सप्तम सोपान — भाग 3
उत्तरकाण्ड
अयोध्या वापसी, राज्याभिषेक एवं रामराज्य की कथा।
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अयोध्या वापसी, राज्याभिषेक एवं रामराज्य की कथा।
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सुनि प्रभु बचन अधिक अनुरागेउँ। मन अनुमान करन तब लागेऊँ॥प्रभु कह देन सकल सुख सही। भगति आपनी देन न कही॥॥२॥
प्रभुके वचन सुनकर मेरा प्रेम और बढ़ गया, पर मन ही मन सोचने लगा—प्रभुने सब सुख देनेकी बात कही सही, पर अपनी भक्ति देनेकी बात तो नहीं कही।
भगति हीन गुन सब सुख ऐसे। लवन बिना बहु बिंजन जैसे॥भजन हीन सुख कवने काजा। अस बिचारि बोलेउ खगराजा॥॥३॥
भक्तिरहित सब गुण और सुख वैसे ही हैं जैसे नमकके बिना अनेक व्यंजन; भजनरहित सुख किस कामका? ऐसा सोचकर मैं, पक्षिराज, बोल उठा—
जौं प्रभु होइ प्रसन्न बर देहू। मो पर करहु कृपा अरु नेहू॥मन भावत बर मागउँ स्वामी। तुम्ह उदार उर अंतरजामी॥॥४॥
यदि प्रभु आप प्रसन्न होकर वर दें और मुझपर कृपा-स्नेह करें, तो हे स्वामी, मैं अपने मनचाहा वर ही माँगता हूँ—आप उदार हैं और हृदयकी हर बात जाननेवाले हैं।
अबिरल भगति बिसुध्द तव श्रुति पुरान जो गाव।जेहि खोजत जोगीस मुनि प्रभु प्रसाद कोउ पाव॥८४(क)॥
आपकी वह अविरल, विशुद्ध भक्ति जिसे वेद-पुराण गाते हैं, जिसे योगीश्वर मुनि खोजते फिरते हैं, और जिसे आपकी कृपासे कोई विरला ही पाता है—
भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपा सिंधु सुख धाम।सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम॥८४(ख)॥
हे भक्तोंके कल्पवृक्ष, शरणागतके हितकारी, कृपासागर, सुखधाम राम! दया करके मुझे अपनी वही भक्ति प्रदान कीजिये।
एवमस्तु कहि रघुकुलनायक। बोले बचन परम सुखदायक॥सुनु बायस तें सहज सयाना। काहे न मागसि अस बरदाना॥॥१॥
'एवमस्तु' कहकर रघुकुलनाथ परम सुखदायी वचन बोले—सुन काक, तू स्वभावसे ही बुद्धिमान है, ऐसा वरदान न माँगे तो भला और क्या माँगे?
सब सुख खानि भगति तैं मागी। नहिं जग कोउ तोहि सम बड़भागी॥जो मुनि कोटि जतन नहिं लहहीं। जे जप जोग अनल तन दहहीं॥॥२॥
तूने सब सुखोंकी खान भक्ति माँग ली, संसारमें तेरे समान भाग्यशाली कोई नहीं। जिस भक्तिको मुनि करोड़ों जप-योगकी अग्निमें शरीर तपाकर भी नहीं पाते,
रीझेउँ देखि तोरि चतुराई। मागेहु भगति मोहि अति भाई॥सुनु बिहंग प्रसाद अब मोरें। सब सुभ गुन बसिहहिं उर तोरें॥॥३॥
वही तूने माँगी—तेरी यह चतुराई देखकर मैं रीझ गया, यह मुझे बहुत भायी। सुन पक्षी, अब मेरी कृपासे सब शुभ गुण तेरे हृदयमें बस जायेंगे।
भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। जोग चरित्र रहस्य बिभागा॥जानब तें सबही कर भेदा। मम प्रसाद नहिं साधन खेदा॥॥४॥
भक्ति, ज्ञान, विज्ञान, वैराग्य, योग, मेरी लीलाओंके रहस्य और भेद—यह सब तू मेरी ही कृपासे जान जायगा, तुझे साधनाका कोई कष्ट नहीं उठाना पड़ेगा।
माया संभव भ्रम सब अब न ब्यापिहहिं तोहि।जानेसु ब्रह्म अनादि अज अगुन गुनाकर मोहि॥८५(क)॥
मायासे उपजे सब भ्रम अब तुझपर नहीं छाएँगे; मुझे अनादि, अजन्मा, निर्गुण और गुणोंकी खान ब्रह्म ही जानना।
मोहि भगत प्रिय संतत अस बिचारि सुनु काग।कायँ बचन मन मम पद करेसु अचल अनुराग॥८५(ख)॥
सुन काक, जान ले कि मुझे भक्त सदा प्रिय होते हैं—यह विचारकर तन, वचन, मनसे मेरे चरणोंमें अटूट प्रेम बनाये रखना।
अब सुनु परम बिमल मम बानी। सत्य सुगम निगमादि बखानी॥निज सिद्धांत सुनावउँ तोही। सुनु मन धरु सब तजि भजु मोही॥॥१॥
अब सुन मेरी परम निर्मल वाणी, जो सत्य और सुगम है, वेदोंने भी जिसका वर्णन किया है; मैं तुझे अपना यह मूल सिद्धांत सुनाता हूँ—सुनकर हृदयमें धारण कर, सब त्यागकर मुझे ही भज।
मम माया संभव संसारा। जीव चराचर बिबिधि प्रकारा॥सब मम प्रिय सब मम उपजाए। सब ते अधिक मनुज मोहि भाए॥॥२॥
यह सारा संसार मेरी मायासे ही उपजा है, इसमें अनेक तरहके चराचर जीव हैं; वे सब मुझे प्रिय हैं क्योंकि सब मेरे ही रचे हैं, पर इन सबमें मनुष्य मुझे सबसे प्रिय लगते हैं।
तिन्ह महँ द्विज द्विज महँ श्रुतिधारी। तिन्ह महुँ निगम धरम अनुसारी॥तिन्ह महँ प्रिय बिरक्त पुनि ग्यानी। ग्यानिहु ते अति प्रिय बिग्यानी॥॥३॥
उनमें भी ब्राह्मण, ब्राह्मणोंमें भी वेदधारी, उनमें भी वेदोक्त धर्मपर चलनेवाले, और उनमें भी विरक्त मुझे प्रिय हैं; विरक्तोंमें ज्ञानी और ज्ञानियोंसे भी अधिक विज्ञानी प्रिय हैं।
तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा। जेहि गति मोरि न दूसरि आसा॥पुनि पुनि सत्य कहउँ तोहि पाहीं। मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं॥॥४॥
विज्ञानियोंसे भी बढ़कर मुझे अपना दास प्रिय है, जिसे मेरे सिवा कोई दूसरी आशा नहीं। मैं बार-बार सत्य कहता हूँ—मुझे अपने सेवकके समान प्रिय कोई नहीं है।
भगति हीन बिरंचि किन होई। सब जीवहु सम प्रिय मोहि सोई॥भगतिवंत अति नीचउ प्रानी। मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी॥॥५॥
भक्तिहीन तो चाहे ब्रह्मा ही क्यों न हो, वह मुझे बाकी सब जीवोंके समान ही प्रिय है; पर भक्तिवान तो अत्यंत नीच प्राणी भी मुझे प्राणोंके समान प्रिय है—यह मेरी घोषणा है।
सुचि सुसील सेवक सुमति प्रिय कहु काहि न लाग।श्रुति पुरान कह नीति असि सावधान सुनु काग॥८६॥
पवित्र, सुशील, सुबुद्धि सेवक भला किसे प्रिय नहीं लगता? वेद-पुराण भी यही नीति कहते हैं—सावधान होकर सुन, काक।
एक पिता के बिपुल कुमारा। होहिं पृथक गुन सील अचारा॥कोउ पंडित कोउ तापस ग्याता। कोउ धनवंत सूर कोउ दाता॥॥१॥
एक ही पिताके अनेक पुत्र भिन्न-भिन्न गुण, स्वभाव और आचरणवाले होते हैं—कोई पंडित, कोई तपस्वी, कोई ज्ञानी, कोई धनी, कोई शूरवीर, कोई दानी,
कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई। सब पर पितहि प्रीति सम होई॥कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा। सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा॥॥२॥
कोई सर्वज्ञ, कोई धर्मपरायण—पर पिताका प्रेम सबपर समान रहता है। किन्तु इनमेंसे जो मन-वचन-कर्मसे केवल पिताका ही भक्त हो, स्वप्रमें भी और कोई धर्म न जाने,
सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना। जद्यपि सो सब भाँति अयाना॥एहि बिधि जीव चराचर जेते। त्रिजग देव नर असुर समेते॥॥३॥
वही पुत्र पिताको प्राणोंके समान प्रिय होता है, चाहे वह सब तरहसे अनजान ही क्यों न हो। इसी तरह पशु-पक्षी, देव, मनुष्य और असुरोंसहित जितने भी जड़-चेतन जीव हैं,
अखिल बिस्व यह मोर उपाया। सब पर मोहि बराबरि दाया॥तिन्ह महँ जो परिहरि मद माया। भजै मोहि मन बच अरु काया॥॥४॥
यह सारा विश्व मेरा ही रचा हुआ है, इसलिये सबपर मेरी दया समान है। पर इनमें से जो मद-माया त्यागकर मन-वचन-कायासे मुझे भजता है,
पुरुष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ।सर्ब भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ॥८७(क)॥
वह पुरुष हो, नपुंसक हो, स्त्री हो या कोई भी चर-अचर जीव—जो भी कपट त्यागकर सर्वभावसे मुझे भजता है, वही मुझे परम प्रिय है।
सत्य कहउँ खग तोहि सुचि सेवक मम प्रानप्रिय।अस बिचारि भजु मोहि परिहरि आस भरोस सब॥८७(ख)॥
हे पक्षी, मैं तुझसे सत्य कहता हूँ—मेरा पवित्र सेवक मुझे प्राणोंके समान प्रिय है। यह विचारकर सब आशा-भरोसा छोड़कर केवल मुझे ही भज।
कबहूँ काल न ब्यापिहि तोही। सुमिरेसु भजेसु निरंतर मोही॥प्रभु बचनामृत सुनि न अघाऊँ। तनु पुलकित मन अति हरषाऊँ॥॥१॥
काल तुझे कभी नहीं छू पायेगा—निरंतर मेरा स्मरण-भजन करते रहना। प्रभुके इस अमृतवचनको सुनते-सुनते मैं तृप्त ही नहीं हो पाता था, शरीर पुलकित और मन हर्षसे भरा था।
सो सुख जानइ मन अरु काना। नहिं रसना पहिं जाइ बखाना॥प्रभु सोभा सुख जानहिं नयना। कहि किमि सकहिं तिन्हहि नहिं बयना॥॥२॥
वह सुख तो केवल मन और कान ही जानते हैं, जीभसे उसे कहा नहीं जा सकता; प्रभुकी शोभाका सुख नेत्र जानते हैं, पर उनकी अपनी कोई वाणी नहीं, वे कैसे कहें?
बहु बिधि मोहि प्रबोधि सुख देई। लगे करन सिसु कौतुक तेई॥सजल नयन कछु मुख करि रूखा। चितइ मातु लागी अति भूखा॥॥३॥
मुझे बहुत तरहसे समझा-बुझाकर सुख देनेके बाद प्रभु फिर बाल-सुलभ खेलमें रम गये; आँखें भरकर, मुँह कुछ रूखा बनाकर उन्होंने माँकी ओर देखा—मानो कह रहे हों, बड़ी भूख लगी है।
देखि मातु आतुर उठि धाई। कहि मृदु बचन लिए उर लाई॥गोद राखि कराव पय पाना। रघुपति चरित ललित कर गाना॥॥४॥
यह देखते ही माता उठ दौड़ीं, कोमल वचन कहकर उन्हें छातीसे लगा लिया; गोदमें लेकर दूध पिलाने लगीं और साथ ही रघुनाथकी सुंदर लीलाएँ गुनगुनाने लगीं।
जेहि सुख लागि पुरारि असुभ बेष कृत सिव सुखद।अवधपुरी नर नारि तेहि सुख महुँ संतत मगन॥८८(क)॥
जिस सुखके लिये सबको सुख देनेवाले त्रिपुरारि शिवने अशुभ वेष धारण किया, उसी सुखमें अवधके नर-नारी निरंतर डूबे रहते थे।
सोइ सुख लवलेस जिन्ह बारक सपनेहुँ लहेउ।ते नहिं गनहिं खगेस ब्रह्मसुखहि सज्जन सुमति॥८८(ख)॥
उस सुखकी एक झलक जिन्हें स्वप्रमें भी एक बार मिल जाय, हे पक्षिराज, वे सुबुद्धि सज्जन फिर ब्रह्मसुखको भी कुछ नहीं गिनते।
मैं पुनि अवध रहेउँ कछु काला। देखेउँ बालबिनोद रसाला॥राम प्रसाद भगति बर पायउँ। प्रभु पद बंदि निजाश्रम आयउँ॥॥१॥
मैं कुछ और समय अवधमें रहा, रामकी रसीली बाल-लीलाएँ देखता रहा; रामकी कृपासे भक्तिका वरदान पाकर, फिर प्रभुके चरणोंकी वंदना कर अपने आश्रम लौट आया।
तब ते मोहि न ब्यापी माया। जब ते रघुनायक अपनाया॥यह सब गुप्त चरित मैं गावा। हरि मायाँ जिमि मोहि नचावा॥॥२॥
जबसे रघुनाथने मुझे अपनाया, तबसे माया मुझे कभी नहीं छू पायी। हरिकी माया मुझे कैसे नचाती थी, वह सब गुप्त वृत्तांत मैंने तुझे सुना दिया।
निज अनुभव अब कहउँ खगेसा। बिनु हरि भजन न जाहि कलेसा॥राम कृपा बिनु सुनु खगराई। जानि न जाइ राम प्रभुताई॥॥३॥
अब हे गरुड़, मैं अपना निजी अनुभव कहता हूँ—हरिभजन बिना दुःख नहीं मिटते। सुनो, रामकी कृपा बिना रामकी प्रभुता नहीं जानी जा सकती,
जानें बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती॥प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई। जिमि खगपति जल के चिकनाई॥॥४॥
प्रभुताको जाने बिना विश्वास नहीं जमता, विश्वासके बिना प्रेम नहीं होता, और प्रेमके बिना भक्ति दृढ़ नहीं होती—जैसे, हे पक्षिराज, जलमें तेल कभी टिकता नहीं।
बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु।गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु॥८९(क)॥
गुरुके बिना कहीं ज्ञान होता है? वैराग्यके बिना ज्ञान होता है? वेद-पुराण भी कहते हैं—हरिभक्तिके बिना सुख कहाँ मिलता है?
कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु।चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ॥८९(ख)॥
तात, सहज संतोषके बिना क्या कोई शांति पाता है? करोड़ों उपाय करके थक जाओ, पर क्या जल बिना नाव कभी चलती है?
बिनु संतोष न काम नसाहीं। काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं॥राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा। थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा॥॥१॥
संतोषके बिना कामना नहीं मिटती, और कामना रहते सुख स्वप्रमें भी नहीं मिलता। रामभजन बिना कामनाएँ कैसे मिटें? क्या भूमि बिना कहीं पेड़ उगता है?
बिनु बिग्यान कि समता आवइ। कोउ अवकास कि नभ बिनु पावइ॥श्रद्धा बिना धर्म नहिं होई। बिनु महि गंध कि पावइ कोई॥॥२॥
विज्ञानके बिना समता कैसे आये? क्या आकाश बिना कोई स्थान मिलता है? श्रद्धाके बिना धर्म नहीं होता, क्या पृथ्वीतत्त्व बिना गंध मिल सकती है?
बिनु तप तेज कि कर बिस्तारा। जल बिनु रस कि होइ संसारा॥सील कि मिल बिनु बुध सेवकाई। जिमि बिनु तेज न रूप गोसाई॥॥३॥
तपके बिना तेज कैसे फैले? जलतत्त्वके बिना संसारमें रस कहाँ? विद्वानोंकी सेवाके बिना शील कैसे मिले? जैसे अग्नितत्त्वके बिना रूप नहीं मिलता, गोसाईं,
निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा। परस कि होइ बिहीन समीरा॥कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा। बिनु हरि भजन न भव भय नासा॥॥४॥
आत्मसुखके बिना मन कैसे स्थिर हो? वायुतत्त्वके बिना स्पर्श कैसे हो? विश्वासके बिना कोई सिद्धि मिलती है? वैसे ही हरिभजन बिना जन्म-मृत्युका भय कभी नहीं मिटता।
बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु।राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु॥॥९०(क)॥
विश्वासके बिना भक्ति नहीं, भक्तिके बिना राम पिघलते नहीं, और रामकी कृपाके बिना जीव स्वप्रमें भी शांति नहीं पाता।
अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल।भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद॥॥९०(ख)॥
यह विचारकर, हे धीरबुद्धि, सब कुतर्क और संदेह त्यागकर करुणाके सागर, सुंदर और सुखदायक रघुवीर रामका भजन करो।
निज मति सरिस नाथ मैं गाई। प्रभु प्रताप महिमा खगराई॥कहेउँ न कछु करि जुगुति बिसेषी। यह सब मैं निज नयनन्हि देखी॥॥१॥
हे पक्षिराज, हे नाथ, मैंने अपनी बुद्धिभर प्रभुके प्रताप और महिमाका गान किया; कहीं कुछ बढ़ाकर नहीं कहा, यह सब मैंने अपनी आँखों देखा है।
महिमा नाम रूप गुन गाथा। सकल अमित अनंत रघुनाथा॥निज निज मति मुनि हरि गुन गावहिं। निगम सेष सिव पार न पावहिं॥॥२॥
रघुनाथकी महिमा, नाम, रूप और गुणोंकी कथा सब अपार और अनंत है, और वे स्वयं भी अनंत हैं; मुनि अपनी-अपनी बुद्धिसे हरिके गुण गाते हैं, पर वेद, शेष और शिव भी उनका पार नहीं पाते।
तुम्हहि आदि खग मसक प्रजंता। नभ उड़ाहिं नहिं पावहिं अंता॥तिमि रघुपति महिमा अवगाहा। तात कबहुँ कोउ पाव कि थाहा॥॥३॥
तुमसे लेकर मच्छरतक सब आकाशमें उड़ते हैं, पर आकाशका अंत कोई नहीं पाता; वैसे ही, तात, रघुनाथकी महिमा भी अथाह है—भला उसकी थाह कोई कभी पा सकता है?
रामु काम सत कोटि सुभग तन। दुर्गा कोटि अमित अरि मर्दन॥सक्र कोटि सत सरिस बिलासा। नभ सत कोटि अमित अवकासा॥॥४॥
रामका सुंदर शरीर करोड़ों कामदेवोंके समान है, वे अनगिनत दुर्गाओंके समान शत्रुनाशक हैं; उनका ऐश्वर्य अरबों इंद्रोंके समान और उनका विस्तार अरबों आकाशोंके समान असीम है।
मरुत कोटि सत बिपुल बल रबि सत कोटि प्रकास।ससि सत कोटि सुसीतल समन सकल भव त्रास॥९१(क)॥
उनका बल अरबों पवनोंके समान, उनकी आभा अरबों सूर्योंके समान, और उनकी शीतलता अरबों चंद्रमाओंके समान है, जो संसारके सारे भयको मिटा देती है।
काल कोटि सत सरिस अति दुस्तर दुर्ग दुरंत।धूमकेतु सत कोटि सम दुराधरष भगवंत॥९१(ख)॥
वे अरबों कालोंके समान दुर्गम, दुर्ग और दुर्निवार हैं; भगवान अरबों धूमकेतुओंके समान अत्यंत प्रबल और अजेय हैं।
प्रभु अगाध सत कोटि पताला। समन कोटि सत सरिस कराला॥तीरथ अमित कोटि सम पावन। नाम अखिल अघ पूग नसावन॥॥१॥
प्रभु अरबों पातालोंके समान अथाह हैं, अरबों यमोंके समान भयंकर; अनगिनत तीर्थोंके समान पवित्र करनेवाले हैं, और उनका नाम समस्त पापोंका नाश करता है।
हिमगिरि कोटि अचल रघुबीरा। सिंधु कोटि सत सम गंभीरा॥कामधेनु सत कोटि समाना। सकल काम दायक भगवाना॥॥२॥
रघुवीर करोड़ों हिमालयोंके समान अटल और अरबों समुद्रोंके समान गंभीर हैं; भगवान अरबों कामधेनुओंके समान सब इच्छाएँ पूरी करनेवाले हैं।
सारद कोटि अमित चतुराई। बिधि सत कोटि सृष्टि निपुनाई॥बिष्नु कोटि सम पालन कर्ता। रुद्र कोटि सत सम संहर्ता॥॥३॥
उनमें अनगिनत सरस्वतियोंकी चतुराई है, अरबों ब्रह्माओंकी सृष्टि-निपुणता है; वे करोड़ों विष्णुओंके समान पालनकर्ता और अरबों रुद्रोंके समान संहारकर्ता हैं।
धनद कोटि सत सम धनवाना। माया कोटि प्रपंच निधाना॥भार धरन सत कोटि अहीसा। निरवधि निरुपम प्रभु जगदीसा॥॥४॥
वे अरबों कुबेरोंके समान धनवान और करोड़ों मायाओंके भंडार हैं; भार वहनमें अरबों शेषोंके समान हैं—संक्षेपमें, जगदीश्वर प्रभु सीमारहित और उपमारहित हैं।
निरुपम न उपमा आन राम समान रामु निगम कहै।जिमि कोटि सत खद्योत सम रबि कहत अति लघुता लहै॥एहि भाँति निज निज मति बिलास मुनीस हरिहि बखानहीं।प्रभु भाव गाहक अति कृपाल सप्रेम सुनि सुख मानहीं॥
राम उपमारहित हैं, राम-जैसा दूसरा कोई नहीं—वेद यही कहते हैं। जैसे सूर्यको करोड़ों जुगनुओंके समान कहना उसकी महिमा घटाना ही है, वैसे ही मुनिजन अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार हरिका वर्णन करते हैं; पर अत्यंत कृपालु प्रभु तो बस भक्तोंके भावको ग्रहण करते हैं, और उस वर्णनको प्रेमसहित सुनकर प्रसन्न होते हैं।
रामु अमित गुन सागर थाह कि पावइ कोई।संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हहि सुनायउँ सोइ॥९२(क)॥
श्रीरामजी तो अनन्त गुणोंके अथाह सागर हैं, उनकी थाह भला कौन पा सकता है! संतोंसे मैंने जैसा कुछ उनके विषयमें सुना था, वही तुम्हें कह सुनाया।
भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन।तजि ममता मद मान भजिअ सदा सीता रवन॥९२(ख)॥
भगवान् सुखके अक्षय भण्डार और करुणाके धाम हैं, पर वे केवल प्रेमके ही वश होते हैं। इसलिये ममता, अभिमान और दम्भ त्यागकर सदा श्रीजानकीवल्लभका ही भजन करना चाहिये।
सुनि भुसुंडि के बचन सुहाए। हरषित खगपति पंख फुलाए॥नयन नीर मन अति हरषाना। श्रीरघुपति प्रताप उर आना॥॥१॥
भुशुण्डिजीके ये मधुर वचन सुनकर पक्षिराज गरुड़ हर्षसे पुलकित हो उठे, उनके पंख फूल गये। नेत्रोंमें प्रेमाश्रु भर आये और मनमें श्रीरघुनाथजीका प्रताप स्मरण होते ही अपार आनन्दकी लहर दौड़ गयी।
पाछिल मोह समुझि पछिताना। ब्रह्म अनादि मनुज करि माना॥पुनि पुनि काग चरन सिरु नावा। जानि राम सम प्रेम बढ़ावा॥॥२॥
गरुड़जीको अपना पूर्व मोह याद आया और वे पछताने लगे कि उन्होंने अनादि ब्रह्मको साधारण मनुष्य मान लिया था। उन्होंने बार-बार सिर झुकाकर काकभुशुण्डिजीके चरण छुए और उन्हें साक्षात् श्रीरामके समान जानकर उनके प्रति अपना प्रेम और बढ़ा लिया।
गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई॥संसय सर्प ग्रसेउ मोहि ताता। दुखद लहरि कुतर्क बहु ब्राता॥॥३॥
गुरुकी शरण लिये बिना कोई भी भवसागर पार नहीं कर सकता, चाहे वह ब्रह्मा या शिवके समान ही सामर्थ्यवान् क्यों न हो। गरुड़जी बोले—हे तात! मुझे सन्देहरूपी सर्पने ऐसा डस लिया था कि भाँति-भाँतिके कुतर्कोंकी दुःखदायी लहरें मेरे भीतर उठती रहती थीं।
तव सरूप गारुड़ि रघुनायक। मोहि जिआयउ जन सुखदायक॥तव प्रसाद मम मोह नसाना। राम रहस्य अनूपम जाना॥॥४॥
आपके ही स्वरूपरूपी गारुड़ी-मंत्रने, जो भक्तोंको सुख देनेवाला है, मुझ श्रीरघुनाथजीके सेवकको फिरसे जीवन दे दिया। आपकी कृपासे मेरा वह मोह मिट गया और मैंने श्रीरामके अनुपम रहस्यको पहचान लिया।
ताहि प्रसंसि बिबिध बिधि सीस नाइ कर जोरि।बचन बिनीत सप्रेम मृदु बोलेउ गरुड़ बहोरि॥९३(क)॥
इस प्रकार भुशुण्डिजीकी बारम्बार प्रशंसा करके, सिर झुकाकर और हाथ जोड़कर गरुड़जी फिर बड़े ही विनम्र और प्रेमभीने कोमल स्वरमें बोले।
प्रभु अपने अबिबेक ते बूझउँ स्वामी तोहि।कृपासिंधु सादर कहहु जानि दास निज मोहि॥९३(ख)॥
हे प्रभो, हे स्वामी! मैं अपनी नासमझीके कारण ही आपसे यह पूछ रहा हूँ। हे कृपासागर! मुझे अपना ही सेवक जानकर आदरपूर्वक मेरी जिज्ञासाका समाधान कीजिये।
तुम्ह सर्बग्य तन्य तम पारा। सुमति सुसील सरल आचारा॥ग्यान बिरति बिग्यान निवासा। रघुनायक के तुम्ह प्रिय दासा॥॥१॥
आप सर्वज्ञ हैं, तत्त्वके पूर्ण ज्ञाता हैं, माया-मोहसे परे हैं, उत्तम बुद्धि और सरल स्वभावके धनी हैं। ज्ञान, वैराग्य और विज्ञान आपमें साक्षात् बसते हैं, और आप स्वयं श्रीरघुनाथजीके परम प्रिय दास हैं।
कारन कवन देह यह पाई। तात सकल मोहि कहहु बुझाई॥राम चरित सर सुंदर स्वामी। पायहु कहाँ कहहु नभगामी॥॥२॥
फिर भी हे तात! यह बतलाइये कि आपने यह काकका शरीर किस कारणसे पाया। और हे आकाशगामी स्वामी! यह सुन्दर रामकथा आपने कहाँसे और कैसे प्राप्त की, वह भी मुझे सुनाइये।
नाथ सुना मैं अस सिव पाहीं। महा प्रलयहुँ नास तव नाहीं॥मुधा बचन नहिं ईस्वर कहई। सोऊ मोरें मन संसय अहई॥॥३॥
हे नाथ! मैंने स्वयं शिवजीसे यह सुना है कि महाप्रलयमें भी आपका नाश नहीं होता, और ईश्वर कभी झूठ नहीं बोलते—फिर भी मेरे मनमें एक सन्देह बना हुआ है।
अग जग जीव नाग नर देवा। नाथ सकल जगु काल कलेवा॥अंड कटाह अमित लय कारी। कालु सदा दुरतिक्रम भारी॥॥४॥
क्योंकि हे नाथ! समस्त चराचर जीव—नाग, मनुष्य, देवता—और यह सम्पूर्ण जगत् कालका ग्रास बन जाता है। असंख्य ब्रह्माण्डोंको लील जानेवाला वह काल सदा अत्यन्त प्रबल और अजेय माना जाता है।
तुम्हहि न ब्यापत काल अति कराल कारन कवन।मोहि सो कहहु कृपाल ग्यान प्रभाव कि जोग बल॥९४(क)॥
फिर वही अत्यन्त भयंकर काल आपपर कोई प्रभाव क्यों नहीं डालता? हे कृपालु! मुझे बतलाइये—क्या यह आपके ज्ञानका प्रताप है या योगबलका चमत्कार?
प्रभु तव आश्रम आएँ मोर मोह भ्रम भाग।कारन कवन सो नाथ सब कहहु सहित अनुराग॥९४(ख)॥
और हे प्रभो! एक और बात—आपके आश्रममें आते ही मेरा सारा मोह और भ्रम क्षणभरमें कैसे भाग गया? हे नाथ! यह सब भी प्रेमपूर्वक मुझे विस्तारसे समझाइये।
गरुड़ गिरा सुनि हरषेउ कागा। बोलेउ उमा परम अनुरागा॥धन्य धन्य तव मति उरगारी। प्रस्न तुम्हारि मोहि अति प्यारी॥॥१॥
हे उमा! गरुड़जीके ये वचन सुनकर काकभुशुण्डिजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और परम प्रेमसे बोले—हे सर्पशत्रु! तुम्हारी बुद्धि धन्य है, धन्य है! तुम्हारे ये प्रश्न मुझे बहुत ही भाये।
सुनि तव प्रस्न सप्रेम सुहाई। बहुत जनम के सुधि मोहि आई॥सब निज कथा कहउँ मैं गाई। तात सुनहु सादर मन लाई॥॥२॥
तुम्हारे इन प्रेमभरे सुन्दर प्रश्नोंको सुनकर मुझे अपने अनेकों पूर्वजन्मोंकी स्मृति ताज़ा हो आयी है। अब मैं अपनी सम्पूर्ण कथा विस्तारसे कहता हूँ, हे तात! तुम आदरपूर्वक मन लगाकर सुनो।
जप तप मख सम दम ब्रत दाना। बिरति बिबेक जोग बिग्याना॥सब कर फल रघुपति पद प्रेमा। तेहि बिनु कोउ न पावइ छेमा॥॥३॥
जप, तप, यज्ञ, संयम, व्रत, दान, वैराग्य, विवेक, योग और विज्ञान—इन सब साधनाओंका अन्तिम फल एक ही है: श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें सच्चा प्रेम जाग उठे। इसके बिना किसी भी साधनसे सच्चा कल्याण सम्भव नहीं।
एहि तन राम भगति मैं पाई। ताते मोहि ममता अधिकाई॥जेहि तें कछु निज स्वारथ होई। तेहि पर ममता कर सब कोई॥॥४॥
इसी शरीरसे मुझे श्रीरामकी भक्ति प्राप्त हुई, इसीलिये मुझे इस देहसे इतना अधिक स्नेह है। यह स्वाभाविक भी है—जिस वस्तुसे हमारा कोई सच्चा प्रयोजन सिद्ध होता है, उसीसे सबका मन बँध जाता है।
पन्नगारि असि नीति श्रुति संमत सज्जन कहहिं।अति नीचहु सन प्रीति करिअ जानि निज परम हित॥९५(क)॥
हे गरुड़! वेदोंने भी यही नीति मानी है और सज्जन भी यही कहते हैं कि अपने परम हितको समझकर अत्यन्त तुच्छ वस्तुसे भी प्रेम रखना चाहिये।
पाट कीट तें होइ तेहि तें पाटंबर रुचिर।कृमि पालइ सबु कोइ परम अपावन प्रान सम॥९५(ख)॥
देखो न, रेशमका सुन्दर वस्त्र आखिर एक तुच्छ कीड़ेसे ही तो बनता है, फिर भी उस अपावन कीड़ेको हर कोई अपने प्राणोंके समान सँभालकर पालता है।
स्वारथ साँच जीव कहुँ एहा। मन क्रम बचन राम पद नेहा॥सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा। जो तनु पाइ भजिअ रघुबीरा॥॥१॥
जीवका सच्चा स्वार्थ बस इतना ही है कि उसका मन, वचन और कर्म सदा श्रीरामके चरणोंमें रमा रहे। वही शरीर वास्तवमें पवित्र और सुन्दर है, जिसे पाकर श्रीरघुवीरका भजन किया जाय।
राम बिमुख लहि बिधि सम देही। कबि कोबिद न प्रसंसहिं तेही॥राम भगति एहिं तन उर जामी। ताते मोहि परम प्रिय स्वामी॥॥२॥
श्रीरामसे विमुख व्यक्ति चाहे ब्रह्माके समान भी दिव्य शरीर पा जाय, तो भी विद्वान् और कवि उसकी प्रशंसा नहीं करते। इसी काकशरीरमें मेरे हृदयमें रामभक्तिका अंकुर फूटा, इसीलिये हे स्वामी! यह देह मुझे अत्यन्त प्रिय है।
तजउँ न तन निज इच्छा मरना। तन बिनु बेद भजन नहिं बरना॥प्रथम मोहँ मोहि बहुत बिगोवा। राम बिमुख सुख कबहुँ न सोवा॥॥३॥
मैं इस शरीरको अपनी इच्छासे मरना होते हुए भी नहीं छोड़ता, क्योंकि शास्त्रोंने स्पष्ट कहा है कि देहके बिना भजन सम्भव ही नहीं। इससे पहले, मोहके वशीभूत होकर मेरी बड़ी दुर्गति हुई थी और श्रीरामसे विमुख रहकर मुझे कभी चैनकी नींद नहीं आयी।
नाना जनम कर्म पुनि नाना। किए जोग जप तप मख दाना॥कवन जोनि जनमेउँ जहँ नाहीं। मैं खगेस भ्रमि भ्रमि जग माहीं॥॥४॥
अनेकानेक जन्मोंमें मैंने भाँति-भाँतिके योग, जप, तप, यज्ञ और दान आदि साधन किये। हे गरुड़! ऐसी कोई योनि नहीं बची जिसमें मैंने बार-बार भटककर जन्म न लिया हो।
देखेउँ करि सब करम गोसाई। सुखी न भयउँ अबहिं की नाई॥सुधि मोहि नाथ जन्म बहु केरी। सिव प्रसाद मति मोहँ न घेरी॥॥५॥
हर तरहके कर्म करके देख लिये, पर जितना सुख अब इस जन्ममें मिला उतना पहले कभी नहीं मिला। हे नाथ! मुझे अपने अनेक पूर्वजन्मोंकी स्मृति बनी रहती है, क्योंकि शिवजीकी कृपासे मेरी बुद्धिको कभी मोहने घेर नहीं पाया।
प्रथम जन्म के चरित अब कहउँ सुनहु बिहगेस।सुनि प्रभु पद रति उपजइ जातें मिटहिं कलेस॥९६(क)॥
अब मैं अपने प्रथम जन्मकी कथा सुनाता हूँ, हे पक्षिराज! इसे सुनकर प्रभुके चरणोंमें ऐसी प्रीति उपजती है जिससे सारे क्लेश मिट जाते हैं।
पूरुब कल्प एक प्रभु जुग कलिजुग मल मूल।नर अरु नारि अधर्म रत सकल निगम प्रतिकूल॥९६(ख)॥
हे प्रभो! एक पूर्वकल्पमें ऐसा कलियुग था जो समस्त पापोंका मूल था, जिसमें सभी स्त्री-पुरुष अधर्ममें रत और वेदके सर्वथा विरोधी हो चुके थे।
तेहि कलिजुग कोसलपुर जाई। जन्मत भय सूद्र तनु पाई॥सिव सेवक मन क्रम अरु बानी। आन देव निंदक अभिमानी॥॥१॥
उसी कलियुगमें मैं अयोध्यापुरीमें शूद्रके शरीरमें जन्मा। मन, वचन और कर्मसे शिवजीका सेवक तो था, पर साथ ही दूसरे देवताओंकी निन्दा करनेवाला घमण्डी भी था।
धन मद मत्त परम बाचाला। उग्रबुद्धि उर दंभ बिसाला॥जदपि रहेउँ रघुपति रजधानी। तदपि न कछु महिमा तब जानी॥॥२॥
धनके नशेमें चूर, अत्यन्त बकवादी और उग्रबुद्धि—मेरे हृदयमें बड़ा भारी दम्भ भरा था। श्रीरघुनाथजीकी ही राजधानीमें रहते हुए भी उस समय मैंने उसकी महिमाको तनिक भी नहीं पहचाना।
अब जाना मैं अवध प्रभावा। निगमागम पुरान अस गावा॥कवनेहुँ जन्म अवध बस जोई। राम परायन सो परि होई॥॥३॥
अब जाकर मैंने अयोध्याका सच्चा प्रभाव समझा है। वेद, शास्त्र और पुराण सभी यही गाते हैं कि जो कोई भी किसी भी जन्ममें अयोध्यामें निवास करता है, वह अन्ततः अवश्य ही श्रीरामका भक्त बन जाता है।
अवध प्रभाव जान तब प्रानी। जब उर बसहिं रामु धनुपानी॥सो कलिकाल कठिन उरगारी। पाप परायन सब नर नारी॥॥४॥
पर अयोध्याका यह प्रभाव जीवको तभी अनुभव होता है जब धनुर्धारी श्रीराम स्वयं उसके हृदयमें बस जायँ। हे गरुड़! वह कलिकाल अत्यन्त कठोर था, जिसमें सभी नर-नारी पापमें ही डूबे रहते थे।
कलिमल ग्रसे धर्म सब लुप्त भए सदग्रंथ।दंभिन्ह निज मति कल्पि करि प्रगट किए बहु पंथ॥९७(क)॥
कलियुगके पापोंने सारे धर्मको निगल लिया, सद्ग्रन्थ लुप्तप्राय हो गये, और पाखण्डियोंने अपनी मनमानी कल्पनाओंसे अनेकों नये-नये पंथ खड़े कर दिये।
भए लोग सब मोहबस लोभ ग्रसे सुभ कर्म।सुनु हरिजान ग्यान निधि कहउँ कछुक कलिधर्म॥९७(ख)॥
सब लोग मोहके अंधकारमें डूब गये, लोभने शुभ कर्मोंको निगल लिया। हे ज्ञानभण्डार, हे हरिवाहन! अब सुनिये, मैं कलियुगके कुछ और लक्षण बतलाता हूँ।
बरन धर्म नहिं आश्रम चारी। श्रुति बिरोध रत सब नर नारी॥द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन। कोउ नहिं मान निगम अनुसासन॥॥१॥
कलियुगमें न वर्णधर्म शेष रहता है, न चारों आश्रम। स्त्री-पुरुष सभी वेदके विरोधमें उतर आते हैं, ब्राह्मण वेदको बेचनेवाले और राजा प्रजाका शोषण करनेवाले हो जाते हैं—वेदकी आज्ञा माननेवाला कोई नहीं बचता।
मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा॥मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहुँ संत कह सब कोई॥॥२॥
जिसे जो अच्छा लगे, वही उसके लिये सच्चा मार्ग बन जाता है; जो केवल डींगें हाँकना जानता है, वही पण्डित कहलाता है। जो झूठा आडम्बर और पाखण्ड रचता है, उसीको सब लोग संत मानने लगते हैं।
सोइ सयान जो परधन हारी। जो कर दंभ सो बड़ आचारी॥जो कह झूँठ मसखरी जाना। कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना॥॥३॥
जो किसी तरह दूसरेका धन हड़प ले, वही चतुर समझा जाता है; जो पाखण्ड करे, वही बड़ा आचारवान् माना जाता है। जो झूठ बोलना और मज़ाक उड़ाना जानता है, कलियुगमें उसीको गुणवान् कहा जाता है।
निराचार जो श्रुति पथ त्यागी। कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी॥जाकें नख अरु जटा बिसाला। सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला॥॥४॥
जो आचारहीन है और वेदमार्गको त्याग चुका है, कलियुगमें वही ज्ञानी और वही वैरागी माना जाता है। जिसके नाखून बढ़े हुए और जटाएँ लम्बी हों, वही उस युगमें प्रसिद्ध तपस्वी बन बैठता है।
असुभ बेष भूषन धरें भच्छाभच्छ जे खाहिं।तेइ जोगी तेइ सिद्ध नर पूज्य ते कलिजुग माहिं॥९८(क)॥
जो अशुभ वेष-भूषा धारण करते हैं और खाने-न खाने योग्यका कोई भेद किये बिना सब कुछ खा लेते हैं, कलियुगमें वे ही योगी, वे ही सिद्ध और वे ही पूज्य पुरुष माने जाते हैं।
जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ।मन क्रम बचन लबार तेइ बकता कलिकाल महुँ॥९८(ख)॥
जिनका आचरण ही दूसरोंका अहित करनेवाला हो, उन्हींका गौरव होता है और वे ही आदरके पात्र बनते हैं। मन, वचन, कर्मसे झूठ बोलनेवाले ही कलिकालमें बड़े वक्ता माने जाते हैं।
नारि बिबस नर सकल गोसाई। नाचहिं नट मर्कट की नाई॥सूद्र द्विजन्ह उपदेसहिं ग्याना। मेलि जनेऊ लेहिं कुदाना॥॥१॥
हे गोसाईं! सभी पुरुष स्त्रियोंके पूर्ण वशमें होकर मदारीके बंदरकी तरह नाचते हैं। शूद्र ब्राह्मणोंको ज्ञानका उपदेश देने लगते हैं और गलेमें जनेऊ डालकर नीच दान तक ग्रहण करने लगते हैं।
सब नर काम लोभ रत क्रोधी। देव बिप्र श्रुति संत बिरोधी॥गुन मंदिर सुंदर पति त्यागी। भजहिं नारि पर पुरुष अभागी॥॥२॥
सभी पुरुष काम, लोभ और क्रोधमें डूबे रहते हैं तथा देवता, ब्राह्मण, वेद और संतोंसे बैर रखते हैं। अभागी स्त्रियाँ गुणवान् और सुन्दर पतिको त्यागकर पराये पुरुषका सेवन करने लगती हैं।
सौभागिनीं बिभूषन हीना। बिधवन्ह के सिंगार नबीना॥गुर सिष बधिर अंध का लेखा। एक न सुनइ एक नहिं देखा॥॥३॥
सुहागिनें आभूषणहीन रहती हैं, जबकि विधवाएँ नित नये शृंगार सजाती हैं। गुरु और शिष्यके बीच बहरे और अंधेका-सा सम्बन्ध रह जाता है—एक उपदेश सुनता नहीं, दूसरा उसे सच्ची दृष्टि देता नहीं।
हरइ सिष्य धन सोक न हरई। सो गुर घोर नरक महुँ परई॥मातु पिता बालकन्हि बोलाबहिं। उदर भरे सोइ धर्म सिखावहिं॥॥४॥
जो गुरु शिष्यका धन तो हर लेता है पर उसका दुःख नहीं हरता, वह घोर नरकमें गिरता है। माता-पिता भी बच्चोंको वही धर्म सिखाते हैं जिससे बस उनका पेट भर जाय।
ब्रह्म ग्यान बिनु नारि नर कहहिं न दूसरि बात।कौड़ी लागि लोभ बस करहिं बिप्र गुर घात॥९९(क)॥
स्त्री-पुरुष ब्रह्मज्ञानकी बड़ी-बड़ी बातें ही करते रहते हैं, पर लोभवश एक कौड़ीके लिये भी ब्राह्मण और गुरुकी हत्या करनेसे नहीं चूकते।
बादहिं सूद्र द्विजन्ह सन हम तुम्ह ते कछु घाटि।जानइ ब्रह्म सो बिप्रबर आँखि देखावहिं डाटि॥९९(ख)॥
शूद्र ब्राह्मणोंसे विवाद करके कहते हैं—हम तुमसे किस बातमें कम हैं? जो ब्रह्मको जान ले वही असली ब्राह्मण है—यों कहकर वे उन्हें आँखें दिखाकर डाँटने लगते हैं।
पर त्रिय लंपट कपट सयाने। मोह द्रोह ममता लपटाने॥तेइ अभेदबादी ग्यानी नर। देखा मैं चरित्र कलिजुग कर॥॥१॥
परायी स्त्रीमें आसक्त, छल-कपटमें निपुण, मोह-द्रोह-ममतामें उलझे हुए लोग ही स्वयंको ब्रह्म और जीवको एक बतानेवाला ज्ञानी घोषित करते हैं। मैंने उस कलियुगका यही स्वरूप प्रत्यक्ष देखा।
आपु गए अरु तिन्हहू घालहिं। जे कहुँ सत मारग प्रतिपालहिं॥कल्प कल्प भरि एक एक नरका। परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका॥॥२॥
ऐसे लोग स्वयं तो नष्ट होते ही हैं, साथ ही जो सन्मार्गपर चलते हैं उन्हें भी भ्रष्ट कर देते हैं। जो कुतर्कोंसे वेदकी निन्दा करते हैं, वे युगों-युगों तक नरकमें पड़े रहते हैं।
जे बरनाधम तेलि कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा॥नारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं सन्यासी॥॥३॥
तेली, कुम्हार, चाण्डाल, भील, कोल, कलवार जैसे नीची जातिके लोग भी पत्नीकी मृत्यु या घर-सम्पत्तिके नाशपर सिर मुँड़ाकर संन्यासी बन बैठते हैं।
ते बिप्रन्ह सन आपु पुजावहिं। उभय लोक निज हाथ नसावहिं॥बिप्र निरच्छर लोलुप कामी। निराचार सठ बृषली स्वामी॥॥४॥
वे स्वयं ब्राह्मणोंसे भी अपनी पूजा करवाने लगते हैं और अपने ही हाथों दोनों लोक बिगाड़ लेते हैं। इधर ब्राह्मण भी अपढ़, लोभी, विषयी, आचारहीन, मूर्ख और नीच स्त्रियोंके अधीन हो जाते हैं।
सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना। बैठि बरासन कहहिं पुराना॥सब नर कल्पित करहिं अचारा। जाइ न बरनि अनीति अपारा॥॥५॥
शूद्र जप-तप-व्रत आदि करने लगते हैं और ऊँचे आसनपर बैठकर पुराण बाँचने लगते हैं। सब लोग मनमाना आचरण करते हैं—उस अपार अनीतिका वर्णन करना भी सम्भव नहीं।
भए बरन संकर कलि भिन्नसेतु सब लोग।करहिं पाप पावहिं दुख भय रुज सोक बियोग॥१००(क)॥
कलियुगमें सब लोग वर्णसंकर होकर मर्यादासे गिर गये हैं। पाप करते हैं, और उसके बदलेमें दुःख, भय, रोग, शोक और प्रियजनोंका वियोग ही पाते हैं।
श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत बिरति बिबेक।तेहि न चलहिं नर मोह बस कल्पहिं पंथ अनेक॥१००(ख)॥
वेदसम्मत, वैराग्य और विवेकसे भरा हुआ जो हरिभक्तिका सीधा मार्ग है, उसपर मोहवश कोई नहीं चलता—लोग इसके बदले अपनी मनमानी कल्पनासे नये-नये पंथ रचते रहते हैं।
बहु दाम सँवारहिं धाम जती। बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती॥तपसी धनवंत दरिद्र गृही। कलि कौतुक तात न जात कही॥॥१॥
संन्यासी बड़ा धन लगाकर आलीशान मठ बनवाते हैं, उनका वैराग्य विषय-भोगोंने निगल लिया है। तपस्वी धनी बन गये और गृहस्थ दरिद्र हो गये—हे तात! कलियुगकी यह विचित्र लीला कही ही नहीं जा सकती।
कुलवंति निकारहिं नारि सती। गृह आनिहिं चेरी निबेरि गती॥सुत मानहिं मातु पिता तब लौं। अबलानन दीख नहीं जब लौं॥॥२॥
कुलीन और पतिव्रता स्त्रीको घरसे निकाल दिया जाता है और उसकी जगह दासीको ला बिठाया जाता है। पुत्र माता-पिताको तभीतक मानते हैं जबतक उनकी पत्नीका मुख नहीं देख लेते।
ससुरारि पिआरि लगी जब तें। रिपरूप कुटुंब भए तब तें॥नृप पाप परायन धर्म नहीं। करि दंड बिडंब प्रजा नितहीं॥॥३॥
जबसे ससुरालवाले प्यारे लगने लगे, तबसे सगे कुटुम्बी ही शत्रु बन गये। राजा भी पापमें डूबे रहते हैं, उनमें धर्म नहीं बचा—वे बेकसूर प्रजाको भी नित्य दण्ड देकर सताते रहते हैं।
धनवंत कुलीन मलीन अपी। द्विज चिन्ह जनेउ उघार तपी॥नहिं मान पुरान न बेदहि जो। हरि सेवक संत सही कलि सो॥॥४॥
नीच कुलका भी धनी व्यक्ति कुलीन गिना जाने लगता है। ब्राह्मणत्वका चिह्न केवल जनेऊ भरका रह गया है और नंगे बदन घूमना ही तपस्वीपन बन गया है। जो वेद-पुराणको मानते ही नहीं, कलियुगमें वही हरिभक्त और सच्चे संत कहलाते हैं।
कबि बृंद उदार दुनी न सुनी। गुन दूषक ब्रात न कोपि गुनी॥कलि बारहिं बार दुकाल परै। बिनु अन्न दुखी सब लोग मरै॥॥५॥
कवियोंकी भीड़ तो बहुत हो गयी, पर उन्हें सराहनेवाला उदार आश्रयदाता कहीं सुनायी नहीं देता। गुणोंमें दोष निकालनेवाले असंख्य हैं, पर सचमुच गुणी कोई नहीं। कलियुगमें बार-बार अकाल पड़ते हैं और अन्नके अभावमें लोग तड़पकर मरते हैं।
सुनु खगेस कलि कपट हठ दंभ द्वेष पाषंड।मान मोह मारादि मद ब्यापि रहे ब्रह्मंड॥१०१(क)॥
हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिये, कलियुगमें कपट, हठ, दम्भ, द्वेष, पाखण्ड, मान, मोह, कामादि और मद पूरे ब्रह्माण्डमें व्याप्त हो जाते हैं।
तामस धर्म करहिं नर जप तप ब्रत मख दान।देव न बरषहिं धरनी बए न जामहिं धान॥१०१(ख)॥
मनुष्य जप, तप, यज्ञ, व्रत और दान जैसे धर्म भी तामसी भावसे करने लगते हैं। फलस्वरूप वर्षा नहीं होती और बोया हुआ अन्न भी धरतीसे उगता नहीं।
अबला कच भूषन भूरि छुधा। धनहीन दुखी ममता बहुधा॥सुख चाहहिं मूढ़ न धर्म रता। मति थोरि कठोरि न कोमलता॥॥१॥
स्त्रियोंके पास आभूषण नहीं बचते, बस उनके बाल ही उनका शृंगार रह जाते हैं, और उन्हें भूख अतृप्त-सी सताती रहती है। धनहीनता और तरह-तरहकी ममता उन्हें दुखी रखती है। वे मूर्ख सुख तो चाहती हैं पर धर्ममें उनका मन नहीं लगता—बुद्धि छोटी और कठोर होती है, कोमलता कहीं शेष नहीं रहती।
नर पीड़ित रोग न भोग कहीं। अभिमान बिरोध अकारनहीं॥लघु जीवन संबतु पंच दसा। कलपांत न नास गुमानु असा॥॥२॥
मनुष्य रोगोंसे पीड़ित रहते हैं, कहीं सच्चा सुख नहीं मिलता, फिर भी बिना किसी कारण अभिमान और झगड़ा करते रहते हैं। जीवन बस दस-पाँच वर्षका है, पर घमण्ड इतना कि मानो प्रलयमें भी उनका नाश नहीं होगा।
कलिकाल बिहाल किए मनुजा। नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा॥नहिं तोष बिचार न सीतलता। सब जाति कुजाति भए मगता॥॥३॥
कलिकालने मनुष्योंको पूरी तरह बदहाल कर डाला है—कोई अपनी बहन-बेटीका भी लिहाज़ नहीं करता। न संतोष बचा, न विवेक, न कोमलता—ऊँच-नीच सभी जातिके लोग भिखारी बनकर रह गये हैं।
इरिषा परुषाच्छर लोलुपता। भरि पूरि रही समता बिगता॥सब लोग बियोग बिसोक हुए। बरनाश्रम धर्म अचार गए॥॥४॥
ईर्ष्या, कड़वे वचन और लालच चारों ओर छाये हुए हैं, समताका नामोनिशान मिट गया है। सब लोग बिछोह और शोकसे भरे हैं, वर्णाश्रम-धर्मका आचरण पूरी तरह लुप्त हो गया है।
दम दान दया नहिं जानपनी। जड़ता परबंचनताति घनी॥तनु पोषक नारि नरा सगरे। परनिंदक जे जग मो बगरे॥॥५॥
इन्द्रिय-संयम, दान, दया और समझदारी—इनका कहीं पता नहीं। मूर्खता और छल-प्रपंच बुरी तरह फैल गये हैं। सब लोग बस अपने शरीरके पालन-पोषणमें ही लगे रहते हैं, और जो दूसरोंकी निन्दा करते हैं, संसारमें वे ही सबसे अधिक फैले नज़र आते हैं।
सुनु ब्यालारि काल कलि मल अवगुन आगार।गुनउँ बहुत कलिजुग कर बिनु प्रयास निस्तार॥१०२(क)॥
हे सर्पशत्रु गरुड़! सुनिये, कलिकाल पाप और अवगुणोंका घर तो है, पर उसमें एक बड़ा गुण भी है—इसमें बिना किसी विशेष परिश्रमके ही भवबन्धनसे मुक्ति मिल जाती है।
कृतजुग त्रेता द्वापर पूजा मख अरु जोग।जो गति होइ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग॥१०२(ख)॥
सत्ययुग, त्रेता और द्वापरमें पूजा, यज्ञ और योगके द्वारा जो गति प्राप्त होती है, कलियुगमें वही गति लोग केवल भगवान्का नाम लेकर पा लेते हैं।
कृतजुग सब जोगी बिग्यानी। करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी॥त्रेताँ बिबिध जग्य नर करहीं। प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं॥॥१॥
सत्ययुगमें सब लोग योगी और ज्ञानी होते हैं, वे केवल हरि-ध्यानसे ही भवसागर पार कर लेते हैं। त्रेतामें लोग विविध यज्ञ करते हैं और अपने सारे कर्म प्रभुको समर्पित करके तर जाते हैं।
द्वापर करि रघुपति पद पूजा। नर भव तरहिं उपाय न दूजा॥कलिजुग केवल हरि गुन गाहा। गावत नर पावहिं भव थाहा॥॥२॥
द्वापरमें श्रीरघुनाथजीके चरणोंकी पूजा करके ही मनुष्य पार होते हैं, कोई दूसरा उपाय नहीं बचता। पर कलियुगमें तो केवल श्रीहरिकी गुणगाथा गा लेनेभरसे मनुष्य भवसागरकी थाह पा जाता है।
कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना। एक अधार राम गुन गाना॥सब भरोस तजि जो भज रामहि। प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि॥॥३॥
कलियुगमें न योग काम आता है, न यज्ञ, न ज्ञान—श्रीरामके गुणगानका ही एकमात्र सहारा रह जाता है। इसलिये जो सब भरोसे छोड़कर श्रीरामको भजता है और प्रेमपूर्वक उनके गुणसमूह गाता है,
सोइ भव तर कछु संसय नाहीं। नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं॥कलि कर एक पुनीत प्रतापा। मानस पुन्य होहिं नहिं पापा॥॥४॥
वही निश्चित रूपसे भवसागरसे पार हो जाता है, इसमें रत्तीभर भी सन्देह नहीं। नामका यह प्रताप कलियुगमें साफ दिखायी देता है। कलियुगका एक पावन प्रताप यह भी है कि यहाँ मनमें पुण्य तो बन जाते हैं, पर मनके पाप उतने बाध्यकारी नहीं होते।
कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास।गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास॥१०३(क)॥
यदि मनुष्य श्रद्धा रखे तो कलियुगके समान कोई अन्य युग सुगम नहीं—क्योंकि इसी युगमें श्रीरामके निर्मल गुण गाते-गाते मनुष्य बिना किसी परिश्रमके ही संसार-सागरसे पार हो जाता है।
प्रगट चारि पद धर्म के कलि महुँ एक प्रधान।जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान॥१०३(ख)॥
धर्मके प्रसिद्ध चार चरण हैं—सत्य, दया, तप और दान—पर कलियुगमें इनमें केवल दान ही प्रधान रह जाता है। चाहे जिस भी विधिसे दिया जाय, दान सदा कल्याण ही करता है।
नित जुग धर्म होहिं सब केरे। हृदयँ राम माया के प्रेरे॥सुद्ध सत्व समता बिग्याना। कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना॥॥१॥
श्रीरामकी मायाकी ही प्रेरणासे सबके हृदयमें सभी युगोंके धर्म बने रहते हैं। शुद्ध सत्त्वगुण, समता, विवेक और मनकी प्रसन्नता—इसे सत्ययुगका प्रभाव समझना चाहिये।
सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा। सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा॥बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस। द्वापर धर्म हरष भय मानस॥॥२॥
अधिक सत्त्वगुण, कुछ रजोगुण, कर्ममें रुचि और चहुँओर सुख—यह त्रेताका धर्म है। रजोगुणकी अधिकता, सत्त्वगुणकी न्यूनता, कुछ तमोगुण, और मनमें हर्ष-भयका मिश्रण—यह द्वापरका धर्म है।
तामस बहुत रजोगुन थोरा। कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा॥बुध जुग धर्म जानि मन माहीं। तजि अधर्म रति धर्म कराहीं॥॥३॥
तमोगुणकी अधिकता, रजोगुणकी न्यूनता और चारों ओर वैर-विरोध—यही कलियुगका प्रभाव है। पर बुद्धिमान् लोग युगधर्मको भलीभाँति पहचानकर अधर्मको त्यागकर धर्ममें ही अपनी प्रीति लगाते हैं।
काल धर्म नहिं ब्यापहिं ताही। रघुपति चरन प्रीति अति जाही॥नट कृत बिकट कपट खगराया। नट सेवकहि न ब्यापइ माया॥॥४॥
जिसका श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें गहरा प्रेम है, उसे युगधर्मका प्रभाव छू भी नहीं पाता। हे पक्षिराज! जैसे बाजीगरका किया इन्द्रजाल देखनेवालोंके लिये अत्यन्त विकट लगता है, पर उसीके सहायकको उसकी माया छल नहीं पाती, वैसे ही भगवद्भक्तको संसारकी माया नहीं छलती।
हरि माया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहिं।भजिअ राम तजि काम सब अस बिचारि मन माहिं॥१०४(क)॥
श्रीहरिकी मायासे उत्पन्न सारे दोष और गुण उनके भजनके बिना कभी दूर नहीं होते। यह मनमें विचारकर सारी कामनाएँ त्यागकर निष्कामभावसे श्रीरामका ही भजन करना चाहिये।
तेहि कलिकाल बरष बहु बसेउँ अवध बिहगेस।परेउ दुकाल बिपति बस तब मैं गयउँ बिदेस॥१०४(ख)॥
हे पक्षिराज! उसी कलिकालमें मैं बहुत वर्षोंतक अयोध्यामें रहा। एक बार वहाँ भयंकर अकाल पड़ा, तो विपत्तिका मारा मैं परदेस चला गया।
गयउँ उजेनी सुनु उरगारी। दीन मलीन दरिद्र दुखारी॥गए काल कछु संपति पाई। तहँ पुनि करउँ संभु सेवकाई॥॥१॥
हे सर्पशत्रु! मैं दीन, उदास, दरिद्र और दुखी होकर उज्जैन पहुँचा। कुछ समय बाद जब थोड़ी सम्पत्ति जुट गयी, तो वहीं मैं फिर शिवजीकी सेवामें लग गया।
बिप्र एक बैदिक सिव पूजा। करइ सदा तेहि काजु न दूजा॥परम साधु परमारथ बिंदक। संभु उपासक नहिं हरि निंदक॥॥२॥
वहाँ एक विद्वान् ब्राह्मण नित्य वेदविधिसे शिवजीकी आराधना करते थे, उन्हें और कोई काम न था। वे परम साधु, परमार्थके ज्ञाता और शिवके भक्त तो थे, पर श्रीहरिकी कभी निन्दा नहीं करते थे।
तेहि सेवउँ मैं कपट समेता। द्विज दयाल अति नीति निकेता॥बाहिज नम्र देखि मोहि साईं। बिप्र पढ़ाव पुत्र की नाईं॥॥३॥
मैं भीतरसे कपट रखते हुए भी उनकी सेवा करता रहा। वे ब्राह्मण अत्यन्त दयालु और नीतिवान् थे। हे स्वामी! ऊपरसे नम्र देखकर वे मुझे अपने पुत्रकी तरह मानकर पढ़ाने लगे।
संभु मंत्र मोहि द्विजबर दीन्हा। सुभ उपदेस बिबिध बिधि कीन्हा॥जपउँ मंत्र सिव मंदिर जाई। हृदयँ दंभ अहमिति अधिकाई॥॥४॥
उन श्रेष्ठ ब्राह्मणने मुझे शिवमन्त्र दिया और भाँति-भाँतिका शुभ उपदेश दिया। मैं शिवमन्दिर जाकर मन्त्र जपने लगा, पर मेरे हृदयमें दम्भ और अहंकार और बढ़ता गया।
मैं खल मल संकुल मति नीच जाति बस मोह।हरि जन द्विज देखें जरउँ करउँ बिष्नु कर द्रोह॥१०५(क)॥
मैं दुष्ट, नीच जातिका और पापसे भरी मलिन बुद्धिवाला था—हरिभक्तों और ब्राह्मणोंको देखते ही मोहवश जल उठता और भगवान् विष्णुसे द्वेष करने लगता।
गुर नित मोहि प्रबोध दुखित देखि आचरन मम।मोहि उपजइ अति क्रोध दंभिहि नीति कि भावई॥१०५(ख)॥
गुरुजी मेरा आचरण देखकर दुखी होते और मुझे नित्य समझाते रहते, पर इसका उलटा असर होता—मुझे भारी क्रोध आ जाता। दम्भीको भला नीतिकी बात कब सुहाती है!
एक बार गुर लीन्ह बोलाई। मोहि नीति बहु भाँति सिखाई॥सिव सेवा कर फल सुत सोई। अबिरल भगति राम पद होई॥॥१॥
एक दिन गुरुजीने मुझे बुलाकर बड़े स्नेहसे समझाया कि हे पुत्र! शिवजीकी सेवाका सच्चा फल तो यही है कि श्रीरामके चरणोंमें अटूट भक्ति बने।
रामहि भजहिं तात सिव धाता। नर पावँर कै केतिक बाता॥जासु चरन अज सिव अनुरागी। तासु द्रोहँ सुख चहसि अभागी॥॥२॥
हे तात! स्वयं शिवजी और ब्रह्माजी तक श्रीरामको भजते हैं, तो नीच मनुष्यकी बिसात ही क्या! जिनके चरणोंके ब्रह्मा-शिव भी अनुरागी हैं, उनसे बैर बाँधकर तू, अभागे, सुख चाहता है?
हर कहुँ हरि सेवक गुर कहेऊ। सुनि खगनाथ हृदय मम दहेऊ॥अधम जाति मैं बिद्या पाएँ। भयउँ जथा अहि दूध पिआएँ॥॥३॥
गुरुजीने जब शिवजीको भी हरिका सेवक बता दिया, तो हे पक्षिराज! यह सुनते ही मेरा हृदय जल उठा। नीच जातिका होकर भी विद्या पाकर मैं वैसा ही हो गया जैसे साँप दूध पिलानेसे और विषैला हो जाता है।
मानी कुटिल कुभाग्य कुजाती। गुर कर द्रोह करउँ दिनु राती॥अति दयाल गुर स्वल्प न क्रोधा। पुनि पुनि मोहि सिखाव सुबोधा॥॥४॥
अभिमानी, कुटिल, दुर्भाग्यशाली और नीच जातिका मैं दिन-रात गुरुजीसे द्रोह करता रहा। पर वे अत्यन्त दयालु थे, उन्हें रत्तीभर भी क्रोध न आता—मेरे द्रोहके बावजूद वे बार-बार मुझे सद्बुद्धिकी ही शिक्षा देते रहते।
जेहि ते नीच बड़ाई पावा। सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा॥धूम अनल संभव सुनु भाई। तेहि बुझाव घन पदवी पाई॥॥५॥
नीच व्यक्ति जिससे मान-सम्मान पाता है, अन्ततः उसीको मारकर नष्ट कर देता है। हे भाई! सुनो, जैसे आगसे उपजा धुआँ बादलका रूप पाकर उसी आगको बुझा देता है।
रज मग परी निरादर रहई। सब कर पद प्रहार नित सहई॥मरुत उड़ाव प्रथम तेहि भरई। पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई॥॥६॥
धूल राहमें बेकद्र पड़ी रहती है और सबकी ठोकरें सहती है, पर जब हवा उसे उड़ाकर ऊँचा उठाती है, तो सबसे पहले वह उसी हवाको भर देती है और फिर राजाओंकी आँखों और मुकुटोंतक जा पहुँचती है।
सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा। बुध नहिं करहिं अधम कर संगा॥कबि कोबिद गावहिं असि नीती। खल सन कलह न भल नहिं प्रीती॥॥७॥
हे पक्षिराज! इस बात को समझकर बुद्धिमान् लोग नीचका साथ कभी नहीं करते। कवि और विद्वान् यही नीति बताते हैं कि दुष्टसे न झगड़ा भला है, न प्रेम।
उदासीन नित रहिअ गोसाईं। खल परिहरिअ स्वान की नाईं॥मैं खल हृदयँ कपट कुटिलाई। गुर हित कहइ न मोहि सोहाई॥॥८॥
हे गोसाईं! दुष्टसे सदा उदासीन ही रहना चाहिये, उसे कुत्तेकी तरह दूरसे ही छोड़ देना चाहिये। मैं भी दुष्ट था, मेरे हृदयमें कपट और कुटिलता भरी थी, इसीलिये गुरुजीकी हितकी बातें भी मुझे भाती नहीं थीं।
एक बार हर मंदिर जपत रहेउँ सिव नाम।गुर आयउ अभिमान तें उठि नहिं कीन्ह प्रनाम॥१०६(क)॥
एक बार मैं शिवमन्दिरमें शिवनाम जप रहा था, तभी गुरुजी वहाँ आये—पर अभिमानके मारे मैंने उठकर उन्हें प्रणाम तक नहीं किया।
सो दयाल नहिं कहेउ कछु उर न रोष लवलेस।अति अघ गुर अपमानता सहि नहिं सके महेस॥१०६(ख)॥
गुरुजी बड़े दयालु थे, उन्होंने कुछ नहीं कहा और उनके मनमें रत्तीभर भी रोष नहीं आया। पर गुरुका अपमान इतना बड़ा पाप है कि स्वयं महादेवजी भी इसे सहन नहीं कर सके।
मंदिर माझ भई नभ बानी। रे हतभाग्य अग्य अभिमानी॥जद्यपि तव गुर कें नहिं क्रोधा। अति कृपाल चित सम्यक बोधा॥॥१॥
मन्दिरमें आकाशवाणी गूँज उठी—अरे हतभाग्य, मूर्ख, अभिमानी! यद्यपि तेरे गुरुको क्रोध नहीं आया, वे अत्यन्त कृपालु और पूर्ण ज्ञानसे सम्पन्न हैं,
तदपि साप सठ दैहउँ तोही। नीति बिरोध सोहाइ न मोही॥जौं नहिं दंड करौं खल तोरा। भ्रष्ट होइ श्रुतिमारग मोरा॥॥२॥
फिर भी हे मूर्ख! मैं तुझे शाप दिये बिना नहीं रहूँगा, क्योंकि नीतिका उल्लंघन मुझे सह्य नहीं। अरे दुष्ट, यदि मैं तुझे दण्ड न दूँ तो मेरा अपना वेदमार्ग ही भ्रष्ट हो जायगा।
जे सठ गुर सन इरिषा करहीं। रौरव नरक कोटि जुग परहीं॥त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा। अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा॥॥३॥
जो मूर्ख गुरुसे ईर्ष्या करते हैं, वे करोड़ों युगोंतक रौरव नरकमें पड़े रहते हैं। फिर वहाँसे निकलकर पशु-पक्षी योनियोंमें जन्म लेकर दस हज़ार जन्मोंतक कष्ट भोगते हैं।
बैठ रहेसि अजगर इव पापी। सर्प होहि खल मल मति ब्यापी॥महा बिटप कोटर महुँ जाई।। रहु अधमाधम अधगति पाई॥॥४॥
अरे पापी! तू गुरुके सामने अजगरकी तरह निश्चेष्ट बैठा रहा—अब तेरी बुद्धि पापसे इतनी ढक चुकी है कि तू सर्प बनकर रह। और अरे अधमसे भी अधम! इस नीच योनिको पाकर किसी बड़े वृक्षके खोखलेमें जा बस।
हाहाकार कीन्ह गुर दारुन सुनि सिव साप।कंपित मोहि बिलोकि अति उर उपजा परिताप॥१०७(क)॥
शिवजीका यह भयानक शाप सुनकर गुरुजी हाहाकार कर उठे। मुझे थर-थर काँपते देखकर उनके हृदयमें गहरा सन्ताप उमड़ आया।
करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख कर जोरि।बिनय करत गदगद स्वर समुझि घोर गति मोरि॥१०७(ख)॥
वे ब्राह्मण प्रेमसहित दण्डवत् करके शिवजीके सामने हाथ जोड़े खड़े हो गये और मेरी भयंकर गतिका विचार करते हुए गद्गद स्वरमें विनती करने लगे—
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विंभुं ब्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं॥निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरींह। चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं॥॥१॥
हे मोक्षस्वरूप, सर्वव्यापी, ब्रह्मस्वरूप, वेदस्वरूप ईशान! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। निजस्वरूपमें स्थित, निर्गुण, भेदरहित, इच्छारहित, चेतन-आकाशरूप और आकाशको ही वस्त्र बनाकर धारण करनेवाले आपको मैं भजता हूँ।
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं॥करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोऽहं॥॥२॥
निराकार, ओंकारके मूल, तुरीय अवस्थारूप, वाणी-ज्ञान-इन्द्रियोंसे परे, कैलासपति, विकराल किन्तु महाकालके भी काल, कृपालु और गुणोंके धाम, संसारसे परे रहनेवाले आपको मैं नमन करता हूँ।
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं॥स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा॥॥३॥
हिमाचलके समान गौर और गम्भीर, जिनके शरीरमें करोड़ों कामदेवोंकी आभा है, जिनकी जटाओंमें सुन्दर गंगा लहरा रही है, ललाटपर द्वितीयाका चन्द्रमा और कण्ठमें सर्प सुशोभित है।
चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं॥मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥॥४॥
जिनके कानोंमें कुण्डल हिलते हैं, सुन्दर भौंहें और विशाल नेत्र हैं, जो प्रसन्नमुख, नीलकण्ठ और दयालु हैं, सिंहचर्म पहने और मुण्डमाला धारण किये हैं—उन सर्वप्रिय, सबके स्वामी शंकरको मैं भजता हूँ।
प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं॥त्रयःशूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं॥॥५॥
प्रचण्ड, श्रेष्ठ, तेजस्वी परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान, तीनों तापोंको जड़से मिटानेवाले, त्रिशूलधारी—भावसे ही जिन्हें पाया जा सकता है, उन भवानीपतिको मैं भजता हूँ।
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्जनान्ददाता पुरारी॥चिदानंदसंदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥॥६॥
कलाओंसे परे, कल्याणस्वरूप, प्रलयकारी, सज्जनोंको सदा आनन्द देनेवाले, त्रिपुरारि, सच्चिदानन्दघन, मोहका नाश करनेवाले कामदेवके शत्रु—हे प्रभो! प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये।
न यावदुमानाथ पादारविन्दं। भजन्तीह लोके परे वा नराणां॥न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं॥॥७॥
जबतक मनुष्य पार्वतीपति आपके चरणकमलोंकी भक्ति नहीं करता, तबतक न इस लोकमें और न परलोकमें उसे सुख-शान्ति मिलती है, न उसके तापोंका नाश होता है। इसलिये हे समस्त प्राणियोंमें बसनेवाले प्रभो! प्रसन्न होइये।
न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं॥जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो॥॥८॥
न मुझे योग आता है, न जप, न पूजा—मैं तो सदा-सर्वदा बस आपको ही नमस्कार करता हूँ। हे शम्भो! जरा और जन्म-मृत्युके दुःखोंसे झुलसते हुए इस शरणागतकी रक्षा कीजिये, हे ईश!
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति॥९॥
यह रुद्राष्टक शिवजीको प्रसन्न करनेके लिये किसी ब्राह्मणके द्वारा रचा गया है। जो मनुष्य इसे भक्तिपूर्वक पढ़ते हैं, उनपर स्वयं भगवान् शम्भु प्रसन्न होते हैं।
सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि बिप्र अनुरागु।पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु॥१०८(क)॥
सर्वज्ञ शिवजीने उस ब्राह्मणकी विनती सुनी और उसका प्रेम देखा, तो मन्दिरमें फिर आकाशवाणी हुई—हे श्रेष्ठ द्विज! अब कोई वर माँग लो।
जौं प्रसन्न प्रभु मो पर नाथ दीन पर नेहु।निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहु॥१०८(ख)॥
ब्राह्मणने कहा—हे प्रभो! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और इस दीनपर आपका स्नेह है, तो पहले अपने चरणोंकी भक्ति दीजिये, फिर दूसरा वर देनेकी बात कीजियेगा।
तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भुलान।तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपा सिंधु भगवान॥१०८(ग)॥
हे प्रभो! यह अबोध जीव आपकी मायाके वशीभूत होकर सदा भटकता फिरता है। हे कृपासागर भगवान्! उसपर क्रोध मत कीजिये।
संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल।साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल॥१०८(घ)॥
हे दीनदयालु शंकर! अब इसपर कृपा कीजिये, जिससे हे नाथ! शीघ्र ही इसे शापसे मुक्ति मिल जाय।
एहि कर होइ परम कल्याना। सोइ करहु अब कृपानिधाना॥बिप्रगिरा सुनि परहित सानी। एवमस्तु इति भइ नभबानी॥॥१॥
इसका जिसमें परम कल्याण हो, हे कृपानिधान! अब वही कीजिये। ब्राह्मणकी परहित-भावसे भरी यह वाणी सुनकर पुनः आकाशवाणी हुई—एवमस्तु, ऐसा ही होगा।
जदपि कीन्ह एहिं दारुन पापा। मैं पुनि दीन्ह कोप करि सापा॥तदपि तुम्हार साधुता देखी। करिहउँ एहि पर कृपा बिसेषी॥॥२॥
यद्यपि इसने भयंकर पाप किया और मैंने क्रोधमें आकर इसे शाप भी दे दिया, फिर भी तुम्हारी साधुता देखकर मैं इसपर विशेष कृपा करूँगा।
छमासील जे पर उपकारी। ते द्विज मोहि प्रिय जथा खरारी॥मोर श्राप द्विज ब्यर्थ न जाइहि। जन्म सहस अवस्य यह पाइहि॥॥३॥
हे द्विज! जो क्षमाशील और परोपकारी हैं, वे मुझे साक्षात् श्रीरामके समान प्रिय हैं। मेरा शाप व्यर्थ नहीं जायगा, यह हज़ार जन्म अवश्य भोगेगा।
जनमत मरत दुसह दुख होई। अहि स्वल्पउ नहिं ब्यापिहि सोई॥कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना। सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना॥॥४॥
पर जन्म-मृत्युका जो असह्य कष्ट होता है, वह इसे छू भी नहीं पायेगा, और किसी भी जन्ममें इसका ज्ञान लुप्त नहीं होगा। हे शूद्र! मेरा यह सत्य वचन ध्यानसे सुन—
रघुपति पुरीं जन्म तब भयऊ। पुनि तें मम सेवाँ मन दयऊ॥पुरी प्रभाव अनुग्रह मोरें। राम भगति उपजिहि उर तोरें॥॥५॥
तेरा जन्म श्रीरघुनाथजीकी नगरीमें हुआ, और फिर तूने मेरी सेवामें मन लगाया। इस पुरीके प्रभाव और मेरी कृपासे तेरे हृदयमें रामभक्ति अवश्य जागेगी।
सुनु मम बचन सत्य अब भाई। हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई॥अब जनि करहि बिप्र अपमाना। जानेहु संत अनंत समाना॥॥६॥
हे भाई! अब मेरा यह सत्य वचन सुन—ब्राह्मणकी सेवा ही भगवान्को प्रसन्न करनेवाला सबसे बड़ा व्रत है। अब कभी किसी विप्रका अपमान मत करना, और संतोंको सदा भगवान्के समान ही समझना।
इंद्र कुलिस मम सूल बिसाला। कालदंड हरि चक्र कराला॥जो इन्ह कर मारा नहिं मरई। बिप्रद्रोह पावक सो जरई॥॥७॥
इन्द्रके वज्र, मेरे विशाल त्रिशूल, कालदण्ड और श्रीहरिके भयंकर चक्रसे भी जो न मरे, वह भी ब्राह्मणद्रोहरूपी अग्निमें अवश्य भस्म हो जाता है।
अस बिबेक राखेहु मन माहीं। तुम्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥औरउ एक आसिषा मोरी। अप्रतिहत गति होइहि तोरी॥॥८॥
ऐसा विवेक सदा मनमें बनाये रखना, फिर संसारमें तुम्हारे लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं रहेगा। और एक आशीर्वाद और लो—तुम्हारी गति सर्वत्र निर्बाध होगी।
सुनि सिव बचन हरषि गुर एवमस्तु इति भाषि।मोहि प्रबोधि गयउ गृह संभु चरन उर राखि॥१०९(क)॥
आकाशवाणीके रूपमें शिवजीके ये वचन सुनकर गुरुजी हर्षित हो उठे। "एवमस्तु" कहकर उन्होंने मुझे बहुत समझाया और शिवजीके चरणोंको हृदयमें धारण किये अपने घर लौट गये।
प्रेरित काल बिधि गिरि जाइ भयउँ मैं ब्याल।पुनि प्रयास बिनु सो तनु जजेउँ गएँ कछु काल॥१०९(ख)॥
कालकी प्रेरणासे मैं विन्ध्याचल पर्वतपर जाकर सर्प बना। फिर कुछ समय बीतनेपर बिना किसी कठिनाईके ही मैंने वह शरीर त्याग दिया।
जोइ तनु धरउँ तजउँ पुनि अनायास हरिजान।जिमि नूतन पट पहिरइ नर परिहरइ पुरान॥१०९(ग)॥
हे हरिवाहन! इसके बाद जो भी शरीर मैं धारण करता, उसे उतनी ही सहजतासे त्याग देता, जैसे मनुष्य पुराना वस्त्र उतारकर नया धारण कर लेता है।
सिव राखी श्रुति नीति अरु मैं नहिं पावा क्लेस।एहि बिधि धरेउँ बिबिध तनु ग्यान न गयउ खगेस॥१०९(घ)॥
शिवजीने वेदकी मर्यादा भी बनाये रखी और मुझे कोई कष्ट भी नहीं हुआ। हे पक्षिराज! इस तरह मैंने अनेक शरीर धारण किये, पर हर बार मेरा ज्ञान बना रहा, कभी लुप्त नहीं हुआ।
त्रिजग देव नर जोइ तनु धरउँ। तहँ तहँ राम भजन अनुसरऊँ॥एक सूल मोहि बिसर न काऊ। गुर कर कोमल सील सुभाऊ॥॥१॥
तिर्यक् योनि, देवता या मनुष्यका जो भी शरीर धारण करता, वहाँ-वहाँ मैं श्रीरामजीका भजन जारी रखता। पर एक शूल मुझे कभी नहीं भूलता — गुरुजीका वह कोमल, सुशील स्वभाव, जिनका मैंने अपमान किया था।
चरम देह द्विज के मैं पाई। सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गाई॥खेलउँ तहूँ बालकन्ह मीला। करउँ सकल रघुनायक लीला॥॥२॥
अन्ततः मैंने ब्राह्मणका अन्तिम शरीर पाया, जिसे वेद-पुराण देवताओंको भी दुर्लभ बताते हैं। उस जन्ममें भी जब मैं बालकोंके साथ खेलता, तो खेल-खेलमें भी श्रीरघुनाथजीकी ही लीलाएँ किया करता।
प्रौढ़ भए मोहि पिता पढ़ावा। समझउँ सुनउँ गुनउँ नहिं भावा॥मन ते सकल बासना भागी। केवल राम चरन लय लागी॥॥३॥
सयाना होनेपर पिताजी मुझे पढ़ाने लगे। मैं समझता, सुनता और सोचता ज़रूर, पर पढ़ाई मुझे कभी अच्छी नहीं लगी—मेरे मनसे सारी वासनाएँ छूट चुकी थीं, अब बस श्रीरामके चरणोंमें ही लगन थी।
कहु खगेस अस कवन अभागी। खरी सेव सुरधेनुहि त्यागी॥प्रेम मगन मोहि कछु न सोहाई। हारे पिता पढ़ाइ पढ़ाई॥॥४॥
हे गरुड़जी! बताइये, ऐसा कौन अभागा होगा जो कामधेनुको छोड़कर गदहीकी सेवा करे? मैं प्रेममें इतना डूबा रहता कि कुछ और सुहाता ही नहीं—पिताजी पढ़ा-पढ़ाकर आख़िर हार मान गये।
भए कालबस जब पितु माता। मैं बन गयउँ भजन जनत्राता॥जहँ जहँ बिपिन मुनीस्वर पावउँ। आश्रम जाइ जाइ सिरु नावउँ॥॥५॥
जब माता-पिता कालके वश हो गये, तो मैं भक्तवत्सल श्रीरामके भजनके लिये वनकी ओर निकल पड़ा। जहाँ-जहाँ मुझे मुनियोंके आश्रम मिलते, वहाँ-वहाँ जाकर मैं श्रद्धासे सिर झुकाता।
बूझत तिन्हहि राम गुन गाहा। कहहिं सुनउँ हरषित खगनाहा॥सुनत फिरउँ हरि गुन अनुबादा। अब्याहत गति संभु प्रसादा॥॥६॥
मैं उनसे श्रीरामकी गुणगाथाएँ पूछता, वे सुनाते और मैं हर्षित होकर सुनता रहता। इस तरह हरिगुणगान सुनते हुए घूमता रहता—शिवजीकी कृपासे कहीं भी मेरी गति रुकती नहीं थी।
छूटी त्रिबिध ईषना गाढ़ी। एक लालसा उर अति बाढ़ी॥राम चरन बारिज जब देखौं। तब निज जन्म सफल करि लेखौं॥॥७॥
पुत्र, धन और मानकी गहरी वासनाएँ मुझसे छूट चुकी थीं, हृदयमें बस एक ही लालसा प्रबल हो गयी थी—श्रीरामके चरणकमलोंका दर्शन पा लूँ तो अपना जन्म सफल मानूँ।
जेहि पूँछउँ सोइ मुनि अस कहई। ईस्वर सर्ब भूतमय अहई॥निर्गुन मत नहिं मोहि सोहाई। सगुन ब्रह्म रति उर अधिकाई॥॥८॥
जिससे भी मैं पूछता, वह मुनि यही कहता कि ईश्वर तो सर्वभूतमय है। पर यह निर्गुण मत मुझे कभी नहीं जँचा—मेरे हृदयमें सगुण ब्रह्मके प्रति प्रेम ही बढ़ता जाता था।
गुर के बचन सुरति करि राम चरन मनु लाग।रघुपति जस गावत फिरउँ छन छन नव अनुराग॥११०(क)॥
गुरुजीके वचन याद करके मेरा मन श्रीरामके चरणोंमें रम गया, और मैं क्षण-प्रतिक्षण नया-नया प्रेम पाते हुए श्रीरघुनाथजीका यशोगान करता फिरने लगा।
मेरु सिखर बट छायाँ मुनि लोमस आसीन।देखि चरन सिरु नायउँ बचन कहेउँ अति दीन॥११०(ख)॥
सुमेरु पर्वतके शिखरपर एक बरगदकी छायामें लोमश मुनि विराजमान थे। उन्हें देखकर मैंने चरणोंमें सिर झुकाया और बड़ी दीनतासे अपनी बात कही।
सुनि मम बचन बिनीत मृदु मुनि कृपाल खगराज।मोहि सादर पूँछत भए द्विज आयहु केहि काज॥११०(ग)॥
हे पक्षिराज! मेरे विनम्र और कोमल वचन सुनकर कृपालु मुनि आदरपूर्वक पूछने लगे—हे ब्राह्मण! तुम यहाँ किस प्रयोजनसे आये हो?
तब मैं कहा कृपानिधि तुम्ह सर्बग्य सुजान।सगुन ब्रह्म अवराधन मोहि कहहु भगवान॥११०(घ)॥
तब मैंने कहा—हे कृपानिधि! आप सर्वज्ञ और सुजान हैं। हे भगवन्! मुझे सगुण ब्रह्मकी आराधनाका मार्ग बतलाइये।
तब मुनीस रघुपति गुन गाथा। कहे कछुक सादर खगनाथा॥ब्रह्मग्यान रत मुनि बिग्यानि। मोहि परम अधिकारी जानी॥॥१॥
तब हे पक्षिराज! उन मुनिवरने आदरपूर्वक श्रीरामकी कुछ गुणगाथाएँ सुनायीं। फिर ब्रह्मज्ञानमें रत उन विज्ञानी मुनिने मुझे इसका सच्चा अधिकारी मानकर—
लागे करन ब्रह्म उपदेसा। अज अद्वेत अगुन हृदयेसा॥अकल अनीह अनाम अरुपा। अनुभव गम्य अखंड अनूपा॥॥२॥
ब्रह्मका उपदेश देना आरम्भ किया—कि वह अजन्मा, अद्वैत, निर्गुण और सबके हृदयका स्वामी है; इच्छारहित, नामरहित, रूपरहित, केवल अनुभवसे जाना जानेवाला, अखण्ड और अनुपम है।
मन गोतीत अमल अबिनासी। निर्बिकार निरवधि सुख रासी॥सो तें ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहिं बेदा॥॥३॥
वह मन-इन्द्रियोंसे परे, निर्मल, अविनाशी, निर्विकार, असीम और सुखकी राशि है। वेद यही गाते हैं कि वही तू है—जैसे जल और उसकी लहरमें कोई भेद नहीं, वैसे ही उसमें और तुझमें कोई अन्तर नहीं।
बिबिध भाँति मोहि मुनि समुझावा। निर्गुन मत मम हृदयँ न आवा॥पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा। सगुन उपासन कहहु मुनीसा॥॥४॥
मुनिने मुझे कई तरहसे समझाया, पर निर्गुण मत मेरे हृदयमें उतरा ही नहीं। मैंने फिर उनके चरणोंमें सिर झुकाकर कहा—हे मुनीश्वर! अब मुझे सगुणकी उपासना समझाइये।
राम भगति जल मम मन मीना। किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना॥सोइ उपदेस कहहु करि दाया। निज नयनन्हि देखौं रघुराया॥॥५॥
मेरा मन तो रामभक्तिरूपी जलमें मछलीकी तरह रम चुका है, हे प्रवीण मुनीश्वर! फिर वह उससे अलग कैसे हो सकता है? कृपा करके मुझे वही उपाय बताइये जिससे मैं अपनी आँखोंसे श्रीरघुनाथजीको देख सकूँ।
भरि लोचन बिलोकि अवधेसा। तब सुनिहऊँ निर्गुन उपदेसा॥मुनि पुनि कहि हरिकथा अनूपा। खंडि सगुन मत अगुन निरूपा॥॥६॥
पहले नेत्र भरकर श्रीअयोध्यानाथका दर्शन कर लूँ, तब निर्गुणका उपदेश सुनूँगा—मैंने ऐसा कहा। मुनिने फिर अनुपम हरिकथा सुनाकर सगुण मतका खण्डन करते हुए निर्गुणका प्रतिपादन किया।
तब मैं निर्गुन मत कर दूरी। सगुन निरूपउँ करि हठ भूरी॥उत्तर प्रतिउत्तर मैं कीन्हा। मुनि तन भए क्रोध के चीन्हा॥॥७॥
तब मैं निर्गुण मतको परे हटाकर बड़े हठके साथ सगुणका ही समर्थन करने लगा। मेरे बार-बार उत्तर-प्रत्युत्तर देनेसे मुनिके शरीरपर क्रोधके चिह्न उभरने लगे।
सुनु प्रभु बहुत अवग्या किएँ। उपज क्रोध ग्यानिन्ह के हिएँ॥अति संघरषन जौं कर कोई। अनल प्रगट चंदन ते होई॥॥८॥
हे प्रभो! सुनिये, बहुत अधिक अपमानित होनेपर ज्ञानीके हृदयमें भी क्रोध जाग उठता है—जैसे चन्दनकी लकड़ीको बहुत रगड़ा जाय, तो उससे भी आग निकल आती है।
-बारंबार सकोप मुनि करइ निरुपन ग्यान।मैं अपनें मन बैठ तब करउँ बिबिध अनुमान॥१११(क)॥
मुनि बार-बार क्रोधसहित ज्ञानका प्रतिपादन करने लगे। तब मैं बैठे-बैठे अपने मनमें तरह-तरहके अनुमान लगाने लगा—
क्रोध कि द्वेतबुद्धि बिनु द्वैत कि बिनु अग्यान।मायाबस परिछिन्न जड़ जीव कि ईस समान॥१११(ख)॥
क्या द्वैतबुद्धिके बिना क्रोध सम्भव है, और क्या अज्ञानके बिना द्वैतबुद्धि उठ सकती है? क्या मायाके वशीभूत यह सीमित जड़ जीव ईश्वरके समान हो सकता है?
कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें। तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें॥परद्रोही की होहिं निसंका। कामी पुनि कि रहहिं अकलंका॥॥१॥
क्या सबका भला चाहनेवालेको कभी दुःख हो सकता है? जिसके पास पारसमणि हो, क्या वह दरिद्र रह सकता है? क्या दूसरोंसे द्रोह करनेवाला निर्भय रह सकता है, और क्या कामी व्यक्ति निष्कलंक रह सकता है?
बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें। कर्म कि होहिं स्वरूपहि चीन्हें॥काहू सुमति कि खल सँग जामी। सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी॥॥२॥
क्या ब्राह्मणका अहित करनेसे किसीका वंश बचा रह सकता है? क्या आत्मस्वरूपको पहचान लेनेके बाद भी आसक्तिपूर्ण कर्म हो सकते हैं? क्या दुष्टोंकी संगतिसे किसीकी बुद्धि निर्मल हुई है? क्या परस्त्रीगामी कभी उत्तम गति पा सकता है?
भव कि परहिं परमात्मा बिंदक। सुखी कि होहिं कबहुँ हरिनिंदक॥राजु कि रहइ नीति बिनु जानें। अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें॥॥३॥
क्या परमात्माको जाननेवाला फिर जन्म-मृत्युके चक्रमें पड़ सकता है? क्या भगवान्की निन्दा करनेवाला कभी सुखी रह सकता है? क्या नीति जाने बिना राज्य टिक सकता है? और क्या श्रीहरिके चरित्रका बखान करते रहनेपर कोई पाप शेष रह सकता है?
पावन जस कि पुन्य बिनु होई। बिनु अघ अजस कि पावइ कोई॥लाभु कि किछु हरि भगति समाना। जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना॥॥४॥
बिना पुण्यके पवित्र यश कभी मिलता है क्या? बिना पापके भी क्या कभी अपयश मिलता है? और जिसकी महिमा वेद, संत और पुराण सब गाते हैं, उस हरिभक्तिके समान भला कोई दूसरा लाभ भी है क्या?
हानि कि जग एहि सम किछु भाई। भजिअ न रामहि नर तनु पाई॥अघ कि पिसुनता सम कछु आना। धर्म कि दया सरिस हरिजाना॥॥५॥
हे भाई! मनुष्य-शरीर पाकर भी श्रीरामका भजन न करना—इससे बड़ी हानि जगत्में और क्या होगी? चुगली करनेसे बढ़कर कोई पाप है क्या? और हे गरुड़! दयासे बढ़कर कोई धर्म है क्या?
एहि बिधि अमिति जुगुति मन गुनऊँ। मुनि उपदेस न सादर सुनऊँ॥पुनि पुनि सगुन पच्छ मैं रोपा। तब मुनि बोले बचन सकोपा॥॥६॥
इस तरह मैं मनमें अनगिनत तर्क गढ़ता रहता और मुनिका उपदेश आदरसे सुनता ही नहीं था। जब मैंने बार-बार सगुणका ही पक्ष लेकर हठ किया, तो मुनि क्रोधमें भरकर बोले—
मूढ़ परम सिख देउँ न मानसि। उत्तर प्रतिउत्तर बहु आनसि॥सत्य बचन बिस्वास न करही। बायस इव सबही ते डरही॥॥७॥
अरे मूर्ख! मैं तुझे इतनी अच्छी शिक्षा देता हूँ, फिर भी तू नहीं मानता और तर्क-पर-तर्क गढ़ता जाता है। मेरे सत्य वचनपर भी भरोसा नहीं करता—कौएकी तरह हर किसीसे शंकित रहता है!
सठ स्वपच्छ तब हृदयँ बिसाला। सपदि होहि पच्छी चंडाला॥लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई। नहिं कछु भय न दीनता आई॥॥८॥
अरे मूर्ख! तेरे हृदयमें अपने ही पक्षका इतना बड़ा हठ है, तो तू शीघ्र चाण्डाल-पक्षी (कौआ) बन जा। मैंने उनका यह शाप सहर्ष सिर-माथे ले लिया—न कोई भय हुआ, न मनमें कोई दीनता आयी।
तुरत भयउँ मैं काग तब पुनि मुनि पद सिरु नाइ।सुमिरि राम रघुबंस मनि हरषित चलेउँ उड़ाइ॥११२(क)॥
तत्क्षण ही मैं कौआ बन गया। फिर मुनिके चरणोंमें सिर झुकाकर और रघुकुलमणि श्रीरामका स्मरण करते हुए मैं प्रसन्न मन उड़ चला।
उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध।निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध॥११२(ख)॥
हे उमा! जो श्रीरामजीके चरणोंके प्रेमी हैं और काम, अभिमान तथा क्रोधसे रहित हैं, वे जगत्को अपने प्रभुसे भरा हुआ देखते हैं, फिर वे किससे वैर करें?
सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन। उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन॥कृपासिंधु मुनि मति करि भोरी। लीन्हि प्रेम परिच्छा मोरी॥॥१॥
काकभुशुण्डिजी बोले—हे पक्षिराज! सुनिये, इसमें ऋषिका तनिक भी दोष नहीं था। स्वयं रघुकुलभूषण श्रीराम ही सबके हृदयमें यह प्रेरणा भर रहे थे। कृपासागर प्रभुने मुनिकी बुद्धिको ही भुलावा देकर असलमें मेरे प्रेमकी परख ली थी।
मन बच क्रम मोहि निज जन जाना। मुनि मति पुनि फेरी भगवाना॥रिषि मम महत सीलता देखी। राम चरन बिस्वास बिसेषी॥॥२॥
मन-वचन-कर्मसे जब प्रभुने मुझे अपना ही जन माना, तो उन्होंने मुनिकी बुद्धि फिर पलट दी। ऋषिने मेरा वह महान् धीरजभरा स्वभाव और श्रीरामके चरणोंमें मेरी अटूट श्रद्धा देखी,
अति बिसमय पुनि पुनि पछिताई। सादर मुनि मोहि लीन्ह बोलाई॥मम परितोष बिबिध बिधि कीन्हा। हरषित राममंत्र तब दीन्हा॥॥३॥
तो वे बहुत आश्चर्यचकित होकर बार-बार पछताने लगे और आदरपूर्वक मुझे बुला लिया। उन्होंने तरह-तरहसे मुझे संतुष्ट किया और फिर हर्षपूर्वक मुझे राममन्त्र प्रदान किया।
बालकरूप राम कर ध्याना। कहेउ मोहि मुनि कृपानिधाना॥सुंदर सुखद मोहि अति भावा। सो प्रथमहिं मैं तुम्हहि सुनावा॥॥४॥
कृपानिधान मुनिने मुझे बालरूप श्रीरामके ध्यानकी विधि बतायी। वह सुन्दर और सुखद ध्यान मुझे इतना भाया कि मैं वही आपको पहले ही सुना चुका हूँ।
मुनि मोहि कछुक काल तहँ राखा। रामचरितमानस तब भाषा॥सादर मोहि यह कथा सुनाई। पुनि बोले मुनि गिरा सुहाई॥॥५॥
मुनिने मुझे कुछ काल अपने पास रखा और तभी मुझे रामचरितकी यह पूरी कथा सुनायी। आदरपूर्वक यह कथा सुनाकर फिर वे मुझसे मधुर वाणीमें बोले—
रामचरित सर गुप्त सुहावा। संभु प्रसाद तात मैं पावा॥तोहि निज भगत राम कर जानी। ताते मैं सब कहेउँ बखानी॥॥६॥
हे तात! यह सुन्दर और गुह्य रामचरितमानस मैंने शिवजीकी कृपासे ही पाया था। तुम्हें श्रीरामका सच्चा भक्त जानकर ही मैंने यह सब विस्तारसे तुम्हें सुनाया है।
राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं। कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं॥मुनि मोहि बिबिध भाँति समुझावा। मैं सप्रेम मुनि पद सिरु नावा॥॥७॥
हे तात! जिनके हृदयमें रामभक्ति नहीं है, उनके सामने यह कथा कभी मत कहना। मुनिने मुझे इस तरह भाँति-भाँतिसे समझाया, और मैंने प्रेमपूर्वक उनके चरणोंमें सिर झुकाया।
निज कर कमल परसि मम सीसा। हरषित आसिष दीन्ह मुनीसा॥राम भगति अबिरल उर तोरें। बसिहि सदा प्रसाद अब मोरें॥॥८॥
मुनीश्वरने अपने कर-कमलोंसे मेरा सिर छूकर हर्षपूर्वक आशीर्वाद दिया कि अब मेरी कृपासे तेरे हृदयमें सदा अटूट रामभक्ति बसी रहेगी।
सदा राम प्रिय होहु तुम्ह सुभ गुन भवन अमान।कामरूप इच्धामरन ग्यान बिराग निधान॥११३(क)॥
तुम सदा श्रीरामके प्रिय बने रहो, शुभ गुणोंके निरभिमान धाम बनो, इच्छानुसार रूप धारण कर सको, इच्छामृत्युके स्वामी बनो, और ज्ञान-वैराग्यके भण्डार बनो।
जेहिं आश्रम तुम्ह बसब पुनि सुमिरत श्रीभगवंत।ब्यापिहि तहँ न अबिद्या जोजन एक प्रजंत॥११३(ख)॥
इतना ही नहीं, तुम जिस भी आश्रममें भगवान्का स्मरण करते हुए निवास करोगे, वहाँ चारों ओर एक योजनतक अविद्याका साया भी नहीं पड़ेगा।
काल कर्म गुन दोष सुभाऊ। कछु दुख तुम्हहि न ब्यापिहि काऊ॥राम रहस्य ललित बिधि नाना। गुप्त प्रगट इतिहास पुराना॥॥१॥
काल, कर्म, गुण-दोष या स्वभावसे उपजनेवाला कोई भी दुःख तुम्हें कभी नहीं छुएगा। श्रीरामके अनेक सुन्दर रहस्य, जो इतिहास और पुराणोंमें कहीं गुप्त और कहीं प्रकट रूपमें छिपे हैं,
बिनु श्रम तुम्ह जानब सब सोऊ। नित नव नेह राम पद होऊ॥जो इच्छा करिहहु मन माहीं। हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं॥॥२॥
वह सब तुम बिना किसी परिश्रमके जान जाओगे। श्रीरामके चरणोंमें तुम्हारा प्रेम प्रतिदिन नया-नया बना रहे। और मनमें जो भी इच्छा करोगे, हरिकृपासे उसे पाना तुम्हारे लिये कभी दुर्लभ नहीं होगा।
सुनि मुनि आसिष सुनु मतिधीरा। ब्रह्मगिरा भई गगन गँभीरा॥एवमस्तु तव बच मुनि ग्यानी। यह मम भगत कर्म मन बानी॥॥३॥
हे धीरबुद्धि गरुड़! सुनिये, मुनिका यह आशीर्वाद सुनते ही आकाशमें गम्भीर ब्रह्मवाणी गूँज उठी—हे ज्ञानी मुनि! तुम्हारा वचन सत्य होकर रहेगा, क्योंकि यह मन-वचन-कर्मसे मेरा ही भक्त है।
सुनि नभगिरा हरष मोहि भयऊ। प्रेम मगन सब संसय गयऊ॥करि बिनती मुनि आयसु पाई। पद सरोज पुनि पुनि सिरु नाई॥॥४॥
यह आकाशवाणी सुनकर मुझे अपार हर्ष हुआ, मैं प्रेममें डूब गया और मेरा सारा सन्देह जाता रहा। फिर मुनिसे विनती करके, उनकी आज्ञा पाकर, बार-बार उनके चरणकमलोंमें सिर नवाकर—
हरष सहित एहिं आश्रम आयउँ। प्रभु प्रसाद दुर्लभ बर पायउँ॥इहाँ बसत मोहि सुनु खग ईसा। बीते कलप सात अरु बीसा॥॥५॥
मैं प्रसन्नतापूर्वक इसी आश्रममें आ गया, क्योंकि प्रभुकी कृपासे मुझे यह दुर्लभ वरदान मिल चुका था। हे पक्षिराज! सुनिये, यहाँ निवास करते-करते मुझे सत्ताईस कल्प बीत चुके हैं।
करउँ सदा रघुपति गुन गाना। सादर सुनहिं बिहंग सुजाना॥जब जब अवधपुरीं रघुबीरा। धरहिं भगत हित मनुज सरीरा॥॥६॥
मैं यहाँ सदा श्रीरघुनाथजीके गुणोंका गान करता रहता हूँ, और सुजान पक्षी उसे आदरपूर्वक सुनते हैं। जब-जब श्रीरघुवीर भक्तोंके हितके लिये अयोध्यामें मनुष्यरूप धारण करते हैं,
तब तब जाइ राम पुर रहऊँ। सिसुलीला बिलोकि सुख लहऊँ॥पुनि उर राखि राम सिसुरूपा। निज आश्रम आवउँ खगभूपा॥॥७॥
तब-तब मैं वहाँ जाकर रहने लगता हूँ और प्रभुकी बाललीलाएँ देखकर आनन्दमग्न हो जाता हूँ। फिर हे पक्षिराज! उस शिशुरूपको हृदयमें सँजोकर मैं वापस अपने आश्रम लौट आता हूँ।
कथा सकल मैं तुम्हहि सुनाई। काग देह जेहिं कारन पाई॥कहेउँ तात सब प्रस्न तुम्हारी। राम भगति महिमा अति भारी॥॥८॥
इस तरह मैंने वह पूरी कथा तुम्हें सुना दी, जिस कारण मुझे यह काकशरीर मिला। हे तात! तुम्हारे सभी प्रश्नोंका उत्तर मैंने विस्तारसे दे दिया—सचमुच, रामभक्तिकी महिमा अपार है।
ताते यह तन मोहि प्रिय भयउ राम पद नेह।निज प्रभु दरसन पायउँ गए सकल संदेह॥११४(क)॥
इसीलिये यह काकशरीर मुझे प्रिय है, क्योंकि इसीमें मुझे श्रीरामके चरणोंका प्रेम मिला। इसी देहसे मैंने अपने प्रभुका साक्षात् दर्शन पाया और मेरे सारे सन्देह मिट गये।
भगति पच्छ हठ करि रहेउँ दीन्हि महारिषि साप।मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप॥११४(ख)॥
मैं हठपूर्वक भक्तिके पक्षपर अड़ा रहा, जिसके कारण महर्षि लोमशने मुझे शाप दे दिया—पर देखो, उसीका फल यह हुआ कि मुझे वह वरदान मिला जो बड़े-बड़े मुनियोंको भी दुर्लभ है। यही तो भजनका सच्चा प्रताप है।
जे असि भगति जानि परिहरहीं। केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं॥ते जड़ कामधेनु गृह त्यागी। खोजत आकु फिरहिं पय लागी॥॥१॥
जो लोग भक्तिकी यह महिमा जानते हुए भी उसे त्याग देते हैं और केवल ज्ञानके लिये ही साधना करते हैं, वे मूर्ख वैसे ही हैं जैसे घरमें खड़ी कामधेनुको छोड़कर आककी झाड़ीमें दूध खोजते फिरें।
सुनु खगेस हरि भगति बिहाई। जे सुख चाहहिं आन उपाई॥ते सठ महासिंधु बिनु तरनी। पैरि पार चाहहिं जड़ करनी॥॥२॥
हे पक्षिराज! सुनिये, जो लोग हरिभक्तिको छोड़कर सुखके लिये दूसरे उपाय ढूँढ़ते हैं, वे मूर्ख उसी तरह भूल करते हैं जैसे कोई बिना जहाजके ही महासागर तैरकर पार करना चाहे।
सुनि भसुंडि के बचन भवानी। बोलेउ गरुड़ हरषि मृदु बानी॥तव प्रसाद प्रभु मम उर माहीं। संसय सोक मोह भ्रम नाहीं॥॥३॥
भुशुण्डिके ये वचन सुनकर, हे भवानी, गरुड़जी हर्षित हो कोमल स्वरमें बोले—हे प्रभो! आपकी कृपासे अब मेरे हृदयमें न कोई सन्देह बचा, न शोक, न मोह और न भ्रम।
सुनेउँ पुनीत राम गुन ग्रामा। तुम्हरी कृपाँ लहेउँ बिश्रामा॥एक बात प्रभु पूँछउँ तोही। कहहु बुझाइ कृपानिधि मोही॥॥४॥
आपकी कृपासे मैंने श्रीरामके पवित्र गुण सुने और मुझे परम शान्ति मिली। अब हे प्रभो! एक बात और पूछता हूँ—हे कृपासागर! कृपया मुझे समझाकर बतलाइये।
कहहिं संत मुनि बेद पुराना। नहिं कछु दुर्लभ ग्यान समाना॥सोइ मुनि तुम्ह सन कहेउ गोसाईं। नहिं आदरेहु भगति की नाईं॥॥५॥
संत, मुनि, वेद और पुराण सब यही कहते हैं कि ज्ञानके समान दुर्लभ कुछ नहीं। हे गोसाईं! वही ज्ञान उन मुनिने आपको दिया था, पर आपने भक्तिकी तरह उसका आदर नहीं किया—
ग्यानहि भगतिहि अंतर केता। सकल कहहु प्रभु कृपा निकेता॥सुनि उरगारि बचन सुख माना। सादर बोलेउ काग सुजाना॥॥६॥
तो हे कृपानिधान प्रभो! ज्ञान और भक्तिमें आखिर कितना अन्तर है? यह मुझे पूरा बतलाइये। गरुड़जीके ये वचन सुनकर सुजान काकभुशुण्डिजीको बड़ा सुख हुआ, और वे आदरपूर्वक कहने लगे—
भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा। उभय हरहिं भव संभव खेदा॥नाथ मुनीस कहहिं कछु अंतर। सावधान सोउ सुनु बिहंगबर॥॥७॥
भक्ति और ज्ञानमें वस्तुतः कोई भेद नहीं है, दोनों ही संसारसे उपजे क्लेशको दूर करते हैं। पर हे नाथ! मुनिजन इनमें कुछ अन्तर बताते हैं, हे श्रेष्ठ पक्षी! उसे ध्यान लगाकर सुनिये—
ग्यान बिराग जोग बिग्याना। ए सब पुरुष सुनहु हरिजाना॥पुरुष प्रताप प्रबल सब भाँती। अबला अबल सहज जड़ जाती॥॥८॥
हे हरिवाहन! सुनिये, ज्ञान, वैराग्य, योग और विज्ञान—ये सब पुरुष-तत्त्व हैं, और पुरुषका प्रभाव सब तरहसे प्रबल होता है, जबकि माया स्वभावसे ही निर्बल और जन्मजात मूढ़ है।
पुरुष त्यागि सक नारिहि जो बिरक्त मति धीर।न तु कामी बिषयाबस बिमुख जो पद रघुबीर॥११५(क)॥
पर स्त्री (माया) को केवल वही धीरबुद्धि, वैराग्यवान् पुरुष त्याग सकता है—न कि वह कामी जो विषयोंका दास है और श्रीरघुवीरके चरणोंसे विमुख है।
सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि।बिबस होइ हरिजान नारि बिष्नु माया प्रगट॥११५(ख)॥
यहाँतक कि बड़े-बड़े ज्ञानभण्डार मुनि भी किसी मृगनयनी सुन्दरीका मुख देखकर विवश हो उठते हैं। हे गरुड़! असलमें स्त्रीरूपमें साक्षात् भगवान् विष्णुकी माया ही प्रकट होती है।
इहाँ न पच्छपात कछु राखउँ। बेद पुरान संत मत भाषऊँ॥मोह न नारि नारि कें रूपा। पन्नगारि यह रीति अनूपा॥॥१॥
यहाँ मैं किसी पक्षपातसे नहीं, वेद-पुराण और संतोंके मतके आधारपर ही कह रहा हूँ। हे गरुड़! यह भी एक विलक्षण बात है कि एक स्त्री दूसरी स्त्रीके रूपपर कभी मोहित नहीं होती।
माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ। नारि बर्ग जानइ सब कोऊ॥पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी। माया खलु नर्तकी बिचारी॥॥२॥
सुनिये, माया और भक्ति—ये दोनों ही स्त्रीरूप मानी गयी हैं, यह सब जानते हैं। पर श्रीरघुवीरको भक्ति ही प्रिय है, जबकि बेचारी माया तो निरी नर्तकीके समान है।
भगतिहि सानुकूल रघुराया। ताते तेहि डरपति अति माया॥राम भगति निरुपम निरुपाधी। बसइ जासु उर सदा अबाधी॥॥३॥
श्रीरघुनाथजी भक्तिपर विशेष कृपा रखते हैं, इसीलिये माया उससे सदा भयभीत रहती है। जिसके हृदयमें उपमारहित, निर्मल रामभक्ति निर्बाध रूपसे बस जाती है,
तेहि बिलोकि माया सकुचाई। करि न सकइ कछु निज प्रभुताई॥अस बिचारि जे मुनि बिग्यानी। जाचहीं भगति सकल सुख खानी॥॥४॥
उसे देखते ही माया सकुचाकर पीछे हट जाती है, उसपर अपना कोई प्रभाव नहीं जमा पाती। यही समझकर ज्ञानी मुनि भी अन्ततः सब सुखोंकी खान भक्तिकी ही याचना करते हैं।
यह रहस्य रघुनाथ कर बेगि न जानइ कोई।जो जानइ रघुपति कृपाँ सपनेहुँ मोह न होइ॥११६(क)॥
श्रीरघुनाथजीका यह रहस्य कोई भी जल्दी नहीं समझ पाता। पर जो उनकी कृपासे इसे जान लेता है, उसे स्वप्नमें भी मोह नहीं सताता।
औरउ ग्यान भगति कर भेद सुनहु सुप्रबीन।जो सुनि होइ राम पद प्रीति सदा अबिछीन॥११६(ख)॥
हे सुचतुर गरुड़! अब ज्ञान और भक्तिका एक और भेद सुनिये, जिसे सुनकर श्रीरामके चरणोंमें तुम्हारा प्रेम सदाके लिये अटूट हो जायगा।
सुनहु तात यह अकथ कहानी। समुझत बनइ न जाइ बखानी॥ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥॥१॥
हे तात! यह कथा इतनी सूक्ष्म है कि इसे शब्दोंमें पूरी तरह बाँधा नहीं जा सकता, केवल अनुभवसे ही समझी जा सकती है—जीव ईश्वरका ही अंश है, इसलिये वह भी अविनाशी, चेतन, निर्मल और स्वभावतः आनन्दस्वरूप है।
सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाई॥जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई॥॥२॥
पर हे गोसाईं! वही जीव मायाके वशीभूत होकर वैसे ही बँध जाता है जैसे तोता या बन्दर अपनी ही करतूतसे फँस जाता है। इस तरह जड़ और चेतनके बीच एक गाँठ पड़ जाती है, और यद्यपि वह गाँठ मिथ्या ही है, फिर भी उसे खोलना कठिन हो जाता है।
तब ते जीव भयउ संसारी। छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी॥श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई॥॥३॥
तभीसे जीव संसारके चक्रमें बँध जाता है—न वह गाँठ खुलती है, न उसे सुख मिलता है। वेद और पुराणोंने इसके अनेक उपाय बताये हैं, पर वह गाँठ छूटनेके बजाय उलटे और उलझती चली जाती है।
जीव हृदयँ तम मोह बिसेषी। ग्रंथि छूट किमि परइ न देखी॥अस संजोग ईस जब करई। तबहुँ कदाचित सो निरुअरई॥॥४॥
जीवके हृदयमें अज्ञानका इतना गहरा अन्धकार छाया रहता है कि वह गाँठ उसे दिखायी ही नहीं देती, फिर खुले तो कैसे? जब कभी ईश्वर स्वयं ऐसा शुभ संयोग बनाते हैं, तभी कहीं वह गाँठ खुल पाती है।
सात्त्विक श्रद्धा धेनु सुहाई। जौं हरि कृपाँ हृदयँ बस आई॥जप तप ब्रत जम नियम अपारा। जे श्रुति कह सुभ धर्म अचारा॥॥५॥
यदि हरिकी कृपासे सात्त्विकी श्रद्धारूपी सुन्दर गौ हृदयके आँगनमें आ बसे, तो शास्त्रोंमें बताये गये अनगिनत जप, तप, व्रत, यम-नियम जैसे शुभ धर्माचार—
