सप्तम सोपान — भाग 2

उत्तरकाण्ड

अयोध्या वापसी, राज्याभिषेक एवं रामराज्य की कथा।

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अयोध्या वापसी, राज्याभिषेक एवं रामराज्य की कथा।

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जब काहू कै देखहिं बिपती। सुखी भए मानहुँ जग नृपती॥स्वारथ रत परिवार बिरोधी। लंपट काम लोभ अति क्रोधी॥

और जब किसी और की विपत्ति देखते हैं, तो ऐसे सुखी होते हैं मानो संसारके राजा बन गये हों; वे स्वार्थपरायण, अपने ही परिवारके विरोधी, काम-लोभमें लिप्त और अत्यंत क्रोधी होते हैं।

मातु पिता गुर बिप्र न मानहिं। आपु गए अरु घालहिं आनहिं॥करहिं मोह बस द्रोह परावा। संत संग हरि कथा न भावा॥

वे माता, पिता, गुरु और ब्राह्मणको कुछ नहीं मानते; स्वयं तो नष्ट रहते ही हैं, दूसरोंको भी नष्ट करते हैं। मोहवश दूसरोंसे द्रोह करते हैं, न उन्हें संतोंका संग भाता है, न हरिकथा।

अवगुन सिंधु मंदमति कामी। बेद बिदूषक परधन स्वामी॥बिप्र द्रोह पर द्रोह बिसेषा। दंभ कपट जियँ धरें सुबेषा॥

वे अवगुणोंके सागर, मंदबुद्धि, कामी, वेदोंके निंदक और परायी संपत्तिको हड़पनेवाले होते हैं; सबसे द्रोह करते हैं, पर ब्राह्मणसे विशेष; हृदयमें दंभ-कपट भरा होता है, पर बाहरसे सुंदर वेष धारण किये रहते हैं।

दोहा

ऐसे अधम मनुज खल कृतजुग त्रेता नाहिं।द्वापर कछुक बृंद बहु होइहहिं कलिजुग माहिं॥४०

ऐसे नीच दुष्ट मनुष्य सतयुग और त्रेतामें नहीं होते; द्वापरमें कुछ थोड़े होंगे, पर कलियुगमें इनके झुंड-के-झुंड होंगे।

पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥निर्नय सकल पुरान बेद कर। कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर॥

हे भाई, दूसरोंका भला करनेके समान कोई धर्म नहीं और दूसरेको दुःख देनेके समान कोई अधर्म नहीं—यह सभी वेद-पुराणोंका निश्चित सिद्धांत है, विद्वान इसे जानते हैं।

नर सरीर धरि जे पर पीरा। करहिं ते सहहिं महा भव भीरा॥करहिं मोह बस नर अघ नाना। स्वारथ रत परलोक नसाना॥

मनुष्यशरीर पाकर भी जो दूसरोंको पीड़ा देते हैं, उन्हें जन्म-मृत्युके भारी संकट सहने पड़ते हैं; मोहवश स्वार्थमें डूबे लोग अनेक पाप करते हैं और अपना परलोक बिगाड़ लेते हैं।

कालरूप तिन्ह कहँ मैं भ्राता। सुभ अरु असुभ कर्म फल दाता॥अस बिचारि जे परम सयाने। भजहिं मोहि संसृत दुख जाने॥

उनके लिये, भाई, मैं स्वयं कालरूप हूँ, उनके शुभ-अशुभ कर्मोंका फल देनेवाला। ऐसा जानकर जो परम बुद्धिमान हैं, वे संसारको दुःखरूप जानकर मुझे ही भजते हैं।

त्यागहिं कर्म सुभासुभ दायक। भजहिं मोहि सुर नर मुनि नायक॥संत असंतन्ह के गुन भाषे। ते न परहिं भव जिन्ह लखि राखे॥

वे शुभ-अशुभ फल देनेवाले कर्मोंको त्यागकर देव-मनुष्य-मुनियोंके स्वामी मुझको भजते हैं। इस तरह संत-असंतके गुण मैंने कहे; जिसने इन्हें समझ लिया, वह जन्म-मृत्युके चक्रमें नहीं पड़ता।

दोहा

सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक।गुन यह उभय न देखिअहिं देखिअ सो अबिबेक४१

सुनो तात, माया-रचित गुण और दोष दोनों ही अनेक हैं; इन दोनोंको न देखना ही विवेक है, इन्हें देखना ही अविवेक है।

श्रीमुख बचन सुनत सब भाई। हरषे प्रेम न हृदयँ समाई॥करहिं बिनय अति बारहिं बारा। हनूमान हियँ हरष अपारा॥

प्रभुके ये वचन सुनकर सब भाई हर्षित हो उठे, प्रेम हृदयमें समाता न था; वे बार-बार विनती करने लगे, और हनुमानके हृदयमें तो अपार हर्ष था।

पुनि रघुपति निज मंदिर गए। एहि बिधि चरित करत नित नए॥बार बार नारद मुनि आवहिं। चरित पुनीत राम के गावहिं॥

फिर रघुनाथ अपने महलको गये, इस प्रकार वे नित नयी लीला रचते रहे; नारदमुनि बार-बार आते और रामके पावन चरित्र गाते।

नित नव चरन देखि मुनि जाहीं। ब्रह्मलोक सब कथा कहाहीं॥सुनि बिरंचि अतिसय सुख मानहिं। पुनि पुनि तात करहु गुन गानहिं॥

मुनि यहाँसे नित नयी लीलाएँ देखकर जाते और ब्रह्मलोकमें जाकर सब कथा सुनाते; ब्रह्माजी सुनकर अत्यंत सुख पाते और कहते—तात, बार-बार रामके गुण गाओ।

सनकादिक नारदहि सराहहिं। जद्यपि ब्रह्म निरत मुनि आहहिं॥सुनि गुन गान समाधि बिसारी।। सादर सुनहिं परम अधिकारी॥

सनकादि मुनि नारदकी सराहना करते; यद्यपि वे स्वयं ब्रह्मनिष्ठ हैं, फिर भी रामका गुणगान सुनकर अपनी समाधि भूल जाते और आदरसे सुनते हैं—वे ही इस कथाके सच्चे अधिकारी हैं।

दोहा

जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान।जे हरि कथाँ न करहिं रति तिन्ह के हिय पाषान४२

जीवन्मुक्त, ब्रह्मपरायण मुनि भी ध्यान छोड़कर रामका चरित्र सुनते हैं; यह जानकर भी जो हरिकथासे प्रेम नहीं करते, उनका हृदय पत्थरके समान है।

एक बार रघुनाथ बोलाए। गुर द्विज पुरबासी सब आए॥बैठे गुर मुनि अरु द्विज सज्जन। बोले बचन भगत भव भंजन॥

एक बार रघुनाथने बुलाया तो गुरु, ब्राह्मण और सब नगरवासी सभामें आये; सब यथायोग्य बैठ गये, तब भक्तोंके भवबंधनको मिटानेवाले रामने वचन कहे।

सुनहु सकल पुरजन मम बानी। कहउँ न कछु ममता उर आनी॥नहिं अनीति नहिं कछु प्रभुताई। सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई॥

हे नगरवासियो, मेरी बात सुनो—मैं इसे किसी ममतासे नहीं कहता, न इसमें कोई अनीति है, न प्रभुताका आग्रह; सुनो और जो अच्छा लगे वही करो।

सोइ सेवक प्रियतम मम सोई। मम अनुसासन मानै जोई॥जौं अनीति कछु भाषौं भाई। तौ मोहि बरजहु भय बिसराई॥

जो मेरी आज्ञा माने, वही मेरा सेवक और प्रियतम है। और भाई, यदि मैं कभी कोई अनुचित बात कहूँ, तो निर्भय होकर मुझे रोक देना।

बड़ें भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथिन्ह गावा॥साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा॥

बड़े भाग्यसे यह मनुष्यशरीर मिलता है, जिसे सब शास्त्र देवताओंको भी दुर्लभ कहते हैं; यह साधनाका धाम और मोक्षका द्वार है—इसे पाकर भी जिसने परलोक न सँवारा,

दोहा

सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ।कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोष लगाइ४३

वह परलोकमें दुःख भोगता है, सिर पीट-पीटकर पछताता है और अपनी भूल न समझकर काल, कर्म और ईश्वरपर व्यर्थ दोष मढ़ता है।

एहि तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं। पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं॥

भाई, इस शरीरका फल विषयभोग नहीं है; स्वर्गका सुख भी थोड़ा है और अंततः दुःखदायी। मनुष्यशरीर पाकर भी जो मन विषयोंमें लगा देते हैं, वे मूर्ख अमृतके बदले विष चुन लेते हैं।

ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई। गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई॥आकर चारि लच्छ चौरासी। जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी॥

जो पारसमणि खोकर घुँघची बीन ले, उसे कोई बुद्धिमान नहीं कहता। यह अविनाशी जीव चौरासी लाख योनियोंमें युगों-युगोंसे भटकता रहता है,

फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म सुभाव गुन घेरा॥कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही॥

मायाकी प्रेरणासे काल, कर्म, स्वभाव और गुणोंसे घिरा सदा भटकता रहता है; बिना किसी कारणके स्नेह करनेवाला ईश्वर कभी-कभी दया करके इसे मनुष्यशरीर दे देता है।

नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो॥करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा॥

यह मनुष्यशरीर भवसागर पार करनेके लिये बेड़ा है, मेरी कृपा अनुकूल पवन है, सद्गुरु इस दृढ़ नावके कर्णधार हैं—इस तरह दुर्लभ साधन सहज ही सुलभ हो जाते हैं।

दोहा

जो न तर भव सागर नर समाज अस पाइ।सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ४४

जो ऐसा अवसर पाकर भी भवसागर पार नहीं करता, वह कृतघ्न और मंदबुद्धि है, और आत्मघाती जैसी दुर्गति पाता है।

जौं परलोक इहाँ सुख चहहू। सुनि मम बचन हृदय दृढ़ गहहू॥सुलभ सुखद मारग यह भाई। भगति मोरि पुरान श्रुति गाई॥

यदि इस लोक और परलोक दोनोंमें सुख चाहते हो, तो मेरे वचन हृदयमें दृढ़तासे धारण कर लो; हे भाई, यह मेरी भक्तिका मार्ग सुलभ और सुखद है, वेद-पुराणोंने इसे गाया है।

ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका। साधन कठिन न मन कहुँ टेका॥करत कष्ट बहु पावइ कोऊ। भक्ति हीन मोहि प्रिय नहिं सोऊ॥

ज्ञानका मार्ग दुर्गम है, उसमें अनेक विघ्न हैं, साधन कठिन है और मनको कोई सहारा नहीं मिलता; बड़े कष्टसे कोई उसे पा भी ले, तो भक्तिहीन होनेके कारण वह मुझे प्रिय नहीं।

भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी॥पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता॥

भक्ति स्वतंत्र और सब सुखोंकी खान है, पर सत्संगके बिना कोई इसे नहीं पाता; और संत भी पुण्यके बिना नहीं मिलते—सत्संग ही जन्म-मृत्युके चक्रका अंत करता है।

पुन्य एक जग महुँ नहिं दूजा। मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा॥सानुकूल तेहि पर मुनि देवा। जो तजि कपटु करइ द्विज सेवा॥

संसारमें एक ही पुण्य है, दूसरा कोई नहीं—मन-वचन-कर्मसे ब्राह्मणके चरणोंकी पूजा। जो कपट त्यागकर ब्राह्मणकी सेवा करता है, उसपर मुनि और देवता प्रसन्न रहते हैं।

दोहा

औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउँ कर जोरि।संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि४५

और एक गुप्त बात भी है, जो मैं हाथ जोड़कर सबसे कहता हूँ—शिवजीके भजन बिना मनुष्य मेरी भक्ति कभी नहीं पाता।

कहहु भगति पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा॥सरल सुभाव न मन कुटिलाई। जथा लाभ संतोष सदाई॥

भक्तिके मार्गमें कौन-सा परिश्रम है? न योग चाहिये, न यज्ञ-जप-तप-उपवास; बस सरल स्वभाव हो, मनमें कुटिलता न हो और जो मिले उसीमें सदा संतोष रखे।

मोर दास कहाइ नर आसा। करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा॥बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई। एहि आचरन बस्य मैं भाई॥

मेरा दास कहलाकर भी जो मनुष्योंसे आशा रखे, उसका मुझपर कैसा विश्वास? अधिक क्या कहूँ, भाई, मैं तो बस इस आचरणका ही वशीभूत हूँ।

बैर न बिग्रह आस न त्रासा। सुखमय ताहि सदा सब आसा॥अनारंभ अनिकेत अमानी। अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी॥

जो न वैर करे, न झगड़ा, न आशा रखे, न भय—उसके लिये सभी दिशाएँ सुखमय हैं। जो फलेच्छासे कर्म नहीं करता, जिसकी घरमें ममता नहीं, जो मानहीन, निष्पाप, क्रोधहीन, दक्ष और विज्ञानवान है,

प्रीति सदा सज्जन संसर्गा। तन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा॥भगति पच्छ हठ नहिं सठताई। दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई॥

जिसे सदा संतोंके संगमें प्रीति है, जिसे विषय-सुख, स्वर्ग और मोक्ष तक तृणके समान लगते हैं, जो भक्तिका आग्रही तो है पर मूर्खतावश हठ नहीं करता और सब कुतर्कोंको दूर बहा चुका है,

दोहा

मम गुन ग्राम नाम रत गत ममता मद मोह।ता कर सुख सोइ जानइ परानंद संदोह४६

जो मेरे गुणों और नामका ही परायण है, ममता-मद-मोहसे मुक्त है—उसका सुख वही जानता है जो स्वयं परमानंदको प्राप्त हो चुका है।

सुनत सुधासम बचन राम के। गहे सबनि पद कृपाधाम के॥जननि जनक गुर बंधु हमारे। कृपा निधान प्रान ते प्यारे॥

रामके अमृत-सम वचन सुनकर सबने कृपाधामके चरण पकड़ लिये—आप ही हमारे माता-पिता, गुरु और भाई हैं, हे कृपानिधान, प्राणोंसे भी प्रिय।

तनु धनु धाम राम हितकारी। सब बिधि तुम्ह प्रनतारति हारी॥असि सिख तुम्ह बिनु देइ न कोऊ। मातु पिता स्वारथ रत ओऊ॥

हे शरणागतकी पीड़ा हरनेवाले, आप ही हमारे तन-धन-घर और हर तरहसे हितकारी हैं; ऐसी शिक्षा आपके सिवा कोई नहीं दे सकता—माता-पिता भी स्वार्थके वशीभूत रहते हैं।

हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी॥स्वारथ मीत सकल जग माहीं। सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं॥

हे असुरोंके शत्रु, संसारमें निःस्वार्थ उपकार करनेवाले बस दो ही हैं—आप और आपके सेवक; बाकी सब स्वार्थके ही मित्र हैं, प्रभु, उनके मनमें स्वप्रमें भी परमार्थ नहीं।

सबके बचन प्रेम रस साने। सुनि रघुनाथ हृदयँ हरषाने॥निज निज गृह गए आयसु पाई। बरनत प्रभु बतकही सुहाई॥

सबके प्रेमरससे सने वचन सुनकर रघुनाथका हृदय हर्षसे भर गया; फिर आज्ञा पाकर सब प्रभुकी सुंदर बातें कहते हुए अपने-अपने घर लौट गये।

दोहा

उमा अवधबासी नर नारि कृतारथ रूप।ब्रह्म सच्चिदानंद घन रघुनायक जहँ भूप४७

शिवजी कहते हैं—हे उमा, अवधके नर-नारी सब कृतार्थ हैं, क्योंकि वहाँ स्वयं सच्चिदानंदघन रघुनाथ राजा हैं।

एक बार बसिष्ट मुनि आए। जहाँ राम सुखधाम सुहाए॥अति आदर रघुनायक कीन्हा। पद पखारि पादोदक लीन्हा॥

एक बार वसिष्ठमुनि वहाँ आये जहाँ सुखधाम राम विराजते थे; रघुनाथने उनका बड़ा आदर किया, चरण धोकर चरणामृत ग्रहण किया।

राम सुनहु मुनि कह कर जोरी। कृपासिंधु बिनती कछु मोरी॥देखि देखि आचरन तुम्हारा। होत मोह मम हृदयँ अपारा॥

मुनिने हाथ जोड़कर कहा—हे कृपासागर राम, मेरी एक विनती सुनिये; आपका मनुष्योचित आचरण देख-देखकर मेरे हृदयमें अपार विस्मय होता है।

महिमा अमित बेद नहिं जाना। मैं केहि भाँति कहउँ भगवाना॥उपरोहित्य कर्म अति मंदा। बेद पुरान सुमृति कर निंदा॥

आपकी महिमा असीम है, जिसे वेद भी नहीं जानते, फिर मैं कैसे कहूँ! पुरोहिती तो बहुत नीचा पेशा है, वेद-पुराण-स्मृति सब इसकी निंदा करते हैं—

जब न लेउँ मैं तब बिधि मोही। कहा लाभ आगें सुत तोही॥परमातमा ब्रह्म नर रूपा। होइहि रघुकुल भूषन भूपा॥

जब मैंने इसे स्वीकार नहीं किया था, तब ब्रह्माजीने कहा था—पुत्र, आगे इससे तुम्हें बड़ा लाभ होगा, क्योंकि स्वयं परमात्मा मनुष्यरूप धरकर रघुकुलके भूषण राजा बनेंगे।

दोहा

-तब मैं हृदयँ बिचारा जोग जग्य ब्रत दान।जा कहुँ करिअ सो पैहउँ धर्म न एहि सम आन४८

तब मैंने मन-ही-मन सोचा—जिस फलके लिये योग, यज्ञ, व्रत और दान किये जाते हैं, वह मुझे इसी कर्मसे मिल जायगा; फिर इसके समान कोई धर्म ही नहीं।

जप तप नियम जोग निज धर्मा। श्रुति संभव नाना सुभ कर्मा॥ग्यान दया दम तीरथ मज्जन। जहँ लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन॥

जप, तप, नियम, योग, अपना-अपना धर्म, वेदविहित शुभ कर्म, ज्ञान, दया, संयम, तीर्थस्नान—जहाँतक वेद और सज्जनोंने धर्म बताया है,

आगम निगम पुरान अनेका। पढ़े सुने कर फल प्रभु एका॥तब पद पंकज प्रीति निरंतर। सब साधन कर यह फल सुंदर॥

और अनेक शास्त्रों, वेदों-पुराणोंके पढ़ने-सुननेका फल भी अंततः एक ही है, प्रभु—और सब साधनोंका भी बस यही सुंदर फल है कि आपके चरणकमलोंमें अटूट प्रेम बना रहे।

छूटइ मल कि मलहि के धोएँ। घृत कि पाव कोइ बारि बिलोएँ॥प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुँ न जाई॥

क्या मैलसे मैल धुलता है? क्या जल बिलोनेसे घी निकलता है? वैसे ही, हे रघुनाथ, प्रेमभक्तिरूपी जलके बिना हृदयका मैल कभी नहीं जाता।

सोइ सर्बग्य तग्य सोइ पंडित। सोइ गुन गृह बिग्यान अखंडित॥दच्छ सकल लच्छन जुत सोई। जाकें पद सरोज रति होई॥

वही सर्वज्ञ है, वही तत्त्वज्ञ और पंडित है, वही गुणोंका घर और पूर्ण विज्ञानी है, वही चतुर और सर्वगुणसंपन्न है, जिसका आपके चरणकमलोंमें प्रेम है।

दोहा

नाथ एक बर मागउँ राम कृपा करि देहु।जन्म जन्म प्रभु पद कमल कबहुँ घटै जनि नेहु४९

हे नाथ राम, मैं आपसे एक ही वर माँगता हूँ, कृपा करके दीजिये—आपके चरणकमलोंमें मेरा प्रेम जन्म-जन्मांतरमें भी कभी कम न हो।

अस कहि मुनि बसिष्ट गृह आए। कृपासिंधु के मन अति भाए॥हनूमान भरतादिक भ्राता। संग लिए सेवक सुखदाता॥

ऐसा कहकर वसिष्ठमुनि घर लौट गये, उनकी बातें कृपासागरके मनको बहुत भायीं; फिर सेवकोंको सुख देनेवाले रामने हनुमान और भरत आदि भाइयोंको साथ लिया।

पुनि कृपाल पुर बाहेर गए। गज रथ तुरग मगावत भए॥देखि कृपा करि सकल सराहे। दिए उचित जिन्ह जिन्ह तेइ चाहे॥

फिर कृपालु राम नगरके बाहर गये और हाथी, रथ, घोड़े मँगवाये; उन्हें देखकर कृपापूर्वक सबकी सराहना की और जिस-जिसने चाहा, उसे उचित जानकर वह भेंट दी।

हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई। गए जहाँ सीतल अवँराई॥भरत दीन्ह निज बसन डसाई। बैठे प्रभु सेवहिं सब भाई॥

जगतके सारे श्रमको हरनेवाले प्रभुको ही जब कुछ थकान महसूस हुई, तो वे शीतल अमराईमें गये; वहाँ भरतने अपना वस्त्र बिछाया, प्रभु उसपर बैठे और सब भाई सेवामें लग गये।

मारुतसुत तब मारुत करई। पुलक बपुष लोचन जल भरई॥

तब पवनपुत्र हनुमान पंखा झलने लगे, उनका शरीर पुलकित हो उठा और नेत्र भर आए।

हनूमान सम नहिं बड़भागी। नहिं कोउ राम चरन अनुरागी॥गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई। बार बार प्रभु निज मुख गाई॥

शिवजी कहते हैं—हे गिरिजा, हनुमान के समान न कोई बड़भागी है, न कोई राम के चरणों का ऐसा प्रेमी, जिसकी सेवा-भक्ति की प्रभु ने स्वयं अपने मुख से बार-बार सराहना की।

दोहा

तेहिं अवसर मुनि नारद आए करतल बीन।गावन लगे राम कल कीरति सदा नबीन॥५०

ठीक उसी समय नारदमुनि हाथ में वीणा लिए आ पहुँचे और राम के सदा नये-से मधुर यश का गान करने लगे।

छंद

मामवलोकय पंकज लोचन। कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन॥नील तामरस स्याम काम अरि। हृदय कंज मकरंद मधुप हरि॥

हे कमलनयन, कृपादृष्टिमात्रसे शोक हरनेवाले, मेरी ओर देखिये; हे नीलकमल-श्याम, कामारि शिवके हृदयकमलके मकरंदको पीनेवाले भ्रमर हरि!

छंद

जातुधान बरूथ बल भंजन। मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन॥भूसुर ससि नव बृंद बलाहक। असरन सरन दीन जन गाहक॥

राक्षससेनाके बलको तोड़नेवाले, मुनि-संतोंको आनंद देनेवाले, पापोंके नाशक; ब्राह्मणरूपी खेतीके लिये नवमेघ, शरणहीनोंके शरणदाता, दीनोंके रक्षक!

छंद

भुज बल बिपुल भार महि खंडित। खर दूषन बिराध बध पंडित॥रावनारि सुखरूप भूपबर। जय दसरथ कुल कुमुद सुधाकर॥

अपनी भुजाओंसे पृथ्वीका भारी बोझ उतारनेवाले, खर-दूषण-विराधके संहारमें कुशल, रावणके शत्रु, आनंदस्वरूप, राजाओंमें श्रेष्ठ, दशरथकुलरूपी कुमुदिनीके चंद्रमा—आपकी जय हो!

छंद

सुजस पुरान बिदित निगमागम। गावत सुर मुनि संत समागम॥कारुनीक ब्यलीक मद खंडन। सब बिधि कुसल कोसला मंडन॥

आपका सुंदर यश पुराण-वेदोंमें प्रसिद्ध है, देव-मुनि-संत सब मिलकर उसे गाते हैं; करुणामय, झूठे अभिमानको तोड़नेवाले, सब तरहसे कुशल, आप ही कोसलपुरीके भूषण हैं।

छंद

कलि मल मथन नाम ममताहन। तुलसीदास प्रभु पाहि प्रनत जन॥

आपका नाम कलियुगके पापोंको मथ डालता और ममताको मार डालता है—हे तुलसीदासके स्वामी, इस शरणागतकी रक्षा कीजिये।

दोहा

प्रेम सहित मुनि नारद बरनि राम गुन ग्राम।सोभासिंधु हृदयँ धरि गए जहाँ बिधि धाम५१

इस प्रकार प्रेमपूर्वक रामके गुणोंका वर्णन कर नारदमुनि उस शोभाके सागरको हृदयमें बसाकर ब्रह्मलोक चले गये।

गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा। मैं सब कही मोरि मति जथा॥राम चरित सत कोटि अपारा। श्रुति सारदा न बरनै पारा॥

शिवजी कहते हैं—हे गिरिजा, सुनो, यह उज्ज्वल कथा मैंने अपनी बुद्धिभर पूरी कह दी; रामके चरित्र तो सौ करोड़से भी अधिक हैं, वेद और सरस्वती भी उनका पूरा वर्णन नहीं कर सकते।

राम अनंत अनंत गुनानी। जन्म कर्म अनंत नामानी॥जल सीकर महि रज गनि जाहीं। रघुपति चरित न बरनि सिराहीं॥

राम अनंत हैं, उनके गुण अनंत, जन्म-कर्म-नाम भी अनंत; जलकी बूँदें और धरतीकी धूल गिनी जा सकती है, पर रघुनाथके चरित्रोंका वर्णन कभी समाप्त नहीं होता।

बिमल कथा हरि पद दायनी। भगति होइ सुनि अनपायनी॥उमा कहिउँ सब कथा सुहाई। जो भुसुंडि खगपतिहि सुनाई॥

यह पवित्र कथा हरिके परमपदको देनेवाली है, इसे सुननेसे अटूट भक्ति मिलती है। हे उमा, मैंने वह सब सुंदर कथा कही जो काकभुशुण्डिने गरुड़को सुनायी थी।

कछुक राम गुन कहेउँ बखानी। अब का कहौं सो कहहु भवानी॥सुनि सुभ कथा उमा हरषानी। बोली अति बिनीत मृदु बानी॥

मैंने रामके कुछ थोड़े ही गुण बखानकर कहे, अब हे भवानी, तुम्हीं बताओ और क्या कहूँ? यह मंगलमय कथा सुनकर पार्वतीजी हर्षित हुईं और अत्यंत विनम्र, कोमल वाणीमें बोलीं।

धन्य धन्य मैं धन्य पुरारी। सुनेउँ राम गुन भव भय हारी॥

हे त्रिपुरारि, मैं धन्य हूँ, धन्य-धन्य हूँ, जो मैंने जन्म-मृत्युका भय हरनेवाले रामके गुण सुने।

दोहा

तुम्हरी कृपाँ कृपायतन अब कृतकृत्य न मोह।जानेउँ राम प्रताप प्रभु चिदानंद संदोह५२(क)

हे कृपाधाम, आपकी कृपासे अब मैं कृतकृत्य हो गयी, मोह जाता रहा; प्रभु, मैं सच्चिदानंदघन रामके प्रतापको जान गयी।

दोहा

नाथ तवानन ससि स्रवत कथा सुधा रघुबीर।श्रवन पुटन्हि मन पान करि नहिं अघात मतिधीर५२(ख)

हे नाथ, आपका मुखरूपी चंद्रमा रघुवीरकी कथारूपी अमृत बरसाता है; हे धीरबुद्धि, मेरा मन कानोंसे उसे पीकर भी कभी तृप्त नहीं होता।

राम चरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं॥जीवनमुक्त महामुनि जेऊ। हरि गुन सुनहिं निरंतर तेऊ॥

रामके चरित्र सुनते-सुनते जो तृप्त हो जाते हैं, उन्होंने उसका असली रस जाना ही नहीं; जीवन्मुक्त महामुनि भी हरिके गुण निरंतर सुनते ही रहते हैं।

भव सागर चह पार जो पावा। राम कथा ता कहँ दृढ़ नावा॥बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा। श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा॥

जो भवसागर पार करना चाहता है, उसके लिये रामकथा दृढ़ नाव है; और हरिके गुण तो विषयासक्त लोगोंके भी कानोंको सुख और मनको आनंद देते हैं।

श्रवनवंत अस को जग माहीं। जाहि न रघुपति चरित सोहाहीं॥ते जड़ जीव निजात्मक घाती। जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती॥

संसारमें ऐसा कौन कानवाला है जिसे रघुनाथके चरित्र न भाते हों? जिन्हें यह कथा नहीं भाती, वे मूर्ख जीव अपनी ही आत्माके हत्यारे हैं।

हरिचरित्र मानस तुम्ह गावा। सुनि मैं नाथ अमिति सुख पावा॥तुम्ह जो कही यह कथा सुहाई। कागभसुंडि गरुड़ प्रति गाई॥

आपने रामचरितमानसका गान किया, हे नाथ, सुनकर मैंने अपार सुख पाया; आपने बताया कि यह सुंदर कथा काकभुशुण्डिने गरुड़को सुनायी थी—

दोहा

बिरति ग्यान बिग्यान दृढ़ राम चरन अति नेह।बायस तन रघुपति भगति मोहि परम संदेह५३

—और वे काकभुशुण्डि, कौएका शरीर पाकर भी वैराग्य-ज्ञान-विज्ञानमें दृढ़ हैं, रामचरणोंमें उनका गहरा प्रेम है और उन्हें रघुनाथकी भक्ति भी प्राप्त है—यह सुनकर मुझे बड़ा विस्मय हो रहा है।

नर सहस्त्र महँ सुनहु पुरारी। कोउ एक होइ धर्म ब्रतधारी॥धर्मसील कोटिक महँ कोई। बिषय बिमुख बिराग रत होई॥

हे त्रिपुरारि, सुनिये, हजारों मनुष्योंमें कोई एक धर्मव्रती होता है, और करोड़ों धर्मात्माओंमें कोई एक विषयोंसे विमुख होकर वैराग्यमें रत होता है।

कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई। सम्यक ग्यान सकृत कोउ लहई॥ग्यानवंत कोटिक महँ कोऊ। जीवनमुक्त सकृत जग सोऊ॥

करोड़ों विरक्तोंमें श्रुति कहती है कोई एक ही सम्यक् ज्ञान पाता है; और करोड़ों ज्ञानियोंमें कोई एक ही जीवन्मुक्त होता है, संसारमें ऐसा कोई विरला ही मिलेगा।

तिन्ह सहस्त्र महुँ सब सुख खानी। दुर्लभ ब्रह्मलीन बिग्यानी॥धर्मसील बिरक्त अरु ग्यानी। जीवनमुक्त ब्रह्मपर प्रानी॥

हजारों जीवन्मुक्तोंमें भी सब सुखोंकी खान, ब्रह्ममें लीन विज्ञानी और दुर्लभ है; धर्मात्मा, वैराग्यवान, ज्ञानी, जीवन्मुक्त और ब्रह्मलीन—

सब ते सो दुर्लभ सुरराया। राम भगति रत गत मद माया॥सो हरिभगति काग किमि पाई। बिस्वनाथ मोहि कहहु बुझाई॥

—इन सबमें भी, हे देवाधिदेव, वह अत्यंत दुर्लभ है जो मद-मायासे मुक्त होकर रामभक्तिमें रत हो। हे विश्वनाथ, ऐसी दुर्लभ हरिभक्ति एक कौआ कैसे पा गया, मुझे समझाकर कहिये।

दोहा

राम परायन ग्यान रत गुनागार मति धीर।नाथ कहहु केहि कारन पायउ काक सरीर५४

हे नाथ, बताइये—रामपरायण, ज्ञाननिष्ठ, गुणोंके धाम, धीरबुद्धि भुशुण्डिने किस कारण कौएका शरीर पाया?

यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा। कहहु कृपाल काग कहँ पावा॥तुम्ह केहि भाँति सुना मदनारी। कहहु मोहि अति कौतुक भारी॥

यह प्रभुका पवित्र सुंदर चरित्र उस कौएने कहाँसे पाया, कृपालु? और हे कामारि, यह भी बताइये कि आपने इसे कैसे सुना—मुझे बड़ी उत्सुकता है।

गरुड़ महाग्यानी गुन रासी। हरि सेवक अति निकट निवासी॥तेहिं केहि हेतु काग सन जाई। सुनी कथा मुनि निकर बिहाई॥

गरुड़ तो महाज्ञानी, सद्गुणोंकी राशि, हरिके सेवक और उनके अत्यंत निकटवासी हैं—फिर मुनियोंका समूह छोड़कर वे कौएके पास जाकर कथा सुनने क्यों गये?

कहहु कवन बिधि भा संबादा। दोउ हरिभगत काग उरगादा॥गौरि गिरा सुनि सरल सुहाई। बोले सिव सादर सुख पाई॥

बताइये, इन दोनों हरिभक्तों—कौआ और गरुड़—के बीच यह संवाद किस तरह हुआ? पार्वतीकी सरल, सुंदर वाणी सुनकर शिवजी आदरसहित सुखपूर्वक बोले—

धन्य सती पावन मति तोरी। रघुपति चरन प्रीति नहिं थोरी॥सुनहु परम पुनीत इतिहासा। जो सुनि सकल लोक भ्रम नासा॥

हे सती, तुम धन्य हो, तुम्हारी बुद्धि परम पवित्र है, रघुनाथके चरणोंमें तुम्हारा प्रेम कम नहीं है; अब वह परम पावन इतिहास सुनो, जिसे सुनते ही सारे लोकोंका भ्रम मिट जाता है,

उपजइ राम चरन बिस्वासा। भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा॥

और रामचरणोंमें ऐसा विश्वास जगता है कि मनुष्य बिना किसी परिश्रमके ही भवसागर पार कर जाता है।

दोहा

ऐसिअ प्रस्न बिहंगपति कीन्ह काग सन जाइ।सो सब सादर कहिहउँ सुनहु उमा मन लाइ५५

गरुड़ने भी जाकर काकभुशुण्डिसे लगभग यही प्रश्न किये थे; हे उमा, मैं वह सब आदरसहित कहूँगा, तुम मन लगाकर सुनो।

मैं जिमि कथा सुनी भव मोचनि। सो प्रसंग सुनु सुमुखि सुलोचनि॥प्रथम दच्छ गृह तव अवतारा। सती नाम तब रहा तुम्हारा॥

जिस तरह मैंने वह भवबंधन काटनेवाली कथा सुनी, हे सुमुखी सुलोचनी, वह प्रसंग सुनो। पहले तुम्हारा जन्म दक्षके घर हुआ था, तब तुम्हारा नाम सती था।

दच्छ जग्य तब भा अपमाना। तुम्ह अति क्रोध तजे तब प्राना॥मम अनुचरन्ह कीन्ह मख भंगा। जानहु तुम्ह सो सकल प्रसंगा॥

दक्षके यज्ञमें तुम्हारा अपमान हुआ, तुमने क्रोधवश प्राण त्याग दिये; फिर मेरे गणोंने वह यज्ञ ध्वंस कर डाला—यह सब प्रसंग तुम पहलेसे ही जानती हो।

तब अति सोच भयउ मन मोरें। दुखी भय बियोग प्रिय तोरें॥सुंदर बन गिरि सरित तड़ागा। कौतुक देखत फिरउँ बेरागा॥

तब मेरे मनमें बड़ा शोक हुआ, प्रिये, तुम्हारे वियोगसे मैं दुखी हो गया; विरक्त होकर मैं सुंदर वन, पर्वत, नदी-तालाबोंके दृश्य देखता हुआ भटकता रहा।

गिरि सुमेर उत्तर दिसि दूरी। नील सैल एक सुंदर भूरी॥तासु कनकमय सिखर सुहाए। चारि चारु मोरे मन भाए॥

सुमेरु पर्वतसे उत्तरमें, बहुत दूर, एक अत्यंत सुंदर नीला पर्वत है; उसके स्वर्णमय सुंदर शिखरोंमेंसे चार शिखर मेरे मनको विशेष भाये।

तिन्ह पर एक एक बिटप बिसाला। बट पीपर पाकरी रसाला॥सैलोपरि सर सुंदर सोहा। मनि सोपान देखि मन मोहा॥

उन शिखरोंमें से एक-एकपर बरगद, पीपल, पाकर और आमका विशाल वृक्ष है; पर्वतके ऊपर एक सुंदर सरोवर शोभित है, जिसकी मणि-सीढ़ियाँ देखकर मन मोहित हो जाता है।

दोहा

सीतल अमल मधुर जल जलज बिपुल बहुरंग।कूजत कल रव हंस गन गुंजत मंजुल भृंग५६

उसका जल शीतल, निर्मल और मीठा है, उसमें रंग-बिरंगे अनेक कमल खिले हैं; हंस मधुर स्वरमें बोलते हैं और भौंरे सुंदर गुंजार करते हैं।

तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग सोई। तासु नास कल्पांत न होई॥माया कृत गुन दोष अनेका। मोह मनोज आदि अबिबेका॥

उसी सुंदर पर्वतपर वह पक्षी (काकभुशुण्डि) निवास करता है, जिसका नाश कल्पके अंतमें भी नहीं होता; माया-रचित अनेक गुण-दोष, मोह-काम आदि अविवेक,

रहे ब्यापि समस्त जग माहीं। तेहि गिरि निकट कबहुँ नहिं जाहीं॥तहँ बसि हरिहि भजइ जिमि कागा। सो सुनु उमा सहित अनुरागा॥

जो सारे संसारमें व्याप्त हैं, वे उस पर्वतके पास कभी फटकते तक नहीं। हे उमा, वहाँ रहकर वह कौआ हरिको कैसे भजता है, यह प्रेमसहित सुनो।

पीपर तरु तर ध्यान सो धरई। जाप जग्य पाकरि तर करई॥आँब छाहँ कर मानस पूजा। तजि हरि भजनु काजु नहिं दूजा॥

पीपलके नीचे वह ध्यान लगाता है, पाकरके नीचे जप-यज्ञ करता है, आमकी छायामें मानस-पूजा करता है—हरिभजनके सिवा उसे कोई दूसरा काम नहीं।

बर तर कह हरि कथा प्रसंगा। आवहिं सुनहिं अनेक बिहंगा॥राम चरित बिचित्र बिधि नाना। प्रेम सहित कर सादर गाना॥

बरगदके नीचे वह हरिकी कथाएँ सुनाता है, अनेक पक्षी वहाँ आकर सुनते हैं; वह विचित्र रामचरित्रको प्रेम और आदरसहित तरह-तरहसे गाता है।

सुनहिं सकल मति बिमल मराला। बसहिं निरंतर जे तेहिं ताला॥जब मैं जाइ सो कौतुक देखा। उर उपजा आनंद बिसेषा॥

उस सरोवरपर सदा बसनेवाले निर्मल बुद्धिके सब हंस भी उसे सुनते हैं। जब मैंने वहाँ जाकर यह अद्भुत दृश्य देखा, तो मेरे हृदयमें विशेष आनंद उमड़ आया।

दोहा

तब कछु काल मराल तनु धरि तहँ कीन्ह निवास।सादर सुनि रघुपति गुन पुनि आयउँ कैलास५७

तब मैंने हंसका रूप धरकर कुछ समय वहाँ निवास किया, आदरसहित रघुनाथके गुण सुने, फिर कैलास लौट आया।

गिरिजा कहेउँ सो सब इतिहासा। मैं जेहि समय गयउँ खग पासा॥अब सो कथा सुनहु जेहि हेतू। गयउ काग पहिं खग कुल केतू॥

हे गिरिजा, मैंने वह सारा इतिहास कहा जब मैं स्वयं उस पक्षीके पास गया था; अब वह कथा सुनो जिस कारण पक्षिकुलके ध्वज गरुड़ उस कौएके पास गये।

जब रघुनाथ कीन्हि रन क्रीड़ा। समुझत चरित होति मोहि ब्रीड़ा॥इंद्रजीत कर आपु बँधायो। तब नारद मुनि गरुड़ पठायो॥

जब रघुनाथने वह रणलीला की—जिसे याद करते मुझे भी लज्जा होती है, कि उन्होंने मेघनादके हाथों स्वयं बँध जाना स्वीकार किया—तब नारदमुनिने गरुड़को वहाँ भेजा।

बंधन काटि गयो उरगादा। उपजा हृदयँ प्रचंड बिषादा॥प्रभु बंधन समुझत बहु भाँती। करत बिचार उरग आराती॥

सर्पभक्षी गरुड़ बंधन काटकर लौटे, पर उनके हृदयमें भारी विषाद उठा; प्रभुके उस बंधनको बार-बार सोचकर सर्पशत्रु गरुड़ तरह-तरहके विचार करने लगे—

ब्यापक ब्रह्म बिरज बागीसा। माया मोह पार परमीसा॥सो अवतार सुनेउँ जग माहीं। देखेउँ सो प्रभाव कछु नाहीं॥

जो सर्वव्यापी, विकाररहित, वाणीके स्वामी और माया-मोहसे परे परमेश्वर हैं, सुना था कि उन्हींका यह अवतार है, पर मैंने तो उनका वह प्रभाव कहीं देखा ही नहीं।

दोहा

भव बंधन ते छूटहिं नर जपि जा कर नाम।खर्च निसाचर बाँधेउ नागपास सोइ राम५८

जिनका नाम जपकर मनुष्य भवबंधनसे मुक्त हो जाते हैं, उन्हीं रामको एक तुच्छ राक्षसने नागपाशसे बाँध लिया!

नाना भाँति मनहि समुझावा। प्रगट न ग्यान हृदयँ भ्रम छावा॥खेद खिन्न मन तर्क बढ़ाई। भयउ मोहबस तुम्हरिहिं नाई॥

गरुड़ने अपने मनको बहुत तरहसे समझाया, पर स्पष्टता नहीं आयी, हृदयमें भ्रम और गहरा गया; दुःख और कुतर्कसे व्याकुल होकर वे भी, हे उमा, ठीक तुम्हारी ही तरह मोहमें पड़ गये।

ब्याकुल गयउ देवरिषि पाहीं। कहेसि जो संसय निज मन माहीं॥सुनि नारदहि लागि अति दाया। सुनु खग प्रबल राम कै माया॥

व्याकुल होकर गरुड़ देवर्षि नारदके पास गये और अपने मनका संदेह कह सुनाया; सुनकर नारदको बड़ी दया आयी—हे पक्षिराज, सुनिये, रामकी माया अत्यंत बलवती है।

जो ग्यानिन्ह कर चित अपहरई। बरिआई बिमोह मन करई॥जेहिं बहु बार नचावा मोही। सोइ ब्यापी बिहंगपति तोही॥

वह ज्ञानियोंके चित्तको भी छीन लेती है और जबरन गहरा मोह उत्पन्न कर देती है; जिसने मुझे भी बार-बार नचाया है, हे पक्षिराज, वही माया अब आपको भी घेर चुकी है।

महामोह उपजा उर तोरें। मिटिहि न बेगि कहें खग मोरें॥चतुरानन पहिं जाहु खगेसा। सोइ करेहु जेहि होइ निदेसा॥

आपके हृदयमें बड़ा भारी मोह उठ खड़ा हुआ है, यह मेरे समझानेसे शीघ्र नहीं मिटेगा; इसलिये हे पक्षिराज, आप ब्रह्माजीके पास जाइये और वहाँसे जो आदेश मिले, वही कीजिये।

दोहा

अस कहि चले देवरिषि करत राम गुन गान।हरि माया बल बरनत पुनि पुनि परम सुजान५९

ऐसा कहकर परम सुजान देवर्षि नारद रामके गुण गाते और बार-बार हरिकी मायाका बल वर्णन करते हुए चल पड़े।

तब खगपति बिरंचि पहिं गयऊ। निज संदेह सुनावत भयऊ॥सुनि बिरंचि रामहि सिरु नावा। समुझि प्रताप प्रेम अति छावा॥

तब पक्षिराज गरुड़ ब्रह्माजीके पास गये और अपना संदेह सुनाया; सुनकर ब्रह्माजीने रामको सिर नवाया, और उनका प्रताप समझते ही उनके हृदयमें अपार प्रेम छा गया।

मन महुँ करइ बिचार बिधाता। माया बस कबि कोबिद ग्याता॥हरि माया कर अमिति प्रभावा। बिपुल बार जेहिं मोहि नचावा॥

ब्रह्माजी मन-ही-मन विचारने लगे—कवि, विद्वान, ज्ञानी सभी मायाके वशमें हैं; हरिकी मायाका प्रभाव असीम है, जिसने मुझे भी अनगिनत बार नचाया है।

अग जगमय जग मम उपराजा। नहिं आचरज मोह खगराजा॥तब बोले बिधि गिरा सुहाई। जान महेस राम प्रभुताई॥

यह सारा चराचर जगत तो मेरा ही रचा है, फिर भी मैं मायावश नाचता हूँ—तो पक्षिराजको मोह होना कोई अचरज नहीं। फिर ब्रह्माजी सुंदर वाणीमें बोले—रामकी महिमा तो महादेव ही जानते हैं।

बैनतेय संकर पहिं जाहू। तात अनत पूछहु जनि काहू॥तहँ होइहि तव संसय हानी। चलेउ बिहंग सुनत बिधि बानी॥

हे गरुड़, तुम शंकरजीके पास जाओ, और तात, बीचमें और किसीसे मत पूछना; वहीं तुम्हारा संदेह मिटेगा। ब्रह्माजीकी यह वाणी सुनते ही गरुड़ चल पड़े।

दोहा

परमातुर बिहंगपति आयउ तब मो पास।जात रहेउँ कुबेर गृह रहिहु उमा कैलास६०

तब बड़ी आतुरतासे पक्षिराज गरुड़ मेरे पास आये; हे उमा, उस समय मैं कुबेरके घर जा रहा था और तुम कैलासपर थीं।

तेहिं मम पद सादर सिरु नावा। पुनि आपन संदेह सुनावा॥सुनि ता करि बिनती मृदु बानी। प्रेम सहित मैं कहेउँ भवानी॥

उन्होंने आदरसे मेरे चरणोंमें सिर नवाकर अपना संदेह सुनाया; हे भवानी, उनकी विनम्र, कोमल वाणी सुनकर मैंने प्रेमसहित उनसे कहा—

मिलेहु गरुड़ मारग महँ मोही। कवन भाँति समुझावौं तोही॥तबहिं होइ सब संसय भंगा। जब बहु काल करिअ सतसंगा॥

गरुड़, तुम मुझे राहमें मिले हो, इतनेमें तुम्हें कैसे समझाऊँ? हर संदेह तभी मिटता है जब दीर्घकाल तक सत्संग किया जाय।

सुनिअ तहाँ हरि कथा सुहाई। नाना भाँति मुनिन्ह जो गाई॥जेहि महुँ आदि मध्य अवसाना। प्रभु प्रतिपाद्य राम भगवाना॥

वहाँ जाकर सुंदर हरिकथा सुनो, जिसे मुनियोंने अनेक प्रकारसे गाया है और जिसके आदि, मध्य और अंतमें भगवान राम ही प्रतिपाद्य हैं।

नित हरि कथा होत जहँ भाई। पठवउँ तहाँ सुनहु तुम्ह जाई॥जाइहि सुनत सकल संदेहा। राम चरन होइहि अति नेहा॥

भाई, जहाँ नित्य हरिकथा होती है, वहीं मैं तुम्हें भेजता हूँ, जाकर सुनो; सुनते ही तुम्हारा सारा संदेह मिट जायगा और रामचरणोंमें गहरा प्रेम जागेगा।

दोहा

बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग।मोह गए बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग६१

सत्संगके बिना हरिकथा नहीं मिलती, कथाके बिना मोह नहीं भागता, और मोह गये बिना रामचरणोंमें दृढ़ प्रेम नहीं जगता।

मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा। किएँ जोग तप ग्यान बिरागा॥उत्तर दिसि सुंदर गिरि नीला। तहँ रह काकभुसुंडि सुसीला॥

प्रेमके बिना केवल योग, तप, ज्ञान-वैराग्यसे रघुनाथ नहीं मिलते। उत्तर दिशामें एक सुंदर नीला पर्वत है, वहाँ परम सुशील काकभुशुण्डि रहते हैं।

राम भगति पथ परम प्रबीना। ग्यानी गुन गृह बहु कालीना॥राम कथा सो कहइ निरंतर। सादर सुनहिं बिबिध बिहंगबर॥

वे रामभक्तिके मार्गमें अत्यंत निपुण, ज्ञानी, गुणोंके धाम और चिरायु हैं; वे निरंतर रामकथा कहते रहते हैं, जिसे अनेक श्रेष्ठ पक्षी आदरपूर्वक सुनते हैं।

जाइ सुनहु तहँ हरि गुन भूरी। होइहि मोह जनित दुख दूरी॥मैं जब तेहि सब कहा बुझाई। चलेउ हरषि मम पद सिरु नाई॥

वहाँ जाकर हरिके अनगिनत गुण सुनो, मोहसे उपजा तुम्हारा दुःख दूर हो जायगा। जब मैंने उसे यह सब समझाकर कहा, तब वह मेरे चरणोंमें सिर नवाकर हर्षित होकर चल पड़ा।

ताते उमा न मैं समुझावा। रघुपति कृपाँ मरमु मैं पावा॥होइहि कीन्ह कबहुँ अभिमाना। सो खौवै चह कृपानिधाना॥

हे उमा, मैंने उसे स्वयं इसलिये नहीं समझाया कि रघुनाथकी कृपासे मैं पहले ही उसका मर्म जान गया था। उसने शायद कभी कुछ अभिमान किया होगा, जिसे कृपानिधान मिटाना चाहते थे।

कछु तेहि ते पुनि मैं नहिं राखा। समुझइ खग खगही कै भाषा॥प्रभु माया बलवंत भवानी। जाहि न मोह कवन अस ग्यानी॥

और कुछ इस कारण भी मैंने उसे अपने पास नहीं रखा कि पक्षी पक्षीकी ही भाषा समझते हैं। हे भवानी, प्रभुकी माया इतनी बलवती है कि ऐसा कौन ज्ञानी है जिसे वह मोहित न कर दे?

दोहा

ग्यानी भगत सिरोमनि त्रिभुवनपति कर जान।ताहि मोह माया नर पावर करहिं गुमान६२(क)

ज्ञानियों और भक्तोंके शिरोमणि, त्रिभुवनपतिके वाहन गरुड़को भी माया मोहित कर गयी—फिर भी नीच मनुष्य मूर्खतावश घमंड करते ही रहते हैं।

दोहा

सिव बिरंचि कहुँ मोहइ को है बपुरा आन।अस जियँ जानि भजहिं मुनि माया पति भगवान६२(ख)

यह माया शिव और ब्रह्माको भी मोहित कर लेती है, तो बेचारा और कौन है? यह जानकर ही मुनिजन उस मायाके स्वामी भगवानको भजते हैं।

गयउ गरुड़ जहँ बसइ भुसुंडा। मति अकुंठ हरि भगति अखंडा॥देखि सैल प्रसन्न मन भयऊ। माया मोह सोच सब गयऊ॥

गरुड़ वहाँ पहुँचे जहाँ अखंड बुद्धि और अटूट हरिभक्तिवाले काकभुशुण्डि रहते थे; उस पर्वतको देखते ही उनका मन प्रसन्न हो गया और सारी माया, मोह, चिंता जाती रही।

करि तड़ाग मज्जन जलपाना। बट तर गयउ हृदयँ हरषाना॥बृद्ध बृद्ध बिहंग तहँ आए। सुने राम के चरित सुहाए॥

सरोवरमें स्नान और जलपान कर वे प्रसन्न हृदयसे बरगदके नीचे गये; वहाँ पहले से ही अनेक वयोवृद्ध पक्षी रामके सुंदर चरित्र सुननेको एकत्र थे।

कथा अरंभ करै सोइ चाहा। तेही समय गयउ खगनाहा॥आवत देखि सकल खगराजा। हरषेउ बायस सहित समाजा॥

भुशुण्डि कथा आरंभ ही करना चाहते थे कि उसी क्षण पक्षिराज गरुड़ वहाँ आ पहुँचे; उन्हें आते देख काकभुशुण्डिसहित सारा पक्षिसमाज हर्षसे भर उठा।

अति आदर खगपति कर कीन्हा। स्वागत पूछि सुआसन दीन्हा॥करि पूजा समेत अनुरागा। मधुर बचन तब बोलेउ कागा॥

उन्होंने गरुड़का भरपूर आदर किया, कुशल पूछी और बैठनेको सुंदर आसन दिया; फिर प्रेमपूर्वक पूजा करके मधुर वाणीमें बोले—

दोहा

नाथ कृतारथ भयउँ मैं तव दरसन खगराज।आयसु देहु सो करौं अब प्रभु आयहु केहि काज६३(क)

हे नाथ, हे पक्षिराज, आपके दर्शनसे मैं कृतार्थ हो गया; अब आज्ञा दीजिये, मैं वही करूँ। प्रभु, आप किस कार्यसे यहाँ पधारे हैं?

दोहा

सदा कृतारथ रूप तुम्ह कह मृदु बचन खगेस।जेहि के अस्तुति सादर निज मुख कीन्हि महेस६३(ख)

गरुड़ने कोमल वाणीमें कहा—आप तो सदा ही कृतार्थ हैं, जिनकी बड़ाई स्वयं महादेवने अपने मुखसे आदरपूर्वक की है।

सुनहु तात जेहि कारन आयउँ। सो सब भयउ दरस तव पायउँ॥देखि परम पावन तव आश्रम। गयउ मोह संसय नाना भ्रम॥

सुनिये तात, जिस कारण मैं आया था, वह तो आपके दर्शन पाते ही पूरा हो गया; आपका यह परम पावन आश्रम देखते ही मेरा मोह, संदेह और हर तरहका भ्रम मिट गया।

अब श्रीराम कथा अति पावनि। सदा सुखद दुख पुंज नसावनि॥सादर तात सुनावहु मोही। बार बार बिनवउँ प्रभु तोही॥

अब हे तात, कृपया आदरसहित मुझे रामकी वह अत्यंत पावन, सदा सुखदायी और दुःखराशिको मिटानेवाली कथा सुनाइये—मैं बार-बार यही विनती करता हूँ।

सुनत गरुड़ के गिरा बिनीता। सरल सुप्रेम सुखद सुपुनीता॥भयउ तासु मन परम उछाहा। लाग कहै रघुपति गुन गाहा॥

गरुड़की विनम्र, सरल, प्रेमसे भरी, सुखद और पवित्र वाणी सुनकर भुशुण्डिके मनमें अपार उत्साह जागा और वे रघुनाथके गुणोंकी कथा कहने लगे।

प्रथमहिं अति अनुराग भवानी। रामचरित सर कहेसि बखानी॥पुनि नारद कर मोह अपारा। कहेसि बहुरि रावन अवतारा॥

हे भवानी, पहले उन्होंने बड़े प्रेमसे रामचरितमानस सरोवरका रूपक विस्तारसे कहा, फिर नारदके अपार मोहकी और फिर रावणके जन्मकी कथा कही।

प्रभु अवतार कथा पुनि गाई। तब सिसु चरित कहेसि मन लाई॥

फिर प्रभुके अवतारकी कथा गायी, और तब मन लगाकर रामकी बाल-लीलाएँ सुनायीं।

दोहा

बालचरित कहिं बिबिध बिधि मन महँ परम उछाह।रिषि आगवन कहेसि पुनि श्री रघुबीर बिबाह६४

मनमें उत्साह भरकर विविध बाल-लीलाएँ कहने के बाद उन्होंने विश्वामित्रके आगमन और रघुवीरके विवाहका वर्णन किया।

बहुरि राम अभिषेक प्रसंगा। पुनि नृप बचन राज रस भंगा॥पुरबासिन्ह कर बिरह बिषादा। कहेसि राम लछिमन संबादा॥

फिर रामके राज्याभिषेकका प्रसंग, राजाके वचनसे उस उत्सवमें बाधा, नगरवासियोंका विरह-विषाद, और राम-लक्ष्मणका संवाद कहा।

बिपिन गवन केवट अनुरागा। सुरसरि उतरि निवास प्रयागा॥बालमीक प्रभु मिलन बखाना। चित्रकूट जिमि बसे भगवाना॥

वनगमन, केवटका प्रेम, गंगा पार कर प्रयागमें निवास, वाल्मीकिसे मिलन, और जैसे भगवान चित्रकूटमें बसे, वह सब सुनाया।

सचिवागवन नगर नृप मरना। भरतागवन प्रेम बहु बरना॥करि नृप क्रिया संग पुरबासी। भरत गए जहँ प्रभु सुख रासी॥

फिर सुमंत्रका नगर लौटना, राजाका देहांत, भरतका आगमन और उनके गहरे प्रेमका विस्तृत वर्णन किया; राजाकी अंत्येष्टि कर नगरवासियोंसहित भरत वहाँ गये जहाँ सुखराशि प्रभु थे।

पुनि रघुपति बहु बिधि समुझाए। लै पादुका अवधपुर आए॥भरत रहनि सुरपति सुत करनी। प्रभु अरु अत्रि भेंट पुनि बरनी॥

फिर रघुनाथने उन्हें बहुत समझाया, जिससे वे खड़ाऊँ लेकर अयोध्या लौट आये—यह कहा; फिर भरतकी नंदिग्राम-वासकी रीति, इंद्रपुत्र जयंतकी नीचता, और प्रभु-अत्रि मिलन वर्णित किया।

दोहा

कहि बिराध बध जेहि बिधि देह तजी सरभंग।बरनि सुतीछन प्रीति पुनि प्रभु अगस्ति सतसंग६५

विराधका वध और शरभंगका देहत्याग कहकर, फिर सुतीक्ष्णके प्रेमका वर्णन कर, प्रभु और अगस्त्यके सत्संगकी कथा कही।

कहि दंडक बन पावनताई। गीध मइत्री पुनि तेहिं गाई॥पुनि प्रभु पंचवटीं कृत बासा। भंजी सकल मुनिन्ह की त्रासा॥

दंडकवनके पवित्र होनेकी कथा कहकर फिर गिद्ध जटायुसे मैत्रीका वर्णन किया; फिर प्रभुने पंचवटीमें कैसे निवास किया और सब मुनियोंका भय कैसे दूर किया, वह कहा।

पुनि लछिमन उपदेस अनूपा। सूपनखा जिमि कीन्हि कुरूपा॥खर दूषन बध बहुरि बखाना। जिमि सब मरमु दसानन जाना॥

फिर लक्ष्मणको दिया अनुपम उपदेश और शूर्पणखाका कुरूप होना वर्णित किया; फिर खर-दूषणका वध और रावणने सब कैसे जाना, वह बखाना।

दसकंधर मारीच बतकहीं। जेहि बिधि भई सो सब तेहिं कही॥पुनि माया सीता कर हरना। श्रीरघुबीर बिरह कछु बरना॥

रावण और मारीचकी बातचीत जैसी हुई, वैसी ही कही; फिर मायासीताका हरण और रघुवीरके विरहका कुछ वर्णन किया।

पुनि प्रभु गीध क्रिया जिमि कीन्ही। बधि कबंध सबरिहि गति दीन्ही॥बहुरि बिरह बरनत रघुबीरा। जेहि बिधि गए सरोबर तीरा॥

फिर प्रभुने जटायुका अंतिम संस्कार कैसे किया, कबंधका वध कर शबरीको कैसी गति दी, और विरहमें रघुवीर जैसे पंपासरोवरके तट गये, वह सब कहा।

दोहा

प्रभु नारद संबाद कहि मारुति मिलन प्रसंग।पुनि सुग्रीव मिताई बालि प्रान कर भंग।। 66(६६(क)

प्रभु और नारदका संवाद और हनुमानसे भेंटका प्रसंग कहकर फिर सुग्रीवसे मित्रता और बालिके प्राणांतका वर्णन किया।

दोहा

कपिहि तिलक करि प्रभु कृत सैल प्रबरषन बास।बरनन बर्षा सरद अरु राम रोष कपि त्रास६६(ख)

सुग्रीवका राजतिलक कर प्रभुका प्रवर्षण पर्वतपर निवास, वर्षा-शरदका वर्णन, रामका सुग्रीवपर रोष और सुग्रीवका भय—ये सब प्रसंग कहे।

जेहि बिधि कपिपति कीस पठाए। सीता खोज सकल दिसि धाए॥बिबर प्रबेस कीन्ह जेहि भाँती। कपिन्ह बहोरि मिला संपाती॥

सुग्रीवने जैसे वानरोंको भेजा और वे सीताकी खोजमें सब दिशाओंमें दौड़े, जैसे उन्होंने गुफामें प्रवेश किया और फिर संपाती मिला, वह कथा कही।

सुनि सब कथा समीरकुमारा। नाघत भयउ पयोधि अपारा॥लंकाँ कपि प्रबेस जिमि कीन्हा। पुनि सीतहि धीरजु जिमि दीन्हा॥

संपातीसे सब सुनकर हनुमान जैसे अपार समुद्र लाँघ गये, फिर जैसे लंकामें प्रवेश किया और सीताको धीरज दिया, वह सब कहा।

बन उजारि रावनहि प्रबोधी। पुर दहि नाघेउ बहुरि पयोधी॥आए कपि सब जहँ रघुराई। बैदेही कि कुसल सुनाई॥

अशोकवन उजाड़कर, रावणको समझाकर, लंका जलाकर फिर जैसे समुद्र लाँघा और सब वानर रघुनाथके पास पहुँचकर जानकीकी कुशल सुनायी, वह सब वर्णित किया।

सेन समेति जथा रघुबीरा। उतरे जाइ बारिनिधि तीरा॥मिला बिभीषन जेहि बिधि आई। सागर निग्रह कथा सुनाई॥

फिर सेनासहित रघुवीर समुद्रतटपर जा उतरे, विभीषण आकर मिले, और समुद्रको बाँधनेकी कथा भी सुनायी।

दोहा

सेतु बाँधि कपि सेन जिमि उतरी सागर पार।गयउ बसीठी बीरबर जेहि बिधि बालिकुमार६७(क)

पुल बाँधकर जैसे वानरसेना समुद्र पार गयी और वीरश्रेष्ठ बालिपुत्र अंगद जैसे दूत बनकर गये, वह सब कहा।

दोहा

निसिचर कीस लराई बरनिसि बिबिध प्रकार।कुंभकरन घननाद कर बल पौरुष संघार६७(ख)

फिर राक्षस-वानर युद्धका अनेक प्रकारसे वर्णन किया, और कुंभकर्ण-मेघनादके बल, पराक्रम और संहारकी कथा सुनायी।

निसिचर निकर मरन बिधि नाना। रघुपति रावन समर बखाना॥रावन बध मंदोदरि सोका। राज बिभीषन देव असोका॥

उन्होंने राक्षससमूहके नाना प्रकारके वधका और रघुनाथ-रावणके युद्धका वर्णन किया; फिर रावणवध, मंदोदरीका शोक, विभीषणका राज्याभिषेक और देवताओंका शोकमुक्त होना कहा,

सीता रघुपति मिलन बहोरी। सुरन्ह कीन्ह अस्तुति कर जोरी॥पुनि पुष्पक चढ़ि कपिन्ह समेता। अवध चले प्रभु कृपा निकेता॥

फिर सीता-रघुनाथका मिलन, देवताओंकी हाथ जोड़कर स्तुति, और फिर जैसे वानरोंसहित पुष्पकविमानपर चढ़कर कृपाधाम प्रभु अवधकी ओर चले, वह सुनाया।

जेहि बिधि राम नगर निज आए। बायस बिसद चरित सब गाए॥कहेसि बहोरि राम अभिषैका। पुर बरनत नृपनीति अनेका॥

राम जिस तरह अपने नगर आये, वे सब उज्ज्वल चरित्र भुशुण्डिने विस्तारसे गाये; फिर रामके राज्याभिषेककी और अयोध्याकी तथा अनेक राजनीतियोंकी कथा कही।

कथा समस्त भुसुंड बखानी। जो मैं तुम्ह सन कही भवानी॥सुनि सब राम कथा खगनाहा। कहत बचन मन परम उछाहा॥

भुशुण्डिने वही सारी कथा कही जो, हे भवानी, मैंने तुम्हें सुनायी है। सारी रामकथा सुनकर पक्षिराज गरुड़का मन परम उत्साहसे भर गया और वे बोल उठे—

सोरठा

गयउ मोर संदेह सुनेउँ सकल रघुपति चरित।भयउ राम पद नेह तव प्रसाद बायस तिलक६८(क)

रघुनाथके सारे चरित्र सुनकर मेरा संदेह जाता रहा; हे काकशिरोमणि, आपकी कृपासे मुझे रामचरणोंमें प्रेम हो गया।

सोरठा

मोहि भयउ अति मोह प्रभु बंधन रन महुँ निरखि।चिदानंद संदोह राम बिकल कारन कवन६८(ख)

युद्धमें प्रभुका नागपाशसे बंधन देखकर मुझे बड़ा मोह हुआ था—सच्चिदानंदघन राम आखिर किस कारण व्याकुल हुए?

देखि चरित अति नर अनुसारी। भयउ हृदयँ मम संसय भारी॥सोइ भ्रम अब हित करि मैं माना। कीन्ह अनुग्रह कृपानिधाना॥

बिलकुल मनुष्योंके-जैसा चरित्र देखकर मेरे हृदयमें भारी संदेह उठा था; अब मैं उस भ्रमको ही अपने हितकारी मानता हूँ—कृपानिधानने मुझपर यह बड़ा अनुग्रह किया।

जो अति आतप ब्याकुल होई। तरु छाया सुख जानइ सोई॥जौं नहिं होत मोह अति मोही। मिलतेउँ तात कवन बिधि तोही॥

जो तेज धूपसे व्याकुल होता है, वही वृक्षकी छायाका सुख जानता है; तात, यदि मुझे इतना गहरा मोह न होता, तो मैं आपसे कैसे मिल पाता?

सुनतेउँ किमि हरि कथा सुहाई। अति बिचित्र बहु बिधि तुम्ह गाई॥निगमागम पुरान मत एहा। कहहिं सिद्ध मुनि नहिं संदेहा॥

और कैसे सुनता यह अद्भुत, सुंदर हरिकथा जो आपने इतने रूपोंमें गायी? यही वेद-शास्त्र-पुराणोंका मत है, सिद्ध और मुनि भी यही कहते हैं, इसमें संदेह नहीं—

संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही। चितवहिं राम कृपा करि जेही॥राम कृपाँ तव दरसन भयऊ। तव प्रसाद सब संसय गयऊ॥

—कि शुद्ध संत उसीको मिलते हैं जिसपर राम कृपाकर दृष्टि डालें। रामकी कृपासे मुझे आपके दर्शन हुए, और आपकी कृपासे मेरा सारा संदेह मिट गया।

दोहा

सुनि बिहंगपति बानी सहित बिनय अनुराग।पुलक गात लोचन सजल मन हरषेउ अति काग६९(क)

पक्षिराज गरुड़की विनम्र, प्रेमभरी वाणी सुनकर काकभुशुण्डिका शरीर पुलकित हो उठा, नेत्रोंमें जल भर आया और मन अत्यंत हर्षसे भर गया।

दोहा

श्रोता सुमति सुसील सुचि कथा रसिक हरि दास।पाइ उमा अति गोप्यमपि सज्जन करहिं प्रकास६९(ख)

हे उमा, सुंदर बुद्धि, सुशील स्वभाव, पवित्रता, कथाप्रेम और हरिभक्तिवाला श्रोता पाकर सज्जन अपने सबसे गुप्त रहस्य भी खोलकर रख देते हैं।

बोलेउ काकभसुंड बहोरी। नभग नाथ पर प्रीति न थोरी॥सब बिधि नाथ पूज्य तुम्ह मेरे। कृपापात्र रघुनायक केरे॥

काकभुशुण्डिने फिर कहा—पक्षिराजपर उनका प्रेम कम न था—हे नाथ, आप सब तरहसे मेरे पूज्य हैं और रघुनाथकी कृपाके पात्र हैं।

तुम्हहि न संसय मोह न माया। मो पर नाथ कीन्ह तुम्ह दाया॥पठइ मोह मिस खगपति तोही। रघुपति दीन्हि बड़ाई मोही॥

आपको न संदेह है, न मोह, न माया—नाथ, आपने तो मुझपर केवल दया की है। हे पक्षिराज, मोहका बहाना बनाकर रघुनाथने आपको यहाँ भेजकर मुझे ही बड़ाई दी है।

तुम्ह निज मोह कही खग साईं। सो नहिं कछु आचरज गोसाईं॥नारद भव बिरंचि सनकादी। जे मुनिनायक आतमबादी॥

आपने अपना मोह बताया, यह कुछ आश्चर्यकी बात नहीं, हे स्वामी—क्योंकि नारद, शिव, ब्रह्मा और सनकादि जैसे आत्मज्ञानके मर्मज्ञ श्रेष्ठ मुनि भी—

मोह न अंध कीन्ह केहि केही। को जग काम नचाव न जेही॥तृस्नाँ केहि न कीन्ह बौराहा। केहि कर हृदय क्रोध नहिं दाहा॥

—उनमें भी किसे मोहने अंधा नहीं किया? संसारमें ऐसा कौन है जिसे कामने न नचाया हो? तृष्णाने किसे पागल नहीं बनाया? क्रोधने किसका हृदय नहीं जलाया?

दोहा

ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद गुन आगार।केहि कै लौभ बिडंबना कीन्हि न एहिं संसार७०(क)

इस संसारमें ऐसा कौन ज्ञानी, तपस्वी, शूरवीर, कवि, विद्वान या गुणवान है, जिसे लोभने कभी बदनाम न किया हो?

दोहा

श्री मद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि।मृगलोचनि के नैन सर को अस लाग न जाहि७०(ख)

धनके मदने किसे टेढ़ा नहीं किया, सत्ताने किसे बहरा नहीं किया? ऐसा कौन है जिसे किसी सुंदरीके नेत्र-बाण कभी न लगे हों?

गुन कृत सन्यपात नहिं केही। कोउ न मान मद तजेउ निबेही॥जोबन ज्वर केहि नहिं बलकावा। ममता केहि कर जस न नसावा॥

गुणोंके सन्निपातसे कौन बचा है? मान-मदने किसे नहीं छुआ? यौवनके ज्वरने किसे बेकाबू नहीं किया? ममताने किसका यश नष्ट नहीं किया?

मच्छर काहि कलंक न लावा। काहि न सोक समीर डोलावा॥चिंता साँपिनि को नहिं खाया। को जग जाहि न ब्यापी माया॥

ईर्ष्याने किसपर दाग नहीं लगाया? शोककी आँधीने किसे नहीं हिलाया? चिंतारूपी सर्पिणीने किसे नहीं डँसा? संसारमें ऐसा कौन है जिसे माया न घेरे हो?

कीट मनोरथ दारु सरीरा। जेहि न लाग घुन को अस धीरा॥सुत बित लोक ईषना तीनी। केहि के मति इन्ह कृत न मलीनी॥

मनोरथ कीड़ा है और शरीर लकड़ी—ऐसा कौन धैर्यवान है जिसे यह कीड़ा न लगा हो? पुत्र, धन और यशकी तीन प्रबल इच्छाओंने किसकी बुद्धिको मलिन नहीं किया?

यह सब माया कर परिवारा। प्रबल अमिति को बरनै पारा॥सिव चतुरानन जाहि डेराहीं। अपर जीव केहि लेखे माहीं॥

यह सब मायाका ही विशाल, बलवान परिवार है, जिसका पूरा वर्णन कोई नहीं कर सकता; शिव और ब्रह्मा तक जिससे डरते हैं, तो साधारण जीवोंकी क्या गिनती?

दोहा

ब्यापि रहेउ संसार महुँ माया कटक प्रचंड।सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाषंड७१(क)

मायाकी प्रचंड सेना पूरे संसारमें फैली है—काम-क्रोध-लोभ उसके सेनापति हैं, और दंभ, कपट, पाखंड उसके योद्धा।

दोहा

सो दासी रघुबीर के समुझें मिथ्या सोपि।छूट न राम कृपा बिनु नाथ कहउँ पद रोपि७१(ख)

पर वह माया रघुवीरकी दासी है—समझ लेनेपर मिथ्या ही है, फिर भी रामकी कृपा बिना कभी नहीं छूटती। नाथ, यह मैं प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ।

जो माया सब जगहि नचावा। जासु चरित लखि काहुँ न पावा॥सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा। नाच नटी इव सहित समाजा॥

जो माया सारे संसारको नचाती है और जिसकी करनी कोई पकड़ नहीं पाया, हे गरुड़, वही माया प्रभुकी भौंहके इशारेपर अपने पूरे परिवारसहित नर्तकीकी तरह नाचती है।

सोइ सच्चिदानंद घन रामा। अज बिग्यान रूप बल धामा॥ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता। अखिल अमोघसक्ति भगवंता॥

वे राम स्वयं वही सच्चिदानंदघन हैं—अजन्मा, विज्ञानस्वरूप, रूप-बलके धाम, सर्वव्यापी और सर्वरूप, अखंड, अनंत, संपूर्ण, अमोघशक्ति भगवान।

अगुन अदभ्र गिरा गोतीता। सबदरसी अनवद्य अजीता॥निर्मम निराकार निरमोहा। नित्य निरंजन सुख संदोहा॥

निर्गुण, महान, वाणी-इंद्रियोंसे परे, सर्वद्रष्टा, निर्दोष, अजेय, ममतारहित, निराकार, मोहरहित,

प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी। ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी॥इहाँ मोह कर कारन नाहीं। रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं॥

नित्य, मायातीत, सुखराशि, प्रकृतिसे परे, सबके हृदयमें बसनेवाले, इच्छारहित, अविकारी, अविनाशी ब्रह्म हैं। यहाँ मोहका कोई कारण ही नहीं—क्या अंधकार कभी सूर्यके सामने टिक सकता है?

दोहा

भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप।किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप७२(क)

भक्तोंके लिये भगवान रामने राजाका शरीर धारण किया और साधारण मनुष्योंकी तरह अनेकों परम पावन चरित्र किये।

दोहा

जथा अनेक बेष धरि नृत्य करइ नट कोइ।सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ७२(ख)

जैसे कोई नट अनेक वेष धरकर नाचता है और हर वेषके अनुरूप भाव दिखाता है, पर स्वयं उनमेंसे कोई बनता नहीं,

असि रघुपति लीला उरगारी। दनुज बिमोहनि जन सुखकारी॥जे मति मलिन बिषयबस कामी। प्रभु पर मोह धरहिं इमि स्वामी॥

—वैसी ही है रघुनाथकी यह लीला, हे गरुड़, जो राक्षसोंको मोहित करती और भक्तोंको सुख देती है। जो मलिनबुद्धि, विषयासक्त और कामी हैं, वे ही प्रभुपर ऐसा मोहका आरोप लगाते हैं।

नयन दोष जा कहँ जब होई। पीत बरन ससि कहुँ कह सोई॥जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा। सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा॥

जिसे आँखका दोष हो, वह चंद्रमाको भी पीला कहता है; हे गरुड़, जिसे दिशाभ्रम हो, वह कहता है सूर्य पश्चिममें उगा।

नौकारूढ़ चलत जग देखा। अचल मोह बस आपुहि लेखा॥बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादीं। कहहिं परस्पर मिथ्याबादी॥

नावपर चढ़ा मनुष्य संसारको चलता देखता है और मोहवश स्वयंको स्थिर मान बैठता है; बच्चे घूमते हैं, घर नहीं घूमता, पर वे आपसमें एक-दूसरेको झूठा कहते हैं।

हरि बिषइक अस मोह बिहंगा। सपनेहुँ नहिं अग्यान प्रसंगा॥मायाबस मतिमंद अभागी। हृदयँ जमनिका बहुबिधि लागी॥

हरिके विषयमें मोहकी कल्पना भी ऐसी ही है, हे गरुड़—भगवानमें स्वप्रमें भी अज्ञानका कोई प्रसंग नहीं। पर जो मायाके वश, मंदबुद्धि और अभागे हैं, जिनके हृदयपर अनेक परदे पड़े हैं,

ते सठ हठ बस संसय करहीं। निज अग्यान राम पर धरहीं॥

वे मूर्ख हठवश संदेह करते हैं और अपना ही अज्ञान रामपर मढ़ देते हैं।

दोहा

काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूप।ते किमि जानहिं रघुपतिहि मूढ़ परे तम कूप७३(क)

जो काम-क्रोध-मद-लोभमें डूबे और दुःखरूपी घरमें आसक्त हैं, वे रघुनाथको कैसे जानें—वे मूर्ख तो अंधकाररूपी कुएँमें पड़े हैं।

दोहा

निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ।सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ७३(ख)

निर्गुण रूप तो सहज ही समझमें आ जाता है, पर सगुण रूपको कोई नहीं जान पाता; इसीलिये सगुण भगवानके सुगम-अगम चरित्र सुनकर मुनियोंका भी मन भ्रमित हो जाता है।

सुनु खगेस रघुपति प्रभुताई। कहउँ जथामति कथा सुहाई॥जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही। सोउ सब कथा सुनावउँ तोही॥

हे गरुड़, अब रघुनाथकी प्रभुता सुनिये, मैंने यह सुंदर कथा अपनी बुद्धिभर कही; अब मुझे जिस तरह मोह हुआ, वह सब कथा भी आपको सुनाता हूँ।

राम कृपा भाजन तुम्ह ताता। हरि गुन प्रीति मोहि सुखदाता॥ताते नहिं कछु तुम्हहिं दुरावउँ। परम रहस्य मनोहर गावउँ॥

तात, आप रामके कृपापात्र हैं, हरिके गुणोंमें आपकी प्रीति है, इसीसे आप मुझे सुख देते हैं; इसीलिये मैं आपसे कुछ नहीं छिपाता, अत्यंत गोपनीय बात भी गाकर सुनाता हूँ।

सुनहु राम कर सहज सुभाऊ। जन अभिमान न राखहिं काऊ॥संसृत मूल सूलप्रद नाना। सकल सोक दायक अभिमाना॥

सुनिये रामका सहज स्वभाव—वे भक्तमें कभी अभिमान नहीं टिकने देते, क्योंकि अभिमान ही संसार-बंधनका मूल है और हर तरहके दुःख-शोकको जन्म देता है।

ताते करहिं कृपानिधि दूरी। सेवक पर ममता अति भूरी॥जिमि सिसु तन ब्रन होइ गोसाई। मातु चिराव कठिन की नाईं॥

इसीलिये कृपानिधि उसे दूर कर देते हैं, क्योंकि सेवकपर उनकी ममता अपार है। हे गोसाईं, जैसे बच्चेके शरीरमें फोड़ा होनेपर माता कठोर हृदय बनकर उसे चिरवा डालती है,

दोहा

जदपि प्रथम दुख पावइ रोवइ बाल अधीर।ब्याधि नास हित जननी गनति न सो सिसु पीर७४(क)

यद्यपि बच्चा पहले दर्दसे रोता-तड़पता है, फिर भी माता रोगके नाशके लिये उस क्षणिक पीड़ाकी परवा नहीं करती।

दोहा

तिमि रघुपति निज दासकर हरहिं मान हित लागि।तुलसिदास ऐसे प्रभुहि कस न भजहु भ्रम त्यागि७४(ख)

उसी तरह रघुनाथ अपने दासका अभिमान उसीके हितके लिये हर लेते हैं। तुलसीदास कहते हैं—ऐसे प्रभुको भ्रम त्यागकर क्यों न भजें?

राम कृपा आपनि जड़ताई। कहउँ खगेस सुनहु मन लाई॥जब जब राम मनुज तनु धरहीं। भक्त हेतु लीला बहु करहीं॥

हे गरुड़, अब रामकी कृपा और अपनी मूर्खताकी बात मन लगाकर सुनिये—जब-जब राम मनुष्यशरीर धरते हैं और भक्तोंके लिये अनेक लीलाएँ करते हैं,

तब तब अवधपुरी मैं जाऊँ। बालचरित बिलोकि हरषाऊँ॥जन्म महोत्सव देखउँ जाई। बरष पाँच तहँ रहउँ लोभाई॥

तब-तब मैं अयोध्या जाता हूँ और उनकी बाल-लीला देखकर हर्षित होता हूँ; जन्मोत्सव देखकर मैं वहाँ लुभाकर पाँच वर्षतक ठहर जाता हूँ।

इष्टदेव मम बालक रामा। सोभा बपुष कोटि सत कामा॥निज प्रभु बदन निहारि निहारी। लोचन सुफल करउँ उरगारी॥

मेरे इष्टदेव वही बालक राम हैं, जिनके शरीरमें अरबों कामदेवोंकी शोभा है; हे गरुड़, अपने प्रभुका मुख बार-बार निहारकर मैं अपने नेत्र सफल करता हूँ।

लघु बायस बपु धरि हरि संगा। देखउँ बालचरित बहुरंगा॥

छोटे कौएका रूप धरकर और हरिके साथ-साथ फिरकर मैं उनकी रंग-बिरंगी बाल-लीलाएँ देखता रहता हूँ।

दोहा

लरिकाईं जहँ जहँ फिरहिं तहँ तहँ संग उड़ाउँ।जूठनि परइ अजिर महँ सो उठाइ करि खाउँ७५(क)

बचपनमें वे जहाँ-जहाँ घूमते हैं, वहाँ-वहाँ मैं भी साथ उड़ता हूँ, और आँगनमें गिरी उनकी जूठन उठाकर खा लेता हूँ।

दोहा

एक बार अतिसय सब चरित किए रघुबीर।सुमिरत प्रभु लीला सोइ पुलकित भयउ सरीर७५(ख)

एक बार रघुवीरने सब लीलाएँ विशेष उमंगसे कीं; उस लीलाका स्मरण करते ही आज भी मेरा शरीर पुलकित हो उठता है।

कहइ भसुंड सुनहु खगनायक। रामचरित सेवक सुखदायक॥नृपमंदिर सुंदर सब भाँती। खचित कनक मनि नाना जाती॥

भुशुण्डि कहने लगे—सुनिये पक्षिराज, रामका चरित्र सेवकोंको सुख देनेवाला है। राजमहल सब तरहसे सुंदर था, सोनेकी दीवारोंमें नाना प्रकारके रत्न जड़े थे।

बरनि न जाइ रुचिर अँगनाई। जहँ खेलहिं नित चारिउ भाई॥बालबिनोद करत रघुराई। बिचरत अजिर जननि सुखदाई॥

उस सुंदर आँगनका वर्णन नहीं हो सकता, जहाँ चारों भाई नित्य खेलते हैं; माताको सुख देते हुए रघुनाथ बाल-विनोद करते हुए वहाँ विचरते हैं।

मरकत मृदुल कलेवर स्यामा। अंग अंग प्रति छबि बहु कामा॥नव राजीव अरुन मृदु चरना। पदज रुचिर नख ससि दुति हरना॥

मरकतमणि-सा कोमल साँवला शरीर है, हर अंगमें अनगिनत कामदेवोंकी छटा; नव-लाल कमलसे कोमल लाल चरण, सुंदर अंगुलियाँ, नख चंद्रमाकी चमकको भी मात देते।

ललित अंक कुलिसादिक चारी। नूपुर चारु मधुर रवकारी॥चारु पुरट मनि रचित बनाई। कटि किंकिन कल मुखर सुहाई॥

तलवोंमें वज्र आदि चार सुंदर चिह्न हैं, चरणोंमें मधुर बजते सुंदर नूपुर हैं; सोने-रत्नोंसे जड़ी कमरबंदकी मधुर झंकार सुहावनी लगती है।

दोहा

रेखा त्रय सुंदर उदर नाभी रुचिर गँभीर।उर आयत भ्राजत बिबिध बाल बिभूषन चीर७६

पेटपर तीन सुंदर रेखाएँ हैं, नाभि सुंदर और गहरी है; चौड़े वक्षपर बालकोचित अनेक आभूषण और वस्त्र शोभा दे रहे हैं।

अरुन पानि नख करज मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर॥कंध बाल केहरि दर ग्रीवा। चारु चिबुक आनन छबि सींवा॥

लाल हथेलियाँ, नख और अंगुलियाँ मन मोह लेती हैं, विशाल भुजाओंपर सुंदर आभूषण हैं; सिंहशावक-से कंधे, शंख-सी ग्रीवा, सुंदर ठुड्डी और मुख तो सौंदर्यकी सीमा ही है।

कलबल बचन अधर अरुनारे। दुइ दुइ दसन बिसद बर बारे॥ललित कपोल मनोहर नासा। सकल सुखद ससि कर सम हासा॥

तोतली बोली, लाल-लाल ओंठ, ऊपर-नीचे दो-दो उजली, सुंदर, नन्ही दंतुलियाँ; सुंदर गाल, मनोहर नासिका और चंद्रकिरणों-सी सुखद मुसकान।

नील कंज लोचन भव मोचन। भ्राजत भाल तिलक गोरोचन॥बिकट भृकुटि सम श्रवन सुहाए। कुंचित कच मेचक छबि छाए॥

नीले कमल-से नेत्र जन्म-मृत्युसे मुक्त करनेवाले हैं, ललाटपर गोरोचनका तिलक शोभित है; टेढ़ी भौंहें, सुडौल कान और घुँघराले काले केश—सब मिलकर अनुपम छटा बिखेरते हैं।

पीत झीनि झगुली तन सोही। किलकनि चितवनि भावति मोही॥रूप रासि नृप अजिर बिहारी। नाचहिं निज प्रतिबिंब निहारी॥

पीली महीन झँगुली शरीरपर सुशोभित है, उनकी किलकारी और चितवन मुझे बहुत प्रिय लगती है; रूपराशि राम राजा दशरथके आँगनमें विचरते हुए अपनी परछाईं देखकर नाचने लगते हैं,

मोहि सन करहीं बिबिध बिधि क्रीड़ा। बरनत मोहि होति अति ब्रीड़ा॥किलकत मोहि धरन जब धावहिं। चलउँ भागि तब पूप देखावहिं॥

और मुझसे तरह-तरहके खेल करते हैं, जिनका वर्णन करते मुझे लाज आती है! किलकारी भरकर जब वे मुझे पकड़नेको दौड़ते और मैं भाग जाता, तो मुझे पूआ दिखाकर लुभाते।

दोहा

आवत निकट हँसहिं प्रभु भाजत रुदन कराहिं।जाउँ समीप गहन पद फिरि फिरि चितइ पराहिं७७(क)

मेरे पास आते ही प्रभु हँसते, भागते ही रोने लगते; और जब मैं उनके चरण छूनेको पास जाता, तो वे बार-बार पीछे मुड़कर देखते हुए भाग जाते।

दोहा

प्राकृत सिसु इव लीला देखि भयउ मोहि मोह।कवन चरित्र करत प्रभु चिदानंद संदोह७७(ख)

साधारण बच्चोंकी-सी यह लीला देखकर मुझे मोह हुआ—सच्चिदानंदघन प्रभु आखिर यह कैसा चरित्र कर रहे हैं?

एतना मन आनत खगराया। रघुपति प्रेरित ब्यापी माया॥सो माया न दुखद मोहि काहीं। आन जीव इव संसृत नाहीं॥

मनमें इतनी शंका आते ही, हे पक्षिराज, रघुनाथकी ही प्रेरित माया मुझपर छा गयी; पर वह माया न मुझे दुःख देनेवाली हुई, न दूसरे जीवोंकी भाँति संसारमें फँसानेवाली।

नाथ इहाँ कछु कारन आना। सुनहु सो सावधान हरिजाना॥ग्यान अखंड एक सीताबर। माया बस्य जीव सचराचर॥

नाथ, इसका कुछ और ही कारण है, हे हरिवाहन, ध्यानसे सुनिये—केवल सीतापति राम ही अखंड ज्ञानस्वरूप हैं, बाकी सभी जड़-चेतन जीव मायाके वशमें हैं।

जौं सब कें रह ग्यान एकरस। ईस्वर जीवहि भेद कहहु कस॥माया बस्य जीव अभिमानी। ईस बस्य माया गुनखानी॥

यदि सबको एकरस ज्ञान बना रहे, तो फिर ईश्वर और जीवमें भेद ही कैसा? अभिमानी जीव मायाके वश है, और तीनों गुणोंकी खान वह माया स्वयं ईश्वरके वशमें है।

परबस जीव स्वबस भगवंता। जीव अनेक एक श्रीकंता॥मुधा भेद जद्यपि कृत माया। बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया॥

जीव परतंत्र है, भगवान स्वतंत्र; जीव अनेक हैं, लक्ष्मीपति एक। यद्यपि मायाकृत यह भेद असत् है, फिर भी हरिभजनके बिना करोड़ों उपायोंसे भी नहीं मिटता।

दोहा

रामचंद्र के भजन बिनु जो चह पद निर्बान।ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिषान७८(क)

रामके भजन बिना जो मोक्षपद चाहता है, वह चाहे कितना ही ज्ञानी क्यों न हो, बिना पूँछ-सींगके पशु ही है।

दोहा

राकापति षोड़स उअहिं तारागन समुदाइ।सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ७८(ख)

सोलहों कलाओंसे पूर्ण चंद्रमा तारागणसहित उदय हो जाय और सारे पर्वतोंमें दावाग्नि लगा दी जाय, तब भी सूर्यके उदय बिना रात्रि नहीं टलती।

ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा। मिटइ न जीवन्ह केर कलेसा॥हरि सेवकहि न ब्याप अबिद्या। प्रभु प्रेरित ब्यापइ तेहि बिद्या॥

उसी तरह, हे पक्षिराज, हरिभजन बिना जीवोंका क्लेश नहीं मिटता। हरिके सेवकको अविद्या नहीं छूती, उसे तो प्रभुकी ही प्रेरित विद्या घेरे रहती है।

ताते नास न होइ दास कर। भेद भगति भाढ़इ बिहंगबर॥भ्रम ते चकित राम मोहि देखा। बिहँसे सो सुनु चरित बिसेषा॥

इसीलिये दासका कभी नाश नहीं होता, हे पक्षिश्रेष्ठ, और भेद-भक्ति बढ़ती ही जाती है। रामने जब मुझे भ्रमसे चकित देखा तो हँस दिये—अब वह विशेष चरित्र सुनिये।

तेहि कौतुक कर मरमु न काहूँ। जाना अनुज न मातु पिताहूँ॥जानु पानि धाए मोहि धरना। स्यामल गात अरुन कर चरना॥

उस खेलका भेद न छोटे भाइयोंने जाना, न माता-पिताने। साँवले शरीरवाले, लाल हथेली-चरणोंवाले बालक राम घुटनों-हाथोंके बल मुझे पकड़ने दौड़े।

तब मैं भागि चलेउँ उरगामी। राम गहन कहँ भुजा पसारी॥जिमि जिमि दूरि उड़ाउँ अकासा। तहँ भुज हरि देखउँ निज पासा॥

तब मैं भाग चला, हे सर्पशत्रु गरुड़; रामने मुझे पकड़नेको भुजा फैलायी। मैं जितना ही आकाशमें दूर उड़ता, उतनी ही हरिकी वह भुजा मुझे अपने पास दिखती।

दोहा

ब्रह्मलोक लगि गयउँ मैं चितयउँ पाछ उड़ात।जुग अंगुल कर बीच सब राम भुजहि मोहि तात७९(क)

मैं ब्रह्मलोकतक जा पहुँचा, और उड़ते-उड़ते पीछे देखा तो, हे तात, रामकी भुजा और मेरे बीच बस दो अंगुल ही अंतर रह गया था।

दोहा

सप्ताबरन भेद करि जहाँ लगें गति मोरि।गयउँ तहाँ प्रभु भुज निरखि ब्याकुल भय बहोरि७९(ख)

सातों आवरणोंको भेदकर जहाँतक मेरी गति थी, वहाँतक गया; पर वहाँ भी प्रभुकी भुजाको अपने पीछे देखकर मैं फिर व्याकुल हो उठा।

मूदेउँ नयन त्रसित जब भयउँ। पुनि चितवत कोसलपुर गयऊँ॥मोहि बिलोकि राम मुसुकाहीं। बिहँसत तुरत गयउँ मुख माहीं॥

डरकर जब मैंने आँखें मूँद लीं, फिर खोलकर देखा तो अवधपुरीमें पहुँच चुका था। मुझे देखकर राम मुसकरा दिये, और हँसते ही मैं सीधा उनके मुखमें चला गया।

उदर माझ सुनु अंडज राया। देखेउँ बहु ब्रह्मांड निकाया॥अति बिचित्र तहँ लोक अनेका। रचना अधिक एक ते एका॥

उनके पेटके भीतर, हे पक्षिराज, मैंने अनगिनत ब्रह्मांडोंके समूह देखे; वहाँ विचित्र-से-विचित्र अनेक लोक थे, हर एककी रचना दूसरेसे भी बढ़कर।

कोटिन्ह _ चतुरानन गौरीसा। अगनित उडगन रबि रजनीसा॥अगनित लोकपाल जम काला। अगनित भूधर भूमि बिसाला॥

करोड़ों ब्रह्मा-शिव, अनगिनत तारे, सूर्य-चंद्र, अनगिनत लोकपाल, यम और काल, अनगिनत विशाल पर्वत और भूमि,

सागर सरि सर बिपिन अपारा। नाना भाँति सृष्टि बिस्तारा॥सुर मुनि सिद्ध नाग नर किंनर। चारि प्रकार जीव सचराचर॥

अपार समुद्र, नदी, तालाब, वन और नाना प्रकारकी सृष्टिका विस्तार; देव, मुनि, सिद्ध, नाग, मनुष्य, किन्नर और चारों तरहके जड़-चेतन जीव—सब मैंने वहाँ देखे।

दोहा

जो नहिं देखा नहिं सुना जो मनहूँ न समाइ।सो सब अद्भुत देखेउँ बरनि कवनि बिधि जाइ८०(क)

जो कभी न देखा, न सुना, न मनमें भी समा सकता था, वह सब अद्भुत मैंने वहाँ देखा—अब उसका वर्णन कैसे हो?

दोहा

एक एक ब्रह्मांड महुँ रहउँ बरष सत एक।एहि बिधि देखत फिरउँ मैं अंड कटाह अनेक८०(ख)

मैं हर एक ब्रह्मांडमें सौ-सौ वर्ष रहता, इस तरह घूमते-घूमते अनगिनत ब्रह्मांड मैंने देख डाले।

लोक लोक प्रति भिन्न बिधाता। भिन्न बिष्नु सिव मनु दिसित्राता॥नर गंधर्ब भूत बेताला। किंनर निसिचर पसु खग ब्याला॥

हर लोकमें अलग ब्रह्मा, अलग विष्णु, शिव, मनु और दिक्पाल थे; अलग मनुष्य, गंधर्व, भूत, वैताल, किन्नर, राक्षस, पशु-पक्षी, सर्प,

देव दनुज गन नाना जाती। सकल जीव तहँ आनहि भाँती॥महि सरि सागर सर गिरि नाना। सब प्रपंच तहँ आनइ आना॥

अलग जाति-जातिके देव-दानव—हर जगह सब जीव भिन्न ही थे; अनेक पृथ्वी, नदी, समुद्र, तालाब, पर्वत—सारी सृष्टि हर जगह अलग-ही-अलग थी।

अंडकोस प्रति प्रति निज रुपा। देखेउँ जिनस अनेक अनूपा॥अवधपुरी प्रति भुवन निनारी। सरजू भिन्न भिन्न नर नारी॥

हर ब्रह्मांडमें मैंने अपना ही रूप और अनेकों अनुपम वस्तुएँ देखीं; हर भुवनमें न्यारी अवधपुरी, न्यारी सरयू और न्यारे ही नर-नारी थे।

दसरथ कौसल्या सुनु ताता। बिबिध रूप भरतादिक भ्राता॥प्रति ब्रह्मांड राम अवतारा। देखउँ बालबिनोद अपारा॥

सुनिये तात, दशरथ, कौसल्या और भरत आदि भाई भी हर जगह अलग-अलग रूपोंके थे; हर ब्रह्मांडमें मैं रामावतार और उनकी अपार बाल-लीलाएँ देखता फिरता था।

दोहा

भिन्न भिन्न मै दीख सबु अति बिचित्र हरिजान।अगनित भुवन फिरेउँ प्रभु राम न देखेउँ आन८१(क)

हे हरिवाहन, मैंने सब कुछ भिन्न और अत्यंत विचित्र देखा; अनगिनत भुवनोंमें घूमकर भी प्रभु रामको मैंने कहीं भिन्न नहीं देखा।

दोहा

सोइ सिसुपन सोइ सोभा सोइ कृपाल रघुबीर।भुवन भुवन देखत फिरउँ प्रेरित मोह समीर८१(ख)

हर जगह वही बालपन, वही शोभा, वही कृपालु रघुवीर! इस तरह मोहरूपी पवनकी प्रेरणासे मैं भुवन-भुवनमें भटकता फिरता रहा।

भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका। बीते मनहुँ कल्प सत एका॥फिरत फिरत निज आश्रम आयउँ। तहँ पुनि रहि कछु काल गवाँयउँ॥

अनेक ब्रह्मांडोंमें भटकते-भटकते मानो सौ कल्प बीत गये; घूमते-घूमते अंततः मैं अपने आश्रम लौटा और वहाँ कुछ समय बिताया।

निज प्रभु जन्म अवध सुनि पायउँ। निर्भर प्रेम हरषि उठि धायउँ॥देखउँ जन्म महोत्सव जाई। जेहि बिधि प्रथम कहा मैं गाई॥

जब मैंने सुना कि मेरे प्रभुका अवधमें जन्म हुआ है, तो प्रेमसे भरकर हर्षित हो दौड़ पड़ा; जाकर जन्मोत्सव देखा, ठीक जैसा पहले वर्णन कर चुका हूँ।

राम उदर देखेउँ जग नाना। देखत बनइ न जाइ बखाना॥तहँ पुनि देखेउँ राम सुजाना। माया पति कृपाल भगवाना॥

रामके उदरमें मैंने फिर वही अनगिनत जगत देखे, जो वर्णनसे परे थे; वहाँ फिर मैंने सुजान, मायाके स्वामी, कृपालु भगवानको देखा।

करउँ बिचार बहोरि बहोरी। मोह कलिल ब्यापित मति मोरी॥उभय घरी महँ मैं सब देखा। भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा॥

मैं बार-बार विचार करने लगा, मेरी बुद्धि मोहके कीचड़में डूबी थी; यह सब मैंने बस दो घड़ीमें देख लिया था, फिर भी मन अत्यंत भ्रमित होकर थक गया।

दोहा

देखि कृपाल बिकल मोहि बिहँसे तब रघुबीर।बिहँसतहीं मुख बाहेर आयउँ सुनु मतिधीर८२(क)

मुझे व्याकुल देखकर कृपालु रघुवीर हँस दिये; हे धीरबुद्धि गरुड़, सुनिये, उनके हँसते ही मैं तुरंत मुखसे बाहर आ गया।

दोहा

सोइ लरिकाई मो सन करन लगे पुनि राम।कोटि भाँति समुझावउँ मनु न लहइ बिश्राम८२(ख)

राम फिर मेरे साथ वही बालसुलभ खेल करने लगे; मैं करोड़ों तरहसे अपने मनको समझाता, पर उसे कहीं शांति नहीं मिलती थी।

देखि चरित यह सो प्रभुताई। समुझत देह दसा बिसराई॥धरनि परेउ मुख आव न बाता। त्राहि त्राहि आरत जन त्राता॥

यह लीला देखकर और वह भीतर देखी हुई प्रभुता याद कर मैं देहकी सुध भूल गया; 'त्राहि त्राहि, हे आर्तजनोंके रक्षक' पुकारता हुआ धरतीपर गिर पड़ा, मुँहसे बोल न फूटता था।

प्रेमाकुल प्रभु मोहि बिलोकी। निज माया प्रभुता तब रोकी॥कर सरोज प्रभु मम सिर धरेऊ। दीनदयाल सकल दुख हरेऊ॥

मुझे प्रेमविह्वल देख प्रभुने अपनी मायाकी शक्तिको रोक लिया; अपना करकमल मेरे सिरपर रखा, और उस दीनदयालुने मेरा सारा दुःख हर लिया।

कीन्ह राम मोहि बिगत बिमोहा। सेवक सुखद कृपा संदोहा॥प्रभुता प्रथम बिचारि बिचारी। मन महँ होइ हरष अति भारी॥

सेवकोंको सुख देनेवाले, कृपासागर रामने मुझे मोहसे पूरी तरह मुक्त कर दिया; उस पहलेवाली प्रभुताको याद कर-करके मेरे मनमें अपार हर्ष हुआ।

भगत बछलता प्रभु के देखी। उपजी मम उर प्रीति बिसेषी॥सजल नयन पुलकित कर जोरी। कीन्हिउँ बहु बिधि बिनय बहोरी॥

प्रभुकी भक्तवत्सलता देखकर मेरे हृदयमें विशेष प्रेम उमड़ आया; नेत्र भरकर, पुलकित होकर, हाथ जोड़कर मैंने फिर बहुत तरहसे विनती की।

दोहा

सुनि सप्रेम मम बानी देखि दीन निज दास।बचन सुखद गंभीर मृदु बोले रमानिवास८३(क)

मेरी प्रेमभरी वाणी सुनकर और अपने दासको दीन देखकर रमानिवास राम सुखद, गंभीर, कोमल वचन बोले—

दोहा

काकभसुंडि मागु बर अति प्रसन्न मोहि जानि।अनिमादिक सिधि अपर रिधि मोच्छ सकल सुख खानि८३(ख)

हे काकभुशुण्डि, मुझे अत्यंत प्रसन्न जानकर वर माँग—अणिमा आदि सिद्धियाँ, अन्य ऋद्धियाँ और सब सुखोंकी खान मोक्ष,

ग्यान बिबेक बिरति बिग्याना। मुनि दुर्लभ गुन जे जग नाना॥आजु देउँ सब संसय नाहीं। मागु जो तोहि भाव मन माहीं॥

ज्ञान, विवेक, वैराग्य, विज्ञान और वे सब गुण जो जगतमें मुनियोंको भी दुर्लभ हैं—यह सब मैं आज तुझे दूँगा, इसमें संदेह मत कर; जो मन भाये सो माँग ले।