प्रथम सोपान — भाग 4
बालकाण्ड
शिव-पार्वती संवाद, श्रीराम जन्म, बाल-लीला एवं श्रीसीता स्वयंवर की कथा।
बालकाण्ड — सुनें
बालकाण्ड — पढ़ें भी, सुनें भी
शिव-पार्वती संवाद, श्रीराम जन्म, बाल-लीला एवं श्रीसीता स्वयंवर की कथा।
यह कथा शीघ्र ही यहाँ सुनने हेतु भी उपलब्ध होगी
आनि देखाई नारदहि भूपति राजकुमारि।कहहु नाथ गुन दोष सब एहि के हृदयँ बिचारि॥१३०॥
राजा ने राजकुमारी को लाकर नारद को दिखाया — हे नाथ, आप हृदय में विचारकर इसके सारे गुण-दोष बताइए।
देखि रूप मुनि बिरति बिसारी। बड़ी बार लगि रहे निहारी॥लच्छन तासु बिलोकि भुलाने। हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने॥॥१॥
उसका रूप देखकर मुनि अपना वैराग्य भूल गए, बहुत देर तक उसे निहारते ही रह गए। उसके लक्षण देखकर वे मोहित हो गए, पर हृदय का हर्ष प्रकट नहीं होने दिया।
जो एहि बरइ अमर सोइ होई। समरभूमि तेहि जीत न कोई॥सेवहिं सकल चराचर ताही। बरइ सीलनिधि कन्या जाही॥॥२॥
जो इससे विवाह करेगा, वह अमर हो जाएगा, समरभूमि में उसे कोई नहीं जीत सकेगा। सारे चराचर उसकी सेवा करेंगे, जिससे शीलनिधि की यह कन्या विवाह करेगी।
लच्छन सब बिचारि उर राखे। कछुक बनाइ भूप सन भाषे॥सुता सुलच्छन कहि नृप पाहीं। नारद चले सोच मन माहीं॥॥३॥
सारे लक्षण विचारकर मन में रख लिए, और राजा से कुछ अपनी ओर से बनाकर कह दिया — कन्या के गुण-लक्षण बताकर नारद वहाँ से चल दिए, पर मन में एक चिंता लिए हुए।
करौं जाइ सोइ जतन बिचारी। जेहि प्रकार मोहि बरै कुमारी॥जप तप कछु न होइ तेहि काला। हे बिधि मिलइ कवन बिधि बाला॥॥४॥
सोच-विचारकर अब मैं वही उपाय करूँ, जिससे यह कुमारी मुझे ही वरे। इस समय जप-तप से तो कुछ काम बनेगा नहीं, हे विधाता, यह बाला किस उपाय से मिलेगी।
एहि अवसर चाहिअ परम सोभा रूप बिसाल।जो बिलोकि रीझै कुअँरि तब मेलै जयमाल॥१३१॥
इस अवसर पर परम शोभा और विशाल रूप चाहिए, जिसे देखकर कुमारी रीझ जाए और तभी जयमाला पहना दे।
हरि सन मागौं सुंदरताई। होइहि जात गहरु अति भाई॥मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ। एहि अवसर सहाय सोइ होऊ॥॥१॥
क्यों न मैं हरि से सुंदरता माँग लूँ — पर भाई, वहाँ जाने में तो बहुत देर हो जाएगी। मेरे हित के लिए हरि के समान कोई नहीं, इस अवसर पर वे ही सहायक हो सकते हैं।
बहुबिधि बिनय कीन्हि तेहि काला। प्रगटेउ प्रभु कौतुकी कृपाला॥प्रभु बिलोकि मुनि नयन जुड़ाने। होइहि काजु हिएँ हरषाने॥॥२॥
उस समय उन्होंने बहुत प्रकार से विनती की, तब कौतुकी कृपालु प्रभु प्रकट हो गए। प्रभु को देखकर मुनि के नेत्र शीतल हो गए, हृदय में हर्षित होकर सोचा — अब मेरा कार्य सिद्ध होगा।
अति आरति कहि कथा सुनाई। करहु कृपा करि होहु सहाई॥आपन रूप देहु प्रभु मोही। आन भाँति नहिं पावौं ओही॥॥३॥
उन्होंने अत्यंत आर्तभाव से सारी कथा कह सुनाई — कृपा कीजिए, सहायक बनिए। हे प्रभु, मुझे अपना ही रूप दीजिए, अन्यथा मुझे वह कन्या नहीं मिल पाएगी।
जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा। करहु सो बेगि दास मैं तोरा॥निज माया बल देखि बिसाला। हियँ हँसि बोले दीनदयाला॥॥४॥
हे नाथ, जिस प्रकार मेरा हित हो, वही शीघ्र कीजिए, मैं आपका दास हूँ। अपनी विशाल माया-शक्ति दिखाकर दीनदयालु प्रभु हृदय में मुस्कराकर बोले —
जेहि बिधि होइहि परम हित नारद सुनहु तुम्हार।सोइ हम करब न आन कछु बचन न मृषा हमार॥१३२॥
हे नारद, सुनो, जिस प्रकार तुम्हारा परम हित होगा, हम वही करेंगे, अन्य कुछ नहीं। हमारा वचन कभी असत्य नहीं होता।
कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी। बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी॥एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ। कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ॥॥१॥
सुनो हे योगी मुनि, जैसे व्याकुल रोगी कुपथ्य माँगे तो वैद्य उसे नहीं देता — इसी प्रकार मैंने भी तुम्हारा हित ही किया है — यह कहकर प्रभु अंतर्धान हो गए।
माया बिबस भए मुनि मूढ़ा। समुझी नहिं हरि गिरा निगूढ़ा॥गवने तुरत तहाँ रिषिराई। जहाँ स्वयंबर भूमि बनाई॥॥२॥
माया के वश होकर मूढ़ मुनि हरि की गूढ़ वाणी को समझ न सके। वे तुरंत वहाँ चल दिए, जहाँ स्वयंवर की भूमि सजाई गई थी।
निज निज आसन बैठे राजा। बहु बनाव करि सहित समाजा॥मुनि मन हरष रूप अति मोरें। मोहि तजि आनहि बारिहि न भोरें॥॥३॥
सभी राजा अपने-अपने आसनों पर बहुत सज-धजकर समाज सहित बैठे थे। मुनि के मन में हर्ष था — मेरा रूप अत्यंत सुंदर है, कन्या मुझे छोड़कर भूल से भी किसी और को नहीं वरेगी।
मुनि हित कारन कृपानिधाना। दीन्ह कुरूप न जाइ बखाना॥सो चरित्र लखि काहुँ न पावा। नारद जानि सबहिं सिर नावा॥॥४॥
कृपानिधान प्रभु ने मुनि के हित के लिए ही उन्हें ऐसा कुरूप दे दिया था, जिसका वर्णन नहीं हो सकता। उस लीला को कोई भी समझ नहीं पाया, केवल नारद जानकर सबको सिर नवाते फिरे।
रहे तहाँ दुइ रुद्र गन ते जानहिं सब भेउ।बिप्रबेष देखत फिरहिं परम कौतुकी तेऊ॥१३३॥
वहाँ शिवजी के दो गण भी उपस्थित थे, जो सारा भेद जानते थे। वे ब्राह्मण-वेष धारण किए, बड़े कौतुक से वहाँ घूम रहे थे।
जेहिं समाज बैठे मुनि जाई। हृदयँ रूप अहमिति अधिकाई॥तहँ बैठ महेस गन दोऊ। बिप्रबेष गति लखइ न कोऊ॥॥१॥
जिस सभा में मुनि जाकर बैठे, उनके हृदय में अपने रूप का बड़ा अभिमान था। वहीं शिवजी के दोनों गण भी बैठे थे, ब्राह्मण-वेष में होने के कारण कोई उनकी असली पहचान नहीं जान सका।
करहिं कूटि नारदहि सुनाई। नीकि दीन्हि हरि सुंदरताई॥रीझहि राजकुअँरि छबि देखी। इन्हहि बरिहि हरि जानि बिसेषी॥॥२॥
वे नारद से चुपके-चुपके ठिठोली करने लगे — हरि ने आपको अच्छी सुंदरता दी है! राजकुमारी आपकी छवि देखकर रीझ जाएगी, और विशेष रूप से आपको ही पहचानकर वरेगी।
मुनिहि मोह मन हाथ पराएँ। हँसहिं संभु गन अति सचु पाएँ॥जदपि सुनहिं मुनि अटपटि बानी। समुझि न परइ बुद्धि भ्रम सानी॥॥३॥
मुनि का मन इस मोह से बिल्कुल हाथ से निकल गया था, शिवजी के गण यह देखकर बहुत सुखी होकर हँसते रहे। यद्यपि मुनि उनकी उलटी-सीधी बातें सुनते रहे, पर बुद्धि भ्रम में सनी होने के कारण कुछ समझ न पाए।
काहुँ न लखा सो चरित बिसेषा। सो सरूप नृपकन्याँ देखा॥मर्कट बदन भयंकर देही। देखत हृदयँ क्रोध भा तेही॥॥४॥
कोई भी उस विशेष लीला को नहीं समझ सका। राजकुमारी ने जब उन्हें देखा, तो उनका असली रूप दिखाई दिया — बंदर के मुख जैसी भयंकर देह देखकर उसके हृदय में क्रोध उत्पन्न हुआ।
सखीं संग लै कुअँरि तब चलि जनु राजमराल।देखत फिरइ महीप सब कर सरोज जयमाल॥१३४॥
सखियों को साथ लेकर कुमारी तब राजहंसिनी के समान चलने लगी, हाथ में कमल जैसी जयमाला लिए, सभी राजाओं को निहारती फिरी।
जेहि दिसि बैठे नारद फूली। सो दिसि तेहिं न बिलोकी भूली॥पुनि पुनि मुनि उकसहिं अकुलाहीं। देखि दसा हर गन मुसकाहीं॥॥१॥
जिस दिशा में नारद फूले हुए बैठे थे, राजकुमारी भूलकर भी उस दिशा की ओर नहीं देख रही थी। मुनि बार-बार उतावले होकर व्याकुल हो रहे थे, उनकी यह दशा देखकर शिवजी के गण मुस्कराते रहे।
धरि नृपतनु तहँ गयउ कृपाला। कुअँरि हरषि मेलेउ जयमाला॥दुलहिनि लै गे लच्छिनिवासा। नृपसमाज सब भयउ निरासा॥॥२॥
कृपालु प्रभु ने वहाँ राजा का सुंदर रूप धारण करके पहुँचे, कुमारी ने हर्षित होकर उन्हें ही जयमाला पहना दी। लक्ष्मीनिवास दुल्हन को लेकर चले गए, और सारा राजसमाज निराश हो गया।
मुनि अति बिकल मोंहँ मति नाठी। मनि गिरि गई छूटि जनु गाँठी॥तब हर गन बोले मुसुकाई। निज मुख मुकुर बिलोकहु जाई॥॥३॥
मुनि अत्यंत विकल हो उठे, उनकी बुद्धि भी भ्रमित हो गई, मानो गाँठ खुल जाने से मणि पर्वत से गिर पड़ी हो। तब शिवजी के गण मुस्कराते हुए बोले — जाकर अपना मुख दर्पण में तो देखिए।
अस कहि दोउ भागे भय भारी। बदन दीख मुनि बारि निहारी॥बेषु बिलोकि क्रोध अति बाढ़ा। तिन्हहि सराप दीन्ह अति गाढ़ा॥॥४॥
यह कहकर वे दोनों बड़े भय से भाग खड़े हुए, और मुनि ने जल में देखकर अपना मुख निहारा। अपना वेष देखकर उनका क्रोध बहुत बढ़ गया, और उन्होंने उन दोनों गणों को अत्यंत कठोर शाप दे दिया।
होहु निसाचर जाइ तुम्ह कपटी पापी दोऊ।हँसेहु हमहि सो लेहु फल बहुरि हँसेहु मुनि कोउ॥१३५॥
तुम दोनों कपटी-पापी निशाचर होकर जन्म लो — जाओ! तुमने हमारी हँसी उड़ाई थी, इसी का फल भोगो; फिर कभी किसी मुनि की हँसी मत उड़ाना।
पुनि जल दीख रूप निज पावा। तदपि हृदयँ संतोष न आवा॥फरकत अधर कोप मन माहीं। सपदी चले कमलापति पाहीं॥॥१॥
फिर जल में उन्होंने अपना असली रूप देखा, पर फिर भी हृदय में संतोष नहीं आया। क्रोध से होंठ फड़कते हुए, वे तुरंत ही कमलापति के पास चल दिए।
देह श्राप कि मरिहउँ जाई। जगत मोर उपहास कराई॥बीचहिं पंथ मिले दनुजारी। संग रमा सोइ राजकुमारी॥॥२॥
यह शाप दूँ या जाकर मर ही जाऊँ, संसार में मेरी हँसी उड़वाने वाले को! रास्ते में ही उन्हें दैत्यों के शत्रु विष्णु मिले, साथ में वही राजकुमारी बनी लक्ष्मी थीं।
बोले मधुर बचन सुरसाईं। मुनि कहँ चले बिकल की नाईं॥सुनत बचन उपजा अति क्रोधा। माया बस न रहा मन बोधा॥॥३॥
देवताओं के स्वामी विष्णु ने मधुर वचन कहे — हे मुनि, आप ऐसे व्याकुल होकर कहाँ चले? यह वचन सुनते ही नारद को अत्यंत क्रोध आया, माया के वश उनके मन में बुद्धि न रही।
पर संपदा सकहु नहिं देखी। तुम्हरें इरिषा कपट बिसेषी॥मथत सिंधु रुद्रहि बौरायहु। सुरन्ह प्रेरी बिष पान करायहु॥॥४॥
तुम दूसरे की संपत्ति देख ही नहीं सकते, तुम्हें विशेष रूप से ईर्ष्या और कपट भरा स्वभाव है। तुमने समुद्र-मंथन में शिवजी को भी विष पिलाकर व्याकुल कर दिया था, देवताओं को उकसाकर।
असुर सुरा बिष संकरहि आपु रमा मनि चारु।स्वारथ साधक कुटिल तुम्ह सदा कपट ब्यवहारु॥१३६॥
असुरों को मदिरा, शिवजी को विष, और स्वयं सुंदर लक्ष्मी और मणि तुमने ले ली — तुम सदा स्वार्थ-साधक, कुटिल और कपटपूर्ण व्यवहार करने वाले हो।
परम स्वतंत्र न सिर पर कोई। भावई मनहि करहु तुम्ह सोई॥भलेहि मंद मंदेहि भल करहू। बिसमय हरष न हियँ कछु धरहू॥॥१॥
तुम्हारे सिर पर कोई नियंत्रण नहीं, तुम पूर्ण स्वतंत्र होकर जो मन में आए वही करते हो। भले को बुरा और बुरे को भला बना देते हो, तुम्हारे हृदय में न विस्मय होता है, न हर्ष।
डहकि डहकि परिचेहु सब काहू। अति असंक मन सदा उछाहू॥करम सुभासुभ तुम्हहि न बाधा। अब लगि तुम्हहि न काहूँ साधा॥॥२॥
तुमने सबको बहला-फुसलाकर धोखा दिया है, तुम्हारा मन सदा निडर और उत्साहित रहता है। शुभ-अशुभ कर्मों का बंधन तुम्हें नहीं रोकता, अब तक किसी ने तुम्हें साधा नहीं है।
भले भवन अब बायन दीन्हा। पावहुगे फल आपन कीन्हा॥बंचेहु मोहि जवनि धरि देहा। सोइ तनु धरहु श्राप मम एहा॥॥३॥
अब भले घर में तुमने यह छल-भरा उपहार दिया है, अपने ही किए का फल तुम पाओगे। तुमने जिस रूप में मुझे ठगा है, यह मेरा शाप है कि तुम स्वयं वही रूप धारण करो —
कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी। करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी॥मम अपकार कीन्ह तुम्ह भारी। नारी बिरहँ तुम्ह होब दुखारी॥॥४॥
तुमने मुझे बंदर की आकृति दी थी, इसलिए अब बंदर ही तुम्हारी सहायता करेंगे। तुमने मेरा भारी अपकार किया है, इसलिए तुम भी स्त्री के वियोग में दुखी होओगे।
श्राप सीस धरि हरषि हियँ प्रभु बहु बिनती कीन्हि।निज माया के प्रबलता करषि कृपानिधि लीन्हि॥१३७॥
प्रभु ने वह शाप हर्षित हृदय से सिर चढ़ाकर स्वीकार किया, और बहुत विनती की; अपनी माया की प्रबलता समेटकर कृपानिधान ने उसे वापस ले लिया।
जब हरि माया दूरि निवारी। नहिं तहँ रमा न राजकुमारी॥तब मुनि अति सभीत हरि चरना। गहे पाहि प्रनतारति हरना॥॥१॥
जब हरि ने अपनी माया दूर हटाई, तो वहाँ न लक्ष्मी थीं, न राजकुमारी। तब मुनि अत्यंत भयभीत होकर हरि के चरण पकड़कर बोले — हे शरणागत की पीड़ा हरने वाले, मेरी रक्षा कीजिए।
मृषा होउ मम श्राप कृपाला। मम इच्छा कह दीनदयाला॥मैं दुर्बचन कहे बहुतेरे। कह मुनि पाप मिटिहिं किमि मेरे॥॥२॥
हे कृपालु, मेरा यह शाप मिथ्या हो जाए — दीनदयालु प्रभु बोले, यह तो मेरी ही इच्छा थी। मैंने तो तुम्हें बहुत दुर्वचन कहे थे, मुनि ने कहा, अब मेरे पाप कैसे मिटेंगे?
जपहु जाइ संकर सत नामा। होइहि हृदयँ तुरंत बिश्रामा॥कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरें। असि परतीति तजहु जनि भोरें॥॥३॥
जाकर शिवजी के सौ नाम जपो, तुम्हारे हृदय को तुरंत शांति मिलेगी। मुझे शिवजी के समान कोई प्रिय नहीं, इस विश्वास को भूलकर भी मत त्यागना।
जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी। सो न पाव मुनि भगति हमारी॥अस उर धरि महि बिचरहु जाई। अब न तुम्हहि माया निअराई॥॥४॥
जिस पर त्रिपुरारि कृपा नहीं करते, वह मुनि हमारी भक्ति भी नहीं पा सकता — यह हृदय में धारण कर पृथ्वी पर विचरण करो, अब तुम्हें माया निकट नहीं आएगी।
बहुबिधि मुनिहि प्रबोधि प्रभु तब भए अंतरधान।सत्यलोक नारद चले करत राम गुन गान॥१३८॥
प्रभु ने मुनि को बहुत प्रकार से समझाकर तब अंतर्धान हो गए; नारदजी राम के गुण गाते हुए सत्यलोक की ओर चल दिए।
हर गन मुनिहि जात पथ देखी। बिगतमोह मन हरष बिसेषी॥अति सभीत नारद पहिं आए। गहि पद आरत बचन सुनाए॥॥१॥
शिवजी के गणों ने मुनि को मार्ग में जाते देखा, तो मोह से मुक्त होकर उनका मन विशेष रूप से हर्षित हुआ। अत्यंत भयभीत होकर वे नारद के पास आए, और उनके चरण पकड़कर दीन वचन कहे।
हर गन हम न बिप्र मुनिराया। बड़ अपराध कीन्ह फल पाया॥श्राप अनुग्रह करहु कृपाला। बोले नारद दीनदयाला॥॥२॥
हे मुनिराज, हम ब्राह्मण नहीं हैं, हमने बड़ा अपराध किया, जिसका यह फल पाया। हे कृपालु, अब शाप और अनुग्रह दोनों आप ही कीजिए — तब दीनदयालु नारद बोले।
निसिचर जाइ होहु तुम्ह दोऊ। बैभव बिपुल तेज बल होऊ॥भुज बल बिस्व जितब तुम्ह जहिआ। धरिहहिं बिष्नु मनुज तनु तहिआ॥॥३॥
तुम दोनों जाकर राक्षस बनो, महान वैभव, तेज और बल पाओ। जब तुम अपनी भुजाओं के बल से सारे विश्व को जीत लोगे, तब विष्णु मनुष्य-शरीर धारण करेंगे।
समर मरन हरि हाथ तुम्हारा। होइहहु मुकुत न पुनि संसारा॥चले जुगल मुनि पद सिर नाई। भए निसाचर कालहि पाई॥॥४॥
युद्ध में हरि के ही हाथों तुम्हारी मृत्यु होगी, और तब तुम मुक्त हो जाओगे, फिर संसार में नहीं भटकोगे। दोनों गण मुनि के चरणों में सिर नवाकर चले, और समय आने पर राक्षस होकर जन्मे।
एक कलप एहि हेतु प्रभु लीन्ह मनुज अवतार।सुर रंजन सज्जन सुखद हरि भंजन भुबि भार॥१३९॥
एक कल्प में इसी कारण प्रभु ने मनुष्य-अवतार लिया — देवताओं को आनंद देने वाला, सज्जनों को सुख देने वाला, और पृथ्वी का भार हरने वाला।
एहि बिधि जनम करम हरि केरे। सुंदर सुखद बिचित्र घनेरे॥कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं। चारु चरित नानाबिधि करहीं॥॥१॥
इस प्रकार हरि के जन्म और कर्म सुंदर, सुखदायी और अत्यंत विचित्र हैं। प्रत्येक कल्प में प्रभु अवतार लेते हैं और नाना प्रकार की सुंदर लीलाएँ करते हैं।
तब तब कथा मुनीसन्ह गाई। परम पुनीत प्रबंध बनाई॥बिबिध प्रसंग अनूप बखाने। करहिं न सुनि आचरजु सयाने॥॥२॥
उस-उस कल्प की कथाएँ मुनीश्वरों ने गाई हैं, और परम पवित्र ग्रंथों में उन्हें रचा है। विविध अनुपम प्रसंगों का वर्णन सुनकर बुद्धिमान लोग आश्चर्य नहीं करते।
हरि अनंत हरिकथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥रामचंद्र के चरित सुहाए। कलप कोटि लगि जाहिं न गाए॥॥३॥
हरि अनंत हैं, और उनकी कथाएँ भी अनंत हैं, सभी संत उन्हें अनेक प्रकार से कहते-सुनते हैं। रामचंद्र के सुंदर चरित्र तो करोड़ों कल्पों में भी पूरी तरह नहीं गाए जा सकते।
यह प्रसंग मैं कहा भवानी। हरिमायाँ मोहहिं मुनि ग्यानी॥प्रभु कौतुकी प्रनत हितकारी।। सेवत सुलभ सकल दुख हारी॥॥४॥
हे भवानी, यह प्रसंग मैंने इसलिए कहा कि हरि की माया ज्ञानी मुनियों को भी मोहित कर देती है। प्रभु कौतुकी, शरणागत का हित करने वाले, सेवा करने में सुलभ और सबका दुःख हरने वाले हैं।
सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल।अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि॥१४०॥
देवता, मनुष्य या मुनि — कोई भी ऐसा नहीं जिसे यह प्रबल मोह-माया न घेरे। यही सोचकर मन-ही-मन उस महामाया के स्वामी की ही उपासना करनी चाहिए।
अपर हेतु सुनु सैलकुमारी। कहउँ बिचित्र कथा बिस्तारी॥जेहि कारन अज अगुन अरूपा। ब्रह्म भयउ कोसलपुर भूपा॥॥१॥
हे शैलकुमारी, अब एक और कारण सुनो, यह विचित्र कथा मैं विस्तार से कहता हूँ — जिस कारण अजन्मा, निर्गुण और निराकार ब्रह्म ने अयोध्यापुरी के भूषण के रूप में जन्म लिया।
जो प्रभु बिपिन फिरत तुम्ह देखा। बंधु समेत धरें मुनिबेषा॥जासु चरित अवलोकि भवानी। सती सरीर रहिहु बौरानी॥॥२॥
जिस प्रभु को तुमने वन में फिरते देखा था, भाई सहित मुनि-वेष धारण किए हुए, जिनका चरित्र देखकर तुम सती-शरीर में मोहित हो गई थीं —
अजहुँ न छाया मिटति तुम्हारी। तासु चरित सुनु भ्रम रुज हारी॥लीला कीन्हि जो तेहिं अवतारा। सो सब कहिहउँ मति अनुसारा॥॥३॥
आज भी तुम्हारी उसकी छाया पूरी तरह नहीं मिटी है — उन्हीं का वह चरित्र सुनो, जो भ्रम-रोग को हरने वाला है। उस अवतार में उन्होंने जो लीला की, वह सब मैं अपनी बुद्धि के अनुसार कहूँगा।
भरद्वाज सुनि संकर बानी। सकुचि सप्रेम उमा मुसकानी॥लगे बहुरि बरने बृषकेतू। सो अवतार भयउ जेहि हेतू॥॥४॥
भरद्वाज मुनि शिवजी की यह वाणी सुनकर, और उमा भी सकुचाकर प्रेमपूर्वक मुस्कराईं। वृषकेतु फिर उस अवतार का वर्णन करने लगे, जिस कारण से वह हुआ था।
सो मैं तुम्ह सन कहऊँ सबु सुनु मुनीस मन लाइ।राम कथा कलि मल हरनि मंगल करनि सुहाइ॥१४१॥
वही मैं तुम्हें सुनाता हूँ, हे मुनीश्वर, मन लगाकर सुनो — यह राम-कथा कलियुग के पापों को हरने वाली और सुंदर मंगल करने वाली है।
स्वायंभू मनु अरु सतरूपा। जिन्ह तें भै नरसृष्टि अनूपा॥दंपति धरम आचरन नीका। अजहुँ गाव श्रुति जिन्ह कै लीका॥॥१॥
स्वायंभुव मनु और शतरूपा, जिनसे यह अनुपम मानव-सृष्टि उत्पन्न हुई — उस दंपति का धर्माचरण इतना उत्तम था कि आज भी वेद उनकी कीर्ति गाते हैं।
नृप उत्तानपाद सुत तासू। ध्रुव हरि भगत भयउ सुत जासू॥लघु सुत नाम प्रिय्रब्रत ताही। बेद पुरान प्रसंसहि जाही॥॥२॥
राजा उत्तानपाद उन्हीं के पुत्र थे, जिनके पुत्र ध्रुव प्रसिद्ध हरिभक्त हुए। उनके छोटे पुत्र का नाम प्रियव्रत था, जिनकी वेद-पुराण भी प्रशंसा करते हैं।
देवहूति पुनि तासु कुमारी। जो मुनि कर्दम कै प्रिय नारी॥आदिदेव प्रभु दीनदयाला। जठर धरेउ जेहिं कपिल कृपाला॥॥३॥
फिर देवहूति उन्हीं मनु की पुत्री थीं, जो मुनि कर्दम की प्रिय पत्नी बनीं। आदिदेव, दीनदयालु प्रभु ने उन्हीं के गर्भ से कृपालु कपिल के रूप में जन्म लिया।
सांख्य सास्त्र जिन्ह प्रगट बखाना। तत्व बिचार निपुन भगवाना॥तेहिं मनु राज कीन्ह बहु काला। प्रभु आयसु सब बिधि प्रतिपाला॥॥४॥
उन्होंने ही सांख्य-शास्त्र का प्रकट रूप से प्रवचन किया, वे तत्त्व-विचार में निपुण भगवान थे। उन्हीं मनु ने बहुत काल तक राज्य किया, और प्रभु की आज्ञा का हर प्रकार से पालन किया।
होइ न बिषय बिराग भवन बसत भा चौथपन।हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु॥१४२॥
घर में रहते-रहते जब बुढ़ापे की चौथी अवस्था आई, तब भी विषयों से वैराग्य नहीं हुआ। उनके हृदय में बड़ा दुःख हुआ — यह सारा जन्म हरिभक्ति के बिना ही बीत गया।
बरबस राज सुतहि तब दीन्हा। नारि समेत गवन बन कीन्हा॥तीरथ बर नैमिष बिख्याता। अति पुनीत साधक सिधि दाता॥॥१॥
तब उन्होंने बलपूर्वक राज्य पुत्र को सौंप दिया, और पत्नी सहित वन को चल दिए। वहाँ विख्यात नैमिषारण्य तीर्थ था, जो अत्यंत पवित्र और साधकों को सिद्धि देने वाला था।
बसहिं तहाँ मुनि सिद्ध समाजा। तहँ हियँ हरषि चलेउ मनु राजा॥पंथ जात सोहहिं मतिधीरा। ग्यान भगति जनु धरें सरीरा॥॥२॥
वहाँ मुनियों और सिद्धों का समाज निवास करता था, यह जानकर राजा मनु हृदय में हर्षित होकर वहाँ चल दिए। मार्ग में जाते हुए वे धीर बुद्धि वाले ऐसे शोभा पा रहे थे मानो ज्ञान और भक्ति ने ही शरीर धारण कर लिया हो।
पहुँचे जाइ धेनुमति तीरा। हरषि नहाने निरमल नीरा॥आए मिलन सिद्ध मुनि ग्यानी। धरम धुरंधर नृपरिषि जानी॥॥३॥
जाकर वे गोमती नदी के तट पर पहुँचे, हर्षित होकर निर्मल जल में स्नान किया। धर्मधुरंधर राजर्षि जानकर सिद्ध और ज्ञानी मुनि उनसे मिलने आए।
जहँ जहँ तीरथ रहे सुहाए। मुनि सकल सादर करवाए॥कृस सरीर मुनिपट परिधाना। सत समाज नित सुनहिं पुराना॥॥४॥
जहाँ-जहाँ सुंदर तीर्थ थे, मुनियों ने आदरपूर्वक सब कराए। दुबले शरीर पर मुनियों जैसा वस्त्र धारण किए, वे नित्य संत-समाज में पुराण सुनते रहे।
द्वादस अच्छर मंत्र पुनि जपहिं सहित अनुराग।बासुदेव पद पंकरुह दंपति मन अति लाग॥१४३॥
फिर वे बारह अक्षर के मंत्र को अनुराग सहित जपते, दंपति का मन वासुदेव के चरण-कमलों में अत्यंत लीन रहता।
करहिं अहार साक फल कंदा। सुमिरहिं ब्रह्म सच्चिदानंदा॥पुनि हरि हेतु करन तप लागे। बारि अधार मूल फल त्यागे॥॥१॥
वे साग-फल-कंद का ही आहार करते और सच्चिदानंद ब्रह्म का स्मरण करते रहते। फिर हरि की प्राप्ति के लिए तप करने लगे, केवल जल पर रहकर मूल-फल का भी त्याग कर दिया।
उर अभिलाष निरंतर होई। देखिअ नयन परम प्रभु सोई॥अगुन अखंड अनंत अनादी। जेहि चिंतहिं परमारथबादी॥॥२॥
उनके हृदय में निरंतर यही अभिलाषा रहती — काश अपनी आँखों से उन्हीं परम प्रभु का दर्शन हो जाए। जो निर्गुण, अखंड, अनंत और अनादि हैं, जिन्हें परमार्थवादी ही चिंतन कर पाते हैं —
नेति नेति जेहि बेद निरूपा। निजानंद निरुपाधि अनूपा॥संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना। उपजहिं जासु अंस तें नाना॥॥३॥
जिन्हें वेद नेति-नेति कहकर ही निरूपित करते हैं, जो अपने आनंद में स्थित, निरुपाधि और अनुपम हैं। शिव, ब्रह्मा और विष्णु भगवान भी जिनके अंश से अनेक रूपों में उत्पन्न होते हैं —
ऐसेउ प्रभु सेवक बस अहई। भगत हेतु लीलातनु गहई॥जौं यह बचन सत्य श्रुति भाषा। तौ हमार पूजहि अभिलाषा॥॥४॥
ऐसे प्रभु भी अपने सेवक के वश में रहते हैं, भक्तों के लिए ही वे लीला-शरीर धारण करते हैं। यदि यह वेद-वचन सत्य है, तो हमारी भी यह अभिलाषा अवश्य पूरी होगी।
एहि बिधि बीतें बरष षट सहस बारि आहार।संबत सप्त सहस्त्र पुनि रहे समीर अधार॥१४४॥
इस प्रकार पाँच सौ वर्ष केवल जल पीकर बीत गए, फिर सात हजार वर्ष तक वे केवल वायु के सहारे रहे।
बरष सहस दस त्यागेउ सोऊ। ठाढ़े रहे एक पद दोऊ॥बिधि हरि हर तप देखि अपारा। मनु समीप आए बहु बारा॥॥१॥
फिर दस हजार वर्ष तक उन्होंने वह भी त्याग दिया, और एक पैर पर खड़े रहकर तप किया। ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी उनका अपार तप देखकर मनु के पास कई बार आए।
मागहु बर बहु भाँति लोभाए। परम धीर नहिं चलहिं चलाए॥अस्थिमात्र होइ रहे सरीरा। तदपि मनाग मनहिं नहिं पीरा॥॥२॥
उन्होंने अनेक प्रकार से वरदान माँगने का लोभ दिखाया, पर परम धैर्यवान मनु अपने संकल्प से टस से मस न हुए। उनका शरीर हड्डी मात्र रह गया, फिर भी मन में तनिक भी पीड़ा न हुई।
प्रभु सर्बग्य दास निज जानी। गति अनन्य तापस नृप रानी॥मागु मागु बरु भै नभ बानी। परम गभीर कृपामृत सानी॥॥३॥
प्रभु ने उन्हें अपना ही सच्चा दास और अनन्य शरणागत तपस्वी राजा-रानी जानकर, आकाश से अत्यंत गंभीर और कृपा-अमृत में सनी वाणी हुई — माँगो, माँगो, वर माँगो।
मृतक जिआवनि गिरा सुहाई। श्रवन रंध्र होइ उर जब आई॥॥४॥
वह मृतक को भी जीवित करने वाली मधुर वाणी जब कानों के छिद्रों से होकर हृदय में पहुँची —
ह्रष्टपुष्ट तन भए सुहाए। मानहुँ अबहिं भवन ते आए॥
वे हृष्ट-पुष्ट और सुंदर शरीर पाकर मानो अभी-अभी अपने घर से लौट आए हों।
श्रवन सुधा सम बचन सुनि पुलक प्रफुल्लित गात।बोले मनु करि दंडवत प्रेम न हृदयँ समात॥१४५॥
कानों को अमृत जैसी लगने वाली उस वाणी को सुनकर, रोमांचित और प्रफुल्लित शरीर से, मनु ने दंडवत प्रणाम करते हुए कहा — हृदय में प्रेम समाया नहीं जा रहा।
सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनु। बिधि हरि हर बंदित पद रेनू॥सेवत सुलभ सकल सुख दायक। प्रनतपाल सचराचर नायक॥॥१॥
हे सेवकों के लिए कल्पवृक्ष और कामधेनु समान प्रभु, ब्रह्मा-विष्णु-शिव भी जिनकी चरण-रज की वंदना करते हैं। सेवा करने में सुलभ, सबको सुख देने वाले, शरणागत की रक्षा करने वाले, सारे चराचर के स्वामी —
जौं अनाथ हित हम पर नेहू। तौ प्रसन्न होइ यह बर देहू॥जो सरूप बस सिव मन माहीं। जेहि कारन मुनि जतन कराहीं॥॥२॥
यदि अनाथों के हित के लिए आपका हम पर स्नेह है, तो प्रसन्न होकर यही वरदान दीजिए — जो रूप शिवजी के मन में सदा बसा रहता है, जिसके लिए मुनि तप करते हैं,
जो भुसुंडि मन मानस हंसा। सगुन अगुन जेहि निगम प्रसंसा॥देखहिं हम सो रूप भरि लोचन। कृपा करहु प्रनतारति मोचन॥॥३॥
जो काकभुशुंडि के मानस-सरोवर में हंस के समान क्रीड़ा करता है, जिसे वेद सगुण और निर्गुण दोनों रूपों में सराहते हैं — वही रूप, हे शरणागत की पीड़ा हरने वाले, कृपा करके हमें नेत्र भरकर दिखाइए।
दंपति बचन परम प्रिय लागे। मृदुल बिनीत प्रेम रस पागे॥भगत बछल प्रभु कृपानिधाना। बिस्वबास प्रगटे भगवाना॥॥४॥
दंपति के ये कोमल, विनम्र और प्रेम-रस में डूबे वचन प्रभु को अत्यंत प्रिय लगे। भक्तवत्सल कृपानिधान, संसार के आधार भगवान प्रकट हो गए।
नील सरोरुह नील मनि नील नीरधर स्याम।लाजहिं तन सोभा निरखि कोटि कोटि सत काम॥१४६॥
नीले कमल, नीलमणि और नीले बादल के समान श्याम वर्ण था, जिसकी शोभा को देखकर करोड़ों कामदेव भी लजा जाएँ।
सरद मयंक बदन छबि सींवा। चारु कपोल चिबुक दर ग्रीवा॥अधर अरुन रद सुंदर नासा। बिधु कर निकर बिनिंदक हासा॥॥१॥
शरद ऋतु के चंद्रमा जैसा सुंदर मुख था, सुंदर कपोल, ठोड़ी और शंख जैसी ग्रीवा। लाल होंठ, सुंदर दाँत, सुंदर नासिका, और चंद्रमा की किरणों को भी लज्जित करने वाली मुस्कान।
नव अबुंज अंबक छबि नीकी। चितवनि ललित भावँती जी की॥भुकुटि मनोज चाप छबि हारी। तिलक ललाट पटल दुतिकारी॥॥२॥
नए कमल जैसे सुंदर नेत्र थे, जिनकी चितवन अत्यंत मनोहर और मन को भाने वाली थी। भौंहें कामदेव के धनुष की छटा को भी मात करने वाली थीं, ललाट पर तिलक की आभा शोभा दे रही थी।
कुंडल मकर मुकुट सिर भ्राजा। कुटिल केस जनु मधुप समाजा॥उर श्रीबत्स रुचिर बनमाला। पदिक हार भूषन मनिजाला॥॥३॥
मकर के आकार के कुंडल और मुकुट सिर पर सुशोभित थे, घुँघराले केश मानो भँवरों का समूह हों। वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न और सुंदर वनमाला थी, पदक, हार और मणियों के आभूषण थे।
केहरि कंधर चारु जनेउ। बाहु बिभूषन सुंदर तेऊ॥करि कर सरि सुभग भुजदंडा। कटि निषंग कर सर कोदंडा॥॥४॥
गले में सिंह जैसी सुदृढ़ गर्दन पर सुंदर यज्ञोपवीत था, भुजाओं पर भी वैसे ही सुंदर आभूषण थे। हाथी की सूँड़ जैसी सुंदर लंबी भुजाएँ थीं, कमर में तरकश और हाथ में धनुष-बाण।
तडित बिनिंदक पीत पट उदर रेख बर तीनि।नाभि मनोहर लेति जनु जमुन भवँर छबि छीनि॥१४७॥
बिजली को भी लज्जित करने वाला पीला वस्त्र था, उदर पर तीन सुंदर रेखाएँ थीं। मनोहर नाभि मानो यमुना के भँवर की शोभा को भी मात कर रही थी।
पद राजीव बरनि नहिं जाहीं। मुनि मन मधुप बसहिं जेन्ह माहीं॥बाम भाग सोभति अनुकूला। आदिसक्ति छबिनिधि जगमूला॥॥१॥
उनके चरण-कमलों का वर्णन नहीं किया जा सकता, जिनमें मुनियों के मन रूपी भँवरे निवास करते हैं। बाईं ओर अनुकूल भाव से शोभा पा रही थीं आदिशक्ति, शोभा की निधि, जगत की मूल जननी।
जासु अंस उपजहिं गुनखानी। अगनित लच्छि उमा ब्रह्मानी॥भृकुटि बिलास जासु जग होई। राम बाम दिसि सीता सोई॥॥२॥
जिनके अंश से गुणों की खान अनगिनत लक्ष्मी, उमा और ब्रह्माणी उत्पन्न होती हैं, जिनकी भौंहों के इशारे मात्र से संसार चलता है — राम के बाईं ओर वही सीता विराजमान थीं।
छबिसमुद्र हरि रूप बिलोकी। एकटक रहे नयन पट रोकी॥चितवहिं सादर रूप अनूपा। तृप्ति न मानहिं मनु सतरूपा॥॥३॥
छवि के समुद्र हरि के रूप को देखकर मनु और शतरूपा एकटक निहारते रह गए, उनकी पलकें मानो नेत्रों के द्वार को रोककर रह गई थीं। वे आदरपूर्वक उस अनुपम रूप को निहारते रहे, पर तृप्ति ही न होती थी।
हरष बिबस तन दसा भुलानी। परे दंड इव गहि पद पानी॥सिर परसे प्रभु निज कर कंजा। तुरत उठाए करुनापुंजा॥॥४॥
हर्ष से अभिभूत होकर उनकी शरीर की सुध-बुध भूल गई, वे दंड के समान गिरकर प्रभु के चरण पकड़ने लगे। प्रभु ने अपने कमल जैसे हाथों से उनके सिर का स्पर्श किया और करुणा के भंडार ने उन्हें तुरंत उठा लिया।
बोले कृपानिधान पुनि अति प्रसन्न मोहि जानि।मागहु बर जोइ भाव मन महादानि अनुमानि॥१४८॥
कृपानिधान फिर बोले — मुझे प्रसन्न जानकर, हे महादानी, अपने मन के अनुकूल कोई भी वर माँग लो।
सुनि प्रभु बचन जोरि जुग पानी। धरि धीरजु बोली मृदु बानी॥नाथ देखि पद कमल तुम्हारे। अब पूरे सब काम हमारे॥॥१॥
प्रभु के ये वचन सुनकर, दोनों हाथ जोड़कर, धैर्य धारण कर मनु मृदु वाणी में बोले — हे नाथ, आपके चरण-कमलों का दर्शन पाकर अब हमारी सारी कामनाएँ पूरी हो गईं।
एक लालसा बड़ि उर माही। सुगम अगम कहि जात सो नाहीं॥तुम्हहि देत अति सुगम गोसाईं। अगम लाग मोहि निज कृपनाईं॥॥२॥
फिर भी हृदय में एक बड़ी लालसा है, जो सहज होकर भी कहना कठिन जान पड़ती है — हे स्वामी, यद्यपि आपके लिए इसे पूरा करना अत्यंत सहज है, पर मुझे अपनी ही संकोच-वृत्ति के कारण यह कठिन लग रहा है।
जथा दरिद्र बिबुधतरु पाई। बहु संपति मागत सकुचाई॥तासु प्रभाउ जान नहिं सोई। तथा हृदयँ मम संसय होई॥॥३॥
जैसे कोई दरिद्र व्यक्ति कल्पवृक्ष पाकर भी बहुत संपत्ति माँगने में सकुचाता है, क्योंकि वह उसका प्रभाव नहीं जानता — वैसे ही, हे प्रभु, मेरे हृदय में भी संशय हो रहा है।
सो तुम्ह जानहु अंतरजामी। पुरवहु मोर मनोरथ स्वामी॥सकुच बिहाइ मागु नृप मोहि। मोरें नहिं अदेय कछु तोही॥॥४॥
हे अंतर्यामी, आप स्वयं मेरे मन की बात जानते हैं, हे स्वामी, मेरा वह मनोरथ पूरा कीजिए। संकोच छोड़कर माँगो, हे राजा, मुझसे तुम्हें कुछ भी अदेय नहीं है।
दानि सिरोमनि कृपानिधि नाथ कहउँ सतिभाउ।चाहउँ तुम्हहि समान सुत प्रभु सन कवन दुराउ॥१४९॥
दानियों के शिरोमणि, कृपानिधान नाथ ने सच्चे भाव से कहा — हे प्रभु, आप जैसा ही पुत्र चाहता हूँ, फिर स्वामी के सामने भला क्या छिपाव।
देखि प्रीति सुनि बचन अमोले। एवमस्तु करुनानिधि बोले॥आपु सरिस खोजौं कहँ जाई। नृप तव तनय होब मैं आई॥॥१॥
मनु की प्रीति देखकर और उनके अमूल्य वचन सुनकर करुणानिधान बोले — एवमस्तु। मैं अपने ही समान कहाँ जाकर खोजूँ — हे राजा, मैं स्वयं आकर तुम्हारा पुत्र बनूँगा।
सतरूपहि बिलोकि कर जोरें। देबि मागु बरु जो रुचि तोरे॥जो बरु नाथ चतुर नृप मागा। सोइ कृपाल मोहि अति प्रिय लागा॥॥२॥
शतरूपा की ओर देखकर, हाथ जोड़कर कहा — हे देवी, तुम्हें जो अच्छा लगे वह वर माँग लो। हे कृपालु, जो वर चतुर राजा ने माँगा, वह मुझे अत्यंत प्रिय लगा।
प्रभु परंतु सुठि होति ढिठाई। जदपि भगत हित तुम्हहि सोहाई॥तुम्ह ब्रह्मादि जनक जग स्वामी। ब्रह्म सकल उर अंतरजामी॥॥३॥
पर हे प्रभु, यह बड़ी ढिठाई होगी, यद्यपि भक्तों के हित के लिए आपको यह अच्छा भी लगता है। आप तो ब्रह्मा आदि के भी जनक और जगत के स्वामी हैं, आप ही ब्रह्मा सहित सबके हृदय के अंतर्यामी हैं।
अस समुझत मन संसय होई। कहा जो प्रभु प्रवान पुनि सोई॥जे निज भगत नाथ तव अहहीं। जो सुख पावहिं जो गति लहहीं॥॥४॥
ऐसा सोचते ही मन में संदेह होता है — पर जो प्रभु ने कहा है, वही प्रमाण मानकर स्वीकार करती हूँ। हे नाथ, जो आपके सच्चे भक्त होते हैं, जो सुख वे पाते हैं, जो गति वे प्राप्त करते हैं,
सोइ सुख सोइ गति सोइ भगति सोइ निज चरन सनेहु।सोइ बिबेक सोइ रहनि प्रभु हमहि कृपा करि देहु॥१५०॥
वही सुख, वही गति, वही भक्ति, वही आपके चरणों का स्नेह, वही विवेक और वही रहन-सहन — हे प्रभु, कृपा करके हमें भी वही दीजिए।
सुनु मृदु गूढ़ रुचिर बर रचना। कृपासिंधु बोले मृदु बचना॥जो कछु रुचि तुम्हेर मन माहीं। मैं सो दीन्ह सब संसय नाहीं॥॥१॥
यह कोमल, गूढ़ और सुंदर श्रेष्ठ रचना सुनकर कृपासिंधु मृदु वचन बोले — जो कुछ तुम्हारे मन में अभिलाषा है, मैंने वह सब दे दी, इसमें कोई संदेह नहीं।
मातु बिबेक अलोकिक तोरें। कबहुँ न मिटिहि अनुग्रह मोरें॥बंदि चरन मनु कहेउ बहोरी। अवर एक बिनती प्रभु मोरी॥॥२॥
हे माता, तुम्हारा विवेक अलौकिक है, इसके लिए मेरा अनुग्रह कभी कम नहीं होगा। प्रभु के चरणों की वंदना करके मनु ने फिर कहा — हे प्रभु, मेरी एक और विनती है।
सुत बिषइक तव पद रति होऊ। मोहि बड़ मूढ़ कहै किन कोऊ॥मनि बिनु फनि जिमि जल बिनु मीना। मम जीवन तिमि तुम्हहि अधीना॥॥३॥
मेरे पुत्र के हृदय में, हे स्वामी, आपके चरणों में निःसंकोच प्रीति हो, चाहे मुझे कोई कितना ही मूढ़ क्यों न कहे। जैसे साँप बिना मणि के और मछली बिना जल के नहीं रह सकती, वैसे ही मेरा जीवन सदा आप ही पर आधारित रहे।
अस बरु मागि चरन गहि रहेऊ। एवमस्तु करुनानिधि कहेऊ॥अब तुम्ह मम अनुसासन मानी। बसहु जाइ सुरपति रजधानी॥॥४॥
ऐसा वर माँगकर मनु प्रभु के चरण पकड़े ही रहे, करुणानिधान ने कहा — एवमस्तु। अब तुम मेरी आज्ञा मानकर जाकर इंद्रलोक में निवास करो।
तहँ करि भोग बिसाल तात गए कछु काल पुनि।होइहहु अवध भुआल तब मैं होब तुम्हार सुत॥१५१॥
वहाँ बहुत काल तक विशाल भोग भोगकर, फिर कुछ समय बाद तुम अयोध्या के राजा बनोगे, तब मैं ही तुम्हारा पुत्र बनूँगा।
इच्छामय नरबेष सँवारें। होइहउँ प्रगट निकेत तुम्हारे॥अंसन्ह सहित देह धरि ताता। करिहउँ चरित भगत सुखदाता॥॥१॥
अपनी इच्छा से मनुष्य-वेष धारण कर मैं तुम्हारे घर में प्रकट होऊँगा। हे तात, अपने अंशों सहित शरीर धारण कर मैं भक्तों को सुख देने वाली लीलाएँ करूँगा।
जे सुनि सादर नर बड़भागी। भव तरिहहिं ममता मद त्यागी॥आदिसक्ति जेहिं जग उपजाया। सोउ अवतरिहि मोरि यह माया॥॥२॥
जिन्हें आदरपूर्वक सुनकर बड़भागी मनुष्य ममता और मद त्यागकर संसार-सागर से पार हो जाएँगे। जिन आदिशक्ति ने इस जगत को उत्पन्न किया, वे भी मेरी इस माया के रूप में अवतरित होंगी।
पुरउब मैं अभिलाष तुम्हारा। सत्य सत्य पन सत्य हमारा॥पुनि पुनि अस कहि कृपानिधाना। अंतरधान भए भगवाना॥॥३॥
मैं तुम्हारी अभिलाषा अवश्य पूरी करूँगा, यह सत्य है, सत्य है, यह मेरी प्रतिज्ञा सत्य है। इस प्रकार बार-बार कहकर करुणानिधान भगवान अंतर्धान हो गए।
दंपति उर धरि भगत कृपाला। तेहिं आश्रम निवसे कछु काला॥समय पाइ तनु तजि अनयासा। जाइ कीन्ह अमरावति बासा॥॥४॥
भक्त-वत्सल दंपति उस वचन को हृदय में धारण करके उसी आश्रम में कुछ काल तक निवास करते रहे। समय पाकर, बिना किसी क्लेश के शरीर त्यागकर, वे अमरावती में जा बसे।
यह इतिहास पुनीत अति उमहि कही बृषकेतु।भरद्वाज सुनु अपर पुनि राम जनम कर हेतु।॥१५२॥
वृषकेतु ने उमा को यह अत्यंत पवित्र इतिहास कहा। हे भरद्वाज, अब राम-जन्म का एक और कारण सुनो।
सुनु मुनि कथा पुनीत पुरानी। जो गिरिजा प्रति संभु बखानी॥बिस्व बिदित एक कैकय देसू। सत्यकेतु तहँ बसइ नरेसू॥॥१॥
हे मुनि, सुनो यह पवित्र पुरानी कथा, जो शिवजी ने गिरिजा को कही थी। संसार में विख्यात एक कैकय नामक देश था, जहाँ सत्यकेतु नामक राजा राज्य करते थे।
धरम धुरंधर नीति निधाना। तेज प्रताप सील बलवाना॥तेहि कें भए जुगल सुत बीरा। सब गुन धाम महा रनधीरा॥॥२॥
वे धर्मधुरंधर, नीति के भंडार, तेज-प्रताप-शील से युक्त और बलवान थे। उनके दो वीर पुत्र हुए, जो सब गुणों के धाम और महान रणधीर थे।
राज धनी जो जेठ सुत आही। नाम प्रतापभानु अस ताही॥अपर सुतहि अरिमर्दन नामा। भुजबल अतुल अचल संग्रामा॥॥३॥
जो जेठे पुत्र थे, वे राज्य के अधिकारी थे, उनका नाम प्रतापभानु था। दूसरे पुत्र का नाम अरिमर्दन था, जो भुजबल में अतुल और युद्ध में अडिग था।
भाइहि भाइहि परम समीती। सकल दोष छल बरजित प्रीती॥जेठे सुतहि राज नृप दीन्हा। हरि हित आपु गवन बन कीन्हा॥॥४॥
दोनों भाइयों में परम मित्रता थी, उनकी प्रीति सब दोष और छल से रहित थी। राजा ने जेठे पुत्र को राज्य दे दिया और स्वयं हरि की भक्ति के लिए वन को चल दिए।
जब प्रतापरबि भयउ नृप फिरी दोहाई देस।प्रजा पाल अति बेदबिधि कतहुँ नहीं अघ लेस॥१५३॥
जब प्रतापभानु राजा बने, तो सारे देश में उनकी दुहाई फिर गई। वे प्रजा का पालन इतनी वेदविधि से करते कि कहीं भी पाप का लेशमात्र न रहा।
नृप हितकारक सचिव सयाना। नाम धरमरुचि सुक्र समाना॥सचिव सयान बंधु बलबीरा। आपु प्रतापपुंज रनधीरा॥॥१॥
राजा के हितकारी एक सुजान मंत्री थे, नाम धर्मरुचि, जो शुक्राचार्य के समान बुद्धिमान थे। बुद्धिमान मंत्री, बलवीर भाई, और स्वयं तेज के पुंज रणधीर राजा —
सेन संग चतुरंग अपारा। अमित सुभट सब समर जुझारा॥सेन बिलोकि राउ हरषाना। अरु बाजे गहगहे निसाना॥॥२॥
उनके पास चतुरंगिणी अपार सेना थी, अनगिनत योद्धा सभी युद्ध में निपुण थे। सेना देखकर राजा हर्षित हुए, और गहरे स्वर में नगाड़े बजने लगे।
बिजय हेतु कटकई बनाई। सुदिन साधि नृप चलेउ बजाई॥जहँ तहँ परीं अनेक लराईं। जीते सकल भूप बरिआई॥॥३॥
विजय के लिए सेना सजाकर, शुभ दिन देखकर राजा ने कूच किया। जहाँ-तहाँ अनेक युद्ध हुए, और उन्होंने बलपूर्वक सभी राजाओं को जीत लिया।
सप्त दीप भुजबल बस कीन्हे। लै लै दंड छाड़ि नृप दीन्हें॥सकल अवनि मंडल तेहि काला। एक प्रतापभानु महिपाला॥॥४॥
उन्होंने सातों द्वीपों को अपने भुजबल से वश में कर लिया, और उनसे कर लेकर उन्हें फिर उनके राज्य लौटा दिए। उस समय सारे पृथ्वी-मंडल पर एक ही सम्राट था — प्रतापभानु।
स्वबस बिस्व करि बाहुबल निज पुर कीन्ह प्रबेसु।अरथ धरम कामादि सुख सेवइ समय नरेसु॥१५४॥
सारे विश्व को अपने बाहुबल से वश में करके उन्होंने अपनी राजधानी में प्रवेश किया, और अर्थ, धर्म, काम आदि सुखों का सेवन करते हुए राजा ने अपना समय बिताया।
भूप प्रतापभानु बल पाई। कामधेनु भै भूमि सुहाई॥सब दुख बरजित प्रजा सुखारी। धरमसील सुंदर नर नारी॥॥१॥
राजा प्रतापभानु के प्रताप से यह सुंदर पृथ्वी कामधेनु के समान हो गई। प्रजा सब दुखों से रहित और सुखी थी, स्त्री-पुरुष सभी धर्मशील और सुंदर थे।
सचिव धरमरुचि हरि पद प्रीती। नृप हित हेतु सिखव नित नीती॥गुर सुर संत पितर महिदेवा। करइ सदा नृप सब के सेवा॥॥२॥
मंत्री धर्मरुचि की हरि के चरणों में प्रीति थी, वे राजा के हित के लिए नित्य उचित नीति सिखाते। गुरु, देवता, संत, पितर और ब्राह्मण — सबकी राजा सदा सेवा करते।
भूप धरम जे बेद बखाने। सकल करइ सादर सुख माने॥दिन प्रति देह बिबिध बिधि दाना। सुनहु सास्त्र बर बेद पुराना॥॥३॥
वेदों में जो राजधर्म बताए गए हैं, वे सब राजा आदरपूर्वक और सुखपूर्वक पालन करते। प्रतिदिन वे विविध प्रकार का दान देते और श्रेष्ठ शास्त्र, वेद-पुराण सुनते।
नाना बापीं कूप तड़ागा। सुमन बाटिका सुंदर बागा॥बिप्रभवन सुरभवन सुहाए। सब तीरथन्ह बिचित्र बनाए॥॥४॥
अनेक बावड़ियाँ, कुएँ, तालाब, फूलों की वाटिकाएँ और सुंदर बाग बनवाए। ब्राह्मणों के घर और देवालय सुंदर बनवाए, और सभी तीर्थों में विचित्र निर्माण करवाए।
जँह लगि कहे पुरान श्रुति एक एक सब जाग।बार सहस्त्र सहस्त्र नृप किए सहित अनुराग॥१५५॥
वेद-पुराणों में जितने भी यज्ञ बताए गए हैं, राजा ने वे सब एक-एक हजार-हजार बार बड़े अनुराग से किए।
हृदयँ न कछु फल अनुसंधाना। भूप बिबेकी परम सुजाना॥करइ जे धरम करम मन बानी। बासुदेव अर्पित नृप ग्यानी॥॥१॥
उनके हृदय में किसी फल की कामना नहीं थी, राजा अत्यंत विवेकी और परम सुजान थे। वे जो भी धर्म-कर्म मन, वचन से करते, वह सब उन्होंने वासुदेव को ही समर्पित कर दिया था — ऐसे ज्ञानी राजा थे।
चढ़ि बर बाजि बार एक राजा। मृगया कर सब साजि समाजा॥बिंध्याचल गभीर बन गयऊ। मृग पुनीत बहु मारत भयऊ॥॥२॥
एक बार राजा सुंदर घोड़े पर चढ़कर, शिकार का सारा साज-सामान सजाकर, विंध्याचल के घने वन में गए और अनेक पवित्र मृग मारने लगे।
फिरत बिपिन नृप दीख बराहू। जनु बन दुरेउ ससिहि ग्रसि राहू॥बड़ बिधु नहिं समात मुख माहीं। मनहुँ क्रोधबस उगिलत नाहीं॥॥३॥
वन में घूमते हुए राजा को एक जंगली सूअर दिखाई दिया, मानो वन में छिपा हुआ राहु चंद्रमा को निगल गया हो — बड़ा चंद्रमा उसके मुख में समाता नहीं, मानो क्रोधवश उसे उगल भी नहीं पा रहा हो।
कोल कराल दसन छबि गाई। तनु बिसाल पीवर अधिकाई॥घुरुघुरात हय आरौ पाएँ। चकित बिलोकत कान उठाएँ॥॥४॥
उसके कराल दाँतों की छवि अद्भुत थी, शरीर विशाल और अत्यंत मोटा था। घोड़े की आहट पाकर वह घुरघुराने लगा, कान उठाकर चकित होकर देखने लगा।
नील महीधर सिखर सम देखि बिसाल बराहु।चपरि चलेउ हय सुटुकि नृप हाँकि न होइ निबाहु॥१५६॥
नीले पर्वत की चोटी के समान उस विशाल सूअर को देखकर, राजा घोड़े को एड़ लगाकर तेजी से दौड़ पड़े, हाँक लगाते हुए, अब पीछे हटना संभव न रहा।
आवत देखि अधिक रव बाजी। चलेउ बराह मरुत गति भाजी॥तुरत कीन्ह नृप सर संधाना। महि मिलि गयउ बिलोकत बाना॥॥१॥
घोड़े की तेज आवाज सुनकर सूअर दौड़ता हुआ आ गया, और वह वायु-वेग से भागने लगा। राजा ने तुरंत बाण चढ़ाया, पर सूअर बाण को देखते ही जमीन से मिल गया।
तकि तकि तीर महीस चलावा। करि छल सुअर सरीर बचावा॥प्रगटत दुरत जाइ मृग भागा। रिस बस भूप चलेउ संग लागा॥॥२॥
राजा निशाना साधकर बार-बार बाण चलाते, पर सूअर छल करके अपना शरीर बचा लेता। कभी प्रकट होकर, कभी छिपकर वह मृग भागता रहा, और क्रोधवश राजा उसके पीछे लगे रहे।
गयउ दूरि घन गहन बराहू। जहँ नाहिन गज बाजि निबाहू॥अति अकेल बन बिपुल कलेसू। तदपि न मृग मग तजइ नरेसू॥॥३॥
सूअर घने जंगल में बहुत दूर निकल गया, जहाँ हाथी-घोड़े का जाना संभव न था। राजा वहाँ अत्यंत अकेले, वन में बड़े कष्ट में थे, फिर भी उन्होंने मृग का पीछा नहीं छोड़ा।
कोल बिलोकि भूप बड़ धीरा। भागि पैठ गिरिगुहाँ गभीरा॥अगम देखि नृप अति पछिताई। फिरेउ महाबन परेउ भुलाई॥॥४॥
सूअर बड़ा धैर्यवान था, वह भागकर एक गहरी पर्वत-गुफा में जा घुसा। गुफा को दुर्गम देखकर राजा को बड़ा पछतावा हुआ, वे लौट पड़े पर महावन में भटक गए।
खेद खिन्न छुद्धित तृषित राजा बाजि समेत।खोजत ब्याकुल सरित सर जल बिनु भयउ अचेत॥१५७॥
थकान, खिन्नता, भूख और प्यास से व्याकुल राजा घोड़े सहित जल खोजते हुए नदी-तालाब ढूँढ़ते रहे, पर जल न मिलने से वे बेसुध हो गए।
फिरत बिपिन आश्रम एक देखा। तहँ बस नृपति कपट मुनिबेषा॥जासु देस नृप लीन्ह छड़ाई। समर सेन तजि गयउ पराई॥॥१॥
वन में घूमते हुए उन्हें एक आश्रम दिखाई दिया, जहाँ कपटी मुनि-वेष धारण किए एक राजा रहता था, जिसका देश प्रतापभानु ने युद्ध में जीत लिया था और जो सेना छोड़कर भाग गया था।
समय प्रतापभानु कर जानी। आपन अति असमय अनुमानी॥गयउ न गृह मन बहुत गलानी। मिला न राजहि नृप अभिमानी॥॥२॥
उसने प्रतापभानु का यह असमय जानकर, और अपने लिए इसे उचित अवसर समझकर — वह घर नहीं गया, मन में बड़ी ग्लानि थी कि अभिमानी राजा से युद्ध में सामना नहीं हो सका।
रिस उर मारि रंक जिमि राजा। बिपिन बसइ तापस कें साजा॥तासु समीप गवन नृप कीन्हा। यह प्रतापरबि तेहि तब चीन्हा॥॥३॥
वह अपने हृदय के क्रोध को दबाकर, एक साधारण गरीब की तरह, वन में तपस्वी का वेष धारण करके रहता था। राजा ने उसी के पास जाकर पहुँचकर प्रणाम किया, तभी उसने प्रतापभानु को पहचान लिया।
राउ तृषित नहिं सो पहिचाना। देखि सुबेष महामुनि जाना॥उतरि तुरग तें कीन्ह प्रनामा। परम चतुर न कहेउ निज नामा॥॥४॥
प्यास से व्याकुल राजा ने उसे नहीं पहचाना, उसका सुंदर वेष देखकर उसे महामुनि ही समझा। घोड़े से उतरकर उन्होंने प्रणाम किया, पर अत्यंत चतुर होने के कारण अपना नाम नहीं बताया।
भूपति तृषित बिलोकि तेहिं सरबरु दीन्ह देखाइ।मज्जन पान समेत हय कीन्ह नृपति हरषाइ॥१५७८॥
राजा को प्यासा देखकर उसने उन्हें एक सुंदर सरोवर दिखाया। राजा ने प्रसन्न होकर स्नान किया, जल पिया और घोड़े को भी जल पिलाया।
गै श्रम सकल सुखी नृप भयऊ। निज आश्रम तापस लै गयऊ॥आसन दीन्ह अस्त रबि जानी। पुनि तापस बोलेउ मृदु बानी॥॥१॥
सारी थकान दूर होकर राजा पूरी तरह सुखी हो गए, तापसी वेषधारी उन्हें अपने आश्रम ले गया। सूर्यास्त होते देख उसने राजा को आसन दिया, फिर मृदु वाणी में बोला —
को तुम्ह कस बन फिरहु अकेलें। सुंदर जुबा जीव परहेलें॥चक्रबर्ति के लच्छन तोरें। देखत दया लागि अति मोरें॥॥२॥
तुम कौन हो, वन में अकेले क्यों घूम रहे हो? हे सुंदर युवक, तुम अपने जीवन को इस प्रकार जोखिम में क्यों डाल रहे हो? तुम्हारे लक्षण तो चक्रवर्ती सम्राट के जैसे हैं, तुम्हें देखकर मुझे बड़ी दया आ रही है।
नाम प्रतापभानु अवनीसा। तासु सचिव मैं सुनहु मुनीसा॥फिरत अहेरें परेउँ भुलाई। बडे भाग देखउँ पद आई॥॥३॥
राजा का नाम प्रतापभानु था, धरतीपति, और मैं उसका मंत्री हूँ, हे मुनीश्वर, सुनिए। शिकार खेलते हुए मैं मार्ग भूल गया, और बड़े भाग्य से आपके चरणों में आ पहुँचा।
हम कहँ दुर्लभ दरस तुम्हारा। जानत हौं कछु भल होनिहारा॥कह मुनि तात भयउ अँधियारा। जोजन सत्तरि नगर तुम्हारा॥॥४॥
हमें तो तुम्हारा दर्शन ही दुर्लभ लगता है, जान पड़ता है कुछ भला होने वाला है। मुनि बोले — हे तात, अँधेरा हो चुका है, तुम्हारा नगर यहाँ से सत्तर योजन दूर है।
निसा घोर गम्भीर बन पंथ न सुनहु सुजान।बसहु आजु अस जानि तुम्ह जाएहु होत बिहान॥१५९(क)॥
रात घोर और गहरी है, वन का मार्ग भी सुनसान है, हे सुजान, इसलिए आज यहीं ठहर जाओ, यह जानकर सवेरा होते ही चले जाना।
तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाइ।आपुनु आवइ ताहि पहिं ताहि तहाँ लै जाइ॥१५९(ख)॥
तुलसीदास कहते हैं, जैसी भवितव्यता होती है, वैसी ही सहायता मिल जाती है — वह स्वयं ही जिसे चाहिए उसके पास ले जाती है और उसे वहाँ पहुँचा देती है।
भलेहिं नाथ आयसु धरि सीसा। बाँधि तुरग तरु बैठ महीसा॥नृप बहु भाँती प्रसंसेउ ताही। चरन बंदि निज भाग्य सराही॥॥१॥
राजा ने कहा — बहुत अच्छा, हे नाथ, ऐसा कहकर उन्होंने आज्ञा सिर चढ़ाई और घोड़े को पेड़ से बाँधकर बैठ गए। राजा ने उसकी बहुत प्रकार से प्रशंसा की, उसके चरण वंदन करके अपने भाग्य को सराहा।
पुनि बोले मृदु गिरा सुहाई। जानि पिता प्रभु करउँ ढिठाई॥मोहि मुनीस सुत सेवक जानी। नाथ नाम निज कहहु बखानी॥॥२॥
फिर उसने मृदु और सुंदर वाणी में कहा — पिता समझकर, हे प्रभु, मैं यह ढिठाई करता हूँ। हे मुनीश्वर, मुझे अपना सेवक जानकर, कृपया अपना नाम बताइए।
तेहि न जान नृप नृपहि सो जाना। भूप सुह्रद सो कपट सयाना॥बैरी पुनि छत्री पुनि राजा। छल बल कीन्ह चहइ निज काजा॥॥३॥
उस राजा ने उसे नहीं पहचाना, पर उसने राजा को पहचान लिया था — वह सुहृद-सा दिखने वाला राजा वास्तव में उसका शत्रु था, अत्यंत कपटी और चतुर। शत्रु फिर छद्मवेशी, फिर राजा — छल-बल से वह अपना काम साधना चाहता था।
समुझि राजसुख दुखित अराती। अवाँ अनल इव सुलगइ छाती॥सरल बचन नृप के सुनि काना। बयर सँभारि हृदयँ हरषाना॥॥४॥
राज्य-सुख को याद कर वह शत्रु दुखी हो उठता, उसकी छाती आग की तरह जल उठती। पर राजा के सरल वचन सुनकर, उसने अपना बैर मन में समेटकर हृदय में हर्ष प्रकट किया।
कपट बोरि बानी मृदुल बोलेउ जुगुति समेत।नाम हमार भिखारि अब निर्धन रहित निकेत॥१६०॥
कपट में डूबी हुई मृदु वाणी में उसने युक्तिपूर्वक कहा — मेरा नाम अब भिखारी है, मैं निर्धन हूँ और मेरा कोई घर-द्वार नहीं है।
कह नृप जे बिग्यान निधाना। तुम्ह सारिखे गलित अभिमाना॥सदा रहहिं अपनपौ दुराएँ। सब बिधि कुसल कुबेष बनाएँ॥॥१॥
राजा ने कहा — जो विज्ञान के भंडार होते हैं, और आप जैसे जिनका अभिमान पूरी तरह गल चुका होता है, वे सदा अपने-आपको छिपाकर, हर प्रकार से कुवेष धारण किए रहते हैं।
तेहि तें कहहिं संत श्रुति टेरें। परम अकिंचन प्रिय हरि केरें॥तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा। होत बिरंचि सिवहि संदेहा॥॥२॥
इसीलिए संत और वेद-वाणी पुकार-पुकारकर कहते हैं कि परम अकिंचन व्यक्ति ही हरि को सबसे प्रिय होता है। आप जैसे धनहीन, गृहहीन भिखारी को देखकर तो ब्रह्मा और शिव को भी संदेह हो जाए।
जोसि सोसि तव चरन नमामी। मो पर कृपा करिअ अब स्वामी॥सहज प्रीति भूपति के देखी। आपु बिषय बिस्वास बिसेषी॥॥३॥
जैसे भी हैं, आपके चरणों में मैं नमन करता हूँ, हे स्वामी, अब मुझ पर कृपा कीजिए। राजा का यह सहज प्रेम देखकर उस पर उसका विशेष विश्वास और बढ़ गया।
सब प्रकार राजहि अपनाई। बोलेउ अधिक सनेह जनाई॥सुनु सतिभाउ कहउँ महिपाला। इहाँ बसत बीते बहु काला॥॥४॥
उसने हर प्रकार से राजा को अपना बना लिया, और अधिक स्नेह प्रकट करके बोला — हे राजा, सच्चे भाव से सुनो, यहाँ रहते हुए मुझे बहुत समय बीत गया।
अब लगि मोहि न मिलेउ कोउ मैं न जनावउँ काहु।लोकमान्यता अनल सम कर तप कानन दाहु॥१६१(क)॥
अब तक मुझसे कोई नहीं मिला और मैंने भी किसी को अपना परिचय नहीं दिया — लोगों की मान्यता तो अग्नि के समान है, जो तपस्या के वन को जला डालती है।
तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर।सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि॥१६१(ख)॥
तुलसीदास कहते हैं, सुंदर वेष देखकर मूर्ख और चतुर दोनों ही धोखा खा जाते हैं — जैसे सुंदर मोर को देखकर कोई नहीं सोचता कि उसके अंदर सर्प जैसा विष है, वैसे ही अमृत जैसी मीठी वाणी में भी विष का भोजन छिपा हो सकता है।
तातें गुपुत रहउँ जग माहीं। हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं॥प्रभु जानत सब बिनहिं जनाएँ। कहहु कवनि सिधि लोक रिझाएँ॥॥१॥
इसीलिए मैं संसार में छिपा रहता हूँ, हरि को छोड़कर किसी और उद्देश्य से कुछ करना व्यर्थ है। प्रभु तो बिना बताए ही सब जानते हैं, फिर बताओ, संसार को रिझाने से क्या सिद्धि मिलेगी।
तुम्ह सुचि सुमति परम प्रिय मोरें। प्रीति प्रतीति मोहि पर तोरें॥अब जौं तात दुरावउँ तोही। दारुन दोष घटइ अति मोही॥॥२॥
तुम पवित्र और सुबुद्धि हो, मुझे अत्यंत प्रिय हो, तुम्हारा मुझ पर प्रेम और विश्वास भी सच्चा है। अब हे तात, यदि मैं तुमसे कुछ छिपाऊँ, तो यह मेरे लिए बड़ा भारी दोष होगा।
जिमि जिमि तापसु कथइ उदासा। तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा॥देखा स्वबस कर्म मन बानी। तब बोला तापस बगध्यानी॥॥३॥
जैसे-जैसे वह तापस उदासीनता की बातें करता गया, वैसे-वैसे राजा का विश्वास और बढ़ता गया। राजा को अपने कर्म, मन और वचन से पूरी तरह वश में देखकर, वह बगुला-ध्यानी तापस तब बोला —
नाम हमार एकतनु भाई। सुनि नृप बोले पुनि सिरु नाई॥कहहु नाम कर अरथ बखानी। मोहि सेवक अति आपन जानी॥॥४॥
मेरा नाम एकतनु है, भाई — यह सुनकर राजा ने फिर सिर नवाकर कहा — कृपया इस नाम का अर्थ भी विस्तार से बताइए, मुझे अपना अत्यंत आज्ञाकारी सेवक जानकर।
आदिसृष्टि उपजी जबहिं तब उतपति भै मोरि।नाम एकतनु हेतु तेहि देह न धरी बहोरि॥१६२॥
जब आदि-सृष्टि उत्पन्न हुई, तभी मेरी भी उत्पत्ति हुई थी। एकतनु नाम का कारण यह है कि उसके बाद मैंने फिर कभी दूसरा शरीर धारण नहीं किया।
जनि आचरजु करहु मन माहीं। सुत तप तें दुर्लभ कछु नाहीं॥तपबल तें जग सृजइ बिधाता। तपबल बिष्नु भए परित्राता॥॥१॥
मन में कोई आश्चर्य मत करो, तप से बढ़कर कुछ भी दुर्लभ नहीं है। तप के बल से ही विधाता संसार की रचना करते हैं, तप के बल से ही विष्णु सबकी रक्षा करने वाले बनते हैं।
तपबल संभु करहिं संघारा। तप तें अगम न कछु संसारा॥भयउ नृपहि सुनि अति अनुरागा। कथा पुरातन कहै सो लागा॥॥२॥
तप के बल से ही शिवजी संहार करते हैं, तप के बल से संसार में कुछ भी असंभव नहीं। यह सुनकर राजा को अत्यंत अनुराग हुआ, तब वह पुरानी-पुरानी कथाएँ कहने लगा।
करम धरम इतिहास अनेका। करइ निरूपन बिरति बिबेका॥उदभव पालन प्रलय कहानी। कहेसि अमित आचरज बखानी॥॥३॥
उसने कर्म, धर्म के अनेक इतिहासों का, वैराग्य और विवेक का निरूपण किया। सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और प्रलय की कथा भी उसने असंख्य आश्चर्यजनक ढंग से वर्णित की।
सुनि महिप तापस बस भयऊ। आपन नाम कहत तब लयऊ॥कह तापस नृप जानउँ तोही। कीन्हेहु कपट लाग भल मोही॥॥४॥
यह सुनकर राजा उस तापस के पूरी तरह वश में हो गया, तब उसने भी अपना नाम बताने का साहस किया। तापस बोला — हे राजा, मैं तुम्हें पहचानता हूँ, तुमने जो यह छल किया, वह मुझे बहुत अच्छा लगा।
सुनु महीस असि नीति जहँ तहँ नाम न कहहिं नृप।मोहि तोहि पर अति प्रीति सोइ चतुरता बिचारि तव॥१६३॥
सुनो हे राजा, यह नीति है कि जहाँ-तहाँ राजा अपना नाम नहीं बताते, पर मुझे तुम पर अत्यंत प्रीति है, इसलिए तुम्हारी यह चतुराई भी मुझे भली लगी।
नाम तुम्हार प्रताप दिनेसा। सत्यकेतु तव पिता नरेसा॥गुर प्रसाद सब जानिअ राजा। कहिअ न आपन जानि अकाजा॥॥१॥
तुम्हारा नाम प्रतापभानु है, और सत्यकेतु तुम्हारे पिता राजा हैं। गुरु की कृपा से मैं सब जानता हूँ, हे राजा, इसलिए यह मत सोचो कि अपना नाम बताने में कोई हानि हुई।
देखि तात तव सहज सुधाई। प्रीति प्रतीति नीति निपुनाई॥उपजि परि ममता मन मोरें। कहउँ कथा निज पूछे तोरें॥॥२॥
हे तात, तुम्हारी सहज सरलता, प्रीति, विश्वास, नीति और निपुणता देखकर मेरे मन में ममता उत्पन्न हो गई, इसीलिए तुम्हारे पूछने पर मैंने अपनी कथा कह दी।
अब प्रसन्न मैं संसय नाहीं। मागु जो भूप भाव मन माहीं॥सुनि सुबचन भूपति हरषाना। गहि पद बिनय कीन्हि बिधि नाना॥॥३॥
अब मैं प्रसन्न हूँ, कोई संशय नहीं — हे राजा, जो तुम्हारे मन को भाए, वह वर माँग लो। यह मधुर वचन सुनकर राजा हर्षित हुए, और चरण पकड़कर अनेक प्रकार से विनती की।
कृपासिंधु मुनि दरसन तोरें। चारि पदारथ करतल मोरें॥प्रभुहि तथापि प्रसन्न बिलोकी। मागि अगम बर होइ असोकी॥॥४॥
हे कृपासिंधु, आपके दर्शन मात्र से ही मेरे लिए चारों पदार्थ हस्तगत हैं। फिर भी प्रभु को प्रसन्न देखकर उसने एक दुर्लभ वर माँगा जो सर्वदा शोकरहित रहे।
जरा मरन दुख रहित तनु समर जितै जनि कोउ।एकछत्र रिपुहीन महि राज कलप सत होउ॥१६४॥
जरा-मृत्यु के दुःख से रहित शरीर हो, युद्ध में मुझे कोई न जीत सके, सौ कल्पों तक बिना किसी शत्रु के मैं एकछत्र पृथ्वी का राज्य करूँ।
कह तापस नृप ऐसेइ होऊ। कारन एक कठिन सुनु सोऊ॥कालउ तुअ पद नाइहि सीसा। एक बिप्रकुल छाड़ि महीसा॥॥१॥
तापस बोला — हे राजा, ऐसा ही होगा, पर सुनो, इसमें एक कठिन शर्त है। काल भी तुम्हारे चरणों में सिर नवाएगा, बस एक ब्राह्मण-कुल को छोड़कर, हे राजा।
तपबल बिप्र सदा बरिआरा। तिन्ह के कोप न कोउ रखवारा॥जौं बिप्रन्ह सब करहु नरेसा। तौ तुअ बस बिधि बिष्नु महेसा॥॥२॥
ब्राह्मण तप के बल से सदा प्रबल होते हैं, उनके क्रोध से कोई भी रक्षा नहीं कर सकता। यदि हे राजा, तुम ब्राह्मणों को भी अपने वश में कर लो, तो विधाता, विष्णु और शिव भी तुम्हारे वश में हो जाएँगे।
चल न ब्रह्मकुल सन बरिआई। सत्य कहउँ दोउ भुजा उठाई॥बिप्र श्राप बिनु सुनु महिपाला। तोर नास नहिं कवनेहुँ काला॥॥३॥
ब्राह्मण-कुल से जबरदस्ती कभी काम नहीं चलता, यह मैं दोनों भुजाएँ उठाकर सत्य कहता हूँ। सुनो हे राजा, ब्राह्मण के शाप के बिना तुम्हारा नाश किसी भी काल में नहीं होगा।
हरषेउ राउ बचन सुनि तासू। नाथ न होइ मोर अब नासू॥तव प्रसाद प्रभु कृपानिधाना। मो कहुँ सर्ब काल कल्याना॥॥४॥
राजा उसके यह वचन सुनकर हर्षित हुए — हे नाथ, अब मेरा नाश नहीं होगा। आपकी कृपा से, हे कृपानिधान प्रभु, मेरा सर्वकाल कल्याण ही होगा।
एवमस्तु कहि कपटमुनि बोला कुटिल बहोरि।मिलब हमार भुलाब निज कहहु त हमहि न खोरि॥१६५॥
एवमस्तु कहकर वह कपटी मुनि फिर कुटिलतापूर्वक बोला — हमारी यह भेंट और तुम्हें दिया गया यह भ्रम, अब इसे किसी से मत कहना, नहीं तो हमें दोष लगेगा।
तातें मै तोहि बरजउँ राजा। कहें कथा तव परम अकाजा॥छठें श्रवन यह परत कहानी। नास तुम्हार सत्य मम बानी॥॥१॥
इसीलिए हे राजा, मैं तुम्हें मना करता हूँ — यह कथा कहने से तुम्हारा बड़ा अहित होगा। यह बात यदि छठे कान तक भी पहुँची, तो तुम्हारा नाश निश्चित है, मेरी यह बात सत्य मानो।
यह प्रगटें अथवा द्विजश्रापा। नास तोर सुनु भानुप्रतापा॥आन उपायँ निधन तव नाहीं। जौं हरि हर कोपहिं मन माहीं॥॥२॥
यह प्रकट होने से, अथवा ब्राह्मण के शाप से ही, हे प्रतापभानु, तुम्हारा नाश हो सकता है, सुनो। इसके सिवा किसी और उपाय से तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी — बस हरि या हर के मन में क्रोध न आए।
सत्य नाथ पद गहि नृप भाषा। द्विज गुर कोप कहहु को राखा॥राखइ गुर जौं कोप बिधाता। गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता॥॥३॥
राजा ने प्रभु के चरण पकड़कर सत्य कहा — हे नाथ, बताइए, ब्राह्मण गुरु के क्रोध से किसने कभी रक्षा पाई है? यदि विधाता भी क्रोधित हो तो गुरु ही रक्षा करते हैं, पर गुरु के विरोध से संसार में कोई भी रक्षक नहीं।
जौं न चलब हम कहे तुम्हारें। होउ नास नहिं सोच हमारें॥एकहिं डर डरपत मन मोरा। प्रभु महिदेव श्राप अति घोरा॥॥४॥
यदि हम तुम्हारी बात नहीं मानेंगे, तो नाश हो जाए, हमें इसकी कोई चिंता नहीं। पर मुझे एक ही बात का डर है, हे प्रभु — ब्राह्मणों का शाप अत्यंत भयंकर होता है।
होहिं बिप्र बस कवन बिधि कहहु कृपा करि सोउ।तुम्ह तजि दीनदयाल निज हितू न देखउँ कोउँ॥१६६॥
कृपा करके यह भी बताइए कि ब्राह्मण किस उपाय से वश में हों — दीनदयालु आपको छोड़कर मुझे कोई और हितैषी नहीं दिखता।
सुनु नृप बिबिध जतन जग माहीं। कष्टसाध्य पुनि होहिं कि नाहीं॥अहइ एक अति सुगम उपाई। तहाँ परंतु एक कठिनाई॥॥१॥
सुनो हे राजा, संसार में अनेक उपाय हैं, पर वे कठिन साध्य हैं, सफल हों या न हों। पर एक अत्यंत सुगम उपाय है, हालाँकि उसमें भी एक कठिनाई है।
मम आधीन जुगुति नृप सोई। मोर जाब तव नगर न होई॥आजु लगें अरु जब तें भयऊँ। काहू के गृह ग्राम न गयऊँ॥॥२॥
वह युक्ति केवल मेरे ही अधीन है, पर मेरा तुम्हारे नगर जाना संभव नहीं। आज तक, जब से मैं उत्पन्न हुआ हूँ, मैं किसी के घर या गाँव नहीं गया।
जौं न जाउँ तव होइ अकाजू। बना आइ असमंजस आजू॥सुनि महीस बोलेउ मृदु बानी। नाथ निगम असि नीति बखानी॥॥३॥
यदि मैं न जाऊँ तो तुम्हारा काम बिगड़ जाएगा, आज तो यह बड़ी दुविधा बन गई है। यह सुनकर राजा मृदु वाणी में बोले — हे नाथ, वेदों ने भी यही नीति बताई है —
बड़े सनेह लघुन्ह पर करहीं। गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं॥जलधि अगाध मौलि बह फेनू। संतत धरनि धरत सिर रेनू॥॥४॥
बड़े लोग छोटों पर विशेष स्नेह करते हैं, पर्वत भी अपने शिखरों पर सदा घास ही धारण करते हैं। अथाह समुद्र के ऊपर भी झाग तैरता है, और पृथ्वी सदा अपने सिर पर धूल ही धारण करती है।
अस कहि गहे नरेस पद स्वामी होहु कृपाल।मोहि लागि दुख सहिअ प्रभु सज्जन दीनदयाल॥१६७॥
ऐसा कहकर राजा ने उसके चरण पकड़ लिए — हे स्वामी, कृपालु होइए, मेरे लिए यह कष्ट सहन कीजिए, हे प्रभु, सज्जन और दीनदयालु।
जानि नृपहि आपन आधीना। बोला तापस कपट प्रबीना॥सत्य कहउँ भूपति सुनु तोही। जग नाहिन दुर्लभ कछु मोही॥॥१॥
राजा को अपने पूरी तरह वश में जानकर, वह कपट में निपुण तापस बोला — हे राजा, सच कहता हूँ सुनो, संसार में मेरे लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं है।
अवसि काज मैं करिहउँ तोरा। मन तन बचन भगत तें मोरा॥जोग जुगुति तप मंत्र प्रभाऊ। फलइ तबहिं जब करिअ दुराऊ॥॥२॥
मैं अवश्य तुम्हारा काम कर दूँगा, क्योंकि मन-वचन-कर्म से तुम मेरे भक्त हो। पर योग-युक्ति, तप और मंत्र का प्रभाव तभी फलित होता है जब उसे गुप्त रखा जाए।
जौं नरेस मैं करौं रसोई। तुम्ह परुसहु मोहि जान न कोई॥अन्न सो जोइ जोइ भोजन करई। सोइ सोइ तव आयसु अनुसरई॥॥३॥
यदि राजा, मैं भोजन बनाऊँ और तुम उसे परोसो, तो कोई मुझे पहचान नहीं पाएगा। जो भी उस अन्न को खाएगा, वह वैसे ही तुम्हारी आज्ञा का अनुसरण करेगा।
पुनि तिन्ह के गृह जेवँइ जोऊ। तव बस होइ भूप सुनु सोऊ॥जाइ उपाय रचहु नृप एहू। संबत भरि संकलप करेहू॥॥४॥
फिर उनके घर जो भी भोजन करेगा, वह भी, सुनो, हे राजा, तुम्हारे वश में हो जाएगा। जाकर यह उपाय रचो और एक वर्ष भर का संकल्प करो।
नित नूतन द्विज सहस सत बरेहु सहित परिवार।मैं तुम्हरे संकलप लगि दिनहिंकरिब जेवनार॥१६८॥
नित्य नए-नए एक लाख ब्राह्मणों को परिवार सहित निमंत्रण दो; मैं तुम्हारे संकल्प के अनुसार प्रतिदिन भोज तैयार करता रहूँगा।
एहि बिधि भूप कष्ट अति थोरें। होइहहिं सकल बिप्र बस तोरें॥करिहहिं बिप्र होम मख सेवा। तेहिं प्रसंग सहजेहिं बस देवा॥॥१॥
इस प्रकार राजा को बहुत ही कम कष्ट में सारे ब्राह्मण तुम्हारे वश में हो जाएँगे। ब्राह्मण होम और यज्ञ की सेवा करेंगे, और उसी प्रसंग से देवता भी सहज ही तुम्हारे वश में आ जाएँगे।
और एक तोहि कहउँ लखाऊ। मैं एहि बेष न आउब काऊ॥तुम्हरे उपरोहित कहुँ राया। हरि आनब मैं करि निज माया॥॥२॥
और एक बात मैं तुम्हें बताता हूँ — मैं इस वेष में कभी नहीं आऊँगा। तुम्हारे यहाँ जो पुरोहित हैं, हे राजा, मैं अपनी माया से उन्हें ही हर लाऊँगा।
तपबल तेहि करि आपु समाना। रखिहउँ इहाँ बरष परवाना॥मैं धरि तासु बेषु सुनु राजा। सब बिधि तोर सँवारब काजा॥॥३॥
तप के बल से उन्हीं के समान अपना रूप बनाकर, मैं यहाँ एक वर्ष तक रहूँगा। सुनो हे राजा, मैं उन्हीं का वेष धारण करके हर प्रकार से तुम्हारा काम सँवारूँगा।
गै निसि बहुत सयन अब कीजे। मोहि तोहि भूप भेंट दिन तीजे॥मैं तपबल तोहि तुरग समेता। पहुँचेहउँ सोवतहि निकेता॥॥४॥
बहुत रात बीत चुकी है, अब सो जाओ। हे राजा, तीसरे दिन मैं तुमसे मिलूँगा। मैं तप के बल से तुम्हें घोड़े सहित सोते-सोते ही तुम्हारे महल में पहुँचा दूँगा।
मैं आउब सोइ बेषु धरि पहिचानेहु तब मोहि।जब एकांत बोलाइ सब कथा सुनावौं तोहि॥१६९॥
मैं उन्हीं का वेष धारण करके आऊँगा, तब तुम मुझे पहचान लेना — जब मैं तुम्हें एकांत में बुलाकर सारी बात समझाऊँ।
सयन कीन्ह नृप आयसु मानी। आसन जाइ बैठ छलग्यानी॥श्रमित भूप निद्रा अति आई। सो किमि सोव सोच अधिकाई॥॥१॥
राजा ने आज्ञा मानकर विश्राम किया, और वह छली-ज्ञानी तापस भी जाकर अपने आसन पर बैठ गया। थके हुए राजा को गहरी नींद आ गई — पर वह चिंतायुक्त तापस भला कैसे सो पाता।
कालकेतु निसिचर तहँ आवा। जेहिं सूकर होइ नृपहि भुलावा॥परम मित्र तापस नृप केरा। जानइ सो अति कपट घनेरा॥॥२॥
वहाँ कालकेतु नामक राक्षस आया, जिसने सूअर बनकर राजा को भुलाया था — वह तापस-बना राजा का परम मित्र था, और उसकी अत्यंत गहरी कपट-चालें जानता था।
तेहि के सत सुत अरु दस भाई। खल अति अजय देव दुखदाई॥प्रथमहिं भूप समर सब मारे। बिप्र संत सुर देखि दुखारे॥॥३॥
उसके सौ पुत्र और दस भाई थे, अत्यंत दुष्ट, अजेय और देवताओं को कष्ट देने वाले। पहले राजा ने ही युद्ध में उन सबको मार डाला था, यह देखकर ब्राह्मण, संत और देवता दुखी हो गए थे।
तेहिं खल पाछिल बयरु सँभरा। तापस नृप मिलि मंत्र बिचारा॥जेहि रिपु छय सोइ रचेन्हि उपाऊ। भावी बस न जान कछु राऊ॥॥४॥
उस दुष्ट ने पुराना बैर याद रखा, और तापस बने राजा से मिलकर यह षड्यंत्र रचा। जिससे शत्रु का नाश हो, उसी का उपाय उन्होंने रचा — पर भवितव्यता के वश राजा को इसका कुछ पता न चला।
रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु।अजहुँ देत दुख रबि ससिहि सिर अवसेषित राहु॥१७०॥
शत्रु चाहे तेजस्वी हो या अकेला और छोटा भी, उसे कभी कम मत समझो। आज भी राहु का बचा हुआ सिर सूर्य और चंद्रमा को दुःख देता रहता है।
तापस नृप निज सखहि निहारी। हरषि मिलेउ उठि भयउ सुखारी॥मित्रहि कहि सब कथा सुनाई। जातुधान बोला सुख पाई॥॥१॥
तापस-रूपी राजा ने अपने मित्र को देखकर हर्षित होकर उसका स्वागत किया, उठकर मिलकर वह सुखी हो गया। मित्र को सारी कथा सुनाकर, वह राक्षस सुख पाकर बोला —
अब साधेउँ रिपु सुनहु नरेसा। जौं तुम्ह कीन्ह मोर उपदेसा॥परिहरि सोच रहहु तुम्ह सोई। बिनु औषध बिआधि बिधि खोई॥॥२॥
सुनो हे राजा, अब शत्रु साध लिया गया, यदि तुमने मेरी सीख मान ली। सारी चिंता त्यागकर निश्चिंत रहो, बिना औषधि के भी विधाता व्याधि को नष्ट कर देंगे।
कुल समेत रिपु मूल बहाई। चौथे दिवस मिलब मैं आई॥तापस नृपहि बहुत परितोषी। चला महाकपटी अतिरोषी॥॥३॥
कुल सहित शत्रु की जड़ बहाकर, चौथे दिन मैं आकर तुमसे मिलूँगा। तापस ने राजा को बहुत संतोष देकर विदा किया, और वह महाकपटी अत्यंत क्रोधी राक्षस चल दिया।
भानुप्रतापहि बाजि समेता। पहुँचाएसि छन माझ निकेता॥नृपहि नारि पहिं सयन कराई। हयगृहँ बाँधेसि बाजि बनाई॥॥४॥
उसने प्रतापभानु को घोड़े सहित क्षणभर में ही महल में पहुँचा दिया। राजा को रानी के पास सुला दिया, और घोड़े को अश्वशाला में बाँध दिया।
राजा के उपरोहितहि हरि लै गयउ बहोरि।लै राखेसि गिरि खोह महुँ माया करि मति भोरि॥१७१॥
फिर वह राजा के पुरोहित को हर ले गया, और अपनी माया से उनकी बुद्धि भ्रमित करके उन्हें एक पर्वत की गुफा में छिपाकर रख दिया।
आपु बिरचि उपरोहित रूपा। परेउ जाइ तेहि सेज अनूपा॥जागेउ नृप अनभएँ बिहाना। देखि भवन अति अचरजु माना॥॥१॥
फिर स्वयं पुरोहित का रूप धारण करके वह उसी अनुपम शय्या पर जाकर लेट गया। सवेरा होते ही राजा जागा, और अपने महल को देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ।
मुनि महिमा मन महुँ अनुमानी। उठेउ गवँहि जेहि जान न रानी॥कानन गयउ बाजि चढ़ि तेहीं। पुर नर नारि न जानेउ केहीं॥॥२॥
मन में मुनि की महिमा का अनुमान लगाकर वह गर्व के साथ उठा, कि रानी को भी पता न चले। उसी घोड़े पर चढ़कर वह वन को चला गया, नगर के किसी भी स्त्री-पुरुष को इसका पता नहीं चला।
गए जाम जुग भूपति आवा। घर घर उत्सव बाज बधावा॥उपरोहितहि देख जब राजा। चकित बिलोकि सुमिरि सोइ काजा॥॥३॥
दो पहर बीतने पर राजा लौटा, घर-घर उत्सव और बधाई के बाजे बजने लगे। जब राजा ने पुरोहित को देखा, तो चकित होकर देखते हुए अपने कार्य का स्मरण किया।
जुग सम नृपहि गए दिन तीनी। कपटी मुनि पद रह मति लीनी॥समय जानि उपरोहित आवा। नृपहि मते सब कहि समुझावा॥॥४॥
राजा के दो-तीन दिन युग के समान बीते, कपटी मुनि पुरोहित के पद पर लीन मन से बैठा रहा। समय जानकर असली पुरोहित लौट आया, और उसने राजा को सारी योजना समझा दी।
नृप हरषेउ पहिचानि गुरु भ्रम बस रहा न चेत।बरे तुरत सत सहस बर बिप्र कुटुंब समेत॥१७२॥
गुरु को पहचानकर राजा हर्षित हुआ, भ्रम के वश उसे कुछ सुध न रही। तुरंत उसने एक लाख श्रेष्ठ ब्राह्मणों को परिवार सहित निमंत्रित किया।
उपरोहित जेवनार बनाई। छरस चारि बिधि जसि श्रुति गाई॥मायामय तेहिं कीन्ह रसोई। बिंजन बहु गनि सकइ न कोई॥॥१॥
पुरोहित ने भोज तैयार किया, वेदों में बताई छहों रस और चार प्रकार की विधि से। उसने माया से रसोई बनाई, जिसमें इतने व्यंजन थे कि कोई गिन ही नहीं सकता था।
बिबिध मृगन्ह कर आमिष राँधा। तेहि महुँ बिप्र माँसु खल साँधा॥भोजन कहुँ सब बिप्र बोलाए। पद पखारि सादर बैठाए॥॥२॥
विविध मृगों का मांस पकाया गया, और उसमें उस दुष्ट ने ब्राह्मण का मांस भी मिला दिया। भोजन के लिए सभी ब्राह्मणों को बुलाया गया, पैर धोकर आदरपूर्वक बिठाया गया।
परुसन जबहिं लाग महिपाला। भै अकासबानी तेहि काला॥बिप्रबृंद उठि उठि गृह जाहू। है बड़ि हानि अन्न जनि खाहू॥॥३॥
जैसे ही राजा भोजन परोसने लगा, उसी समय आकाशवाणी हुई — हे ब्राह्मण-समूह, उठो-उठो, अपने घर जाओ, यह अन्न मत खाओ, बड़ी हानि होगी।
भयउ रसोईं भूसुर माँसू। सब द्विज उठे मानि बिस्वासू॥भूप बिकल मति मोहँ भुलानी। भावी बस न आव मुख बानी॥॥४॥
रसोई में ब्राह्मण का मांस मिला हुआ था, यह सुनकर सारे ब्राह्मण विश्वास मानकर उठ खड़े हुए। राजा व्याकुल हो गया, उसकी बुद्धि भी मोहग्रस्त हो गई, भवितव्यता के वश मुख से कोई वाणी न निकली।
बोले बिप्र सकोप तब नहिं कछु कीन्ह बिचार।जाइ निसाचर होहु नृप मूढ़ सहित परिवार॥१७३॥
क्रोधित होकर ब्राह्मण बोले, तब उन्होंने कुछ भी विचार नहीं किया — जाओ, हे मूढ़ राजा, अपने परिवार सहित राक्षस बन जाओ।
छत्रबंधु तें बिप्र बोलाई। घाले लिए सहित समुदाई॥ईस्वर राखा धरम हमारा। जैहसि तें समेत परिवारा॥॥१॥
क्षत्रिय होकर तूने ब्राह्मणों को बुलाकर, उन्हें छल से बुलाकर मरवा डाला। हमारे धर्म की रक्षा ईश्वर ने की, अब तू अपने परिवार सहित राक्षस-योनि में जन्म लेगा।
संबत मध्य नास तव होऊ। जलदाता न रहिहि कुल कोऊ॥नृप सुनि श्राप बिकल अति त्रासा। भै बहोरि बर गिरा अकासा॥॥२॥
एक वर्ष के भीतर तुम्हारा नाश हो, तुम्हारे कुल में जल-तर्पण देने वाला भी कोई न बचे। यह शाप सुनकर राजा अत्यंत भयभीत हो उठा, तभी फिर आकाश से एक वरदान की वाणी हुई।
बिप्रहु श्राप बिचारि न दीन्हा। नहिं अपराध भूप कछु कीन्हा॥चकित बिप्र सब सुनि नभबानी। भूप गयउ जहँ भोजन खानी॥॥३॥
ब्राह्मणों ने बिना विचारे ही यह शाप दे दिया, राजा ने कोई अपराध नहीं किया था। यह आकाशवाणी सुनकर सारे ब्राह्मण चकित रह गए, और राजा वहाँ गया जहाँ भोजन बनाया गया था।
तहँ न असन नहिं बिप्र सुआरा। फिरेउ राउ मन सोच अपारा॥सब प्रसंग महिसुरन्ह सुनाई। त्रसित परेउ अवनीं अकुलाई॥॥४॥
वहाँ न तो कोई भोजन था, न ब्राह्मण रसोइया — राजा अत्यंत सोच में डूबा हुआ लौट आया। उसने सारा प्रसंग ब्राह्मणों को सुनाया, यह सुनकर वे भी भयभीत होकर व्याकुल हो गए।
भूपति भावी मिटइ नहिं जदपि न दूषन तोर।किए अन्यथा होइ नहिं बिप्रश्राप अति घोर॥१७४॥
हे राजा, भवितव्यता कभी टलती नहीं, यद्यपि इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। ब्राह्मण का शाप कभी अन्यथा नहीं होता, वह अत्यंत भयंकर होता है।
अस कहि सब महिदेव सिधाए। समाचार पुरलोगन्ह पाए॥सोचहिं दूषन दैवहि देहीं। बिचरत हंस काग किय जेहीं॥॥१॥
ऐसा कहकर सभी ब्राह्मण चले गए, नगरवासियों को भी यह सारा समाचार मिल गया। सब सोचने लगे कि देवता को इसका दोष कैसे दें, जैसे हंस बनाते-बनाते कौआ बन गया हो।
उपरोहितहि भवन पहुँचाई। असुर तापसहि खबरि जनाई॥तेहिं खल जहँ तहँ पत्र पठाए। सजि सजि सेन भूप सब धाए॥॥२॥
राजा के असली पुरोहित को उनके घर पहुँचाकर, राक्षस ने कपटी तापस को यह सारी खबर दी। उस दुष्ट ने जहाँ-तहाँ पत्र भेजे, और सारे राजा सेना सजाकर दौड़ पड़े।
घेरेन्हि नगर निसान बजाई। बिबिध भाँति नित होइ लराई॥जूझे सकल सुभट करि करनी। बंधु समेत परेउ नृप धरनी॥॥३॥
उन्होंने नगर को घेर लिया, नगाड़े बजाकर विविध प्रकार से नित्य युद्ध होने लगा। सारे योद्धा वीरतापूर्वक लड़कर मारे गए, और राजा भी अपने भाई सहित पृथ्वी पर गिर पड़ा।
सत्यकेतु कुल कोउ नहिं बाँचा। बिप्रश्राप किमि होइ असाँचा॥रिपु जिति सब नृप नगर बसाई। निज पुर गवने जय जसु पाई॥॥४॥
सत्यकेतु के कुल में कोई नहीं बचा, ब्राह्मण का शाप भला कभी झूठा कैसे हो सकता है। शत्रु राजाओं ने विजय पाकर नगर बसाया, और यश पाकर अपने-अपने नगरों को लौट गए।
भरद्वाज सुनु जाहि जब होइ बिधाता बाम।धूरि मेरुसम जनक जम ताहि ब्यालसम दाम॥१७५॥
हे भरद्वाज, सुनो, जिस पर विधाता प्रतिकूल हो जाते हैं, उसे धूल भी मेरु पर्वत के समान भारी और मित्र भी यमराज के समान, और रस्सी भी सर्प के समान लगने लगती है।
काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा। भयउ निसाचर सहित समाजा॥दस सिर ताहि बीस भुजदंडा। रावन नाम बीर बरिबंडा॥॥१॥
सुनो हे मुनि, समय पाकर वही राजा अपने समाज सहित राक्षस बना। दस सिरों और बीस भुजाओं वाला वह अत्यंत बलशाली वीर रावण नाम से प्रसिद्ध हुआ।
भूप अनुज अरिमर्दन नामा। भयउ सो कुंभकरन बलधामा॥सचिव जो रहा धरमरुचि जासू। भयउ बिमात्र बंधु लघु तासू॥॥२॥
राजा का छोटा भाई अरिमर्दन, वही बलशाली कुंभकर्ण बना। जो धर्मरुचि नामक मंत्री था, वह उनका सौतेला छोटा भाई बना।
नाम बिभीषन जेहि जग जाना। बिष्नुभगत बिग्यान निधाना॥रहे जे सुत सेवक नृप केरे। भए निसाचर घोर घनेरे॥॥३॥
उसका नाम विभीषण हुआ, जिसे संसार जानता है — विष्णु-भक्त और ज्ञान के भंडार। जो पहले राजा के पुत्र-सेवक थे, वे सब भी अत्यंत भयंकर राक्षस बने।
कामरूप खल जिनस अनेका। कुटिल भयंकर बिगत बिबेका॥कृपा रहित हिंसक सब पापी। बरनि न जाहिं बिस्व परितापी॥॥४॥
वे इच्छानुसार रूप धरने वाले अनेक प्रकार के दुष्ट, कुटिल, भयंकर और विवेकहीन थे। सब निर्दयी, हिंसक और पापी थे, जिनका वर्णन नहीं हो सकता, संसार भर के लिए संताप देने वाले।
उपजे जदपि पुलस्त्यकुल पावन अमल अनूप।तदपि महीसुर श्राप बस भए सकल अघरूप॥॥१७६॥
यद्यपि वे पुलस्त्य के पवित्र, निर्मल और अनुपम कुल में उत्पन्न हुए थे, तथापि ब्राह्मण के शाप के कारण वे सब पापरूप हो गए।
कीन्ह बिबिध तप तीनिहुँ भाई। परम उग्र नहिं बरनि सो जाई॥गयउ निकट तप देखि बिधाता। मागहु बर प्रसन्न मैं ताता॥॥१॥
तीनों भाइयों ने विविध प्रकार का अत्यंत उग्र तप किया, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। उनका तप देखकर ब्रह्माजी निकट आए — हे तात, माँगो, मैं प्रसन्न हूँ।
करि बिनती पद गहि दससीसा। बोलेउ बचन सुनहु जगदीसा॥हम काहू के मरहिं न मारें। बानर मनुज जाति दुइ बारें॥॥२॥
विनती करके, चरण पकड़कर रावण बोला — सुनिए हे जगदीश्वर। हमें कोई भी न मारे, न हम मरें — देवता, दानव को छोड़कर, बस वानर और मनुष्य इन दो जातियों को छोड़कर।
एवमस्तु तुम्ह बड़ तप कीन्हा। मैं ब्रह्माँ मिलि तेहि बर दीन्हा॥पुनि प्रभु कुंभकरन पहिं गयऊ। तेहि बिलोकि मन बिसमय भयऊ॥॥३॥
एवमस्तु, तुमने बड़ा तप किया है — ऐसा कहकर ब्रह्माजी ने उसे यह वर दे दिया। फिर प्रभु कुंभकर्ण के पास गए, उसे देखकर उनके मन में विस्मय हुआ।
जौं एहिं खल नित करब अहारू। होइहि सब उजारि संसारू॥सारद प्रेरि तासु मति फेरी। मागेसि नीद मास षट केरी॥॥४॥
यदि यह दुष्ट नित्य आहार करता रहे, तो सारा संसार ही उजड़ जाएगा। शारदा को प्रेरित कर उसकी बुद्धि फिरा दी, और उसने छह महीने की नींद माँग ली।
गए बिभीषन पास पुनि कहेउ पुत्र बर मागु।तेहिं मागेउ भगवंत पद कमल अमल अनुरागु॥१७७॥
फिर ब्रह्माजी विभीषण के पास गए और कहा — हे पुत्र, वर माँगो। उसने भगवान के निर्मल चरण-कमलों में अनुराग ही माँगा।
तिन्हहि देइ बर ब्रह्म सिधाए। हरषित ते अपने गृह आए॥मय तनुजा मंदोदरि नामा। परम सुंदरी नारि ललामा॥॥१॥
तीनों को वरदान देकर ब्रह्माजी चले गए, वे हर्षित होकर अपने-अपने घर लौट आए। मय दानव की पुत्री का नाम मंदोदरी था, वह परम सुंदरी और नारियों में शिरोमणि थी।
सोइ मयँ दीन्हि रावनहि आनी। होइहि जातुधानपति जानी॥हरषित भयउ नारि भलि पाई। पुनि दोउ बंधु बिआहेसि जाई॥॥२॥
मय ने वही मंदोदरी लाकर रावण को दे दी, यह जानकर कि वह राक्षसों का राजा बनेगा। सुंदर पत्नी पाकर रावण हर्षित हुआ, फिर उसने अपने दोनों भाइयों का भी विवाह करा दिया।
गिरि त्रिकूट एक सिंधु मझारी। बिधि निर्मित दुर्गम अति भारी॥सोइ मय दानवँ बहुरि सँवारा। कनक रचित मनिभवन अपारा॥॥३॥
समुद्र के बीच त्रिकूट नामक एक पर्वत था, जिसे ब्रह्माजी ने अत्यंत विशाल दुर्ग के रूप में बनाया था। उस पर्वत को मय दानव ने फिर सजाया, सोने से बने अपार मणिजड़ित भवन बनाए।
भोगावति जसि अहिकुल बासा। अमरावति जसि सक्रनिवासा॥तिन्ह तें अधिक रम्य अति बंका। जग बिख्यात नाम तेहि लंका॥॥४॥
जैसे नागलोक की भोगावती नगरी है और इंद्र का निवास अमरावती है, उनसे भी अधिक रमणीय और भव्य वह नगरी थी, जिसका संसार भर में प्रसिद्ध नाम था — लंका।
खाई सिंधु गभीर अति चारिहुँ दिसि फिरि आव।कनक कोट मनि खचित दृढ़ बरनि न जाइ बनाव॥१७८(क)॥
चारों ओर एक अत्यंत गहरी समुद्र-खाई घूमकर आती थी, सोने के परकोटे मणियों से जड़े और अत्यंत दृढ़ थे, जिसकी बनावट का वर्णन नहीं हो सकता।
हरिप्रेरित जेहिं कलप जोइ जातुधानपति होइ।सूर प्रतापी अतुलबल दल समेत बस सोइ॥१७८(ख)॥
हरि की ही प्रेरणा से जिस कल्प में जो यक्षपति बनता है, वह प्रतापी शूरवीर अपनी अतुल सेना सहित भी अंततः वश में हो ही जाता है।
रहे तहाँ निसिचर भट भारे। ते सब सुरन्ह समर संघारे॥अब तहँ रहहिं सक्र के प्रेरे। रच्छक कोटि जच्छपति केरे॥॥१॥
वहाँ जो बड़े-बड़े बलशाली राक्षस योद्धा रहते थे, देवताओं ने युद्ध में उन सबका संहार कर दिया। अब वहाँ इंद्र की प्रेरणा से यक्षपति कुबेर के करोड़ों रक्षक निवास करते थे।
दसमुख कतहुँ खबरि असि पाई। सेन साजि गढ़ घेरेसि जाई॥देखि बिकट भट बड़ि कटकाई। जच्छ जीव लै गए पराई॥॥२॥
रावण को कहीं से यह समाचार मिला, तो उसने सेना सजाकर जाकर उस दुर्ग को घेर लिया। विकट योद्धाओं और बड़ी सेना को देखकर, यक्ष अपने प्राण लेकर भाग गए।
फिरि सब नगर दसानन देखा। गयउ सोच सुख भयउ बिसेषा॥सुंदर सहज अगम अनुमानी। कीन्हि तहाँ रावन रजधानी॥॥३॥
घूम-घूमकर दसानन ने पूरा नगर देखा, उसकी सारी चिंता जाती रही और उसे विशेष सुख हुआ। इसे स्वभाव से ही सुंदर और दुर्गम मानकर, उसने वहीं लंका को अपनी राजधानी बना ली।
जेहि जस जोग बाँटि गृह दीन्हे। सुखी सकल रजनीचर कीन्हे॥एक बार कुबेर पर धावा। पुष्पक जान जीति लै आवा॥॥४॥
जिसे जो पद योग्य था, उसे बाँटकर घर दे दिए, इस तरह उसने सभी राक्षसों को सुखी कर दिया। एक बार वह कुबेर पर चढ़ाई करने गया, और पुष्पक विमान को जीतकर ले आया।
कौतुकहीं कैलास पुनि लीन्हेसि जाइ उठाइ।मनहुँ तौलि निज बाहुबल चला बहुत सुख पाइ॥१७९॥
फिर एक बार कौतुकवश उसने कैलास पर्वत को ही उठा लिया, मानो अपने बाहुबल को तौल रहा हो, और बड़ा सुख पाकर वहाँ से चल दिया।
