि राम के सोभा। सुमिरि पिता पनु मनु अति छोभा॥॥२॥
संकोचवश सीता ने तब नेत्र खोले, सम्मुख दोनों रघुसिंहों को निहारा। नख से शिख तक राम की शोभा देखकर, पिता की प्रतिज्ञा का स्मरण करके मन अत्यंत व्याकुल हो उठा।
परबस सखिन्ह लखी जब सीता। भयउ गहरु सब कहहिं सभीता॥पुनि आउब एहि बेरिआँ काली। अस कहि मन बिहसी एक आली॥॥३॥
जब सखियों ने देखा कि सीता परवश हो गई हैं, तो देर होते देख सब भयभीत होकर कहने लगीं — कल इसी समय फिर आएँगे, ऐसा कहकर एक सखी मन-ही-मन मुस्कराई।
गूढ़ गिरा सुनि सिय सकुचानी। भयउ बिलंबु मातु भय मानी॥धरि बड़ि धीर रामु उर आने। फिरि अपनपउ पितुबस जाने॥॥४॥
यह गूढ़ वचन सुनकर सीता सकुचा गईं, देर होते देख माता के भय से डर गईं। बड़ा धैर्य धारण करके, राम को हृदय में बसाकर, वे अपनी स्थिति को पिता के अधीन जानकर लौट पड़ीं।
देखन मिस मृग बिहग तरु फिरइ बहोरि बहोरि।निरखि निरखि रघुबीर छबि बाढ़इ प्रीति न थोरि॥॥२३४॥
देखने के बहाने मृग-पक्षी और वृक्षों को निहारते हुए वे बार-बार मुड़तीं, रघुवीर की छवि देख-देखकर उनकी प्रीति कम नहीं बल्कि और बढ़ती जाती।
जानि कठिन सिवचाप बिसूरति। चली राखि उर स्यामल मूरति॥प्रभु जब जात जानकी जानी। सुख सनेह सोभा गुन खानी॥॥१॥
शिवजी के धनुष को कठिन जानकर वे व्याकुल थीं, श्यामल मूर्ति को हृदय में बसाए हुए वे चल पड़ीं। जब प्रभु ने जानकी को जाते देखा, तो सुख, स्नेह, शोभा और गुणों की खान —
परम प्रेममय मृदु मसि कीन्ही। चारु चित भीतीं लिख लीन्ही॥गई भवानी भवन बहोरी। बंदि चरन बोली कर जोरी॥॥२॥
उन्होंने परम प्रेममय, मृदु स्याही बनाई, और अपने सुंदर चित्त की भित्ति पर उसे अंकित कर लिया। सीता भी लौटकर भवानी के मंदिर गईं, चरण वंदन करके हाथ जोड़कर बोलीं —
जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी॥जय गज बदन षड़ानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता॥॥३॥
जय जय, हे गिरिराज की किशोरी! जय, हे महेश के मुख-चंद्रमा की चकोरी! जय, हे गजानन और षडानन की माता! हे जगत-जननी, आपका शरीर बिजली की चमक-सा है।
नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना॥भव भव बिभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि॥॥४॥
आपका न आदि है, न मध्य, न अंत — आपका अपार प्रभाव तो वेद भी नहीं जानते। आप संसार के ऐश्वर्य और पराभव दोनों की कारण हैं, विश्व को मोहित करने वाली, अपनी ही इच्छा से विहार करने वाली हैं।
पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख।महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष॥२३५॥
गौरी कहती हैं - पतिव्रता स्त्रियों में सबसे पहले तुम्हारा ही नाम आता है, हे सीता; तुम्हारी महिमा इतनी अपार है कि हजार शारदा और शेषनाग भी मिलकर उसका पूरा वर्णन नहीं कर सकते।
सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायनी पुरारि पिआरी॥देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे॥॥१॥
हे वरदायिनी, हे शिवप्रिया! तुम्हारी सेवा से चारों फल (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) सहज ही मिल जाते हैं। हे देवी! तुम्हारे चरण-कमलों की पूजा करके देवता, मनुष्य और मुनि सभी सुखी हो जाते हैं।
मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबही कें॥कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं। अस कहि चरन गहे बैदेहीं॥॥२॥
तुम मेरे मन की इच्छा भलीभाँति जानती हो, तुम सबके हृदय में सदा निवास करती हो; इसीलिए मैंने अपनी इच्छा प्रकट नहीं की। ऐसा कहकर सीता ने देवी के चरण पकड़ लिए।
बिनय प्रेम बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी॥सादर सिय प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ॥॥३॥
सीता की विनय और प्रेम से भवानी प्रसन्न हो गईं, प्रतिमा मुसकराई और गले की माला (आप ही) खिसक पड़ी। सीता ने आदरपूर्वक उस प्रसाद को सिर पर धारण किया, और हृदय में हर्ष भरकर गौरी बोल उठीं।
सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी॥नारद बचन सदा सुचि साचा। सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा॥॥४॥
सुनो सीता, हमारा यह आशीर्वाद सत्य होगा, तुम्हारे मन की कामना अवश्य पूर्ण होगी। नारदजी का वचन सदा पवित्र और सत्य होता है, इसलिए वही वर तुम्हें मिलेगा जिसमें तुम्हारा मन रम गया है।
मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो।करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो॥एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली।तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥
जिसमें मन रम गया है, वही सहज सुंदर साँवला वर तुम्हें मिलेगा; वह करुणा का सागर और सुजान है, तुम्हारे शील और स्नेह को वह भलीभाँति जानता है। इस प्रकार गौरी का आशीर्वाद सुनकर सीता अपनी सखियों सहित हृदय में हर्षित हुईं। तुलसीदास कहते हैं कि भवानी को बारंबार पूजकर सीता प्रसन्न मन से महल को लौट चलीं।
जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे॥२३६॥
गौरी को अनुकूल जानकर सीता के हृदय का हर्ष कहा नहीं जा सकता; सुंदर मंगल के सूचक उनके बाएँ अंग फड़कने लगे।
हृदयँ सराहत सीय लोनाई। गुर समीप गवने दोउ भाई॥राम कहा सबु कौसिक पाहीं। सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं॥॥१॥
मन-ही-मन सीता के सौंदर्य की सराहना करते हुए दोनों भाई गुरु के पास गए। सरल स्वभाव के राम ने विश्वामित्र मुनि से सब कुछ यथावत कह दिया, क्योंकि छल उनके स्वभाव को छूता तक नहीं था।
सुमन पाइ मुनि पूजा कीन्ही। पुनि असीस दुहु भाइन्ह दीन्ही॥सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे। रामु लखनु सुनि भए सुखारे॥॥२॥
फूल पाकर मुनि ने अपनी पूजा पूर्ण की, फिर दोनों भाइयों को आशीर्वाद दिया - तुम्हारे सब मनोरथ सफल हों। यह सुनकर राम और लक्ष्मण दोनों सुखी हुए।
करि भोजनु मुनिबर बिग्यानी। लगे कहन कछु कथा पुरानी॥बिगत दिवसु गुरु आयसु पाई। संध्या करन चले दोउ भाई॥॥३॥
भोजन करके ज्ञानी मुनि विश्वामित्र कुछ पुरानी कथाएँ सुनाने लगे। इस प्रकार दिन बीत गया; गुरु की आज्ञा पाकर दोनों भाई संध्या-वंदन करने चले गए।
प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा। सिय मुख सरिस देखि सुखु पावा॥बहुरि बिचारु कीन्ह मन माहीं। सीय बदन सम हिमकर नाहीं॥॥४॥
पूर्व दिशा में सुंदर चंद्रमा उदय हुआ; राम ने उसे देखकर सीता के मुख जैसा जानकर सुख पाया। फिर मन में विचार किया कि नहीं, चंद्रमा सीता के मुख के समान नहीं हो सकता।
जनमु सिंधु पुनि बंधु बिषु दिन मलीन सकलंक।सिय मुख समता पाव किमि चंदु बापुरो रंक॥२३७॥
चंद्रमा का जन्म समुद्र से हुआ, विष उसका बंधु है, दिन में वह मलिन पड़ जाता है और उस पर कलंक भी है - ऐसा बेचारा दरिद्र चंद्रमा भला सीता के मुख की समानता कैसे पा सकता है।
घटइ बढ़इ बिरहनि दुखदाई। ग्रसइ राहु निज संधिहिं पाई॥कोक सिकप्रद पंकज द्रोही। अवगुन बहुत चंद्रमा तोही॥॥१॥
चंद्रमा घटता-बढ़ता रहता है, विरहिणियों को दुख देता है, अवसर पाकर राहु उसे ग्रस लेता है; वह चकवा-चकवी को शोक देने वाला और कमल का शत्रु है - हे चंद्रमा, तुझमें तो बहुत अवगुण हैं।
बैदेही मुख पटतर दीन्हे। होइ दोष बड़ अनुचित कीन्हे॥सिय मुख छबि बिधु ब्याज बखानी। गुर पहिं चले निसा बड़ि जानी॥॥२॥
सीता के मुख की उपमा तुझसे देना ही बड़ा दोष और अनुचित कार्य होगा। इस प्रकार चंद्रमा के बहाने सीता की मुख-छवि का बखान करते हुए, रात बहुत बीत गई जानकर राम गुरु के पास लौट चले।
करि मुनि चरन सरोज प्रनामा। आयसु पाइ कीन्ह बिश्रामा॥बिगत निसा रघुनायक जागे। बंधु बिलोकि कहन अस लागे॥॥३॥
मुनि के चरण-कमलों में प्रणाम करके, आज्ञा पाकर वे विश्राम करने लगे। रात बीतने पर राम जागे और अपने भाई को देखकर इस प्रकार कहने लगे।
उदउ अरुन अवलोकहु ताता। पंकज कोक लोक सुखदाता॥बोले लखनु जोरि जुग पानी। प्रभु प्रभाउ सूचक मृदु बानी॥॥४॥
हे भाई, देखो सूर्य उदय हुआ, जो कमल, चकवा और सारे संसार को सुख देने वाला है। तब लक्ष्मण दोनों हाथ जोड़कर प्रभु के प्रभाव को सूचित करने वाली कोमल वाणी में बोले।
अरुनोदयँ सकुचे कुमुद उडगन जोति मलीन।जिमि तुम्हार आगमन सुनि भए नृपति बलहीन॥२३८॥
हे प्रभु! जैसे सूर्योदय होते ही कुमुदिनी सकुचा जाती है और तारों की ज्योति फीकी पड़ जाती है, वैसे ही आपके आगमन का समाचार सुनकर सभी राजा बलहीन हो गए हैं।
नृप सब नखत करहिं उजिआरी। टारि न सकहिं चाप तम भारी॥कमल कोक मधुकर खग नाना। हरषे सकल निसा अवसाना॥॥१॥
ये सब राजा तारों के समान थोड़ी बहुत चमक तो दिखा रहे हैं, पर धनुष रूपी घोर अंधकार को टाल नहीं सकते। जैसे रात्रि के अंत में कमल, चकवा, भ्रमर और अनेक पक्षी हर्षित होते हैं, वैसे ही आपके आगमन से सब हर्षित होंगे।
ऐसेहिं प्रभु सब भगत तुम्हारे। होइहहिं टूटें धनुष सुखारे॥उयउ भानु बिनु श्रम तम नासा। दुरे नखत जग तेजु प्रकासा॥॥२॥
हे प्रभु, ऐसे ही आपके सब भक्त धनुष टूटने पर सुखी होंगे। सूर्य उदय होते ही बिना परिश्रम अंधकार नष्ट हो जाता है, तारे छिप जाते हैं और संसार में तेज का प्रकाश फैल जाता है।
रबि निज उदय ब्याज रघुराया। प्रभु प्रतापु सब नृपन्ह दिखाया॥तव भुज बल महिमा उदघाटी। प्रगटी धनु बिघटन परिपाटी॥॥३॥
हे रघुनाथ! सूर्य ने अपने उदय के बहाने मानो आपका प्रताप ही सब राजाओं को दिखा दिया है। आपकी भुजाओं के बल की महिमा प्रकट करने के लिए ही धनुष तोड़ने की यह रीति प्रकट हुई है।
बंधु बचन सुनि प्रभु मुसुकाने। होइ सुचि सहज पुनीत नहाने॥नित्यक्रिया करि गुरु पहिं आए। चरन सरोज सुभग सिर नाए॥॥४॥
भाई के वचन सुनकर प्रभु मुसकराए, फिर पवित्र होकर सहज ही स्नान किया। नित्यकर्म करके वे गुरु के पास आए और उनके सुंदर चरण-कमलों में सिर नवाया।
सतानंदु तब जनक बोलाए। कौसिक मुनि पहिं तुरत पठाए॥जनक बिनय तिन्ह आइ सुनाई। हरषे बोलि लिए दोउ भाई॥॥५॥
तब राजा जनक ने शतानंद मुनि को बुलाया और तुरंत विश्वामित्र मुनि के पास भेजा। शतानंद ने आकर जनक का निमंत्रण सुनाया; विश्वामित्र प्रसन्न होकर दोनों भाइयों को बुला लाए।
सतानंदपद बंदि प्रभु बैठे गुर पहिं जाइ।चलहु तात मुनि कहेउ तब पठवा जनक बोलाइ॥२३९॥
शतानंद के चरणों की वंदना करके प्रभु राम गुरु के पास जाकर बैठ गए। तब मुनि विश्वामित्र ने कहा - हे तात, चलो, राजा जनक ने बुलावा भेजा है।
सीय स्वयंबरु देखिअ जाई। ईसु काहि धौं देइ बड़ाई॥लखन कहा जस भाजनु सोई। नाथ कृपा तव जापर होई॥॥१॥
चलकर सीता का स्वयंवर देखें, देखें ईश्वर किसे यह बड़ाई देता है। लक्ष्मण ने कहा - हे नाथ, यश का पात्र वही होगा जिस पर आपकी कृपा होगी।
हरषे मुनि सब सुनि बर बानी। दीन्हि असीस सबहिं सुखु मानी॥पुनि मुनिबृंद समेत कृपाला। देखन चले धनुषमख साला॥॥२॥
लक्ष्मण की यह श्रेष्ठ वाणी सुनकर सब मुनि हर्षित हुए और सुख मानकर सबने आशीर्वाद दिया। फिर कृपालु राम मुनियों के समूह सहित धनुष-यज्ञशाला देखने चले।
रंगभूमि आए दोउ भाई। असि सुधि सब पुरबासिन्ह पाई॥चले सकल गृह काज बिसारी। बाल जुबान जरठ नर नारी॥॥३॥
दोनों भाई रंगभूमि में आ पहुँचे, यह समाचार सब नगरवासियों को मिल गया। तब बालक, युवा, वृद्ध, स्त्री-पुरुष सभी अपने घर का काम-काज भूलकर चल पड़े।
देखी जनक भीर भै भारी। सुचि सेवक सब लिए हँकारी॥तुरत सकल लोगन्ह पहिं जाहू। आसन उचित देहू सब काहू॥॥४॥
जनक ने देखा कि भीड़ बहुत भारी हो गई है, तब उन्होंने अपने विश्वसनीय सेवकों को बुलाकर कहा - तुरंत सब लोगों के पास जाओ और सबको उचित आसन दो।
कहि मृदु बचन बिनीत तिन्ह बैठारे नर नारि।उत्तम मध्यम नीच लघु निज निज थल अनुहारि॥२४०॥
सेवकों ने मीठे और विनम्र वचन कहकर सब स्त्री-पुरुषों को बिठाया, और उत्तम, मध्यम, निम्न तथा साधारण सबको उनके योग्य स्थान पर बिठाया।
राजकुअँर तेहि अवसर आए। मनहुँ मनोहरता तन छाए॥गुन सागर नागर बर बीरा। सुंदर स्यामल गौर सरीरा॥॥१॥
उसी अवसर पर राजकुमार वहाँ आए, मानो उनके शरीर में साक्षात मनोहरता ही छा गई हो। वे गुणों के सागर, चतुर और श्रेष्ठ वीर थे, एक का शरीर साँवला और दूसरे का गोरा सुंदर था।
राज समाज बिराजत रूरे। उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे॥जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी॥॥२॥
राजाओं की सभा में वे दोनों ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो तारों के बीच दो पूर्ण चंद्रमा हों। जिस-जिस दर्शक की जैसी भावना थी, उसने प्रभु की मूर्ति वैसी ही देखी।
देखहिं रूप महा रनधीरा। मनहुँ बीर रसु धरें सरीरा॥डरे कुटिल नृप प्रभुहि निहारी। मनहुँ भयानक मूरति भारी॥॥३॥
कोई उन्हें महान रणधीर वीर के रूप में देखता, मानो वीर रस ने ही शरीर धारण कर लिया हो। कुटिल राजा प्रभु को देखकर डर गए, मानो उन्हें कोई भयानक विकराल मूर्ति दिखाई दे रही हो।
रहे असुर छल छोनिप बेषा। तिन्ह प्रभु प्रगट कालसम देखा॥पुरबासिन्ह देखे दोउ भाई। नरभूषन लोचन सुखदाई॥॥४॥
जो असुर छल से राजा का वेश धरकर वहाँ बैठे थे, उन्होंने प्रभु को साक्षात काल के समान प्रकट देखा। परंतु नगरवासियों ने तो दोनों भाइयों को नरों के भूषण और नेत्रों को सुख देने वाले रूप में देखा।
नारि बिलोकहिं हरषि हियँ निज निज रुचि अनुरूप।जनु सोहत सिंगार धरि मूरति परम अनूप॥२४१॥
सब स्त्रियाँ हर्षित हृदय से अपनी-अपनी रुचि के अनुसार उन्हें निहारती थीं, मानो वह परम अनुपम मूर्ति साक्षात श्रृंगार-रस धारण कर सुशोभित हो रही हो।
बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीसा। बहु मुख कर पग लोचन सीसा॥जनक जाति अवलोकहिं कैसैं। सजन सगे प्रिय लागहिं जैसें॥॥१॥
विद्वानों को प्रभु विराट रूप में दिखाई दिए, जिनके अनेक मुख, हाथ, पैर, नेत्र और सिर हैं। मिथिलावासी उन्हें कैसे देखते थे - जैसे अपने प्रिय सगे-संबंधी को देखा जाता है, वैसे ही प्रेम से।
सहित बिदेह बिलोकहिं रानी। सिसु सम प्रीति न जाति बखानी॥जोगिन्ह परम तत्वमय भासा। सांत सुद्ध सम सहज प्रकासा॥॥२॥
राजा जनक सहित रानी सुनयना उन्हें अपने पुत्र के समान प्रेम से देखती थीं, वह प्रीति वर्णन नहीं की जा सकती। योगियों को वे परम तत्त्वमय, शांत, शुद्ध, सम और सहज प्रकाशस्वरूप दिखाई दिए।
हरिभगतन्ह देखे दोउ भ्राता। इष्टदेव इव सब सुख दाता॥रामहि चितव भायँ जेहि सीया। सो सनेहु सुखु नहिं कथनीया॥॥३॥
हरि के भक्तों ने दोनों भाइयों को अपने इष्टदेव के समान सबको सुख देने वाला देखा। और जिस भाव से सीता राम को निहार रही थीं, उस स्नेह और सुख का वर्णन नहीं किया जा सकता।
उर अनुभवति न कहि सक सोऊ। कवन प्रकार कहै कबि कोऊ॥एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ। तेहिं तस देखेउ कोसलराऊ॥॥४॥
सीता स्वयं भी हृदय में जो अनुभव कर रही थीं उसे कह नहीं पातीं, फिर भला कोई कवि उसे कैसे कह सकता है। इस प्रकार जिस-जिस दर्शक का जैसा भाव था, उसने कोसलराज राम को वैसा ही देखा।
राजत राज समाज महुँ कोसलराज किसोर।सुंदर स्यामल गौर तन बिस्व बिलोचन चोर॥२४२॥
राजाओं की उस सभा में कोसलराज के दोनों किशोर पुत्र ऐसे सुशोभित हो रहे थे - एक साँवले और एक गोरे सुंदर शरीर वाले - मानो वे सारे संसार के नेत्रों को चुराने वाले हों।
सहज मनोहर मूरति दोऊ। कोटि काम उपमा लघु सोऊ॥सरद चंद निंदक मुख नीके। नीरज नयन भावते जी के॥॥१॥
दोनों की मूर्ति स्वभाव से ही मनोहर थी, करोड़ों कामदेव भी उनकी उपमा देने में तुच्छ पड़ जाएँ। उनके सुंदर मुख शरद ऋतु के चंद्रमा को भी लजाने वाले थे और उनके कमल-सरीखे नेत्र सबके मन को भाते थे।
चितवत चारु मार मनु हरनी। भावति हृदय जाति नहिं बरनी॥कल कपोल श्रुति कुंडल लोला। चिबुक अधर सुंदर मृदु बोला॥॥२॥
उनकी सुंदर चितवन कामदेव के भी मन को हरने वाली थी, वह हृदय को इतनी भाती थी कि उसका वर्णन नहीं हो सकता। उनके सुंदर कपोल, कानों में हिलते कुंडल, ठोड़ी, अधर और मृदु वाणी सब मनोहर थे।
कुमुदबंधु कर निंदक हाँसा। भृकुटी बिकट मनोहर नासा॥भाल बिसाल तिलक झलकाहीं। कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं॥॥३॥
उनकी हँसी चंद्रमा की चाँदनी को भी लजाने वाली थी, भौंहें विकट और नासिका मनोहर थी। उनके विशाल भाल पर तिलक झलकता था, और उनके केश देखकर भ्रमरों की पंक्ति भी लजा जाती थी।
पीत चौतनीं सिरन्हि सुहाई। कुसुम कलीं बिच बीच बनाईं॥रेखें रुचिर कंबु कल गीवाँ। जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ॥॥४॥
उनके सिरों पर पीली टोपियाँ शोभा दे रही थीं, जिनमें बीच-बीच में फूलों की कलियाँ लगी थीं। उनकी शंख जैसी सुंदर ग्रीवा पर रेखाएँ ऐसी थीं मानो त्रिभुवन की समस्त सुंदरता की सीमा वहीं हो।
कुंजर मनि कंठा कलित उरन्हि तुलसिका माल।बृषभ कंध केहरि ठवनि बल निधि बाहु बिसाल॥२४३॥
उनके गले में गजमुक्ता की माला और वक्षस्थल पर तुलसी की सुंदर माला शोभित थी। उनके कंधे बैल के समान और चाल सिंह जैसी थी, उनकी विशाल भुजाएँ बल की निधि थीं।
कटि तूनीर पीत पट बाँधे। कर सर धनुष बाम बर काँधे॥पीत जग्य उपबीत सुहाए। नख सिख मंजु महाछबि छाए॥॥१॥
कमर में तरकश और पीत वस्त्र बँधे थे, हाथ में बाण और बाईं ओर सुंदर धनुष धारण किए थे। पीत यज्ञोपवीत सुशोभित था; इस प्रकार नख से शिख तक उनके सुंदर महान सौंदर्य की छटा छाई हुई थी।
देखि लोग सब भए सुखारे। एकटक लोचन चलत न तारे॥हरषे जनकु देखि दोउ भाई। मुनि पद कमल गहे तब जाई॥॥२॥
उन्हें देखकर सब लोग सुखी हो गए, उनके नेत्रों की पुतलियाँ एकटक होकर हिलती ही न थीं। दोनों भाइयों को देखकर राजा जनक हर्षित हुए, फिर जाकर उन्होंने मुनि विश्वामित्र के चरण-कमल पकड़ लिए।
करि बिनती निज कथा सुनाई। रंग अवनि सब मुनिहि देखाई॥जहँ जहँ जाहि कुअँर बर दोऊ। तहँ तहँ चकित चितव सबु कोऊ॥॥३॥
विनती करके जनक ने अपनी सारी कथा सुनाई और मुनि को समूची रंगभूमि दिखाई। दोनों सुंदर राजकुमार जहाँ-जहाँ जाते, वहाँ-वहाँ सब लोग चकित होकर उन्हें निहारते थे।
निज निज रुख रामहि सबु देखा। कोउ न जान कछु मरमु बिसेषा॥भलि रचना मुनि नृप सन कहेऊ। राजाँ मुदित महासुख लहेऊ॥॥४॥
सबने राम को अपनी-अपनी दृष्टि के अनुसार ही देखा, कोई भी उनका विशेष रहस्य नहीं जान सका। मुनि ने राजा से यज्ञशाला की सुंदर रचना की प्रशंसा की, जिसे सुनकर राजा जनक ने अत्यंत हर्ष और सुख पाया।
सब मंचन्ह ते मंचु एक सुंदर बिसद बिसाल।मुनि समेत दोउ बंधु तहँ बैठारे महिपाल॥२४४॥
सब मंचों में से एक सबसे सुंदर, स्वच्छ और विशाल मंच था; राजा जनक ने मुनि विश्वामित्र सहित दोनों भाइयों को उसी मंच पर बिठाया।
प्रभुहि देखि सब नृप हिंयँ हारे। जनु राकेस उदय भए तारे॥असि प्रतीति सब के मन माहीं। राम चाप तोरब सक नाहीं॥॥१॥
प्रभु राम को देखकर सब राजा हृदय से हार गए, मानो पूर्ण चंद्रमा के उदय होते ही तारे फीके पड़ गए हों। सबके मन में यह विश्वास हो गया कि राम के अतिरिक्त और कोई भी वह धनुष तोड़ नहीं सकता।
बिनु भंजेहुँ भव धनुषु बिसाला। मेलिहि सीय राम उर माला॥अस बिचारि गवनहु घर भाई। जसु प्रतापु बलु तेजु गवाँई॥॥२॥
उस विशाल शिव-धनुष को बिना तोड़े ही सीता राम के गले में वरमाला डाल देंगी - ऐसा सोचकर राजा आपस में कहने लगे कि हे भाइयो, अपना यश, प्रताप, बल और तेज गँवाकर व्यर्थ यहाँ रुकने से अच्छा है घर लौट चलें।
बिहसे अपर भूप सुनि बानी। जे अबिबेक अंध अभिमानी॥तोरेहुँ धनुषु ब्याहु अवगाहा। बिनु तोरें को कुअँरि बिआहा॥॥३॥
यह वचन सुनकर दूसरे अज्ञानी और अंधे अभिमानी राजा हँस पड़े - बोले, धनुष तोड़ने पर ही तो विवाह होना निश्चित है, बिना तोड़े भला कुआँरी कन्या से विवाह कौन कर सकता है।
एक बार कालउ किन होऊ। सिय हित समर जितब हम सोऊ॥यह सुनि अवर महिप मुसकाने। धरमसील हरिभगत सयाने॥॥४॥
चाहे एक बार काल ही क्यों न सामने आ जाए, हम सीता के लिए युद्ध में विजय अवश्य पाएँगे। यह सुनकर दूसरे धर्मशील, हरिभक्त और बुद्धिमान राजा मुसकरा दिए।
सीय बिआहबि राम गरब दूरि करि नृपन्ह के।जीति को सक संग्राम दसरथ के रन बाँकुरे॥२४५०॥
वे बुद्धिमान राजा जानते थे कि राम ही सब राजाओं का घमंड दूर करके सीता से विवाह करेंगे; दशरथ के रणबाँके पुत्र से युद्ध में विजय पाना किसके वश की बात है।
ब्यर्थ मरहु जनि गाल बजाई। मन मोदकन्हि कि भूख बुताई॥सिख हमारि सुनि परम पुनीता। जगदंबा जानहु जियँ सीता॥॥१॥
वे राजा आपस में कहने लगे - व्यर्थ डींग हाँककर मत मरो, क्या मन के कल्पित लड्डुओं से कभी भूख मिटती है। हमारी यह परम पवित्र सीख सुनो - सीता को साक्षात जगदंबा जानो।
जगत पिता रघुपतिहि बिचारी। भरि लोचन छबि लेहु निहारी॥सुंदर सुखद सकल गुन रासी। ए दोउ बंधु संभु उर बासी॥॥२॥
राम को जगत का पिता समझकर नेत्र भरकर उनकी छवि निहार लो; ये दोनों भाई सुंदर, सुखदायी और समस्त गुणों की राशि हैं, स्वयं शिव के हृदय में निवास करने वाले हैं।
सुधा समुद्र समीप बिहाई। मृगजलु निरखि मरहु कत धाई॥करहु जाइ जा कहुँ जोई भावा। हम तौ आजु जनम फलु पावा॥॥३॥
अमृत के समुद्र को पास छोड़कर मृगतृष्णा के जल को देखकर व्यर्थ दौड़कर क्यों मरते हो। जिस राजा को जो कुछ जँचे वह जाकर करे, हमने तो आज अपने जन्म का फल पा लिया है।
अस कहि भले भूप अनुरागे। रूप अनूप बिलोकन लागे॥देखहिं सुर नभ चढ़े बिमाना। बरषहिं सुमन करहिं कल गाना॥॥४॥
ऐसा कहकर वे भले राजा प्रेममग्न होकर उस अनुपम रूप को निहारने लगे। आकाश में विमानों पर चढ़े देवता भी यह दृश्य देख रहे थे, वे फूल बरसाते और मधुर गीत गाते थे।
जानि सुअवसरु सीय तब पठई जनक बोलाई।चतुर सखीं सुंदर सकल सादर चलीं लवाईं॥२४६॥
शुभ अवसर जानकर राजा जनक ने सीता को बुलावा भेजा; सब चतुर और सुंदर सखियाँ आदरपूर्वक उन्हें साथ लेकर चलीं।
सिय सोभा नहिं जाइ बखानी। जगदंबिका रूप गुन खानी॥उपमा सकल मोहि लघु लागीं। प्राकृत नारि अंग अनुरागीं॥॥१॥
सीता की शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता, वे साक्षात जगदंबा हैं, रूप और गुणों की खान हैं। तुलसीदास कहते हैं - मुझे उनके लिए सब उपमाएँ तुच्छ लगती हैं, क्योंकि वे तो साधारण स्त्रियों के अंगों से जुड़ी हुई होती हैं।
सिय बरनिअ जेहि उपमा देई। कुकबि कहाइ अजसु को लेई॥जौं पटतरिअ तीय सम सीया। जग असि जुबति कहाँ कमनीया॥॥२॥
सीता का वर्णन करने के लिए कैसी उपमा दी जाए - बुरा कवि कहलाकर भला अपयश कौन ले। यदि सीता की तुलना किसी अन्य स्त्री से करें, तो संसार में ऐसी सुंदर युवती है ही कहाँ।
गिरा मुखर तन अरध भवानी। रति अति दुखित अतनु पति जानी॥बिष बारुनी बंधु प्रिय जेही। कहिअ रमासम किमि बैदेही॥॥३॥
सरस्वती वाचाल हैं, पार्वती का आधा शरीर शिव संग है, रति अपने पति कामदेव को अनंग जानकर अत्यंत दुखी रहती हैं, लक्ष्मी का प्रिय भाई विष और मदिरा है - ऐसे में सीता की तुलना लक्ष्मी से भी कैसे की जाए।
जौं छबि सुधा पयोनिधि होई। परम रूपमय कच्छप सोई॥सोभा रजु मंदरु सिंगारू। मथै पानि पंकज निज मारू॥॥४॥
यदि सौंदर्य का अमृत-सागर हो और परम रूपमय कच्छप भी वही हो, शोभा रूपी रस्सी और शृंगार रूपी मंदराचल हो, तो कामदेव अपने कमल-सरीखे हाथों से उसे मथकर सीता का सौंदर्य उत्पन्न करे।
एहि बिधि उपजै लच्छि जब सुंदरता सुख मूल।तदपि सकोच समेत कबि कहहिं सीय समतूल॥२४७॥
इस प्रकार यदि सुंदरता और सुख की मूल लक्ष्मी उत्पन्न हों, तब भी कवि संकोच के साथ ही उन्हें सीता के समान कहते हैं, क्योंकि सीता की तुलना करना भी दुष्कर है।
चलीं संग लै सखीं सयानी। गावत गीत मनोहर बानी॥सोह नवल तनु सुंदर सारी। जगत जननि अतुलित छबि भारी॥॥१॥
बुद्धिमान सखियों को साथ लेकर सीता चलीं, वे मनोहर वाणी में मंगल गीत गा रही थीं। नवीन शरीर पर सुंदर साड़ी सुशोभित थी; जगत की माता की वह अतुलनीय छवि अपार थी।
भूषन सकल सुदेस सुहाए। अंग अंग रचि सखिन्ह बनाए॥रंगभूमि जब सिय पगु धारी। देखि रूप मोहे नर नारी॥॥२॥
सखियों ने सभी सुंदर आभूषण अंग-अंग पर सजाकर पहनाए थे। जब सीता ने रंगभूमि में पैर रखा, तो उनका रूप देखकर सब स्त्री-पुरुष मोहित हो गए।
हरषि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई। बरषि प्रसून अपछरा गाई॥पानि सरोज सोह जयमाला। अवचट चितए सकल भुआला॥॥३॥
हर्षित देवताओं ने नगाड़े बजाए, अप्सराओं ने फूल बरसाकर गीत गाए। सीता के कमल-सरीखे हाथ में जयमाला शोभित थी; अकस्मात सब राजाओं की दृष्टि उन पर पड़ गई।
सीय चकित चित रामहि चाहा। भए मोहबस सब नरनाहा॥मुनि समीप देखे दोउ भाई। लगे ललकि लोचन निधि पाई॥॥४॥
चकित मन से सीता ने राम को निहारा, और सब राजा मोहवश हो गए। मुनि विश्वामित्र के पास दोनों भाइयों को देखकर सीता के नेत्र मानो कोई निधि पाकर ललचाने लगे।
गुरजन लाज समाजु बड़ देखि सीय सकुचानि।लागि बिलोकन सखिन्ह तन रघुबीरहि उर आनि॥२४८॥
गुरुजनों की लाज और बड़ी सभा को देखकर सीता सकुचा गईं; उन्होंने राम को हृदय में बसाकर, सखी के शरीर की ओर देखने का बहाना बना लिया।
राम रूपु अरु सिय छबि देखें। नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें॥सोचहिं सकल कहत सकुचाहीं। बिधि सन बिनय करहिं मन माहीं॥॥१॥
राम का रूप और सीता की छवि देखकर सब स्त्री-पुरुषों ने पलक झपकना ही छोड़ दिया। सब सोच में पड़ गए, कुछ कहते हुए सकुचाते थे, और मन-ही-मन ब्रह्मा से विनती करने लगे।
हरु बिधि बेगि जनक जड़ताई। मति हमारि असि देहि सुहाई॥बिनु बिचार पनु तजि नरनाहु। सीय राम कर करै बिबाहू॥॥२॥
हे विधाता, शीघ्र जनक की जड़ता दूर करो, और हमें भी ऐसी अच्छी बुद्धि दो। बिना विचार किए राजा अपना प्रण त्यागकर सीता और राम का विवाह करा दें।
जग भल कहिहि भाव सब काहू। हठ कीन्हे अंतहुँ उर दाहू॥एहिं लालसाँ मगन सब लोगू। बरु साँवरो जानकी जोगू॥॥३॥
संसार भी इसे भला ही कहेगा और सबको यही भाएगा; हठ करने से तो अंत में हृदय में जलन ही होगी। इसी लालसा में सब लोग मग्न थे कि साँवला वर ही जानकी के योग्य है।
तब बंदीजन जनक बौलाए। बिरिदावली कहत चलि आए॥कह नृप जाइ कहहु पन मोरा। चले भाट हियँ हरषु न थोरा॥॥४॥
तब राजा जनक ने भाटों को बुलाया, वे राजाओं की प्रशस्ति गाते हुए चले आए। राजा ने कहा - जाकर मेरा प्रण सुनाओ; भाट हृदय में बड़े हर्ष के साथ चल पड़े।
बोले बंदी बचन बर सुनहु सकल महिपाल।पन बिदेह कर कहहिं हम भुजा उठाइ बिसाल॥२४९॥
भाटों ने श्रेष्ठ वचन बोले - हे समस्त राजाओ, सुनो, हम भुजा उठाकर राजा जनक का महान प्रण सुनाते हैं।
नृप भुजबल बिधु सिवधनु राहू। गरुअ कठोर बिदित सब काहू॥रावनु बानु महाभट भारे। देखि सरासन गवँहिं सिधारे॥॥१॥
राजाओं के भुजबल के लिए यह शिव-धनुष राहु के समान है, जो चंद्रमा को ग्रस लेता है, यह भारी और कठोर होना सबको विदित है। रावण और बाणासुर जैसे महाबली योद्धा भी इस धनुष को देखकर अपने गर्व सहित लौट गए थे।
सोइ पुरारि कोदंडु कठोरा। राज समाज आजु जोइ तोरा॥त्रिभुवन जय समेत बैदेही।। बिनहिं बिचार बरइ हठि तेही॥॥२॥
उसी शिव के कठोर धनुष को आज राजसभा में जो कोई तोड़ देगा, वह त्रिभुवन-विजय के यश सहित बिना किसी विचार के सीता को वर लेगा।
सुनि पन सकल भूप अभिलाषे। भटमानी अतिसय मन माखे॥परिकर बाँधि उठे अकुलाई। चले इष्टदेवन्ह सिर नाई॥॥३॥
यह प्रण सुनकर सब राजा सीता को पाने की अभिलाषा करने लगे; अपने को वीर मानने वाले राजा मन में अत्यंत क्रोधित हो उठे। कमर कसकर वे अकुला उठे, और अपने इष्टदेव को सिर नवाकर चल पड़े।
तमकि ताकि तकि सिवधनु धरहीं। उठइ न कोटि भाँति बलु करहीं॥जिन्ह के कछु बिचारु मन माहीं। चाप समीप महीप न जाहीं॥॥४॥
क्रोध से तनकर, ताककर, निशाना साधकर राजा शिव-धनुष को पकड़ते थे, पर करोड़ों प्रकार से बल लगाने पर भी वह उठता नहीं था। जिन राजाओं के मन में कुछ विचार-शक्ति शेष थी, वे तो धनुष के पास जाते ही नहीं थे।
तमकि धरहिं धनु मूढ़ नृप उठइ न चलहिं लजाइ।मनहुँ पाइ भट बाहुबलु अधिकु अधिकु गरुआइ॥२५०॥
मूर्ख राजा क्रोध से धनुष पकड़ते, पर वह उठता नहीं, और वे लज्जित होकर लौट जाते; मानो वह धनुष वीरों का भुजबल पाकर और भी अधिक भारी होता जा रहा हो।
भूप सहस दस एकहि बारा। लगे उठावन टरइ न टारा॥डगइ न संभु सरासन कैसें। कामी बचन सती मनु जैसें॥॥१॥
दस हजार राजा एक साथ धनुष उठाने लगे, पर वह टलने का नाम ही नहीं लेता था। शिव का धनुष वैसे ही नहीं डिगता था जैसे किसी कामी पुरुष के वचन से सती स्त्री का मन नहीं डिगता।
सब नृप भए जोगु उपहासी। जैसें बिनु बिराग संन्यासी॥कीरति बिजय बीरता भारी। चले चाप कर बरबस हारी॥॥२॥
सब राजा हास्यास्पद हो गए, जैसे बिना वैराग्य के संन्यासी उपहास के पात्र बनते हैं। अपनी कीर्ति, विजय और भारी वीरता को गँवाकर वे बलपूर्वक धनुष से हारकर लौट चले।
श्रीहत भए हारि हियँ राजा। बैठे निज निज जाइ समाजा॥नृपन्ह बिलोकि जनकु अकुलाने। बोले बचन रोष जनु साने॥॥३॥
हृदय से हारकर राजा शोभाहीन हो गए, और अपने-अपने समाज में जाकर बैठ गए। राजाओं की यह दशा देखकर जनक व्याकुल हो उठे और मानो क्रोध में डूबे वचन बोलने लगे।
दीप दीप के भूपति नाना। आए सुनि हम जो पनु ठाना॥देव दनुज धरि मनुज सरीरा। बिपुल बीर आए रनधीरा॥॥४॥
हमने जो प्रण ठाना था, उसे सुनकर द्वीप-द्वीप के अनेक राजा यहाँ आए, यहाँ तक कि मनुष्य शरीर धरकर देवता और दानव भी अनेक रणधीर वीर बनकर आए।
कुअँरि मनोहर बिजय बड़ि कीरति अति कमनीय।पावनिहार बिरंचि जनु रचेउ न धनु दमनीय॥२५१॥
मनोहर कन्या, बड़ी विजय और अत्यंत सुंदर कीर्ति पाने वाला कोई है ही नहीं - मानो ब्रह्मा ने यह धनुष जीता न जा सकने वाला ही रचा हो।
कहहु काहि यहु लाभु न भावा। काहुँ न संकर चाप चढ़ावा॥रहउ चढ़ाउब तोरब भाई। तिलु भरि भूमि न सके छड़ाई॥॥१॥
कहो, यह लाभ किसे नहीं भाया, फिर भी किसी ने शिव का धनुष चढ़ाया तो नहीं। चढ़ाना और तोड़ना तो दूर, हे भाइयो, कोई इसे तिल भर भी भूमि से हिला तक न सका।
अब जनि कोउ माखै भट मानी। बीर बिहीन मही मैं जानी॥तजहु आस निज निज गृह जाहू। लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहू॥॥२॥
अब कोई अपने को वीर मानकर क्रोधित न हो; पृथ्वी को वीरहीन जानकर तुम सब आशा त्यागकर अपने-अपने घर चले जाओ - विधाता ने सीता का विवाह लिखा ही नहीं है, ऐसा जान पड़ता है।
सुकृत जाइ जौं पनु परिहरऊँ। कुअँरि कुआरि रहउ का करऊँ॥जो जनतेउँ बिनु भट भुबि भाई। तौ पनु करि होतेउँ न हँसाई॥॥३॥
यदि मैं अपना प्रण त्याग दूँ तो पुण्य नष्ट हो जाएगा, पर कुँआरी सीता को कुररी पक्षी की भाँति विलाप करते रहने दूँ तो मैं क्या करूँ। हे भाइयो, यदि मैं जानता कि पृथ्वी वीरों से रहित हो गई है, तो ऐसा प्रण करके अपनी हँसाई न कराता।
जनक बचन सुनि सब नर नारी। देखि जानकिहि भए दुखारी॥माखे लखनु कुटिल भइँ भौंहें। रदपट फरकत नयन रिसौंहें॥॥४॥
जनक के ये वचन सुनकर और सीता की व्याकुलता देखकर सब स्त्री-पुरुष दुखी हो गए। यह सुनकर लक्ष्मण क्रोधित हो उठे, उनकी भौंहें कुटिल हो गईं, होंठ फड़कने लगे और नेत्र क्रोध से रँग उठे।
कहि न सकत रघुबीर डर लगे बचन जनु बान।नाइ राम पद कमल सिरु बोले गिरा प्रमान॥२५२॥
राम के डर से लक्ष्मण कुछ कह नहीं पा रहे थे, मानो उनके वचन बाण जैसे तैयार थे; राम के चरण-कमलों में सिर नवाकर वे प्रमाणपूर्ण वाणी में बोले।
रघुबंसिन्ह महुँ जहँ कोउ होई। तेहिं समाज अस कहइ न कोई॥कही जनक जसि अनुचित बानी। बिद्यमान रघुकुल मनि जानी॥॥१॥
जिस सभा में रघुवंश का कोई भी वंशज उपस्थित हो, वहाँ ऐसी बात कोई नहीं कह सकता; परंतु रघुकुल के भूषण राम के प्रत्यक्ष विद्यमान होने पर भी राजा जनक ने ऐसी अनुचित वाणी कह डाली।
सुनहु भानुकुल पंकज भानू। कहउँ सुभाउ न कछु अभिमानू॥जौं तुम्हारि अनुसासन पावौं। कंदुक इव ब्रह्मांड उठावौं॥॥२॥
सुनिए, हे सूर्यकुल रूपी कमल के सूर्य! मैं यह अपने स्वभाव से कह रहा हूँ, कुछ अभिमान से नहीं - यदि आपकी आज्ञा पाऊँ तो मैं गेंद के समान ब्रह्मांड को भी उठा सकता हूँ।
काचे घट जिमि डारौं फोरी। सकउँ मेरु मूलक जिमि तोरी॥तव प्रताप महिमा भगवाना। को बापुरो पिनाक पुराना॥॥३॥
मैं इसे कच्चे घड़े की तरह फोड़ सकता हूँ, मेरु पर्वत को मूली की तरह तोड़ सकता हूँ। हे भगवान! आपके प्रताप की महिमा के आगे यह पुराना बेचारा शिव-धनुष है ही क्या।
नाथ जानि अस आयसु होऊ। कौतुकु करौं बिलोकिअ सोऊ॥कमल नाल जिमि चाप चढ़ावौं। जोजन सत प्रमान लै धावौं॥॥४॥
हे नाथ! यह जानकर यदि आज्ञा हो तो मैं यह कौतुक करके दिखाऊँ - कमल की नाल की भाँति इस धनुष को चढ़ाकर, सौ योजन तक इसे लेकर दौड़ जाऊँ।
तोरौं छत्रक दंड जिमि तव प्रताप बल नाथ।जौं न करौं प्रभु पद सपथ कर न धरौं धनु भाथ॥२५३॥
हे नाथ! आपके प्रताप-बल से मैं इसे छतरी के डंडे की तरह तोड़ दूँ; यदि ऐसा न करूँ तो आपके चरणों की सौगंध, मैं फिर कभी हाथ में धनुष-बाण न धरूँ।
लखन सकोप बचन जे बोले। डगमगानि महि दिग्गज डोले॥सकल लोक सब भूप डेराने। सिय हियँ हरषु जनकु सकुचाने॥॥१॥
लक्ष्मण के क्रोधपूर्ण वचन ऐसे थे कि पृथ्वी डगमगा उठी और दिग्गज हाथी डोलने लगे। सब लोग और सब राजा भयभीत हो गए, सीता के हृदय में हर्ष उमड़ा और जनक सकुचा गए।
गुर रघुपति सब मुनि मन माहीं। मुदित भए पुनि पुनि पुलकाहीं॥सयनहिं रघुपति लखनु नेवारे। प्रेम समेत निकट बैठारे॥॥२॥
गुरु विश्वामित्र, राम और सब मुनि मन-ही-मन प्रसन्न हुए, बारंबार पुलकित हो उठे। राम ने संकेत से लक्ष्मण को रोका और प्रेमपूर्वक अपने पास बिठा लिया।
बिस्वामित्र समय सुभ जानी। बोले अति सनेहमय बानी॥उठहु राम भंजहु भवचापा। मेटहु तात जनक परितापा॥॥३॥
शुभ अवसर जानकर विश्वामित्र अत्यंत स्नेहभरी वाणी में बोले - हे राम, उठो और शिव-धनुष को भंग करो, हे तात, जनक का यह संताप मिटा दो।
सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा। हरषु बिषादु न कछु उर आवा॥ठाढ़े भए उठि सहज सुभाएँ। ठवनि जुबा मृगराजु लजाएँ॥॥४॥
गुरु का वचन सुनकर राम ने चरणों में सिर नवाया, उनके हृदय में न कोई हर्ष आया न विषाद। वे सहज स्वभाव से उठकर खड़े हो गए, उनकी चाल युवा सिंह को भी लजाने वाली थी।
उदित उदयगिरि मंच पर रघुबर बालपतंग।बिकसे संत सरोज सब हरषे लोचन भृंग॥२७४॥
मानो उदयाचल रूपी मंच पर बाल-सूर्य ही उदित हुआ हो - राम के उठते ही संतरूपी सब कमल खिल उठे और नेत्ररूपी सब भ्रमर हर्षित हो उठे।
नृपन्ह केरि आसा निसि नासी। बचन नखत अवली न प्रकासी॥मानी महिप कुमुद सकुचाने। कपटी भूप उलूक लुकाने॥॥१॥
राजाओं की आशा-रूपी रात्रि नष्ट हो गई, उनके गर्वीले वचन-रूपी तारों की पंक्ति फीकी पड़ गई। अभिमानी राजा-रूपी कुमुदिनी सकुचा गई, और कपटी राजा-रूपी उल्लू छिप गए।
भए बिसोक कोक मुनि देवा। बरिसहिं सुमन जनावहिं सेवा॥गुर पद बंदि सहित अनुरागा। राम मुनिन्ह सन आयसु मागा॥॥२॥
मुनि और देवता-रूपी चकवा शोकरहित हो गए, वे फूल बरसाकर अपनी सेवा प्रकट करने लगे। गुरु के चरणों की वंदना करके प्रेमसहित राम ने मुनीश्वर से आज्ञा माँगी।
सहजहिं चले सकल जग स्वामी। मत्त मंजु बर कुंजर गामी॥॥३॥
सारे जगत के स्वामी राम सहज ही चल पड़े, उनकी चाल मतवाले सुंदर श्रेष्ठ हाथी की भाँति थी।
चलत राम सब पुर नर नारी। पुलक पूरि तन भए सुखारी॥
श्रीराम के धनुष उठाने हेतु चलते ही सम्पूर्ण नगर के नर-नारी रोमांचित होकर आनंदित हो उठे।
बंदि पितर सुर सुकृत सँभारे। जौं कछु पुन्य प्रभाउ हमारे॥तौ सिवधनु मृनाल की नाईं। तोरहुँ राम गनेस गोसाईं॥॥४॥
पितरों और देवताओं को प्रणाम करके सब लोग अपने-अपने पुण्य का स्मरण करने लगे - यदि हमारे भी कुछ पुण्य का प्रभाव है, तो हे गणेश! हे स्वामी! राम शिव-धनुष को कमल-नाल की भाँति सहज ही तोड़ दें।
रामहि प्रेम समेत लखि सखिन्ह समीप बोलाइ।सीता मातु सनेह बस बचन कहइ बिलखाइ।॥२५५॥
राम को प्रेमपूर्वक निहारकर, सखियों को समीप बुलाकर, सीता की माता स्नेहवश विकल होकर वचन कहने लगीं।
सखि सब कौतुक देखनिहारे। जे कहावत हितू हमारे॥कोउ न बुझाइ कहइ गुर पाहीं। ए बालक असि हठ भलि नाहीं॥॥१॥
यहाँ तो सब लोग केवल तमाशा देखने वाले जुट आए हैं, जो हमारे हितैषी कहलाते हैं। कोई भी समझाकर गुरु से यह नहीं कहता कि ऐसे बालकों को यह हठ शोभा नहीं देता।
रावन बान छुआ नहिं चापा। हारे सकल भूप करि दापा॥सो धनु राजकुअँर कर देहीं। बाल मराल कि मंदर लेहीं॥॥२॥
जिस धनुष को रावण और बाणासुर ने भी छुआ तक नहीं, जिसके सामने अभिमान करने वाले सब राजा हार गए, वही धनुष ये सेवक राजकुमार के हाथ में दे रहे हैं - क्या बाल हंस भला मंदराचल पर्वत उठा सकता है।
भूप सयानप सकल सिरानी। सखि बिधि गति कछु जाति न जानी॥बोली चतुर सखी मृदु बानी। तेजवंत लघु गनिअ न रानी॥॥३॥
राजा की सारी बुद्धिमानी समाप्त हो गई, सखियों की यह अवस्था किसी से समझ में नहीं आ रही थी। तब एक चतुर सखी कोमल वाणी में बोली - हे रानी, तेजवान् पुरुष को छोटा समझकर तुच्छ न समझिए।
कहँ कुंभज कहँ सिंधु अपारा। सोषेउ सुजसु सकल संसारा॥रबि मंडल देखत लघु लागा। उदयँ तासु तिभुवन तम भागा॥॥४॥
कहाँ छोटा-सा घड़े में जन्मा अगस्त्य मुनि और कहाँ अपार समुद्र - फिर भी उन्होंने समुद्र को सोख लिया, यह सुयश सारे संसार में विख्यात है। सूर्यमंडल देखने में छोटा लगता है, पर उसके उदय होते ही त्रिभुवन का अंधकार भाग जाता है।
मंत्र परम लघु जासु बस बिधि हरि हर सुर सर्ब।महामत्त गजराज कहुँ बस कर अंकुस खर्ब॥२५६॥
मंत्र परम छोटा होता है, पर उसके वश में ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सब देवता हो जाते हैं। बड़े मतवाले गजराज को भी छोटा-सा अंकुश वश में कर लेता है।
काम कुसुम धनु सायक लीन्हे। सकल भुवन अपने बस कीन्हे॥देबि तजिअ संसय अस जानी। भंजब धनुष रामु सुनु रानी॥॥१॥
कामदेव ने फूलों का धनुष-बाण लेकर ही सारे भुवन को अपने वश में कर लिया है। हे देवी, यह जानकर संशय त्याग दीजिए - राम अवश्य ही धनुष तोड़ेंगे, हे रानी, सुनिए।
सखी बचन सुनि भै परतीती। मिटा बिषादु बढ़ी अति प्रीती॥तब रामहि बिलोकि बैदेही। सभय हृदयँ बिनवति जेहि तेही॥॥२॥
सखी के वचन सुनकर सुनयना को विश्वास हो गया, उनका विषाद मिट गया और प्रीति और बढ़ गई। तब राम को निहारकर सीता भयभीत हृदय से जिस-तिस देवता से विनती करने लगीं।
मनहीं मन मनाव अकुलानी। होहु प्रसन्न महेस भवानी॥करहु सफल आपनि सेवकाई। करि हितु हरहु चाप गरुआई॥॥३॥
व्याकुल होकर सीता मन-ही-मन देवताओं को मनाने लगीं - हे महेश, हे भवानी, प्रसन्न होइए। मेरी सेवा को सफल कीजिए, हित करके इस धनुष का भारीपन दूर कर दीजिए।
गननायक बरदायक देवा। आजु लगें कीन्हिउँ तुअ सेवा॥बार बार बिनती सुनि मोरी। करहु चाप गुरुता अति थोरी॥॥४॥
हे गणनायक, हे वरदायक देव! आज तक मैंने आपकी ही सेवा की है। मेरी यह बारंबार विनती सुनकर इस धनुष का भारीपन बहुत ही थोड़ा कर दीजिए।
देखि देखि रघुबीर तन सुर मनाव धरि धीर।भरे बिलोचन प्रेम जल पुलकावली सरीर॥२५७॥
राम के शरीर को बार-बार निहारते हुए सीता धैर्य धरकर देवताओं को मनाती रहीं, उनके नेत्र प्रेम के आँसुओं से भर गए और शरीर पर रोमांच छा गया।
नीकें निरखि नयन भरि सोभा। पितु पनु सुमिरि बहुरि मनु छोभा॥अहह तात दारुनि हठ ठानी। समुझत नहिं कछु लाभु न हानी॥॥१॥
नेत्र भरकर भलीभाँति राम की शोभा निहार लेने के बाद, पिता के प्रण का स्मरण करके सीता का मन फिर व्याकुल हो उठा - हाय तात, आपने कैसा भयंकर हठ ठान लिया, आप न कुछ लाभ समझते हैं न हानि।
सचिव सभय सिख देइ न कोई। बुध समाज बड़ अनुचित होई॥कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा। कहँ स्यामल मृदुगात किसोरा॥॥२॥
भयभीत मंत्री कोई सीख भी नहीं देता, विद्वानों की सभा में यह कितना अनुचित हो रहा है। कहाँ यह वज्र से भी कठोर धनुष और कहाँ यह साँवला कोमल शरीर वाला किशोर।
बिधि केहि भाँति धरौं उर धीरा। सिरस सुमन कन बेधिअ हीरा॥सकल सभा के मति भै भोरी। अब मोहि संभुचाप गति तोरी॥॥३॥
हे विधाता, मैं किस प्रकार हृदय में धीरज धरूँ - क्या शिरीष के कोमल फूल से हीरा बींधा जा सकता है। सारी सभा की बुद्धि भ्रमित हो गई लगती है; अब तो मेरी गति शिव-धनुष के भरोसे ही है।
निज जड़ता लोगन्ह पर डारी। होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी॥अति परिताप सीय मन माही। लव निमेष जुग सब सय जाहीं॥॥४॥
सीता अपनी जड़ता दूसरों पर डालकर, राम को निहारकर मन-ही-मन कहने लगीं - हे धनुष, हलका हो जा। सीता के मन में अत्यंत संताप था, उन्हें पल भर भी सैकड़ों युग के समान बीत रहा था।
प्रभुहि चितइ पुनि चितव महि राजत लोचन लोल।खेलत मनसिज मीन जुग जनु बिधु मंडल डोल॥२५८॥
सीता कभी प्रभु को निहारतीं, कभी भूमि की ओर देखने लगतीं - उनके चंचल नेत्र ऐसे सुशोभित थे मानो चंद्रमंडल में कामदेव की दो मछलियाँ क्रीड़ा कर रही हों।
गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी। प्रगट न लाज निसा अवलोकी॥लोचन जलु रह लोचन कोना। जैसे परम कृपन कर सोना॥॥१॥
सीता की वाणी-रूपी भ्रमरी को मुख-कमल ने रोक रखा था, लज्जा-रूपी रात्रि को देखकर वह प्रकट नहीं हो पा रही थी। नेत्रों के कोने में आँसू ऐसे रुके थे जैसे किसी महाकंजूस का सोना व्यय होने से रुका रहता है।
सकुची ब्याकुलता बड़ि जानी। धरि धीरजु प्रतीति उर आनी॥तन मन बचन मोर पनु साचा। रघुपति पद सरोज चितु राचा॥॥२॥
अपनी व्याकुलता बहुत बढ़ती देख सीता सकुचा गईं, फिर धीरज धरकर हृदय में विश्वास लाईं - तन, मन, वचन से मेरा प्रण सत्य है, मेरा चित्त तो राम के चरण-कमलों में ही रम गया है।
तौ भगवानु सकल उर बासी। करिहि मोहि रघुबर के दासी॥जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संहेहू॥॥३॥
तो सबके हृदय में बसने वाले भगवान अवश्य मुझे राम की दासी बना देंगे। जिसका जिस पर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे अवश्य मिलता है, इसमें कोई संदेह नहीं।
प्रभु तन चितइ प्रेम तन ठाना। कृपानिधान राम सबु जाना॥सियहि बिलोकि तकेउ धनु कैसे। चितव गरुरु लघु ब्यालहि जैसे॥॥४॥
सीता ने प्रभु के शरीर को निहारकर मन में प्रेम को दृढ़ किया; कृपानिधान राम यह सब जानते थे। सीता की ओर देखकर राम ने धनुष की ओर वैसे ही निगाह डाली जैसे गरुड़ किसी छोटे साँप की ओर देखता है।
लखन लखेउ रघुबंसमनि ताकेउ हर कोदंडु।पुलकि गात बोले बचन चरन चापि ब्रह्मांडु॥२५९॥
लक्ष्मण ने देखा कि रघुकुल-मणि राम ने शिव-धनुष की ओर निगाह डाल दी है; शरीर पुलकित होकर वे चरणों से मानो ब्रह्मांड को दबाकर वचन बोले।
दिसकुंजरहु कमठ अहि कोला। धरहु धरनि धरि धीर न डोला॥रामु चहहिं संकर धनु तोरा। होहु सजग सुनि आयसु मोरा॥॥१॥
हे दिशाओं के हाथियो, कच्छप, शेषनाग और वराह! धैर्य धरकर पृथ्वी को दृढ़ता से धारण करना, हिलना मत। राम शिव का धनुष तोड़ने वाले हैं, मेरी आज्ञा सुनकर सावधान हो जाओ।
चाप समीप रामु जब आए। नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाए॥॥२॥
जब राम धनुष के समीप आए, तब सब स्त्री-पुरुषों और देवताओं ने अपने-अपने पुण्यों का स्मरण करके मनौती मनाई।
सब कर संसउ अरु अग्यानू। मंद महीपन्ह कर अभिमानू॥
सभी का संशय और अज्ञान मिटने लगा, और मंदबुद्धि राजाओं का अभिमान चूर होने लगा।
भृगुपति केरि गरब गरुआई। सुर मुनिबरन्ह केरि कदराई॥सिय कर सोचु जनक पछितावा। रानिन्ह कर दारुन दुख दावा॥॥३॥
उस समय राजाओं के गर्व की भारी गरिमा, देवताओं और श्रेष्ठ मुनियों की व्याकुलता, सीता की चिंता, जनक का पछतावा और रानियों का भयंकर दुखरूपी दावानल - सब एक साथ छाया हुआ था।
संभुचाप बड़ बोहितु पाई। चढ़े जाइ सब संगु बनाई॥राम बाहुबल सिंधु अपारू। चहत पारु नहिं कोउ कड़हारू॥॥४॥
शिव-धनुष रूपी बड़ा जहाज पाकर सब लोग साथ मिलकर उस पर चढ़ गए थे, अर्थात सबकी आशा उसी पर टिकी थी। परंतु राम का बाहुबल तो अपार समुद्र है, जिसका पार पाना किसी खेवटिया के वश की बात नहीं।
राम बिलोके लोग सब चित्र लिखे से देखि।चितई सीय कृपायतन जानी बिकल बिसेषि॥२६०॥
राम ने देखा कि सब लोग चित्र में खिंची हुई मूर्तियों के समान स्तब्ध खड़े हैं; फिर कृपानिधान राम ने सीता को अत्यंत विकल जानकर उनकी ओर देखा।
देखी बिपुल बिकल बैदेही। निमिष बिहात कलप सम तेही॥तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा। मुएँ करइ का सुधा तड़ागा॥॥१॥
राम ने देखा कि सीता अत्यंत विकल हैं, उनके लिए एक पल भी कल्प के समान बीत रहा है। प्यासे को जल न मिले और वह प्राण त्याग दे, तो मरने के बाद अमृत का तालाब भी उसके किस काम आएगा।
का बरषा सब कृषी सुखानें। समय चुकें पुनि का पछितानें॥अस जियँ जानि जानकी देखी। प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी॥॥२॥
सारी खेती सूख जाने के बाद वर्षा किस काम की, अवसर चूक जाने पर फिर पछताने से क्या लाभ। मन में ऐसा विचार कर राम ने सीता की ओर देखा, और सीता की विशेष प्रीति देखकर प्रभु स्वयं पुलकित हो उठे।
गुरहि प्रनामु मनहि मन कीन्हा। अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा॥दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ। पुनि नभ धनु मंडल सम भयऊ॥॥३॥
मन-ही-मन गुरु को प्रणाम करके राम ने अत्यंत सहजता से धनुष उठा लिया। जब उसे उठाया तो वह बिजली की भाँति चमक उठा, फिर आकाश में इंद्रधनुष के समान मंडलाकार दिखने लगा।
लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें। काहुँ न लखा देख सब ठाढ़ें॥तेहि छन राम मध्य धनु तोरा। भरे भुवन धुनि घोर कठोरा॥॥४॥
धनुष को उठाना, चढ़ाना और जोर से खींचना - यह सब इतनी शीघ्रता से हुआ कि खड़े देख रहे किसी को भी कुछ दिखाई न दिया। उसी क्षण राम ने धनुष को बीच से तोड़ डाला, जिसकी भयंकर कठोर ध्वनि से सारे भुवन गूँज उठे।
भरे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु चले।चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरुम कलमले॥सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं।कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति बचन उचारही॥
उस भयंकर कठोर ध्वनि से सारे भुवन भर गए, सूर्य के घोड़े मार्ग छोड़कर भटक गए। दिग्गज हाथी चीत्कार करने लगे, पृथ्वी डोल उठी, शेषनाग, वराह और कच्छप व्याकुल हो उठे। देवता, असुर और मुनि कान लगाकर व्याकुल होकर विचार करने लगे कि यह क्या हुआ। तुलसीदास कहते हैं कि राम ने शिव-धनुष खंडित कर दिया - यह जानकर सब जय-जयकार करने लगे।
संकर चापु जहाजु सागरु रघुबर बाहुबलु।बूड़ सो सकल समाजु चढ़ा जो प्रथमहिं मोह बस॥२६१॥
शिव का धनुष एक जहाज के समान था और राम का बाहुबल मानो समुद्र था; जो-जो लोग पहले मोहवश उस धनुष-रूपी जहाज पर चढ़ गए थे, वह सारा समाज गर्व सहित डूब गया।
प्रभु दोउ चापखंड महि डारे। देखि लोग सब भए सुखारे॥कोसिकरुप पयोनिधि पावन। प्रेम बारि अवगाहु सुहावन॥॥१॥
प्रभु ने धनुष के दोनों टुकड़े भूमि पर डाल दिए, यह देखकर सब लोग सुखी हो गए। विश्वामित्र रूपी पवित्र समुद्र प्रेम-जल में सुहावने ढंग से डूब गया, अर्थात हर्ष से भर उठा।
रामरूप राकेसु निहारी। बढ़त बीचि पुलकावलि भारी॥बाजे नभ गहगहे निसाना। देवबधू नाचहिं करि गाना॥॥२॥
राम-रूपी पूर्ण चंद्रमा को निहारकर विश्वामित्र के हृदय में रोमांच की भारी लहरें उठने लगीं। आकाश में जोर-जोर से नगाड़े बजने लगे, देवांगनाएँ गीत गाते हुए नाचने लगीं।
ब्रह्मादिक सुर सिद्ध मुनीसा। प्रभुहि प्रसंसहि देहिं असीसा॥बरिसहिं सुमन रंग बहु माला। गावहिं किंनर गीत रसाला॥॥३॥
ब्रह्मा आदि देवता, सिद्ध और मुनीश्वर प्रभु की प्रशंसा करते हुए आशीर्वाद देने लगे। वे रंग-बिरंगे फूलों की मालाएँ बरसाने लगे, और किन्नर मधुर गीत गाने लगे।
रही भुवन भरि जय जय बानी। धनुषभंग धुनि जात न जानी॥मुदित कहहिं जहँ तहँ नर नारी। भंजेउ राम संभुधनु भारी॥॥४॥
सारे भुवन में जय-जयकार की ध्वनि गूँज उठी, धनुष टूटने की गड़गड़ाहट कहाँ विलीन हो गई पता ही न चला। जहाँ-तहाँ प्रसन्न होकर स्त्री-पुरुष कहने लगे - राम ने शिव का भारी धनुष तोड़ डाला।
बंदी मागध सूतगन बिरुद बदहिं मतिधीर।करहिं निछावरि लोग सब हय गय धन मनि चीर॥२६२॥
बुद्धिमान भाट, मागध और सूत राम की विरुदावली गाने लगे। सब लोग प्रसन्न होकर घोड़े, हाथी, धन, मणि और वस्त्र न्योछावर करने लगे।
झाँझि मृदंग संख सहनाई। भेरि ढोल दुंदुभी सुहाई॥बाजहिं बहु बाजने सुहाए। जहँ तहँ जुबतिन्ह मंगल गाए॥॥१॥
झाँझ, मृदंग, शंख, शहनाई, भेरी, ढोल और सुंदर नगाड़े - अनेक सुंदर वाद्य बजने लगे, और जहाँ-तहाँ युवतियाँ मंगल गीत गाने लगीं।
सखिन्ह सहित हरषी अति रानी। सूखत धान परा जनु पानी॥जनक लहेउ सुखु सोचु बिहाई। परत थकें थाह जनु पाई॥॥२॥
सखियों सहित रानी सुनयना अत्यंत हर्षित हुईं, मानो सूखते हुए धान पर वर्षा का जल पड़ गया हो। राजा जनक भी चिंता त्यागकर सुखी हो गए, मानो डूबते हुए थके तैराक को अचानक भूमि की थाह मिल गई हो।
श्रीहत भए भूप धनु टूटे। जैसें दिवस दीप छबि छूटे॥सीय सुखहि बरनिअ केहि भाँती। जनु चातकी पाइ जलु स्वाती॥॥३॥
धनुष टूटते ही सब राजा शोभाहीन हो गए, जैसे दिन में दीपक की चमक फीकी पड़ जाती है। सीता के सुख का वर्णन किस प्रकार करूँ - मानो चातकी को स्वाति नक्षत्र की बूँद का जल मिल गया हो।
रामहि लखनु बिलोकत कैसें। ससिहि चकोर किसोरकु जैसें॥सतानंद तब आयसु दीन्हा। सीताँ गमनु राम पहिं कीन्हा॥॥४॥
लक्ष्मण राम को कैसे निहार रहे थे - जैसे कोई किशोर चकोर चंद्रमा को निहारता है। तब शतानंद मुनि ने आज्ञा दी, और सीता राम के पास जाने के लिए चलीं।
संग सखीं सुदंर चतुर गावहिं मंगलचार।गवनी बाल मराल गति सुषमा अंग अपार॥२६३॥
सुंदर और चतुर सखियाँ साथ में मंगल गीत गाती जा रही थीं; बाल हंसिनी की सी चाल से सीता चलीं, उनके अंग-अंग में अपार सुंदरता थी।
सखिन्ह मध्य सिय सोहति कैसे। छबिगन मध्य महाछबि जैसें॥कर सरोज जयमाल सुहाई। बिस्व बिजय सोभा जेहिं छाई॥॥१॥
सखियों के बीच सीता कैसे सुशोभित हो रही थीं - जैसे सुंदरताओं के समूह के बीच साक्षात महाछवि हो। उनके कमल-सरीखे हाथ में वह सुंदर जयमाला थी जिसमें विश्व-विजय की शोभा छाई हुई थी।
तन सकोचु मन परम उछाहू। गूढ़ प्रेमु लखि परइ न काहू॥जाइ समीप राम छबि देखी। रहि जनु कुँअरि चित्र अवरेखी॥॥२॥
शरीर में संकोच था पर मन में परम उत्साह; उनका गूढ़ प्रेम किसी से पहचाना नहीं जा सकता था। समीप जाकर जब सीता ने राम की छवि देखी, तो मानो वे किसी चित्र में खिंची कुँआरी की भाँति स्तब्ध रह गईं।
चतुर सखीं लखि कहा बुझाई। पहिरावहु जयमाल सुहाई॥सुनत जुगल कर माल उठाई। प्रेम बिबस पहिराइ न जाई॥॥३॥
यह देखकर चतुर सखी ने समझाकर कहा - अब यह सुंदर जयमाला पहनाओ। यह सुनते ही सीता ने दोनों हाथों से माला उठाई, पर प्रेम में इतनी विवश हो गईं कि पहनाई ही नहीं जा रही थी।
सोहत जनु जुग जलज सनाला। ससिहि सभीत देत जयमाला॥गावहिं छबि अवलोकि सहेली। सियँ जयमाल राम उर मेली॥॥४॥
सीता के दोनों हाथ ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो दो डंठल-सहित कमल किसी चंद्रमा को सभय होकर जयमाला अर्पित कर रहे हों। यह छवि देखकर सखियाँ गीत गाने लगीं, और अंततः सीता ने राम के गले में जयमाला डाल ही दी।
रघुबर उर जयमाल देखि देव बरिसहिं सुमन।सकुचे सकल भुआल जनु बिलोकि रबि कुमुदगन॥२६४॥
राम के गले में जयमाला देखकर देवता फूल बरसाने लगे; सब राजा ऐसे सकुचा गए जैसे सूर्य को देखकर कुमुदिनियाँ मुरझा जाती हैं।
पुर अरु ब्योम बाजने बाजे। खल भए मलिन साधु सब राजे॥सुर किंनर नर नाग मुनीसा। जय जय जय कहि देहिं असीसा॥॥१॥
नगर और आकाश दोनों में बाजे बजने लगे; दुष्ट लोग मलिन हो गए और सज्जन सब प्रसन्नता से चमक उठे। देवता, किन्नर, मनुष्य, नाग और मुनीश्वर सब जय-जयकार करते हुए आशीर्वाद देने लगे।
नाचहिं गावहिं बिबुध बधूटीं। बार बार कुसुमांजलि छूटीं॥जहँ तहँ बिप्र बेदधुनि करहीं। बंदी बिरदावलि उच्चरहीं॥॥२॥
देवांगनाएँ नाचती-गाती थीं, बारंबार फूलों की अंजलि बरसाती थीं। जहाँ-तहाँ ब्राह्मण वेद-ध्वनि कर रहे थे, और भाट विरुदावली का उच्चारण कर रहे थे।
महि पाताल नाक जसु ब्यापा। राम बरी सिय भंजेउ चापा॥करहिं आरती पुर नर नारी। देहिं निछावरि बित्त बिसारी॥॥३॥
पृथ्वी, पाताल और स्वर्ग तीनों लोकों में यह यश फैल गया कि राम ने धनुष तोड़कर सीता को वरण कर लिया। नगर के स्त्री-पुरुष आरती उतार रहे थे, धन का हिसाब भुलाकर न्योछावर कर रहे थे।
सोहति सीय राम कै जौरी। छबि सिंगारु मनहुँ एक ठोरी॥सखीं कहहिं प्रभुपद गहु सीता। करति न चरन परस अति भीता॥॥४॥
सीता-राम की जोड़ी ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो छवि और शृंगार दोनों एक ही स्थान पर एकत्र हो गए हों। सखियाँ कहती थीं - सीता, प्रभु के चरण छू लो; पर अत्यंत भयभीत होने के कारण सीता चरण-स्पर्श नहीं कर रही थीं।
गौतम तिय गति सुरति करि नहिं परसति पग पानि।मन बिहसे रघुबंसमनि प्रीति अलौकिक जानि॥२६५॥
गौतम की पत्नी अहिल्या की गति का स्मरण करके सीता हाथ से चरण नहीं छू रही थीं; यह देखकर रघुकुल-मणि राम मन-ही-मन मुसकराए, उन्होंने सीता की इस अलौकिक प्रीति को पहचान लिया।
तब सिय देखि भूप अभिलाषे। कूर कपूत मूढ़ मन माखे॥उठि उठि पहिरि सनाह अभागे। जहँ तहँ गाल बजावन लागे॥॥१॥
तब सीता को देखकर जो क्रूर, कुपूत और मूर्ख राजा उन्हें पाने की लालसा रखते थे, वे मन-ही-मन क्रोधित हो उठे। वे अभागे राजा उठ-उठकर कवच पहनकर जहाँ-तहाँ डींगें हाँकने लगे।
लेहु छड़ाइ सीय कह कोऊ। धरि बाँधहु नृप बालक दोऊ॥तोरें धनुषु चाड़ नहिं सरई। जीवत हमहि कुअँरि को बरई॥॥२॥
कोई कहता - सीता को छीन लो; कोई कहता - इन दोनों राजकुमारों को पकड़कर बाँध लो। धनुष तोड़ देने से ही काम नहीं चलेगा - जब तक हम जीवित हैं, कोई कुँआरा भी सीता को कैसे वरण कर सकता है।
जौं बिदेहु कछु करै सहाई। जीतहु समर सहित दोउ भाई॥साधु भूप बोले सुनि बानी। राजसमाजहि लाज लजानी॥॥३॥
यदि विदेहराज जनक कुछ सहायता करें, तो दोनों भाइयों सहित युद्ध में उन्हें जीत लो। यह वाणी सुनकर भले राजा बोल उठे कि यह तो सारी राजसभा को ही लज्जित कर देने वाली बात है।
बलु प्रतापु बीरता बड़ाई। नाक पिनाकहि संग सिधाई॥सोइ सूरता कि अब कहुँ पाई। असि बुधि तौ बिधि मुहँ मसि लाई॥॥४॥
तुम्हारा बल, प्रताप, वीरता और बड़ाई तो शिव-धनुष के साथ ही स्वर्ग सिधार गए। क्या वही वीरता अब कहीं और मिल गई है? यदि ऐसी बुद्धि है, तो विधाता ने तुम्हारे मुँह पर कालिख ही पोत दी है।
देखहु रामहि नयन भरि तजि इरिषा मदु कोहु।लखन रोषु पावकु प्रबल जानि सलभ जनि होहु॥२६६॥
ईर्ष्या, मद और क्रोध त्यागकर नेत्र भरकर राम को देखो; लक्ष्मण के रोष को प्रबल अग्नि जानकर उसमें पतंगे की तरह जलकर मत भस्म हो जाओ।
बैनतेय बलि जिमि चह कागू। जिमि ससु चहै नाग अरि भागू॥जिमि चह कुसल अकारन कोही। सब संपदा चहै सिवद्रोही॥॥१॥
जैसे कौआ गरुड़ का बल पाना चाहे, जैसे खरगोश शेषनाग के शत्रु का भाग्य पाना चाहे, जैसे बिना कारण क्रोध करने वाला व्यक्ति कुशलता चाहे - वैसे ही शिवद्रोही व्यक्ति समस्त संपदा पाना चाहता है।
लोभी लोलुप कल कीरति चहई। अकलंकता कि कामी लहई॥हरि पद बिमुख परम गति चाहा। तस तुम्हार लालचु नरनाहा॥॥२॥
लोभी और लालची व्यक्ति सुंदर कीर्ति चाहते हैं, पर क्या कामी को कभी निष्कलंकता मिलती है? भगवान के चरणों से विमुख व्यक्ति परम गति चाहे - हे राजाओ, तुम्हारा यह लालच भी वैसा ही व्यर्थ है।
कोलाहलु सुनि सीय सकानी। सखीं लवाइ गईं जहँ रानी॥रामु सुभायँ चले गुरु पाहीं। सिय सनेहु बरनत मन माहीं॥॥३॥
यह कोलाहल सुनकर सीता सहम गईं; सखियाँ उन्हें रानी के पास ले गईं। राम सहज स्वभाव से गुरु के पास चले, मन-ही-मन सीता के स्नेह का स्मरण करते हुए।
रानिन्ह सहित सोचबस सीया। अब धौं बिधिहि काह करनीया॥भूप बचन सुनि इत उत तकहीं। लखनु राम डर बोलि न सकहीं॥॥४॥
रानियों सहित सीता चिंता में डूब गईं - अब न जाने विधाता क्या करने वाले हैं। राजाओं के ऐसे वचन सुनकर सब लोग इधर-उधर देखने लगे; लक्ष्मण राम के भय से आज्ञा बिना कुछ बोल नहीं पा रहे थे।
अरुन नयन भृकुटी कुटिल चितवत नृपन्ह सकोप।मनहुँ मत्त गजगन निरखि सिंघकिसोरहि चोप॥२६७॥
लक्ष्मण के नेत्र लाल हो गए, भौंहें टेढ़ी हो गईं, वे क्रोधपूर्वक राजाओं की ओर देख रहे थे - मानो मतवाले हाथियों के झुंड को देखकर सिंह-शावक क्रोध से तमतमा उठा हो।
खरभरु देखि बिकल पुर नारीं। सब मिलि देहिं महीपन्ह गारीं॥तेहिं अवसर सुनि सिव धनु भंगा। आयसु भृगुकुल कमल पतंगा॥॥१॥
यह हलचल देखकर नगर की स्त्रियाँ विकल हो गईं, और सब मिलकर राजाओं को गालियाँ देने लगीं। ठीक उसी अवसर पर शिव-धनुष टूटने का समाचार सुनकर भृगुकुल-रूपी कमल के सूर्य परशुराम वहाँ आ पहुँचे।
देखि महीप सकल सकुचाने। बाज झपट जनु लवा लुकाने॥गौरि सरीर भूति भल भ्राजा। भाल बिसाल त्रिपुंड बिराजा॥॥२॥
परशुराम को देखते ही सब राजा सकुचा गए, मानो बाज की झपट देखकर तीतर छिप जाते हैं। उनका गोरा शरीर भस्म से भलीभाँति सुशोभित था, विशाल भाल पर त्रिपुंड शोभित था।
सीस जटा ससिबदनु सुहावा। रिसबस कछुक अरुन होइ आवा॥भृकुटी कुटिल नयन रिस राते। सहजहुँ चितवत मनहुँ रिसाते॥॥३॥
सिर पर जटा और चंद्रमा-सा सुंदर मुख था, जो क्रोधवश कुछ लाल हो आया था। भौंहें टेढ़ी थीं, नेत्र क्रोध से रँगे हुए थे - वे सहज ही देखते तो भी मानो क्रोधित दिखाई देते थे।
बृषभ कंध उर बाहु बिसाला। चारु जनेउ माल मृगछाला॥।कटि मुनि बसन तून दुइ बाँधें। धनु सर कर कुठारु कल काँधें॥॥४॥
उनके कंधे बैल के समान और वक्षस्थल-भुजाएँ विशाल थीं; सुंदर जनेऊ, माला और मृगछाला धारण किए थे। कमर में मुनि-वस्त्र और दो तरकश बँधे थे, हाथ में धनुष-बाण और कुठार तथा सुंदर करधनी थी।
सांत बेषु करनी कठिन बरनि न जाइ सरुप।धरि मुनितनु जनु बीर रसु आयउ जहँ सब भूप॥२६८॥
उनका वेश शांत था पर करनी कठोर थी, उनके स्वरूप का वर्णन नहीं किया जा सकता - मानो मुनि का शरीर धारण करके साक्षात वीर रस ही उस स्थान पर आ पहुँचा हो जहाँ सब राजा एकत्र थे।
देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला॥पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥॥१॥
परशुराम का भयंकर वेश देखते ही सब राजा भयभीत होकर उठ खड़े हुए। पिता सहित अपना-अपना नाम बताते हुए सब दंडवत प्रणाम करने लगे।
जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी॥जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा॥॥२॥
परशुराम जिस किसी को भी हितैषी समझकर सहज भाव से देख लेते, वह मानो अपनी मृत्यु ही सामने आई जानता। फिर राजा जनक ने आकर सिर नवाया और सीता को बुलाकर उनसे भी प्रणाम कराया।
आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गई सयानीं॥बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई॥॥३॥
परशुराम ने आशीर्वाद दिया, सखियाँ हर्षित हुईं और बुद्धिमती सखियाँ सीता को अपने समाज में ले गईं। फिर विश्वामित्र आकर परशुराम से मिले, और दोनों भाइयों को उनके चरण-कमलों में प्रणाम कराया।
रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा॥रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन॥॥४॥
यह जानकर कि ये राम-लक्ष्मण दशरथ के पुत्र हैं, परशुराम ने उनकी सुंदर जोड़ी देखकर आशीर्वाद दिया। राम को निहारते हुए उनके नेत्र मानो वहीं थककर ठहर गए, क्योंकि राम का रूप अपार था और कामदेव के मद को भी चूर करने वाला था।
बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर।पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर॥२६९॥
फिर जनक की ओर देखकर परशुराम ने पूछा - कहो, यहाँ इतनी भीड़ किस कारण है। यह पूछते समय वे मानो सब कुछ जानते हुए भी अनजान बनकर पूछ रहे थे, और उनके शरीर में क्रोध व्याप्त हो गया।
समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए॥सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे॥॥१॥
राजा जनक ने वह सारा समाचार सुनाया जिस कारण सब राजा वहाँ आए थे। यह वचन सुनते ही परशुराम ने दूसरी ओर देखा, तो भूमि पर पड़े धनुष के टुकड़े दिखाई दिए।
अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष के तोरा॥बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥॥२॥
अत्यंत क्रोध से परशुराम कठोर वचन बोले - हे मूर्ख जनक, बताओ, यह धनुष किसने तोड़ा। शीघ्र दिखाओ, नहीं तो हे मूढ़, आज ही तुम्हारा जहाँ तक राज्य है, उसे उलट दूँगा।
अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥सुर मुनि नाग नगर नर नारी।। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥॥३॥
अत्यंत भय से राजा जनक कोई उत्तर नहीं दे पा रहे थे; इस पर कुटिल राजा मन-ही-मन हर्षित हुए। देवता, मुनि, नाग तथा नगर के स्त्री-पुरुष सब हृदय में भारी त्रास के साथ सोचने लगे।
मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता॥॥४॥
सीता की माता मन-ही-मन पछता रही थीं - हाय विधाता, अब तक बनी हुई बात बिगड़ गई। परशुराम का स्वभाव सुनकर सीता के लिए आधा पल भी कल्प के समान बीतने लगा।
सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥२७०॥
परशुराम ने सब लोगों को भयभीत देखा और सीता को भी भयभीत जानकर उनका ध्यान गया; तब श्रीराम, जिनके हृदय में न कोई हर्ष था न विषाद, बोल पड़े।
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥॥१॥
हे नाथ, शिव-धनुष तोड़ने वाला आपका ही कोई दास होगा; मुझे क्या आज्ञा है, कहिए। यह सुनकर क्रोधी मुनि परशुराम रुष्ट होकर बोले।
सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई॥सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥॥२॥
सेवक वही है जो सेवा करे; शत्रु का काम करके फिर लड़ाई की क्या बात। सुनो राम, जिसने भी शिव-धनुष तोड़ा है, वह सहस्रबाहु के समान मेरा शत्रु है।
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥॥३॥
वह इस सभा को छोड़कर अलग हो जाए, नहीं तो सब राजाओं सहित मारा जाएगा। मुनि के ये वचन सुनकर लक्ष्मण मुसकरा उठे और परशुराम का अपमान करते हुए बोले।
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥॥४॥
हे स्वामी, बचपन में तो हमने कितने ही धनुष तोड़े हैं, पर आपने कभी ऐसा क्रोध नहीं किया। फिर इस धनुष पर आपकी इतनी ममता किस कारण है? यह सुनकर भृगुकुल के ध्वजारूप परशुराम क्रोधित होकर बोले।
रे नृप बालक कालबस बोलत तोहि न सँमार।धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥२७१॥
अरे राजकुमार, तू काल के वश होकर बोल रहा है, तुझे कुछ सुध-बुध नहीं रही। यह शिव का धनुष तेरे लिए साधारण धनुही के समान भले हो, पर यह तो सारे संसार में विख्यात है।
लखन कहा हँसि हमरें जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना॥का छति लाभु जून धनु तौरें। देखा राम नयन के भोरें॥॥१॥
लक्ष्मण ने हँसकर कहा - हे देव, हमारी समझ में तो सब धनुष एक समान हैं। इस पुराने धनुष के टूटने से क्या हानि-लाभ हो गया? राम ने तो इसे केवल आँखों की चूक से देखा था।
छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू॥बोले चितइ परसु की ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा॥॥२॥
छूते ही यह टूट गया, इसमें राम का भी कोई दोष नहीं है, फिर हे मुनि, आप व्यर्थ ही क्रोध क्यों कर रहे हैं। यह सुनकर परशुराम अपने फरसे की ओर देखते हुए बोले - अरे मूर्ख, तूने मेरा स्वभाव नहीं सुना है।
बालकु बोलि बधउँ नहिं तोही। केवल मुनि जड़ जानहि मोही॥बाल ब्रह्मचारी अति कोही। बिस्व बिदित छत्रियकुल द्रोही॥॥३॥
तुझे बालक समझकर मैं मार नहीं रहा, तू मुझे केवल एक जड़ मुनि ही समझ रहा है। मैं आजन्म ब्रह्मचारी और अत्यंत क्रोधी हूँ, संसार भर में विख्यात क्षत्रियकुल का शत्रु हूँ।
भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही। बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही॥सहसबाहु भुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा॥॥४॥
मैंने अपने भुजबल से पृथ्वी को अनेक बार राजाओं से रहित करके ब्राह्मणों को दान कर दिया है। सहस्रबाहु की भुजाओं को काटने वाला यह मेरा फरसा है - हे राजकुमार, इसे भलीभाँति देख ले।
मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर।गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर॥२७२॥
हे राजकुमार, अपने माता-पिता को चिंतित न करा; मेरा यह अत्यंत भयंकर फरसा तो गर्भ में पल रहे बच्चों तक का नाश कर देने वाला है।
बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महा भटमानी॥पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू। चहत उड़ावन फूँकि पहारू॥॥१॥
हँसकर लक्ष्मण कोमल वाणी में बोले - अहो मुनीश्वर, आप तो अपने को बड़ा भारी योद्धा मानते हैं। आप बार-बार मुझे अपना कुठार दिखा रहे हैं, मानो फूँक मारकर पहाड़ को उड़ाना चाहते हों।
इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं॥देखि कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना॥॥२॥
यहाँ कोई कुम्हड़े की बतिया जैसा कमजोर नहीं है, जो उँगली दिखाते ही डरकर मर जाए। आपका फरसा, धनुष-बाण देखकर ही मैंने कुछ अभिमानपूर्ण वचन कहे हैं।
भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी। जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी॥सुर महिसुर हरिजन अरु गाई। हमरें कुल इन्ह पर न सुराई॥॥३॥
आपको भृगुऋषि का पुत्र और आपका जनेऊ देखकर ही मैं क्रोध रोककर जो कुछ आप कहते हैं, सह लेता हूँ। देवता, ब्राह्मण, हरिभक्त और गाय - इन पर हमारे कुल में कभी शूरता नहीं दिखाई जाती।
बधें पापु अपकीरति हारें। मारतहूँ पा परिअ तुम्हारें॥कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा॥॥४॥
आपको मारने से पाप लगेगा, और यदि हारकर भाग जाऊँ तो अपयश होगा - इसलिए मारते समय भी आपके ही चरणों में पड़ना उचित होगा। आपका वचन ही करोड़ों वज्र के समान है, अतः धनुष-बाण और कुठार व्यर्थ ही धारण किए हुए हैं।
जो बिलोकि अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर।सुनि सरोष भृगुबंसमनि बोले गिरा गभीर॥२७३॥
हे महामुनि, हे धीर! यदि आपकी अवस्था और स्वरूप देखकर मैंने कुछ अनुचित कह दिया हो तो क्षमा करें। यह सुनकर भृगुवंश-मणि परशुराम अत्यंत रोष के साथ गंभीर वाणी में बोले।
कौसिक सुनहु मंद यहु बालकु। कुटिल कालबस निज कुल घालकु॥भानु बंस राकेस कलंकू। निपट निरंकुस अबुध असंकू॥॥१॥
हे विश्वामित्र, सुनिए - यह बालक अत्यंत मंदबुद्धि है, कुटिल काल के वश होकर अपने ही कुल का नाश करने वाला बन गया है। यह सूर्यवंश रूपी पूर्ण चंद्रमा पर कलंक है - नितांत निरंकुश, अज्ञानी और निडर है।
काल कवलु होइहि छन माहीं। कहउँ पुकारि खोरि मोहि नाहीं॥तुम्ह हटकउ जौं चहहु उबारा। कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा॥॥२॥
यह क्षण भर में काल का ग्रास हो जाएगा, मैं पुकारकर कह देता हूँ, फिर मुझे दोष मत देना। यदि आप इसे बचाना चाहते हैं तो इसे रोकिए - मेरे प्रताप, बल और रोष का यह हाल है।
लखन कहेउ मुनि सुजस तुम्हारा। तुम्हहि अछत को बरनै पारा॥अपने मुँह तुम्ह आपनि करनी। बार अनेक भाँति बहु बरनी॥॥३॥
लक्ष्मण ने कहा - हे मुनि, आपके यश का वर्णन तो आपके स्वयं रहते और कौन कर सकता है। आपने अपने मुख से अपनी ही करनी का बखान बारंबार, अनेक प्रकार से बहुत बार कर दिया है।
नहिं संतोषु त पुनि कछु कहहू। जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहू॥बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा। गारी देत न पावहु सोभा॥॥४॥
यदि अभी भी संतोष न हुआ हो, तो और कुछ कहिए; क्रोध रोककर असह्य दुख मत सहिए। आप वीरव्रती, धीर और अक्षुब्ध हैं - पर गाली देते हुए आपको शोभा नहीं मिलती।
सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु।बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु॥२७४॥
शूरवीर तो युद्ध में करनी करते हैं, कहकर अपनी वीरता प्रकट नहीं करते; कायर व्यक्ति ही शत्रु को सामने पाकर भी केवल अपने प्रताप की बातें बघारते हैं।
तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा॥सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर घोरा॥॥१॥
लगता है काल ने ही तुम्हें हाँक लगाकर बार-बार मुझे बुलाने के लिए भेजा है। लक्ष्मण के ये कठोर वचन सुनते ही परशुराम ने अपने भयंकर फरसे को हाथ में सँभाल लिया।
अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू। कटुबादी बालकु बधजोगू॥बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा। अब यहु मरनिहार भा साँचा॥॥२॥
अब लोग मुझे दोष न दें - यह कटुभाषी बालक तो वध के ही योग्य है। इसे बालक समझकर मैंने अब तक बहुत बचाया है, पर अब सचमुच यह मरने ही वाला है।
कौसिक कहा छमिअ अपराधू। बाल दोष गुन गनहिं न साधू॥खर कुठार मैं अकरुन कोही। आगें अपराधी गुरुद्रोही॥॥३॥
विश्वामित्र ने कहा - हे मुनि, इसका अपराध क्षमा कीजिए, साधुजन बालकों के दोष-गुण नहीं गिनते। परशुराम बोले - मेरा कुठार तीक्ष्ण है, मैं निर्दयी और क्रोधी हूँ, और सामने खड़ा है एक अपराधी, गुरुद्रोही बालक।
